समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खं-2-९)
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दादाश्री : दूसरी चिपक जाए तो दूसरी से छूटना। जिसे छूटना है, उसे सबकुछ आता है।
प्रश्नकर्ता : इसके अलावा, व्यवहार में जरूरत से ज्यादा ढूब जाएँ, धंधे-व्यापार में तो अपना ज्ञाता-दृष्टापन कम हो जाता है, ऐसा नहीं है न?
दादाश्री : व्यापार ऐसी फाइल नहीं है। यह तो दावा करे ऐसी फाइल है। वह दिन-रात तुम्हारे लिए सोचती रहेगी और तुम्हें दिन-रात बाँधती रहेगी। हम अपने घर हों तो भी व्यापार नहीं बाँधता या फिर जलेबी भी नहीं बाँधती, आम भी नहीं बाँधता। यह जो जीवित है, वह बाँधती है, इसमें क्लेम है न? तुम जो सुख दूँढ रहे हो उस तरफ का, तो कोई माँगेंगा मतलब यह क्लेमवाला है। सुख तो जलेबी खाई और अच्छी नहीं लगी तो फेंक दी। उसके अलावा क्या है? कोई दावा भी नहीं है जलेबी का, कोई हर्ज नहीं। ये सारी हमारी सूक्ष्म खोज हैं। वर्ना छूटेंगे कैसे?
तुझे ये बातें बहुत काम आएगी। कितने दिनों से मुझसे पूछता जा रहा है, ‘कैसे छूटना?’ लेकिन यों ही तो मुझसे कहा नहीं जा सकता, कभी ऐसा कुछ कहूँ तब समझ जाना। यह भी, अगर समझोगे तो हल आएगा, नहीं समझोगे तो फिर...
प्रश्नकर्ता : अब जल्दी हल लाने की जरूरत है।
दादाश्री : घर का बिगड़ेगा, घर में खड़ा नहीं रहने देंगे।
प्रश्नकर्ता : बाहर भी अगर बिगड़ गया तो सब जगह बिगड़ जाएगा।
दादाश्री : और घर पर भी फ्रैक्चर हो जाएगा। यहाँ पर भी सब फ्रैक्चर हो जाएगा।
पूरी रात मेरे लिए किसी को कुछ भी विचार आए कि
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
‘दादा ने मेरा ऐसा किया और वैसा किया। दादा ने मेरा नुकसान किया या दूसरी और व्यापार में ऐसे हुआ, फलाना हुआ,’ तो उससे बाँध लेता है, लेकिन मुझे उसके लिए ऐसा विचार आए, ऐसा मेरे पास है ही नहीं न, तो बाँधेगा कैसे? मैं वीतराग ही रहता हूँ, तो वह बाँधे कैसे? मैं वहाँ चिपकूँगा तब मुझे बाँधेगा। वहाँ वीतराग रहना है। छूटने का रास्ता यही है।
प्रश्नकर्ता : कैसे वीतराग रहते हैं?
दादाश्री : भले ही कुछ भी करके भी हमें उस प्रकृति के प्रति द्वेष भी नहीं और राग भी नहीं करना है। वह कहलाता है समभाव से निकाल! वह कितना भी खराब करे, उल्टा करे, नुकसान करे, यदि मैं उसे थोड़ा भी रिपेयर करने जाऊँ तो उसका मतलब इतना है कि मैं राग-द्वेष में पड़ा तो मुझे अभी भी जरूरत है, इच्छा है मेरी, राग-द्वेषवाली प्रकृति है। उसका समभाव से निकाल करने को कहा है।
उसका मन अपने प्रति राग में रहेगा तो बाँधेगा। ऐसा नहीं होना चाहिए। राग या द्वेष से लोगों के मन बाँधते हैं, लेकिन मेरे साथ सच्चे प्रेम से बाँधे तो बल्कि पूरे दिन शांति रहेगी। भगवान महावीर इसी तरह छूटे थे, वर्ना नहीं छूट पाते।
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[ १० ]
विषयी आचरण? तो डिसमिस
यहाँ किए हुए पाप से मिले नर्क
दृष्टि बिगड़े तब वह गलत कहलाता है। दृष्टि नहीं बिगड़े वह ब्रह्मचर्य कहलाता है। बाहर बिगड़े तो हर्ज नहीं। उसका भी प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। यहाँ तो सभी विश्वास से आते हैं न!
अन्य जगह पाप किए हों न, वे यहाँ आने से धुल जाते हैं, लेकिन यहाँ पर किया हुआ पाप नर्कगति में भुगतना पड़ता है। जो हो चुके हों उन्हें लेट गो करते हैं, लेकिन नया तो नहीं होने देना चाहिए न! जो हो चुका है, उसका फिर कुछ उपाय है क्या?
एक बार उल्टा काम हो जाए, अपने आप ही यहाँ से कहीं और चला जाए, मुँह दिखाने के लिए भी खड़ा न रहे। वर्ना फिर दुनिया उल्टी ही चलेगी न, ब्रह्मचर्य के नाम पर! यहाँ ऐसा नहीं चलेगा!
