श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
नहीं होता। यह तो सदासे ही है। भगवान्ने इस शरीरीको अपना अंश बताते हुए इसको ‘सनातन’ कहा है— ‘मैवांशो जीवलोकै जीवभूतः सनातनः’ (१५।७)।
यह शरीरी कभी मरता भी नहीं। मरता वही है, जो पैदा होता है; और ‘प्रियते’ का प्रयोग भी वहीं होता है, जहाँ पिण्ड-प्राणका वियोग होता है। पिण्ड-प्राणका वियोग शरीरमें होता है। परन्तु शरीरीमें संयोग-वियोग दोनों ही नहीं होते। यह ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसका मरना होता ही नहीं।
सभी विकारोंमें जन्मना और मरना—ये दो विकार ही मुख्य हैं; अतः भगवान्ने इनका दो बार निषेध किया है—जिसको पहले ‘न जायते’ कहा, उसीको दुबारा ‘अजः’ कहा है; और जिसको पहले ‘न प्रियते’ कहा, उसीको दुबारा ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ कहा है।
‘अयं भूत्वा भविता वा न भूयः’ —‘यह अविनाशी नित्य-तत्त्व पैदा होकर फिर होनेवाला नहीं है अर्थात् यह स्वतःसिद्ध निर्विकार है। जैसे, बच्चा पैदा होता है, तो पैदा होनेके बाद उसकी सत्ता होती है। जबतक वह गर्भमें नहीं आता, तबतक ‘बच्चा है’ ऐसे उसकी सत्ता (होनापन) कोई भी नहीं कहता। तात्पर्य है कि बच्चेकी सत्ता पैदा होनेके बाद होती है; क्योंकि उस विकारी सत्ताका आदि और अन्त होता है। परन्तु इस नित्य-तत्त्वकी सत्ता स्वतःसिद्ध और निर्विकार है; क्योंकि इस अविकारी सत्ताका आरम्भ और अन्त नहीं होता।
‘अजः’ —इस शरीरीका कभी जन्म नहीं होता। इसलिये यह ‘अजः’ अर्थात् जन्मरहित कहा गया है।
‘नित्यः’ —‘यह शरीरी नित्य-निरन्तर रहनेवाला है; अतः इसका कभी अपक्षय नहीं होता। अपक्षय तो अनित्य वस्तुमें होता है, जो कि निरन्तर रहनेवाली नहीं है। जैसे,
परिशिष्ट भाव —हमारा (स्वयंका) और शरीरका स्वभाव बिलकुल अलग-अलग है। हम शरीरके साथ चिपके हुए नहीं हैं, शरीरसे मिले हुए नहीं हैं। शरीर हमारे साथ चिपका हुआ नहीं है, हमारेसे मिला हुआ नहीं है। इसलिये शरीरके न रहनेपर हमारा कुछ भी बिगड़ता नहीं। अबतक हम असंख्य शरीर धारण करके छोड़ चुके हैं, पर उससे हमारी सत्तामें क्या फर्क पड़ा? हमारा क्या नुकसान हुआ? हम तो ज्यों-के-त्यों ही रहे—‘भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’ (गीता ८।१९)। ऐसे ही यह शरीर छूटनेपर भी हम स्वयं ज्यों-के-त्यों ही रहेंगे।
जैसे हाथ, पैर, नासिका आदि शरीरके अंग हैं, ऐसे शरीर शरीरी (स्वयं)-का अंग भी नहीं है। जो बहनेवाला और विकारी होता है, वह ‘अंग’ नहीं होता*; जैसे—कफ, मूत्र आदि बहनेवाले और फोड़ा आदि विकारी होनेसे शरीरके अंग नहीं हैं, ऐसे ही शरीर बहनेवाला (परिवर्तनशील) और विकारी होनेसे शरीरीका अंग नहीं है।
आधी उम्र बीतनेपर शरीर घटने लगता है, बल क्षीण होने लगता है, इन्द्रियोंकी शक्ति कम होने लगती है। इस प्रकार शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिका तो अपक्षय होता है, पर शरीरीका अपक्षय नहीं होता। इस नित्य-तत्त्वमें कभी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती।
‘शाश्वतः’ —‘यह नित्य-तत्त्व निरन्तर एकरूप, एकरस रहनेवाला है। इसमें अवस्थाका परिवर्तन नहीं होता अर्थात् यह कभी बदलता नहीं। इसमें बदलनेकी योग्यता है ही नहीं।
‘पुराणः’ —‘यह अविनाशी तत्त्व पुराण (पुराना) अर्थात् अनादि है। यह इतना पुराना है कि यह कभी पैदा हुआ ही नहीं। उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें भी देखा जाता है कि जो वस्तु पुरानी हो जाती है, वह फिर बढ़ती नहीं, प्रत्युत नष्ट हो जाती है; फिर यह तो अनुत्पन्न तत्त्व है, इसमें बढ़नारूप विकार कैसे हो सकता है? तात्पर्य है कि बढ़नारूप विकार तो उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें ही होता है, इस नित्य-तत्त्वमें नहीं।
‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ —शरीरका नाश होनेपर भी इस अविनाशी शरीरीका नाश नहीं होता। यहाँ ‘शरीरे’ पद देनेका तात्पर्य है कि यह शरीर नष्ट होनेवाला है। इस नष्ट होनेवाले शरीरमें ही छः विकार होते हैं, शरीरीमें नहीं।
इन पदोंमें भगवान्ने शरीर और शरीरीका जैसा स्पष्ट वर्णन किया है, ऐसा स्पष्ट वर्णन गीतामें दूसरी जगह नहीं आया है।
अर्जुन युद्धमें कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे विशेष शोक कर रहे थे। उस शोकको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि शरीरके मरनेपर भी इस शरीरीका मरना नहीं होता अर्थात् इसका अभाव नहीं होता। इसलिये शोक करना अनुचित है।
- अद्वयं मूर्तिमत्त्वा स्वार्द्धं प्राणिस्थमविकारजम्। अतत्स्थं तत्र दृष्टं च तेन चेततथायुतम्॥
श्लोक २१-२२ ]
- साधक-संजीवनी *
१७
सम्बन्ध—उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि यह शरीरी न तो मारता है और न मरता ही है। इसमें मरनेका निषेध तो बीसवें श्लोकमें कर दिया, अब मारनेका निषेध करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
वेदाविनाशिनां नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | नित्यम् | = नित्य, | कथम् | = कैसे |
|---|---|---|---|---|---|
| यः | = जो | अजम् | = जन्मरहित (और) | कम् | = किसको |
| पुरुषः | = मनुष्य | अव्ययम् | = अव्यय | हन्ति | = मारे (और) |
| एनम् | = इस शरीरीको | वेद | = जानता है, | कम् | = (कैसे) किसको |
| अविनाशिन्म् | = अविनाशी, | सः | = वह | घातयति | = मरवाये ? |
व्याख्या —‘वेदाविनाशिन्म्’……‘घातयति हन्ति कम्’—इस शरीरीका कभी नाश नहीं होता, इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता, इसका कभी जन्म नहीं होता और इसमें कभी किसी तरहकी कोई कमी नहीं आती—ऐसा जो ठीक अनुभव कर लेता है, वह पुरुष कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये ? अर्थात् दूसरोंको मारने और मरवानेमें उस पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। वह किसी क्रियाका न तो कर्ता बन सकता है और न कारयिता बन सकता है।
यहाँ भगवान्ने शरीरीको अविनाशी, नित्य, अज और अव्यय कहकर उसमें छहों विकारोंका निषेध किया है; जैसे—‘अविनाशी’ कहकर मृत्युरूप विकारका, ‘नित्य’ कहकर अवस्थान्तर होना और बढ़नारूप विकारका, ‘अज’ कहकर जन्म होना और जन्मके बाद होनेवाली सत्तारूप विकारका, तथा ‘अव्यय’ कहकर क्षयरूप
परिशिष्ट भाव—उत्पन्न होनेवाली वस्तु तो स्वतः मिटती है, उसको मिटाना नहीं पड़ता। पर जो वस्तु उत्पन्न नहीं होती, वह कभी मिटती ही नहीं। हमने चौरासी लाख शरीर धारण किये, पर कोई भी शरीर हमारे साथ नहीं रहा और हम किसी भी शरीरके साथ नहीं रहे; किन्तु हम ज्यों-के-त्यों अलग रहे। यह जाननेकी विवेकशक्ति उन शरीरोंमें नहीं थी, प्रत्युत इस मनुष्य-शरीरमें ही है। अगर हम इसको नहीं जानते तो भगवान्ने दिये विवेकका निरादर करते हैं।
विकारका निषेध किया गया है। शरीरीमें किसी भी क्रियासे किंचिन्मात्र भी कोई विकार नहीं होता।
अगर भगवान्को ‘न हन्यते हन्यमाने शरीर’ और ‘कं घातयति हन्ति कम्’ इन पदोंमें शरीरीके कर्ता और कर्म बननेका ही निषेध करना था, तो फिर यहाँ करने-न-करनेकी बात न कहकर मरने-मारनेकी बात क्यों कही ? इसका उत्तर है कि युद्धका प्रसंग होनेसे यहाँ यह कहना जरूरी है कि शरीरी युद्धमें मारनेवाला नहीं बनता; क्योंकि इसमें कर्तापन नहीं है। जब शरीरी मारनेवाला अर्थात् कर्ता नहीं बन सकता, तब यह मरनेवाला अर्थात् क्रियाका विषय (कर्म) भी कैसे बन सकता है ? तात्पर्य यह है कि यह शरीरी किसी भी क्रियाका कर्ता और कर्म नहीं बनता। अतः मरने-मारनेमें शोक नहीं करना चाहिये, प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार प्राप्त कर्तव्य-कर्मका पालन करना चाहिये।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकोंमें देहीकी निर्विकारताका जो वर्णन हुआ है, आगेके श्लोकमें उसीका दृष्टान्तरूपसे वर्णन करते हैं।
वासांसि जीर्णाणि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
| नरः | = मनुष्य | नवानि | = नये (कपड़े) | शरीराणि | = शरीरोंको |
|---|---|---|---|---|---|
| यथा | = जैसे | गृह्णाति | = धारण कर लेता है, | विहाय | = छोड़कर |
| जीर्णाणि | = पुराने | तथा | = ऐसे ही | अन्यानि | = दूसरे |
| वासांसि | = कपड़ोंको | देही | = देही | नवानि | = नये (शरीरोंमें) |
| विहाय | = छोड़कर | जीर्णाणि | = पुराने | संयाति | = चला जाता है। |
| अपराणि | = दूसरे |
१८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
व्याख्या—‘वाससि जीर्णानि’ ‘संयाति नवानि देही’— इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें सूत्ररूपसे कहा गया था कि देहान्तरकी प्राप्तिके विषयमें धीर पुरुष शोक नहीं करते। अब उसी बातको उदाहरण देकर स्पष्टरूपसे कह रहे हैं कि जैसे पुराने कपड़ोंके परिवर्तनपर मनुष्यको शोक नहीं होता, ऐसे ही शरीरोंके परिवर्तनपर भी शोक नहीं होना चाहिये।
कपड़े मनुष्य ही बदलते हैं, पशु-पक्षी नहीं; अतः यहाँ कपड़े बदलनेके उदाहरणमें ‘नरः ’ पद दिया है। यह ‘नरः ’ पद मनुष्ययोनिका वाचक है और इसमें स्त्री-पुरुष, बालक-बालिकाएँ, जवान-बूढ़े आदि सभी आ जाते हैं।
जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़ोंको धारण करता है, ऐसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंको धारण करता है। पुराना शरीर छोड़नेको ‘मरना’ कह देते हैं, और नया शरीर धारण करनेको ‘जन्मना’ कह देते हैं। जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर कर्मोंके अनुसार या अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार नये-नये शरीरोंको प्राप्त होता रहता है।
यहाँ ‘शरीराणि ’ पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि जबतक शरीरोंको अपने वास्तविक स्वरूपका यथार्थ बोध नहीं होता, तबतक यह शरीरी अनन्तकालतक शरीर धारण करता ही रहता है। आजतक इसने कितने शरीर धारण किये हैं, इसकी गिनती भी सम्भव नहीं है। इस बातको लक्ष्यमें रखकर ‘शरीराणि ’ पदमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा सम्पूर्ण जीवोंका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ ‘देही ’ पद आया है।
यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें तो जीर्ण कपड़ोंकी बात कही है और उत्तरार्धमें जीर्ण शरीरोंकी। जीर्ण कपड़ोंका दृष्टान्त शरीरोंमें कैसे लागू होगा? कारण कि शरीर तो बच्चों और जवानोंके भी मर जाते हैं। केवल बूढ़ोंके जीर्ण शरीर मर जाते हों, यह बात तो है नहीं! इसका उत्तर यह है कि शरीर तो आयु समाप्त होनेपर ही मरता है और आयु समाप्त होना ही शरीरका जीर्ण होना है*। शरीर चाहे बच्चोंका हो, चाहे जवानोंका हो, चाहे बूढ़ोंका हो, आयु समाप्त होनेपर वे सभी जीर्ण ही कहलायेंगे।
इस श्लोकमें भगवान्ने ‘यथा ’ और ‘तथा ’ पद देकर कहा है कि जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े धारण कर लेता है, वैसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चला जाता है। यहाँ एक शंका होती है। जैसे कुमार, युवा और वृद्ध अवस्थाएँ अपने-आप होती हैं, वैसे ही देहान्तरकी प्राप्ति अपने-आप होती है (दूसरे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)— यहाँ तो ‘यथा ’ (जैसे) और ‘तथा ’ (वैसे) घट जाते हैं। परन्तु (इस श्लोकमें) पुराने कपड़ोंको छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो मनुष्यकी स्वतन्त्रता है, पर पुराने शरीरोंको छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें देहीकी स्वतन्त्रता नहीं है। इसलिये यहाँ ‘यथा ’ और ‘तथा ’ कैसे घटेंगे? इसका समाधान है कि यहाँ भगवान्का तात्पर्य स्वतन्त्रता-परतन्त्रताकी बात कहनेमें नहीं है, प्रत्युत शरीरके वियोगसे होनेवाले शोकको मिटानेमें है। जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े धारण करनेपर भी धारण करनेवाला (मनुष्य) वही रहता है, वैसे ही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चले जानेपर भी देही ज्यों-का-त्यों निर्लिप्तरूपसे रहता है; अतः शोक करनेकी कोई बात है ही नहीं। इस दृष्टिसे यह दृष्टान्त ठीक ही है।
दूसरी शंका यह होती है कि पुराने कपड़े छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो सुख होता है, पर पुराने शरीर छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें दुःख होता है। अतः यहाँ ‘यथा ’ और ‘तथा ’ कैसे घटेंगे? इसका समाधान यह है कि शरीरोंके मरनेका जो दुःख होता है, वह मरनेसे नहीं होता, प्रत्युत जीनेकी इच्छासे होता है। ‘मैं जीता रहूँ’— ऐसी जीनेकी इच्छा भीतरमें रहती है और मरना पड़ता है, तब दुःख होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य शरीरके साथ एकात्मता कर लेता है, तब वह शरीरके मरनेसे अपना मरना मान लेता है और दुःखी होता है। परन्तु जो शरीरके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता, उसको मरनेमें दुःख नहीं होता, प्रत्युत आनन्द होता है! जैसे, मनुष्य कपड़ोंके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता, तो कपड़ोंको बदलनेमें उसको दुःख नहीं होता। कारण कि वहाँ उसका यह विवेक स्पष्टतया जाग्रत रहता है कि कपड़े अलग हैं और मैं अलग हूँ। परन्तु वही कपड़ोंका बदलना अगर छोटे बच्चेका किया जाय, तो वह पुराने कपड़े उतारनेमें और नये कपड़े धारण
- विवेक-विचारपूर्वक देखा जाय तो आयु प्रतिक्षण समाप्त हो रही है अर्थात् शरीर प्रतिक्षण जीर्ण हो रहा है, प्रतिक्षण मर रहा है। यह एक क्षण भी स्थिर नहीं है। जैसे, जवान होनेसे बालकपन मर जाता है, तो वास्तवमें वह बालकपन निरन्तर मरता ही रहा है। परन्तु उधर दृष्टि न होनेसे प्रतिक्षण होनेवाली मौतकी तरफ खयाल नहीं जाता। यही वास्तवमें बेहोशी है।
श्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
११
करनेमें भी रोता है। उसका यह दुःख केवल मूर्खतासे, नासमझीसे होता है। इस मूर्खताको मिटानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ 'यथा' और 'तथा' पद देकर कपड़ोंका दृष्टान्त दिया है।
यहाँ भगवान्ने कपड़ोंके धारण करनेमें तो 'गृह्णाति' (धारण करता है) क्रिया दी, पर शरीरोंके धारण करनेमें 'संयाति' (जाता है) क्रिया दी, ऐसा क्रियाभेद भगवान्ने क्यों किया? लौकिक दृष्टिसे बेसमझीके कारण ऐसा दीखता है कि मनुष्य अपनी जगह रहता हुआ ही कपड़ोंको धारण करता है और देहान्तरकी प्राप्तिमें देहीको उन-उन देहोंमें जाना पड़ता है। इस लौकिक दृष्टिको लेकर ही भगवान्ने क्रियाभेद किया है।
विशेष बात
गीतामें 'येन सर्वमिदं तत्तम्' (२।१७), 'नित्यः सर्वगतः स्थाणुः' (२।२४) आदि पदोंसे देहीको सर्वत्र व्याप्त, नित्य, सर्वगत और स्थिर स्वभाववाला बताया तथा 'संयाति नवानि देही' (२।२२), 'शरीरं यदवाजोति' (१५।८) आदि पदोंसे देहीको दूसरे शरीरोंमें जानेकी बात कही गयी है। अतः जो सर्वगत है, सर्वत्र व्याप्त है, उसका जाना-आना कैसे? क्योंकि जो जिस देशमें न हो, उस देशमें चला जाय, तो इसको 'जाना' कहते हैं और जो दूसरे देशमें है, वह इस देशमें आ जाय, तो इसको 'आना' कहते हैं। परन्तु देहीके विषयमें तो ये दोनों ही बातें नहीं घटतीं! इसका समाधान यह है कि जैसे किसीकी बाल्यावस्थासे युवावस्था हो जाती है तो वह कहता है कि 'मैं जवान हो गया हूँ'। परन्तु वास्तवमें वह स्वयं जवान नहीं हुआ है,
परिशिष्ट भाव —मनुष्य नयी-नयी वस्तु चाहता है तो भगवान् भी उसको नयी-नयी वस्तु (शरीरादि सामग्री) देते रहते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है तो भगवान् उसको नया शरीर दे देते हैं। अतः नयी-नयी इच्छा करना ही जन्म-मरणका हेतु है। नयी-नयी इच्छा करनेवालेको अनन्तकालतक नयी-नयी वस्तु मिलती ही रहेगी। मनुष्यमें एक इच्छाशक्ति है, एक प्राणशक्ति है। इच्छाशक्तिके रहते हुए प्राणशक्ति नष्ट हो जाती है, तब नया जन्म होता है। अगर इच्छाशक्ति न रहे तो प्राणशक्ति नष्ट होनेपर भी पुनः जन्म नहीं होता।
कोई भी दृष्टान्त केवल एक अंशमें घटता है, सर्वथा नहीं घटता। यहाँ पुराने कपड़े छोड़कर नये कपड़े बदलनेका दृष्टान्त केवल इस अंशमें है कि जैसे आदमी अनेक कपड़े बदलनेपर भी एक ही रहता है, ऐसे ही स्वयं अनेक योनियोंमें अनेक शरीर धारण करनेपर भी एक (वही-का-वही) रहता है। जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़नेसे हम मर नहीं जाते और नये कपड़े धारण करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते, ऐसे ही पुराने शरीरको छोड़नेसे हम मर नहीं जाते और नया शरीर धारण
प्रत्युत उसका शरीर जवान हुआ है। इसलिये बाल्यावस्थामें जो वह था, युवावस्थामें भी वह वही है। परन्तु शरीरसे तादात्म्य माननेके कारण वह शरीरके परिवर्तनको अपनेमें आरोपित कर लेता है। ऐसे ही आना-जाना वास्तवमें शरीरका धर्म है, पर शरीरके साथ तादात्म्य होनेसे वह अपनेमें आना-जाना मान लेता है। अतः वास्तवमें देहीका कहीं भी आना-जाना नहीं होता, केवल शरीरोंके तादात्म्यके कारण उसका आना-जाना प्रतीत होता है।
अब यह प्रश्न होता है कि अनादिकालसे जो जन्म-मरण चला आ रहा है, उसमें कारण क्या है? कर्मोंकी दृष्टिसे तो शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये जन्म-मरण होता है, ज्ञानकी दृष्टिसे अज्ञानके कारण जन्म-मरण होता है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान्की विमुखताके कारण जन्म-मरण होता है। इन तीनोंमें भी मुख्य कारण है कि भगवान्ने जीवको जो स्वतन्त्रता दी है, उसका दुरुपयोग करनेसे ही जन्म-मरण हो रहा है। अब वह जन्म-मरण मिटे कैसे? मिली हुई स्वतन्त्रताका सदुपयोग करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। तात्पर्य है कि अपने स्वार्थके लिये कर्म करनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। अपनी जानकारीका अनादर करनेसे* जन्म-मरण हुआ है; अतः अपनी जानकारीका आदर करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। भगवान्ने विमुख होनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः भगवान्के सम्मुख होनेसे जन्म-मरण मिट जायगा।
- अपनी जानकारीका अनादर करनेका तात्पर्य है कि हम जितना जानते हैं, उसके अनुसार कार्य न करना। जैसे, सत्य बोलना ठीक है, झूठ बोलना ठीक नहीं—ऐसा जानते हुए भी स्वार्थके लिये झूठ बोल देते हैं। कोई हमें सुख देता है तो अच्छा लगता है और दुःख देता है तो बुरा लगता है—ऐसा जानते हुए भी अपने सुखके लिये दूसरोंको दुःख देते हैं। ऐसे ही हम जानते हैं कि शरीर आदि सब जानेवाले हैं, रहनेवाले नहीं हैं, फिर भी इनमें मोह-ममता करते हैं। यही अपनी जानकारीका अनादर है।
१००
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते। तात्पर्य है कि शरीर मरता है, हम नहीं मरते। अगर हम मर जायें तो फिर पुण्य-पापका फल कौन भोगेगा? अन्य योनियोंमें कौन जायगा? बन्धन किसका होगा? मुक्त कौन होगा?
सम्बन्ध—पहले दृष्टान्तरूपसे शरीरीकी निर्विकारताका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसीका प्रकारान्तरसे वर्णन करते हैं।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥
| शस्त्राणि | = शस्त्र | एनम् | = इसको | न, क्लेदयन्ति | = गीला नहीं कर |
|---|---|---|---|---|---|
| एनम् | = इस (शरीरी)-को | न, दहति | = जला नहीं | सकता | |
| न, छिन्दन्ति | = काट नहीं | सकती, | च | = और | |
| सकते, | आपः | = जल | मारुतः | = वायु (इसको) | |
| पावकः | = अग्नि | एनम् | = इसको | न, शोषयति | = सुखा नहीं सकती। |
व्याख्या—‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’ —इस शरीरीको शस्त्र नहीं काट सकते; क्योंकि ये प्राकृत शस्त्र वहाँतक पहुँच ही नहीं सकते।
जितने भी शस्त्र हैं, वे सभी पृथ्वी-तत्त्वसे उत्पन्न होते हैं। यह पृथ्वी-तत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहका कोई विकार नहीं पैदा कर सकता। इतना ही नहीं, पृथ्वी-तत्त्व इस शरीरीतक पहुँच ही नहीं सकता, फिर विकृति करनेकी बात तो दूर ही रही!
