श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक १३ ]
- साधक-संजीवनी *
८१
उस नित्य-तत्त्वको हम सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका आधार और सम्पूर्ण प्रतीतियोंका प्रकाशक कह सकते हैं। परन्तु ये आधार और प्रकाशक नाम भी आधेय और प्रकाश्यके सम्बन्धसे ही हैं। आधेय और प्रकाश्यके
न रहनेपर भी उसकी सत्ता ज्यों-की-त्यों ही है। उस सत्य-तत्त्वकी तरफ जिसकी दृष्टि है, उसको शोक कैसे हो सकता है? अर्थात् नहीं हो सकता। इसी दृष्टिसे मैं, तू और राजालोग स्वरूपसे अशोच्य हैं।
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें परमात्मा और जीवात्माके साधर्म्यका वर्णन है। भगवान् कहते हैं कि मैं कृष्णरूपसे, तू अर्जुनरूपसे तथा सब लोग राजारूपसे पहले भी नहीं थे और आगे भी नहीं रहेंगे, पर सत्तारूपसे हम सब पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। तात्पर्य है कि मैं, तू तथा राजालोग—ये तीनों शरीरको लेकर तो अलग-अलग हैं, पर सत्ताको लेकर एक ही हैं। शरीर तो पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे, पर स्वरूप (स्वयं) की सत्ता पहले भी थी, बादमें भी रहेगी और वर्तमानमें है ही। जब ये शरीर नहीं थे, तब भी सत्ता थी और जब ये शरीर नहीं रहेंगे, तब भी सत्ता रहेगी। एक सत्ताके सिवाय कुछ नहीं है।
मैं, तू तथा ये राजालोग—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि परमात्माकी सत्ता और जीवकी सत्ता एक ही है अर्थात् 'है' और 'हूँ'—दोनोंमें एक ही चिन्मय सत्ता है। 'मैं' (अहम्) के सम्बन्धसे ही 'हूँ' है। अगर 'मैं' (अहम्) का सम्बन्ध न रहे तो 'हूँ' नहीं रहेगा, प्रत्युत 'है' ही रहेगा। वह 'है' अर्थात् चिन्मय सत्तामात्र ही हमारा स्वरूप है, शरीर हमारा स्वरूप नहीं है। इसलिये शरीरको लेकर शोक नहीं करना चाहिये।
भूतकाल और भविष्यकालकी घटना जितनी दूर दीखती है, उतनी ही दूर वर्तमान भी है। जैसे भूत और भविष्यसे हमारा सम्बन्ध नहीं है, ऐसे ही वर्तमानसे भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। जब सम्बन्ध ही नहीं है, तो फिर भूत, भविष्य और वर्तमानमें क्या फर्क हुआ? ये तीनों कालके अन्तर्गत हैं, जबकि हमारा स्वरूप कालसे अतीत है। कालका तो खण्ड होता है, पर स्वरूप (सत्ता) अखण्ड है। शरीरको अपना स्वरूप माननेसे ही भूत, भविष्य और वर्तमानमें फर्क दीखता है। वास्तवमें भूत, भविष्य और वर्तमान विद्यमान है ही नहीं!
अनेक युग बदल जायँ तो भी शरीरी बदलता नहीं, वह-का-वह ही रहता है; क्योंकि वह परमात्माका अंश है। परन्तु शरीर बदलता ही रहता है, क्षणमात्र भी वह नहीं रहता।
देहिनोऽस्मिन्थथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
| देहिनः | = देहधारीके | यौवनम् | = जवानी (और) | प्राप्ति होती है। |
|---|---|---|---|---|
| अस्मिन् | = इस | जरा | = वृद्धावस्था | |
| (होती है), | तत्र = उस विषयमें | |||
| देहे | = मनुष्यशरीरमें | तथा | = ऐसे ही | धीरः = धीर मनुष्य |
| यथा | = जैसे | देहान्तरप्राप्तिः | = दूसरे शरीरकी | न, मुह्यति = मोहित नहीं होता। |
| कौमारम् | = बालकपन, |
व्याख्या —'देहिनोऽस्मिन्थथा देहे* कौमारं यौवनं जरा'—शरीरधारीके शरीरमें पहले बाल्यावस्था आती है, फिर युवावस्था आती है और फिर वृद्धावस्था आती है। तात्पर्य है कि शरीरमें कभी एक अवस्था नहीं रहती, उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है।
यहाँ 'शरीरधारीके इस शरीरमें'—ऐसा कहनेसे सिद्ध होता है कि शरीरी अलग है और शरीर अलग है। शरीरी
द्रष्टा है और शरीर दृश्य है। अतः शरीरमें बालकपन आदि अवस्थाओंका जो परिवर्तन है, वह परिवर्तन शरीरीमें नहीं है।
'तथा देहान्तरप्राप्तिः'—जैसे शरीरकी कुमार, युवा आदि अवस्थाएँ होती हैं, ऐसे ही देहान्तरकी अर्थात् दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है। जैसे स्थूलशरीर बालकसे जवान एवं जवानसे बूढ़ा हो जाता है, तो इन अवस्थाओंके परिवर्तनको लेकर कोई शोक नहीं होता, ऐसे ही शरीरी एक
- कुमार, युवा और वृद्धावस्था तो मात्र शरीरधारियोंके शरीरोंकी होती है; परन्तु यहाँ 'अस्मिन् देहे' पदोंमें 'देह' शब्द मनुष्य-शरीरका वाचक मानना चाहिये।
८२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है, तो इस विषयमें भी शोक नहीं होना चाहिये। जैसे स्थूलशरीरके रहते-रहते कुमार, युवा आदि अवस्थाएँ होती हैं, ऐसे ही सूक्ष्म और कारण-शरीरके रहते-रहते देहान्तरकी प्राप्ति होती है अर्थात् जैसे बालकपन, जवानी आदि स्थूल-शरीरकी अवस्थाएँ हैं, ऐसे देहान्तरकी प्राप्ति (मृत्युके बाद दूसरा शरीर धारण करना) सूक्ष्म और कारण-शरीरकी अवस्था है।
स्थूलशरीरके रहते-रहते कुमार आदि अवस्थाओंका परिवर्तन होता है—यह तो स्थूल दृष्टि है। सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो अवस्थाओंकी तरह स्थूलशरीरमें भी परिवर्तन होता रहता है। बाल्यावस्थामें जो शरीर था, वह युवावस्थामें नहीं है। वास्तवमें ऐसा कोई भी क्षण नहीं है, जिस क्षणमें स्थूलशरीरका परिवर्तन न होता हो। ऐसे ही सूक्ष्म और कारण-शरीरमें भी प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है, जो देहान्तररूपसे स्पष्ट देखनेमें आता है।
अब विचार यह करना है कि स्थूलशरीरका तो हमें ज्ञान होता है, पर सूक्ष्म और कारण-शरीरका हमें ज्ञान नहीं होता। अतः जब सूक्ष्म और कारण-शरीरका ज्ञान भी नहीं होता, तो उनके परिवर्तनका ज्ञान हमें कैसे हो सकता है? इसका उत्तर है कि जैसे स्थूलशरीरका ज्ञान उसकी अवस्थाओंको लेकर होता है, ऐसे ही सूक्ष्म और कारण-शरीरका ज्ञान भी उसकी अवस्थाओंको लेकर होता है। स्थूलशरीरकी 'जाग्रत्', सूक्ष्म-शरीरकी 'स्वप्न' और कारण-शरीरकी 'सुषुप्ति' अवस्था मानी जाती है। मनुष्य अपनी बाल्यावस्थामें अपनेको स्वप्नमें बालक देखता है, युवावस्थामें स्वप्नमें युवा देखता है और वृद्धावस्थामें स्वप्नमें वृद्ध देखता है। इससे सिद्ध हो गया कि स्थूलशरीरके साथ-साथ सूक्ष्मशरीरका भी परिवर्तन होता है। ऐसे ही सुषुप्ति-अवस्था बाल्यावस्थामें ज्यादा होती है, युवावस्थामें कम होती है और वृद्धावस्थामें वह बहुत कम हो जाती है; अतः इससे कारणशरीरका परिवर्तन भी सिद्ध हो गया।
दूसरी बात, बाल्यावस्था और युवावस्थामें नींद लेनेपर शरीर और इन्द्रियोंमें जैसी ताजगी आती है, वैसी ताजगी वृद्धावस्थामें नींद लेनेपर नहीं आती अर्थात् वृद्धावस्थामें बाल्य और युवा-अवस्था-जैसा विश्राम नहीं मिलता। इस रीतिसे भी कारणशरीरका परिवर्तन सिद्ध होता है।
जिसको दूसरा—देवता, पशु, पक्षी आदिका शरीर मिलता है, उसको उस शरीरमें (देहाध्यासके कारण) 'मैं यही हूँ'—ऐसा अनुभव होता है, तो यह सूक्ष्मशरीरका परिवर्तन हो गया। ऐसे ही कारणशरीरमें स्वभाव (प्रकृति) रहता है, जिसको स्थूल दृष्टिसे आदत कहते हैं। वह आदत देवताकी और होती है तथा पशु-पक्षी आदिकी और होती है, तो यह कारणशरीरका परिवर्तन हो गया।
अगर शरीरी-(देही-) का परिवर्तन होता, तो अवस्थाओंके बदलनेपर भी 'मैं वही हूँ'—ऐसा ज्ञान नहीं होता। परन्तु अवस्थाओंके बदलनेपर भी 'जो पहले बालक था, जवान था, वही मैं अब हूँ'—ऐसा ज्ञान होता है। इससे सिद्ध होता है कि शरीरमें अर्थात् स्वयंमें परिवर्तन नहीं हुआ है।
यहाँ एक शंका हो सकती है कि स्थूलशरीरकी अवस्थाओंके बदलनेपर तो उनका ज्ञान होता है, पर शरीरान्तरकी प्राप्ति होनेपर पहलेके शरीरका ज्ञान क्यों नहीं होता? पूर्वशरीरका ज्ञान न होनेमें कारण यह है कि मृत्यु और जन्मके समय बहुत ज्यादा कष्ट होता है। उस कष्टके कारण बुद्धिमें पूर्वजन्मकी स्मृति नहीं रहती। जैसे लकवा मार जानेपर, अधिक वृद्धावस्था होनेपर बुद्धिमें पहले जैसा ज्ञान नहीं रहता, ऐसे ही मृत्युकालमें तथा जन्मकालमें बहुत बड़ा धक्का लगनेपर पूर्वजन्मका ज्ञान नहीं रहता। परन्तु जिसकी मृत्युमें ऐसा कष्ट नहीं होता अर्थात् शरीरकी अवस्थान्तरकी प्राप्तिकी तरह अनायास ही देहान्तरकी प्राप्ति हो जाती है, उसकी बुद्धिमें पूर्वजन्मकी स्मृति रह सकती है।
अब विचार करें कि जैसा ज्ञान अवस्थान्तरकी प्राप्तिमें
१-देहान्तरकी प्राप्ति होनेपर स्थूलशरीर तो छूट जाता है, पर मुक्तिसे पहले सूक्ष्म और कारणशरीर नहीं छूटते। जबतक मुक्ति न हो तबतक सूक्ष्म और कारणशरीरके साथ सम्बन्ध बना रहता है।
२-शास्त्रमें इस ज्ञानको 'प्रत्यभिज्ञा' कहा गया है—'तत्तेदन्तावगाहि ज्ञानं प्रत्यभिज्ञा'।
३-प्रियते रुदतां स्वानामुरुवेदनयास्तधीः। (श्रीमद्भगवद्गीता ३।३०।१८)
'मनुष्य रोते हुए स्वजनोंके बीच अत्यन्त वेदनासे अचेत होकर मृत्युको प्राप्त होता है।'
विनिष्क्रामति कृच्छ्रेण निरुच्छवासो हतस्मृतिः ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ३।३१।२३)
'जन्मके समय उसके श्वासकी गति रुक जाती है और पूर्वस्मृति नष्ट हो जाती है।'
४-ये मृताः सहसा मर्त्यां जायन्ते सहसा पुनः। तेषां पौराणिकोऽध्यासः कञ्चित् कालं हि तिष्ठति ॥
तस्माज्जातिस्मरा लोके जायन्ते बोधसंयुताः। तेषां विवर्धतां संज्ञा स्वप्नवत् सा प्रणश्यति ॥
(महाभारत, अनुशासनो १४५)
लोक १३ ]
- साधक-संजीवनी *
८३
होता है, वैसा ज्ञान देहान्तरकी प्राप्तिमें नहीं होता; परन्तु 'मैं हूँ' इस प्रकार अपनी सत्ताका ज्ञान तो सबको रहता है। जैसे, सुषुप्ति-(गाढ़-निद्रा-) में अपना कुछ भी ज्ञान नहीं रहता, पर जगनेपर मनुष्य कहता है कि ऐसी गाढ़ नींद आयी कि मेरेको कुछ पता नहीं रहा, तो 'कुछ पता नहीं रहा'—इसका ज्ञान तो है ही। सोनेसे पहले मैं जो था, वही मैं जगनेके बाद हूँ, तो सुषुप्तिके समय भी मैं वही था—इस प्रकार अपनी सत्ताका ज्ञान अखण्डरूपसे निरन्तर रहता है। अपनी सत्ताके अभावका ज्ञान कभी किसीको नहीं होता। शरीरधारीकी सत्ताका सद्भाव अखण्डरूपसे रहता है, तभी तो मुक्ति होती है और मुक्त-अवस्थामें वह रहता है। हाँ, जीवन्मुक्त अवस्थामें उसको शरीरान्तरोंका ज्ञान भले ही न हो, पर मैं तीनों शरीरोंसे अलग हूँ—ऐसा अनुभव तो होता ही है।
'धीरस्तत्र न मुहति' —धीर वही है, जिसको सत्-
असत्का बोध हो गया है। ऐसा धीर मनुष्य उस विषयमें कभी मोहित नहीं होता, उसको कभी सन्देह नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं है कि उस धीर मनुष्यको देहान्तरकी प्राप्ति होती है। ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होनेका कारण गुणोंका संग है और गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर धीर मनुष्यको देहान्तरकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती।
यहाँ 'तत्र ' पदका अर्थ 'देहान्तर-प्राप्तिके विषयमें' नहीं है, प्रत्युत 'देह-देहीके विषयमें' है। तात्पर्य है कि देह क्या है? देही क्या है? परिवर्तनशील क्या है? अपरिवर्तनशील क्या है? अनित्य क्या है? नित्य क्या है? असत् क्या है? सत् क्या है? विकारी क्या है? अविकारी क्या है?—इस विषयमें वह मोहित नहीं होता। देह और देही सर्वथा अलग हैं—इस विषयमें उसको कभी मोह नहीं होता। उसको अपनी असंगताका अखण्ड ज्ञान रहता है।
परिशिष्ट भाव —शरीर कभी एकरूप रहता ही नहीं और सत्ता कभी अनेकरूप होती ही नहीं। शरीर जन्मसे पहले भी नहीं था, मरनेके बाद भी नहीं रहेगा तथा वर्तमानमें भी वह प्रतिक्षण मर रहा है। वास्तवमें गर्भमें आते ही शरीरके मरनेका क्रम (परिवर्तन) शुरू हो जाता है। बाल्यावस्था मर जाय तो युवावस्था आ जाती है, युवावस्था मर जाय तो वृद्धावस्था आ जाती है और वृद्धावस्था मर जाय तो देहान्तर-अवस्था अर्थात् दूसरे शरीरकी प्राप्ति हो जाती है। ये सब अवस्थाएँ शरीरकी हैं। बाल, युवा और वृद्ध—ये तीन अवस्थाएँ स्थूलशरीरकी हैं और देहान्तरकी प्राप्ति सूक्ष्मशरीर तथा कारणशरीरकी है। परन्तु स्वरूपकी चिन्मय सत्ता इन सभी अवस्थाओंसे अतीत है। अवस्थाएँ बदलती हैं, स्वरूप वही रहता है। इस प्रकार शरीर-विभाग और सत्ता-विभागको अलग-अलग जाननेवाला तत्त्वज्ञ पुरुष कभी किसी अवस्थामें भी मोहित नहीं होता।
जीव अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये अनेक योनियोंमें जाता है, नरक और स्वर्गमें जाता है—ऐसा कहनेमात्रसे सिद्ध होता है कि चौरासी लाख योनियाँ छूट जाती हैं, स्वर्ग और नरक छूट जाते हैं, पर स्वयं (शरीरी) वही रहता है। योनियाँ (शरीर) बदलती हैं, जीव (शरीरी) नहीं बदलता। जीव एक रहता है, तभी तो वह अनेक योनियोंमें, अनेक लोकोंमें जाता है। जो अनेक योनियोंमें जाता है, वह स्वयं किसीके साथ लिप्त नहीं होता, कहीं नहीं फँसता। अगर वह लिप्त हो जाय, फँस जाय तो फिर चौरासी लाख योनियोंको कौन भोगेगा? स्वर्ग और नरकमें कौन जायगा? मुक्त कौन होगा?