‘अन्य क्षेत्रे कृतम् पापम्, धर्म क्षेत्रे विनश्यति।’
बाहर जो संसार में पाप किया हों, वे धर्मक्षेत्र में जाने से नाश हो जाते हैं और ‘धर्मक्षेत्र कृतम् पापम् वज्रलेपो भविष्यति’ वे नर्कगति में ले जाते हैं। बाहर पाप करने और यहाँ पाप करने में बहुत फर्क है! यहाँ पर तो पाप का विचार तक नहीं आना चाहिए, वज्रलेप होता है। वज्रलेप यानी नर्क के बंधन बंधते हैं, भयंकर यातना भुगतनी पड़ती है!
२३४
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
नहीं शोभा देता वह
प्रश्नकर्ता : अभी भी ऐसे विचार और ऐसा क्यों हो जाता है?
दादाश्री : अंदर विचार ही भरे पड़े हैं। वे तो निकलेंगे, लेकिन आचरण में नहीं आना चाहिए। आचरण में आ गया तो बिल्कुल बंद फिर। हमेशा के लिए बंद कर देते हैं हम। ऐसे अपवित्र इंसान यहाँ चलेंगे नहीं न? विचार आएँ तो उन्हें देखनेवाले तुम हो।
प्रश्नकर्ता : वह तो ठीक है, सत्संग में तो ऐसा चलेगा ही नहीं।
दादाश्री : नहीं। नहीं चलेगा। यह तो बहुत पवित्र जगह है, यहाँ तो कभी ऐसा हुआ ही नहीं है।
ऐसों का आना तो हमेशा के लिए बंद ही कर देना चाहिए। कोई इतना विकारी होगा तभी ऐसा हो सकता है! आपको तो विचार आते ही तुरंत उसी समय देख लेना चाहिए। नहीं देख पाओ तो उसका पश्चाताप करना कि यह देख नहीं पाया इसलिए उसका पश्चाताप करता हूँ और अब तो सख्त कदम ही उठाना है, भले ही कोई भी हो लेकिन उसका आना बंद कर देना चाहिए। ऐसी पवित्र जगह! बाकी आचरण में ऐसा हो उसे, पहले एक-दो का आना बंद कर दिया था, तो देखो न अभी तक हमेशा के लिए आ ही नहीं पाते। मुँह भी नहीं दिखाते हैं न!!
पहले जो कुछ हो गया हो, यहाँ पर उस भूल को स्वीकार करना है, नये सिरे से तो होनी ही नहीं चाहिए न! अब इतना देखना है कि आचरण में नहीं आए। आचरण में कभी-भी नहीं आए और जो आचरण में आए, उसे हम यहाँ एडमिट नहीं करते।
इसलिए अपवित्र विचार आएँ तो खोदकर निकाल देना, विचार
विषयी आचरण? तो डिसमिस (खं-2-१०)
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आते ही। जिस तरह अपने खेत-बगीचे में कोई फालतू चीज़ उग जाए तो उसे निकाल देते हैं, उसी तरह उल्टी चीज़ को तुरंत उखाड़ देना चाहिए।
पाशवता करने से तो अच्छा शादी कर लेना। शादी करने में क्या हर्ज है? वह पाशवता अच्छी है, शादीवाली! शादी नहीं करना और गलत नखरे करना, वह तो भयंकर पाशवता कहलाती है, नर्कगति के अधिकारी! और वह तो यहाँ होना ही नहीं चाहिए न? शादी करना तो हक का विषय कहलाता है। सोचकर देखना, शादी करनी है या नहीं?
प्रश्नकर्ता : सवाल ही नहीं। नो चान्स।
दादाश्री : अभी जब तक पक्का नहीं हो जाता, तब तक डिसीजन नहीं लेना ही ठीक है, धीरे धीरे पक्का करने के बाद ही डिसीजन लेना।
फिसलना सहज, यदि एक बार फिसला
ब्रह्मचर्य भंग करना, वह बहुत बड़ा दोष है। ब्रह्मचर्य भंग हो जाए, तो मुश्किल है। थे वहाँ से गिर पड़े। दस साल से रोपा हुआ पेड़ हो और गिर जाए तो फिर आज ही रोपा हो, ऐसा ही हो गया न और वापस दसों साल व्यर्थ गए! और ब्रह्मचर्यवाला गिर गया। एक ही दिन गिर जाए तो खत्म हो गया।
और जो इंसान यहाँ से फिसला तो फिर वह जो फिसला, वह उतना हिस्सा फिर से जोर लगाएगा, वही हिस्सा फिर से उसे फिसलाएगा। फिर खुद के क्राबू में नहीं रह पाता। फिर क्राबू-कंट्रोल खो देता है, खत्म हो जाता है। वहाँ हम सावधान रहने को कहते हैं। ‘मर जाएगा,’ कहते हैं।
न हो संग संयोगी
जागृति रहती है न, अब? आनंद शुरू हो गया है न! वे
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
सब तो आनंद में आ गए। सभी के चेहरे पर नया ही तेज आ गया है। एक ही दीवार पार करे तो आनंद की शुरुआत हो जाती है और प्रकट हो जाता है तुरंत ही और अगर पार नहीं की और फिसल गया तो वहाँ पर फिर गाढ़ हो जाता है। फिर वापस उल्टा हो जाता है इसलिए कसौटी के टाइम पर संभाल लेना। पाताल फूटकर फिर आनंद उभरता रहता है!