‘नैनं दहति पावकः’ —अग्नि इस शरीरीको जला नहीं सकती; क्योंकि अग्नि वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती। जब वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती, तब उसके द्वारा जलाना कैसे सम्भव हो सकता है? तात्पर्य है कि अग्नि-तत्त्व इस शरीरीमें कभी किसी तरहका विकार उत्पन्न कर ही नहीं सकता।
‘न चैनं क्लेदयन्त्यापः’ —जल इसको गीला नहीं कर सकता; क्योंकि जल वहाँतक पहुँच ही नहीं सकता। तात्पर्य है कि जल-तत्त्व इस शरीरीमें किसी प्रकारका विकार पैदा नहीं कर सकता।
‘न शोषयति मारुतः’ —वायु इसको सुखा नहीं सकती अर्थात् वायुमें इस शरीरीको सुखानेकी सामर्थ्य नहीं है; क्योंकि वायु वहाँतक पहुँचती ही नहीं। तात्पर्य है कि वायु-तत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहको विकृति पैदा नहीं कर सकता।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच महाभूत कहलाते हैं। भगवान्ने इनमेंसे चार ही महाभूतोंकी बात कही है कि ये पृथ्वी, जल, तेज और वायु इस शरीरीमें किसी तरहको विकृति नहीं कर सकते; परन्तु पाँचवें महाभूत आकाशको कोई चर्चा ही नहीं की है। इसका कारण यह
है कि आकाशमें कोई भी क्रिया करनेकी शक्ति नहीं है। क्रिया (विकृति) करनेकी शक्ति तो इन चार महाभूतोंमें ही है। आकाश तो इन सबको अवकाशमात्र देता है।
पृथ्वी, जल, तेज और वायु—ये चारों तत्त्व आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं, पर वे अपने कारणभूत आकाशमें भी किसी तरहका विकार पैदा नहीं कर सकते अर्थात् पृथ्वी आकाशका छेदन नहीं कर सकती, जल गीला नहीं कर सकता, अग्नि जला नहीं सकती और वायु सुखा नहीं सकती। जब ये चारों तत्त्व अपने कारणभूत आकाशको, आकाशके कारणभूत महत्त्वको और महत्त्वके कारणभूत प्रकृतिको भी कोई क्षति नहीं पहुँचा सकते, तब प्रकृतिसे सर्वथा अतीत शरीरीतक ये पहुँच ही कैसे सकते हैं? इन गुणयुक्त पदार्थोंकी उस निर्गुण-तत्त्वमें पहुँच ही कैसे हो सकती है? नहीं हो सकती (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
शरीरी नित्य-तत्त्व है। पृथ्वी आदि चारों तत्त्वोंको इसीसे सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः जिससे इन तत्त्वोंको सत्ता-स्फूर्ति मिलती है, उसको ये कैसे विकृत कर सकते हैं? यह शरीरी सर्वव्यापक है और पृथ्वी आदि चारों तत्त्व व्याप्य हैं अर्थात् शरीरीके अन्तर्गत हैं। अतः व्याप्य वस्तु व्यापकको कैसे नुकसान पहुँचा सकती है? उसको नुकसान पहुँचाना सम्भव ही नहीं है।
यहाँ युद्धका प्रसंग है। ‘ये सब सम्बन्धी मर जायेंगे’—इस बातको लेकर अर्जुन शोक कर रहे हैं। अतः भगवान् कहते हैं कि ये कैसे मर जायेंगे? क्योंकि वहाँतक अस्त्र-शस्त्रोंकी क्रिया पहुँचती ही नहीं अर्थात् शस्त्रके द्वारा शरीर कट जानेपर भी शरीरी नहीं कटता, अग्न्यास्त्रके द्वारा
श्लोक २४ ]
- साधक-संजीवनी *
१०१
शरीर जल जानेपर भी शरीरी नहीं जलता, वरुणास्त्रके द्वारा शरीर गल जानेपर भी शरीरी नहीं गलता और वायव्यास्त्रके द्वारा शरीर सूख जानेपर भी शरीरी नहीं सूखता। तात्पर्य
परिशिष्ट भाव —हम कहते हैं कि 'शरीर है' तो परिवर्तन शरीरमें होता है, 'है' (शरीरी) में नहीं होता। जैसे, 'काठ है' तो विकृति काठमें आती है, 'है' में नहीं आती। काठ कटता है, 'है' नहीं कटता। काठ जलता है, 'है' नहीं जलता। काठ गीला होता है, 'है' गीला नहीं होता। काठ सूखता है, 'है' नहीं सूखता। काठ कभी एकरूप रहता ही नहीं और 'है' कभी अनेकरूप होता ही नहीं।
अच्छेद्योऽयमदाहोऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
| अयम् | = यह शरीरी | नहीं किया जा |
|---|---|---|
| अच्छेद्यः | = काटा नहीं जा सकता, | सकता |
| अयम् | = यह | च = और |
| अदाह्यः | = जलाया नहीं जा सकता, | अशोष्यः, एव = (यह ) सुखाया |
| अक्लेद्यः | = (यह) गीला | भी नहीं जा सकता। |
| (कारण कि) |
व्याख्या —[शस्त्र आदि इस शरीरीमें विकार क्यों नहीं करते—यह बात इस श्लोकमें कहते हैं।]
'अच्छेद्योऽयम्' —शस्त्र इस शरीरीका छेदन नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि शस्त्रोंका अभाव है या शस्त्र चलानेवाला अयोग्य है, प्रत्युत छेदनरूपी क्रिया शरीरीमें प्रविष्ट ही नहीं हो सकती, यह छेदन होनेके योग्य ही नहीं है।
शस्त्रके सिवाय मन्त्र, शाप आदिसे भी इस शरीरीका छेदन नहीं हो सकता। जैसे, याज्ञवल्क्यके प्रश्नका उत्तर न दे सकनेके कारण उनके शापसे शाकल्यका मस्तक कटकर गिर गया (बृहदारण्यक०)। इस प्रकार देह तो मन्त्रोंसे, वाणीसे कट सकता है, पर देही सर्वथा अछेद्य है।
'अदाहोऽयम्' —यह शरीरी अदाह्य है; क्योंकि इसमें जलनेकी योग्यता ही नहीं है। अग्निके सिवाय मन्त्र, शाप आदिसे भी यह देही जल नहीं सकता। जैसे, दमयन्तीके शाप देनेसे व्याध बिना अग्निके जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार अग्नि, शाप आदिसे वही जल सकता है, जो जलनेयोग्य होता है। इस देहीमें तो दहन-क्रियाका प्रवेश ही नहीं हो सकता।
'अक्लेद्यः' —यह देही गीला होनेयोग्य नहीं है अर्थात् इसमें गीला होनेकी योग्यता ही नहीं है। जलसे एवं मन्त्र,
है कि अस्त्र-शस्त्रोंके द्वारा शरीर मर जानेपर भी शरीरी नहीं मरता, प्रत्युत ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। अतः इसको लेकर शोक करना तेरी बिलकुल ही बेसमझी है।
| अयम् | = यह |
|---|---|
| नित्यः | = नित्य रहनेवाला, |
| सर्वगतः | = सबमें परिपूर्ण, |
| अचलः | = अचल, |
| स्थाणुः | = स्थिर स्वभाववाला (और) |
| सनातनः | = अनादि है। |
शाप, ओषधि आदिसे यह गीला नहीं हो सकता। जैसे, सुननेमें आता है कि 'मालकोश' रागके गये जानेसे पत्थर भी गीला हो जाता है; चन्द्रमाको देखनेसे चन्द्रकान्तमणि गीली हो जाती है। परन्तु यह देही राग-रागिनी आदिसे गीली होनेवाली वस्तु नहीं है।
'अशोष्यः' —'यह देही अशोष्य है। वायुसे इसका शोषण हो जाय, यह ऐसी वस्तु नहीं है; क्योंकि इसमें शोषण-क्रियाका प्रवेश ही नहीं होता। वायुसे तथा मन्त्र, शाप, ओषधि आदिसे यह देही सूख नहीं सकता। जैसे अगस्त्य ऋषि समुद्रका शोषण कर गये, ऐसे इस देहीका कोई अपनी शक्तिसे शोषण नहीं कर सकता।
'एव च' —अर्जुन नाशकी सम्भावनाको लेकर शोक कर रहे थे। इसलिये शरीरीको अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य कहकर भगवान् 'एव च' पदोंसे विशेष जोर देकर कहते हैं कि यह शरीरी तो ऐसा ही है। इसमें किसी भी क्रियाका प्रवेश नहीं होता। अतः यह शरीरी शोक करनेयोग्य है ही नहीं।
'नित्यः' —'यह देही नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। यह किसी कालमें नहीं था और किसी कालमें नहीं रहेगा—ऐसी बात नहीं है; किन्तु यह सब कालमें नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है।
१०२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
‘सर्वगतः’ —यह देही सब कालमें ज्यों-का-त्यों ही रहता है, तो यह किसी देशमें रहता होगा? इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति, वस्तु, शरीर आदिमें एकरूपसे विराजमान है।
‘अचलः’ —यह सर्वगत है, तो यह कहीं आता-जाता भी होगा? इसपर कहते हैं कि यह देही स्थिर स्वभाववाला है अर्थात् इसमें कभी यहाँ और कभी वहाँ—इस प्रकार आने-जानेकी क्रिया नहीं है।
‘स्थानुः’ —यह स्थिर स्वभाववाला है, कहीं आता-जाता नहीं—यह बात ठीक है, पर इसमें कम्पन तो होता होगा? जैसे वृक्ष एक जगह ही रहता है, कहीं भी आता-जाता नहीं, पर वह एक जगह रहता हुआ ही हिलता है, ऐसे ही इस देहीमें भी हिलनेकी क्रिया होती होगी? इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही स्थानु है अर्थात् इसमें हिलनेकी क्रिया नहीं है।
‘सनातनः’ —यह देही अचल है, स्थानु है—यह बात तो ठीक है, पर यह कभी पैदा भी होता होगा? इसपर कहते हैं कि यह सनातन है, अनादि है, सदासे है। यह किसी समय नहीं था, ऐसा सम्भव ही नहीं है।
विशेष बात
यह संसार अनित्य है, एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। परन्तु जो सदा रहनेवाला है, जिसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता, उस देहीकी तरफ
परिशिष्ट भाव—‘सर्वगतः’ स्वयं देहगत नहीं है, प्रत्युत सर्वगत है—ऐसा अनुभव होना ही जीवनमुक्ति है। जैसे शरीर संसारमें बैठा हुआ है, ऐसे हम शरीरमें बैठे हुए नहीं हैं। शरीरके साथ हमारा मिलन कभी हुआ ही नहीं, है ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं। शरीर हमारेसे बहुत दूर है। परन्तु कामना-ममता-तादात्म्यके कारण हमें शरीरके साथ एकता प्रतीत होती है।
वास्तवमें शरीरीको शरीरकी जरूरत ही नहीं है। शरीरके बिना भी शरीरी मौजसे रहता है।
लक्ष्य करानेमें ‘नित्यः’ पदका तात्पर्य है।
देखने, सुनने, पढ़ने, समझनेमें जो कुछ प्राकृत संसार आता है, उसमें जो सब जगह परिपूर्ण तत्त्व है, उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें ‘सर्वगतः’ पदका तात्पर्य है।
संसारमात्रमें जो कुछ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदि हैं, वे सब-के-सब चलायमान हैं। उन चलायमान वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिमें जो अपने स्वरूपसे कभी चलायमान (विचलित) नहीं होता, उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें ‘अचलः’ पदका तात्पर्य है।
प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें प्रतिक्षण क्रिया होती रहती है, परिवर्तन होता रहता है। ऐसे परिवर्तनशील संसारमें जो क्रियारहित, परिवर्तनरहित, स्थायी स्वभाववाला तत्त्व है, उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें ‘स्थानुः’ पदका तात्पर्य है।
मात्र प्राकृत पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा ये पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे। परन्तु जो न उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है तथा जो पहले भी था और पीछे भी हरदम रहेगा—उस तत्त्व-(देही-)की तरफ लक्ष्य करानेमें ‘सनातनः’ पदका तात्पर्य है।
उपर्युक्त पाँचों विशेषणोंका तात्पर्य है कि शरीर-संसारके साथ तादात्म्य होनेपर भी और शरीर-शरीरी-भावका अलग-अलग अनुभव न होनेपर भी शरीरी नित्य-निरन्तर एकरस, एकरूप रहता है।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥
| अयम् | = यह देही | अयम् | = (और) यह | एवम् | = ऐसा |
|---|---|---|---|---|---|
| अव्यक्तः | = प्रत्यक्ष नहीं दीखता, | अविकार्यः | = निर्विकार | विदित्वा | = जानकर |
