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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

श्रीः हिन्दी-सांख्य दर्शन विद्याप्रदं गुरुं नत्वा तथा रुद्रं कृपाकरम् । ईश्वरकृष्णसांख्यस्य हिन्दीभाषां करोम्यहम् ॥ सांख्यशास्त्र में प्रवृत्ति का कारण दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातकेहेतौ । दृष्टे साऽपार्था चे न्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥१॥ ( क ) क्योंकि — सांख्यशास्त्रीयतत्वों के ज्ञान से तीनों दुःखों की निवृत्ति होती है, अतः उसमें पुरुष की प्रवृत्ति होती है। अथवा तीनों दुःख विनाशी हैं, या उनका विनाश देखा जाता है, अतः उनके नाश के हेतु (सांख्य शास्त्र के तत्वों के ज्ञान) में इच्छा होती है। ( ख ) यदि कहा जावे कि-लौकिक उपाय से तीनों दुःखों का नाश होता है, अतः सांख्य शास्त्र में इच्छा व्यर्थ है? ठीक नहीं, क्योंकि-उस दृष्ट उपाय से ऐकान्तिक तथा आत्यन्तिक दुःख निवृत्ति नहीं होती। अवश्य ही होने वाली दुःखनिवृत्ति एकान्तिक दुःखनिवृत्ति, और जो दुःखनिवृत्ति होकर फिर निवृ- त्त नहीं होती वह आत्यन्तिक दुःखनिवृत्ति कहलाती है। १॥ वैदिक उपाय की अनुपायता । दृष्टवदानुश्रविकः सह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्तः । तद्विपरीतः श्रेयान्व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥२॥ ( क ) आनुश्रविक या वैदिक उपाय भी दृष्ट उपायके स-

हिन्दी सांख्य दर्शन ( २ ) मान है। क्योंकि-वह अविशुद्धि, क्षय और अतिशय दोषों से युक्त है। (ख) श्रेयान् या दुःखध्वंसरूप मोक्ष या वास्तविक क- ल्‍याण उससे (अविशुद्धि आदि दोष वाले से) विपरीत है। अर्थात् अविशुद्धि आदि दोष से रहित है, सुतराम् वह दोष युक्त उपाय का साध्य नहीं, तथा व्यक्त अव्यक्त और ज्ञ (पुरु- ष) के विज्ञान से होता है ॥ २ ॥ शास्त्र का संक्षिप्त अर्थ । मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयःसप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्नविकृतिःपुरुषः ॥३॥ (क) मूलप्रकृति (प्रधान) अविकृति (अकार्य) है। (ख) महत् आदि ७ पदार्थ (महत्तत्व, अहंकार, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) प्रकृति विकृति या कार्य कारण रूप हैं। (ग) सोलह (१६) पदार्थ (५ ज्ञानेन्द्रियें, ५ कर्मे- न्द्रियें १ मन, ५ महाभूत आकाश आदि) विकाररूप हैं। (घ) पुरुष न प्रकृति (कारण) है, और न विकृति कार्य है ॥ ३ ॥ प्रमाण और उसके भेद (क) प्रमा का साधन प्रमाण होता है। अर्थात्-जिस वस्तु की सहायता से पुरुष को यथार्थ ज्ञान होता है, वह वस्तु प्रमाण कहलाती है। दृष्टमनुमानमाप्तवचनंच, सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं, प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि ॥४॥

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३ ) (क) प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाणं होते हैं सांख्य लोगों का अभिमान है, कि-और सब उपमान आदि प्रमाणों का इन तीन ही प्रमाणों में अन्तर्भाव हो जाता है। यहां प्रत्यक्षका नाम ‘दृष्ट’, और शब्द प्रमाण का ‘आप्तश्रुति’ नाम लिया गया है । (ख) प्रमाण का निरूपण इस लिये किया गया है कि प्रमेय वस्तु का यथार्थ ज्ञान प्रमाण से होता है यहां ‘प्रमेय’ नाम प्रकृति आदि २५ तत्वों का है । प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के लक्षण प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं, त्रिविधमनुमानमाख्यातम्। तल्लिङ्गलिङ्गिपूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनन्तु ॥५॥ (क) प्रतिविषय नाम अपनें विषय के साथ मिला हुआ इन्द्रिय, उससे उत्पन्न होने वाला (अध्यवसाय) ज्ञान प्रत्य- क्ष ज्ञान होता है। इस ज्ञान का उत्पन्न करने वाला साधन इन्द्रियरूप प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाता है । (ख) लिङ्ग (व्याप्य या अल्प देश में रहने वाली वस्तु) और लिङ्गी (व्यापक या अधिक देश में रहने वाली वस्तु) के ज्ञानको अवलम्बन करके अनुमान प्रमाण होता है, अथवा व्याप्ति का ज्ञान अनुमान प्रमाण है। अर्थात्-दो सम्बन्धियों में से एक सम्बन्धी का ज्ञान होना अनुमान प्रमाण है, और उससे दूसरे सम्बन्धी का ज्ञान होना उसका प्रयोजन है । जैसे पीलवान के ज्ञान से हाथी का ज्ञान । यहां पीलवान का ज्ञान अनुमान प्रमाण है, और हाथीका ज्ञान (अनुमिति) उस का प्रयोजन है । ऐसे ही धूम के ज्ञानसे अग्नि के ज्ञान को भी समझना । यह अनुमान प्रमाण तीन प्रकार का है ।

