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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ९ ]

  • साधक-संजीवनी *

८२७

युक्तिसंगत है।

भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अगर तू मन-बुद्धिको मेरेमें अचलभावसे स्थापित करनेमें अर्थात् मेरे अर्पण करनेमें अपनेको असमर्थ मानता है, तो अभ्यासयोगके द्वारा मेरेको प्राप्त करनेकी इच्छा कर।

‘अभ्यास’ और ‘अभ्यासयोग’ पृथक्-पृथक् हैं। किसी लक्ष्यपर चित्तको बार-बार लगानेका नाम ‘अभ्यास’ है और समताका नाम ‘योग’ है। समता रखते हुए अभ्यास करना ही ‘अभ्यासयोग’ कहलाता है। केवल भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे किया गया भजन, नाम-जप आदि ‘अभ्यासयोग’ है।

अभ्यासके साथ योगका संयोग न होनेसे साधकका उद्देश्य संसार ही रहेगा। संसारका उद्देश्य होनेपर स्त्री-पुत्र, धन-सम्पत्ति, मान-बड़ाई, नीरोगता, अनुकूलता आदिकी अनेक कामनाएँ उत्पन्न होंगी। कामनावाले पुरुषकी क्रियाओंके उद्देश्य भी (कभी पुत्र, कभी धन, कभी मान-बड़ाई आदि) भिन्न-भिन्न रहेंगे (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालिसर्वाँ श्लोक)। इसलिये ऐसे पुरुषकी क्रियामें योग नहीं होगा। योग तभी होगा, जब क्रियामात्रका उद्देश्य (ध्येय) केवल परमात्मा ही हो।

साधक जब भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर बार-बार नाम-जप आदि करनेकी चेष्टा करता है, तब उसके मनमें दूसरे अनेक संकल्प भी पैदा होते रहते हैं, अतः साधकको ‘मेरा ध्येय भगवत्प्राप्ति ही है’—इस प्रकारकी दृढ़ धारणा करके अन्य सब संकल्पोंसे उपराम हो जाना चाहिये।

मामिच्छान्तुम् ’ पदोंसे भगवान् ‘अभ्यासयोग’ को अपनी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बताते हैं।

पीछेके श्लोकमें भगवान्ने अपनेमें मन-बुद्धि अर्पण करनेके लिये कहा। अब इस श्लोकमें अभ्यासयोगके लिये कहते हैं। इससे यह धारणा हो सकती है कि अभ्यासयोग भगवान्में मन-बुद्धि अर्पण करनेका साधन है; अतः पहले अभ्यासके द्वारा मन-बुद्धि भगवान्के अर्पण होंगे, फिर भगवान्की प्राप्ति होगी। परन्तु मन-बुद्धिको अर्पण करनेसे ही भगवत्प्राप्ति होती हो, ऐसा नियम नहीं है। भगवान्के

परिशिष्ट भाव— छठे अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें तो केवल ‘अभ्यास’ की बात आयी थी; परन्तु यहाँ ‘अभ्यासयोग’ की बात आयी है, जिससे कल्याण हो जाता है। केवल अभ्यास हो, योग न हो तो एक स्थिति (अवस्था) बनेगी, पर कल्याण नहीं होगा।

मनका निरोध करना अथवा मनको बार-बार भगवान्में लगाना अभ्यास है। अभ्यासयोगमें मनका निरोध नहीं है, प्रत्युत मनसे सम्बन्ध-विच्छेद है—‘समत्वं योग उच्यते ’ (गीता २।४८)।

कथनका तात्पर्य यह है कि यदि उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही हो अर्थात् उद्देश्यके साथ साधककी पूर्ण एकता हो तो केवल ‘अभ्यास’ से ही उसे भगवत्प्राप्ति हो जायगी।

जब साधक भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे बार-बार नाम जप, भजन-कीर्तन, श्रवण आदिका अभ्यास करता है, तब उसका अन्तःकरण शुद्ध होने लगता है और भगवत्प्राप्तिकी इच्छा जाग्रत् हो जाती है। सांसारिक सिद्धि-असिद्धिमें सम होनेपर भगवत्प्राप्तिकी इच्छा तीव्र हो जाती है। भगवत्प्राप्तिकी तीव्र इच्छा होनेपर भगवान्से मिलनेके लिये व्याकुलता पैदा हो जाती है। यह व्याकुलता उसकी अवशिष्ट सांसारिक आसक्ति एवं अनन्त जन्मोंके पापोंको जला डालती है। सांसारिक आसक्ति तथा पापोंका नाश होनेपर उसका एकमात्र भगवान्में ही अनन्य प्रेम हो जाता है और वह भगवान्के वियोगको सहन नहीं कर पाता। जब भक्त भगवान्के बिना नहीं रह सकता, तब भगवान् भी उस भक्तके बिना नहीं रह सकते अर्थात् भगवान् भी उसके वियोगको नहीं सह सकते और उस भक्तको मिल जाते हैं।

साधकको भगवत्प्राप्तिमें देरी होनेका कारण यही है कि वह भगवान्के वियोगको सहन कर रहा है। यदि उसको भगवान्का वियोग असह्य हो जाय, तो भगवान्के मिलनेमें देरी नहीं होगी। भगवान्की देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिसे दूरी है ही नहीं। जहाँ साधक है, वहाँ भगवान् हैं ही। भक्तमें उत्कण्ठाकी कमीके कारण ही भगवत्प्राप्तिमें देरी होती है। सांसारिक सुखभोगकी इच्छाके कारण ही ऐसी आशा कर ली जाती है कि भगवत्प्राप्ति भविष्यमें होगी। जब भगवत्प्राप्तिके लिये व्याकुलता और तीव्र उत्कण्ठा होगी, तब सुख-भोगकी इच्छाका स्वतः नाश हो जायगा और वर्तमानमें ही भगवत्प्राप्ति हो जायगी।

साधकका यदि आरम्भसे ही यह दृढ़ निश्चय हो कि मेरेको तो केवल भगवत्प्राप्ति ही करनी है (चाहे लौकिक दृष्टिसे कुछ भी बने या बिगड़े) तो कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग—किसी भी मार्गसे उसे बहुत जल्दी भगवत्प्राप्ति हो सकती है।

८२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमाप्स्यसि ॥ १० ॥

अभ्यासे= (अगर तू)असि= है, (तो)कर्माणि= कर्मोंको
अभ्यास- (योग-)मत्कर्मपरमः= मेरे लिये कर्मकुर्वन्= करता हुआ
मेंकरनेके परायणअपि= भी (तू)
अपि= भी (अपनेको)भव= हो जा।सिद्धिम्= सिद्धिको
असमर्थः= असमर्थ (पाता)मदर्थम्= मेरे लियेअवाप्स्यसि= प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या —‘अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव’—

यहाँ ‘अभ्यासे’ पदका अभिप्राय पीछेके (नवें) श्लोकमें वर्णित ‘अभ्यासयोग’ से है। गीताकी यह शैली है कि पहले कहे हुए विषयका आगे संक्षेपमें वर्णन किया जाता है। आठवें श्लोकमें भगवान्ने अपनेमें मन-बुद्धि लगानेके साधनको नवें श्लोकमें पुनः ‘चित्तं समाधातुम्’ पदोंसे कहा अर्थात् ‘चित्तम्’ पदके अन्तर्गत मन-बुद्धि दोनोंका समावेश कर लिया। इसी प्रकार नवें श्लोकमें आये हुए अभ्यासयोगके लिये यहाँ (दसवें श्लोकमें) ‘अभ्यासे’ पद आया है।

भगवान् कहते हैं कि अगर तू पूर्वश्लोकमें वर्णित अभ्यासयोगमें भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्म करनेके परायण हो जा। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण कर्मों- (वर्णाश्रमधर्मानुसार शरीरनिर्वाह और आजीविका-सम्बन्धी लौकिक एवं भजन, ध्यान, नाम-जप आदि पारमार्थिक कर्मों- ) का उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रह न होकर एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही हो। जो कर्म भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदज्ञानुसार किये जाते हैं, उनको ‘मत्कर्म’ कहते हैं। जो साधक इस प्रकार कर्मोंके परायण हैं, वे ‘मत्कर्मपरम’ कहे जाते हैं। साधकका अपना सम्बन्ध भी भगवान्से हो और कर्मोंका सम्बन्ध भी भगवान्के साथ रहे, तभी मत्कर्मपरायणता सिद्ध होगी।

साधकका ध्येय जब संसार (भोग और संग्रह) नहीं रहेगा, तब निषिद्ध क्रियाएँ सर्वथा छूट जायँगी; क्योंकि निषिद्ध क्रियाओंके अनुष्ठानमें संसारकी ‘कामना’ ही हेतु है (गीता—तीसरे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। अतः भगवत्प्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे साधककी सम्पूर्ण क्रियाएँ शास्त्रविहित और भगवदर्थ ही होंगी।

‘मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमाप्स्यसि’— भगवान्ने जिस साधनकी बात इसी श्लोकके पूर्वार्धमें ‘मत्कर्मपरमो भव’ पदोंसे कही है, वही बात इन पदोंमें पुनः कही गयी है। भाव यह है कि केवल परमात्माका उद्देश्य होनेसे उस

साधककी और जगह स्थिति हो ही कैसे सकती है?

जिस प्रकार भगवान्ने आठवें श्लोकमें मन-बुद्धि अपनेमें अर्पण करनेके साधनको तथा नवें श्लोकमें अभ्यासयोगके साधनको अपनी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बताया, उसी प्रकार यहाँ भगवान् ‘मत्कर्मपरमो भव’ (केवल मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो)—इस साधनको भी अपनी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन बता रहे हैं।

जैसे धन-प्राप्तिके लिये व्यापार आदि कर्म करनेवाले मनुष्यको ज्यों-ज्यों धन प्राप्त होता है, त्यों-त्यों उसके मनमें धनका लोभ और कर्म करनेका उत्साह बढ़ता है, ऐसे ही साधक जब भगवान्के लिये ही सम्पूर्ण कर्म करता है, तब उसके मनमें भी भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा और साधन करनेका उत्साह बढ़ता रहता है। उत्कण्ठा तीव्र होनेपर जब उसको भगवान्का वियोग असह्य हो जाता है, तब सर्वत्र परिपूर्ण भगवान् उससे छिपे नहीं रहते। भगवान् अपनी कृपासे उसको अपनी प्राप्ति करा ही देते हैं। यदि साधकका उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही है और सम्पूर्ण क्रियाएँ वह भगवान्के लिये ही करता है, तो इसका अभिप्राय यह है कि उसने अपनी सारी समझ, सामग्री, सामर्थ्य और समय भगवत्प्राप्तिके लिये ही लगा दिया। इसके सिवाय वह और कर भी क्या सकता है? भगवान् उस साधकसे इससे अधिक अपेक्षा भी नहीं रखते। अतः उसे अपनी प्राप्ति करा देते हैं। इसका कारण यह है कि भगवान् किसी साधन-विशेषसे खरीदे नहीं जा सकते। भगवान्के महत्त्वके सामने सृष्टिमात्रका महत्त्व भी कुछ नहीं है, फिर एक व्यक्तिके द्वारा अर्पित सीमित सामग्री और साधनसे उनका मूल्य चुकाया ही कैसे जा सकता है! अतः अपनी प्राप्तिके लिये भगवान् साधकसे इतनी ही अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी पूरी योग्यता, सामर्थ्य आदिको मेरी प्राप्तिमें लगा दे अर्थात् अपने पास बचाकर कुछ न रखे और इन योग्यता, सामर्थ्य आदिको अपना भी न समझे।

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

८२९

परिशिष्ट भाव —अभ्यासकी अपेक्षा क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करना सुगम है। कारण कि अभ्यास तो नया काम है, जो करना पड़ता है, पर कर्म स्वतः होते हैं; क्योंकि कर्म करनेका स्वभाव पड़ा हुआ है। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँधता है—‘कर्मणा बध्यते जन्तुः ’। इसलिये कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेसे मनुष्य सुगमतापूर्वक भगवान्को प्राप्त हो जाता है (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ-अठ्ठाईसवाँ श्लोक)।

मदर्थमपि ’ पदका तात्पर्य है कि आरम्भसे भगवान्के लिये ही कर्म किये जायँ।

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥

अथ= अगरसाधन-कोयतात्मवान्= मन-इन्द्रियोंको
मद्योगम्= मेरे योग-अपि= भीवशमें करके
(समता-) केकर्तुम्= करनेमें (अपनेको)सर्वकर्मफल-
आश्रितः= आश्रित हुआअशक्तः= असमर्थत्यागम्= सम्पूर्ण कर्मोंके
(तू)(पाता)फलकी इच्छाका
एतत्= इस-(पूर्वश्लोकमें)असि= है,त्याग
कहे गयेततः= तोकुरु= कर।

व्याख्या —‘अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योग- माश्रितः ’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने लिये ही सम्पूर्ण कर्म करनेसे अपनी प्राप्ति बतायी और अब इस श्लोकमें वे सम्पूर्ण कर्मोंके फलत्यागरूप साधनकी बात बता रहे हैं। वहाँ भगवान्के लिये समस्त कर्म करनेमें भक्तिकी प्रधानता होनेसे उसे ‘भक्तियोग’ कहेंगे और यहाँ सर्वकर्मफलत्यागमें केवल फलत्यागकी मुख्यता होनेसे इसे ‘कर्मयोग’ कहेंगे। इस प्रकार भगवत्प्राप्तिके ये दोनों ही स्वतन्त्र (पृथक्-पृथक्) साधन हैं।

इस श्लोकमें ‘मद्योगमाश्रितः ’ पदका सम्बन्ध ‘अथैतदप्यशक्तोऽसि ’ के साथ मानना ही ठीक मालूम देता है; क्योंकि यदि इसका सम्बन्ध ‘सर्वकर्मफलत्यागं कुरु ’ के साथ माना जाय, तो भगवान्के आश्रयकी मुख्यता हो जानेसे यहाँ ‘भक्तियोग’ ही हो जायगा। ऐसी दशामें दसवें श्लोकमें कहे हुए भक्तियोगके साधनसे इसकी भिन्नता नहीं रहेगी, जबकि भगवान् दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः ‘भक्तियोग’ और ‘कर्मयोग’—दो भिन्न-भिन्न साधन बताना चाहते हैं।