| अयम् | = यह | उच्यते | = कहा जाता है। | अनुशोचितुम् | = शोक |
| अचिन्त्यः | = चिन्तनका विषय | तस्मात् | = अतः | न | = नहीं |
| नहीं है | एनम् | = इस देहीको | अर्हसि | = करना चाहिये। |
व्याख्या—‘अव्यक्तोऽयम्’ —जैसे शरीर-संसार स्थूलरूपसे देखनेमें आता है, वैसे यह शरीरी स्थूलरूपसे देखनेमें
आनेवाला नहीं है; क्योंकि यह स्थूल सृष्टिसे रहित है।
‘अचिन्त्योऽयम्’ —मन, बुद्धि आदि देखनेमें तो नहीं
श्लोक २६ ]
- साधक-संजीवनी *
१०३
आते, पर चिन्तनमें आते ही हैं अर्थात् ये सभी चिन्तनके विषय हैं। परन्तु यह देही चिन्तनका भी विषय नहीं है; क्योंकि यह सूक्ष्म सृष्टिसे रहित है।
‘अविकार्याऽयमुच्यते’ —यह देही विकाररहित कहा जाता है अर्थात् इसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। सबका कारण प्रकृति है, उस कारणभूत प्रकृतिमें भी विकृति होती है। परन्तु इस देहीमें किसी प्रकारकी विकृति नहीं होती; क्योंकि यह कारण सृष्टिसे रहित है।
यहाँ चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें अच्छेछ, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, अचल, अत्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य—इन आठ विशेषणोंके द्वारा इस देहीका निषेधमुखसे और
नित्य, सर्वगत, स्थाणु और सनातन— इन चार विशेषणोंके द्वारा इस देहीका विधिमुखसे वर्णन किया गया है। परन्तु वास्तवमें इसका वर्णन हो नहीं सकता; क्योंकि यह वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी आदि प्रकाशित होते हैं, उस देहीको वे सब प्रकाशित कैसे कर सकते हैं? अतः इस देहीका ऐसा अनुभव करना ही इसका वर्णन करना है।
‘तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि’ —इसलिये इस देहीको अच्छेछ, अशोष्य, नित्य, सनातन, अविकार्य आदि जान लें अर्थात् ऐसा अनुभव कर लें तो फिर शोक हो ही नहीं सकता।
सम्बन्ध— अगर शरीरीको निर्वाकार न मानकर विकारी मान लिया जाय (जो कि सिद्धान्तसे विरुद्ध है), तो भी शोक नहीं हो सकता—यह बात आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
| महाबाहो | = हे महाबाहो! | नित्यम् | = नित्य | त्वम् | = तुम्हें |
|---|---|---|---|---|---|
| अथ | = अगर (तुम) | मृतम् | = मरनेवाला | एवम् | = इस प्रकार |
| एनम् | = इस देहीको | च | = भी | शोचितुम् | = शोक |
| नित्यजातम् | = नित्य पैदा होनेवाला | मन्यसे | = मानो, | न | = नहीं |
| वा | = अथवा | तथापि | = तो भी | अर्हसि | = करना चाहिये। |
व्याख्या—‘अथ चैनं’ ……‘शोचितुमर्हसि’— भगवान् यहाँ पश्चात्तरमें ‘अथ च’ और ‘मन्यसे’ पद देकर कहते हैं कि यद्यपि सिद्धान्तकी और सच्ची बात यही है कि देही किसी भी कालमें जन्मने-मरनेवाला नहीं है (गीता— दूसरे अध्यायका बीसवाँ श्लोक), तथापि अगर तुम सिद्धान्तसे बिलकुल विरुद्ध बात भी मान लो कि देही नित्य जन्मनेवाला और नित्य मरनेवाला है, तो भी तुम्हें शोक नहीं होना चाहिये। कारण कि जो जन्मेगा, वह मरेगा ही और जो मरेगा, वह जन्मेगा ही—इस नियमको कोई टाल नहीं सकता।
अगर बीजको पृथ्वीमें बो दिया जाय, तो वह फूलकर अंकुर दे देता है और वही अंकुर क्रमशः बढ़कर वृक्षरूप हो जाता है। इसमें सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय कि क्या वह बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहा? पृथ्वीमें वह पहले अपने कठोररूपको छोड़कर कोमलरूपमें हो गया, फिर कोमलरूपको छोड़कर अंकुररूपमें हो गया, इसके बाद
अंकुररूपको छोड़कर वृक्षरूपमें हो गया और अन्तमें आयु समाप्त होनेपर वह सूख गया। इस तरह बीज एक क्षण भी एकरूपसे नहीं रहा, प्रत्युत प्रतिक्षण बदलता रहा। अगर बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहता, तो वृक्षके सूखनेतककी क्रिया कैसे होती? उसने पहले रूपको छोड़ा—यह उसका मरना हुआ, और दूसरे रूपको धारण किया—यह उसका जन्मना हुआ। इस तरह वह प्रतिक्षण ही जन्मता-मरता रहा। बीजकी ही तरह यह शरीर है। बहुत सूक्ष्मरूपसे वीर्यका जन्तु रजके साथ मिला। वह बढ़ते-बढ़ते बच्चेके रूपमें हो गया और फिर जन्म गया। जन्मके बाद वह बढ़ा, फिर घटा और अन्तमें मर गया। इस तरह शरीर एक क्षण भी एकरूपसे न रहकर बदलता रहा अर्थात् प्रतिक्षण जन्मता-मरता रहा।
भगवान् कहते हैं कि अगर तुम शरीरकी तरह शरीरीको भी नित्य जन्मने-मरनेवाला मान लो, तो भी यह शोकका विषय नहीं हो सकता।
१०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्यैऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥
| हि | = कारण कि | ध्रुवम् | = जरूर | नहीं हो सकता। | |
|---|---|---|---|---|---|
| जातस्य | = पैदा हुएकी | जन्म | = जन्म होगा। | अर्थ | = (अतः) इस विषयमें |
| ध्रुवः | = जरूर | तस्मात् | = अतः | त्वम् | = तुम्हें |
| मृत्युः | = मृत्यु होगी | अपरिहार्यै | = (इस जन्म-मरण- | ||
| रूप परिवर्तनके | |||||
| प्रवाहका) निवारण | शोचितुम् | = शोक | |||
| च | = और | न | = नहीं | ||
| मृतस्य | = मरे हुएका | अर्हसि | = करना चाहिये। |
व्याख्या—‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च’ —पूर्वश्लोकके अनुसार अगर शरीरीको नित्य जन्मने और मरनेवाला भी मान लिया जाय, तो भी वह शोकका विषय नहीं हो सकता। कारण कि जिसका जन्म हो गया है, वह जरूर मरेगा और जो मर गया है, वह जरूर जन्मेगा।
‘तस्मादपरिहार्यैऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि’ —इसलिये कोई भी इस जन्म-मृत्युरूप प्रवाहका परिहार (निवारण) नहीं कर सकता; क्योंकि इसमें किसीका किंचिन्मात्र भी वश नहीं चलता। यह जन्म-मृत्युरूप प्रवाह तो अनादिकालसे चला आ रहा है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। इस दृष्टिसे तुम्हारे लिये शोक करना उचित नहीं है।
ये धृतराष्ट्रके पुत्र जन्में हैं, तो जरूर मरेंगे। तुम्हारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे तुम उनको बचा सको। जो मर जायेंगे, वे जरूर जन्मेंगे। उनको भी तुम रोक नहीं सकते। फिर शोक किस बातका?
शोक उसीका कीजिये, जो अनहोनी होय।
अनहोनी होती नहीं, होनी है सो होय॥
जैसे, इस बातको सब जानते हैं कि सूर्यका उदय हुआ है, तो उसका अस्त होगा ही और अस्त होगा तो उसका उदय
होगा ही। इसलिये मनुष्य सूर्यका अस्त होनेपर शोक-चिन्ता नहीं करते। ऐसे ही हे अर्जुन! अगर तुम ऐसा मानते हो कि शरीरके साथ ये भीष्म, द्रोण आदि सभी मर जायेंगे, तो फिर शरीरके साथ जन्म भी जायेंगे। अतः इस दृष्टिसे भी शोक नहीं हो सकता।
भगवान्ने इन दो (छब्बीसवें-सत्ताईसवें) श्लोकोंमें जो बात कही है, वह भगवान्का कोई वास्तविक सिद्धान्त नहीं है। अतः ‘अथ च’ पद देकर भगवान्ने दूसरे (शरीर-शरीरीको एक माननेवाले) पक्षकी बात कही है कि ऐसा सिद्धान्त तो है नहीं, पर अगर तू ऐसा भी मान ले, तो भी शोक करना उचित नहीं है।
इन दो श्लोकोंका तात्पर्य यह हुआ कि संसारकी मात्र चीजें प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेसे पहले रूपको छोड़कर दूसरे रूपको धारण करती रहती हैं। इसमें पहले रूपको छोड़ना—यह मरना हो गया और दूसरे रूपको धारण करना—यह जन्मना हो गया। इस प्रकार जो जन्मता है, उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है, वह फिर जन्मता है—यह प्रवाह तो हरदम चलता ही रहता है। इस दृष्टिसे भी क्या शोक करें?
परिशिष्ट भाव— किसी प्रियजनकी मृत्यु हो जाय, धन नष्ट हो जाय तो मनुष्यको शोक होता है। ऐसे ही भविष्यको लेकर चिन्ता होती है कि अगर स्त्री मर गयी तो क्या होगा? पुत्र मर गया तो क्या होगा? आदि। ये शोक-चिन्ता अपने विवेकको महत्त्व न देनेके कारण ही होते हैं। संसारमें परिवर्तन होना, परिस्थिति बदलना आवश्यक है। अगर परिस्थिति नहीं बदलेगी तो संसार कैसे चलेगा? मनुष्य बालकसे जवान कैसे बनेगा? मूर्खसे विद्वान् कैसे बनेगा? रोगीसे नीरोग कैसे बनेगा? बीजका वृक्ष कैसे बनेगा? परिवर्तनके बिना संसार स्थिर चित्रकी तरह बन जायगा! वास्तवमें मरनेवाला (परिवर्तनशील) ही मरता है, रहनेवाला कभी मरता ही नहीं। यह सबका प्रत्यक्ष अनुभव है कि मृत्यु होनेपर शरीर तो हमारे सामने पड़ा रहता है, पर शरीरका मालिक (जीवात्मा) निकल जाता है। अगर इस अनुभवको महत्त्व दें तो फिर चिन्ता-शोक हो ही नहीं सकते। बालिके मरनेपर भगवान् राम इसी अनुभवकी ओर ताराका लक्ष्य कराते हैं—
तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लागि तुम्ह रोवा॥
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
१०५
उपजा ग्यान चरन तब लागी । लीन्हंसि परम भगति बर माँगौ ॥
(मानस, किष्किन्धा० ११। २-३)
विचार करना चाहिये कि जब चौरासी लाख योनियोंमें कोई भी शरीर नहीं रहा, तो फिर यह शरीर कैसे रहेगा? जब चौरासी लाख शरीर मैं-मेरे नहीं रहे, तो फिर यह शरीर मैं-मेरा कैसे रहेगा? यह विवेक मनुष्य-शरीरमें हो सकता है, अन्य शरीरोंमें नहीं।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें पश्चात्तरकी बात कहकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥
| भारत | = हे भारत! | अव्यक्तनिधनानि | = मरनेके बाद | दीखते हैं। (अतः) |
|---|---|---|---|---|
| भूतानि | = सभी प्राणी | अप्रकट हो जायेंगे, | तत्र | |
| अव्यक्तादीनि | = जन्मसे पहले | व्यक्तमध्यानि, एव | = केवल | परिदेवना |
| अप्रकट थे (और) | बीचमें ही प्रकट | का | = बात ही क्या है? |
व्याख्या—‘अव्यक्तादीनि भूतानि’ —देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाले जितने भी प्राणी (शरीर आदि) हैं, वे सब-के-सब जन्मसे पहले अप्रकट थे अर्थात् दीखते नहीं थे।
‘अव्यक्तनिधनान्येव’ —ये सभी प्राणी मरनेके बाद अप्रकट हो जायेंगे अर्थात् इनका नाश होनेपर ये सभी ‘नहीं’ में चले जायेंगे, दीखेंगे नहीं।
‘व्यक्तमध्यानि’ —ये सभी प्राणी बीचमें अर्थात् जन्मके बाद और मृत्युके पहले प्रकट दिखायी देते हैं। जैसे सोनेसे पहले भी स्वप्न नहीं था और जगनेपर भी स्वप्न नहीं रहा,
परिशिष्ट भाव— जो आदि और अन्तमें नहीं है, उसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है तथा जो आदि और अन्तमें है, उसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है। जिसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘असत्’ (शरीर) है और जिसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘सत्’ (शरीरी) है। असत्के साथ हमारा नित्यवियोग है और सत्के साथ हमारा नित्ययोग है।