अन्य कुछ भी हो जाए तो परेशानी नहीं है। संग संयोगी नहीं बन जाना चाहिए। बाकी कुछ हो जाए तो उसमें हर्ज नहीं है, उसका अर्थ ऐसा है कि वैसा हो तो बहुत हुआ इतनी फिक्र करने जैसा नहीं है लेकिन संयोग तो मूल्य है। स्त्री-पुरुष का संयोग, वह तो मूल्य ही है, तुम लोगों के लिए ऐसा ही है।
प्रश्नकर्ता : यानी कि मर जाएँ लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए।
दादाश्री : नहीं, वह मूल्य ही है। यों ही मूल्य हो गई क्योंकि जो आनंद प्रकट होनेवाला था, उसी समय फिसल गए। जैसे कि उपवास किया हो, तो थोड़े समय के बाद अंदर अच्छा हो जानेवाला होता है, लेकिन उससे पहले ही खा लेता है!
इसलिए सावधान रहना। वर्ना फिर से यह भूमिका नहीं मिलेगी। ऐसी भूमिका किसी काल में मिलनेवाली नहीं है इसलिए सावधान रहना। यह सब बिल्कुल भी चूकना मत और बहुत बड़ा हमला हो तो मुझे खबर कर देना और इसके अलावा कुछ और हो तो वह सब बताने की कोई जरूरत नहीं है। वह सब यूजलेस! स्त्री-पुरुष का संयोग नहीं होना चाहिए। बस इतना ही। बाकी सब को तो मैं लेट गो कर लूँगा।
प्रश्नकर्ता : यानी उसके जितना जोखिम नहीं है, बाकी सब में?
दादाश्री : नहीं, जोखिम नहीं। सबसे बड़ा जोखिम यही है। यह तो आत्महत्या ही है। उसमें तो पट्टी लगा सकते हैं, उसकी दवाई है।
विषयी आचरण? तो डिस्पिस (खं-2-१०)
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अभी तो, जितना खरा तप करोगे, उतना ही आनंद। यही तप करना है, और कोई तप नहीं। आमने-सामने छोटा हुल्लड हो जाए और खबर कर दें तो तुरंत प्रबंध हो जाता है। इस तरह से प्रबंध रखना है।
प्रश्नकर्ता : अब अंदर यों ब्रह्मचर्य का पक्का निश्चय हो ही गया है!
दादाश्री : तेरा निश्चय हो ही गया है। चेहरे पर नूर आ गया है न!
प्रश्नकर्ता : ज्ञान में थोड़ी कमी रह जाए तो हर्ज नहीं है, लेकिन ब्रह्मचर्य का तो बिल्कुल परफेक्ट (निश्चित) कर लेना है। यानी कम्लीट (संपूर्ण) निर्मूल ही कर देना है। फिर अगले जन्म का जोखिम नहीं रहेगा।
दादाश्री : बस, बस।
प्रश्नकर्ता : अभी तो दादा मिले हैं तो पूरा कर ही देना है।
दादाश्री : पूरा कर ही देना है। वह निश्चय डगमगाए नहीं, इतना रखना है। विषय का संयोग नहीं होना चाहिए। तुम से और कुछ भी होगा तो लेट गो करेंगे (चला लेंगे)। उसका इलाज बता देंगे। बाकी सभी गलतियाँ पाँच-सात-दस तरह की होंगी तो उसका सभी तरह का इलाज बता देंगे। उसका इलाज है, मेरे पास सभी प्रकार का इलाज है। लेकिन इसका इलाज नहीं है। नौ हजार मील आया और वहाँ पर नहीं मिला तो वापस लौट गया। अब नौ हजार पाँचसौ मील पर 'वह' था! यों वापस लौटने की मेहनत की, उससे अच्छा आगे बढ़ न! देखो न इसे निश्चय नहीं हुआ है, कितनी परेशानी है?
प्रश्नकर्ता : निश्चय तो है लेकिन गलतियाँ हो जाती हैं।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : दूसरी कोई गलतियाँ होंगी तो चला लेंगे। विषय संयोग नहीं होना चाहिए। लेकिन तुझे हमने इस गिनती में नहीं लिया है और जिसे गिनती में लिया हो, यह बात उसके लिए है। तू जब तेरा यह टेस्ट एक्ज़ामिनेशन देगा, तब तुझे गिनती में ले लेंगे। फिर तुझे भी डॉटिंगे। अभी तुझे नहीं डॉटिंगे। मजे कर। खुद के हित के लिए मजे करने हैं न? किस के लिए मजे करने हैं?
प्रश्नकर्ता : मजे करने में खुद का हित तो नहीं होता है।
दादाश्री : नहीं होता। तो फिर मजे क्यों करता है?
