समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
दादाश्री : वह तो कर्म के उदय आपको खींचते हैं न! अभी तो आपको देखना पड़ेगा कि कर्म के उदय यहाँ खींच रहे हैं। सभी की ओर नहीं खींचते। चार बैठी हों तो एक के प्रति आकृष्ट होता है बाकी पर नहीं। यानी हिसाब है, पहले का, पिछला।
प्रश्नकर्ता : ऑफिस में काम कर रहे हों तब, जब वह व्यक्ति गुज़रे तभी अपनी नज़र ऊपर उठती है।
दादाश्री : हाँ, यानी वहाँ पर हिसाब है। इसलिए वहाँ पर प्रतिक्रमण करते रहना है। अतिक्रमण से वहाँ लिपटा हुआ है और प्रतिक्रमण से तोड़ दो। अतिक्रमण यानी पहले जो दृष्टियाँ की हैं, उनके प्रतिक्रमण करेंगे तो खत्म हो जाएगा।
जब तक दृष्टि में किसी भी चीज़ पर आकर्षण है, तब तक उसे मोह है। वह मोह गया। दर्शनमोह गया, चारित्रमोह रहा। वह तो कुछ देखते ही यदि बदलाव हो जाता हो तो दीवार को देखकर क्यों नहीं होता? बीच में कोई जानवर है, जो ऐसे बदलाव करवाता है। कौन सा जानवर? मोह नामक!
प्रश्नकर्ता : वह तो जितनी खुद की जागृति हो, तब पता चलता है कि अंदर कुछ बदलाव हुआ है, वर्ना कितना कुछ हो जाता है फिर भी पता नहीं चलता कि यह बदलाव हुआ है। पता ही नहीं चलता।
दादाश्री : जिसे भान ही नहीं है, उसे पता कैसे चलेगा? यह क्या हो रहा है? उसका भी भान नहीं है।
आकर्षण और मोह नहीं होने चाहिए। फिर बाकी गुनाह माफ कर देते हैं, आँवर फलो हुआ हो या ऐसा वैसा कुछ हुआ हो तो उसे माफ कर देते हैं हम। हमें ऐसा कुछ नहीं है कि आपको गुनहगार ही बनाना है। हम समझते हैं कि घर में रहकर इस तरह रहना मुश्किल है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन रहा जा सकता है।
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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दादाश्री : रहा जा सकता है लेकिन उनकी अलग टोली हो, उसकी बात ही अलग है!
प्रश्नकर्ता : इस वातावरण में हो, तब तक सतर्कता रखना ताकि परीक्षा तो हो जाए न?
दादाश्री : सचमुच का टेस्ट होगा लेकिन अपना ज्ञान ऐसा है कि जरा सा आकर्षण हो जाए तो यों बीज पड़ा कि उखाड़कर फेंक देता है, तुरंत! फिर प्रतिक्रमण कर देता है, तुरंत ही। अपना विज्ञान इतना सुंदर है।
जहाँ आकर्षण है, वहाँ जोखिम समझ
स्त्री या विषय में रमणता की जाए, ध्यान किया जाए, निदिध्यासन किया जाए तो वह गाँठ पड़ जाएगी, विषय की। फिर कैसे खत्म होगी वह? तो वह यह कि, विषय विरुद्ध विचारों से खत्म हो जाएगी। इंसान केवल एक इतना ही संभाल ले तो कोई भी विषय-आकर्षण हो जाए तो अगर वहाँ पर तुरंत ही प्रतिक्रमण कर ले तो आगे उसका खाता बिल्कुल साफ रहेगा। जरा दो मिनट भी देर कर दे तो फिर उग निकलेगा। अतः यह तो प्रतिक्रमण से बंद होगा वरना यह तो बंद ही नहीं होगा न! फिर भी अगर पतन हो जाए तो जोखिमदारी नहीं रहेगी। लेकिन जहाँ पर भान ही नहीं रहे, वहाँ पर फिर आकर्षण हुआ तो फिर वहाँ सबकुछ ज्यों का त्यों पड़ा रहेगा। अतः देखते ही आकर्षण हो जाए, उसी के साथ उसका आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान और खराब विचारों को काटे तो बच सकेंगे, वरना कोई बचेगा ही नहीं इससे। यानी बहुत गहरा गड़ड़ा है यह तो।
यह आकर्षण क्यों होता है कि पहले की अज्ञानता से। हमें समझ नहीं थी इसलिए उसके साथ रमणता की थी, इसलिए फिर से आकर्षण खड़ा हो जाता है। अतः हमें समझ जाना चाहिए कि अब इसका कुछ हिसाब है।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : वह पता तो चलता है लेकिन फिर भी बार-बार विचार आते रहते हैं।
दादाश्री : हाँ। लेकिन विचार आएँ तो फिर से उन्हें, वे जो विचार आएँ, उन सबको तोड़ना पड़ेगा। जैसे-जैसे आते जाएँ, वैसे-वैसे तोड़ते जाना है, आते जाएँ वैसे-वैसे तोड़ते जाना है। हर एक को देखकर प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता : वह समझ में तो आता है कि कितनी बड़ी गलती की थी!