ऐसे ही इन प्राणियोंके शरीरोंका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव रहेगा। परन्तु बीचमें भावरूपसे दीखते हुए भी वास्तवमें इनका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है।
‘तत्र का परिदेवना’ —जो आदि और अन्तमें नहीं होता, वह बीचमें भी नहीं होता—यह सिद्धान्त है। सभी प्राणियोंके शरीर पहले नहीं थे और पीछे नहीं रहेंगे; अतः वास्तवमें वे बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु यह शरीरी पहले भी था और पीछे भी रहेगा; अतः वह बीचमें भी रहेगा ही। निष्कर्ष यह निकला कि शरीरोंका सदा अभाव है और शरीरीका कभी भी अभाव नहीं है। इसलिये इन दोनोंके लिये शोक नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—अब भगवान् शरीरीकी अलौकिकताका वर्णन करते हैं।
१-आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। (माण्डूक्यकारिका ४। ३१)
२-(क) यत्तु यस्यादिरन्तरञ्च स वै मध्यं च तस्य सन्। (श्रीमद्भा० ११। २४। १७)
‘जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है।’
(ख) आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥ (श्रीमद्भा० ११। २८। १८)
‘इस संसारके आदिमें जो था तथा अन्तमें जो रहेगा, जो इसका मूल कारण और प्रकाशक है, वही परमात्मा बीचमें भी है।’
(ग) न यत् पुरस्तादुत यन् पश्चामध्ये च तन् व्यपदेशमात्रम्। (श्रीमद्भा० ११। २८। २१)
‘जो उत्पत्तिसे पहले नहीं था और प्रलयके बाद भी नहीं रहेगा, ऐसा समझना चाहिये कि बीचमें भी वह है नहीं, केवल कल्पनामात्र, नाममात्र ही है।’
१०६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनाश्चर्यवद्ब्रूहि तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥
| कश्चित् | = कोई | आश्चर्यवत् | = (इसका) | शृणोति | = सुनता है |
|---|---|---|---|---|---|
| एनम् | = इस शरीरीको | आश्चर्यकी | च | = और | |
| आश्चर्यवत् | = आश्चर्यकी तरह | तरह | एनम् | = इसको | |
| पश्यति | = देखता (अनुभव करता) है | ब्रूहि | = वर्णन करता है | श्रुत्वा | = सुनकर |
| च | = और | च | = तथा | अपि | = भी |
| तथा | = वैसे | अन्यः | = अन्य (कोई) | कश्चित्, एव | = कोई |
| एव | = ही | एनम् | = इसको | न | = नहीं |
| अन्यः | = दूसरा (कोई) | आश्चर्यवत् | = आश्चर्यकी तरह | वेद | = जानता अर्थात् यह दुविज्ञेय है। |
व्याख्या—‘आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्’ —इस देहीको कोई आश्चर्यकी तरह जानता है। तात्पर्य यह है कि जैसे दूसरी चीजें देखने, सुनने, पढ़ने और जाननेमें आती हैं, वैसे इस देहीका जानना नहीं होता। कारण कि दूसरी वस्तुएँ इदंतासे (‘यह’ करके) जानते हैं अर्थात् वे जाननेका विषय होती हैं, पर यह देही इन्द्रिय-मन-बुद्धिका विषय नहीं है। इसको तो स्वयंसे, अपने-आपसे ही जाना जाता है। अपने-आपसे जो जानना होता है, वह जानना लौकिक ज्ञानकी तरह नहीं होता, प्रत्युत बहुत विलक्षण होता है।
‘पश्यति’ पदके दो अर्थ होते हैं—नेत्रोंसे देखना और स्वयंके द्वारा स्वयंको जानना। यहाँ ‘पश्यति’ पद स्वयंके द्वारा स्वयंको जाननेके विषयमें आया है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ, छठे अध्यायका बीसवाँ आदि)।
जहाँ नेत्र आदि करणोंसे देखना (जानना) होता है, वहाँ द्रष्टा (देखनेवाला), दृश्य (दीखनेवाली वस्तु) और दर्शन (देखनेकी शक्ति)—यह त्रिपुटी होती है। इस त्रिपुटीसे ही सांसारिक देखना—जानना होता है। परन्तु स्वयंके ज्ञानमें यह त्रिपुटी नहीं होती अर्थात् स्वयंका ज्ञान करण-सापेक्ष नहीं है। स्वयंका ज्ञान तो स्वयंके द्वारा ही होता है अर्थात् वह ज्ञान करण-निरपेक्ष है। जैसे, ‘मैं हूँ’—ऐसा जो अपने होनेपनका ज्ञान है, इसमें किसी प्रमाणकी या किसी करणकी आवश्यकता नहीं है। इस अपने होनेपनको ‘इदंता’ से अर्थात् दृश्यरूपसे नहीं देख सकते। इसका ज्ञान अपने-आपको ही होता है। यह ज्ञान इन्द्रियजन्य या बुद्धिजन्य नहीं है। इसलिये स्वयंको (अपने-आपको) जानना आश्चर्यकी तरह होता है।
जैसे अँधेरे कमरेमें हम किसी चीजको लाने जाते हैं, तो हमारे साथ प्रकाश भी चाहिये और नेत्र भी चाहिये
अर्थात् उस अँधेरे कमरेमें प्रकाशकी सहायतासे हम उस चीजको नेत्रोंसे देखेंगे, तब उसको लायेंगे। परन्तु कहीं दीपक जल रहा है और हम उस दीपकको देखने जायेंगे, तो उस दीपकको देखनेके लिये हमें दूसरे दीपककी आवश्यकता नहीं पड़ेगी; क्योंकि दीपक स्वयंप्रकाश है। वह अपने-आपको स्वयं ही प्रकाशित करता है। ऐसे ही अपने स्वरूपको देखनेके लिये किसी दूसरे प्रकाशकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि यह देही (स्वरूप) स्वयंप्रकाश है। अतः यह अपने-आपसे ही अपने-आपको जानता है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीन शरीर हैं। अन्न-जलसे बना हुआ ‘स्थूलशरीर’ है। यह स्थूलशरीर इन्द्रियोंका विषय है। इस स्थूलशरीरके भीतर पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि—इन सत्रह तत्त्वोंसे बना हुआ ‘सूक्ष्मशरीर’ है। यह सूक्ष्मशरीर इन्द्रियोंका विषय नहीं है, प्रत्युत बुद्धिका विषय है। जो बुद्धिका भी विषय नहीं है, जिसमें प्रकृति—स्वभाव रहता है, वह ‘कारणशरीर’ है। इन तीनों शरीरोंपर विचार किया जाय तो यह स्थूलशरीर मेरा स्वरूप नहीं है; क्योंकि यह प्रतिक्षण बदलता है और जाननेमें आता है। सूक्ष्मशरीर भी बदलता है और जाननेमें आता है; अतः यह भी मेरा स्वरूप नहीं है। कारणशरीर प्रकृतिस्वरूप है, पर देही (स्वरूप) प्रकृतिसे भी अतीत है, अतः कारणशरीर भी मेरा स्वरूप नहीं है। यह देही जब प्रकृतिको छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है, तब यह अपने-आपसे अपने-आपको जान लेता है। यह जानना सांसारिक वस्तुओंको जाननेकी अपेक्षा सर्वथा विलक्षण होता है, इसलिये इसको ‘आश्चर्यवत् पश्यति’ कहा गया है।
यहाँ भगवान्ने कहा है कि अपने-आपका अनुभव
श्लोक २९ ]
- साधक-संजीवनी *
१०७
करनेवाला कोई एक ही होता है—‘कश्चित्’ और आगे सातवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भी यही बात कही है कि कोई एक मनुष्य ही मेरेको तत्त्वे जानता है—‘कश्चिन्मां वेति तत्त्वतः ।’ इन पदोंसे ऐसा मालूम होता है कि इस अविनाशी तत्त्वको जानना बड़ा कठिन है, दुर्लभ है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। इस तत्त्वको जानना कठिन नहीं है, दुर्लभ नहीं है, प्रत्युत इस तत्त्वको सच्चे हृदयसे जाननेवालेकी इस तरफ लगनेवालेकी कमी है। यह कमी जाननेकी जिज्ञासा कम होनेके कारण ही है।
‘आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः’—ऐसे ही दूसरा पुरुष इस देहीका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है; क्योंकि यह तत्त्व वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी भी प्रकाशित होती है, वह वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती है? जो महारूप इस तत्त्वका वर्णन करता है, वह तो शाखा-चन्द्रन्यायकी तरह वाणीसे इसका केवल संकेत ही करता है, जिससे सुननेवालेका इधर लक्ष्य हो जाय। अतः इसका वर्णन आश्चर्यकी तरह ही होता है।
यहाँ जो ‘अन्यः’ पद आया है, उसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो जाननेवाला है, उससे यह कहनेवाला अन्य है; क्योंकि जो स्वयं जानेगा ही नहीं, वह वर्णन क्या करेगा? अतः इस पदका तात्पर्य यह है कि जितने जाननेवाले हैं, उनमें वर्णन करनेवाला कोई एक ही होता है। कारण कि सब-के-सब अनुभवी तत्त्वज्ञ महारूप उस तत्त्वका विवेचन करके सुननेवालेको उस तत्त्वतक नहीं पहुँचा सकते। उसकी शंकाओंका, तर्काँका पूरी तरह समाधान करनेकी क्षमता नहीं रखते। अतः वर्णन करनेवालेकी विलक्षण क्षमताका छोटन करनेके लिये ही यह ‘अन्यः’ पद दिया गया है।
‘आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति’—दूसरा कोई इस देहीको आश्चर्यकी तरह सुनता है। तात्पर्य है कि सुननेवाला शास्त्रोंकी, लोक-लोकान्तरोंकी जितनी बातें सुनता आया है, उन सब बातोंसे इस देहीकी बात विलक्षण मालूम देती है। कारण कि दूसरा जो कुछ सुना है, वह सब-का-सब इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदिका विषय है; परन्तु यह देही इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है, प्रत्युत यह इन्द्रियों आदिके
विषयको प्रकाशित करता है। अतः इस देहीकी विलक्षण बात वह आश्चर्यकी तरह सुनता है।
यहाँ ‘अन्यः’ पद देनेका तात्पर्य है कि जाननेवाला और कहनेवाला—इन दोनोंसे सुननेवाला (तत्त्वका जिज्ञासु) अलग है।
‘श्रुत्वाप्येन वेद न चैव कश्चित्’—इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसने सुन लिया, तो अब वह जानेगा ही नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि केवल सुन करके (सुननेमात्रसे) इसको कोई भी नहीं जान सकता। सुननेके बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा, तब वह अपने-आपसे ही अपने-आपको जानेगा*।
यहाँ कोई कहे कि शास्त्रों और गुरुजनोंसे सुनकर ज्ञान तो होता ही है, फिर यहाँ ‘सुन करके भी कोई नहीं जानता’—ऐसा कैसे कहा गया है? इस विषयपर थोड़ी गम्भीरतासे विचार करके देखें कि शास्त्रोंपर श्रद्धा स्वयं शास्त्र नहीं कराते और गुरुजनोंपर श्रद्धा स्वयं गुरुजन नहीं कराते; किन्तु साधक स्वयं ही शास्त्र और गुरुपर श्रद्धा-विश्वास करता है, स्वयं ही उनके सम्मुख होता है। अगर स्वयंके सम्मुख हुए बिना ही ज्ञान हो जाता, तो आजतक भगवान्के बहुत अवतार हुए हैं, बड़े-बड़े जीवन्मुक्त महारूप हुए हैं, उनके सामने कोई अज्ञानी रहना ही नहीं चाहिये था। अर्थात् सबको तत्त्वज्ञान हो जाना चाहिये था! पर ऐसा देखनेमें नहीं आता। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक सुननेसे स्वरूपमें स्थित होनेमें सहायता तो जरूर मिलती है, पर स्वरूपमें स्थित स्वयं ही होता है। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य तत्त्वज्ञानको असम्भव बतानेमें नहीं, प्रत्युत उसे करण-निरपेक्ष बतानेमें है। मनुष्य किसी भी रीतिसे तत्त्वको जाननेका प्रयत्न क्यों न करे, पर अन्तमें अपने-आपसे ही अपने-आपको जानेगा। श्रवण, मनन आदि साधन तत्त्वके ज्ञानमें परम्परागत साधन माने जा सकते हैं, पर वास्तविक बोध करण-निरपेक्ष (अपने-आपसे) ही होता है।
अपने-आपसे अपने-आपको जानना क्या होता है? एक होता है करना, एक होता है देखना और एक होता है जानना। करनेमें कर्मैन्द्रियोंकी, देखनेमें ज्ञानैन्द्रियोंकी और जाननेमें स्वयंकी मुख्यता होती है।