वहाँ पर दादा की मौन सख्ती
विषय में संयोग हुआ तो हमारी नज़र कड़वी हो जाती है, हमें तुरंत सबकुछ पता चल जाता है? 'दादा' की नज़र कड़वी रहती है, वह सिर्फ विषय के बारे में ही, बाकी चीज़ों में नहीं। बाकी चीज़ों में कड़वी नज़र नहीं रखते। दूसरी गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन 'यह' तो होनी ही नहीं चाहिए, अगर हो जाए तो हमें बता देना। रिपेयर कर देंगे, छुड़वा देंगे।
प्रश्नकर्ता : हर तरह से छूटने के लिए ही यहाँ दादा के पास आना है।
दादाश्री : उसमें हर्ज नहीं। इसीलिए तो इन आप्तपुत्रों से मैंने सब लिखवा लिया है ताकि मुझे नहीं निकालना पड़े, तुम्हें अपने आप ही चले जाना है।
वह विषय यदि 'संयोग' रूप में हो रहा हो न, तो उस पर हमारी कड़वी नज़र होने पर वह अपने आप ही छूट जाता है। ताप ही छुड़वा देता है। हमें डॉटना नहीं पड़ता। इतनी कड़वी नज़र पड़ती है, उस ताप की वजह से उसे रात को नींद तक नहीं आती। वह सौम्यता का ताप कहलाता है। प्रताप का ताप
विषयी आचरण? तो डिस्पिस (खं-2-१०)
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तो जगत् के लोगों के पास है। प्रताप तो, चेहरे पर तेज रहता है, ऐसे ब्रह्मचर्य भी अच्छा, शरीर बलवान होता है, वाणी ऐसी प्रतापवान, व्यवहार ऐसा प्रतापवान। प्रताप तो होता है संसार में, लेकिन सौम्यता का ताप नहीं होता किसी के पास। अब ये दोनों साथ में हों, तब जाकर काम होता है। सूर्य-चंद्र के दोनों गुण। सिर्फ प्रतापी पुरुष होते हैं, लेकिन कुछ ही, ज्यादा तो इस दृषमकाल में होते ही नहीं हैं न!
प्रश्नकर्ता : और अपना यह ज्ञान ही ऐसा है कि अंदर से ही यों जोर लगाकर सावधान करता रहता है।
दादाश्री : हाँ, वह जोर लगाता है।
प्रश्नकर्ता : यानी थोड़ा सा भी कुछ इधर-उधर हो जाए न, तो अंदर शोर मच जाता है कि 'यहाँ चूके, वापस लौटो यहाँ से।' मतलब अंदर सेफ की तरफ ही पूरा खींच लाता है हमें।
दादाश्री : हारने लगे तो मुझे बता देना। एक ही जन्म यदि अपवित्र नहीं हुआ तो मोक्ष हो जाएगा, हरी झंडी। अगर शादी कर लो तो भी हर्ज नहीं है। तब भी मोक्ष में दिक्कत नहीं आएगी।
प्रश्नकर्ता : हम इच्छापूर्वक किसी को छूएँ तो वह वर्तन में आया ऐसा कहा जाएगा न?
दादाश्री : इच्छापूर्वक छूना? तब तो वर्तन में ही आया कहलाएगा न। इच्छापूर्वक अंगारों को छूकर देखना न?!
प्रश्नकर्ता : समझ गया।
दादाश्री : उसके बाद अगर आगे की इच्छा तो, इच्छा होते ही वहाँ से निकाल ही देना चाहिए जड़ से, उगते ही, बीज उगते ही जान जाओ कि यह कौन सा बीज उग रहा है? तो वह है विषय का। तो तोड़कर निकाल देना है। वरना उसे छूते ही आनंद हुआ, तब तो फिर खत्म हो गया। वह जीवन ही नहीं
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
रहा न, मनुष्य का! अब कानून समझकर करना यह सब। जिसके वर्तन में आ जाए, तो उसका आना हम बंद कर देते हैं क्योंकि नहीं तो यह संघ टूट जाएगा। संघ में तो विषय की दुर्गंध आनी ही नहीं चाहिए। अतः अगर ऐसा हो तो मुझे बता देना। शादी करेगा फिर भी उपाय है। शादी करने से मोक्ष चला नहीं जाएगा। तेरे पास उपाय रहे, ऐसा कर देंगे।
आप्तपुत्रों के लिए दफाएँ
जिसका निश्चय है न, वह रह सकता है! सिर पर ज्ञानीपुरुष की छत्रछाया है। ज्ञान लिया हुआ है, अंदर सुख तो रहता ही है न, फिर किसलिए कुएँ में गिरना? इसलिए यह जो प्रमाद किए हैं न, उसके बाद मुझे अच्छे ही नहीं लगते तुम। अभी भी प्रमादी और यों सारे यूजलेस। कुछ ठिकाना ही नहीं है न! मेरी मौजूदगी में सोते हैं, फिर क्या बात करनी? कब लिखकर देनेवाले हो?
प्रश्नकर्ता : आप कहें तब। अभी लिखकर दे देते हैं।
दादाश्री : दो दफाएँ, एक विषयी व्यवहार, यदि विषयी व्यवहार हो जाए तो हम खुद ही निवृत्त हो जाएँगे, किसी को निवृत्त नहीं करना पड़ेगा। ऐसा लिखना है। हम खुद ही यह स्थान छोड़कर चले जाएँगे और दूसरा अगर यह प्रमाद हो जाए तो उस समय संघ हमें जो भी दंड देगा, वह। तीन दिन तक भूखे रहने की या कुछ भी, जो भी दंड देंगे, उसे स्वीकार कर लेंगे। हम कहाँ बीच में आएँ! यह संघ है न। ये लोग मेरी मौजूदगी में इतना सोते हैं तो क्या यह अच्छा दिखता है? हाँ, दोपहर में तो सो रहे थे, तो ये पकड़े गए सब। पहले भी कई बार पकड़े गए थे। यह तो सारा कचरा माल है। वह तो जैसे तैसे थोड़ा बहुत सुधरा। तुझे ऐसा लिखकर देना है। आप्तपुत्र ऐसा लिखकर देंगे, हमें। दो दफाएँ, कौन सी दफाएँ लिखकर देंगे?