जन्मना और मरना हमारा धर्म नहीं है, प्रत्युत शरीरका धर्म है। हमारी आयु अनादि और अनन्त है, जिसके अन्तर्गत अनेक शरीर उत्पन्न होते और मरते रहते हैं। जैसे हम अनेक वस्त्र बदलते रहते हैं, पर वस्त्र बदलनेपर हम नहीं बदलते, प्रत्युत वे-के-वे ही रहते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। ऐसे ही अनेक योनियोंमें जानेपर भी हमारी सत्ता नित्य-निरन्तर ज्यों-की-त्यों रहती है। तात्पर्य है कि हमारी स्वतन्त्रता और असंगता स्वतःसिद्ध है। हमारा जीवन किसी एक शरीरके अधीन नहीं है। असंग होनेके कारण ही हम अनेक शरीरोंमें जानेपर भी वही रहते हैं, पर शरीरके साथ संग मान लेनेके कारण हम अनेक शरीरोंको धारण करते रहते हैं। माना हुआ संग तो टिकता नहीं, पर हम नया-नया संग पकड़ते रहते हैं। अगर नया संग न पकड़ें तो मुक्ति (असंगता), स्वाधीनता स्वतःसिद्ध है।
सम्बन्ध—अनित्य वस्तु—शरीर आदिको लेकर जो शोक होता है, उसकी निवृत्तिके लिये कहते हैं—
'जो मनुष्य सहसा मृत्युको प्राप्त होकर फिर कहीं सहसा जन्म ले लेते हैं, उनका पुराना अभ्यास या संस्कार कुछ कालतक बना रहता है। इसलिये वे लोकमें पूर्वजन्मकी बातोंके ज्ञानसे युक्त होकर जन्म लेते हैं और जातिस्मर कहलाते हैं। फिर ज्यों-ज्यों वे बढ़ने लगते हैं, त्यों-त्यों उनकी स्वप्न-जैसी वह पुरानी स्मृति नष्ट होने लगती है।'
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | और उष्ण | (और) |
|---|---|---|---|
| मात्रास्पर्शाः | = इन्द्रियोंके विषय | ||
| (जड़ पदार्थ) | (प्रतिकूलता)-के | ||
| द्वारा सुख और | |||
| दुःख देनेवाले हैं | अनित्याः = अनित्य हैं । | ||
| तु | = तो | (तथा) | भारत = हे भरतवंशोद्भव |
| अर्जुन ! | |||
| शीतोष्ण- | तान् = उनको (तुम) | ||
| सुखदुःखदाः | = शीत (अनुकूलता) | आगमापायिनः = आने-जानेवाले | तितिक्षस्व = सहन करो । |
व्याख्या —[यहाँ एक शंका होती है कि इन चौदहवें-पंद्रहवें श्लोकोंसे पहले (ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक) और आगे (सोलहवेंसे तीसवें श्लोकतक) देही और देह—इन दोनोंका ही प्रकरण है। फिर बीचमें ‘मात्रास्पर्श’ के ये दो श्लोक (प्रकरणसे अलग) कैसे आये? इसका समाधान यह है कि जैसे बारहवें श्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण जीवोंके नित्य-स्वरूपको बतानेके लिये ‘किसी कालमें मैं नहीं था, ऐसी बात नहीं है’—ऐसा कहकर अपनेको उन्हींकी पंक्तिमें रख दिया, ऐसे ही शरीर आदि मात्र प्राकृत पदार्थोंको अनित्य, विनाशी, परिवर्तनशील बतानेके लिये भगवान्ने यहाँ ‘मात्रास्पर्श’ की बात कही है।]
‘तु’—नित्य-तत्त्वसे देहादि अनित्य वस्तुओंको अलग बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद आया है।
‘मात्रास्पर्शः’ —जिनसे माप-तील होता है अर्थात् जिनसे ज्ञान होता है, उन (ज्ञानके साधन) इन्द्रियों और अन्तःकरणका नाम ‘मात्रा ’ है। मात्रासे अर्थात् इन्द्रियों और अन्तःकरणसे जिनका संयोग होता है, उनका नाम ‘स्पर्श ’ है। अतः इन्द्रियों और अन्तःकरणसे जिनका ज्ञान होता है, ऐसे सुष्ठिके मात्र पदार्थ ‘मात्रास्पर्शः ’ हैं।
यहाँ ‘मात्रास्पर्शः ’ पदसे केवल पदार्थ ही क्यों लिये जायँ, पदार्थोंका सम्बन्ध क्यों न लिया जाय? अगर हम यहाँ ‘मात्रास्पर्शः ’ पदसे केवल पदार्थोंका सम्बन्ध ही लें, तो उस सम्बन्धको ‘आगमापायिनः ’ (आने-जानेवाला) नहीं कह सकते; क्योंकि सम्बन्धकी स्वीकृति केवल अन्तःकरणमें न होकर स्वयंमें (अहममें) होती है। स्वयं नित्य है, इसलिये उसमें जो स्वीकृति हो जाती है, वह भी नित्य-जैसी ही हो
जाती है। स्वयं जबतक उस स्वीकृतिको नहीं छोड़ता, तबतक वह स्वीकृति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है अर्थात् पदार्थोंका वियोग हो जानेपर भी, पदार्थोंके न रहनेपर भी, उन पदार्थोंका सम्बन्ध बना रहता है।* जैसे, कोई स्त्री विधवा हो गयी है अर्थात् उसका पतिसे सदाके लिये वियोग हो गया है, पर पचास वर्षके बाद भी उसको कोई कहता है कि यह अमुककी स्त्री है, तो उसके कान खड़े हो जाते हैं! इससे सिद्ध हुआ कि सम्बन्धी-(पति-) के न रहनेपर भी उसके साथ माना हुआ सम्बन्ध सदा बना रहता है। इस दृष्टिसे उस सम्बन्धको आने-जानेवाला कहना बनता नहीं; अतः यहाँ ‘मात्रास्पर्शः ’ पदसे पदार्थोंका सम्बन्ध न लेकर मात्र पदार्थ लिये गये हैं।
‘शीतोष्णसुखदुःखदाः’ —यहाँ शीत और उष्ण शब्द अनुकूलता और प्रतिकूलताके वाचक हैं। अगर इनका अर्थ सरदी और गरमी लिया जाय तो ये केवल त्वगिन्द्रिय-(त्वचा-)के विषय हो जायेंगे, जो कि एकदेशीय हैं। अतः शीतका अर्थ अनुकूलता और उष्णका अर्थ प्रतिकूलता लेना ही ठीक मालूम देता है।
मात्र पदार्थ अनुकूलता-प्रतिकूलताके द्वारा सुख-दुःख देनेवाले हैं अर्थात् जिसको हम चाहते हैं, ऐसी अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, देश, काल आदिके मिलनेसे सुख होता है और जिसको हम नहीं चाहते, ऐसी प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिके मिलनेसे दुःख होता है। यहाँ अनुकूलता-प्रतिकूलता कारण हैं और सुख-दुःख कार्य हैं। वास्तवमें देखा जाय तो इन पदार्थोंमें सुख-दुःख देनेकी सामर्थ्य नहीं है। मनुष्य इनके साथ
- यह माना हुआ सम्बन्ध केवल अस्वीकृतिसे अर्थात् अपनेमें न माननेसे ही मिटता है। अपने सत्स्वरूपमें सम्बन्ध है नहीं, हुआ नहीं और हो सकता भी नहीं; परन्तु माने हुए सम्बन्धकी अस्वीकृतिके बिना कितना ही त्याग किया जाय, कितना ही कष्ट भोगा जाय, शरीरमें कितना ही परिवर्तन हो जाय, कितनी ही तपस्या की जाय, तो भी माना हुआ सम्बन्ध मिटता नहीं, प्रत्युत ज्यों-का-त्यों ही बना रहता है।
श्लोक १४]
- साधक-संजीवनी *
८५
सम्बन्ध जोड़कर इनमें अनुकूलता-प्रतिकूलताकी भावना कर लेता है, जिससे ये पदार्थ सुख-दुःख देनेवाले दीखते हैं। अतः भगवान्ने यहाँ ‘सुखदुःखदाः’ कहा है।
‘आगमापायिनः’—मात्र पदार्थ आदि-अन्तवाले, उत्पत्ति-विनाशशील और आने-जानेवाले हैं। वे उठरनेवाले नहीं हैं; क्योंकि वे उत्पत्तिसे पहले नहीं थे और विनाशके बाद भी नहीं रहेंगे। इसलिये वे ‘आगमापायी’ हैं।
‘अनित्याः’—अगर कोई कहे कि वे उत्पत्तिसे पहले और विनाशके बाद भले ही न हों, पर मध्यमें तो रहते ही होंगे? तो भगवान् कहते हैं कि अनित्य होनेसे वे मध्यमें भी नहीं रहते। वे प्रतिक्षण बदलते रहते हैं। इतनी तेजीसे बदलते हैं कि उनको उसी रूपमें दुबारा कोई देख ही नहीं सकता; क्योंकि पहले क्षण वे जैसे थे, दूसरे क्षण वे वैसे रहते ही नहीं। इसलिये भगवान्ने उनको ‘अनित्याः’ कहा है।
केवल वे पदार्थ ही अनित्य, परिवर्तनशील नहीं हैं, प्रत्युत जिनसे उन पदार्थोंका ज्ञान होता है, वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण भी परिवर्तनशील हैं। उनके परिवर्तनको कैसे समझें? जैसे दिनमें काम करते-करते शामतक इन्द्रियों आदिमें थकावट आ जाती है, और सबेरे तृप्तपूर्वक नींद लेनेपर उनमें जो ताजगी आयी थी, वह शामतक नहीं रहती। इसलिये पुनः नींद लेनी पड़ती है, जिससे इन्द्रियोंकी थकावट मिटती है और ताजगीका अनुभव होता है। जैसे
परिशिष्ट भाव —जैसे शरीर कभी एकरूप नहीं रहता, प्रतिक्षण बदलता रहता है, ऐसे ही इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जिनका ज्ञान होता है, वे सम्पूर्ण सांसारिक पदार्थ (मात्र प्रकृति और प्रकृतिका कार्य) भी कभी एकरूप नहीं रहते, उनका संयोग और वियोग होता रहता है। जिन पदार्थोंको हम चाहते हैं, उनके संयोगसे सुख होता है और वियोगसे दुःख होता है। जिन पदार्थोंको हम नहीं चाहते, उनके वियोगसे सुख होता है और संयोगसे दुःख होता है। पदार्थ भी आने-जानेवाले तथा अनित्य हैं। ऐसे ही जिनसे पदार्थोंका ज्ञान होता है, वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण भी आने-जानेवाले तथा अनित्य हैं और पदार्थोंसे होनेवाला सुख-दुःख भी आने-जानेवाला तथा अनित्य है। परन्तु स्वयं सदा ज्यों-का-त्यों रहनेवाला, निर्विकार तथा नित्य है। अतः उनको सह लेना चाहिये। अर्थात् उनके संयोग-वियोगको लेकर सुखी-दुःखी नहीं होना चाहिये, प्रत्युत निर्विकार रहना चाहिये। सुख और दुःख दोनों अलग-अलग होते हैं, पर उनको देखनेवाला एक ही होता है और उन दोनोंसे अलग (निर्विकार) होता है। परिवर्तनशीलको देखनेसे स्वयं (स्वरूप) की अपरिवर्तनशीलता (निर्विकारता)-का अनुभव स्वतः होता है।
यहाँ ‘शीत’ शब्द अनुकूलताका और ‘उष्ण’ शब्द प्रतिकूलताका वाचक है। तात्पर्य है कि ज्यादा सर्दी (ठण्ड) पड़नेसे भी वृक्ष सूख जाता है और ज्यादा गर्मी पड़नेसे भी वृक्ष सूख जाता है; अतः परिणाममें सर्दी और गर्मी—दोनों एक ही हैं। इसी तरह अनुकूलता और प्रतिकूलता भी एक ही हैं। इसलिये भगवान् इन दोनोंको ही सहनेकी अर्थात् इनसे ऊँचा उठनेकी आज्ञा देते हैं।
सुख-दुःख, हर्ष-शोक, राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि आने-जानेवाले, बदलनेवाले हैं, पर स्वयं (स्वरूप) ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। साधकसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह बदलनेवाली दशाको देखता है, पर स्वयंको नहीं देखता।
जाग्रत्-अवस्थामें प्रतिक्षण थकावट आती रहती है, ऐसे ही नींदमें प्रतिक्षण ताजगी आती रहती है। इससे सिद्ध हुआ कि इन्द्रियों आदिमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है।
[यहाँ मात्र पदार्थोंको स्थूलरूपसे ‘आगमापायिनः’ और सूक्ष्मरूपसे ‘अनित्याः’ कहा गया है। इनको अनित्यसे भी सूक्ष्म बतानेके लिये आगे सोलहवें श्लोकमें इनको ‘असत्’ कहेंगे और पहले जिस नित्य-तत्त्वका वर्णन हुआ है, उसको ‘सत्’ कहेंगे।]
‘तात्स्तितिक्षस्व’—ये जितने मात्रास्पष्ट अर्थात् इन्द्रियोंके विषय हैं, उनके सामने आनेपर ‘यह अनुकूल है और यह प्रतिकूल है’—ऐसा ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत उनको लेकर अन्तःकरणमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार पैदा होना ही दोषी है। अतः अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान होनेपर भी राग-द्वेषादि विकारोंको पैदा न होने देना अर्थात् मात्रास्पष्टोंमें निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इस सहनेको ही भगवान्ने ‘तितिक्षस्व’ कहा है।
दूसरा भाव यह है कि शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिकी क्रियाओंका, अवस्थाओंका आरम्भ और अन्त होता है तथा उनका भाव और अभाव होता है। वे क्रियाएँ, अवस्थाएँ तुम्हारेमें नहीं हैं; क्योंकि तुम उनको जाननेवाले हो, उनसे अलग हो। तुम स्वयं ज्यों-के-त्यों रहते हो। अतः उन क्रियाओंमें, अवस्थाओंमें तुम निर्विकार रहो। इनमें निर्विकार रहना ही तितिक्षा है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