दादाश्री : लेकिन गलती तो की, थी तभी तो अंदर आया न! एक विचार तक भी आए तो उसे कैसे तोड़ना, उतना आना चाहिए! उसे उसमें पूरा दिन गुज़ारना पड़ेगा, दो-दो घंटे। तब छेदन होगा वर्ना नहीं। उन्हें(कर्म) बाँधते समय कुछ सोचा ही नहीं था न! पूरी रात उल्टा लेटकर फिर पूरी रात विचार करता रहा।
प्रश्नकर्ता : ‘उल्टे लेटकर विचार करते हैं’ इसका मतलब समझ में नहीं आया।
दादाश्री : उसे कुछ अट्रैक्टिव लगा इसलिए फिर वहाँ वह उल्टा लेटकर सोचता ही रहता है। बाद में वह रमणता करता रहता है। अब वह तो चली गई तो अब क्यों रमणता कर रहा है? भाई उल्टा लेटकर रमणता करता है, अंदर वह टेस्ट आता है न एक तरह का। अब यदि रमणता ब्रह्मचर्य में रहे, उससे फिर कार्य ब्रह्मचर्य होगा। पतन कब होता है? रमणता अब्रह्मचर्य रहे, तब से होता है।
तेरी इस तरह की कोई दखल नहीं है न, श्री विज्ञन रहता है न?
प्रश्नकर्ता : फिर भी कभी कभार कच्चा पड़ जाता है।
दादाश्री : ऐसा! उस समय बायें हाथ से दाहिने गाल पर
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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थप्पड़ मार देता है? ! तब क्या करता है? 'क्या समझता है?' कहकर एक लगा देना।
विषय रमणता की हो तो प्रतिक्रमण करके उसे धो देना। बाद में दांत-बांत तोड़ दें तो क्या दिखेगा, ऐसा सब देखना चाहिए। श्री विजन तो कहलाएगा न।
प्रश्नकर्ता : लेकिन श्री विजन देखने के बावजूद भी वह बार-बार याद आता है।
दादाश्री : यह याद, वह तो मन का काम है, तेरा क्या जाता है? तुझे 'देखते' ही रहना है।
प्रश्नकर्ता : तो इस पर से ऐसा लगता है कि अभी तक वह टूटा नहीं है।
दादाश्री : टूटेगा कैसे लेकिन? वह तो उसका सारा जोर निकल जाएगा, तब अलग होगा। तब तक जितना जोर भरा हुआ है, उसे हमें देखते ही रहना है।
प्रश्नकर्ता : लंबे समय तक विचार आईं तो उनमें तन्मयाकार हो जाते हैं।
दादाश्री : विचार तो आईंगे, वह तो, जितना लंबा है उतने विचार आते ही रहेंगे। उनका हिसाब खत्म हो जाएगा तो मन बंद हो जाएगा, वह फिर दूसरा पकड़ लेगा।
प्रश्नकर्ता : लेकिन वह हिसाब कब पूरा होगा?
दादाश्री : अभी तो बहुत सारा है। बेहिसाब। अभी तो कोई हिसाब ही नहीं है। अभी तो इस पहाड़ का पहला पत्थर हटा है। लेकिन जो यहाँ से तुरंत काट दे, उसके लिए फिर कुछ खास नहीं रहेगा। दिखाई दे, तभी से प्रतिक्रमण करे और फिर किसी रमणता में नहीं पड़े, रात को, कहीं भी। जरा सा भी उसका विचार
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आया कि रमणता में पड़ा नीचे, स्लिप हुआ कहलाएगा। रमणता से ही ये सारे दोष खड़े हुए हैं न! इसलिए उल्टे होकर फिर उसमें भोग लेते हैं, वह मैं देखता हूँ न!
दृष्टि बदलने के बाद रमणता शुरू होती है। दृष्टि बदले तो उसका भी कारण है। उसके पीछे पिछले जन्म के कॉजेज हैं। इसलिए हर किसी को देखकर दृष्टि नहीं बदलती। कुछ खास लोगों को देखे, तभी दृष्टि बदलती है। कॉजेज हों, उसका पहले का हिसाब चल रहा हो और बाद में रमणता हो जाए तो समझना कि बहुत बड़ा हिसाब है। अतः वहाँ पर अधिक जागृति रखना। उसके सामने प्रतिक्रमण के तीर चलाते रहना। आलोचना-प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान, जबरदस्त रहने चाहिए।
नियम आकर्षण - विकर्षण के
स्पर्श हो जाए या ऐसा वैसा कुछ हो जाए तो आकर मुझे बता देना तो मैं तुरंत साफ कर दूँगा।
प्रश्नकर्ता : नहीं। वह कभी भी, कहीं भी नहीं।
दादाश्री : लेकिन गलती से ऐसा हो जाए तो आकर तुरंत मुझे बता देना क्योंकि एक ही टच से अंदर इलेक्ट्रिसिटी का जो अट्रैक्शन होता है, वह इलेक्ट्रिसिटी फिर हमें निकालनी पड़ेगी।
प्रश्नकर्ता : मैं कितने सालों से मार्क कर रहा हूँ कि मैं बैठा होऊँ तो मेरे नजदीक कोई स्त्री आती ही नहीं है। मुझसे यों दूर ही रहती है!