दूसरी बात, भगवान्ने इस श्लोकमें ‘यतात्मवान् ’ (मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके सहित शरीरपर विजय प्राप्त करनेवाला) पद भी दिया है। आत्मसंयमकी विशेष आवश्यकता कर्मयोगमें ही है; क्योंकि आत्मसंयमके बिना सर्वकर्म-फलत्याग होना असम्भव है। इसलिये भी ‘मद्योगमाश्रितः

पदका सम्बन्ध ‘अथैतदप्यशक्तोऽसि ’ के साथ मानना चाहिये, न कि सर्वकर्मफलत्याग करनेकी आज्ञाके साथ।

जिसका भगवान्पर तो उतना विश्वास नहीं है, पर भगवान्के विधानमें अर्थात् देश-समाजकी सेवा आदि करनेमें अधिक विश्वास है, उसके लिये भगवान् इस श्लोकमें सर्वकर्मफलत्याग-रूप साधन बताते हैं। तात्पर्य है कि अगर वह सम्पूर्ण कर्मोंको मेरे अर्पण न कर सके, तो जिस फलको प्राप्त करना उसके हाथकी बात नहीं है, उस फलकी इच्छाका त्याग कर दे—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ’ (गीता २।४७)। फलकी इच्छाका त्याग करके कर्तव्य कर्म करनेसे उसका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ’—कर्मयोगके साधनमें स्वाभाविक ही कर्मोंका विस्तार होता है; क्योंकि योगकी प्राप्तिमें अनासक्त भावसे कर्म करना ही हेतु कहा गया है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। इससे कर्मोंमें फलासक्ति होनेके कारण बँधनेका भय रहता है। अतः ‘यतात्मवान् ’ पदसे भगवान् कर्मफलत्यागके साधनमें मन-इन्द्रियों आदिके संयमकी आवश्यकता बताते हैं। यह ध्यान देनेकी बात है कि मन-इन्द्रियोंका संयम होनेपर कर्मफलत्यागमें भी सुगमता होती है। अगर साधक मन-बुद्धि-इन्द्रियों आदिका संयम नहीं करता, तो स्वाभाविक ही उसके मनद्वारा विषयोंका चिन्तन होगा और उसकी उन विषयोंमें आसक्ति हो जायगी। इससे उसका

८३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

पतन होनेकी बहुत सम्भावना रहेगी (गीता—दूसरे अध्यायका बासटवॉ-तिरसटवॉ श्लोक)। त्यागका उद्देश्य होनेसे साधक मन-इन्द्रियोंका संयम सुगमतासे कर सकता है।

यहाँ ‘सर्वकर्म’ पद यज्ञ, दान, तप, सेवा और वर्णाश्रमके अनुसार जीविका तथा शरीर-निर्वाहके लिये किये जानेवाले शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंका वाचक है। सर्वकर्मफलत्यागका अभिप्राय स्वरूपसे कर्मफलका त्याग न होकर कर्मफलमें ममता, आसक्ति, कामना, वासना आदिका त्याग ही है।

कर्मफलत्यागके साधनमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी बात नहीं कही गयी; क्योंकि कर्म करना तो जरूरी है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)। जैसा कि पहले कह चुके हैं, आवश्यकता केवल कर्म और उनके फलोंमें ममता, आसक्ति, कामना आदिके त्यागकी ही है।

कर्मयोगके साधकको अकर्मण्य नहीं होना चाहिये; क्योंकि कर्मफल-त्यागकी बात सुनकर प्रायः साधक सोचता है कि जब कुछ लेना ही नहीं है, तो फिर कर्मोंको करनेकी क्या जरूरत! इसलिये भगवान्ने दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगकी बात कहते हुए ‘मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि’ ‘तेरी कर्म न करनेमें आसक्ति न हो’—यह कहकर साधकके लिये अकर्मण्यता-(कर्मके त्याग-) का निषेध किया है।

अठारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने सात्त्विक त्यागके लक्षण बताते हुए कर्मोंमें फलासक्तिके त्यागको ही ‘सात्त्विक त्याग’ कहा है, न कि स्वरूपसे कर्मोंके त्यागको।

फलासक्तिका त्याग करके क्रियाओंको करते रहनेसे क्रियाओंको करनेका वेग शान्त हो जाता है और पुरानी आसक्ति मिट जाती है। फलकी इच्छा न रहनेसे कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और नयी आसक्ति पैदा नहीं होती। फिर साधक कृतकृत्य हो जाता है। पदार्थोंमें राग, आसक्ति, कामना, ममता, फलेच्छा आदि ही

परिशिष्ट भाव— अगर साधक सर्वथा भगवान्के लिये कर्म न कर सके तो उसको फलेच्छाका त्याग करके कर्म करना चाहिये; क्योंकि फलेच्छा ही बाँधनेवाली है—‘फले सत्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)।

सम्बन्ध— भगवान्ने आठवें श्लोकसे ग्यारहवें श्लोकतक एक साधनमें असमर्थ होनेपर दूसरा, दूसरे साधनमें असमर्थ होनेपर तीसरा और तीसरे साधनमें असमर्थ होनेपर चौथा साधन बताया। इससे यह शंका हो सकती है कि क्या अन्तमें बताया गया ‘सर्वकर्मफलत्याग’ साधन सबसे निम्न श्रेणीका है? क्योंकि उसको सबसे अन्तमें कहा गया है तथा भगवान्ने उस-(सर्वकर्मफलत्याग-)का कोई फल भी नहीं बताया। इस शंकाका निवारण करते हुए भगवान् सर्वकर्मफलत्यागरूप साधनकी श्रेष्ठता तथा उसका फल बताते हैं।

क्रियाओंका वेग पैदा करनेवाली है। इनके रहते हुए हठपूर्वक क्रियाओंका त्याग करनेपर भी क्रियाओंका वेग शान्त नहीं होता। राग-द्वेष रहनेके कारण साधककी प्रकृति पुनः उसे कर्मोंमें लगा देती है। अतः राग-द्वेषादिका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक कर्तव्य-कर्म करनेसे ही क्रियाओंका वेग शान्त होता है।

जिन साधकोंकी सगुण-साकार भगवान्में स्वाभाविक श्रद्धा और भक्ति नहीं है, प्रत्युत व्यावहारिक और लोकहितके कार्य करनेमें ही अधिक श्रद्धा और रुचि है, ऐसे साधकोंके लिये यह (सर्वकर्मफलत्यागरूप) साधन बहुत उपयोगी है।

भगवान्ने जहाँ भी कर्मफलत्यागकी बात कही है, वहाँ आसक्ति और फलेच्छाके त्यागका अध्याहार कर लेना चाहिये; क्योंकि भगवान्के मतमें आसक्ति और फलेच्छाका पूरी तरह त्याग होनेसे ही कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होता है (गीता—अठारहवें अध्यायका छठा श्लोक)।

सम्पूर्ण कर्मोंके फल-(फलेच्छा-) का त्याग भगवत्-प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है। कर्मफलत्यागसे विषयासक्तिका नाश होकर शान्ति-(सात्त्विक सुख-) की प्राप्ति हो जाती है। उस शान्तिका उपभोग न करनेसे (उसमें सुख-बुद्धि करके उसमें न अटकनेसे) वह शान्ति परमतत्त्वका बोध कराकर उससे अभिन्न करा देती है।

ग्यारहवें अध्यायके पचपनवें श्लोकमें भगवान्ने साधक भक्तके पाँच लक्षणोंमें एक लक्षण ‘संगवर्जितः’ (आसक्तिसे रहित) बताया था। इस श्लोकमें भगवान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलत्यागकी बात कहते हैं, जो संसारकी आसक्तिके सर्वथा त्यागसे ही सम्भव है। इस-(सर्वकर्मफलत्याग-)का फल भगवान्ने इसी अध्यायके बारहवें श्लोकमें तत्काल परमशान्तिकी प्राप्ति होना बताया है। अतः यह समझना चाहिये कि केवल आसक्तिका सर्वथा त्याग करनेसे भी परमशान्ति अथवा भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

८३१

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानादध्यानं विशिष्यते ।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥

अभ्यासात्= अभ्याससेविशिष्यते= श्रेष्ठ है (और)त्याग (श्रेष्ठ है);
ज्ञानम्= शास्त्रज्ञानध्यानात्= ध्यानसेहि= क्योंकि
श्रेयः= श्रेष्ठ है,(भी)त्यागात्= त्यागसे
ज्ञानात्= शास्त्रज्ञानसेकर्मफल-अनन्तरम्= तत्काल ही
ध्यानम्= ध्यानत्यागः= सब कर्मोंकेशान्तिः= परमशान्ति प्राप्त हो
फलकी इच्छाकाजाती है।

व्याख्या —[ भगवान्ने आठवें श्लोकसे ग्यारहवें श्लोकतक एक-एक साधनमें असमर्थ होनेपर क्रमशः समर्पणयोग, अभ्यासयोग, भगवदर्थ कर्म और कर्मफलत्याग—ये चार साधन बताये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि क्रमशः पहले साधनकी अपेक्षा आगेका साधन नीचे दर्जका है, और अन्तमें कहा गया कर्मफलत्यागका साधन सबसे नीचे दर्जका है। इस बातकी पुष्टि इससे भी होती है कि पहलेके तीन साधनोंमें भगवत्प्राप्तिरूप फलकी बात (‘निवसिष्यसि मध्येव’, ‘मामिच्छानुम्’ तथा ‘सिद्धिमवाप्यसि’—इन पदोंद्वारा) साथ-साथ कही गयी; परन्तु ग्यारहवें श्लोकमें जहाँ कर्मफलत्याग करनेकी आज्ञा दी गयी है, वहाँ उसका फल भगवत्प्राप्ति नहीं बताया गया।

उपर्युक्त धारणाओंको दूर करनेके लिये यह बारहवाँ श्लोक कहा गया है। इसमें भगवान्ने कर्मफलत्यागको श्रेष्ठ और तत्काल परमशान्ति देनेवाला बताया है, जिससे कि इस चौथे साधनको कोई निम्न श्रेणीका न समझ ले। कारण कि इस साधनमें आसक्ति, ममता और फलेच्छाके त्यागकी ही प्रधानता होनेसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति समर्पणयोग, अभ्यासयोग एवं भगवदर्थ कर्म करनेसे होती है, ठीक उसी तत्त्वकी प्राप्ति कर्मफलत्यागसे भी होती है।

वास्तवमें उपर्युक्त चारों साधन स्वतन्त्रतासे भगवत्प्राप्ति करानेवाले हैं। साधकोंकी रुचि, विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण ही भगवान्ने आठवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक अलग-अलग साधन कहे हैं।

जहाँतक कर्मफलत्यागके फल-(भगवत्प्राप्ति-) को अलगसे बारहवें श्लोकमें कहनेका प्रश्न है, उसमें यही विचार करना चाहिये कि समर्पणयोग, अभ्यासयोग एवं भगवदर्थ कर्म करनेसे भगवत्प्राप्ति होती है, यह तो प्रायः प्रचलित ही है; किंतु कर्मफलत्यागसे भी भगवत्प्राप्ति होती है, यह बात प्रचलित नहीं है। इसीलिये प्रचलित साधनोंकी अपेक्षा इसकी श्रेष्ठता बतानेके लिये बारहवाँ श्लोक कहा

गया है और उसीमें कर्मफलत्यागका फल कहना उचित प्रतीत होता है।]

‘श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात्’—महर्षि पतंजलि कहते हैं—‘तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः।’ (योगदर्शन १।१३)

अर्थात् किसी एक विषयमें स्थिति (स्थिरता) प्राप्त करनेके लिये बार-बार प्रयत्न करनेका नाम ‘अभ्यास’ है।

यहाँ (इस श्लोकमें) ‘अभ्यास’ शब्द केवल अभ्यास-रूप क्रियाका वाचक है, अभ्यासयोगका वाचक नहीं; क्योंकि इस (प्राणायाम, मनोनिग्रह आदि) अभ्यासमें शास्त्रज्ञान और ध्यान नहीं है तथा कर्मफलकी इच्छाका त्याग भी नहीं है। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही योग होता है, जबकि उपर्युक्त अभ्यासमें जड़ता-(शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि-) का आश्रय रहता है।

यहाँ ‘ज्ञान’ शब्दका अर्थ शास्त्रज्ञान है, तत्त्वज्ञान नहीं; क्योंकि तत्त्वज्ञान तो सभी साधनोंका फल है। अतः यहाँ जिस ज्ञानकी अभ्याससे तुलना की जा रही है, उस ज्ञानमें न तो अभ्यास है, न ध्यान है और न कर्मफलत्याग ही है। जिस अभ्यासमें न ज्ञान है, न ध्यान है और न कर्मफलत्याग ही है—ऐसे अभ्यासकी अपेक्षा उपर्युक्त ज्ञान ही श्रेष्ठ है।

शास्त्रोंके अध्ययन और सत्संगके द्वारा आध्यात्मिक जानकारीको तो प्राप्त कर ले, पर न तो उसके अनुसार वास्तविक तत्त्वका अनुभव करे और न ध्यान, अभ्यास और कर्मफलत्यागरूप किसी साधनका अनुष्ठान ही करे—ऐसी (केवल शास्त्रोंकी) जानकारीके लिये यहाँ ‘ज्ञानम्’ पद आया है। इस ज्ञानको उपर्युक्त अभ्यासकी अपेक्षा श्रेष्ठ कहनेका तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिक ज्ञानसे रहित अभ्यास भगवत्प्राप्तिमें उतना सहायक नहीं होता, जितना अभ्याससे रहित ज्ञान सहायक होता है। कारण कि ज्ञानसे भगवत्प्राप्तिकी अभिलाषा जाग्रत् हो सकती है, जिससे संसारसे ऊँचा उठना जितना सुगम हो सकता है, उतना अभ्यासमात्रसे नहीं।