- अपने-आपसे ही अपनेको जाननेकी बात गीतामें कई जगह आयी है; जैसे—
(१) आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते। (२।५५)
(२) यस्मात्परतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ (३।१७)
(३) यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यनात्मानं तृष्यति॥ (६।२०)
(४) यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्। (१५।११)
१०८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा जानना नहीं होता, प्रत्युत देखना होता है, जो कि व्यवहारमें उपयोगी है। स्वयंके द्वारा जो जानना होता है, वह दो तरहका होता है—एक तो शरीर-संसारके साथ मेरी सदा भिन्नता है और दूसरा, परमात्माके साथ मेरी सदा अभिन्नता है। दूसरे शब्दोंमें, परिवर्तनशील नाशवान्
पदार्थके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है और अपरिवर्तनशील अविनाशी परमात्माके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध है। ऐसा जाननेके बाद फिर स्वतः अनुभव होता है। उस अनुभवका वाणीसे वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ तो बुद्धि भी चुप हो जाती है।
परिशिष्ट भाव —शरीरीको सुनेमात्रसे अर्थात् अभ्यासके द्वारा नहीं जान सकते, पर जिज्ञासापूर्वक तत्त्वज्ञ, अनुभवी महापुरुषोंसे सुनकर जान सकते हैं—‘यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ’ (गीता ७।३)। ‘आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ’ कहनेका तात्पर्य है कि तत्त्वका अनुभव करनेवालोंमें भी वर्णन करनेवाला कोई एक ही होता है। सब-के-सब अनुभव करनेवाले उसका वर्णन नहीं कर सकते।
जैसे संसारमें सुनेमात्रसे विवाह नहीं होता, प्रत्युत स्त्री और पुरुष एक-दूसरेको पति-पत्नीरूपसे स्वीकार करते हैं, तब विवाह होता है, ऐसे ही सुनेमात्रसे परमात्मतत्त्वको कोई भी नहीं जान सकता, प्रत्युत सुनेनेके बाद जब स्वयं उसको स्वीकार करेगा अथवा उसमें स्थित होगा, तब स्वयंसे उसको जानेगा। अतः सुनेमात्रसे मनुष्य ज्ञानकी बातें सीख सकता है, दूसरोंको सुना सकता है, लिख सकता है, व्याख्यान दे सकता है, विवेचन कर सकता है, पर अनुभव नहीं कर सकता।
परमात्मतत्त्वको केवल सुनेमात्रसे नहीं जान सकते, प्रत्युत सुनकर उपासना करनेसे जान सकते हैं—‘श्रुत्वान्येभ्य उपासते..... ’ (गीता १३।२५)। अगर परमात्मतत्त्वका वर्णन करनेवाला अनुभवी हो और सुनेनेवाला श्रद्धालु तथा जिज्ञासु हो तो तत्काल भी ज्ञान हो सकता है।
सम्बन्ध—अबतक देह और देहीका जो प्रकरण चल रहा था, उसका आगेके श्लोकमें उपसंहार करते हैं।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥
भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! | नित्यम् | = नित्य ही | | प्राणीके लिये ---|---|---|---|---|--- सर्वस्य | = सबके | अवध्यः | = अवध्य है। | त्वम् | = तुम्हें देहे | = देहमें | तस्मात् | = इसलिये | शोचितुम् | = शोक अयम् | = यह | सर्वाणि | = सम्पूर्ण | न | = नहीं देही | = देही | भूतानि | = प्राणियोंके लिये | अर्हसि | = करना चाहिये।
व्याख्या —‘देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ’—मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि स्थावर-जंगम सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें यह देही नित्य अवध्य अर्थात् अविनाशी है।
‘अवध्यः’ शब्दके दो अर्थ होते हैं—(१) इसका वध नहीं करना चाहिये और (२) इसका वध हो ही नहीं सकता। जैसे गाय अवध्य है अर्थात् कभी किसी भी अवस्थामें गायको नहीं मारना चाहिये; क्योंकि गायको मारनेमें बड़ा भारी दोष है, पाप है। परन्तु देहीके विषयमें ‘देहीका वध नहीं करना चाहिये ’—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत इस देहीका वध (नाश) कभी किसी भी तरहसे हो
ही नहीं सकता और कोई कर भी नहीं सकता—‘विनाशमव्यवस्थास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ’ (२।१७)।
‘तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि’ —इसलिये तुम्हें किसी भी प्राणीके लिये शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि इस देहीका विनाश कभी हो ही नहीं सकता और विनाशी देह क्षणमात्र भी स्थिर नहीं रहता।
यहाँ ‘सर्वाणि भूतानि ’ पदोंमें बहुवचन देनेका आशय है कि कोई भी प्राणी बाकी न रहे अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये शोक नहीं करना चाहिये।
शरीर विनाशी ही है; क्योंकि उसका स्वभाव ही नाशवान् है। वह प्रतिक्षण ही नष्ट हो रहा है। परन्तु जो अपना
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
१०९
नित्य-स्वरूप है, उसका कभी नाश होता ही नहीं। अगर इस वास्तविकताको जान लिया जाय तो फिर शोक होना सम्भव ही नहीं है।
प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात
यहाँ ग्यारहवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतकका जो प्रकरण है, यह विशेषरूपसे देही-देह, नित्य-अनित्य, सत्-असत्, अविनाशी-विनाशी—इन दोनोंके विवेकके लिये अर्थात् इन दोनोंको अलग-अलग बतानेके लिये ही है। कारण कि जबतक 'देही अलग है और देह अलग है'—यह विवेक नहीं होगा, तबतक कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि कोई-सा भी योग अनुष्ठानमें नहीं आयेगा। इतना ही नहीं, स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्तिके लिये भी देही-देहके भेदको समझना आवश्यक है। कारण कि देहसे अलग देही न हो, तो देहके मरनेपर स्वर्ग कौन जायगा? अतः जितने भी आस्तिक दार्शनिक हैं, वे चाहे अद्वैतवादी हों, चाहे द्वैतवादी हों; किसी भी मतके क्यों न हों, सभी शरीर-शरीरके भेदको मानते ही हैं। यहाँ भगवान् इसी भेदको स्पष्ट करना चाहते हैं।
इस प्रकरणमें भगवान्ने जो बात कही है, वह प्रायः सम्पूर्ण मनुष्योंके अनुभवकी बात है। जैसे, देह बदलता है और देही नहीं बदलता। अगर यह देही बदलता तो देहके बदलनेको कौन जानता? पहले बाल्यावस्था थी, फिर जवानी आयी; कभी बीमारी आयी, कभी बीमारी चली गयी—इस तरह अवस्थाएँ तो बदलती रहती हैं, पर इन सभी अवस्थाओंको जाननेवाला देही वही रहता है। अतः
परिशिष्ट भाव— भगवान्ने ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक देह-देहीके विवेकका वर्णन किया है। इस प्रकरणमें भगवान्ने ब्रह्म-जीव, प्रकृति-पुरुष, जड़-चेतन, माया-अविद्या, आत्मा-अनात्मा आदि किसी दार्शनिक शब्दका प्रयोग नहीं किया है। इसका कारण यह है कि भगवान् इसको पढ़ाईका अर्थात् सीखनेका विषय न बनाकर अनुभवका विषय बनाना चाहते हैं और यह सिद्ध करना चाहते हैं कि देह-देहीके अलगावका अनुभव मनुष्यमात्र कर सकता है। इसमें कोई पढ़ाई करनेकी, अधिकारी बननेकी जरूरत नहीं है।
सत्-असत्का विवेक मनुष्य अगर अपने शरीरपर करता है तो वह साधक होता है और संसारपर करता है तो विद्वान् होता है। अपनेको अलग रखते हुए संसारमें सत्-असत्का विवेक करनेवाला मनुष्य वाचक (सीखा हुआ) ज्ञानी तो बन जाता है, पर उसको अनुभव नहीं हो सकता। परन्तु अपनी देहमें सत्-असत्का विवेक करनेसे मनुष्य वास्तविक (अनुभव) ज्ञानी हो सकता है। तात्पर्य है कि संसारमें सत्-असत्का विवेक केवल पण्डिताईके लिये है, जबकि गीता पण्डिताईके लिये नहीं है। इसलिये भगवान्ने दार्शनिक शब्दोंका प्रयोग न करके देह-देही, शरीर-शरीरी जैसे सामान्य शब्दोंका प्रयोग किया है। जो संसारमें सत्-असत्का विचार करते हैं, वे अपनेको अलग रखते हुए अपनेको ज्ञानका अधिकारी बनाते हैं। परन्तु अपनेमें देह-देहीका विचार करनेमें मनुष्यमात्र ज्ञानप्राप्तिका अधिकारी है। अनुभव करनेके लिये
बदलनेवाला और न बदलनेवाला—ये दोनों कभी एक नहीं हो सकते। इसका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है। इसलिये भगवान्ने इस प्रकरणमें आत्मा-अनात्मा, ब्रह्म-जीव, प्रकृति-पुरुष, जड़-चेतन, माया-अविद्या आदि दार्शनिक शब्दोंका प्रयोग नहीं किया है*। कारण कि लोगोंने दार्शनिक बातें केवल सीखनेके लिये मान रखी हैं, उन बातोंको केवल पढ़ाईका विषय मान रखा है। इसको दृष्टिमें रखकर भगवान्ने इस प्रकरणमें दार्शनिक शब्दोंका प्रयोग न करके देह-देही, शरीर-शरीरी, असत्-सत्, विनाशी-अविनाशी शब्दोंका ही प्रयोग किया है। जो इन दोनोंके भेदको ठीक-ठीक जान लेता है, उसको कभी किंचिन्मात्र भी शोक नहीं हो सकता। जो केवल दार्शनिक बातें सीख लेते हैं, उनका शोक दूर नहीं होता।
एक छहों दर्शनोंकी पढ़ाई करना होता है और एक अनुभव करना होता है। ये दोनों बातें अलग-अलग हैं और इनमें बड़ा भारी अन्तर है। पढ़ाईमें ब्रह्म, ईश्वर, जीव, प्रकृति और संसार—ये सभी जानके विषय होते हैं अर्थात् पढ़ाई करनेवाला तो ज्ञाता होता है और ब्रह्म, ईश्वर आदि इन्द्रियों और अन्तःकरणके विषय होते हैं। पढ़ाई करनेवाला तो जानकारी बढ़ाना चाहता है, विद्याका संग्रह करना चाहता है, पर जो साधक मुमुक्षु, जिज्ञासु और भक्त होता है, वह अनुभव करना चाहता है अर्थात् प्रकृति और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके और अपने-आपको जानकर ब्रह्मके साथ अभिन्नताका अनुभव करना चाहता है, ईश्वरके शरण होना चाहता है।
- यद्यपि इस प्रकरणमें (पंद्रहवें और इक्कीसवें श्लोकमें) दो बार 'पुरुष' शब्दका प्रयोग किया गया है, तथापि वह दार्शनिक 'प्रकृति-पुरुष' के अर्थमें प्रयुक्त न होकर 'मनुष्य' के अर्थमें ही प्रयुक्त हुआ है।
११०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
देह-देहीका विवेचन उपयोगी है और सीखनेके लिये तत्त्वका विवेचन उपयोगी है। इसलिये साधक अनुभव करना चाहता है तो सबसे पहले उसको शरीरसे अपने अलगावका अनुभव करना चाहिये कि शरीर शरीरीके सम्बन्धसे रहित है और शरीरी शरीरके सम्बन्धसे रहित है अर्थात् 'मैं शरीर नहीं हूँ।' उसने जितनी सच्चाईसे, दृढ़तासे, विश्वाससे और निःसन्देहतासे शरीरकी सत्ता-महत्ता मानी है, उतनी ही सच्चाईसे, दृढ़तासे, विश्वाससे और निःसन्देहतासे स्वयं (स्वरूप)-की सत्ता-महत्ता मान ले और अनुभव कर ले।
शरीर केवल कर्म करनेका साधन है और कर्म केवल संसारके लिये ही होता है। जैसे कोई लेखक जब लिखने बैठता है, तब वह लेखनीको ग्रहण करता है और जब लिखना बन्द करता है, तब लेखनीको यथास्थान रख देता है, ऐसे ही साधकको कर्म करते समय शरीरको स्वीकार करना चाहिये और कर्म समाप्त होते ही शरीरको ज्यों-का-त्यों रख देना चाहिये—उससे असंग हो जाना चाहिये। कारण कि अगर हम कुछ भी न करें तो शरीरकी क्या जरूरत है?