विषयी आचरण? तो डिसमिस (खं-2-१०)
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प्रश्नकर्ता : एक तो, कभी भी विषय से संबंधित दोष नहीं करूँगा और करूँगा तो यह...
दादाश्री : करूँगा तो तुरंत ही मैं अपने घर चला जाऊँगा। आपतपुत्रों की यह जगह छोड़कर चला जाऊँगा। आपको मुँह दिखाने के लिए नहीं रुकूँगा।
और दूसरा ज्ञानीपुरुष की मौजूदगी में झोंका नहीं खाऊँगा। किसी भी प्रकार का प्रमाद नहीं करूँगा। ये दो शर्तें लिखकर सब तैयार हो जाओ। यानी कि ब्रह्मचर्य महत्वपूर्ण है।
मैं इन्हें कहता हूँ, शादी कर लो। लेकिन कहते हैं नहीं करनी। मैं मना नहीं करता। आप शादी कर लो। शादी करोगे फिर भी मोक्ष चला नहीं जाएगा। तब फिर हमारे सिर पर आरोप नहीं आएगा। आपको बीबी नहीं पुसाए तो उसमें मैं क्या करूँ! तब कहते हैं, हमें नहीं पुसाएगी। ऐसा खुलासा करते हैं न! इसलिए अगर तुझे पुसाए तो शादी करना और नहीं पुसाए तो मुझे बताना।
अंदर माल भरा हुआ हो तो शादी करके उसका हिसाब पूरा करो। शादी की, इसका मतलब हमेशा के लिए कहीं पति नहीं बन जाता। सभी रास्ते होते हैं।
मन बिगड़ जाए तो प्रतिक्रमण करने पड़ेंगे। वह भी शूट ऑन साइट होना चाहिए। मन से दोष हुए हों तो वह चला लेंगे। उसका हमारे पास इलाज है, उसका इस्तेमाल करके हम धो देंगे। वाणी से और काया से होगा तो नहीं चला सकते। पवित्रता आवश्यक है ही! दफाएँ तुझे अच्छी लगीं?
प्रश्नकर्ता : हाँ, अच्छी लगीं।
दादाश्री : तो लिखकर ले आना। अच्छी नहीं लगे तो नहीं। दफाएँ मंजूर नहीं हों तो अभी बंद रखना। जब एडमिशन लेने लायक हो जाए, तब करना।
२४२
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
हमारी मौजूदगी में बिल्कुल भी नींद नहीं आनी चाहिए, किसी को। कमी नहीं रहनी चाहिए। निरंतर विनय रहना चाहिए। मेरी मौजूदगी में कभी भी आँखें मिच जाएँ तो वह नहीं चलेगा और अपवित्रता तो बिल्कुल भी नहीं चलेगी, यहाँ बिल्कुल पवित्र पुरुषों का काम है। पवित्रता होगी तो वहाँ से भगवान जाएँगे नहीं!
मैंने सभी से कहा है, कि भई ऐसी पोल तो नहीं चलेगी। यह अनिश्चय है। इन आप्तपुत्रों ने शादी नहीं की लेकिन निश्चय है इसलिए आचरण मत बिगड़ने देना। हर एक जन बोलो, देखते हैं, कौन दृढ़ता से पालन करेगा? हर एक जन बोलो, खड़े होकर बोलो न!
जिसका आचरण बिगड़े, उसे तो डिस्मिस कर देना। क्रार लिखकर दिए हैं मुझे। नहीं चलेगी अपवित्रता, सूअर जैसा व्यवहार! सूअर और इसमें फर्क क्या रहा फिर? पवित्र लोग तैयार हुए हैं, जगत् का कल्याण करेंगे!
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[ ११ ]
सेफ साइड तक की बाड़
आवश्यकताएँ, ब्रह्मचर्य के साधक की
तुझे ब्रह्मचर्य की परख करना आता है? वह परख करना आ जाए तो काम का! सभी तरह से परख लेना चाहिए!
प्रश्नकर्ता : इसमें मुझे खुद को ऐसा लगता है, कि मेरा पुरुषार्थ बहुत मंद है।
दादाश्री : वह तो, वहाँ सभी के साथ रहेगा न, तब देखना पुरुषार्थ का योग! बाद में स्त्री को तो देखना तक अच्छा नहीं लगेगा। क्योंकि सत्संग में रहते हैं न वे सभी। फिर उस ओर के विचार ही नहीं आते!