८३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

‘ज्ञानादध्यानं विशिष्यते’—यहाँ ‘ध्यान’ शब्द केवल मनकी एकाग्रतरूप क्रियाका वाचक है, ध्यानयोगका वाचक नहीं। इस ध्यानमें शास्त्रज्ञान और कर्मफलत्याग नहीं है। ऐसा ध्यान उस ज्ञानकी अपेक्षा श्रेष्ठ है, जिस ज्ञानमें अभ्यास, ध्यान और कर्मफलत्याग नहीं है। कारण कि ध्यानसे मनका नियन्त्रण होता है, जब कि केवल शास्त्रज्ञानसे मनका नियन्त्रण नहीं होता। इसलिये मन-नियन्त्रणके कारण ध्यानसे जो शक्ति संचित होती है, वह शास्त्रज्ञानसे नहीं होती। यदि साधक उस शक्तिका सदुपयोग करके परमात्माकी तरफ बढ़ना चाहे, तो जितनी सुगमता उसको होगी, उतनी शास्त्रज्ञानवालेको नहीं। इसके साथ-साथ ध्यान करनेवाले साधकको (अगर वह शास्त्रका अध्ययन करे, तो) मनकी एकाग्रताके कारण वास्तविक ज्ञानकी प्राप्ति बहुत सुगमतासे हो सकती है, जबकि केवल शास्त्राध्यायी साधकको (चाहेनेपर भी) मनकी चंचलताके कारण ध्यान लगानेमें कठिनाता होती है। [आजकल भी देखा जाय तो शास्त्रका अध्ययन करनेवाले आदमी जितने मिलते हैं, उतने मनकी एकाग्रताके लिये उद्योग करनेवाले नहीं मिलते।]

‘ध्यानात्कर्मफलत्यागः’—ज्ञान और कर्मफलत्यागसे रहित ‘ध्यान’की अपेक्षा ज्ञान और ध्यानसे रहित ‘कर्मफलत्याग’ श्रेष्ठ है। यहाँ कर्मफलत्यागका अर्थ कर्मों तथा कर्मफलोंका स्वरूपसे त्याग नहीं है, प्रत्युत कर्मों और उनके फलोंमें ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग ही है। उत्पत्ति-विनाशशील सब-की-सब वस्तुएँ कर्मफल हैं। उनकी आसक्तिका त्याग करना ही सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंका त्याग करना है।

कर्मोंमें आसक्ति और फलेच्छा ही संसारमें बन्धनका कारण है। आसक्ति और फलेच्छा न रहनेसे कर्मफलत्यागी पुरुष सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य, पदार्थ आदि जो कुछ मनुष्यके पास है, वह सब-का-सब संसारसे ही मिला हुआ है, उसका व्यक्तिगत नहीं है। इसलिये कर्मफलत्यागी अर्थात् कर्मयोगी मिली हुई (शरीरादि) सब सामग्रीको अपनी और अपने लिये न मानकर उसको निष्कामभावपूर्वक संसारकी ही सेवामें लगा देता है। इस प्रकार मिली हुई सामग्री-(जडता-) का प्रवाह संसार-(जडता-) की ही तरफ हो जानेसे उसका जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और उसको परमात्मासे अपने

स्वाभाविक और नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगीके लिये अलगसे ध्यान लगानेकी जरूरत नहीं है। अगर वह ध्यान लगाना भी चाहे, तो कोई सांसारिक कामना न होनेके कारण वह सुगमतापूर्वक ध्यान लगा सकता है, जब कि सकामभावके कारण सामान्य साधकको ध्यान लगानेमें कठिनाई होती है।

गीताके छठे अध्यायमें (ध्यानयोगके प्रकरणमें) भगवान्ने बताया है कि ध्यानका अभ्यास करते-करते अन्तमें जब साधकका चित्त एकमात्र परमात्मामें अच्छी तरहसे स्थित हो जाता है, तब वह सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो जाता है और चित्तके उपराम होनेपर वह स्वयंसे परमात्मतत्वमें स्थित हो जाता है (छठे अध्यायके अठारहवेंसे बीसवें श्लोकतक)। परन्तु कर्मयोगी सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके तत्काल स्वयंसे परमात्मतत्वमें स्थित हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ श्लोक)। कारण यह है कि ध्यानमें परमात्मामें चित्त लगाया जाता है, इसलिये उसमें चित्त-(जडता-) का आश्रय रहनेके कारण चित्त-(जडता-) के साथ बहुत दूरतक सम्बन्ध बना रहता है। परन्तु कर्मयोगमें ममता और कामनाका त्याग किया जाता है, इसलिये उसमें ममता और कामना-(जडता-) का त्याग करनेके साथ ही चित्त-(जडता-) का भी स्वतः त्याग हो जाता है। इसलिये परिणाममें समानरूपसे परमात्मतत्वकी प्राप्ति होनेपर भी ध्यानका अभ्यास करनेवाले साधकको ध्येयमें चित्त लगानेमें कठिनाई होती है तथा उसे परमात्मतत्वका अनुभव भी देरीसे होता है, जब कि कर्मयोगीको परमात्मतत्वका अनुभव सुगमतापूर्वक तथा शीघ्रतासे होता है। इससे सिद्ध होता है कि ध्यानकी अपेक्षा कर्मयोगका साधन श्रेष्ठ है।

अपना कुछ नहीं, अपने लिये कुछ नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ नहीं करना है—यही कर्मयोगका मूल महामन्त्र है, जिसके कारण यह सब साधनोंसे विलक्षण हो जाता है—‘कर्मयोगो विशिष्यते’ (गीता ५।२)।

‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’—यहाँ ‘त्यागात्’ पद ‘कर्मफलत्याग’के लिये ही आया है। त्यागके स्वरूपको विशेषरूपसे समझनेकी आवश्यकता है। त्याग न तो उसका हो सकता है, जो अपना स्वरूप है और न उसीका हो सकता है, जिसके साथ अपना सम्बन्ध नहीं है। जैसे, अपना स्वरूप होनेके कारण प्रकाश और उष्णतासे सूर्यका वियोग नहीं हो सकता, और जिससे वियोग नहीं हो सकता, उसका त्याग

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

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करना असम्भव है। इसके विपरीत अपना स्वरूप न होनेके कारण अन्धकार और शीतलतासे सूर्यका वियोग भी कहना नहीं बनता; क्योंकि अपना स्वरूप न होनेके कारण उनका वियोग अथवा त्याग नित्य और स्वतःसिद्ध है। इसलिये वास्तवमें त्याग उसीका होता है जो अपना नहीं है, पर भूलसे अपना मान लिया गया है।

जीव स्वयं चेतन और अविनाशी है तथा संसार जड़ और विनाशी है। जीव भूलसे (अपने अंशी परमात्माको भूलकर) विजातीय संसारको अपना मान लेता है। इसलिये संसारसे माने हुए सम्बन्धका ही त्याग करनेकी आवश्यकता है।

त्याग असीम होता है। संसारके सम्बन्धमें तो सीमा होती है, पर संसारके त्याग-(सम्बन्ध-विच्छेद) में सीमा नहीं होती। तात्पर्य है कि जिन वस्तुओंसे हम अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं, उन वस्तुओंको तो सीमा होती है, पर उन वस्तुओंका त्याग असीम होता है। त्याग करते ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति भी असीम होती है। कारण कि परमात्मतत्त्व देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिकी सीमासे रहित (असीम) है। सीमित वस्तुओंके मोहके कारण ही उस असीम परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं होता।

‘कर्मफलत्याग’ में संसारसे माने हुए सम्बन्धका त्याग हो जाता है। इसलिये यहाँ ‘त्यागात्’ पद कर्म और उनके फलों (संसार)-के साथ भूलसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेके अर्थमें ही आया है। यही त्यागका वास्तविक स्वरूप है।

त्यागके अन्तर्गत जप, भजन, ध्यान, समाधि आदिके फलका त्याग भी समझना चाहिये। कारण कि जबतक जप, भजन, ध्यान, समाधि अपने लिये की जाती है, तबतक व्यक्तित्व बना रहनेसे बन्धन बना रहता है। अतः अपने लिये किया हुआ ध्यान, समाधि आदि भी बन्धन ही है। इसलिये किसी भी क्रियाके साथ अपने लिये कुछ भी चाह न रखना ही ‘त्याग’ है। वास्तविक त्यागमें त्याग-वृत्तिसे भी सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है।

यहाँ ‘शान्तिः’ पदका तात्पर्य परमशान्तिकी प्राप्ति है। इसीको भगवत्प्राप्ति कहते हैं।

अभ्यास, ज्ञान और ध्यान—तीनों साधनोंसे वस्तुतः कर्मफलत्यागरूप साधन श्रेष्ठ है। जबतक साधकमें

फलकी आसक्ति रहती है, तबतक वह (जड़ताका आश्रय रहनेसे) मुक्त नहीं हो सकता (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसलिये फलासक्तिके त्यागकी जरूरत अभ्यास, ज्ञान और ध्यान— तीनों ही साधनोंमें है। जड़ता अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका सम्बन्ध ही अशान्तिका खास कारण है। कर्मफलत्याग अर्थात् कर्मयोगमें आरम्भसे ही कर्मों और उनके फलोंमें आसक्तिका त्याग किया जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)। इसलिये जड़ताका सम्बन्ध न रहनेसे कर्मयोगीको शीघ्र परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)।

कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात

‘कर्मफलत्याग’ कर्मयोगका ही दूसरा नाम है। कारण कि कर्मयोगमें ‘कर्मफलत्याग’ ही मुख्य है। यह कर्मयोग भगवान् श्रीकृष्णके अवतारसे बहुत पहले ही लुप्तप्राय हो गया था (गीता—चौथे अध्यायका दूसरा श्लोक)। भगवान्ने अर्जुनको निमित्त बनाकर कृपापूर्वक इस कर्मयोगको पुनः प्रकट किया (गीता—चौथे अध्यायका तीसरा श्लोक)। भगवान्ने इसको प्रकट करके प्रत्येक परिस्थितिमें प्रत्येक मनुष्यको कल्याणका अधिकार प्रदान किया, अन्यथा अध्यात्ममार्गके विषयमें कभी यह सोचा ही नहीं जा सकता कि एकान्तके बिना, कर्मोंको छोड़े बिना, वस्तुओंका त्याग किये बिना, स्वजनोंके त्यागके बिना—प्रत्येक परिस्थितिमें मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है!

कर्मयोगमें फलासक्तिका त्याग ही मुख्य है। स्वस्थता-अस्वस्थता, धनवता-निर्धनता, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा आदि सभी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ कर्मोंके फलरूपमें आती हैं। इनके साथ राग-द्वेष रहनेसे कभी परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो सकती (गीता—दूसरे अध्यायके बयालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक)।

उत्पन्न होनेवाली मात्र वस्तुएँ कर्मफल हैं। जो फलरूपमें मिला है, वह सदा रहनेवाला नहीं होता; क्योंकि जब कर्म सदा नहीं रहता, तब उससे उत्पन्न होनेवाला फल सदा कैसे रहेगा? इसलिये उसमें आसक्ति, ममता करना भूल ही है। जो फल अभी नहीं मिला है, उसकी कामना करना भी भूल है। अतः फलासक्तिका त्याग कर्मयोगका बीज है।

कर्मयोगमें क्रियाओंकी प्रधानता प्रतीत होती है और

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

शरीरादि जड पदार्थोंके बिना क्रियाओंका होना सम्भव नहीं है, इसलिये कर्मों एवं फलोंसे छुटकारा पाना कठिन मालूम देता है। परन्तु वास्तवमें देखा जाय तो मिली हुई कर्म-सामग्री-(शरीरादि जड-पदार्थों-) को अपनी तथा अपने लिये माननेसे ही फलासक्तिका त्याग कठिन मालूम देता है। शरीरादि प्राप्त-सामग्रियों किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर कर्तव्य-कर्म करनेसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। वास्तवमें क्रियाएँ कभी बन्धनकारक नहीं होतीं। बन्धनका मूल हेतु कामना और फलासक्ति है। कामना और फलासक्तिके मिटनेपर सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायके उन्नीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक)।

भगवान्ने कर्मयोगको कर्मसंन्याससे भी श्रेष्ठ बताया है (गीता—पाँचवें अध्यायका दूसरा श्लोक)। भगवान्ने मतमें स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेवाला व्यक्ति संन्यासी नहीं है, प्रत्युत कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करनेवाला कर्मयोगी ही संन्यासी है (गीता—छठे अध्यायका पहला श्लोक)। आसक्तिरहित कर्मयोगी सभी संकल्पोंसे मुक्त होकर सुगमतापूर्वक योगारूढ़ हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका चौथा श्लोक)। इसके विपरीत जो कर्मों तथा उनके फलोंको अपना और अपने लिये मानकर सुख-भोगकी इच्छा रखते हैं, वे वास्तवमें पापका ही भोग करते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। अतः फलासक्ति ही संसारमें बन्धनका मुख्य कारण है—‘फले सत्तो निबध्यते ’ (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। इसका त्याग ही वास्तवमें त्याग है (गीता—अठारहवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)।

गीता फलासक्तिके त्यागपर जितना जोर देती है, उतना और किसी साधनपर नहीं। दूसरे साधनोंका वर्णन करते समय भी कर्मफलत्यागको उनके साथ रखा गया है। भगवान्के मतानुसार त्याग वही है, जिसमें निष्कामभावसे अपने कर्तव्यका पालन हो और फलोंमें किसी प्रकारकी आसक्ति न हो (गीता—अठारहवें अध्यायका छठा श्लोक)। उत्तम-से-उत्तम कर्मोंमें भी आसक्ति न हो और साधारण-से-साधारण कर्मोंमें भी द्वेष न हो; क्योंकि कर्म तो उत्पन्न होकर समाप्त हो जायेंगे, पर उनमें होनेवाली आसक्ति (रग) और द्वेष रह जायगा, जो बन्धनका हेतु है। इसके विपरीत अहंभाव तथा रग-द्वेषसे रहित मनुष्यके सामने समस्त प्राणियोंका संहाररूप कर्तव्य-कर्म भी आ जाय, तो