दादाश्री : बहुत अच्छा। इतना अच्छा है। बड़ा पुण्य लेकर आए हो।
प्रश्नकर्ता : मैं किसी भी स्त्री के साथ बात करता हूँ, जान-पहचानवाली हो या कोई और हो, लेकिन उसके सामने कभी भी यों नज़र मिलाकर बात नहीं करता।
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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दादाश्री : ठीक है। वह बहुत अच्छा है। यह तो मैं तुम्हें सावधान कर रहा हूँ कि कभी यों गलती से हाथ लग जाए न, तो मुझे बताना, स्त्री जाति जान-बूझकर छू जाती है, कई बार तो।
प्रश्नकर्ता : वह इलेक्ट्रिसिटी कैसी होती है? आपने कहा न कि 'इलेक्ट्रिसिटी ऐसी होती है कि मुझे धोनी पड़ेगी।'
दादाश्री : उसके परमाणुओं का असर हो जाता है। अट्रैक्शन के परमाणु बढ़ते जाते हैं और आँखों से देखा, उसके परमाणु सूक्ष्म होते हैं और सूक्ष्म में से स्थूल खड़ा होता है और फिर उसमें से आकर्षण होता है। आकर्षण बढ़ता ही जाता है। आकर्षण बढ़कर फिर उसका विकर्षण होता है। विकर्षण शुरू होना हो, तब पहले कार्य होता है। फिर विकर्षण होता रहता है। कार्य शुरू हुआ, तभी से विकर्षण शुरू होता है। कार्य की शुरुआत तक आकर्षण होता रहता है और कार्य पूरा हो जाने पर विकर्षण होता रहता है। परमाणुओं का अट्रैक्शन ऐसा हैं।
अब दिक्कत नहीं आएगी। दादा मेरे साथ हैं, ऐसे बोलोगे तो भी राह पर आ जाएगा।
प्रश्नकर्ता : परमाणुओं का यह नया विज्ञान बताया।
दादाश्री : यह सब कहने जैसा नहीं है। बाहर कहने जैसा नहीं है। यह तो निजी तौर पर लोगों को जितनी जरूरत हो, उतनी ही बात करते हैं और बाहर बताने का क्या अर्थ है? लोग, जगत् छूए बिना रहनेवाला नहीं है।
प्रश्नकर्ता : तो उस स्पर्श से परमाणु उसे नीचे कहाँ तक घसीटकर ले जाते हैं?
दादाश्री : हाँ, मतलब परमाणु का अट्रैक्शन ही सब काम करता है। उस बेचारे के तो हाथ में ही नहीं रहती सत्ता और जब विकर्षण होता है, तब उसे अलग नहीं होना हो फिर भी
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वे परमाणु ही खुद विकर्षण करवाते हैं, अलग करवा देते हैं।
प्रश्नकर्ता : विकर्षण होता है तब खुद परमाणु ही अलग करवा देते हैं।
दादाश्री : हाँ, खुद ही विकर्षण करवा देते हैं, उसे अमल देकर।
प्रश्नकर्ता : मतलब वह कैसे?
दादाश्री : उसका अमल फल देकर और खुद ही विकर्षण रूपी बन जाता है।
प्रश्नकर्ता : अर्थात यह उसका नियम ही है कि यदि आकर्षण हुआ तो फिर उसका ऐसा विकर्षण परिणाम आएगा ही।
दादाश्री : आकर्षण-विकर्षण, यह नियम ही है। आकर्षण कब तक कहलाएगा? विकर्षण जब तक इकट्ठा नहीं होता, तब तक फल नहीं देता है। विकर्षण का संयोग इकट्ठा हुआ कि फल देना शुरू कर देगा।
प्रश्नकर्ता : आकर्षण फल देना शुरू कर दे तो, उसके बाद क्या होता है?
दादाश्री : फिर खत्म हो गया! इंसान मर ही गया। आप ब्रह्मचर्य के निश्चयवालों को कोई परेशानी नहीं है।
एक बार भोगा कि गया
यह विषय ऐसी चीज़ है कि जिस तरह मन और चित्त जा रहे हों, उन्हें उस तरह नहीं रहने देता। और एक बार इसमें पड़ा कि इसी में आनंद मानकर चित्त का वहाँ जाना बढ़ जाता है। 'बहुत अच्छा है, बहुत मजेदार है' ऐसा मानकर निरे अनगिनत बीज डल जाते हैं।
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प्रश्नकर्ता : कईयों को तो इसमें रुचि ही नहीं होती, रुचि उत्पन्न भी नहीं होती और कईयों में वह रुचि बहुत अधिक भी होती है। वह पहले का लेकर ही आया होता है न?
दादाश्री : सिर्फ यह विषय ही ऐसा है कि इसमें बहुत गड़बड़ हो जाती है। एक बार विषय भोगा कि फिर उसका चित्त वहीं का वहीं जाता है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन वह पूर्व का लेकर आया होता है न वैसा?
दादाश्री : उसका चित्त वहीं का वहीं जाता है, वह पूर्व का लेकर नहीं आया। लेकिन फिर उसका चित्त निकल ही जाता है, हाथ से! खुद मना करे फिर भी निकल जाता है। इसलिए अगर ये लड़के ब्रह्मचर्य के भाव में रहें तो अच्छा है और फिर अपने आप जो स्वलन होता है, वह तो गलन कहलाता है। रात में हो गया, दिन में हो गया, वह सब गलन कहलाता है लेकिन इन लड़कों को यदि एक ही बार विषय छू गया हो न तो फिर दिन-रात उसी के सपने आते रहेंगे।
प्रश्नकर्ता : ये जो खराब विचार आते हैं, वे भी चित्त के बगैर आ सकते हैं?