दशाको स्वीकार करता है, पर स्वयंको स्वीकार नहीं करता। दशा पहले भी नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी; अतः बीचमें दीखनेपर भी वह है नहीं। परन्तु स्वयंमें आदि, अन्त और मध्य है ही नहीं। दशा कभी एकरूप रहती ही नहीं और स्वयं कभी अनेकरूप होता ही नहीं। जो दीखता है, वह भी दशा है और जो देखनेवाली (बुद्धि) है, वह भी दशा है। जाननेमें आनेवाली भी दशा है, और जाननेवाली भी दशा है। स्वयंमें न दीखनेवाला है, न देखनेवाला है; न जाननेमें आनेवाला है, न जाननेवाला है। ये दीखनेवाला-देखनेवाला आदि सब दशाके अन्तर्गत हैं। दीखनेवाला-देखनेवाला तो नहीं रहेंगे, पर स्वयं रहेगा; क्योंकि दशा तो मिट जायगी, पर स्वयं रह जायगा। तात्पर्य है कि 'दीखनेवाले' (दृश्य) के साथ सम्बन्ध होनेसे ही स्वयं 'देखनेवाला' (द्रष्टा) कहलाता है। अगर 'दीखनेवाले' के साथ सम्बन्ध न रहे तो स्वयं रहेगा, पर उसका नाम 'देखनेवाला' नहीं रहेगा। इसी तरह 'शरीर' के साथ सम्बन्ध होनेसे ही स्वयं (चिन्मय सत्ता) 'शरीरी' कहलाता है। अगर 'शरीर' के साथ सम्बन्ध न रहे तो स्वयं रहेगा, पर उसका नाम 'शरीरी' नहीं रहेगा (गीता—तेरहवें अध्यायका पहला श्लोक)। अतः भगवान्ने केवल मनुष्योंको समझानेके लिये ही 'शरीरी' नाम कहा है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें मात्रास्पर्शोंकी तितिक्षाकी बात कही। अब ऐसी तितिक्षासे क्या होगा—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
| हि | = कारण कि | धीरम् | = बुद्धिमान् | नहीं करते, |
|---|---|---|---|---|
| पुरुषर्षभ | = हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ | पुरुषम् | = मनुष्यको | सः |
| अर्जुन! | एते | = ये मात्रास्पर्श | अमृतत्वाय | = अमर होनेमें |
| समदुःखसुखम् | = सुख-दुःखमें | (पदार्थ) | कल्पते | |
| सम रहनेवाले | न, व्यथयन्ति | = विचलित | अर्थात् वह अमर | |
| यम् | = जिस | (सुखी-दुःखी) |
व्याख्या—'पुरुषर्षभ'—मनुष्य प्रायः परिस्थितियोंको बदलनेका ही विचार करता है, जो कभी बदली नहीं जा सकती और जिनको बदलना सम्भव ही नहीं। युद्धरूपी परिस्थितिके प्राप्त होनेपर अर्जुनने उसको बदलनेका विचार न करके अपने कल्याणका विचार कर लिया है। यह कल्याणका विचार करना ही मनुष्योंमें उनकी श्रेष्ठता है।
'समदुःखसुखं धीरम्'—धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम होता है। अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही सुख और दुःख—ये दोनों अलग-अलग दीखते हैं। सुख-दुःखके भोगनेमें पुरुष (चेतन) हेतु है, और वह हेतु बनता है प्रकृतिमें स्थित होनेसे (गीता—तेरहवें अध्यायका बीसवाँ-इककीसवाँ श्लोक)। जब वह अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है, तब सुख-दुःखको भोगनेवाला कोई नहीं रहता। अतः अपने-आपमें स्थित होनेसे वह सुख-दुःखमें स्वाभाविक ही सम हो जाता है।
'यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषम्'—धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श अर्थात् प्रकृतिके मात्र पदार्थ व्यथा नहीं पहुँचाते। प्राकृत पदार्थोंके संयोगसे जो सुख होता है, वह भी व्यथा
है और उन पदार्थोंके वियोगसे जो दुःख होता है, वह भी व्यथा है। परन्तु जिसकी दृष्टि समताकी तरफ है, उसको ये प्राकृत पदार्थ सुखी-दुःखी नहीं कर सकते। समताकी तरफ दृष्टि रहनेसे अनुकूलताको लेकर उस सुखका ज्ञान तो होता है, पर उसका भोग न होनेसे अन्तःकरणमें उस सुखका स्थायी रूपसे संस्कार नहीं पड़ता। ऐसे ही प्रतिकूलता आनेपर उस दुःखका ज्ञान तो होता है, पर उसका भोग न होनेसे अन्तःकरणमें उस दुःखका स्थायीरूपसे संस्कार नहीं पड़ता। इस प्रकार सुख-दुःखके संस्कार न पड़नेसे वह व्यथित नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि अन्तःकरणमें सुख-दुःखका ज्ञान होनेसे वह स्वयं सुखी-दुःखी नहीं होता।
'सोऽमृतत्वाय कल्पते'—ऐसा धीर मनुष्य अमरताके योग्य हो जाता है अर्थात् उसमें अमरता प्राप्त करनेकी सामर्थ्य आ जाती है। सामर्थ्य, योग्यता आनेपर वह अमर हो ही जाता है, इसमें देरीका कोई काम नहीं। कारण कि उसकी अमरता तो स्वतःसिद्ध है। केवल पदार्थोंके संयोग-वियोगसे जो अपनेमें विकार मानता था, यही गलती थी।
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
८७
विशेष बात
यह मनुष्य-योनि सुख-दुःख भोगनेके लिये नहीं मिली है, प्रत्युत सुख-दुःखसे ऊँचा उठकर महान् आनन्द, परम शान्तिकी प्राप्तिके लिये मिली है, जिस आनन्द, सुख-शान्तिके प्राप्त होनेके बाद और कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रहता (गीता ६।२२)। अगर अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिके होनेमें अथवा उनकी सम्भावनामें हम सुखी होंगे अर्थात् हमारे भीतर अनुकूल वस्तु, व्यक्ति आदिको प्राप्त करनेकी कामना, लोलुपता रहेगी तो हम अनुकूलताका सदुपयोग नहीं कर सकेंगे। अनुकूलताका सदुपयोग करनेकी सामर्थ्य, शक्ति हमें प्राप्त नहीं हो सकेगी। कारण कि अनुकूलताका सदुपयोग करनेकी शक्ति अनुकूलताके भोगमें खर्च हो जायगी, जिससे अनुकूलताका सदुपयोग नहीं होगा; किन्तु भोग ही होगा। इसी रीतिसे प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, क्रिया आदिके आनेपर अथवा उनकी आशंकासे हम दुःखी होंगे तो प्रतिकूलताका सदुपयोग नहीं होगा; किन्तु भोग ही होगा। दुःखको सहनेकी सामर्थ्य हमारेमें नहीं रहेगी। अतः हम प्रतिकूलताके भोगमें ही फँसे रहेंगे और दुःखी होते रहेंगे।
अगर अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिके प्राप्त होनेपर सुख-सामग्रीका अपने सुख, आराम, सुविधाके लिये उपयोग करेंगे और उससे राजी होंगे तो यह अनुकूलताका भोग हुआ। परन्तु निर्वाह-बुद्धिसे उपयोग करते हुए उस सुख-सामग्रीको अभावग्रस्तोंकी सेवामें लगा दें तो यह अनुकूलताका सदुपयोग हुआ। अतः सुख-सामग्रीको दुःखियोंकी ही समझें। उसमें दुःखियोंका ही हक है। मान लो कि हम लखपति हैं तो हमें लखपति होनेका सुख होता है, अभिमान होता है। परन्तु यह सब तब होता है, जब हमारे सामने कोई लखपति न हो। अगर हमारे सामने, हमारे देखने-सुननेमें जो आते हैं, वे सब-के-सब करोड़पति हों, तो क्या हमें लखपति होनेका सुख मिलेगा? बिलकुल नहीं मिलेगा। अतः हमें लखपति होनेका सुख तो अभावग्रस्तोंने, दरिद्रोंने ही दिया है। अगर हम मिली हुई सुख-सामग्रीसे अभावग्रस्तोंकी सेवा न करके स्वयं सुख भोगते हैं, तो हम कृतघ्न होते हैं। इसीसे सब अनर्थ पैदा होते हैं। कारण कि हमारे पास जो सुख-सामग्री है, वह दुःखी आदमियोंकी ही दी हुई है। अतः उस सुख-सामग्रीको दुःखियोंकी सेवामें लगा देना हमारा कर्तव्य होता है।
अब विचार यह करना है कि प्रतिकूलताका सदुपयोग कैसे किया जाय? दुःखका कारण सुखकी इच्छा, आशा ही है। प्रतिकूल परिस्थिति दुःखदायी तभी होती है, जब भीतर सुखकी इच्छा रहती है। अगर हम सावधानीके साथ अनुकूलताकी इच्छाका, सुखकी आशाका त्याग कर दें, तो फिर हमें प्रतिकूल परिस्थितिमें दुःख नहीं हो सकता अर्थात् हमें प्रतिकूल परिस्थिति दुःखी नहीं कर सकती। जैसे, रोगीको कड़वी-से-कड़वी दवाई लेनी पड़े, तो भी उसे दुःख नहीं होता, प्रत्युत इस बातको लेकर प्रसन्नता होती है कि इस दवाईसे मेरा रोग नष्ट हो रहा है। ऐसे ही पैरमें काँटा गहरा गड़ जाय और काँटा निकालनेवाला उसे निकालनेके लिये सुईसे गहरा घाव बनाये तो बड़ी पीड़ा होती है। उस पीड़ासे वह सिसकता है, घबराता है, पर वह काँटा निकालनेवालेको यह कभी नहीं कहता कि भाई, तुम छोड़ दो, काँटा मत निकालो। काँटा निकल जायगा, सदाके लिये पीड़ा दूर हो जायगी—इस बातको लेकर वह इस पीड़ाको प्रसन्नतापूर्वक सह लेता है। यह जो सुखकी इच्छाका त्याग करके दुःखको, पीड़ाको प्रसन्नतापूर्वक सहना है यह प्रतिकूलताका सदुपयोग है। अगर वह कड़वी दवाई लेनेसे, काँटा निकालनेकी पीड़ासे दुःखी हो जाता है, तो यह प्रतिकूलताका भोग है, जिससे उसको भयंकर दुःख पाना पड़ेगा।
यदि हम सुख-दुःखका उपभोग करते रहेंगे, तो भविष्यमें हमें भोग-योनियोंमें अर्थात् स्वर्ग, नरक आदिमें जाना ही पड़ेगा। कारण कि सुख-दुःख भोगनेके स्थान ये स्वर्ग, नरक आदि ही हैं। यदि हम सुख-दुःखका भोग करते हैं, सुख-दुःखमें सम नहीं रहते, सुख-दुःखसे ऊँचे नहीं उठते, तो हम मुक्तिके पात्र कैसे होंगे? नहीं हो सकते।
चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि ये सांसारिक पदार्थ आदि अनुकूलता-प्रतिकूलताके द्वारा सुख-दुःख देनेवाले और आने-जानेवाले हैं, सदा रहनेवाले नहीं हैं; क्योंकि ये अनित्य हैं, क्षणभंगुर हैं। इनके प्राप्त होनेपर उसी क्षण इनका नष्ट होना शुरू हो जाता है। इनका संयोग होते ही इनसे वियोग होना शुरू हो जाता है। ये पहले नहीं थे, पीछे नहीं रहेंगे और वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं। इनको भोगकर हम केवल अपना स्वभाव बिगाड़ रहे हैं, सुख-दुःखके भोगी बनते जा रहे हैं। सुख-दुःखके भोगी बनकर हम भोगयोनिके ही पात्र बनते जा रहे हैं, फिर हमें मुक्ति कैसे मिलेगी? हमें भुक्ति-(भोग-) की ही रुचि है, तो फिर
८८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
भगवान् हमें मुक्ति कैसे देंगे ? उनका सदुपयोग करेंगे, तो हम सुख-दुःखसे ऊँचे उठ इस प्रकार यदि हम सुख-दुःखका उपभोग न करके जायेंगे और महान् आनन्दका अनुभव कर लेंगे।
परिशिष्ट भाव— स्वरूप सत्तारूप है। सतामें कोई व्यथा नहीं है। शरीरमें अपनी स्थिति माननेसे ही व्यथा होती है। अतः शरीरमें अपनी स्थिति मानते हुए कोई भी मनुष्य व्यथारहित नहीं हो सकता। व्यथारहित होनेका तात्पर्य है—प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न होना और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न होना (गीता—पाँचवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। व्यथारहित होनेसे मनुष्यकी बुद्धि स्थिर हो जाती है—‘स्थिरबुद्धिरसम्भूतः ’ (गीता ५।२०)।
सुखदायी-दुःखदायी परिस्थितिसे सुखी-दुःखी होना ही व्यथित होना है। सुखी-दुःखी होना सुख-दुःखका भोग है। भोगी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। साधकको सुख-दुःखका भोग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत सुख-दुःखका सदुपयोग करना चाहिये। सुखदायी-दुःखदायी परिस्थितिका प्राप्त होना प्रारब्ध है और उस परिस्थितिको साधन-सामग्री मानकर उसका सदुपयोग करना वास्तविक पुरुषार्थ है। इस पुरुषार्थसे अमरताकी प्राप्ति हो जाती है। सुखका सदुपयोग है—दूसरोंको सुख पहुँचाना, उनकी सेवा करना और दुःखका सदुपयोग है—सुखकी इच्छाका त्याग करना। दुःखका सदुपयोग करनेपर साधक दुःखके कारणकी खोज करता है। दुःखका कारण है—सुखकी इच्छा—‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ’ (गीता ५।२२)। जो सुख-दुःखका भोग करता है, उस भोगीका पतन हो जाता है और जो सुख-दुःखका सदुपयोग करता है, वह योगी सुख-दुःख दोनोंसे ऊँचे उठकर अमरताका अनुभव कर लेता है।
सम्बन्ध—अबतक देह-देहीका जो विवेचन हुआ है, उसीको भगवान् दूसरे शब्दोंसे आगेके तीन श्लोकोंमें कहते हैं।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥
| असतः | = असत्का तो | अभावः | = अभाव | उभयोः | = दोनोंका |
|---|---|---|---|---|---|
| भावः | = भाव (सत्ता) | न, विद्यते | = विद्यमान नहीं है। | अपि | = ही |
| न, विद्यते | = विद्यमान नहीं है | तत्त्वदर्शिभिः | = तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने | अन्तः | = तत्त्व |