प्रश्नकर्ता : उस संग का बहुत असर पड़ता है।
दादाश्री : फिर बहुत आसान हो जाता है। अभी तो संयोग नहीं हैं न? ये सारे विपरीत संयोग, कुसंग के और आज्ञा पालन करने की खुद की शक्ति नहीं है। दादा की आज्ञा पालन करेंगे तो कुछ भी बाधक नहीं होगा। यही है इसका उपाय, वहाँ सभी के साथ में रहेगा, तभी होगा। उसका और कोई उपाय नहीं है।
ब्रह्मचर्य पालन के लिए इतने कारण होने चाहिए। एक तो अपना यह 'ज्ञान' होना चाहिए, इसके अलावा इतनी आवश्यकता तो है ही कि ब्रह्मचारियों का समूह होना चाहिए। ब्रह्मचारियों की जगह शहर से जरा दूर होनी चाहिए और साथ ही पोषण होना
२४४
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)
चाहिए। यानी ऐसे सारे 'कांजेज' होने चाहिए। ब्रह्मचारियों के समूह में रहे, तब तक वह प्रख्यात रहता है, लेकिन यदि अलग हो गया तो वह प्रख्यात नहीं रहेगा। फिर वह दूसरे ताल में आ जाता है न? ! समूह में रहे तब तो दूसरा विचार ही नहीं आता न? यही अपना संसार और यही अपना ध्येय! दूसरा विकल्प ही नहीं न! और अगर सुख चाहिए, तो वह तो अंदर अपार है, अपार सुख है!!
संग, कुसंग के परिणाम
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य के लिए संगबल की जरूरत पड़ती है न?
दादाश्री : हाँ, जरूरत पड़ती है।
प्रश्नकर्ता : तो उसका मतलब ऐसा है कि मेरा निश्चय उतना कच्चा है?
दादाश्री : नहीं, संगबल की जरूरत तो है। भले ही कैसा भी ब्रह्मचारी हो, लेकिन कुसंग उसके लिए मात्र हानिकारक ही है। क्योंकि कुसंग का रंग यदि लग जाए तो वह हानि किए बगैर रहेगा ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : इसका मतलब ऐसा हुआ कि कुसंग निश्चयबल को काट देता है?
दादाश्री : हाँ, निश्चयबल को काट देता है! अरे, इंसान में पूरा ही परिवर्तन कर देता है और सत्संग भी इंसान में परिवर्तन कर देता है। लेकिन एक बार जो कुसंग में चला गया हो, उसे सत्संग में लाना हो तो बहुत मुश्किल हो जाता है और सत्संगवाले को कुसंगी बनाना हो तो देर नहीं लगेगी। क्योंकि कुसंग वह फिसलनवाला है, नीचे जाना है जबकि सत्संग का मतलब चढ़ना है। कुसंगी को सत्संगी बनाना हो तो चढ़ना होता है, उसमें बहुत
सेफ साइड तक की बाड़ (खंड-2-११)
२४५
देर लगती है और सत्संगी को कुसंगी बनाना हो तो तुरंत, एक कुसंगी परिचित मिल जाए तो तुरंत सबकुछ ठिकाने(!) पर ला देता है। इसलिए किसी पर विश्वास नहीं कर सकते। जो कोई अपना विश्वासपात्र हो, उसी के संग घूमना चाहिए।
कुसंग ही पोइजन है। कुसंग से तो बहुत दूर रहना चाहिए। कुसंग का असर मन पर होता है, बुद्धि पर होता है, चित्त पर होता है, अहंकार पर होता है, शरीर पर होता है। सिर्फ एक ही साल के कुसंग से होनेवाला असर तो पच्चीस-पच्चीस साल तक रहा करता है। यानी एक ही साल का कितना खराब फल आता है, फिर वह पछतावा करता रहे फिर भी छूट नहीं पाता और एक बार फिसलने के बाद और ज्यादा गहराई में उतरते जाता है और ठेठ तले तक उतार देता है। फिर अगर पछतावा करे, वापस लौटना चाहे फिर भी लौट नहीं सकता। अतः जिसका संग सुधरा, उसका सबकुछ सुधर गया और जिसका संग बिगड़ा, उसका सबकुछ बिगड़ गया। सब से बड़ा जोखिम कुसंग है। सत्संग में पड़े रहनेवाले को दिक्कत नहीं आती।
लशकर तैयार करके उतरो जंग में वीरो
प्रश्नकर्ता : जितनी भी गाँठें हैं, उनमें से विषय की गाँठ जरा ज्यादा परेशान करती है।
दादाश्री : कुछ गाँठें ज्यादा परेशान करती हैं। उसके लिए हमें लशकर तैयार रखना पड़ेगा। ये सभी गाँठें तो धीरे-धीरे एकजॉस्ट होती ही रहती हैं, घिसती ही रहती हैं, एक दिन वे सब इस्तेमाल हो ही जाएंगी न?!
पाकिस्तान का लशकर भले ही कभी भी हमला करे, उसके लिए अपने हिन्दुस्तान ने तैयारी रखी है या नहीं? वैसी तैयारी रखनी पड़ेगी।
प्रश्नकर्ता : इसीलिए ब्रह्मचारियों के संग में रहना है न?
२४६
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : नहीं, तैयारी में सिर्फ़ इतना ही नहीं चलेगा। अभी तो ठेठ तक लश्कर रखना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता : संपूर्ण सेफ़ साइड कब होगी?