दादाश्री : हाँ, चित्त का और विचार का कोई लेना-देना नहीं।
प्रश्नकर्ता : ऐसा मान लें कि 'मुझे बाहर से किसी चीज़ का विचार आया तो वह बाहर की चीज़ अपने चित्त का हरण करती है।' ऐसा है या नहीं?
दादाश्री : नहीं, उन दोनों चीज़ों का बैलेन्स नहीं है। यह हो तो यह होगा ही, ऐसा संभव नहीं है। शायद हो सकता है, लेकिन यह हो तो यह होगा ही, ऐसा नहीं है। कई बार सिर्फ
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विचार होते हैं, चित्त का हरण शायद न भी हुआ हो। कई बार चित्त गया हो लेकिन विचार में न भी हो। ऐसा हो सकता है और नहीं भी हो सकता।
मुक्त दशा का शर्मामीटर
तुझे ऐसा अनुभव है कि जब विषय में चित्त जाता है, तब ध्यान ठीक से नहीं रह पाता?
प्रश्नकर्ता : चित्त यदि जरा भी विषय के स्पंदनों को टच करके रहे तो कितने ही समय तक तो खुद की स्थिरता नहीं रहने देता और चित्त उसे छूकर वापस अलग हो गया हो तो खुद की स्थिरता नहीं जाती। वह यदि एक ही बार यों ‘टच’ हुआ हो, वह भी स्थूल में नहीं लेकिन सूक्ष्म में भी हुआ हो, तो भी वह कितने ही समय तक हिलाकर रख देता है।
दादाश्री : हमारा चित्त कैसा होगा?! वह कभी भी जगह से हटा ही नहीं है! हम बोलते हैं तब निरंतर यों मुरली की तरह डोलता रहता है। तब जाकर चित्त की प्रसन्नता उत्पन्न होती है। वर्ना मुँह खिंचा हुआ रहता है, जुबान भी खिंची हुई रहती है। लोग तो आँखें पढ़कर ही बता देते हैं कि ‘यह खराब दृष्टिवाला है।’ जिसकी जहरीली दृष्टि हो उसके लिए भी लोग बता देते हैं कि ‘इसकी आँखों में जहर है।’ उसी तरह यह भी समझ सकते हैं कि आँखों में वीतरागता है। लोग सबकुछ समझ सकते हैं, लेकिन दाल-चावल-रोटी-सब्जी खाकर सोचेंगे तो!! लेकिन खाकर सो जाएँ तो नहीं समझ सकेंगे।
मैं क्या कहना चाहता हूँ कि पूरी दुनिया में घूमो। लेकिन यदि कोई भी चीज आपके चित्त का हरण नहीं कर सके तो आप स्वतंत्र हो। कितने ही सालों से मैंने अपने चित्त को देखा है कि कोई चीज इसे हरण नहीं कर सकती इसलिए फिर मैं अपने आप समझ गया कि, ‘मैं बिल्कुल संपूर्ण स्वतंत्र
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हो चुका हूँ।' मन में भले ही कैसे भी खराब विचार आएँ लेकिन उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन चित्त का हरण तो होना ही नहीं चाहिए।
भटकती वृत्तियाँ चित्त की
चित्त वृत्तियाँ जितनी भटकेंगी, उतना ही आत्मा को भटकना पड़ेगा। चित्त वृत्ति जिस जगह जाएगी, उसी जगह आपको भी जाना पड़ेगा। चित्त वृत्ति नक्शा बना देती है। अगले जन्म के लिए आने-जाने का नक्शा बना देती है। फिर उस नक्शे के अनुसार हमें घूमना पड़ता है, तो कहीं-कहीं घूम आती होंगी चित्त वृत्तियाँ?
प्रश्नकर्ता : लेकिन चित्त भटके तो उसमें हर्ज क्या है?
दादाश्री : चित्त जैसी प्लानिंग (योजना) करेगा, उस अनुसार हमें भटकना पड़ेगा। इसलिए जिम्मेदारी अपनी है, जितना भी भटकता रहेगा उसकी!
चित्त चेतन है, वह जहाँ-जहाँ चिपका, वहाँ-वहाँ भटकते, भटकते, भटकते ही रहना पड़ेगा!
प्रश्नकर्ता : चित्त हर कहीं नहीं चिपक जाता, लेकिन अगर एक जगह चिपक जाए तो क्या वह पहले का हिसाब है?