| तु | = और | दृष्टः | = देखा अर्थात् अनुभव किया | ||
| सतः | = सत्का | अनयोः | = इन | है। |
व्याख्या—[यहाँ (पूर्वार्धमें) भगवान्ने ‘भू सत्तायाम् ’ (भावः, अभावः), ‘अस् भुवि ’ (असतः, सतः) और ‘विद् सत्तायाम् ’ (विद्यते)—इन तीन सत्तावाचक धातुओंका प्रयोग किया है। इन तीनोंके प्रयोगका तात्पर्य नित्य-तत्त्वकी ओर लक्ष्य करानेमें ही है।]
‘नासतो विद्यते भावः’ —शरीर उत्पत्तिके पहले भी नहीं था, मरनेके बाद भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी इसका क्षण-प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। तात्पर्य है कि यह शरीर भूत, भविष्य और वर्तमान—इन तीनों कालोंमें कभी भावरूपसे नहीं रहता। अतः यह असत् है। इसी तरहसे इस संसारका भी भाव नहीं है, यह भी असत् है। यह शरीर तो संसारका एक छोटा-सा नमूना है; इसलिये शरीरके परिवर्तनसे संसारमात्रके परिवर्तनका अनुभव होता है कि इस संसारका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव होगा तथा वर्तमानमें भी अभाव हो रहा है।
संसारमात्र कालरूपी अग्निमें लकड़ीकी तरह निरन्तर जल रहा है। लकड़ीके जलनेपर तो कोयला और राख बची रहती है, पर संसारको कालरूपी अग्नि ऐसी विलक्षण रीतिसे जलाती है कि कोयला अथवा राख कुछ भी बाकी नहीं रहता। वह संसारका अभाव-ही-अभाव कर देती है। इसलिये कहा गया है कि असत्की सत्ता नहीं है।
‘नाभावो विद्यते सतः’ —‘जो सत् वस्तु है, उसका अभाव नहीं होता अर्थात् जब देह उत्पन्न नहीं हुआ था, तब भी देही था, देह नष्ट होनेपर भी देही रहेगा और वर्तमानमें देहके परिवर्तनशील होनेपर भी देही उसमें ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसी रीतिसे जब संसार उत्पन्न नहीं हुआ था, उस समय भी परमात्मतत्त्व था, संसारका अभाव होनेपर भी परमात्मतत्त्व रहेगा और वर्तमानमें संसारके परिवर्तनशील होनेपर भी परमात्मतत्त्व उसमें ज्यों-का-त्यों ही है।
श्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
८९
मार्मिक बात
संसारको हम एक ही बार देख सकते हैं, दूसरी बार नहीं। कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है; अतः एक क्षण पहले वस्तु जैसी थी, दूसरे क्षणमें वह वैसी नहीं रहती, जैसे—सिनेमा देखते समय परदेपर दृश्य स्थिर दीखता है; पर वास्तवमें उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। मशीनपर फिल्म तेजीसे घूमनेके कारण वह परिवर्तन इतनी तेजीसे होता है कि उसे हमारी आँखें नहीं पकड़ पातीं। इससे भी अधिक मार्मिक बात यह है कि वास्तवमें संसार एक बार भी नहीं दीखता। कारण कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जिन करणोंसे हम संसारको देखते हैं—अनुभव करते हैं, वे करण भी संसारके ही हैं। अतः वास्तवमें संसारसे ही संसार दीखता है। जो शरीर-संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित है, उस स्वरूपसे संसार कभी दीखता ही नहीं! तात्पर्य यह है कि स्वरूपमें संसारकी प्रतीति नहीं है। संसारके सम्बन्धसे ही संसारकी प्रतीति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि स्वरूपका संसारसे कोई सम्बन्ध है ही नहीं।
दूसरी बात, संसार (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि)—की सहायताके बिना चेतन-स्वरूप कुछ कर ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ कि मात्र क्रिया संसारमें ही है, स्वरूपमें नहीं। स्वरूपका क्रियासे कोई सम्बन्ध है ही नहीं।
संसारका स्वरूप है—क्रिया और पदार्थ। जब स्वरूपका न तो क्रियासे और न पदार्थसे ही कोई सम्बन्ध है, तब यह सिद्ध हो गया कि शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित सम्पूर्ण संसारका अभाव है। केवल परमात्मतत्त्वका ही भाव (सत्ता) है, जो निलिप्तरूपसे सबका प्रकाशक और आधार है।
‘उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः’ —इन दोनोंके अर्थात् सत्-असत्, देही-देहेके तत्त्वको जाननेवाले
परिशिष्ट भाव —सत्तामात्र ‘सत्’ है और सत्ताके सिवाय जो कुछ भी प्रकृति और प्रकृतिका कार्य (क्रिया और पदार्थ) है, वह ‘असत्’ अर्थात् परिवर्तनशील है। जिन महापुरुषोंने सत् और असत्—दोनोंका तत्त्व देखा है अर्थात् जिनको सत्तामात्रमें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो गया है, उनकी दृष्टि (अनुभव)—में असत्की सत्ता विद्यमान
महापुरुषोंने इनका तत्त्व देखा है, इनका निचोड़ निकाला है कि केवल एक सत्-तत्त्व ही विद्यमान है।
असत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है और सत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है अर्थात् दोनोंका तत्त्व एक ‘सत्’ ही है, दोनोंका तत्त्व भावरूपसे एक ही है। अतः सत् और असत्—इन दोनोंके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा जाननेमें आनेवाला एक सत्-तत्त्व ही है। असत्की जो सत्ता प्रतीत होती है, वह सत्ता भी वास्तवमें सत्की ही है। सत्की सत्तासे ही असत् सत्तावान् प्रतीत होता है। इसी सत्को ‘परा प्रकृति ’ (गीता ७।५), ‘क्षेत्रज्ञ ’ (गीता १३।१-२), ‘पुरुष ’ (गीता १३।१९) और ‘अक्षर ’ (गीता १५।१६) कहा गया है; तथा असत्को ‘अपरा प्रकृति ’, ‘क्षेत्र ’, ‘प्रकृति ’ और ‘क्षर ’ कहा गया है।
अर्जुन भी शरीरोंको लेकर शोक कर रहे हैं कि युद्ध करनेसे ये सब मर जायेंगे। इसपर भगवान् कहते हैं कि क्या युद्ध न करनेसे ये नहीं मरेंगे? असत् तो मरेगा ही और निरन्तर मर ही रहा है। परन्तु इसमें जो सत्-रूपसे है, उसका कभी अभाव नहीं होगा। इसलिये शोक करना तुम्हारी बेसमझी ही है।
ग्यारहवें श्लोकमें आया है कि जो मर गये हैं और जो जी रहे हैं, उन दोनोंके लिये पण्डितजन शोक नहीं करते। बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें देहीकी नित्यताका वर्णन है और उसमें ‘धीर ’ शब्द आया है। चौदहवें-पंद्रहवें श्लोकोंमें संसारकी अनित्यताका वर्णन आया है, तो उसमें भी ‘धीर ’ शब्द आया है। ऐसे ही यहाँ (सोलहवें श्लोकमें) सत्-असत्का विवेचन आया है, तो इसमें ‘तत्त्वदर्शी ’ शब्द आया है। इन श्लोकोंमें ‘पण्डित ’, ‘धीर ’ और ‘तत्त्वदर्शी ’ पद देनेका तात्पर्य है कि जो विवेकी होते हैं, समझदार होते हैं, उनको शोक नहीं होता। अगर शोक होता है, तो वे विवेकी नहीं हैं, समझदार नहीं हैं।
१-नित्यदा ह्यंग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च। कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन् दृश्यते॥ ( श्रीमद्भगवद्गीता ११।२२।४२ )
‘यद्यपि प्रतिक्षणं ही शरीरोंकी उत्पत्ति और नाश होता रहता है, तथापि कालकी गति अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण उनका प्रतिक्षण उत्पन्न और नष्ट होना दिखायी नहीं देता।’
२-‘नानुशोचन्ति पण्डिताः’ (२।११), ‘धीरस्तत्र न मुह्यति’ (२।१३), ‘समदुःखसुखं धीरम्’ (२।१५)—इन तीन जगह जिनको ‘पण्डित’ और ‘धीर’ कहा है, उन्हींको यहाँ ‘तत्त्वदर्शी’ कहा गया है।
१०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
है ही नहीं और सत्का अभाव विद्यमान है ही नहीं अर्थात् सत्तामात्र (सत्-तत्त्व)-के सिवाय कुछ भी नहीं है। भगवान्ने चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें शरीरकी अनित्यताका वर्णन किया था, उसको यहाँ 'नासतो विद्यते भावः' पदोंसे कहा है और बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें शरीरकी नित्यताका वर्णन किया था, उसको यहाँ 'नाभावो विद्यते सतः' पदोंसे कहा है।
'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः'—इन सोलह अक्षरोंमें सम्पूर्ण वेदों, पुराणों, शास्त्रोंका तात्पर्य भरा हुआ है! असत् और सत्—इन दोनोंको ही प्रकृति और पुरुष, क्षर और अक्षर, शरीर और शरीरी, अनित्य और नित्य, नाशवान् और अविनाशी आदि अनेक नामोंसे कहा गया है। देखने, सुनने, समझने, चिन्तन करने, निश्चय करने आदिमें जो कुछ भी आता है, वह सब 'असत्' है। जिसके द्वारा देखते, सुनते, चिन्तन आदि करते हैं, वह भी 'असत्' है और दीखनेवाला भी 'असत्' है।
इस श्लोकार्थ (सोलह अक्षरों)-में तीन धातुओंका प्रयोग हुआ है—
(१) 'भू सत्तायाम्—जैसे 'अभावः' और 'भावः'।
(२) 'अस् भुवि'—जैसे, 'असतः' और 'सतः'।
(३) 'विद् सत्तायाम्'—जैसे, 'विद्यते' और 'न विद्यते'।
यद्यपि इन तीनों धातुओंका मूल अर्थ एक 'सत्ता' ही है, तथापि सूक्ष्मरूपसे ये तीनों अपना स्वतन्त्र अर्थ भी रखते हैं; जैसे—'भू' धातुका अर्थ 'उत्पत्ति' है, 'अस्' धातुका अर्थ 'सत्ता' (होनापन) है और 'विद्' धातुका अर्थ 'विद्यमानता' (वर्तमानकी सत्ता) है।
'नासतो विद्यते भावः' पदोंका अर्थ है—'असतः भावः न विद्यते' अर्थात् असत्की सत्ता विद्यमान नहीं है, प्रत्युत असत्का अभाव ही विद्यमान है; क्योंकि इसका निरन्तर अभाव (परिवर्तन) होता ही रहता है। असत् वर्तमान नहीं है। असत् उपस्थित नहीं है। असत् प्राप्त नहीं है। असत् मिला हुआ नहीं है। असत् मौजूद नहीं है। असत् कायम नहीं है। जो वस्तु उत्पन्न होती है, उसका नाश अवश्य होता है—यह नियम है। उत्पन्न होते ही तत्काल उस वस्तुका नाश शुरू हो जाता है। उसका नाश इतनी तेजीसे होता है कि उसको दो बार कोई देख ही नहीं सकता अर्थात् उसको एक बार देखनेपर फिर दुबारा उसी स्थितिमें नहीं देखा जा सकता। यह सिद्धान्त है कि जिस वस्तुका किसी भी क्षण अभाव है, उसका सदा अभाव ही है। अतः संसारका सदा ही अभाव है। संसारको कितनी ही सत्ता दें, कितना ही महत्त्व दें, पर वास्तवमें वह विद्यमान है ही नहीं। असत् प्राप्त है ही नहीं, कभी प्राप्त हुआ ही नहीं, कभी प्राप्त होगा ही नहीं। असत्का प्राप्त होना सम्भव ही नहीं है।
'नाभावो विद्यते सतः' पदोंका अर्थ है—'सतः अभावः न विद्यते' अर्थात् सत्का अभाव विद्यमान नहीं है, प्रत्युत सत्का भाव ही विद्यमान है; क्योंकि इसका कभी अभाव (परिवर्तन) होता ही नहीं। जिसका अभाव हो जाय, उसको सत् कहते ही नहीं। सत्की सत्ता निरन्तर विद्यमान है। सत् निरन्तर वर्तमान है। सत् निरन्तर उपस्थित है। सत् निरन्तर प्राप्त है। सत् निरन्तर मिला हुआ है। सत् निरन्तर मौजूद है। सत् निरन्तर कायम है। किसी भी देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदिमें सत्का अभाव नहीं होता। कारण कि देश, काल, वस्तु आदि तो असत् (अभावरूप अर्थात् निरन्तर परिवर्तनशील) है, पर सत् सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन नहीं होता, कोई कमी नहीं आती। अतः सत्का सदा ही भाव है। परमात्मतत्त्वको कितना ही अस्वीकार करें, उसकी कितनी ही उपेक्षा करें, उससे कितना ही विमुख हो जायें, उसका कितना ही तिरस्कार करें, उसका कितनी ही युक्तियोंसे खण्डन करें, पर वास्तवमें उसका अभाव विद्यमान है ही नहीं। सत्का अभाव होना सम्भव ही नहीं है। सत्का अभाव कभी कोई कर सकता ही नहीं (गीता—दूसरे अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)।