भी वह बंध नहीं सकता (गीता—अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। इसीलिये भगवान् ‘कर्मफल-त्याग’ को तप, ज्ञान, कर्म, अभ्यास, ध्यान आदि साधनोंसे श्रेष्ठ बताते हैं। दूसरे साधनोंमें क्रियाएँ तो उत्तम प्रतीत होती हैं, पर विशेष लाभ दिखायी नहीं देता तथा श्रम भी करना पड़ता है। परन्तु फलासक्तिका त्याग कर देनेपर न तो कोई नये कर्म करने पड़ते हैं, न आश्रम, देश आदिका परिवर्तन ही करना पड़ता है, प्रत्युत साधक जहाँ है, जो करता है, जैसी परिस्थितियों में, उसीमें (फलासक्तिके त्यागसे) बहुत सुगमतासे अपना कल्याण कर सकता है।

नित्यप्राप्त परमात्माकी अनुभूति होती है, प्राप्ति नहीं। जहाँ ‘परमात्माकी प्राप्ति’ कहा जाता है, वहाँ उसका अर्थ नित्यप्राप्तकी प्राप्ति या अनुभव ही मानना चाहिये। वह प्राप्ति साधनोंसे नहीं होती, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होती है। ममता, कामना और आसक्ति ही जड़ता है। शरीर, मन, इन्द्रियाँ, पदार्थ आदिको ‘मैं’ या ‘मेरा’ मानना ही जड़ता है। ज्ञान, अभ्यास, ध्यान, तप आदि साधन करते-करते जब जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होता है, तभी नित्यप्राप्त परमात्माकी अनुभूति होती है। इस जड़ताका त्याग जितना कर्मफलत्यागसे अर्थात् कर्मयोगसे सुगम होता है, उतना ज्ञान, अभ्यास, ध्यान, तप आदिसे नहीं। कारण कि ज्ञानादि साधनोंमें शरीरादिको अपना और साधनको अपने लिये मानते रहनेसे जड़ता-(शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ-) से विशेष सम्बन्ध बना रहता है। इन साधनोंका लक्ष्य परमात्मप्राप्ति होनेसे आखिरमें सफलता तो मिल जाती है; किन्तु उसमें देरी और कठिनाई होती है। परन्तु कर्मयोगमें आरम्भसे ही जड़ताके त्यागका लक्ष्य रहता है। जड़ताका सम्बन्ध ही नित्यप्राप्त परमात्माकी अनुभूतिमें प्रधान बाधा है—यह बात अन्य साधनोंमें स्पष्ट प्रतीत नहीं होती।

जब साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है कि मेरेको कभी किसी परिस्थितियों में, वाणी अथवा क्रियासे चोरी, झूठ, व्यभिचार, हिंसा, छल, कपट, अभक्ष्य-भक्षण आदि कोई शास्त्र-विरुद्ध कर्म नहीं करने हैं, तब उसके द्वारा स्वतः विहित कर्म होने लगते हैं।

साधकको निषिद्ध कर्मोंके त्यागका ही निश्चय करना चाहिये, न कि विहित कर्मोंको करनेका। कारण कि अगर साधक विहित कर्मोंको करनेका निश्चय करता है, तो उसमें विहित कर्म करनेका अभिमान आ जायगा, जिससे उसका ‘अहम्’ सुरक्षित रहेगा। विहित कर्म करनेका अभिमान

श्लोक १२ ]

  • साधक-संजीवनी *

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रहनेसे निषिद्ध कर्म होते हैं। परन्तु 'मैं निषिद्ध कर्म नहीं करूँगा' इस निषेधात्मक निश्चयमें किसी योग्यता, सामर्थ्यकी अपेक्षा न रहनेके कारण साधकमें अभिमान नहीं आता। निषिद्ध कर्मोंके त्यागमें भी मूर्खतासे अभिमान आ सकता है। अभिमान आनेपर विचार करे कि जो नहीं करना चाहिये, वह नहीं किया तो इसमें विशेषता किस बातकी? फलकी कामना भी तभी होती है, जब कुछ किया जाता है। जब कुछ किया ही नहीं, केवल निषिद्ध कर्मका त्याग ही किया है,* तब फलकी कामना क्यों होगी? अतः करनेका अभिमान न रहनेसे फलासक्तिका त्याग स्वतः हो जाता है। फलासक्तिका त्याग होनेपर शान्ति स्वतः सिद्ध है।

साधन-सम्बन्धी विशेष बात

भगवान्ने नवें, दसवें और ग्यारहवें श्लोकमें क्रमशः जो तीन साधन (अभ्यासयोग, भगवदर्थ-कर्म और कर्मफल-त्याग) बताये हैं, विचारपूर्वक देखा जाय तो उनमेंसे (कर्मफलत्यागको छोड़कर) प्रत्येक साधनमें शेष दोनों साधन भी आ जाते हैं; जैसे—(१) अभ्यासयोगमें भगवान्ने लिये भजन, नाम-जप आदि क्रियाएँ करनेसे वह भगवदर्थ है ही और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे उसमें कर्मफलत्याग भी है, (२) भगवदर्थ-कर्ममें भगवान्ने लिये कर्म होनेसे अभ्यासयोग भी है और नाशवान् फलकी कामना न होनेसे कर्मफलत्याग भी है।

वास्तवमें साधकको सबसे पहले अपने लक्ष्य, ध्येय अथवा उद्देश्यको दृढ़ करना चाहिये। इसके बाद उसे यह पहचानना चाहिये कि उसका सम्बन्ध वास्तवमें किसके साथ है। फिर चाहे कोई भी साधन करे—अभ्यास करे, भगवत्प्रतीत्यर्थ कर्म करे अथवा कर्मफलत्याग करे, वही साधन उसके लिये श्रेष्ठ हो जायगा। जब साधकका यह लक्ष्य हो जायगा कि उसे भगवान्को ही प्राप्त करना है और वह यह भी पहचान लेगा कि अनादिकालसे उसका भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है, तब कोई भी साधन उसके लिये छोटा नहीं रह जायगा। किसी साधनका छोटा या बड़ा होना लौकिक दृष्टिसे ही है। वास्तवमें मुख्यता उद्देश्यकी ही है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपने उद्देश्यमें कभी किञ्चिन्मात्र भी शिथिलता न आने दे।

किसी साधनको सुगमता या कठिनता साधकको

'रुचि' और 'उद्देश्य' पर निर्भर करती है। रुचि और उद्देश्य एक भगवान्का होनेसे साधन सुगम होता है तथा रुचि संसारकी और उद्देश्य भगवान्का होनेसे साधन कठिन हो जाता है।

जैसे, भूख सबकी एक ही होती है और भोजन करनेपर तृप्तिका अनुभव भी सबको एक ही होता है, पर भोजनकी रुचि सबकी भिन्न-भिन्न होनेके कारण भोज्य-पदार्थ भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इसी तरह साधकोंकी रुचि, विश्वास और योग्यताके अनुसार साधन भी भिन्न-भिन्न होते हैं, पर भगवान्की अप्राप्तिका दुःख तथा भगवत्प्राप्तिकी अभिलाषा (भूख) सभी साधकोंमें एक ही होती है। साधक चाहे किसी भी श्रेणीका क्यों न हो, साधनकी पूर्णताके बाद भगवत्प्राप्तिरूप आनन्दकी अनुभूति (तृप्ति) भी सबको एक-जैसी ही होती है।

इस प्रकरणमें अर्जुनको निमित्त बनाकर भगवान्ने मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये चार साधन बताये हैं—(१) समर्पणयोग, (२) अभ्यासयोग, (३) भगवान्के लिये ही सम्पूर्ण कर्मोंका अनुष्ठान और (४) सर्वकर्मफल-त्याग। यद्यपि चारों साधनोंका फल भगवत्प्राप्ति ही है, तथापि साधकोंमें रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण ही भिन्न-भिन्न साधनोंका वर्णन हुआ है। वास्तवमें चारों ही साधन समानरूपसे स्वतन्त्र और श्रेष्ठ हैं। इसलिये साधक जो भी साधन अपनाये, उसे उस साधनको सर्वोपरि मानना चाहिये।

अपने साधनको किसी भी तरह हीन (निम्नश्रेणीका) नहीं मानना चाहिये और साधनकी सफलता-(भगवत्प्राप्ति- ) के विषयमें कभी निराश भी नहीं होना चाहिये; क्योंकि कोई भी साधन निम्नश्रेणीका नहीं होता। अगर साधकका एकमात्र उद्देश्य भगवत्प्राप्ति हो, साधन उसकी रुचि, विश्वास तथा योग्यताके अनुसार हो, साधन पूरी सामर्थ्य और तत्परता-(लगन- ) से किया जाय और भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा भी तीव्र हो तो सभी साधन एक समान हैं। साधकको उद्देश्य, सामर्थ्य और तत्परताके विषयमें कभी हतोत्साह नहीं होना चाहिये। भगवान् साधकसे इतनी ही अपेक्षा रखते हैं कि वह अपनी पूरी सामर्थ्य और योग्यताको साधनमें लगा दे।

  • निषिद्ध कर्म न करनेका निश्चय होनेपर दो अवस्थाएँ होती हैं—या तो विहित कर्मोंमें प्रवृत्ति होगी या सर्वथा निवृत्ति। विहित कर्मोंमें प्रवृत्तिसे अन्तःकरण निर्मल होता है और सर्वथा निवृत्ति होनेसे परमात्मामें स्थिति होती है। सर्वथा निवृत्तिका तात्पर्य वासनारहित अवस्थामें है, न कि अकर्मण्यता या आलस्यसे; क्योंकि आलस्य आदि भी निषिद्ध कर्म हैं।

८३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

साधक चाहे भगवत्त्वको ठीक-ठीक न जाने, पर सर्वज्ञ भगवान् तो उसके उद्देश्य, भाव, सामर्थ्य, तत्परता आदिको अच्छी तरह जानते ही हैं। यदि साधक अपने उद्देश्य, भाव, चेष्टा, तत्परता, उत्कण्ठा आदिमें किसी प्रकारकी कमी न आने दे तो भगवान् स्वयं उसे अपनी प्राप्ति करा देते हैं। वास्तवमें अपने उद्योग, बल, ज्ञान आदिकी कीमतसे भगवान्की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। अगर भगवान्के दिये हुए बल, ज्ञान आदिको भगवान्की प्राप्तिके लिये ही लगा दिया जाय तो वे साधकको कृपापूर्वक अपनी प्राप्ति करा देते हैं।

संसारमें भगवत्प्राप्ति ही सबसे सुगम है और इसके सभी अधिकारी हैं; क्योंकि इसीके लिये मनुष्यशरीर मिला है। सब प्राणियोंके कर्म भिन्न-भिन्न होनेके कारण किन्हीं दो व्यक्तियोंको भी संसारके पदार्थ एक समान नहीं मिल सकते, जब कि (भगवान् एक होनेसे) भगवत्प्राप्ति सबको एक समान ही होती है; क्योंकि भगवत्प्राप्ति कर्मजन्य

नहीं है।

भगवान्की प्राप्तिमें संसारसे वैराग्य और भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा—ये दो बातें ही मुख्य हैं। इन दोनोंमेंसे किसी भी एक साधनके तीव्र होनेपर भगवत्प्राप्ति हो जाती है। फिर भी भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठामें विशेष शक्ति है।

ऊपर जो चार साधन बताये गये हैं, उनमेंसे प्रथम तीन साधन तो मुख्यतः भगवत्प्राप्तिकी उत्कण्ठा जाग्रत् करनेवाले हैं, और चौथा साधन (कर्मफलत्याग) मुख्यतः संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेवाला है।

साधन कोई भी हो; जब सांसारिक भोग दुःखदायी प्रतीत होने लगेंगे तथा भोगोंका हृदयसे त्याग होगा, तब (लक्ष्य भगवान् होनेसे) भगवान्की ओर स्वतः प्रगति होगी और भगवान्की कृपासे ही उनकी प्राप्ति हो जायगी।

इसी तरह जब भगवान् परमप्रिय लगने लगेंगे, उनके बिना रहा नहीं जायगा, उनके वियोगमें व्याकुलता होने लगेगी, तब शीघ्र ही भगवान्की प्राप्ति हो जायगी।

परिशिष्ट भाव —अभ्यास, शास्त्रज्ञान और ध्यान—ये तीनों तो करणसापेक्ष हैं, पर कर्मफलत्याग करणनिरपेक्ष है। कर्मफलत्यागको श्रेष्ठ बतानेका कारण यह है कि लोगोंकी इस साधनमें निकृष्टबुद्धि है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि कर्मफलत्याग पहलेके तीनों साधनोंसे श्रेष्ठ है। वास्तवमें ये चारों ही साधन श्रेष्ठ हैं और उन साधकोंके लिये हैं, जिनका उद्देश्य त्यागका है।

इस श्लोकमें आये चार साधनोंके अन्तर्गत दसवें श्लोकमें आये 'मर्दर्थमपि कर्माणि' (भगवान्के लिये कर्म करना) को नहीं लिया गया है। इसका कारण यह है कि 'मर्दर्थमपि कर्माणि' अर्थात् भक्तिमें ही साधनकी पूर्णता हो जाती है। अतः भक्ति और त्याग—दोनों ही साधन श्रेष्ठ हैं।

कर्मफलत्यागसे कर्मफलकी इच्छाका त्याग समझना चाहिये। इच्छा भीतर होती है और फलत्याग बाहर होता है। फलत्याग करनेपर भी भीतरमें उसकी इच्छा रह सकती है। अतः साधकका उद्देश्य कर्मफलकी इच्छाके त्यागका रहना चाहिये। इच्छाका त्याग होनेपर जन्म-मरणका कारण ही नहीं रहता। मुक्ति वस्तुके त्यागसे नहीं होती, प्रत्युत इच्छाके त्यागसे होती है।