( ४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन ( ग ) आप्तश्रुति ( आप्तवाक्य ) या प्रामाणिक पुरुष का वाक्य शब्द प्रमाण होता है ॥ ५ ॥ प्रमाणों का विषय भेद सामान्यतस्तुदृष्टात् अतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् तस्मादपिचासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्सिद्धम् ॥६॥ ( क ) प्रत्यक्ष प्रमाण ( इन्द्रिय ) का विषय घट (घड़ा) पट ( वस्त्र ) एवम् पृथिवी आदि है । ( ख ) अनुमान प्रमाण से अतीन्द्रिय या प्रत्यक्ष के अविषय ( पर्वतादि देशस्थ अग्नि आदि ) पदार्थों की प्रतीति होती है । ( ग ) और उस अनुमान प्रमाण से भी असिद्ध परोक्ष ( महत् तत्व आदि या स्वर्ग अदृष्ट आदि ) पदार्थों की सिद्धि शब्द प्रमाण से होती है ॥६॥ विद्यमान विषय में भी प्रत्यक्ष प्रमाण की अप्रवृत्ति के कारण । अतिदूरात्सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात्समानाभिहाराच्च ७ अति दूर होने से विद्यमान वस्तु भी प्रतीत नहीं होती जैसे आकाश में उड़ता हुआ पक्षी अति दूर हो जाने पर रहता हुआ भी नहीं दिखाई देता । ( १ ) अत्यन्त समीप होने से भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे नेत्र का अञ्जन । ( २ ) इन्द्रिय का घात हो जाने से प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे अन्धता ( आंधेपन ) बधिरता ( बहरेपन ) से दर्शन श्रवण नहीं होता ( ३ ) मन के अनवस्थान या अन्य विषय में लग जाने से

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ५ ) प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे काम आदि से जिस का मन किसी विषय में लग जाता है और उसे अच्छे प्रकाश में निकट वस्तु भी नहीं दिखाई देती । ( ४ ) अत्यन्त सूक्ष्म होने से भी वस्तु प्रत्यक्ष नहीं होती । जैसे पृथिवी आदि के परमाणु नेत्र के समीप भी रहते हैं, किन्तु वे सूक्ष्मता के कारण दिखाई नहीं देते । ( ५ ) व्यवधान या किसी वस्तु के बीच में आने से वस्तु प्रतीत नहीं होती । जैसे दीवार आदि के बीच में आ जाने से राजा की रानी आदि दिखाई न दे । ( ६ ) अभिभव या तिरस्कार से प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे दिन में सूर्य की किरणों से तिरस्कृत होने के कारण ग्रह नक्षत्र नहीं दिखाई देते । ( ७ ) समानाभिहार या समान वस्तु में मिल जाने से प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे जलाशय में मेघ से गिरे हुये जल के विन्दु नहीं दिखाई देते । ( ८ ) इस श्लोक में जो “च” कार दिया है, इस से अनुद्भव ( अप्रकटता ) भी यहां समझना । जैसे दूध आदि की अवस्था में दही आदि को नहीं देखता ।६। प्रधान आदि के प्रत्यक्ष न होने का कारण सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात्,कार्यतस्तदुपलब्धेः महदादि तच्चकार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपंच ॥ ८ ॥ सूक्ष्मता के कारण प्रधान आदि वस्तुओं का प्रत्यक्ष नहीं होता है, किन्तु उनके अभाव या न होने से नहीं । क्योंकि उनकी उपलब्धि कार्य से होती है, और वह कार्य महत् आदि है, जो प्रकृति के समान रूप और विलक्षण रूपवाला है ॥८॥ सत्कार्यवाद के साधक असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् ।