'उभयोरपि दृष्टः'—तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने सत्-तत्त्वको उत्पन्न नहीं किया है, प्रत्युत देखा है अर्थात् अनुभव किया है। तात्पर्य है कि असत्का अभाव और सत्का भाव—दोनोंके तत्त्व (निष्कर्ष)—को जाननेवाले जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष एक सत्-तत्त्वको ही देखते हैं अर्थात् स्वतः-स्वाभाविक एक 'है' का ही अनुभव करते हैं। असत्का तत्त्व भी सत् है और सत्का तत्त्व भी सत् है—ऐसा जान लेनेपर उन महापुरुषोंकी दृष्टिमें एक सत्-तत्त्व 'है' के सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं।
श्लोक १७]
- साधक-संजीवनी *
११
असत्की सत्ता विद्यमान न रहनेसे उसका अभाव और सत्का अभाव विद्यमान न रहनेसे उसका भाव सिद्ध हुआ। निष्कर्ष यह निकला कि असत् है ही नहीं, प्रत्युत सत्-ही-सत् है। उस सत्-तत्त्वमें देह और देहीका विभाग नहीं है। जबतक असत्की सत्ता है, तबतक विवेक है। असत्की सत्ता मिटनेपर विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है। 'उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदृशिभिः'—'इसमें उभयोरपि' में विवेक है, 'अन्तः' में तत्त्वज्ञान है और 'दृष्टः' में अनुभव है अर्थात् विवेक तत्त्वज्ञानमें परिणत हो गया और सत्तामात्र ही शेष रह गयी। एक सत्ताके सिवाय कुछ नहीं है—यह ज्ञानमार्गकी सर्वोपरि बात है।
असत्की सत्ता नहीं है—यह भी सत्य है और सत्का अभाव नहीं है—यह भी सत्य है। सत्यको स्वीकार करना साधकका काम है। साधकको अनुभव हो अथवा न हो, उसको तो सत्यको स्वीकार करना है। 'है' को स्वीकार करना है और 'नहीं' को अस्वीकार करना है—यही वेदान्त है, वेदोंका खास निष्कर्ष है।
संसारमें भाव और अभाव—दोनों दीखते हुए भी 'अभाव' मुख्य रहता है। परमात्मामें भाव और अभाव—दोनों दीखते हुए भी 'भाव' मुख्य रहता है। संसारमें 'अभाव' के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं और परमात्मामें 'भाव' के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं। दूसरे शब्दोंमें, संसारमें 'नित्यवियोग' के अन्तर्गत संयोग-वियोग हैं और परमात्मामें 'नित्ययोग' के अन्तर्गत योग-वियोग (मिलन-विरह) हैं। अतः संसारमें अभाव ही रहा और परमात्मामें भाव ही रहा।
सम्बन्ध-सत् और असत् क्या हैं—इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
| अविनाशि | = अविनाशी | इदम् | = यह | विनाशम् | = विनाश |
|---|---|---|---|---|---|
| तु | = तो | सर्वम् | = सम्पूर्ण (संसार) | कश्चित् | = कोई भी |
| तत् | = उसको | ततम् | = व्याप्त है। | न | = नहीं |
| विद्धि | = जान, | अस्य | = इस | कर्तुम् | = कर |
| येन | = जिससे | अव्ययस्य | = अविनाशीका | अर्हति | = सकता। |
व्याख्या—'अविनाशि तु तद्विद्धि'—पूर्वश्लोकमें जो सत्-असत्की बात कही थी, उसमेंसे पहले 'सत्' की व्याख्या करनेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है।
'उस अविनाशी तत्त्वको त् समझ'—ऐसा कहकर भगवान्ने उस तत्त्वको परोक्ष बताया है। परोक्ष बतानेमें तात्पर्य है कि इदंतासे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारमें वह परोक्ष तत्त्व ही व्याप्त है, परिपूर्ण है। वास्तवमें जो परिपूर्ण है, वही 'है' और जो सामने संसार दीख रहा है,
यह 'नहीं' है।
यहाँ 'तत्' पदसे सत्-तत्त्वको परोक्ष रीतिसे कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि वह तत्त्व बहुत दूर है; किन्तु वह इन्द्रियों और अन्तःकरणका विषय नहीं है, इसलिये उसको परोक्ष रीतिसे कहा गया है।
'येन सर्वमिदं ततम्'—'जिसको परोक्ष कहा है, उसीका वर्णन करते हैं कि यह सब-का-सब संसार उस नित्य-तत्त्वसे व्याप्त है। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें सोना,
- 'येन सर्वमिदं ततम्'—ये पद गीतामें तीन बार आये हैं। उनमेंसे यहाँ (२।१७ में) ये पद शरीरीके लिये आये हैं कि इस शरीरीसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। यह बात सांख्ययोगकी दृष्टिसे कही गयी है। दूसरी बार ये पद आठवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें आये हैं। वहाँ कहा गया है कि जिस ईश्वरसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह अनन्यभक्तिके मिलता है। अतः भक्तिका वर्णन होनेसे उपर्युक्त पद ईश्वरके विषयमें आये हैं। तीसरी बार ये पद अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें आये हैं। वहाँ कहा गया है कि जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उसका चारों वर्ण अपने-अपने कर्मद्वारा पूजन करें। यह वर्णन भी भक्तिकी दृष्टिसे हुआ है।
नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें राजविद्याका वर्णन करते हुए भगवान्ने 'मया ततमिदं सर्वम्' पदोंसे कहा है कि यह सम्पूर्ण संसार मेरेसे व्याप्त है। इस प्रकार तीन जगह तो 'येन' पद देकर उस तत्त्वको परोक्षरूपसे कहा है, और एक जगह 'अस्मत्' शब्द—'मया' देकर स्वयं भगवान्ने अपरोक्षरूपसे अपनी बात कही है।
१२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
लोहेसे बने हुए अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा, मिट्टीसे बने हुए बर्तनोंमें मिट्टी और जलसे बनी हुई बर्फमें जल ही व्याप्त (परिपूर्ण) है, ऐसे ही संसारमें वह सत्-तत्त्व ही व्याप्त है। अतः वास्तवमें इस संसारमें वह सत्-तत्त्व ही जाननेयोग्य है।
‘विनाशमव्यवस्थाय न कश्चिचक्रतुर्मर्हति’ —यह शरीरी अव्यय* अर्थात् अविनाशी है। इस अविनाशीका कोई विनाश कर ही नहीं सकता। परन्तु शरीर विनाशी है— क्योंकि वह नित्य-निरन्तर विनाशकी तरफ जा रहा है। अतः इस विनाशीके विनाशको कोई रोक ही नहीं
परिशिष्ट भाव —व्यवहारमें हम कहते हैं कि ‘यह मनुष्य है, यह पशु है, यह वृक्ष है, यह मकान है’ आदि, तो इसमें ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो पहले भी नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे तथा वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं। परन्तु इनमें ‘है’ रूपसे जो सत्ता है, वह सदा ज्यों-की-त्यों है। तात्पर्य है कि ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो संसार (असत्) है और ‘है’ अविनाशी आत्मतत्त्व (सत्) है। इसलिये ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो अलग-अलग हुए, पर इन सबमें ‘है’ एक ही रहा। इसी तरह मैं मनुष्य हूँ, मैं पशु हूँ, मैं देवता हूँ आदिमें शरीर तो अलग-अलग हुए पर ‘हूँ’ अथवा ‘है’ एक ही रहा।
‘येन सर्वमिदं ततम्’ —ये पद यहाँ जीवात्माके लिये आये हैं और आठवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें तथा अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें यही पद परमात्माके लिये आये हैं। इसका तात्पर्य है कि जीवात्माका सर्वव्यापक परमात्माके साथ साधर्म्य है। अतः जैसे परमात्मा संसारसे असंग हैं, ऐसे ही जीवात्मा भी शरीर-संसारसे स्वतः-स्वाभाविक असंग है—‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदा० ४।३।१५), ‘देहेऽस्मिन्पुरुषः परः’ (गीता १३।२२)। जीवात्माकी स्थिति किसी एक शरीरमें नहीं है। वह किसी शरीरसे चिपका हुआ नहीं है। परन्तु इस असंगताका अनुभव न होनेसे ही जन्म-मरण हो रहा है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनीऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥
| अनाशिनः | = अविनाशी, | शरीरिणः | = इस शरीरीके | उक्ताः | = कहे गये हैं। |
|---|---|---|---|---|---|
| अप्रमेयस्य | = जाननेमें न आनेवाले (और) | इमे | = ये | तस्मात् | = इसलिये |
| नित्यस्य | = नित्य रहनेवाले | देहाः | = देह | भारत | = हे अर्जुन! (तुम) |
| अन्तवन्तः | = अन्तवाले | युध्यस्व | = युद्ध करो। |
व्याख्या —‘अनाशिनः’—किसी कालमें, किसी कारणसे कभी किंचिन्मात्र भी जिसमें परिवर्तन नहीं होता, जिसकी क्षति नहीं होती, जिसका अभाव नहीं होता, उसका नाम ‘अनाशी’ अर्थात् अविनाशी है।
‘अप्रमेयस्य’ —जो प्रमा-(प्रमाण-)का विषय नहीं है अर्थात् जो अन्तःकरण और इन्द्रियोंका विषय नहीं है,
सकता। तू सोचता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तो ये नहीं मरेंगे, पर वास्तवमें तेरे युद्ध करनेसे अथवा न करनेसे इस अविनाशी और विनाशी तत्त्वमें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा अर्थात् अविनाशी तो रहेगा ही और विनाशीका नाश होगा ही।
यहाँ ‘अस्य’ पदसे सत्-तत्त्वको इदंतासे कहनेका तात्पर्य है कि प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरोंमें जो सत्ता दीखती है, वह इसी सत्-तत्त्वकी ही है। ‘मेरा शरीर है और मैं शरीरधारी हूँ’—ऐसा जो अपनी सत्ताका ज्ञान है, उसीको लक्ष्य करके भगवान्ने यहाँ ‘अस्य’ पद दिया है।
उसको ‘अप्रमेय’ कहते हैं।
जिसमें अन्तःकरण और इन्द्रियाँ प्रमाण नहीं होतीं, उसमें शास्त्र और सन्त-महापुरुष ही प्रमाण होते हैं, शास्त्र और सन्त-महापुरुष उन्हींके लिये प्रमाण होते हैं, जो श्रद्धालु हैं। जिसकी जिस शास्त्र और सन्तमें श्रद्धा होती है, वह उसी शास्त्र और सन्तके वचनोंको मानता है। इसलिये यह तत्त्व
- भगवान्ने गीतामें जगह-जगह शरीरीको भी अव्यय कहा है और अपनेको भी अव्यय कहा है। स्वरूपसे दोनों अव्यय होनेपर भी भगवान् तो प्रकृतिको अपने वशमें करके (स्वतन्त्रतापूर्वक) प्रकट और अन्तर्धान होते हैं और यह शरीरी प्रकृतिके पर्वश होकर जन्मता और मरता रहता है; क्योंकि इसने शरीरको अपना मान रखा है।
श्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
१३
केवल श्रद्धाका विषय हैं, प्रमाणका विषय नहीं।
शास्त्र और सन्त किसीको बाध्य नहीं करते कि तुम हमारेमें श्रद्धा करो। श्रद्धा करने अथवा न करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है। अगर वह शास्त्र और सन्तके वचनोंमें श्रद्धा करेगा, तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय है; और अगर वह श्रद्धा नहीं करेगा, तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय नहीं है।
'नित्यस्य' —यह नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। किसी कालमें यह न रहता हो—ऐसी बात नहीं है अर्थात् यह सब कालमें सदा ही रहता है।
'अन्तवन्त इमे देहा उक्ताः शरीरिणः' —इस अविनाशी, अप्रमेय और नित्य शरीरीके सम्पूर्ण संसारमें जितने भी शरीर हैं, वे सभी अन्तवाले कहे गये हैं। अन्तवाले कहनेका तात्पर्य है कि इनका प्रतिक्षण अन्त हो रहा है। इनमें अन्तके सिवाय और कुछ है ही नहीं, केवल अन्त-ही-अन्त है। उपर्युक्त पदोंमें शरीरीके लिये तो एकवचन दिया है और शरीरोंके लिये बहुवचन दिया है। इसका एक कारण तो यह है कि प्रत्येक प्राणीके स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीन शरीर होते हैं। दूसरा कारण यह है कि संसारके सम्पूर्ण शरीरोंमें एक ही शरीरी व्याप्त है। आगे चौबीसवें श्लोकमें भी इसको 'सर्वगतः' पदसे सबमें व्यापक बतायेंगे। यह शरीरी तो अविनाशी है और इसके कहे जानेवाले सम्पूर्ण शरीर नाशवान् हैं। जैसे अविनाशीका कोई विनाश नहीं कर सकता, ऐसे ही नाशवान्को कोई अविनाशी नहीं बना सकता। नाशवान्को तो विनाशीपना ही नित्य रहेगा अर्थात् उसका तो नाश ही होगा।
विशेष बात