दादाश्री : हाँ, हिसाब है तभी चिपकता है। लेकिन अब हमें क्या करना चाहिए? पुरुषार्थ वह कि जहाँ हिसाब हो वहाँ पर भी नहीं चिपकने दे। चित्त जाए लेकिन धो दिया तो, तब तक वह अब्रह्मचर्य नहीं माना जाता। लेकिन अगर चित्त जाए और धोए नहीं तो वह अब्रह्मचर्य कहलाता है। इसीलिए कहा है न, 'इसलिए सावधान रहना मन-बुद्धि, निर्मल रहना चित्तशुद्धि।' मन-बुद्धि को सावधान करते हैं। अब हमें चित्तवृत्ति निर्मल रखने के लिए क्या करना पड़ेगा? आज्ञा में रहना पड़ेगा। हमारा चित्त संपूर्णतः शुद्ध रहता है, इसलिए फिर कुछ छूता भी नहीं है और बाधा
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भी नहीं डालता। आप जैसे-जैसे आज्ञा में रहते जाओगे, वैसे-वैसे पहले का जो छू चुका होगा, जैसे कि चंद्र ग्रहण लिखा होता है कि आठ बजे से एक बजे तक, मतलब आठ बजे शुरू होता है और फिर एक बजे के बाद फिर से चंद्र ग्रहण नहीं होता। उसी तरह आज्ञा में रहा करो ताकि जो ग्रहण हो गया है, वह छूट जाए और नया जोखिम उड़ जाए तो फिर कोई परेशानी नहीं रहेगी न!
चित्त की पकड़, छूटती है ऐसे...
जो चित्त को डिंगा दे, वे सभी विषय हैं। ज्ञान से बाहर जिस-जिस चीज़ में चित्त जाता है, वे सभी विषय हैं।
प्रश्नकर्ता : आपने कहा कि भले ही कैसे भी विचार आएँ, उसमें हर्ज नहीं है लेकिन चित्त वहाँ पर जाए, उसमें हर्ज है।
दादाश्री : हाँ, चित्त का ही झंझट है न! चित्त भटकता है, वही झंझट है न! विचार तो चाहे कैसे भी हों, उसमें हर्ज नहीं है लेकिन इस ज्ञान के मिलने के बाद चित्त विचलित नहीं होना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : यदि कभी ऐसा हो जाए तो उसका क्या?
दादाश्री : हमें वहाँ पर फिर ऐसा पुरुषार्थ करना पड़ेगा कि 'अब ऐसा नहीं होगा'। पहले जितना जाता था, उतना ही अभी भी जाता है?
प्रश्नकर्ता : नहीं, उतना स्लिप नहीं होता, फिर भी पूछ रहा हूँ।
दादाश्री : नहीं, लेकिन चित्त तो जाना ही नहीं चाहिए। मन में भले ही कैसे भी विचार आएँ, लेकिन उसमें हर्ज नहीं है। उन्हें हटाते रहो। उसके साथ बातचीत का व्यवहार करो कि फलाना मिलेगा तो वह सब कब करोगे? उसके लिए गाड़ियाँ, मोटरें वगैरह कहाँ
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से लाएँगे? या फिर सत्संग की बात करेंगे तो मन वापस नये विचार दिखाएगा।
पहले जिन पर्यायों का खूब वेदन किया हो, अभी वे अधिक आते हैं तब चित वहीं चिपका रहता है। जैसे-जैसे वह चिपकाव, पकड़ धुलती जाएगी, वैसे-वैसे फिर चित वहाँ पर ज्यादा नहीं रहेगा। चिपकेगा और अलग हो जाएगा। अटकण आए न तो, वहीं चिपका रहता है। तब हमें क्या कहना चाहिए? तुझे जितने नाच करने हों, उतने कर। अब 'तू जेय और मैं ज्ञाता' इतना कहते ही वह मुँह फेर देगा। वह नाचेंगे तो जरूर, लेकिन उनका टाइम होगा उतनी ही देर नाचेंगे। फिर चले जाएँगे। आत्मा के सिवा इस जगत् में और कुछ भी अच्छा नहीं है। यह तो, पहले जिससे परिचय किया हुआ हो, पहले का वह परिचय अभी गड़बड़ करवाता है।
चित अधिक से अधिक किस में फँसता है? विषय में! और जितना चित फँसा, उतना ही ऐश्वर्य टूट गया। ऐश्वर्य टूटा कि जानवर बन गया। अतः विषय ऐसी चीज़ है कि उसी से सारा जानवरपन आया है। मनुष्य में से जानवरपन, विषय के कारण ही आया है। फिर भी हम क्या कहते हैं कि यह तो पहले का भरा हुआ माल है, वह निकलेगा तो सही लेकिन अगर वापस नये सिरे से संग्रह न करो तो वह उत्तम कहलाएगा।
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[ १ ]
‘फाइल’ के सामने सख्ती
विकारी दृष्टि के सामने ढाल
प्रश्नकर्ता : वह यदि मोह का जाल डाले तो उससे कैसे बचें?
दादाश्री : तुम्हें नजर ही नहीं मिलानी है। तुम्हें पता है कि यह जाल खींच लेगा, तो उसके साथ नजर ही नहीं मिलानी है।
प्रश्नकर्ता : लेडीज के साथ नजर से नजर नहीं मिलानी चाहिए?
दादाश्री : हाँ, नजर से नजर नहीं मिलानी चाहिए और जहाँ तुम्हें लगे कि यहाँ तो फँसाव ही है, तो वहाँ पर तो उससे मिलना ही नहीं चाहिए। तुम्हें तुरंत ऐसा पता चल जाएगा न कि यह बुरी है?