(६) हिन्दी सांख्य दर्शन शक्तस्य शक्यकरणात्,कारणभावाच्च सत्कार्यम् ।९। (क) असत् (जो पहिले से नहीं है) कार्य को कोई कर नहीं सकता, इस से कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी सत् होता है। (ख) कार्य और कारण के सम्बन्ध से कार्य होता है, और असत् कार्य का कारण के साथ सम्बन्ध हो नहीं सकता, अतः कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी विद्यमान है। (ग) सब कार्यों का सब स्थानों में सम्भव नहीं, अर्थात् यदि बिना हुआ भी कार्य उत्पन्न हो, तो उसे सब स्थानों में होना चाहिये, किन्तु ऐसा संभव नहीं, अतः कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी सत् है (घ) शक्त या शक्तिमान् कारण शक्य को बनाता है, और शक्त कारण का अविद्यमान कार्य शक्य नहीं हो सकता। क्योंकि कार्य को देखकर ही कारण की शक्ति होती है, अतः कार्य अपनी ०-० । (ङ) और कार्य कारण भाव से भी कार्य सत् है, अर्थात् कारण का कारणत्व कार्य की कार्यता से ही निरूपित होता है, और असत् कार्य से कारणत्व कल्पित नहीं हो सकता, अतः कार्य ०--० । व्यक्त और अव्यक्त का साधर्म्य और वैधर्म्य। हेतुमदनित्यमव्यापिसक्रियमनेकमाश्रितंलिङ्गम् । सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं, विपरीतमव्यक्तम् ॥ १०॥ व्यक्त (महत् आदि) के धर्म। हेतुमान् (सकारण)। अनित्य । अव्यापकं । क्रियावान् । अनेक (नाना) । आश्रि-

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ७ ) त्त ( दूसरे में रहने वाला )। लिङ्ग (दूसरे का अनुमान कराने वाला )। सावयव ( अवयवों या भागों वाला ) और परतन्त्र ( पराधीन ) । अव्यक्त या मूल-प्रकृति उससे विपरीत होती है। अर्थात्- कारणशून्य (उसका कोई कारण नहीं), नित्य, व्यापक, नि- ष्क्रिय, एक, अनाश्रित ( किसी आधार में नहीं रहने वाली ) अलिङ्ग (किसी वस्तु का अनुमान न कराने वाली), निरवयव (उस में कोई अवयव या भाग नहीं हैं) और स्वतन्त्र या स्वाधीन है। व्यक्त अव्यक्त दोनों का साधर्म्य( समानधर्मता ) और उन से पुरुष का वैधर्म्य ( विरुद्ध धर्मता ) । त्रिगुणमविवेकि विषयः सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि। व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथाच पुमान् ॥११॥ (क) व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही त्रिगुण, अविवेकी, विषय, सामान्य, अचेतन और प्रसवधर्मी हैं। (ख) और पुरुष उन दोनों ( व्यक्त और अव्यक्त ) से विलक्षण अर्थात्-अत्रिगुण, विवेकी, अविषय, असामान्य, चेतन और अप्रसवधर्मी है। तथा नित्यत्व, स्वतन्त्रत्व, कारणशून्य- त्व, व्यापकत्व, निष्क्रियत्व, अनाश्रितत्व, अलिङ्गत्व, और निरवयवत्व, - इन विशेषणों से प्रकृति के सदृश और अनेकता से व्यक्त (महत् आदि) के सदृश है॥ ११॥ तीन गुण और उन के लक्षण प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकाः प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः। अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्चगुणाः १२।

( ८ ) हिंदी सांख्य दर्शन (क) सत्वगुण प्रीतिरूप या सुखरूप और प्रकाश के अर्थ है (ख) रजोगुण अप्रीति या दुःखरूप और प्रवृत्तिके अर्थ है। (ग) तमोगुण विषाद या मोहरूप और नियम ( प्रतिबन्ध ) के लिये होता है । (घ) तीनों गुणों में प्रत्येक गुण की अन्य दो गुणों का अभिभव ( तिरस्कार ) करना, आश्रयण ( दूसरे में रहना ) करना, परिणामके अभिमुख ( संमुख ) करना और सहचार (सं- ग रहना ) करना वृत्तियें ( क्रियायें ) हैं ॥ १२ ॥ गुणों के प्रकाश आदि प्रयोजनों के हेतु सत्वं लघुप्रकाशकमिष्टम्, उपष्टम्भकं चलं च रजः । गुरु वरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः॥१३॥ (क) सत्वगुण लघु ( हलका ) होता है, अतएव ( अग्नि के ऊर्ध्व ज्वलनका वायु के तिर्यक् गमन ( तिरछा चलने ) का और ) इन्द्रियों में अर्थों ( वस्तुओं ) के प्रकाशन शक्ति का हेतु होता है । (ख) रजोगुण चल होता है, ( अतएव प्रवर्त्तक होता है ) (ग) तमोगुण गुरु ( भारी ) होता है । अतएव आवरण ( नियमन = अवरोध ) करने वाला होता है । (घ) “अर्थतः” पुरुषार्थ ( जीवों के अदृष्ट ) वश परस्पर विरुद्ध स्वभाव वाले भी गुणों की दीपक, तैल, वत्ती और अ- ग्नि के तुल्य समान कार्य में प्रवृत्ति होती है ॥१३॥ सत्व आदि गुणों में अविवेकित्व आदि की सिद्धि और उसके लिये प्रधान की सिद्धि अविवेक्यादेः सिद्धिस्त्रैगुण्यात्तद्विपर्ययाभावात् ।