यहाँ 'अन्तवन्त इमे देहाः' कहनेका तात्पर्य है कि ये जो देह देखनेमें आते हैं, ये सब-के-सब नाशवान् हैं। पर ये देह किसके हैं? 'नित्यस्य' , 'अनाशिनः' —ये देह नित्यके हैं, अविनाशीके हैं। तात्पर्य है कि नित्य-तत्त्वने, जिसका कभी नाश नहीं होता, इनको अपना मान रखा है। अपना माननेका अर्थ है कि अपनेको शरीरमें रख दिया और शरीरको अपनेमें रख लिया। अपनेको शरीरमें रखनेसे
'अहंता' अर्थात् 'मैं'-पन पैदा हो गया और शरीरको अपनेमें रखनेसे 'ममता' अर्थात् 'मेरा'-पन पैदा हो गया।
यह स्वयं जिन-जिन चीजोंमें अपनेको रखता चला जाता है, उन-उन चीजोंमें 'मैं'-पन होता ही चला जाता है, जैसे—अपनेको धनमें रख दिया तो 'मैं धनी हूँ'; अपनेको राज्यमें रख दिया तो 'मैं राजा हूँ'; अपनेको विद्यामें रख दिया तो 'मैं विद्वान् हूँ'; अपनेको बुद्धिमें रख दिया तो 'मैं बुद्धिमान् हूँ'; अपनेको सिद्धियोंमें रख दिया तो 'मैं सिद्ध हूँ'; अपनेको शरीरमें रख दिया तो 'मैं शरीर हूँ'; आदि-आदि।
यह स्वयं जिन-जिन चीजोंको अपनेमें रखता चला जाता है, उन-उन चीजोंमें 'मेरा'-पन होता ही चला जाता है; जैसे—कुटुम्बको अपनेमें रख लिया तो 'कुटुम्ब मेरा है'; धनको अपनेमें रख लिया तो 'धन मेरा है'; बुद्धिको अपनेमें रख लिया तो 'बुद्धि मेरी है'; शरीरको अपनेमें रख लिया तो 'शरीर मेरा है'; आदि-आदि।
जड़ताके साथ 'मैं' और 'मेरा'-पन होनेसे ही मात्र विकार पैदा होते हैं। तात्पर्य है कि शरीर और मैं (स्वयं)—दोनों अलग-अलग हैं, इस विवेकको महत्त्व न देनेसे ही मात्र विकार पैदा होते हैं। परन्तु जो इस विवेकको आदर देते हैं, महत्त्व देते हैं, वे पण्डित होते हैं। ऐसे पण्डितलोग कभी शोक नहीं करते; क्योंकि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है—इसका उनको ठीक अनुभव हो जाता है।
'तस्मात्' 'युध्यस्व' —भगवान् अर्जुनके लिये आज्ञा देते हैं कि सत्-असत्को ठीक समझकर तुम युद्ध करो अर्थात् प्राप्त कर्तव्यका पालन करो। तात्पर्य है कि शरीर तो अन्तवाला है और शरीरी अविनाशी है। इन दोनों—शरीर-शरीरीकी दृष्टिसे शोक बन ही नहीं सकता। अतः शोकका त्याग करके युद्ध करो।
विशेष बात
यहाँ सत्रहवें और अठारहवें—इन दोनों श्लोकोंमें विशेषतासे सत्-तत्त्वका ही विवेचन हुआ है। कारण कि इस पुरे प्रकरणमें भगवान्का लक्ष्य सत्का बोध करानेमें ही है। सत्का बोध हो जानेसे असत्की निवृत्ति स्वतः हो जाती है।
१-आरम्भमें तो यह तत्त्व श्रद्धाका विषय है, पर आगे चलकर जब इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तब यह श्रद्धाका विषय नहीं रहता।
२-यहाँ 'तस्मात्' पद युक्ति समझनेमें आया है अर्थात् युक्ति समझमें आ गयी तो अब युद्ध करो। इसी तरह गीतामें 'तस्मात्' पदका प्रयोग प्रायः प्रकरणकी समाप्तिपर अथवा युक्तिकी समाप्तिपर किया गया है; जैसे—दूसरे अध्यायके तीसवें, तीसरे अध्यायके उन्नीसवें, आठवें अध्यायके सातवें तथा सत्ताईसवें आदि श्लोकोंमें 'तस्मात्' पद प्रकरणकी समाप्तिके लिये आया है और दूसरे अध्यायके पचीसवें, सत्ताईसवें, सैंतीसवें, अड़सठवें तथा ग्यारहवें अध्यायके तैंतीसवें आदि श्लोकोंमें 'तस्मात्' पद युक्तिकी समाप्तिके लिये आया है।
१४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
फिर किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। इस प्रकार सत्का अनुभव करके निःसंदिध होकर कर्तव्यका पालन करना चाहिये। इस विवेचनसे यह बात सिद्ध होती है कि सांख्ययोग एवं कर्मयोगमें किसी विशेष वर्ण और आश्रमकी आवश्यकता नहीं है। अपने कल्याणके लिये चाहे सांख्ययोगका अनुष्ठान करे, चाहे कर्मयोगका अनुष्ठान करे, इसमें मनुष्यकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। परन्तु व्यावहारिक काम करनेमें वर्ण और आश्रमके अनुसार शास्त्रीय विधानकी परम आवश्यकता है, तभी तो यहाँ सांख्ययोगके अनुसार सत्-असत्का विवेचन करते हुए भगवान् युद्ध करनेकी अर्थात् कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें ‘गतासूनू ’ (मृत) और ‘अगतासूनू ’ (जीवित)—दोनों प्राणियोंको अशोच्य बताया। फिर बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें ‘गतासूनू ’ को अशोच्य बतानेके लिये ‘सत्’ (नित्य) का वर्णन किया और चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें ‘अगतासूनू ’ को अशोच्य बतानेके लिये ‘असत्’ (अनित्य) का वर्णन किया। फिर सत् और असत्—दोनोंका वर्णन सोलहवें श्लोकमें किया। इसके बाद सत्के भाव और असत्के अभावका विवेचन मुख्यरूपसे सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें करके एक प्रकरण पूरा करते हैं।
यद्यपि भाव (होनापन) आत्माका ही है, शरीरका नहीं, तथापि मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह पहले शरीरको देखकर फिर उसमें आत्माको देखता है, पहले आकृतिको देखकर फिर भावको देखता है। ऊपर लगायी हुई पालिश कबतक टिकेगी ? साधकको विचार करना चाहिये कि आत्मा पहले थी या शरीर पहले था ? विचार करनेपर सिद्ध होता है कि आत्मा पहले है, शरीर पीछे है; भाव पहले है, आकृति पीछे है। इसलिये साधकको दृष्टि पहले भावरूप आत्मा या स्वयंकी तरफ जानी चाहिये, शरीरकी तरफ नहीं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकतक शरीरीको अविनाशी जाननेवालोंकी बात कही। अब उसी बातको अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे दृढ़ करनेके लिये, जो शरीरीको अविनाशी नहीं जानते, उनकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
| यः | = जो मनुष्य | एनम् | = इसको | विजानीतः | = जानते; |
|---|---|---|---|---|---|
| एनम् | = इस (अविनाशी शरीरी)-को | हतम् | = मरा | (क्योंकि) | |
| हन्तारम् | = मारनेवाला | मन्यते | = मानता है, | अयम् | = यह |
| वेत्ति | = मानता है | तौ | = वे | न | = न |
| च | = और | उभौ | = दोनों ही | हन्ति | = मारता है (और) |
| यः | = जो मनुष्य | (इसको) | न | = न | |
| न | = नहीं | हन्यते | = मारा जाता है। |
व्याख्या—‘य एनं’ वेत्ति हन्तारम् —जो इस कारण कि शरीरमें कर्तापन नहीं है। जैसे कोई भी कारीगर शरीरीको मारनेवाला मानता है; वह ठीक नहीं जानता। कैसा ही चतुर क्यों न हो, पर किसी औजारके बिना वह
- यहाँ ‘एनम्’ पद अन्वादेशमें आया है। जिसका पहले वर्णन हो चुका है, उसको दुबारा कहना ‘अन्वादेश’ कहलाता है। पहले सत्रहवें श्लोकमें एक विषयको लेकर जिसका ‘अस्य’ पदसे वर्णन हुआ है, अब यहाँ दूसरे विषयको लेकर उसी तत्त्वको दुबारा कह रहे हैं। इसलिये यहाँ ‘एनम्’ पदका प्रयोग किया गया है।
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
१५
कार्य नहीं कर सकता, ऐसे ही यह शरीरी शरीरके बिना स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता। अतः तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि सब प्रकारकी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं—ऐसा जो अनुभव करता है, वह शरीरीके अकर्तापनका अनुभव करता है (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवें श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि शरीरीमें कर्तापन नहीं है, पर यह शरीरके साथ तादात्म्य करके, सम्बन्ध जोड़कर शरीरसे होनेवाली क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मान लेता है। अगर यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो यह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है।
‘यश्चैनं मन्यते हतम्’ —जो इसको मरा मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता। जैसे यह शरीरी मारनेवाला नहीं है, ऐसे ही यह मरनेवाला भी नहीं है; क्योंकि इसमें कभी कोई विकृति नहीं आती। जिसमें विकृति आती है, परिवर्तन होता है अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील होता है, वही मर
सकता है।
‘उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते’ —वे दोनों ही नहीं जानते अर्थात् जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता और जो इसको मरनेवाला मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता।
यहाँ प्रश्न होता है कि जो इस शरीरीको मारनेवाला और मरनेवाला दोनों मानता है, क्या वह ठीक जानता है? इसका उत्तर है कि वह भी ठीक नहीं जानता। कारण कि यह शरीरी वास्तवमें ऐसा नहीं है। यह नाश करनेवाला भी नहीं है और नष्ट होनेवाला भी नहीं है। यह निर्विकाररूपसे नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। अतः इस शरीरीको लेकर शोक नहीं करना चाहिये।
अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग होनेसे ही यहाँ शरीरीको मरने-मारनेकी क्रियासे रहित बताया गया है। वास्तवमें यह सम्पूर्ण क्रियाओंसे रहित है।
परिशिष्ट भाव —यह शरीरी न तो किसीको मारता है और न किसीसे मारा ही जाता है—इसका तात्पर्य है कि शरीरी किसी क्रियाका कर्ता भी नहीं है तथा कर्म भी नहीं है और इसमें कोई विकार भी नहीं आता। जो मनुष्य शरीरकी तरह शरीरीको भी मारनेवाला तथा मरनेवाला मानते हैं, वे वास्तवमें शरीर और शरीरीके विवेकको महत्त्व नहीं देते, इसमें स्थित नहीं होते, प्रत्युत अविवेकको महत्त्व देते हैं।
सम्बन्ध—यह शरीरी मरनेवाला क्यों नहीं है? इसके उत्तरमें कहते हैं—
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
| अयम् | = यह शरीरी | भूत्वा | = उत्पन्न होकर | शाश्वतः | = शाश्वत |
|---|---|---|---|---|---|
| न | = न | भूयः | = फिर | (और) | |
| कदाचित् | = कभी | भविता | = होनेवाला | पुराणः | = अनादि है। |
| जायते | = जन्मता है | न | = नहीं है। | शरीरे | = शरीरके |
| वा | = और | अयम् | = यह | हन्यमाने | = मारे जानेपर |
| न | = न | अजः | = जन्मरहित, | न | भी (यह) |
| म्रियते | = मरता है | नित्यः | = नित्य-निरन्तर | हन्यते | = नहीं |
| वा | = तथा (यह) | रहनेवाला, | = मारा जाता। |
व्याख्या —[शरीरमें छः विकार होते हैं—उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना]। यह शरीरी इन छहों विकारोंसे रहित है—यही बात भगवान्
इस श्लोकमें बता रहे हैं।]
‘न जायते म्रियते वा कदाचित्’ —जैसे शरीर उत्पन्न होता है, ऐसे यह शरीरी कभी भी, किसी भी समयमें उत्पन्न
१-जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धतेऽपक्षीयते विनश्यति। (निरुक्त १।१।२)
२-यह शरीरी उत्पन्न नहीं होता—‘न जायते’, ‘अजः’; उत्पन्न होकर विकारी सत्तावाला नहीं होता—‘अयं भूत्वा भविता वा न भूयः’; यह बदलता नहीं—‘शाश्वतः’; यह बढ़ता नहीं—‘पुराणः’; यह क्षीण नहीं होता—‘नित्यः’; और यह मरता नहीं—‘न म्रियते’ ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’।
९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
नहीं होता। यह तो सदासे ही है। भगवान्ने इस शरीरीको अपना अंश बताते हुए इसको ‘सनातन’ कहा है— ‘मैवांशो जीवलोकै जीवभूतः सनातनः’ (१५।७)।
यह शरीरी कभी मरता भी नहीं। मरता वही है, जो पैदा होता है; और ‘प्रियते’ का प्रयोग भी वहीं होता है, जहाँ पिण्ड-प्राणका वियोग होता है। पिण्ड-प्राणका वियोग शरीरमें होता है। परन्तु शरीरीमें संयोग-वियोग दोनों ही नहीं होते। यह ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसका मरना होता ही नहीं।