सम्बन्ध—भगवान्ने निर्गुण-निराकार ब्रह्म और सगुण-साकार भगवान्की उपासना करनेवाले उपासकोंमें सगुण-उपासकोंको श्रेष्ठ बताकर अर्जुनको सगुण-उपासना करनेकी आज्ञा दी। सगुण-उपासनाके अन्तर्गत भगवान्ने आठवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक अपनी प्राप्तिके चार साधन बताये। अब तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक भगवान् पाँच प्रकरणोंमें चारों साधनोंसे सिद्धावस्थाको प्राप्त हुए अपने प्रिय भक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते हैं। पहला प्रकरण तेरहवें और चौदहवें दो श्लोकोंका है, जिसमें सिद्ध भक्तके बारह लक्षण बताये गये हैं।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मध्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥

श्लोक १३-१४ ]

  • साधक-संजीवनी *

८३७

सर्वभूतानाम् = सब प्राणियोंमें अद्रेष्टा = द्वेषभावसे रहित च = और मैत्रः = मित्रभाववाला (तथा) करुणः = दयालु एव = भी (और) निर्ममः = ममत्तरहित, निरहङ्कारः = अहंकाररहित,

समदुःखसुखः = सुख-दुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमी = क्षमाशील, सततम् = निरन्तर सन्तुष्टः = सन्तुष्ट, योगी = योगी, यतात्मा = शरीरको वशमें किये हुए, दूढनिश्चयः = दूढ निश्चयवाला,

मयि = मुझमें अर्पित- मनोबुद्धिः = अर्पित मन-बुद्धिवाला यः = जो मद्वक्तः = मेरा भक्त है, सः = वह मे = मुझे प्रियः = प्रिय है।

व्याख्या —‘अद्रेष्टा सर्वभूतानाम्’—अनिष्ट करने-वालोंके दो भेद हैं—(१) इष्टकी प्राप्तिमें अर्थात् धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदिकी प्राप्तिमें बाधा पैदा करनेवाले और (२) अनिष्ट पदार्थ, क्रिया, व्यक्ति, घटना आदिसे संयोग करनेवाले। भक्तके शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सिद्धान्तके प्रतिकूल चाहे कोई कितना ही, किसी प्रकारका व्यवहार करे—इष्टकी प्राप्तिमें बाधा डाले, किसी प्रकारकी आर्थिक और शारीरिक हानि पहुँचाये, पर भक्तके हृदयमें उसके प्रति कभी किंचिन्मात्र भी द्वेष नहीं होता। कारण कि वह प्राणिमात्रमें अपने प्रभुको ही व्याप्त देखता है, ऐसी स्थितिमें वह विरोध करे तो किससे करे— निज प्रभुमय देखहि जगत केहि सन करहि विरोध ॥ (मानस ७।११२ ख)

इतना ही नहीं; वह तो अनिष्ट करनेवालोंकी सब क्रियाओंको भी भगवान्का कृपापूर्ण मंगलमय विधान ही मानता है!

प्राणिमात्र स्वरूपसे भगवान्का ही अंश है। अतः किसी भी प्राणीके प्रति थोड़ा भी द्वेषभाव रहना भगवान्के प्रति ही द्वेष है। इसलिये किसी प्राणीके प्रति द्वेष रहते हुए भगवान्से अभिन्नता तथा अनन्यप्रेम नहीं हो सकता। प्राणिमात्रके प्रति द्वेषभावसे रहित होनेपर ही भगवान्में पूर्ण प्रेम हो सकता है। इसलिये भक्तमें प्राणिमात्रके प्रति द्वेषका सर्वथा अभाव होता है।

‘मैत्रः करुण एव च’* —भक्तके अन्तःकरणमें प्राणिमात्रके प्रति केवल द्वेषका अत्यन्त अभाव ही नहीं होता, प्रत्युत सम्पूर्ण प्राणियोंमें भगवद्भाव होनेके नाते उसका सबसे मैत्री और दयाका व्यवहार भी होता है।

भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। भगवान्का स्वभाव भक्तमें अवतरित होनेके कारण भक्त भी सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् होता है— ‘सुहृदः सर्वदेहिनाम्’ (श्रीमद्भागवत ३।२५।२१)। इसलिये भक्तका भी सभी प्राणियोंके प्रति बिना किसी स्वार्थके स्वाभाविक ही मैत्री और दयाका भाव रहता है—

हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक अमुरारी।

(मानस ७।४७।३)

अपना अनिष्ट करनेवालोंके प्रति भी भक्तके द्वारा मित्रताका व्यवहार होता है; क्योंकि उसका भाव यह रहता है कि अनिष्ट करनेवालेने अनिष्टरूपमें भगवान्का विधान ही प्रस्तुत किया है। अतः उसने जो कुछ किया है, मेरे लिये ठीक ही किया है। कारण कि भगवान्का विधान सदैव मंगलमय होता है। इतना ही नहीं, भक्त यह मानता है कि मेरा अनिष्ट करनेवाला (अनिष्टमें निमित्त बनकर) मेरे पूर्वकृत पापकर्मोंका नाश कर रहा है; अतः वह विशेषरूपसे आदरका पात्र है।

साधकमात्रके मनमें यह भाव रहता है और रहना ही चाहिये कि उसका अनिष्ट करनेवाला उसके पिछले पापोंका फल भुगताकर उसे शुद्ध कर रहा है। जब सामान्य साधकमें भी अनिष्ट करनेवालेके प्रति मैत्री और करुणाका भाव रहता है, फिर सिद्ध भक्तका तो कहना ही क्या है? सिद्ध भक्तका तो उसके प्रति ही क्या, प्राणिमात्रके प्रति मैत्री और दयाका विलक्षण भाव रहता है।

पातंजलयोगदर्शनमें चित्त-शुद्धिके चार हेतु बताये गये हैं—

  • यहाँ भक्तके जो लक्षण बताये गये हैं, वे ज्ञानी (गुणातीत) पुरुषोंके (गीता—चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक वर्णित) लक्षणोंकी अपेक्षा भी अधिक एवं विलक्षण हैं। ‘मैत्रः’ और ‘करुणः’ पद भी यहाँ—भक्तके लक्षणोंमें ही आये हैं।

८३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

‘मैत्रीकरणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य-विषयाणां भावनातिश्चितप्रसादनम्।’ (१।३३)

‘सुखियोंके प्रति मैत्री, दुःखियोंके प्रति करुणा, पुण्यात्माओंके प्रति मुदिता (प्रसन्नता) और पापात्माओंके प्रति उपेक्षाके भावसे चित्तमें निर्मलता आती है।’

परन्तु भगवान्ने इन चारों हेतुओंको दोमें विभक्त कर दिया है—‘मैत्रः च करुणः।’ तात्पर्य यह है कि सिद्ध भक्तका सुखियों और पुण्यात्माओंके प्रति ‘मैत्री’ का भाव तथा दुःखियों और पापात्माओंके प्रति ‘करुणा’ का भाव रहता है।

दुःख पानेवालेकी अपेक्षा दुःख देनेवालेपर (उपेक्षाका भाव न होकर) दया होनी चाहिये; क्योंकि दुःख पानेवाला तो (पुराने पापोंका फल भोगकर) पापोंसे छूट रहा है, पर दुःख देनेवाला नया पाप कर रहा है। अतः दुःख देनेवाला दयाका विशेष पात्र है।

‘निर्ममः’—यद्यपि भक्तका प्राणिमात्रके प्रति स्वाभाविक ही मैत्री और करुणाका भाव रहता है, तथापि उसकी किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी ममता नहीं होती। प्राणियों और पदार्थोंमें ममता (मेरेपनका भाव) ही मनुष्यको संसारमें बाँधनेवाली होती है। भक्त इस ममतासे सर्वथा रहित होता है। उसकी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिमें भी बिलकुल ममता नहीं होती। साधकसे भूल यह होती है कि वह प्राणियों और पदार्थोंसे तो ममताको हटानेकी चेष्टा करता है, पर अपने शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंसे ममता हटानेकी ओर विशेष ध्यान नहीं देता। इसीलिये वह सर्वथा निर्मम नहीं हो पाता।

‘निरहंकारः’—शरीर, इन्द्रियाँ आदि जड-पदार्थोंको अपना स्वरूप माननेसे अहंकार उत्पन्न होता है।

भक्तकी अपने शरीरादिके प्रति किंचिन्मात्र भी अहंबुद्धि न होनेके कारण तथा केवल भगवान्ने अपने नित्य सम्बन्धका अनुभव हो जानेके कारण उसके अन्तःकरणमें स्वतः श्रेष्ठ, दिव्य, अलौकिक गुण प्रकट होने लगते हैं। इन गुणोंको भी वह अपने गुण नहीं मानता, प्रत्युत (दैवी सम्पत्ति होनेसे) भगवान्के ही मानता है। ‘सत्’-(परमात्मा-)के होनेके कारण ही ये गुण ‘सद्गुण’

कहलाते हैं। ऐसी दशामें भक्त उनको अपना मान ही कैसे सकता है! इसलिये वह अहंकारसे सर्वथा रहित होता है।

‘समदुःखसुखः’—भक्त सुख-दुःखोंकी प्राप्तिमें सम रहता है अर्थात् अनुकूलता-प्रतिकूलता उसके हृदयमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार पैदा नहीं कर सकते।

गीतामें ‘सुख-दुःख’ पद अनुकूलता-प्रतिकूलताकी परिस्थिति-(जो सुख-दुःख उत्पन्न करनेमें हेतु है) के लिये तथा अन्तःकरणमें होनेवाले हर्ष-शोकादि विकारोंके लिये भी आया है।

अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति मनुष्यको सुखी-दुःखी बनाकर ही उसे बाँधती है। इसलिये सुख-दुःखमें सम होनेका अर्थ है—अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर अपनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंका न होना।

भक्तके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, सिद्धान्त आदिके अनुकूल या प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिका संयोग या वियोग होनेपर उसे अनुकूलता और प्रतिकूलताका ‘ज्ञान’ तो होता है, पर उसके अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि कोई ‘विकार’ उत्पन्न नहीं होता। यहाँ यह बात समझ लेनी चाहिये कि किसी परिस्थितिका ज्ञान होना अपने-आपमें कोई दोष नहीं है, प्रत्युत उससे अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न होना ही दोष है। भक्त राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंसे सर्वथा रहित होता है। जैसे, प्रारब्धानुसार भक्तके शरीरमें कोई रोग होनेपर उसे शारीरिक पीड़ाका ज्ञान (अनुभव) तो होगा; किन्तु उसके अन्तःकरणमें किसी प्रकारका विकार नहीं होगा।

‘क्षमी’—अपना किसी तरहका भी अपराध करनेवालेको किसी भी प्रकारका दण्ड देनेकी इच्छा न रखकर उसे क्षमा कर देनेवालेको ‘क्षमी’ कहते हैं।

भक्तके लक्षणोंमें पहले ‘अद्वेष्टा’ पद देकर भगवान्ने भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति द्वेषका अभाव बताया, अब यहाँ ‘क्षमी’ पदसे यह बताते हैं कि भक्तमें अपना अपराध करनेवालेके प्रति ऐसा भाव रहता है कि उसको भगवान् अथवा अन्य किसीके द्वारा भी दण्ड न मिले। ऐसा क्षमाभाव भक्तकी एक विशेषता है।

‘सन्तुष्टः सततम्’*—जीवको मनके अनुकूल प्राणी,

  • ऐसे संतोषीके लिये भागवतकार कहते हैं—

सदा संतुष्टमनसः सर्वाः सुखमया दिशः। शर्कराकण्टकादिभ्यो यथोपान्तपदः शिवम्॥

(श्रीमद्भगवत ७।१५।१७)

‘जैसे पैरोंमें जूते पहनकर चलनेवालेको कंकड़ और काँटोंसे कोई भय नहीं होता, ऐसे ही जिसके मनमें संतोष है, उसके लिये सर्वदा सब जगह सुख-ही-सुख है, दुःख है ही नहीं।’

श्लोक १३-१४ ]

  • साधक-संजीवनी *

८३९

पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके संयोगमें और मनके प्रतिकूल प्राणी, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदिके वियोगमें एक संतोष होता है। विजातीय और अनित्य पदार्थसे होनेके कारण यह संतोष स्थायी नहीं रह पाता। स्वयं नित्य होनेके कारण जीवको नित्य परमात्माकी अनुभूतिसे ही वास्तविक और स्थायी संतोष होता है।

भगवान्को प्राप्त होनेपर भक्त नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहता है; क्योंकि न तो उसका भगवान्से कभी वियोग होता है और न उसको नाशवान् संसारकी कोई आवश्यकता ही रहती है। अतः उसके असंतोषका कोई कारण ही नहीं रहता। इस संतुष्टिके कारण वह संसारके किसी भी प्राणी-पदार्थके प्रति किंचिन्मात्र भी महत्त्वबुद्धि नहीं रखता*।

‘सन्तुष्टः’ के साथ ‘सततम्’ पद देकर भगवान्ने भक्तके उस नित्य-निरन्तर रहनेवाले संतोषकी ओर ही लक्ष्य कराया है, जिसमें न तो कभी कोई अन्तर पड़ता है और न कभी अन्तर पड़नेकी सम्भावना ही रहती है। कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग—किसी भी योगमार्गसे सिद्धि प्राप्त करनेवाले महापुरुषमें ऐसी संतुष्टि (जो वास्तवमें है) निरन्तर रहती है।

‘योगी’—भक्तियोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त (नित्य-निरन्तर परमात्मासे संयुक्त) पुरुषका नाम यहाँ ‘योगी’ है।

वास्तवमें किसी भी मनुष्यका परमात्मासे कभी वियोग हुआ नहीं, है नहीं, हो सकता नहीं और सम्भव ही नहीं। इस वास्तविकताका जिसने अनुभव कर लिया है, वही ‘योगी’ है।

‘यतात्मा’—जिसका मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित शरीरपर पूर्ण अधिकार है, वह ‘यतात्मा’ है। सिद्ध भक्तको मन-बुद्धि आदि वशमें करने नहीं पड़ते, प्रत्युत ये स्वाभाविक ही उसके वशमें रहते हैं। इसलिये उसमें किसी प्रकारके इन्द्रियजन्य दुर्गुण-दुराचारके आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।

वास्तवमें मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ स्वाभाविकरूपसे सन्मार्गपर चलनेके लिये ही हैं; किन्तु संसारसे रागयुक्त सम्बन्ध रहनेसे ये मार्गच्युत हो जाती हैं। भक्तका संसारसे किंचिन्मात्र भी रागयुक्त सम्बन्ध नहीं होता, इसलिये उसकी मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ सर्वथा उसके वशमें होती हैं। अतः उसकी प्रत्येक क्रिया दूसरोंके लिये आदर्श होती है।

  • सत कबीरदासजी कहते हैं—

गोधन गजधन बाजिधन, और रतन धन खान। जब आवै संतोष धन, सब धन धुरि समान॥

ऐसा देखा जाता है कि न्याय-पथपर चलनेवाले सत्पुरुषोंकी इन्द्रियाँ भी कभी कुमार्गगामी नहीं होतीं। जैसे, राजा दुष्यन्तकी वृत्ति शकुन्तलाकी ओर जानेपर उन्हें दृढ़ विश्वास हो जाता है कि यह क्षत्रिय-कन्या ही है, ब्राह्मण कन्या नहीं। कवि कालिदासके कथनानुसार जहाँ सन्देह हो, वहाँ सत्पुरुषके अन्तःकरणकी प्रवृत्ति ही प्रमाण होती है— सतां हि संदेहपदेशु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ॥

(अभिज्ञानशाकुन्तलम् १।२१)

जब न्यायशील सत्पुरुषकी इन्द्रियोंकी प्रवृत्ति भी स्वतः कुमार्गकी ओर नहीं होती, तब सिद्ध भक्त (जो न्यायधर्मसे कभी किसी अवस्थामें च्युत नहीं होता—) की मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ कुमार्गकी ओर जा ही कैसे सकती हैं!