दादाश्री : संपूर्ण सेफ़ साइड कब होगी, उसका तो ठिकाना ही नहीं न! लेकिन पैंतीस साल के बाद ज़रा उसके दिन ढलने लगते हैं, इसलिए वह आपको बहुत परेशान नहीं करता। फिर आपके तय किए अनुसार चलता रहेगा, वह आपके विचारों के अधीन रहेगा। आपकी इच्छा नहीं बिगड़ेगी तो फिर आपको कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा। लेकिन पैंतीस साल तक तो बहुत ही जोखिम है!
प्रश्नकर्ता : पैंतीस साल तक सेफ़ साइड क्या है?
दादाश्री : वह तो अपना निश्चय! दृढ़ निश्चय और साथ में प्रतिक्रमण!
प्रश्नकर्ता : एक बार निश्चय दृढ़ हो जाए तो उसके बाद में क्या?
दादाश्री : बाद में निश्चय डगमगाए नहीं तो बहुत हो गया!
प्रश्नकर्ता : अभी हमारा निश्चय दृढ़ हो गया कहलाएगा?
दादाश्री : अभी नहीं माना जाएगा। अभी तो बहुत देर लगेगी। इसलिए अभी तो तुम्हें ब्रह्मचारियों के संग में ही रहना है। बाकी निर्भयपद है, ऐसा मान लेने जैसा नहीं है।
प्रश्नकर्ता : लश्कर मतलब क्या? प्रतिक्रमण?
दादाश्री : प्रतिक्रमण और दृढ़ निश्चय, यह सारा लश्कर रखना पड़ेगा और 'ज्ञानीपुरुष' के दर्शन। इस दर्शन से अलग हो जाओ तो भी गड़बड़ हो जाएगी। अतः सेफ़ साइड कोई आसान चीज़ नहीं है।
प्रश्नकर्ता : आपने कहा था कि ब्रह्मचारियों का संग, संसारियों
सेफ साइड तक की बाड़ (खंड-2-११)
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से दूर और सत्संग की पुष्टि, इन तीन 'कॉजेज' का सेवन होगा तो सबकुछ हो जाएगा।
दादाश्री : यह सब निश्चय को हेल्प करता है और निश्चय मजबूत करना, वह अपने हाथ की बात है न!
सत्संग के परिचय में रहने से इंसान बिगड़ता नहीं है। कुसंग के परिचय से तो इंसान खत्म हो जाता है। अरे, कुसंग जरा सा भी छू जाए तो भी खत्म हो जाएगा। खीर में जरा सा भी नमक डाल दिया तो?
प्रश्नकर्ता : ऐसा आनंद तो कहीं भी देखा ही नहीं है। इसलिए कहीं भी जाने का मन नहीं करता। यहीं अच्छा लगता है।
दादाश्री : सिनेमा में आनंद मिलता होगा न?
प्रश्नकर्ता : लेकिन फिर बाहर निकलने पर वैसे के वैसे ही।
दादाश्री : हाँ, जैसा था वैसा ही वापस। अठारह रुपये खर्च हो गए और बल्कि परेशानी हो गई, तीन घंटे का टाइम खो दिया। मनुष्य जन्म के तीन घंटे कहीं बिगाड़े जाते होंगे?
प्रश्नकर्ता : तीन घंटे तो देखने में, लेकिन आगे-पीछे दूसरी तैयारी करने में भी समय जाता है न!
दादाश्री : हाँ, ऊपर से वह टाइम अलग। मैं लोगों से पूछता हूँ कि, 'चिंता होती है तब क्या करते हो?' तब कहते हैं कि, 'सिनेमा देखने चला जाता हूँ।' अरे, यह सही उपाय नहीं है। यह तो पेट्रोल डालकर अग्न को बुझाने जैसी बात है। यह जगत् पेट्रोल की अग्न से जल ही रहा है न? उसी तरह क्योंकि यह सूक्ष्म अग्न है इसलिए दिखाई नहीं देती, स्थूल में नहीं जलता।
कलियुग की हवा बहुत खराब है। यह तो ज्ञान की वजह से बच जाते हैं, वर्ना कलियुग की हवा का फटका ऐसा लगता है कि इंसान को खत्म कर दे।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
इस बवंडर में तो फ्रैक्चर हो जाता है सबकुछ। इसलिए जितने हमें मिले उतने सभी बच गए। यह तो बवंडर है, प्रवाह है, उसमें टकराकर-कुटकर मरना है! दिन-रात जलन! कैसे जीते हैं, वही आश्चर्य है!
विषयी वातावरण से फैला व्यापार
प्रश्नकर्ता : ऑफिस में सभी और कुसंग बहुत ही है। वहाँ सब ऐसी विषय की और ऐसी ही बातें चलती रहती हैं, इसलिए उसकी रमणता चलती रहती है।
दादाश्री : यह जगत् अभी कुसंग रूपी ही है। इसलिए किसी के साथ खड़े रहना जैसा नहीं है, कहीं भी।
प्रश्नकर्ता : ऐसा होता है कि कब छूटेगा यह।
दादाश्री : या तो अकेले बैठे रहना, या फिर यहाँ आकर सत्संग में पड़े रहना। कभी भी कुसंग में खड़े रहने जैसा नहीं है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन मुझे नौकरी का बिल्कुल भी शौक नहीं है।
दादाश्री : क्या करोगे नहीं जाओगे तो? बाहर का कुसंग छूना नहीं चाहिए, दादा का निदिध्यासन निरंतर रहना चाहिए। आँखें मीचकर दादा दिखें तो कुसंग छूएगा ही नहीं न! ऑफिस में कुसंग मिल जाता है, नहीं?