प्रश्नकर्ता : व्यवहार में जो अपने जान-पहचानवाले होते हैं, वे आकर हम से बात करें तो उसका हमें समभाव से निकाल करना चाहिए, लेकिन उसमें उसकी दृष्टि खराब हो तो हमें क्या करना चाहिए?
दादाश्री : तो तुम्हें नीची नजर रखकर सारा काम करना चाहिए। छोटी उम्र के हो, इसमें और कुछ नहीं समझते, उसके सामने ऐसा कर देना चाहिए कि और उसे ऐसा ही लगे कि यह
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खंड-2-९)
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कुछ समझता ही नहीं है, तो फिर फिर वह चली जाएगी। तुझे कोई ऐसी मिल जाए, तो वह ऐसा समझेगी कि यह सब समझ गया है? क्या तू ऐसा बताने जाता है? वह सब बेवकूफी कहलाएगी।
व्यापारी का बेटा व्यापार करने बैठता हो तो सौ रुपये की चीज़ की कीमत सौ रुपये के बदले अठारसी रुपये बोल दे तो फिर वह ग्राहक कहेगा, ‘माल बताओ।’ तब वह लड़का समझ जाता है कि बोलने में मेरी गलती हो गई है, तो फिर वह क्या करेगा? उन्हें कहेगा कि, ‘ऐसा माल छियासी में मिलेगा और दूसरा छियासठवाला भी है और एक सौ पाँच रुपयेवाला भी है’ ऐसा सब बोलने से गलतियाँ सब खत्म हो जाएँगी और वह समझ जाएगा कि यह बात पूरी अलग है। उसी तरह इसमें भी सामनेवाले इंसान को पता चल जाता है कि यह माहिर नहीं है। हम माहिर हैं या नहीं, ऐसा वह एक बार देख लेती है। ऐसा पता चल जाए कि माहिर नहीं है, तो राह पर आ जाएगा, फिर वह छोड़ देगी और बेवकूफ बन जाए तो उसका सब चला जाएगा। वह फँसा देगी। यदि अपना मन परेशान हो जाए तो हमें बुद्धि का इस्तेमाल करना है कि ‘तुझ में अकल नहीं है।’ ऐसा कहेंगे तो वह अपने आप ही भाग जाएगी लेकिन अगर भाग गई, तो फिर दवाई लगानी पड़ेगी। इस तरह भगाने में फायदा नहीं है, लेकिन वह तो अगर और कोई चारा नहीं हो तो। अपना मन परेशान हो जाए, तब ऐसा करना पड़ता है। वनाँ ऐसे के साथ नजर ही नहीं मिलाएँ तो बहुत हो गया। सब से अच्छा नजर ही नहीं मिलानी चाहिए। नीचे देखकर चलना, आगे-पीछे हो जाना, वे सब सरल मार्ग है।
आकर्षण में बह मत जाना, जहाँ आँखें आकृष्ट हों, वहाँ से दूर ही रहना। जहाँ सीधी आखें हों, ऐसी सब जगह व्यवहार करना लेकिन जहाँ आँखें आकर्षित होने लगेँ, वहाँ पर जोखिम है, लाल बत्ती है। किसी के भी साथ नजरें मिलाकर बात मत करना, नजरें नीची रखकर ही बात करनी चाहिए। दृष्टि से ही बिगड़ता है। उस
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दृष्टि में विष होता है और फिर विष चढ़ जाता है। अतः यदि दृष्टि गड़ गई हो और नज़र खींच गई हो तो तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। इसमें तो सावधान ही रहना चाहिए। जिसे यह जीवन बिगड़ने नहीं देना है, उसे बिवेयर रहना चाहिए। जान-बूझकर कोई कुएँ में गिरता है क्या?!
विकारी चंचलता
अपने यहाँ कोई चाय पीए, खाए, सबकुछ करे फिर भी बाहर धर्मध्यान रहता है और अंदर शुक्लध्यान रहता है। किसी को ही, निकाचित् कर्मवाला हो, उसी का मन विकारी हो जाता है, तब वह फिसल गया कहलाता है। निकाचित् कर्मवाला कोई हो सकता है, इसमें। उसे विकारी विचार आते हैं। वह चंचलतावाला होता है। चंचल हो चुका होता है। चंचल को आप पहचानते हो या नहीं पहचानते? इधर देखता है, उधर देखता है। उसे कहें कि 'भाई, क्यों ऐसे हो रहे हो।' तो वह इसलिये कि विकारी विचार आया इसलिये चंचल हो गया और इस कारण से धर्मध्यान और शुक्लध्यान दोनों चले जाते हैं। बाकी अपने महात्माओं को धर्मध्यान और शुक्लध्यान दोनों रहते हैं। फिर भले ही खाए-पीए, ओढ़कर सो जाए, लेटकर सो जाए।
ऐसे निकाचित् कर्मवाले को हमसे पूछना चाहिए कि 'हमें क्या करना चाहिए? अब कौन सी दवाई लगाएँ?' बहुत गहरे घाव हो जाते हैं। ऐसे कर्मवाले हों तो हमें पूछने में हर्ज नहीं है। वह अकेले में पूछे तो हम दवाई बता देंगे कि यों दवाई लगाना ताकि घाव भर जाएँ।
फाइल बन गई, वहँ...