‘दृढनिश्चयः’—सिद्ध महापुरुषकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका सर्वथा अभाव रहता है। उसकी बुद्धिमें एक परमात्माकी ही अटल सत्ता रहती है। अतः उसकी बुद्धिमें विपर्यय-दोष (प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारका स्थायी दीखना) नहीं रहता। उसको एक भगवान्के साथ ही अपने नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव होता रहता है। अतः उसका भगवान्में ही दृढ़ निश्चय होता है। उसका यह निश्चय बुद्धिमें नहीं, प्रत्युत ‘स्वयं’ में होता है, जिसका आभास बुद्धिमें प्रतीत होता है।

संसारकी स्वतन्त्र सत्ता माननेसे अथवा संसारसे अपना सम्बन्ध माननेसे ही बुद्धिमें विपर्यय और संशयरूप दोष उत्पन्न होते हैं। विपर्यय और संशययुक्त बुद्धि कभी स्थिर नहीं होती। ज्ञानी और अज्ञानी पुरुषकी बुद्धिके निश्चयमें ही अन्तर होता है; स्वरूपसे तो दोनों समान ही होते हैं। अज्ञानीकी बुद्धिमें संसारकी सत्ता और उसका महत्त्व रहता है; परन्तु सिद्ध भक्तकी बुद्धिमें एक भगवान्के सिवाय न तो संसारकी किसी वस्तुकी स्वतन्त्र सत्ता रहती है और न उसका कोई महत्त्व ही रहता है। अतः उसकी बुद्धि विपर्यय और संशयदोषसे सर्वथा रहित होती है और उसका केवल परमात्मामें ही दृढ़ निश्चय होता है।

‘मध्यर्पितमनोबुद्धिः’—जब साधक एकमात्र भगवत्प्राप्तिको ही अपना उद्देश्य बना लेता है और स्वयं भगवान्का ही हो जाता है (जो कि वास्तवमें है) तब उसके मन-बुद्धि भी अपने-आप भगवान्में लग जाते हैं। फिर

८४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

सिद्ध भक्तके मन-बुद्धि भगवान्के अपित रहें—इसमें तो कहना ही क्या है!

जहाँ प्रेम होता है, वहाँ स्वाभाविक ही मनुष्यका मन लगता है और जिसे मनुष्य सिद्धान्तसे श्रेष्ठ समझता है, उसमें स्वाभाविक ही उसकी बुद्धि लगती है। भक्तके लिये भगवान्से बढ़कर कोई प्रिय और श्रेष्ठ होता ही नहीं। भक्त तो मन-बुद्धिपर अपना अधिकार ही नहीं मानता। वह तो

परिशिष्ट भाव —गीतामें कर्मयोगीके लक्षण भी आये हैं (दूसरे अध्यायके पचपनवेंसे बहत्तरवें श्लोकतक और छठे अध्यायके सातवेंसे नवें श्लोकतक), ज्ञानयोगीके लक्षण भी आये हैं (चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक) और भक्तके लक्षण भी आये हैं (बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)। परन्तु केवल भक्तके लक्षणोंमें ही भगवान्ने कहा है—‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ’। यह लक्षण (मित्रता और करुणा) न कर्मयोगीके लक्षणोंमें आया है, न ज्ञानयोगीके लक्षणोंमें, प्रत्युत केवल भक्तके लक्षणोंमें आया है। कर्मयोगी और ज्ञानयोगीमें समता तो होती है, पर मित्रता और करुणा नहीं होती। परन्तु भक्तमें आरम्भसे ही मित्रता और करुणा होती है।

भक्तकी दृष्टिमें सम्पूर्ण प्राणी समग्र भगवान्का अंग होनेसे अपने प्रभु ही हैं, फिर कौन वैर करे, किससे करे और क्यों करे?—‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ’ (मानस, उत्तर० ११२ ख)। उदाहरणके लिये, किसीको राम प्रिय हैं, किसीको कृष्ण प्रिय हैं, किसीको शंकर प्रिय हैं तो इष्ट अलग-अलग होनेपर भी वे सब भक्त परस्पर एक हो सकते हैं, पर सब ज्ञानयोगी परस्पर एक नहीं हो सकते। अगर भक्त और ज्ञानयोगी परस्पर मिलें तो भक्त ज्ञानयोगीका जितना आदर करेगा, उतना ज्ञानयोगी भक्तका नहीं कर सकेगा। इसलिये भक्तोंका लक्षण बताया है—‘सबहि मानप्रद आपु अमानी ’ (मानस, उत्तर० ३८।२)।

श्रीरामचरितमानसके आरम्भमें गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज सज्जनोंके साथ-साथ दुष्टोंकी भी वन्दना करते हैं और सच्चे भावसे करते हैं—‘बहुति बंदि खल गन सतिभार् ’ (मानस, बाल० ४।१)। ऐसा भक्त ही कर सकता है, ज्ञानयोगी नहीं! यद्यपि ज्ञानयोगीका किसीसे कभी किंचिन्मात्र भी वैर नहीं होता, तथापि उसमें स्वाभाविक उदासीनता, तटस्थता रहती है। विवेकमार्ग-(ज्ञान-में) वैराग्यकी मुख्यता रहती है और वैराग्य रूखा होता है। इसलिये ज्ञानयोगीमें भीतरसे कठोरता न होनेपर भी वैराग्य, उदासीनताके कारण बाहरसे कठोरता प्रतीत होती है।

सुख लेनेमें कठोरता रहती है और सुख देनेमें कोमलता रहती है। ज्ञानयोगी मोक्षका भी सुख लेता है, तो उसमें कठोरता रहती है। परन्तु दूसरेको सुख देनेका भाव होनेसे भक्तमें आरम्भसे ही कोमलता रहती है। भक्तके मनमें वैरीसे भी द्वेष नहीं होता। ज्ञानयोगी पिताकी तरह होता है और भक्त माँकी तरह, इसलिये भक्तमें करुणा ज्यादा होती है।

एव ’ पद देनेका तात्पर्य है कि भक्त द्वेषभावसे रहित होता है—इतनी ही बात नहीं है, वह मित्रभाववाला और दयालु भी होता है।

निर्ममो निरहंकारः ’—प्रत्येक साधकके लिये निर्मम और निरहंकार होना बहुत आवश्यक है, इसलिये गीतामें भगवान्ने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही योगमार्गोंमें निर्मम और निरहंकार होनेकी बात कही है—कर्मयोगमें ‘निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ’ (२।७१), ज्ञानयोगमें ‘अहंकारं ..... विमुच्य निर्ममः

  • भगवान् श्रीराम कहते हैं—

अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरी दाय॥

तिन्ह महीं जो परिहरी मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया॥

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।

सर्व भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥

(मानस, उत्तर० ८७।४, ८७ क)

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

८४९

शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते' (१८।५३) और भक्तियोगमें 'निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी' (१२।१३)। इस विषयमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि वास्तवमें हमारा स्वरूप अहंता-ममतासे रहित है। अहंता (मैंपन) और ममता (मेरापन)—दोनों अपने स्वरूपमें मानी हुई हैं, वास्तविक नहीं हैं। अगर ये वास्तविक होतीं तो हम कभी निर्मम और निरहंकार नहीं हो सकते और भगवान् भी सबके लिये निर्मम और निरहंकार होनेकी बात नहीं कहते। परन्तु हम निर्मम और निरहंकार हो सकते हैं, तभी भगवान् ऐसा कहते हैं।

कर्मयोगमें पहले 'कामना'का त्याग होता है, फिर कर्मयोगी स्वतः निर्मम-निरहंकार हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका इकहत्तरवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगमें पहले 'अहंकार'का त्याग होता है, फिर ज्ञानयोगी स्वतः निर्मम हो जाता है (गीता—अठारहवाँ अध्यायका तिरपनवाँ श्लोक)। भक्तियोगमें भक्त अपने-आपको भगवान्के अर्पित कर देता है तो भगवत्कृपासे वह स्वतः निर्मम-निरहंकार हो जाता है।

'मव्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः'—यहाँ 'मव्यर्पितमनोबुद्धिः' पद उस मनुष्यका वाचक है, जिसने स्वयंको (अपने-आपको) भगवान्के अर्पित कर दिया है। स्वयं अर्पित होनेसे मन-बुद्धि भी स्वतः भगवान्के अर्पित हो जाते हैं। स्वयं अर्पित होनेसे फिर कुछ बाकी रहता ही नहीं। कारण कि स्वयं पहले है, शरीर-मन-बुद्धि आदि पीछे हैं। भक्त पहले है, मनुष्य पीछे है। भगवान्में अर्पित होनेसे मन-बुद्धिकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत केवल भगवान् ही रहते हैं।

भगवान्का परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंके साथ समान सम्बन्ध है, पर जीव-(परा-) का सम्बन्ध अपराके साथ नहीं है। कारण कि जीव अपरा प्रकृतिसे उत्कृष्ट है और भगवान्का अंश है। इसलिये जीवका सम्बन्ध भगवान्के साथ है। 'मव्यर्पितमनोबुद्धिः' का तात्पर्य है कि जीव अपरा प्रकृति-(मन-बुद्धि-) को अपना न माने, प्रत्युत भगवान्को ही अपना माने*।

भगवान् ज्ञानस्वरूप और नित्य परिपूर्ण हैं। अतः उनमें ज्ञानकी भूख (जिज्ञासा) तो नहीं है, पर प्रेमकी भूख (प्रेम-पिपासा) अवश्य है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है। ऐसे भक्तके सिवाय भगवान्को प्यारा और कोई हो ही नहीं सकता।

जैसे किसी राजाका बेटा दूसरोंसे भीख माँगने लगे तो वह राजाको नहीं सुहाता, ऐसे ही सत्-चित्-आनन्दरूप भगवान्का अंश जीव जब असत्-जड़-दुःखरूप संसारसे कुछ आशा रखता है, तब वह भगवान्को नहीं सुहाता, प्यारा नहीं लगता; क्योंकि इसमें जीवका महान् अहित है। भगवान्को वही प्यारा लगता है, जो अन्यसे आशा नहीं रखता तथा जिसमें जीवका परम हित होता है—

एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाके गति न आन की ॥ (मानस, अरण्य० १०।४)

सम्बन्ध—सिद्ध भक्तके लक्षणोंका दूसरा प्रकरण, जिसमें छः लक्षणोंका वर्णन है, आगेके श्लोकमें आया है।

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥

यस्मात्= जिससेलोकात्= किसी प्राणीसेभय और उद्वेग-
लोकः= कोई भी प्राणीन, उद्विजते= उद्विग्न नहीं होता(हलचल-) से
न, उद्विजते= उद्विग्न (क्षुब्ध)= तथामुक्तः
नहीं होतायः= जो= रहित है,
= औरहर्षामर्ष-सः
यः= जो स्वयं भीभयोद्वेगैः= हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या),मे
प्रियः
= मुझे
= प्रिय है।
  • यहाँ 'मन'के अन्तर्गत चित्तको और बुद्धिके अन्तर्गत अहम्को भी लेना चाहिये।

८४२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

व्याख्या—‘यस्मान्नोद्विजते लोकः’— भक्त सर्वत्र और सबमें अपने परमप्रिय प्रभुको ही देखता है। अतः उसकी दृष्टिमें मन, वाणी और शरीरसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ एकमात्र भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होती हैं (गीता ६।३१)। ऐसी अवस्थामें भक्त किसी भी प्राणीको उद्देग कैसे पहुँचा सकता है? फिर भी भक्तोंके चरित्रमें यह देखनेमें आता है कि उनकी महिमा, आदर-सत्कार तथा कहीं-कहीं उनकी क्रिया, यहाँतक कि उनकी सीम्य आकृतिमात्रसे भी कुछ लोग ईर्ष्यावश उद्भ्रान्त हो जाते हैं और भक्तोंसे अकारण द्वेष और विरोध करने लगते हैं।

लोगोंको भक्तसे होनेवाले उद्देगके सम्बन्धमें विचार किया जाय, तो यही पता चलेगा कि भक्तकी क्रियाएँ कभी किसीके उद्देगका कारण नहीं होतीं; क्योंकि भक्त प्राणिमात्रमें भगवान्को ही देखता है—‘वासुदेवः सर्वम् ’ (गीता ७।१९)। उसकी मात्र क्रियाएँ स्वभावतः प्राणियोंके परमहितके लिये ही होती हैं। उसके द्वारा कभी भूलसे भी किसीके अहितकी चेष्टा नहीं होती। जिनको उससे उद्देग होता है, वह उनके अपने राग-द्वेषयुक्त आसुर स्वभावके कारण ही होता है। अपने ही दोषयुक्त स्वभावके कारण उनको भक्तकी हितपूर्ण चेष्टाएँ भी उद्देगजनक प्रतीत होती हैं।