साधकके लिये खास बात है—जाने हुए असत्का त्याग। साधक जिसको असत् जानता है, उसका वह त्याग कर दे तो उसका साधन सहज, सुगम हो जायगा और जल्दी सिद्ध हो जायगा। साधककी अपने साध्यमें जो प्रियता है, वही साधन कहलाती है। वह प्रियता किसी वस्तु, व्यक्ति, योग्यता, सामर्थ्य आदिके द्वारा अथवा किसी अभ्यासके द्वारा प्राप्त नहीं होती, प्रत्युत साध्यमें अपनापन होनेसे प्राप्त होती है। साधक जिसको अपना मान लेता है, उसमें उसकी प्रियता स्वतः हो जाती है। परन्तु वास्तविक अपनापन उस वस्तुसे होता है, जिसमें ये चार बातें हों—
१—जिससे हमारी सधर्मता अर्थात् स्वरूपगत एकता हो।
२—जिसके साथ हमारा सम्बन्ध नित्य रहनेवाला हो।
३—जिससे हम कभी कुछ न चाहें।
४—हमारे पास जो कुछ है, वह सब जिसको समर्पित कर दें।
ये चारों बातें भगवान्में ही लग सकती हैं। कारण कि शरीर और संसारसे हमारा सम्बन्ध नित्य रहनेवाला नहीं है और उनसे हमारी स्वरूपगत एकता भी नहीं है। प्रतिक्षण बदलनेवालेके साथ कभी न बदलनेवालेकी एकता कैसे हो सकती है? शरीरके साथ हमारी जो एकता दीखती है, वह वास्तविक नहीं है, प्रत्युत मानी हुई है। मानी हुई एकता कर्तव्यका पालन करनेके लिये है। तात्पर्य है कि जिसके साथ हमारी मानी हुई एकता है, उसकी सेवा तो हो सकती है, पर उसके साथ अपनापन नहीं हो सकता।
जाने हुए असत्का त्याग करनेके लिये यह आवश्यक है कि साधक विवेकविरोधी सम्बन्धका त्याग करे। जिसके साथ हमारा न तो नित्य सम्बन्ध है और न स्वरूपगत एकता ही है, उसको अपना और अपने लिये मानना विवेकविरोधी सम्बन्ध है। इस दृष्टिसे शरीरको अपना और अपने लिये मानना विवेकविरोधी है। विवेकविरोधी सम्बन्धके रहते हुए कोई भी साधन सिद्ध नहीं हो सकता। शरीरके साथ सम्बन्ध रखते हुए कोई कितना ही तप कर ले, समाधि लगा ले, लोक-लोकान्तरमें घूम आये, तो भी उसके मोहका नाश तथा सत्य तत्त्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती। विवेकविरोधी सम्बन्धका त्याग होते ही मोहका नाश हो जाता है तथा सत्य तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये विवेकविरोधी सम्बन्धका त्याग किये बिना साधकको चैनसे नहीं बैठना चाहिये। अगर हम शरीरसे माने हुए विवेकविरोधी सम्बन्धका त्याग न करें तो भी शरीर हमारा त्याग कर ही देगा! जो हमारा त्याग अवश्य करेगा, उसका त्याग करनेमें क्या कठिनाई है? इसलिये किसी भी मार्गका कोई भी साधक क्यों न हो, उसे इस सत्यको स्वीकार करना ही पड़ेगा कि शरीर मैं नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं है और शरीर मेरे लिये नहीं है, क्योंकि मैं अशरीरी हूँ, मेरा स्वरूप अत्यन्त है।
जबतक साधकका शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध रहता है, तबतक साधन करते हुए भी सिद्धि नहीं होती और वह शुभ कर्मोंसे, सार्थक चिन्तनसे और स्थितिकी आसक्तिसे बँधा रहता है। वह यज्ञ, तप, दान आदि बड़े-बड़े शुभ कर्म करे, आत्माका अथवा परमात्माका चिन्तन करे अथवा समाधिमें भी स्थित हो जाय तो भी उसका बन्धन सर्वथा मिटता नहीं। कारण कि शरीरके साथ सम्बन्ध मानना ही मूल बन्धन है, मूल दोष है, जिससे सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्ति होती है। अगर साधकका शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध सर्वथा मिट जाय तो उसके द्वारा अशुभ कर्म तो होंगे ही नहीं, शुभ कर्मोंमें भी आसक्ति नहीं रहेगी। उसके द्वारा निरर्थक चिन्तन तो होगा ही नहीं, सार्थक चिन्तनमें भी आसक्ति नहीं रहेगी। उसमें
श्लोक ३१ ]
- साधक-संजीवनी *
१११
चंचलता तो रहेगी ही नहीं, समाधिमें, स्थिरतामें अथवा निर्विकल्प स्थितिमें भी आसक्ति नहीं रहेगी। इस प्रकार स्थूलशरीरसे होनेवाले कर्ममें, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाले चिन्तनमें और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरतामें आसक्तिका नाश हो जानेपर उसका साधन सिद्ध हो जायगा अर्थात् मोह नष्ट हो जायगा और सत्य तत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें शरीरका सम्बन्ध सर्वथा मिटानेके लिये शरीर-शरीरीके विवेकका वर्णन किया है।
सम्बन्ध—अर्जुनके मनमें कुटुम्बियोंके मरनेका शोक था और गुरुजनोंको मारनेके पापका भय था अर्थात् यहाँ कुटुम्बियोंका वियोग हो जायेगा तो उनके अभावमें दुःख पाना पड़ेगा—यह शोक था और परलोकमें पापके कारण नरका आदिका दुःख भोगना पड़ेगा—यह भय था। अतः भगवान्ने अर्जुनका शोक दूर करनेके लिये ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतकका प्रकरण कहा, और अब अर्जुनका भय दूर करनेके लिये क्षात्रधर्म-विषयक आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्यान्दि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥
| च | = और | न | विचलित | क्षत्रियस्य | = क्षत्रियके लिये |
|---|---|---|---|---|---|
| स्वधर्मम् | = अपने क्षात्रधर्मको | अर्हसि | = नहीं | अन्यत् | = दूसरा कोई |
| अवेक्ष्य | = देखकर | हि | = होना चाहिये; | श्रेयः | = कल्याणकारक |
| अपि | = भी (तुम्हें) | धर्म्यात् | = क्योंकि | न | = नहीं |
| विकम्पितुम् | = विकम्पित अर्थात् | युद्धात् | = युद्धसे बढ़कर | विद्यते | = है। |
| कर्तव्य-कर्मसे |
व्याख्या—[पहले दो श्लोकोंमें युद्धसे होनेवाले लाभका वर्णन करते हैं।]
‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि’—यह स्वयं परमात्माका अंश है। जब यह शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब यह ‘स्व’ को अर्थात् अपने-आपको जो कुछ मानता है, उसका कर्तव्य ‘स्वधर्म’ कहलाता है। जैसे, कोई अपने-आपको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र मानता है, तो अपने-अपने वर्णाचित कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको शिक्षक या नौकर मानता है तो शिक्षक या नौकरके कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको किसीका पिता या किसीका पुत्र मानता है, तो पुत्र या पिताके प्रति किये जानेवाले कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है।
यहाँ क्षत्रियके कर्तव्य-कर्मको ‘धर्म’ नामसे कहा गया है*। क्षत्रियका खास कर्तव्य-कर्म है—युद्धसे विमुख न होना। अर्जुन क्षत्रिय है; अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है।
परिशिष्ट भाव—देह-देहीके विवेकका वर्णन करनेके बाद अब भगवान् यहाँसे अङ्गीसवें श्लोकतक देहीके स्वधर्मपालन (कर्तव्यपालन)-का वर्णन करते हैं। कारण कि देह-देहीके विवेकसे जो तत्त्व मिलता है, वही तत्त्व देहके
इसलिये भगवान् कहते हैं कि अगर स्वधर्मको लेकर देखा जाय तो भी क्षात्रधर्मके अनुसार तुम्हारे लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है। अपने कर्तव्यसे तुम्हें कभी विमुख नहीं होना चाहिये।
‘धर्म्यान्दि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते’—धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याण-कारक कर्म नहीं है अर्थात् क्षत्रियके लिये क्षत्रियके कर्तव्यका अनुष्ठान करना ही खास काम है (गीता—अठारहवें अध्यायका तैलालीसवें श्लोक)। [ऐसे ही ब्राह्मण, वैश्य और शुद्रके लिये भी अपने-अपने कर्तव्यका अनुष्ठान करनेके सिवाय दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है।]
अर्जुनने सातवें श्लोकमें प्रार्थना की थी कि आप मेरे लिये निश्चित श्रेयकी बात कहिये। उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि श्रेय (कल्याण) तो अपने धर्मका पालन करनेसे ही होगा। किसी भी दृष्टिसे अपने धर्मका त्याग कल्याणकारक नहीं है। अतः तुम्हें अपने युद्धरूप धर्मसे विमुख नहीं होना चाहिये।
- अठारहवें अध्यायमें जहाँ (१८।४२—४८ में) चारों वर्णोंके कर्तव्य-कर्मोंका वर्णन आया है, वहाँ बीचमें ‘धर्म’ शब्द भी आया है—‘श्रेयान्स्वधर्मा विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्’ (१८।४७)। इससे ‘कर्म’ और ‘धर्म’ शब्द पर्यायवाची सिद्ध होते हैं।
१९२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
सदुपयोगसे, स्वधर्मके पालनसे भी मिल सकता है। विवेकमें 'जानना' मुख्य है और स्वधर्मपालनमें 'करना' मुख्य है। यद्यपि मनुष्यके लिये विवेक मुख्य है, जो व्यवहार और परमार्थमें, लोक और परलोकमें सब जगह काम आता है। परन्तु जो मनुष्य देह-देहीके विवेकको न समझ सके, उसके लिये भगवान् स्वधर्मपालनकी बात कहते हैं, जिससे वह कोरा वाचक ज्ञानी न बनकर वास्तविक तत्त्वका अनुभव कर सके।
तात्पर्य है कि जो मनुष्य परमात्मतत्त्वको जानना चाहता है, पर तीक्ष्ण बुद्धि और तेजीका वैराग्य न होनेके कारण ज्ञानयोगसे नहीं जान सका तो वह कर्मयोगसे परमात्मतत्त्वको जान सकता है; क्योंकि ज्ञानयोगसे जो अनुभव होता है, वही कर्मयोगसे भी हो सकता है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)।
अर्जुन क्षत्रिय थे, इसलिये भगवान्ने इस प्रकारमें क्षात्रधर्मकी बात कही है। वास्तवमें यहाँ क्षात्रधर्म चारों वर्णोंका उपलक्षण है। इसलिये ब्राह्मणादि अन्य वर्णोंको भी यहाँ अपना-अपना धर्म (कर्तव्य) समझ लेना चाहिये। (गीता—अठारहवें अध्यायका बयालीसवाँ, तैंतालिसवाँ और चौवालीसवाँ श्लोक)।
['स्वधर्म' को ही स्वभावज कर्म, सहज कर्म, स्वकर्म आदि नामोंसे कहा गया है (गीता—अठारहवें अध्यायके इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक)। स्वार्थ, अभिमान और फलेच्छाका त्याग करके दूसरेके हितके लिये कर्म करना स्वधर्म है। स्वधर्मका पालन ही कर्मयोग है।]
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२ ॥
| यदृच्छया | = अपने-आप | च | = भी है। | (भाग्यशाली) हैं, | |
|---|---|---|---|---|---|
| उपपन्नम् | = प्राप्त हुआ (युद्ध) | पार्थ | = हे पुथानन्दन! | ईदृशम् | = (जिनको) ऐसा |
| अपावृतम् | = खुला हुआ | क्षत्रियाः | = (वे) क्षत्रिय | युद्धम् | = युद्ध |
| स्वर्गद्वारम् | = स्वर्गका दरवाजा | सुखिनः | = बड़े सुखी | लभन्ते | = प्राप्त होता है। |
व्याख्या —'यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्'—पाण्डवोंसे जूआ खेलनेमें दुर्घोधनेने यह शर्त रखी थी कि अगर इसमें आप हार जायेंगे, तो आपको बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास भोगना होगा। तेरहवें वर्षके बाद आपको अपना राज्य मिल जायगा। परन्तु अज्ञात-वासमें अगर हमलोग आपलोगोंको खोज लेंगे, तो आप-लोगोंको दुबारा बारह वर्षका वनवास भोगना पड़ेगा। जूएमें हार जानेपर शर्तके अनुसार पाण्डवोंने बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास भोग लिया। उसके बाद जब उन्होंने अपना राज्य माँगा, तब दुर्घोधनेने कहा कि मैं बिना युद्ध किये सूर्यकी तीखी नोक-जितनी जमीन भी नहीं दूँगा। दुर्घोधनेके ऐसा कहनेपर भी पाण्डवोंको ओरसे बार-बार
सन्धिकका प्रस्ताव रखा गया, पर दुर्घोधनेने पाण्डवोंसे सन्धि स्वीकार नहीं की। इसलिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि यह युद्ध तुमलोगोंको अपने-आप प्राप्त हुआ है। अपने-आप प्राप्त हुए धर्ममय युद्धमें जो क्षत्रिय शूरवीरतासे लड़ते हुए मरता है, उसके लिये स्वर्गका दरवाजा खुला हुआ रहता है।
'सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्' —ऐसा धर्ममय युद्ध जिनको प्राप्त हुआ है, वे क्षत्रिय बड़े सुखी हैं। यहाँ सुखी कहनेका तात्पर्य है कि अपने कर्तव्यका पालन करनेमें जो सुख है, वह सुख सांसारिक भोगोंको भोगनेमें नहीं है। सांसारिक भोगोंका सुख तो पशु-पक्षियोंको भी होता है। अतः जिनको कर्तव्य-पालनका अवसर प्राप्त हुआ है, उनको बड़ा भाग्यशाली मानना चाहिये।
सम्बन्ध—युद्ध न करनेसे क्या हानि होती है—इसका आगेके चार श्लोकोंमें वर्णन करते हैं।