प्रश्नकर्ता : एक ही स्त्री से संबंधित विचार बार-बार आएँ तो क्या ऐसा समझना है कि उसके प्रति राग है?
दादाश्री : वह बाँधी हुई फाइल है। अब, अगर विचार आएँ
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खंड-2-९)
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वह फिर चले जाएँ और उसके बाद कुछ भी नहीं हो तो इसका मतलब उसे अभी तक फाइल नहीं बनाया है, अभी तक नई फाइल नहीं लाए हो। जबकि जिसके बारे में बार-बार विचार आते रहें, वह तो बाँधी हुई फाइल है, कितने ही केस हैं अंदर।
प्रश्नकर्ता : पहले कभी भी मिले नहीं हों, पहचान नहीं हो, सिर्फ आधे घंटे की ही मुलाकात हो, वैसे।
दादाश्री : उसी को फाइल कहते हैं। फाइल मतलब जो अपने दिमाग में घुस जाए। वे सब फाइल कहलाते हैं।
प्रश्नकर्ता : यह तो भूत की तरह घुस गया है।
दादाश्री : हाँ, भूत की तरह घुस जाता है।
प्रश्नकर्ता : उसके उपाय में प्रतिक्रमण तो चल ही रहे है।
दादाश्री : बस वही। दूसरा कोई उपाय नहीं है और वहाँ पर बहुत ही सावधान रहना पड़ता है, बहुत जागृति रखनी पड़ती है। तेरा ऐसा कुछ तो नहीं है न!
प्रश्नकर्ता : तीन-चार दिन से वही विचार आ रहे हैं भूत की तरह, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
दादाश्री : वह तो बल्कि अच्छा है, तीन-चार दिन से, लेकिन हमारी मौजूदगी में आ रहे हैं न? यहाँ हमारे पास हो तब आ रहे हैं न? बहुत अच्छा, निबेड़ा आ जाएगा। निकल जाएगा। जब सत्संग नहीं हो और अकेले हों, तब अगर यह सब आए, तो फिर वे दूसरी कल्पना करेंगे।
प्रश्नकर्ता : बुद्धि वापस ऐसी कल्पना करती है। लेकिन मैं हटा देता हूँ।
दादाश्री : फिर दूसरी कल्पना करती है।
प्रश्नकर्ता : शादी तक की।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : हाँ। सब करती है, इसलिए सावधान रहना है। अब बिवेयर बोर्ड लगाना, चोर जेब में से लूट ले जाए, उसमें हर्ज नहीं है। वह सब तो फिर से आ जाएगा लेकिन ऐसे लुट गया! एक दिन का क्या फल मिलता है, अगर सचमुच लुट जाए तब? एक दिन में ऐसे लुट जाए तो क्या फल मिलेगा?
प्रश्नकर्ता : पाशवता कहलाएगी, अधोगति।
दादाश्री : है। बिवेयर लिखकर रखना, हर कहीं। बाकी कही पूरी दुनिया के साथ नहीं संभालना है। जहाँ आकर्षण हो रहा हो वहीं ध्यान रखना है। खींचनेवाला कौन? बहुत हुआ तो पाँच, दस या पंद्रह होते हैं। ज्यादा नहीं होते, उतना ही ध्यान रखना है। औरों की तो गोदी में बैठेंगे फिर भी आकर्षण नहीं होगा। इतनी सेफ साइडवाला जगत् है यह। तुम्हारे पाँच, दस या पंद्रह होंगी, बहुत छैल छबीला होगा तो उसकी पचास होंगी।
सामने 'फाइल' आए, तब...
प्रश्नकर्ता : कभी-कभी यह समझ नहीं रह पाती।
दादाश्री : अपना फोर्स टूट जाएगा तो वह समझ चली जाएगी। अपना निश्चय टूट जाएगा तो समझ चली जाएगी। अपने निश्चय से ही रह पाएगी। वर्ना पुद्गल ऐसा नहीं है बेचारा। पुद्गल को अच्छा-बुरा नहीं लगता। वह तो अगर 'बहुत अच्छी चीज, अच्छी चीज, अच्छी चीज है', ऐसा करे तभी वह धक्का मारेगा। 'खराब है, खराब है', ऐसा करें तो फिर वह टूट जाएगा। जहाँ मन खिंच रहा हो, वह फाइल आए, उस समय मन चंचल ही रहता है।
उस समय मन चंचल हो जाता है और मुझे अंदर बहुत दुःख होता है कि इसका मन चंचल हो गया था इसलिए मेरी नजर सख्त हो जाती है।
फाइल आए, उस समय अंदर हिलाकर रख देती है। ऊपर
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खं-2-९)
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जाता है, नीचे जाता है, ऊपर जाता है, नीचे जाता है। उसके विचार आते ही! वह तो अंदर निरी गंदगी भरी है, कचरा माल है। अंदर आत्मा की ही कीमत है!
फाइल गैरहाजिर हो और याद आती रहे तो बहुत जोखिम कहलाता है। फाइल गैरहाजिर हो और याद नहीं आए, लेकिन उसके आते ही तुरंत असर हो जाए, वह सेकन्डरी जोखिम। तुम्हें उसका असर होने ही नहीं देना है। स्वतंत्र बन जाने की जरूरत है। उस समय अपनी लगाम टूट ही जाती है। फिर लगाम रह नहीं पाती न!