सभी विकारोंमें जन्मना और मरना—ये दो विकार ही मुख्य हैं; अतः भगवान्ने इनका दो बार निषेध किया है—जिसको पहले ‘न जायते’ कहा, उसीको दुबारा ‘अजः’ कहा है; और जिसको पहले ‘न प्रियते’ कहा, उसीको दुबारा ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ कहा है।
‘अयं भूत्वा भविता वा न भूयः’ —‘यह अविनाशी नित्य-तत्त्व पैदा होकर फिर होनेवाला नहीं है अर्थात् यह स्वतःसिद्ध निर्विकार है। जैसे, बच्चा पैदा होता है, तो पैदा होनेके बाद उसकी सत्ता होती है। जबतक वह गर्भमें नहीं आता, तबतक ‘बच्चा है’ ऐसे उसकी सत्ता (होनापन) कोई भी नहीं कहता। तात्पर्य है कि बच्चेकी सत्ता पैदा होनेके बाद होती है; क्योंकि उस विकारी सत्ताका आदि और अन्त होता है। परन्तु इस नित्य-तत्त्वकी सत्ता स्वतःसिद्ध और निर्विकार है; क्योंकि इस अविकारी सत्ताका आरम्भ और अन्त नहीं होता।
‘अजः’ —इस शरीरीका कभी जन्म नहीं होता। इसलिये यह ‘अजः’ अर्थात् जन्मरहित कहा गया है।
‘नित्यः’ —‘यह शरीरी नित्य-निरन्तर रहनेवाला है; अतः इसका कभी अपक्षय नहीं होता। अपक्षय तो अनित्य वस्तुमें होता है, जो कि निरन्तर रहनेवाली नहीं है। जैसे,
परिशिष्ट भाव —हमारा (स्वयंका) और शरीरका स्वभाव बिलकुल अलग-अलग है। हम शरीरके साथ चिपके हुए नहीं हैं, शरीरसे मिले हुए नहीं हैं। शरीर हमारे साथ चिपका हुआ नहीं है, हमारेसे मिला हुआ नहीं है। इसलिये शरीरके न रहनेपर हमारा कुछ भी बिगड़ता नहीं। अबतक हम असंख्य शरीर धारण करके छोड़ चुके हैं, पर उससे हमारी सत्तामें क्या फर्क पड़ा? हमारा क्या नुकसान हुआ? हम तो ज्यों-के-त्यों ही रहे—‘भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’ (गीता ८।१९)। ऐसे ही यह शरीर छूटनेपर भी हम स्वयं ज्यों-के-त्यों ही रहेंगे।
जैसे हाथ, पैर, नासिका आदि शरीरके अंग हैं, ऐसे शरीर शरीरी (स्वयं)-का अंग भी नहीं है। जो बहनेवाला और विकारी होता है, वह ‘अंग’ नहीं होता*; जैसे—कफ, मूत्र आदि बहनेवाले और फोड़ा आदि विकारी होनेसे शरीरके अंग नहीं हैं, ऐसे ही शरीर बहनेवाला (परिवर्तनशील) और विकारी होनेसे शरीरीका अंग नहीं है।
आधी उम्र बीतनेपर शरीर घटने लगता है, बल क्षीण होने लगता है, इन्द्रियोंकी शक्ति कम होने लगती है। इस प्रकार शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिका तो अपक्षय होता है, पर शरीरीका अपक्षय नहीं होता। इस नित्य-तत्त्वमें कभी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती।
‘शाश्वतः’ —‘यह नित्य-तत्त्व निरन्तर एकरूप, एकरस रहनेवाला है। इसमें अवस्थाका परिवर्तन नहीं होता अर्थात् यह कभी बदलता नहीं। इसमें बदलनेकी योग्यता है ही नहीं।
‘पुराणः’ —‘यह अविनाशी तत्त्व पुराण (पुराना) अर्थात् अनादि है। यह इतना पुराना है कि यह कभी पैदा हुआ ही नहीं। उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें भी देखा जाता है कि जो वस्तु पुरानी हो जाती है, वह फिर बढ़ती नहीं, प्रत्युत नष्ट हो जाती है; फिर यह तो अनुत्पन्न तत्त्व है, इसमें बढ़नारूप विकार कैसे हो सकता है? तात्पर्य है कि बढ़नारूप विकार तो उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें ही होता है, इस नित्य-तत्त्वमें नहीं।
‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ —शरीरका नाश होनेपर भी इस अविनाशी शरीरीका नाश नहीं होता। यहाँ ‘शरीरे’ पद देनेका तात्पर्य है कि यह शरीर नष्ट होनेवाला है। इस नष्ट होनेवाले शरीरमें ही छः विकार होते हैं, शरीरीमें नहीं।
इन पदोंमें भगवान्ने शरीर और शरीरीका जैसा स्पष्ट वर्णन किया है, ऐसा स्पष्ट वर्णन गीतामें दूसरी जगह नहीं आया है।
अर्जुन युद्धमें कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे विशेष शोक कर रहे थे। उस शोकको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि शरीरके मरनेपर भी इस शरीरीका मरना नहीं होता अर्थात् इसका अभाव नहीं होता। इसलिये शोक करना अनुचित है।
- अद्वयं मूर्तिमत्त्वा स्वार्द्धं प्राणिस्थमविकारजम्। अतत्स्थं तत्र दृष्टं च तेन चेततथायुतम्॥
श्लोक २१-२२ ]
- साधक-संजीवनी *
१७
सम्बन्ध—उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि यह शरीरी न तो मारता है और न मरता ही है। इसमें मरनेका निषेध तो बीसवें श्लोकमें कर दिया, अब मारनेका निषेध करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
वेदाविनाशिनां नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | नित्यम् | = नित्य, | कथम् | = कैसे |
|---|---|---|---|---|---|
| यः | = जो | अजम् | = जन्मरहित (और) | कम् | = किसको |
| पुरुषः | = मनुष्य | अव्ययम् | = अव्यय | हन्ति | = मारे (और) |
| एनम् | = इस शरीरीको | वेद | = जानता है, | कम् | = (कैसे) किसको |
| अविनाशिन्म् | = अविनाशी, | सः | = वह | घातयति | = मरवाये ? |
व्याख्या —‘वेदाविनाशिन्म्’……‘घातयति हन्ति कम्’—इस शरीरीका कभी नाश नहीं होता, इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता, इसका कभी जन्म नहीं होता और इसमें कभी किसी तरहकी कोई कमी नहीं आती—ऐसा जो ठीक अनुभव कर लेता है, वह पुरुष कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये ? अर्थात् दूसरोंको मारने और मरवानेमें उस पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। वह किसी क्रियाका न तो कर्ता बन सकता है और न कारयिता बन सकता है।
यहाँ भगवान्ने शरीरीको अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय कहकर उसमें छहों विकारोंका निषेध किया है; जैसे—‘अविनाशी’ कहकर मृत्युरूप विकारका, ‘नित्य’ कहकर अवस्थान्तर होना और बढ़नारूप विकारका, ‘अज’ कहकर जन्म होना और जन्मके बाद होनेवाली सत्तारूप विकारका, तथा ‘अव्यय’ कहकर क्षयरूप
परिशिष्ट भाव—उत्पन्न होनेवाली वस्तु तो स्वतः मिटती है, उसको मिटाना नहीं पड़ता। पर जो वस्तु उत्पन्न नहीं होती, वह कभी मिटती ही नहीं। हमने चौरासी लाख शरीर धारण किये, पर कोई भी शरीर हमारे साथ नहीं रहा और हम किसी भी शरीरके साथ नहीं रहे; किन्तु हम ज्यों-के-त्यों अलग रहे। यह जाननेकी विवेकशक्ति उन शरीरोंमें नहीं थी, प्रत्युत इस मनुष्य-शरीरमें ही है। अगर हम इसको नहीं जानते तो भगवान्ने दिये विवेकका निरादर करते हैं।
विकारका निषेध किया गया है। शरीरीमें किसी भी क्रियासे किंचिन्मात्र भी कोई विकार नहीं होता।
अगर भगवान्को ‘न हन्यते हन्यमाने शरीर’ और ‘कं घातयति हन्ति कम्’ इन पदोंमें शरीरीके कर्ता और कर्म बननेका ही निषेध करना था, तो फिर यहाँ करने-न-करनेकी बात न कहकर मरने-मारनेकी बात क्यों कही ? इसका उत्तर है कि युद्धका प्रसंग होनेसे यहाँ यह कहना जरूरी है कि शरीरी युद्धमें मारनेवाला नहीं बनता; क्योंकि इसमें कर्तापन नहीं है। जब शरीरी मारनेवाला अर्थात् कर्ता नहीं बन सकता, तब यह मरनेवाला अर्थात् क्रियाका विषय (कर्म) भी कैसे बन सकता है ? तात्पर्य यह है कि यह शरीरी किसी भी क्रियाका कर्ता और कर्म नहीं बनता। अतः मरने-मारनेमें शोक नहीं करना चाहिये, प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार प्राप्त कर्तव्य-कर्मका पालन करना चाहिये।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें देहीकी निर्विकारताका जो वर्णन हुआ है, आगेके श्लोकमें उसीका दृष्टान्तरूपसे वर्णन करते हैं।
वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
| नरः | = मनुष्य | नवानि | = नये (कपड़े) | शरीराणि | = शरीरोंको |
|---|---|---|---|---|---|
| यथा | = जैसे | गृह्णाति | = धारण कर लेता है, | विहाय | = छोड़कर |
| जीर्णाणि | = पुराने | तथा | = ऐसे ही | अन्यानि | = दूसरे |
| वासांसि | = कपड़ोंको | देही | = देही | नवानि | = नये (शरीरोंमें) |
| विहाय | = छोड़कर | जीर्णाणि | = पुराने | संयाति | = चला जाता है। |
| अपराणि | = दूसरे |
१८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
व्याख्या—‘वाससि जीर्णानि’ ‘संयाति नवानि देही’— इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें सूत्ररूपसे कहा गया था कि देहान्तरकी प्राप्तिके विषयमें धीर पुरुष शोक नहीं करते। अब उसी बातको उदाहरण देकर स्पष्टरूपसे कह रहे हैं कि जैसे पुराने कपड़ोंके परिवर्तनपर मनुष्यको शोक नहीं होता, ऐसे ही शरीरोंके परिवर्तनपर भी शोक नहीं होना चाहिये।
कपड़े मनुष्य ही बदलते हैं, पशु-पक्षी नहीं; अतः यहाँ कपड़े बदलनेके उदाहरणमें ‘नरः ’ पद दिया है। यह ‘नरः ’ पद मनुष्ययोनिका वाचक है और इसमें स्त्री-पुरुष, बालक-बालिकाएँ, जवान-बूढ़े आदि सभी आ जाते हैं।
जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़ोंको धारण करता है, ऐसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंको धारण करता है। पुराना शरीर छोड़नेको ‘मरना’ कह देते हैं, और नया शरीर धारण करनेको ‘जन्मना’ कह देते हैं। जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर कर्मोंके अनुसार या अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार नये-नये शरीरोंको प्राप्त होता रहता है।
यहाँ ‘शरीराणि ’ पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि जबतक शरीरोंको अपने वास्तविक स्वरूपका यथार्थ बोध नहीं होता, तबतक यह शरीरी अनन्तकालतक शरीर धारण करता ही रहता है। आजतक इसने कितने शरीर धारण किये हैं, इसकी गिनती भी सम्भव नहीं है। इस बातको लक्ष्यमें रखकर ‘शरीराणि ’ पदमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा सम्पूर्ण जीवोंका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ ‘देही ’ पद आया है।
यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें तो जीर्ण कपड़ोंकी बात कही है और उत्तरार्धमें जीर्ण शरीरोंकी। जीर्ण कपड़ोंका दृष्टान्त शरीरोंमें कैसे लागू होगा? कारण कि शरीर तो बच्चों और जवानोंके भी मर जाते हैं। केवल बूढ़ोंके जीर्ण शरीर मर जाते हों, यह बात तो है नहीं! इसका उत्तर यह है कि शरीर तो आयु समाप्त होनेपर ही मरता है और आयु समाप्त होना ही शरीरका जीर्ण होना है*। शरीर चाहे बच्चोंका हो, चाहे जवानोंका हो, चाहे बूढ़ोंका हो, आयु समाप्त होनेपर वे सभी जीर्ण ही कहलायेंगे।
इस श्लोकमें भगवान्ने ‘यथा ’ और ‘तथा ’ पद देकर कहा है कि जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े धारण कर लेता है, वैसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चला जाता है। यहाँ एक शंका होती है। जैसे कुमार, युवा और वृद्ध अवस्थाएँ अपने-आप होती हैं, वैसे ही देहान्तरकी प्राप्ति अपने-आप होती है (दूसरे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)— यहाँ तो ‘यथा ’ (जैसे) और ‘तथा ’ (वैसे) घट जाते हैं। परन्तु (इस श्लोकमें) पुराने कपड़ोंको छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो मनुष्यकी स्वतन्त्रता है, पर पुराने शरीरोंको छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें देहीकी स्वतन्त्रता नहीं है। इसलिये यहाँ ‘यथा ’ और ‘तथा ’ कैसे घटेंगे? इसका समाधान है कि यहाँ भगवान्का तात्पर्य स्वतन्त्रता-परतन्त्रताकी बात कहनेमें नहीं है, प्रत्युत शरीरके वियोगसे होनेवाले शोकको मिटानेमें है। जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े धारण करनेपर भी धारण करनेवाला (मनुष्य) वही रहता है, वैसे ही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चले जानेपर भी देही ज्यों-का-त्यों निर्लिप्तरूपसे रहता है; अतः शोक करनेकी कोई बात है ही नहीं। इस दृष्टिसे यह दृष्टान्त ठीक ही है।