प्रश्नकर्ता : यानी हमें अच्छा नहीं लगता हो, ऐसा आए तब फिर संघर्ष होता है।
दादाश्री : संघर्ष होकर भी निकाल हो जाता है न? वह आता है न, 'और भी कोई हो तो आ जाओ, मुझे तो निकाल कर देना है', कहना, घबराना नहीं। जहाँ मानसिक संघर्ष है, वहाँ उसमें देर ही कितनी लगेगी? देह का संघर्ष नहीं होना चाहिए। मानसिक संघर्ष में हर्ज नहीं, उसका निकाल आ जाएगा।
सेफ साइड तक की बाड़ (खंड-2-११)
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नहीं सुननी चाहिए विषयी वाणी
विषय-विकारवाली जो वाणी सुनता तक नहीं है, खुद बोलता भी नहीं है, विषय की वैसी बातें सुने तो मन में क्या होगा?
प्रश्नकर्ता : मन बिगड़ेगा।
दादाश्री : अतः ऐसी वाणी खुद बोलनी भी नहीं चाहिए, कोई बोल रहा हो तो सुननी भी नहीं चाहिए। यह वाणी महाभारत नहीं है कि सुनने जैसी हो।
प्रश्नकर्ता : ऑफिस में बैठे हों, तब मजबूरन वह सुननी पड़े तो?
दादाश्री : तो तुम पर असर न हो, ऐसा करना। तुम्हें इन्टरेस्ट हो तभी सुनाई देगा, वरना सुनाई नहीं देगा। अपना इन्टरेस्ट नहीं होगा तो कान सुनेंगे लेकिन तुम्हें नहीं सुनाई देगा!
प्रश्नकर्ता : उपयोग में कमी होगी, इसलिए ऐसा होता है?
दादाश्री : उपयोग में तो पूरी ही कमी है। यदि उपयोग होगा तो वह नहीं रहेगा और वह होगा तो उपयोग नहीं रहेगा!
प्रश्नकर्ता : वह आपने कहा था न कि छः महीने तक विचार आएँ कि 'शादी करनी है, शादी करनी है।' फिर भी अपने निश्चय में खुद स्थिर रहे तब तो पार निकल जाएँगे।
दादाश्री : वह खत्म हो जाएगा। निश्चय मजबूत होना चाहिए। निश्चय ढीला नहीं होना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : फिर सर्विस में ये सारे जो कुसंग मिलते हैं। उनका निकाल कर देना है। आपने जो वह कहा है, तो उसमें क्या करना है? वह निकाल कैसे करना है?
दादाश्री : अपनी आज्ञा का पालन करके, प्रतिक्रमण से निकाल कर देना है। जिसे निकाल करना है, उसका निकाल हो
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
जाएगा और जिसे लड़ना है, वह लड़ेगा और जिसे निकाल करना है, वह निकाल कर देगा। तेरी इच्छा तो निकाल करने की है न? कैसा भी हो फिर भी?
प्रश्नकर्ता : ऑफिस में सहकर्मी मुझसे पूछते हैं कि लड़की देखने पर तुझ पर कुछ असर होता है या नहीं?
दादाश्री : फिर?
प्रश्नकर्ता : फिर मैं कहता हूँ कि लड़की देखता हूँ तो आकर्षण होता है। लेकिन शादी नहीं करनेवाला, ऐसा नहीं कहता। वना वे लोग मजाक करेंगे कि तू लड़की देखता है और तुझ पर कुछ असर नहीं होता तो तुझ में कोई दम ही नहीं है। ऐसा सब तय कर लेते हैं, वे लोग। फिर उसका प्रचार करते हैं, इसलिए फिर कहता हूँ कि मुझे आकर्षण होता है।
दादाश्री : ऐसे झूठ नहीं बोलना है। दम उसी को कहते हैं कि जिसे आकर्षण नहीं हो, बल्कि बिना दमवाले को ही अधिक आकर्षण होता है। 'मुझे नहीं होता, मुझे तो छूता तक नहीं।' कहना। इसलिए हम कहते हैं न कि भाई, ये आप्तपुत्र एक जगह बस जाएंगे तो फिर ऐसी बातें सुनने को ही नहीं मिलेगी। पोइज़न नहीं चढ़ेगा।
समभावियों का समूह
यह बाहर का जो परिचय है, वह उल्टा परिचय है और अभी तक ज्ञानियों से पूरा परिचय नहीं हुआ है। यदि परिचय हुआ होता तो ऐसा नहीं होता। इसलिए ज्ञानियों के पास पढ़े रहना है। बाहर के परिचय से ही तो यह सारी मार खाई है न?! बाहर के परिचय से सबकुछ बिगड़ता ही रहता है, बहुत बिगड़ता है। यदि ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो बाहर का परिचय भी रखे और ब्रह्मचर्य का पालन कर सके, ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते! वह तो पूरा समूह होना चाहिए, अलग निवास स्थान होना चाहिए,