इसमें भक्तका क्या दोष? भर्तृहरिजी कहते हैं—

मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषवहितवृत्तीनाम्। लुब्धकधीवरपिशूना निष्कारणवैरिणो जगति ॥

(भर्तृहरि-नीतिशतक ६१)

‘हरिण, मछली और सज्जन क्रमशः तृण, जल और संतोषपर अपना जीवन-निर्वाह करते हैं (किसीको कुछ नहीं कहते); परन्तु व्याध, मछुए और दुष्टलोग अकारण ही इनसे वैर करते हैं।’

वास्तवमें भक्तोंद्वारा दूसरे मनुष्योंके उद्भ्रान्त होनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता, प्रत्युत भक्तोंके चरित्रमें ऐसे प्रसंग देखनेमें आते हैं कि उनसे द्वेष रखनेवाले लोग भी उनके चिन्तन और संग-दर्शन-स्पर्श-वार्तालापके प्रभावसे अपना आसुर स्वभाव छोड़कर भक्त हो गये। ऐसा होनेमें भक्तोंका उदारतापूर्ण स्वभाव ही हेतु है।

उमा संत कइ इइइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई ॥

(मानस ५।४१।४)

परन्तु भक्तोंसे द्वेष करनेवाले सभी लोगोंको लाभ ही होता हो—ऐसा नियम भी नहीं है।

अगर ऐसा मान लिया जाय कि भक्तसे किसीको उद्देग होता ही नहीं अथवा दूसरे लोग भक्तके विरुद्ध कोई चेष्टा

करते ही नहीं या भक्तके शत्रु-मित्र होते ही नहीं, तो फिर भक्तके लिये शत्रु-मित्र, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति आदिमें सम होनेकी बात (जो आगे अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें कही गयी है) नहीं कही जाती। तात्पर्य यह है कि लोगोंको अपने आसुर स्वभावके कारण भक्तकी हितकर क्रियाओंसे भी उद्देग हो सकता है और वे बदलेकी भावनासे भक्तके विरुद्ध चेष्टा कर सकते हैं तथा अपनेको उस भक्तका शत्रु मान सकते हैं; परन्तु भक्तकी दृष्टिमें न तो कोई शत्रु होता है और न किसीको उद्भ्रान्त करनेका उसका भाव ही होता है।

‘लोकान्नोद्विजते च यः’— पहले भगवान्ने बताया कि भक्तसे किसी प्राणीको उद्देग नहीं होता और अब उपर्युक्त पदोंसे यह बताते हैं कि भक्तको खुद भी किसी प्राणीसे उद्देग नहीं होता। इसके दो कारण हैं—

(१) भक्तके शरीर, मन, इन्द्रियाँ, सिद्धान्त आदिके विरुद्ध भी अनिच्छा या परेच्छासे क्रियाएँ और घटनाएँ हो सकती हैं। परन्तु वास्तविकताका बोध होने तथा भगवान्में अत्यन्त प्रेम होनेके कारण भक्त भगवत्प्रेममें इतना निमग्न रहता है कि उसको सर्वत्र और सबमें भगवान्के ही दर्शन होते हैं। इसलिये प्राणिमात्रकी क्रियाओंमें (चाहे उनमें कुछ उसके प्रतिकूल ही क्यों न हों) उसको भगवान्की ही लीला दिखायी देती है। अतः उसको किसी भी क्रियासे कभी उद्देग नहीं होता।

(२) मनुष्यको दूसरोंसे उद्देग तभी होता है, जब उसकी कामना, मान्यता, साधना, धारणा आदिका विरोध होता है। भक्त सर्वथा पूर्णकाम होता है। इसलिये दूसरोंसे उद्भ्रान्त होनेका कोई कारण ही नहीं रहता।

‘हर्षामर्षभयोद्देगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः’— यहाँ हर्षसे मुक्त होनेका तात्पर्य यह है कि सिद्ध भक्त सब प्रकारके हर्षादि विकारोंसे सर्वथा रहित होता है। पर इसका आशय यह नहीं है कि सिद्ध भक्त सर्वथा हर्षरहित (प्रसन्नताशून्य) होता है, प्रत्युत उसकी प्रसन्नता तो नित्य, एकरस, विलक्षण और अलौकिक होती है। हाँ, उसकी प्रसन्नता सांसारिक पदार्थोंके संयोग-वियोगसे उत्पन्न क्षणिक, नाशवान् तथा घटने-बढ़नेवाली नहीं होती। सर्वत्र भगवद्बुद्धि रहनेसे एकमात्र अपने इष्टदेव भगवान्को और उनकी लीलाओंको देख-देखकर वह सदा ही प्रसन्न रहता है।

किसीके उत्कर्ष-(उन्नति-) को सहन न करना ‘अमर्ष’ कहलाता है। दूसरे लोगोंको अपने समान या अपनेसे

श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

८४३

अधिक सुख-सुविधा, धन, विद्या, महिमा, आदर-सत्कार आदि प्राप्त हुआ देखकर साधारण मनुष्यके अन्तःकरणमें उनके प्रति ईर्ष्या होने लगती है; क्योंकि उसको दूसरोंका उत्कर्ष सहन नहीं होता।

कई बार कुछ साधकोंके अन्तःकरणमें भी दूसरे साधकोंकी आध्यात्मिक उन्नति और प्रसन्नता देखकर अथवा सुनकर किंचित् ईर्ष्याका भाव पैदा हो जाता है। पर भक्त इस विकारसे सर्वथा रहित होता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें अपने प्रिय प्रभुके सिवाय अन्य किसीकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं। फिर वह किसके प्रति अमर्ष करे और क्यों करे?

अगर साधकके हृदयमें दूसरोंकी आध्यात्मिक उन्नति देखकर ऐसा भाव पैदा होता है कि मेरी भी ऐसी ही आध्यात्मिक उन्नति हो, तो यह भाव उसके साधनमें सहायक होता है। परन्तु अगर साधकके हृदयमें ऐसा भाव पैदा हो जाय कि इसकी उन्नति क्यों हो गयी, तो ऐसे दुर्भावके कारण उसके हृदयमें अमर्षका भाव पैदा हो जायगा, जो उसे पतनकी ओर ले जानेवाला होगा।

इष्टके वियोग और अनिष्टके संयोगकी आशंकासे होनेवाले विकारको 'भय' कहते हैं। भय दो कारणोंसे होता है—(१) बाहरी कारणोंसे; जैसे—सिंह, साँप, चोर, डाकू आदिसे अनिष्ट होने अथवा किसी प्रकारकी सांसारिक हानि पहुँचनेकी आशंकासे होनेवाला भय और (२) भीतरी कारणोंसे; जैसे—चोरी, झूठ, कपट, व्यभिचार आदि शास्त्र-विरुद्ध भावों तथा आचरणोंसे होनेवाला भय।

सबसे बड़ा भय मौतका होता है। विवेकशील कहे जानेवाले पुरुषोंको भी प्रायः मौतका भय बना रहता है।* साधकको भी प्रायः सत्संग-भजन-ध्यानादि साधनोंसे शरीरके कृश होने आदिका भय रहता है। उसको कभी-कभी यह भय भी होता है कि संसारसे सर्वथा वैराग्य हो जानेपर मेरे शरीर और परिवारका पालन कैसे होगा! साधारण मनुष्यको अनुकूल वस्तुकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेवाले अपनेसे बलवान् मनुष्यसे भय होता है। ये सभी भय केवल शरीर—(जड़ता—) के आश्रयसे ही पैदा होते हैं। भक्त सर्वथा भगवच्चरणोंके आश्रित रहता है, इसलिये वह सदा-सर्वदा भयरहित होता है। साधकको भी तभीतक भय रहता है, जबतक वह सर्वथा भगवच्चरणोंके आश्रित नहीं हो जाता। सिद्ध भक्तको तो सदा, सर्वत्र अपने प्रिय प्रभुकी

लीला ही दीखती है। फिर भगवान्की लीला उसके हृदयमें भय कैसे पैदा कर सकती है!

मनका एकरूप न रहकर हलचलयुक्त हो जाना 'उद्वेग' कहलाता है। इस (पंद्रहवें) श्लोकमें 'उद्वेग' शब्द तीन बार आया है। पहली बार उद्वेगकी बात कहकर भगवान्ने यह बताया कि भक्तकी कोई भी क्रिया उसकी ओरसे किसी मनुष्यके उद्वेगका कारण नहीं बनती। दूसरी बार उद्वेगकी बात कहकर यह बताया कि दूसरे मनुष्योंकी किसी भी क्रियासे भक्तके अन्तःकरणमें उद्वेग नहीं होता। इसके सिवाय दूसरे कई कारणोंसे भी मनुष्यको उद्वेग हो सकता है; जैसे बार-बार कोशिश करनेपर भी अपना कार्य पूरा न होना, कार्यका इच्छानुसार फल न मिलना, अनिच्छासे क्रतु-परिवर्तन; भूकम्प, बाढ़ आदि दुःखदायी घटनाएँ घटना; अपनी कामना, मान्यता, सिद्धान्त अथवा साधनमें विघ्न पड़ना आदि। भक्त इन सभी प्रकारके उद्वेगोंसे सर्वथा मुक्त होता है—यह बतानेके लिये ही तीसरी बार उद्वेगकी बात कही गयी है। तात्पर्य यह है कि भक्तके अन्तःकरणमें 'उद्वेग' नामकी कोई चीज रहती ही नहीं।

उद्वेगके होनेमें अज्ञानजनित इच्छा और आसुर स्वभाव ही कारण हैं। भक्तमें अज्ञानका सर्वथा अभाव होनेसे कोई स्वतन्त्र इच्छा नहीं रहती, फिर आसुर स्वभाव तो साधना-अवस्थामें ही नष्ट हो जाता है। भगवान्की इच्छा ही भक्तकी इच्छा होती है। भक्त अपनी क्रियाओंके फलरूपमें अथवा अनिच्छासे प्राप्त अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंमें भगवान्का कृपापूर्ण विधान ही देखता है और निरन्तर आनन्दमें मग्न रहता है। अतः भक्तमें उद्वेगका सर्वथा अभाव होता है।

'मुक्तः' पदका अर्थ है—विकारोंसे सर्वथा छूटा हुआ। अन्तःकरणमें संसारका आदर रहनेसे अर्थात् परमात्मामें पूर्णतया मन-बुद्धि न लगनेसे ही हर्ष, अमर्ष, भय, उद्वेग आदि विकार उत्पन्न होते हैं। परन्तु भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय अन्य किसीकी स्वतन्त्र सत्ता और महत्ता न रहनेसे उसमें ये विकार उत्पन्न ही नहीं होते। उसमें स्वाभाविक ही सदगुण-सदाचार रहते हैं।

इस श्लोकमें भगवान्ने 'भक्तः' पद न देकर 'मुक्तः' पद दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि भक्त यावन्मात्र दुर्गुण-दुराचारोंसे सर्वथा रहित होता है।

गुणोंका अभिमान होनेसे दुर्गुण अपने-आप आ जाते हैं।

  • स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥ (पातंजलयोगदर्शन २।१)

८४४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १२

अपनेमें किसी गुणके आनेपर अभिमानरूप दुर्गुण उत्पन्न

हो जाय तो उस गुणको गुण कैसे माना जा सकता है?

दैवी सम्पत्ति (सद्गुण)-से कभी आसुरी सम्पत्ति (दुर्गुण)

उत्पन्न नहीं हो सकती। अगर दैवी सम्पत्तिसे आसुरी

सम्पत्तिकी उत्पत्ति होती तो 'दैवी सम्पद्विमोक्षाय' (गीता

१६। ५)-इन भगवद्वचनोंके अनुसार मनुष्य मुक्त कैसे

होता? वास्तवमें गुणोंके अभिमानमें गुण कम तथा दुर्गुण

(अभिमान) अधिक होता है। अभिमानसे दुर्गुणोंकी वृद्धि

होती है; क्योंकि सभी दुर्गुण-दुराचार अभिमानके ही

आश्रित रहते हैं।

भक्तको तो प्राय: इस बातकी जानकारी ही नहीं

होती कि मेरेमें कोई गुण है। अगर उसको अपनेमें कभी

कोई गुण दीखता भी है तो वह उसको भगवान्‌का ही

मानता है, अपना नहीं। इस प्रकार गुणोंका अभिमान न

होनेके कारण भक्त सभी दुर्गुण-दुराचारों, विकारोंसे

मुक्त होता है भक्तको भगवान्‌ प्रिय होते हैं, इसलिये

भगवान्‌को भी भक्त प्रिय होते हैं, (गीता-सातवें अध्यायका

सत्रहवाँ श्लोक)।

परिशिष्ट भाव-दूसरेको सत्ता देनेसे ही उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि होते हैं। भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान्‌के सिवाय

दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं, फिर वह किससे उद्वेग, ईर्ष्या, भय आदि करे और क्यों करे?-'निज प्रभुमय देखहिं

जगत केहि सन करहिं बिरोध' (मानस, उत्तर० ११२ ख)।

सम्बन्ध-सिद्ध भक्तके छ: लक्षण बतानेवाला तीसरा प्रकरण आगेके श्लोकमें आया है।

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय: ॥ १६ ॥

य: = जो

अनपेक्ष: = अपेक्षा-

(आवश्यकता-) से

रहित,

शुचि: = (बाहर-भीतरसे)

पवित्र,

दक्ष: = चतुर,

उदासीन: = उदासीन,

गतव्यथ: = व्यथासे रहित (और)