दूसरी शंका यह होती है कि पुराने कपड़े छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो सुख होता है, पर पुराने शरीर छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें दुःख होता है। अतः यहाँ ‘यथा ’ और ‘तथा ’ कैसे घटेंगे? इसका समाधान यह है कि शरीरोंके मरनेका जो दुःख होता है, वह मरनेसे नहीं होता, प्रत्युत जीनेकी इच्छासे होता है। ‘मैं जीता रहूँ’— ऐसी जीनेकी इच्छा भीतरमें रहती है और मरना पड़ता है, तब दुःख होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य शरीरके साथ एकात्मता कर लेता है, तब वह शरीरके मरनेसे अपना मरना मान लेता है और दुःखी होता है। परन्तु जो शरीरके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता, उसको मरनेमें दुःख नहीं होता, प्रत्युत आनन्द होता है! जैसे, मनुष्य कपड़ोंके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता, तो कपड़ोंको बदलनेमें उसको दुःख नहीं होता। कारण कि वहाँ उसका यह विवेक स्पष्टतया जाग्रत रहता है कि कपड़े अलग हैं और मैं अलग हूँ। परन्तु वही कपड़ोंका बदलना अगर छोटे बच्चेका किया जाय, तो वह पुराने कपड़े उतारनेमें और नये कपड़े धारण
- विवेक-विचारपूर्वक देखा जाय तो आयु प्रतिक्षण समाप्त हो रही है अर्थात् शरीर प्रतिक्षण जीर्ण हो रहा है, प्रतिक्षण मर रहा है। यह एक क्षण भी स्थिर नहीं है। जैसे, जवान होनेसे बालकपन मर जाता है, तो वास्तवमें वह बालकपन निरन्तर मरता ही रहा है। परन्तु उधर दृष्टि न होनेसे प्रतिक्षण होनेवाली मौतकी तरफ खयाल नहीं जाता। यही वास्तवमें बेहोशी है।
श्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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करनेमें भी रोता है। उसका यह दुःख केवल मूर्खतासे, नासमझीसे होता है। इस मूर्खताको मिटानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ 'यथा' और 'तथा' पद देकर कपड़ोंका दृष्टान्त दिया है।
यहाँ भगवान्ने कपड़ोंके धारण करनेमें तो 'गृह्णाति' (धारण करता है) क्रिया दी, पर शरीरोंके धारण करनेमें 'संयाति' (जाता है) क्रिया दी, ऐसा क्रियाभेद भगवान्ने क्यों किया? लौकिक दृष्टिसे बेसमझीके कारण ऐसा दीखता है कि मनुष्य अपनी जगह रहता हुआ ही कपड़ोंको धारण करता है और देहान्तरकी प्राप्तिमें देहीको उन-उन देहोंमें जाना पड़ता है। इस लौकिक दृष्टिको लेकर ही भगवान्ने क्रियाभेद किया है।
विशेष बात
गीतामें 'येन सर्वमिदं तत्तम्' (२।१७), 'नित्यः सर्वगतः स्थाणुः' (२।२४) आदि पदोंसे देहीको सर्वत्र व्याप्त, नित्य, सर्वगत और स्थिर स्वभाववाला बताया तथा 'संयाति नवानि देही' (२।२२), 'शरीरं यदवाजोति' (१५।८) आदि पदोंसे देहीको दूसरे शरीरोंमें जानेकी बात कही गयी है। अतः जो सर्वगत है, सर्वत्र व्याप्त है, उसका जाना-आना कैसे? क्योंकि जो जिस देशमें न हो, उस देशमें चला जाय, तो इसको 'जाना' कहते हैं और जो दूसरे देशमें है, वह इस देशमें आ जाय, तो इसको 'आना' कहते हैं। परन्तु देहीके विषयमें तो ये दोनों ही बातें नहीं घटतीं! इसका समाधान यह है कि जैसे किसीकी बाल्यावस्थासे युवावस्था हो जाती है तो वह कहता है कि 'मैं जवान हो गया हूँ'। परन्तु वास्तवमें वह स्वयं जवान नहीं हुआ है,
परिशिष्ट भाव —मनुष्य नयी-नयी वस्तु चाहता है तो भगवान् भी उसको नयी-नयी वस्तु (शरीरादि सामग्री) देते रहते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है तो भगवान् उसको नया शरीर दे देते हैं। अतः नयी-नयी इच्छा करना ही जन्म-मरणका हेतु है। नयी-नयी इच्छा करनेवालेको अनन्तकालतक नयी-नयी वस्तु मिलती ही रहेगी। मनुष्यमें एक इच्छाशक्ति है, एक प्राणशक्ति है। इच्छाशक्तिके रहते हुए प्राणशक्ति नष्ट हो जाती है, तब नया जन्म होता है। अगर इच्छाशक्ति न रहे तो प्राणशक्ति नष्ट होनेपर भी पुनः जन्म नहीं होता।
कोई भी दृष्टान्त केवल एक अंशमें घटता है, सर्वथा नहीं घटता। यहाँ पुराने कपड़े छोड़कर नये कपड़े बदलनेका दृष्टान्त केवल इस अंशमें है कि जैसे आदमी अनेक कपड़े बदलनेपर भी एक ही रहता है, ऐसे ही स्वयं अनेक योनियोंमें अनेक शरीर धारण करनेपर भी एक (वही-का-वही) रहता है। जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़नेसे हम मर नहीं जाते और नये कपड़े धारण करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते, ऐसे ही पुराने शरीरको छोड़नेसे हम मर नहीं जाते और नया शरीर धारण
प्रत्युत उसका शरीर जवान हुआ है। इसलिये बाल्यावस्थामें जो वह था, युवावस्थामें भी वह वही है। परन्तु शरीरसे तादात्म्य माननेके कारण वह शरीरके परिवर्तनको अपनेमें आरोपित कर लेता है। ऐसे ही आना-जाना वास्तवमें शरीरका धर्म है, पर शरीरके साथ तादात्म्य होनेसे वह अपनेमें आना-जाना मान लेता है। अतः वास्तवमें देहीका कहीं भी आना-जाना नहीं होता, केवल शरीरोंके तादात्म्यके कारण उसका आना-जाना प्रतीत होता है।
अब यह प्रश्न होता है कि अनादिकालसे जो जन्म-मरण चला आ रहा है, उसमें कारण क्या है? कर्मोंकी दृष्टिसे तो शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये जन्म-मरण होता है, ज्ञानकी दृष्टिसे अज्ञानके कारण जन्म-मरण होता है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान्की विमुखताके कारण जन्म-मरण होता है। इन तीनोंमें भी मुख्य कारण है कि भगवान्ने जीवको जो स्वतन्त्रता दी है, उसका दुरुपयोग करनेसे ही जन्म-मरण हो रहा है। अब वह जन्म-मरण मिटे कैसे? मिली हुई स्वतन्त्रताका सदुपयोग करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। तात्पर्य है कि अपने स्वार्थके लिये कर्म करनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। अपनी जानकारीका अनादर करनेसे* जन्म-मरण हुआ है; अतः अपनी जानकारीका आदर करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। भगवान्ने विमुख होनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः भगवान्के सम्मुख होनेसे जन्म-मरण मिट जायगा।
- अपनी जानकारीका अनादर करनेका तात्पर्य है कि हम जितना जानते हैं, उसके अनुसार कार्य न करना। जैसे, सत्य बोलना ठीक है, झूठ बोलना ठीक नहीं—ऐसा जानते हुए भी स्वार्थके लिये झूठ बोल देते हैं। कोई हमें सुख देता है तो अच्छा लगता है और दुःख देता है तो बुरा लगता है—ऐसा जानते हुए भी अपने सुखके लिये दूसरोंको दुःख देते हैं। ऐसे ही हम जानते हैं कि शरीर आदि सब जानेवाले हैं, रहनेवाले नहीं हैं, फिर भी इनमें मोह-ममता करते हैं। यही अपनी जानकारीका अनादर है।
१००
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते। तात्पर्य है कि शरीर मरता है, हम नहीं मरते। अगर हम मर जायें तो फिर पुण्य-पापका फल कौन भोगेगा? अन्य योनियोंमें कौन जायगा? बन्धन किसका होगा? मुक्त कौन होगा?
सम्बन्ध—पहले दृष्टान्तरूपसे शरीरीकी निर्विकारताका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसीका प्रकारान्तरसे वर्णन करते हैं।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥
| शस्त्राणि | = शस्त्र | एनम् | = इसको | न, क्लेदयन्ति | = गीला नहीं कर |
|---|---|---|---|---|---|
| एनम् | = इस (शरीरी)-को | न, दहति | = जला नहीं | सकता | |
| न, छिन्दन्ति | = काट नहीं | सकती, | च | = और | |
| सकते, | आपः | = जल | मारुतः | = वायु (इसको) | |
| पावकः | = अग्नि | एनम् | = इसको | न, शोषयति | = सुखा नहीं सकती। |
व्याख्या—‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’ —इस शरीरीको शस्त्र नहीं काट सकते; क्योंकि ये प्राकृत शस्त्र वहाँतक पहुँच ही नहीं सकते।
जितने भी शस्त्र हैं, वे सभी पृथ्वी-तत्त्वसे उत्पन्न होते हैं। यह पृथ्वी-तत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहका कोई विकार नहीं पैदा कर सकता। इतना ही नहीं, पृथ्वी-तत्त्व इस शरीरीतक पहुँच ही नहीं सकता, फिर विकृति करनेकी बात तो दूर ही रही!
‘नैनं दहति पावकः’ —अग्नि इस शरीरीको जला नहीं सकती; क्योंकि अग्नि वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती। जब वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती, तब उसके द्वारा जलाना कैसे सम्भव हो सकता है? तात्पर्य है कि अग्नि-तत्त्व इस शरीरीमें कभी किसी तरहका विकार उत्पन्न कर ही नहीं सकता।
‘न चैनं क्लेदयन्त्यापः’ —जल इसको गीला नहीं कर सकता; क्योंकि जल वहाँतक पहुँच ही नहीं सकता। तात्पर्य है कि जल-तत्त्व इस शरीरीमें किसी प्रकारका विकार पैदा नहीं कर सकता।
‘न शोषयति मारुतः’ —वायु इसको सुखा नहीं सकती अर्थात् वायुमें इस शरीरीको सुखानेकी सामर्थ्य नहीं है; क्योंकि वायु वहाँतक पहुँचती ही नहीं। तात्पर्य है कि वायु-तत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहको विकृति पैदा नहीं कर सकता।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत कहलाते हैं। भगवान्ने इनमेंसे चार ही महाभूतोंकी बात कही है कि ये पृथ्वी, जल, तेज और वायु इस शरीरीमें किसी तरहको विकृति नहीं कर सकते; परन्तु पाँचवें महाभूत आकाशको कोई चर्चा ही नहीं की है। इसका कारण यह
है कि आकाशमें कोई भी क्रिया करनेकी शक्ति नहीं है। क्रिया (विकृति) करनेकी शक्ति तो इन चार महाभूतोंमें ही है। आकाश तो इन सबको अवकाशमात्र देता है।
पृथ्वी, जल, तेज और वायु—ये चारों तत्त्व आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, पर वे अपने कारणभूत आकाशमें भी किसी तरहका विकार पैदा नहीं कर सकते अर्थात् पृथ्वी आकाशका छेदन नहीं कर सकती, जल गीला नहीं कर सकता, अग्नि जला नहीं सकती और वायु सुखा नहीं सकती। जब ये चारों तत्त्व अपने कारणभूत आकाशको, आकाशके कारणभूत महत्त्वको और महत्त्वके कारणभूत प्रकृतिको भी कोई क्षति नहीं पहुँचा सकते, तब प्रकृतिसे सर्वथा अतीत शरीरीतक ये पहुँच ही कैसे सकते हैं? इन गुणयुक्त पदार्थोंकी उस निर्गुण-तत्त्वमें पहुँच ही कैसे हो सकती है? नहीं हो सकती (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
शरीरी नित्य-तत्त्व है। पृथ्वी आदि चारों तत्त्वोंको इसीसे सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः जिससे इन तत्त्वोंको सत्ता-स्फूर्ति मिलती है, उसको ये कैसे विकृत कर सकते हैं? यह शरीरी सर्वव्यापक है और पृथ्वी आदि चारों तत्त्व व्याप्य हैं अर्थात् शरीरीके अन्तर्गत हैं। अतः व्याप्य वस्तु व्यापकको कैसे नुकसान पहुँचा सकती है? उसको नुकसान पहुँचाना सम्भव ही नहीं है।
यहाँ युद्धका प्रसंग है। ‘ये सब सम्बन्धी मर जायेंगे’—इस बातको लेकर अर्जुन शोक कर रहे हैं। अतः भगवान् कहते हैं कि ये कैसे मर जायेंगे? क्योंकि वहाँतक अस्त्र-शस्त्रोंकी क्रिया पहुँचती ही नहीं अर्थात् शस्त्रके द्वारा शरीर कट जानेपर भी शरीरी नहीं कटता, अग्न्यास्त्रके द्वारा