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्यसि ॥ ३३ ॥
श्लोक ३४-३५ ]
- साधक-संजीवनी *
११३
| अथ | = अब | सङ्ग्रामम् | = युद्ध | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| चेत् | = अगर | न | = नहीं | कीर्तिम् | = कीर्तिका |
| त्वम् | = तू | करिष्यसि | = करेगा | हित्वा | = त्याग करके |
| इमम् | = यह | ततः | = तो | पापम् | = पापको |
| धर्म्यम् | = धर्ममय | स्वधर्मम् | = अपने धर्म | अवाप्यसि | = प्राप्त होगा। |
व्याख्या —‘अथ चेत्त्वमिमं’.....‘पापमवाप्यसि’—यहाँ ‘अथ’ अव्यय पश्चात्तरमें आया है और ‘चेत्’ अव्यय सम्भावनाके अर्थमें आया है। इनका तात्पर्य है कि यद्यपि तू युद्धके बिना रह नहीं सकेगा, अपने क्षात्र स्वभावके परवश हुआ तू युद्ध करेगा ही (गीता—अठारहवें अध्यायका साठवाँ श्लोक), तथापि अगर ऐसा मान लें कि तू युद्ध नहीं करेगा, तो तेरे द्वारा क्षात्रधर्मका त्याग हो जायगा।
क्षात्रधर्मका त्याग होनेसे तुझे पाप लगेगा और तेरी कीर्तिका भी नाश होगा।
आप-से-आप प्राप्त हुए धर्मरूप कर्तव्यका त्याग करके तू क्या करेगा? अपने धर्मका त्याग करनेसे तुझे परधर्म स्वीकार करना पड़ेगा, जिससे तुझे पाप लगेगा। युद्धका त्याग करनेसे दूसरे लोग ऐसा मानेंगे कि अर्जुन-जैसा शूरवीर भी मरनेसे भयभीत हो गया! इससे तेरी कीर्तिका नाश होगा।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥
| च | = और | अकीर्तिम् | = अपकीर्तिका | मनुष्यके लिये |
|---|---|---|---|---|
| भूतानि | = सब प्राणी | कथयिष्यन्ति | = कथन अर्थात् निन्दा करेंगे। | मरणात् |
| अपि | = भी | अकीर्तिः | = (वह) अपकीर्ति | च |
| ते | = तेरी | सम्भावितस्य | = सम्मानित | अतिरिच्यते |
| अव्ययाम् | = सदा रहनेवाली |
व्याख्या —‘अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्’—मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि जिन प्राणियोंका तेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं है अर्थात् जिनकी तेरे साथ न मित्रता है और न शत्रुता, ऐसे साधारण प्राणी भी तेरी अपकीर्ति, अपयशका कथन करेंगे कि देखो! अर्जुन कैसा भीरू था, जो कि अपने क्षात्रधर्मसे विमुख हो गया। वह कितना शूरवीर था, पर युद्धके मौकेपर उसकी कायरता प्रकट हो गयी, जिसका कि दूसरोंको पता ही नहीं था; आदि-आदि।
‘ते’ कहनेका भाव है कि स्वर्ग, मृत्यु और पाताल-लोकमें भी जिसकी धाक जमी हुई है, ऐसे तेरी अपकीर्ति होगी। ‘अव्ययाम्’ कहनेका तात्पर्य है कि जो आदमी श्रेष्ठताको लेकर जितना अधिक प्रसिद्ध होता है, उसकी कीर्ति और अपकीर्ति भी उतनी ही अधिक स्थायी
रहनेवाली होती है। ‘सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते’—इस श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने साधारण प्राणियोंद्वारा अर्जुनकी निन्दा किये जानेकी बात बतायी। अब श्लोकके उत्तरार्धमें सबके लिये लागू होनेवाली सामान्य बात बताते हैं।
संसारकी दृष्टिमें जो श्रेष्ठ माना जाता है, जिसको लोग बड़ी ऊँची दृष्टिसे देखते हैं, ऐसे मनुष्यकी जब अपकीर्ति होती है, तब वह अपकीर्ति उसके लिये मरणसे भी अधिक भयंकर दुःखदायी होती है। कारण कि मरनेमें तो आयु समाप्त हुई है, उसने कोई अपराध तो किया नहीं है, परन्तु अपकीर्ति होनेमें तो वह खुद धर्म-मर्यादासे, कर्तव्यसे च्युत हुआ है। तात्पर्य है कि लोगोंमें श्रेष्ठ माना जानेवाला मनुष्य अगर अपने कर्तव्यसे च्युत होता है, तो उसका बड़ा भयंकर अपयश होता है।
भयाद्वर्णादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥
श्रीमद्भगवद्गीता
च = तथा, महारथा: = महारथीलोग, त्वाम् = तुझे, भयात् = भयके कारण, रणात् = युद्धसे
उपरतम् = हटा हुआ, मंस्यन्ते = मानेंगे।, येषाम् = जिनकी (धारणा में), त्वम् = तू
बहुमत: = बहुमान्य, भूत्वा = हो चुका है, (उनकी दृष्टि में), लाघवम् = (तू) लघुताको, यास्यसि = प्राप्त हो जायगा।
व्याख्या—'भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा:'—तू ऐसा समझता है कि मैं तो केवल अपना कल्याण करनेके लिये युद्धसे उपरत हुआ हूँ; परन्तु अगर ऐसी ही बात होती और युद्धको तू पाप समझता, तो पहले ही एकान्तमें रहकर भजन-स्मरण करता और तेरी युद्धके लिये प्रवृत्ति भी नहीं होती। परन्तु तू एकान्तमें न रहकर युद्धमें प्रवृत्त हुआ है। अब अगर तू युद्धसे निवृत्त होगा तो बड़े-बड़े महारथीलोग ऐसा ही मानेंगे कि युद्धमें मारे जानेके भयसे ही अर्जुन युद्धसे निवृत्त हुआ है। अगर वह धर्मका विचार करता तो युद्धसे निवृत्त नहीं होता; क्योंकि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म है। अतः वह मरनेके भयसे ही युद्धसे निवृत्त हो रहा है।
'येषां च त्वं बहुमत भूत्वा यास्यसि लाघवम्'—भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य आदि जो बड़े-बड़े महारथी हैं, उनकी दृष्टिमें तू बहुमान्य हो चुका है अर्थात् उनके मनमें यह एक विश्वास है कि युद्ध करनेमें नामी शूरवीर तो अर्जुन ही है। वह युद्धमें अनेक दैत्यों, देवताओं, गन्धर्वों आदिको हरा चुका है। अगर अब तू युद्धसे निवृत्त हो जायगा, तो उन महारथियोंके सामने तू लघुता-(तुच्छता-) को प्राप्त हो जायगा अर्थात् उनकी दृष्टिमें तू गिर जायगा।
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता:। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥ ३६॥
तव = तेरे, अहिता: = शत्रुलोग, तव = तेरी, सामर्थ्यम् = सामर्थ्यकी, निन्दन्त: = निन्दा करते
हुए, बहून् = बहुत-से, अवाच्यवादान् = न कहनेयोग्य वचन, च = भी
वदिष्यन्ति = कहेंगे।, तत: = उससे, दुःखतरम् = बढ़कर और दुःखकी बात, नु, किम् = क्या होगी?
व्याख्या—'अवाच्यवादांश्च ..... निन्दन्तस्तव सामर्थ्यम्'—'अहित' नाम शत्रुका है, अहित करनेवालेका है। तेरे जो दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण आदि शत्रु हैं, तेरे वैर न रखनेपर भी वे स्वयं तेरे साथ वैर रखकर तेरा अहित करनेवाले हैं। वे तेरी सामर्थ्यको जानते हैं कि यह बड़ा भारी शूरवीर है। ऐसा जानते हुए भी वे तेरी सामर्थ्यकी निन्दा करेंगे कि यह तो हिजड़ा है। देखो! यह युद्धके मौकेपर हो गया न अलग! क्या यह हमारे सामने टिक सकता है? क्या यह हमारे साथ युद्ध कर सकता है? इस प्रकार तुझे दुःखी करनेके लिये, तेरे भीतर जलन पैदा करनेके लिये न जाने कितने न कहने-लायक वचन कहेंगे। उनके वचनोंको तू कैसे सहेगा?
'ततो दुःखतरं नु किम्'—इससे बढ़कर अत्यन्त भयंकर दुःख क्या होगा? क्योंकि यह देखा जाता है कि जैसे मनुष्य तुच्छ आदमियोंके द्वारा तिरस्कृत होनेपर अपना तिरस्कार सह नहीं सकता और अपनी योग्यतासे, अपनी शूरवीरतासे अधिक काम करके मर मिटता है। ऐसे ही जब शत्रुओंके द्वारा तेरा सर्वथा अनुचित तिरस्कार हो जायगा, तब उसको तू सह नहीं सकेगा और तेजीमें आकर युद्धके लिये कूद पड़ेगा। तेरेसे युद्ध किये बिना रहा नहीं जायगा। अभी तो तू युद्धसे उपरत हो रहा है, पर जब तू समयपर युद्धके लिये कूद पड़ेगा, तब तेरी कितनी निन्दा होगी। उस निन्दाको तू कैसे सह सकेगा?
सम्बन्ध—पीछेके चार श्लोकोंमें युद्ध न करनेसे हानि बताकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें युद्ध करनेसे लाभ बताते हैं।
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥ ३७॥
श्लोक ३८ ]
- साधक-संजीवनी *
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| वा | = अगर ( युद्धमें तू ) | जित्वा | = जीत जायगा | कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! |
|---|---|---|---|---|---|
| हतः | = मारा जायगा ( तो ) | ( तो ) | ( तू ) | ||
| स्वर्गम् | = ( तुझे ) स्वर्गकी | महीम् | = पृथ्वीका राज्य | युद्धाय | = युद्धके लिये |
| प्राप्यसि | = प्राप्ति होगी ( और ) | भोक्ष्यसे | = भोगेगा । | कृतनिश्चयः | = निश्चय करके |
| वा | = अगर ( युद्धमें तू ) | तस्मात् | = अतः | उत्तिष्ठ | = खड़ा हो जा । |
व्याख्या —‘हतो वा प्राप्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’—इसी अध्यायके छठे श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि हमलोगोंको इसका भी पता नहीं है कि युद्धमें हम उनको जीतेंगे या वे हमको जीतेंगे । अर्जुनके इस सन्देहको लेकर भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि अगर युद्धमें तुम कर्ण आदिके द्वारा मारे भी जाओगे तो स्वर्गको चले जाओगे और अगर युद्धमें तुम्हारी जीत हो जायगी तो यहाँ पृथ्वीका राज्य भोगोगे । इस तरह तुम्हारे तो दोनों ही हाथोंमें लडू हैं । तात्पर्य है कि युद्ध करनेसे तो तुम्हारा दोनों तरफसे लाभ-ही-लाभ है और युद्ध न करनेसे दोनों तरफसे हानि-ही-हानि है । अतः तुम्हें युद्धमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये ।
‘तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः’—‘यहाँ ‘कौन्तेय’ सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि जब मैं सन्धिकका प्रस्ताव लेकर कौरवोंके पास गया था, तब माता कुन्तीने
तुम्हारे लिये यही संदेश भेजा था कि तुम युद्ध करो । अतः तुम्हें युद्धसे निवृत्त नहीं होना चाहिये, प्रत्युत युद्धका निश्चय करके खड़े हो जाना चाहिये ।
अर्जुनका युद्ध न करनेका निश्चय था और भगवान्ने इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें युद्ध करनेकी आज्ञा दे दी । इससे अर्जुनके मनमें सन्देह हुआ कि युद्ध करना ठीक है या न करना ठीक है । अतः यहाँ भगवान् उस सन्देहको दूर करनेके लिये कहते हैं कि तुम युद्ध करनेका एक निश्चय कर लो, उसमें सन्देह मत रखो ।
यहाँ भगवान्का तात्पर्य ऐसा मालूम देता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें प्राप्त कर्तव्यका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उत्साह और तत्परतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये । कर्तव्यका पालन करनेमें ही मनुष्यकी मनुष्यता है ।
परिशिष्ट भाव —धर्मका पालन करनेसे लोक-परलोक दोनों सुधर जाते हैं । तात्पर्य है कि कर्तव्यका पालन और अकर्तव्यका त्याग करनेसे लोककी भी सिद्धि हो जाती है और परलोककी भी ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्यसि ॥ ३८ ॥
| जयाजयौ | = जय-पराजय, | कृत्वा | = करके | एवम् | = इस प्रकार |
|---|---|---|---|---|---|
| लाभालाभौ | = लाभ-हानि ( और ) | ततः | = फिर | ( युद्ध करनेसे ) | |
| सुखदुःखे | = सुख-दुःखको | युद्धाय | = युद्धमें | पापम् | = ( तू ) पापको |
| समे | = समान | युज्यस्व | = लग जा । | न, अवाप्यसि | = प्राप्त नहीं होगा । |
व्याख्या —[अर्जुनको यह आशंका थी कि युद्धमें कुटुम्बियोंको मारनेसे हमारेको पाप लग जायगा, पर भगवान् यहाँ कहते हैं कि पापका हेतु युद्ध नहीं है, प्रत्युत अपनी कामना है । अतः कामनाका त्याग करके तू युद्धके लिये खड़ा हो जा ।]
‘सुखदुःखे समे .... ततो युद्धाय युज्यस्व’—युद्धमें सबसे पहले जय और पराजय होती है, जय-पराजयका परिणाम होता है—लाभ और हानि तथा लाभ-हानिका परिणाम होता है—सुख और दुःख । जय-पराजयमें और लाभ-हानिमें सुखी-दुःखी होना तेरा उद्देश्य नहीं है । तेरा
उद्देश्य तो इन तीनोंमें सम होकर अपने कर्तव्यका पालन करना है ।
युद्धमें जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःख तो होंगे ही । अतः तू पहलेसे यह विचार कर ले कि मुझे तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है, जय-पराजय आदिसे कुछ भी मतलब नहीं रखना है । फिर युद्ध करनेसे पाप नहीं लेगीगा अर्थात् संसारका बन्धन नहीं होगा ।
सकाम और निष्काम—दोनों ही भावोंसे अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करना आवश्यक है । जिसका सकाम भाव है, उसको तो कर्तव्यकर्मके करनेमें आलस्य, प्रमाद