लकड़ी की पुतली अच्छी
एक यही गलती नहीं होनी चाहिए। फाइल हो और संडास करने बैठो हो और कहे कि धो दो। तो क्या कहेंगे? धो देते हैं सब?
प्रश्नकर्ता : देखना ही अच्छा नहीं लगता तो धोना कैसे अच्छा लगेगा?
दादाश्री : तू तो धो भी देगा क्या? चाटेगा भी? मुझे लगता है! वह संडास करती हुई दिखे और फिर तुझे धोने को कहे, ‘वर्ना नहीं बोल्गी’ कहे तो?
प्रश्नकर्ता : चलेगा, नहीं बोलेगी तो।
दादाश्री : उस समय छोड़ देगा, तो आज ही छोड़ दे न?
इसलिए कृपालुदेव ऐसा लिखते हैं, ‘लकड़ी की पुतली तो अच्छी है।’ उसमें से संडास नहीं निकलती। निरी गंध है यह तो! उसका मुँह देखो तो वह भी बदबू मारता है। भ्रांति चढ़ जाती है न इसलिए नशा चढ़ जाता है। तब भान नहीं रहता। इसलिए फिर धिन नहीं आती।
प्रश्नकर्ता : सभी को इसका अनुभव है ही!
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : उस घड़ी जब संडास करने बैठी हो, तब देखे तो चंचल रहेगा या नहीं?
प्रश्नकर्ता : नहीं रहेगा। प्रेम टूट जाएगा।
दादाश्री : प्रेम है ही कहाँ यह? केवल साइकलॉजिकल इफेक्ट है। उस समय हमें लपेटते रहना पड़ेगा। ये सीधा लपेटा था, उसे उल्टा लपेटने से निकल जाएगा, खत्म हो जाएगा। 'मेरा, मेरा' करके चिपका था। अब 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करेगा तो चला जाएगा।
अग्नि और 'फाइल' एक से
जहाँ आकर्षण होता है, वहाँ जागृत रहो। आकर्षण नहीं हो रहा हो तो हर्ज नहीं है। बार-बार आकर्षण हो रहा हो तो समझना कि यह फाइल है।
प्रश्नकर्ता : कुछ फाइलों के प्रति आकर्षण होता है।
दादाश्री : सावधान रहकर चलना। अपना यह ज्ञान है तो ब्रह्मचर्यव्रत रह सकता है क्योंकि शुद्धात्मा को अलग कर दिया है इसलिए रह सकता है। वर्ना और कहीं नहीं रह सकता। दादा द्वारा दिया गया, 'मैं शुद्धात्मा हूँ' ऐसा कहते ही वह कम्प्लीट अलग हो जाता है। वह शंका रहित है। बाकी सब जगह शंकावाला।
प्रश्नकर्ता : 'खुद' अलग रहता है इसीलिए यह सब पता चल पाता है कि यह कोई फाइल आई और चंचलता हुई।
दादाश्री : हाँ, पता चलेगा ही न। वह अलग नहीं हुआ होता तो पता नहीं चल पाता, तन्मयाकार ही रहता। पता चलता है, हिल उठा है, ऐसा समझ में आता है। अब सब कैसे करना है, वह भी जानता है, सभी संयोग उसे (समझ में) आते हैं।
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खंड-2-९)
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तेरा ठीक रहता है या फिर सब यों ही? अभी भी चंचल हो जाता है न?
प्रश्नकर्ता : मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ ही नहीं।
दादाश्री : ऐसा हुआ है। मैं तो चंचलता को देखता हूँ न! तुझे पता नहीं चलता। देह चंचल हो जाए, वह तुझे पता नहीं चलता। मैं पहचान जाता हूँ न चंचलता को!
प्रश्नकर्ता : मन बिगड़ जाए, तब खुद को पता चलता है न?
दादाश्री : मन बिगड़े, विचार बिगड़े तो तुझे पता चल जाता है। लेकिन देह चंचल हो जाए तो वह पता नहीं चलता। देह चंचल हो जाती है। उसके सामने देखने की शक्ति होनी चाहिए। संडास में उसका रूप देख लेना चाहिए। सख्त ही रहना चाहिए। यह तो अच्छा लगता है। बिल्कुल सख्त, अग्नि समझकर अलग रहना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता : दादा कभी-कभार उल्टी साइड का कॉन्फिडेन्स बढ़ जाता है।
दादाश्री : उसमें चोर नीयत होती है। सख्त नहीं हुआ तो समझना कि यहाँ कमी है अभी। जिससे खुद को नुकसान होता है, उससे यदि दूर नहीं रहे न तो मूर्ख ही कहलाएगा न? और यह तो अधोगति कहलाती है। इस गलती को नहीं चला सकते। विषय-विकार और मृत्यु दोनों एक समान ही हैं।
काटो सख्ती से ‘उसे’
जिसकी फाइल बन ही चुकी हो, उसके लिए बहुत जोखिम है। उसके प्रति सख्त रहना चाहिए। सामने आ जाए तो आँखें दिखाना, तो वह फाइल डरती रहेगी। फाइल बन जाने के बाद तो बल्कि लोग चप्पल मारते हैं, तो वह फिर से मुँह दिखाना ही भूल जाता