सर्वारम्भ-

परित्यागी = सभी आरम्भोंका

अर्थात् नये-नये

कर्मोंके आरम्भका

सर्वथा त्यागी है,

स: = वह

मद्भक्त: = मेरा भक्त

मे = मुझे

प्रिय: = प्रिय है।

व्याख्या-'अनपेक्ष:'-भक्त भगवान्‌को ही सर्वश्रेष्ठ

मानता है। उसकी दृष्टिमें भगवत्प्राप्तिसे बढ़कर दूसरा कोई

लाभ नहीं होता। अत: संसारकी किसी भी वस्तुमें उसका

किंचिन्मात्र भी खिंचाव नहीं होता। इतना ही नहीं, अपने

कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धिमें भी उसका

अपनापन नहीं रहता, प्रत्युत वह उनको भी भगवान्‌का ही

मानता है, जो कि वास्तवमें भगवान्‌के ही हैं। अत: उसको

शरीर-निर्वाहकी भी चिन्ता नहीं होती। फिर वह और किस

बातकी अपेक्षा करे? अर्थात् फिर उसे किसी भी वस्तुकी

इच्छा-वासना-स्पृहा नहीं रहती।

भक्तपर चाहे कितनी ही बड़ी आपत्ति आ जाय,

आपत्तिका ज्ञान होनेपर भी उसके चित्तपर प्रतिकूल प्रभाव

नहीं होता। भयंकर-से-भयंकर परिस्थितिमें भी वह

भगवान्‌की लीलाका अनुभव करके मस्त रहता है। इसलिये

वह किसी प्रकारकी अनुकूलताकी कामना नहीं करता।

नाशवान्‌ पदार्थ तो रहते नहीं, उनका वियोग अवश्यम्भावी

है और अविनाशी परमात्मासे कभी वियोग होता ही नहीं-

इस वास्तविकताको जाननेके कारण भक्तमें स्वाभाविक ही

नाशवान्‌ पदार्थोंकी इच्छा पैदा नहीं होती।

यह बात खास ध्यान देनेकी है कि केवल इच्छा

करनेसे शरीर-निर्वाहके पदार्थ मिलते हैं तथा इच्छा न

करनेसे न मिलते हों-ऐसा कोई नियम नहीं है। वास्तवमें

शरीर-निर्वाहके आवश्यक सामग्री स्वत: प्राप्त होती है;

क्योंकि जीवमात्रके शरीर-निर्वाहकी आवश्यक सामग्रीका

प्रबन्ध भगवान्‌की ओरसे पहले ही हुआ रहता है। इच्छा

करनेसे तो आवश्यक वस्तुओंकी प्राप्तिमें बाधा ही आती

है। अगर मनुष्य किसी वस्तुको अपने लिये अत्यन्त आवश्यक

समझकर 'वह वस्तु कैसे मिले? कहाँ मिले? कब

मिले?'-ऐसी प्रबल इच्छाको अपने अन्तःकरणमें पकड़े

रहता है, तो उसकी उस इच्छाका विस्तार नहीं हो पाता।

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

८४५

अर्थात् उसकी वह इच्छा दूसरे लोगोंके अन्तःकरणतक नहीं पहुँच पाती। इस कारण दूसरे लोगोंके अन्तःकरणमें उस आवश्यक वस्तुको देनेकी इच्छा या प्रेरणा नहीं होती। प्रायः देखा जाता है कि लेनेकी प्रबल इच्छा रखनेवाले—(चोर आदि) को कोई देना नहीं चाहता। इसके विपरीत किसी वस्तुकी इच्छा न रखनेवाले विरक्त त्यागी और बालककी आवश्यकताओंका अनुभव अपने-आप दूसरोंको होता है, और दूसरे उनके शरीर-निर्वाहका अपने-आप प्रसन्नतापूर्वक प्रबन्ध करते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि इच्छा न करनेसे जीवन-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुएँ बिना माँगें स्वतः मिलती हैं। अतः वस्तुओंकी इच्छा करना केवल मूर्खता और अकारण दुःख पाना ही है। सिद्ध भक्तको तो अपने कहे जानेवाले शरीरकी भी अपेक्षा नहीं होती; इसलिये वह सर्वथा निरपेक्ष होता है।

किसी-किसी भक्तको तो इसकी भी अपेक्षा नहीं होती कि भगवान् दर्शन दें! भगवान् दर्शन दें तो आनन्द, न दें तो आनन्द! वह तो सदा भगवान्की प्रसन्नता और कृपाको देखकर मस्त रहता है। ऐसे निरपेक्ष भक्तके पीछे-पीछे भगवान् भी घूमा करते हैं! भगवान् स्वयं कहते हैं—

निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्। अनुब्रजाम्यहं नित्यं पृथेयेत्यङ्घिरेणुभिः॥

(श्रीमद्भागवतम् ११।१४।१६)

‘जो निरपेक्ष (किसीकी अपेक्षा न रखनेवाला), निरन्तर मेरा मनन करनेवाला, शान्त, द्वेषरहित और सबके प्रति समान दृष्टि रखनेवाला है, उस महात्माके पीछे-पीछे मैं सदा यह सोचकर घूमा करता हूँ कि उसकी चरण-रज मेरे ऊपर पड़ जाय और मैं पवित्र हो जाऊँ।’

किसी वस्तुकी इच्छाको लेकर भगवान्की भक्ति करनेवाला मनुष्य वस्तुतः उस इच्छित वस्तुका ही भक्त होता है; क्योंकि (वस्तुकी ओर लक्ष्य रहनेसे) वह वस्तुके लिये ही भगवान्की भक्ति करता है, न कि भगवान्के लिये। परन्तु भगवान्की यह उदारता है कि उसको भी अपना भक्त मानते हैं (गीता—सातवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक); क्योंकि वह इच्छित वस्तुके लिये किसी दूसरेपर भरोसा न रखकर अर्थात् केवल भगवान्पर भरोसा रखकर ही भजन करता है। इतना ही नहीं, भगवान् भक्त ध्रुवकी तरह उस (अर्थार्थी भक्त)-की इच्छा पूरी करके उसको सर्वथा निःसृष्ट भी बना देते हैं।

‘शुचिः’—शरीरमें अहंता-ममता (मैं-मेरापन) न

रहनेसे भक्तका शरीर अत्यन्त पवित्र होता है। अन्तःकरणमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक, काम-क्रोधादि विकारोंके न रहनेसे उसका अन्तःकरण भी अत्यन्त पवित्र होता है। ऐसे (बाहर-भीतरसे अत्यन्त पवित्र) भक्तके दर्शन, स्पर्श, वातालाप और चिन्तनसे दूसरे लोग भी पवित्र हो जाते हैं। तीर्थ सब लोगोंको पवित्र करते हैं; किन्तु ऐसे भक्त तीर्थोंको भी तीर्थत्व प्रदान करते हैं अर्थात् तीर्थ भी उनके चरण-स्पर्शसे पवित्र हो जाते हैं (पर भक्तोंके मनमें ऐसा अहंकार नहीं होता)। ऐसे भक्त अपने हृदयमें विराजित ‘पवित्राणां पवित्रम्’ (पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले) भगवान्के प्रभावसे तीर्थोंको भी महातीर्थ बनाते हुए विचरण करते हैं—

तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभूता॥

(श्रीमद्भागवतम् ११।१३।१०)

महाराज भगीरथ गंगाजीसे कहते हैं—

साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः। हरन्त्यधं तेऽङ्गसंगात् तेष्वान्ते हृद्यभिन्द्ररिः॥

(श्रीमद्भागवतम् ११।११।६)

‘माता! जिन्होंने लोक-परलोककी समस्त कामनाओंका त्याग कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी साधु पुरुष हैं, वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे (पापियोंके अंग-स्पर्शसे आये) समस्त पापोंको नष्ट कर देंगे; क्योंकि उनके हृदयमें समस्त पापोंका नाश करनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं।’

‘दक्षः’—जिसने करनेयोग्य काम कर लिया है, वही दक्ष है। मानव-जीवनका उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही है। इसीके लिये मनुष्य-शरीर मिला है। अतः जिसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया अर्थात् भगवान्को प्राप्त कर लिया, वही वास्तवमें दक्ष अर्थात् चतुर है। भगवान् कहते हैं—

एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्। यत्सत्यमनुतेनेह मर्त्यनाजोति मामृतम्॥

(श्रीमद्भागवतम् ११।२१।२२)

‘विवेकियोंके विवेक और चतुरोंकी चतुराईकी पराकाष्ठा इसीमें है कि वे इस विनाशी और असत्य शरीरके द्वारा मुझ अविनाशी एवं सत्य तत्त्वको प्राप्त कर लें।’

सांसारिक दक्षता (चतुराई) वास्तवमें दक्षता नहीं है।

एक दृष्टिसे तो व्यवहारमें अधिक दक्षता होना कलंक ही है; क्योंकि इससे अन्तःकरणमें जड़ पदार्थोंका आदर बढ़ता है।

८४६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १२ ]

जो मनुष्यके पतनका कारण होता है।

सिद्ध भक्तमें व्यावहारिक (सांसारिक) दक्षता भी होती है। परन्तु व्यावहारिक दक्षताको पारमार्थिक स्थितिकी कसौटी मानना वस्तुतः सिद्ध भक्तका अपमान ही करना है।

‘उदासीनः’ —उदासीन शब्दका अर्थ है—उत्+आसीन अर्थात् ऊपर बैठा हुआ, तटस्थ, पक्षपातसे रहित।

विवाद करनेवाले दो व्यक्तियोंके प्रति जिसका सर्वथा तटस्थ भाव रहता है, उसको उदासीन कहा जाता है। उदासीन शब्द निलिप्तताका द्योतक है। जैसे ऊँचे पर्वतपर खड़े हुए पुरुषपर नीचे पृथ्वीपर लगी हुई आग या बाढ़ आदिका कोई असर नहीं पड़ता, ऐसे ही किसी भी अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिका भक्तपर कोई असर नहीं पड़ता, वह सदा निलिप्त रहता है।

जो मनुष्य भक्तका हित चाहता है तथा उसके अनुकूल आचरण करता है, वह उसका मित्र समझा जाता है और जो मनुष्य भक्तका अहित चाहता है तथा उसके प्रतिकूल आचरण करता है, वह उसका शत्रु समझा जाता है। इस प्रकार मित्र और शत्रु समझे जानेवाले व्यक्तिके साथ भक्तके बाहरी व्यवहारमें फरक मालूम दे सकता है; परन्तु भक्तके अन्तःकरणमें दोनों मनुष्योंके प्रति किंचिन्मात्र भी भेदभाव नहीं होता। वह दोनों स्थितियोंमें सर्वथा उदासीन अर्थात् निलिप्त रहता है।

भक्तके अन्तःकरणमें अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। वह शरीरसहित सम्पूर्ण संसारको परमात्माका ही मानता है। इसलिए उसका व्यवहार पक्षपातसे रहित होता है।

‘गतव्यथः’ —कुछ मिले या न मिले, कुछ भी आये या चला जाय, जिसके चित्तमें दुःख-चिन्ता-शोकरूप हलचल कभी होती ही नहीं, उस भक्तको यहाँ ‘गतव्यथः’ कहा गया है।

यहाँ ‘व्यथा’ शब्द केवल दुःखका वाचक नहीं है। अनुकूलताकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें प्रसन्नता तथा प्रतिकूलताकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें खिन्नताकी जो हलचल होती है, वह भी ‘व्यथा’ ही है। अतः अनुकूलता तथा प्रतिकूलतासे अन्तःकरणमें होनेवाले रग-द्रेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंके सर्वथा अभावको ही यहाँ ‘गतव्यथः’ पदसे कहा गया है।

‘सर्वारम्भपरित्यागी’ —भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्म करनेको ‘आरम्भ’ कहते हैं; जैसे—

सुखभोगके उद्देश्यसे घरमें नयी-नयी चीजें इकट्ठी करना, वस्त्र खरीदना; रुपये बढ़ानेके उद्देश्यसे नयी-नयी दूकानें खोलना, नया व्यापार शुरू करना आदि। भक्त भोग और संग्रहके लिये किये जानेवाले मात्र कर्मोंका सर्वथा त्यागी होता है*।

जिसका उद्देश्य संसारका है और जो वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार आदिको लेकर अपनेमें विशेषता देखता है, वह भक्त नहीं होता। भक्त भगवनिष्ठ होता है। अतः उसके कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, क्रिया, फल आदि सब भगवान्के अर्पित होते हैं। वास्तवमें इन शरीरादिके मालिक भगवान् ही हैं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्यमात्र भगवान्का है। अतः भक्त एक भगवान्के सिवाय किसीको भी अपना नहीं मानता। वह अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। उसके द्वारा होनेवाले मात्र कर्म भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होते हैं। धन-सम्पत्ति, सुख-आराम, मान-बड़ाई आदिके लिये किये जानेवाले कर्म उसके द्वारा कभी होते ही नहीं।

जिसके भीतर परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिकी ही सच्ची लगन लगी है, वह साधक चाहे किसी भी मार्गका क्यों न हो, भोग भोगने और संग्रह करनेके उद्देश्यसे वह कभी कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता।

‘यो मद्भक्तः स मे प्रियः’ —भगवान्में स्वाभाविक ही इतना महान् आकर्षण है कि भक्त स्वतः उनकी ओर खिंच जाता है, उनका प्रेमी हो जाता है।

आत्मारामाश्च मुनयो निर्गन्था अप्यरुक्रमे।

कुर्वन्त्यहंतुर्को भक्तिमिथ्याभूतगुणो हरिः॥

(श्रीमद्भगवद्गीता १।७।१०)

‘ज्ञानके द्वारा जिनकी चित्-जड-ग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान्की हेतुरहित (निष्काम) भक्ति किया करते हैं; क्योंकि भगवान्के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी ओर खींच लेते हैं।’

यहाँ प्रश्न हो सकता है कि अगर भगवान्में इतना महान् आकर्षण है, तो सभी मनुष्य भगवान्की ओर क्यों नहीं खिंच जाते, उनके प्रेमी क्यों नहीं हो जाते?

वास्तवमें देखा जाय तो जीव भगवान्का ही अंश है। अतः उसका भगवान्की ओर स्वतः-स्वाभाविक आकर्षण होता है। परन्तु जो भगवान् वास्तवमें अपने हैं, उनको तो

  • अनारंभ अनेकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ विग्यानी ॥ (मानस ७।४६।३)