(क) सत्व आदि गुण अविवेकित्व, विषयत्व और

हिंदी सांख्य दर्शन कारणगुणात्मकत्वात्कार्यस्याव्यक्तमपिसिद्धम्॥१४॥ (क) सत्व आदि गुण अविवेकित्व, विषयत्व और अचेतनत्व धर्म वाले हैं। क्यों कि ये सब त्रिगुण हैं। जो २ त्रिगुण वस्तु देखी जाती है, वह २ सब अविवेकि आदि ही है, इस के अतिरिक्त यह भी है कि जहां आत्मा या पुरुष में अविवेकित्व आदि धर्म नहीं है, वहां यह तीनों गुण भी नहीं हैं। (ख) यदि कहा जावे कि अव्यक्त हो, तो उससे उत्पन्न होने वाले इन तीनों गुणों में अविवेकित्व आदि सिद्ध हो सकता है, किन्तु अभी अव्यक्त ही सिद्ध नहीं हुआ है ? इस पर कहा जा सका है, कि कार्य को कारण गुणात्मक होने से अव्यक्त भी सिद्ध होता है। अर्थात् महत् आदि सब कार्य गुण वाले हैं, और कार्य में गुणों की अनुवृत्ति (आगम) कारण से ही होती है। जैसे नील वस्त्र में उस के कारण नील सन्तुओं से ही नील रूप की अनुवृत्ति होती है, अतः महत् आदि कार्यों में गुणों की अनुवृत्ति के अर्थ उनका कोई कारण होना चाहिये। इस रीति से उन का कारण सिद्ध होता है, तथा वही अव्यक्त है ॥ १४ ॥ अव्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति। माना भी जावे कि इस रीति से अव्यक्त सिद्ध हो गया, तथापि आपत्ति हो सकती है कि जिस प्रकार न्याय वैशेषिक के आचार्यों ने व्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति मानी उसी प्रकार यहां भी मानना चाहिये। अर्थात् गौतम और कणाद मुनि मानते हैं कि परमाणु व्यक्त हैं, उन्ही से द्वयणुक, उससे त्र्यणुक इत्यादि क्रम से महापृथिवी पर्यन्त सब जगत् उत्पन्न हो जाता है, तथा पृथिवी आदि में उन के कारणों के गुणों की

( १० ) हिन्दी सांख्य दर्शन अनुवृत्ति हो जाती है । अतः व्यक्त से ही व्यक्त और उस का गुण उत्पन्न होता है, अव्यक्त रूप कारण की कल्पना व्यर्थ है ? इस आपत्ति पर यह कारिका - भेदानां परिमाणात् समन्वयात् शक्तितः प्रवृत्तेश्च । कारणकार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥१५॥ कारणमस्त्यव्यक्तम् प्रवर्त्तते त्रिगुणतः समुदयाच्च । परिणामतः सलिलवत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् ( क ) भेदों ( महत् आदिकों ) का कारण अव्यक्त है । क्योंकि कछुवे के अङ्गों का उसके शरीर के साथ विभाग और अविभाग होता है, ऐसे ही कारण में विद्यमान रहते हुये ही कार्य के कारण से विभाग और अविभाग होते हैं । ( ख ) कारण की शक्तिसे कार्य प्रवृत्त होता है, और कारणमें शक्ति कार्यकी अव्यक्तरूप ही होती है । सत्कार्य पक्ष में कार्य की अव्यक्तता + ( अप्रकटता ) से भिन्न कारण की कोई शक्ति नहीं । जैसे तिलों से उनमें रहता हुआ ही तैल प्रकट होता है, किन्तु बालू से नहीं । ( ग ) महत्तत्व को ही परम अव्यक्तता क्यों नहीं ? परिमित या अव्यापी होने से वह अव्यक्त कारण वाला है । क्योंकि जो २ वस्तु परिमित होती है वह सब अव्यक्त कारण वाली होती है । जैसे घट ( घड़ा ) आदि । और- × अव्यक्तता नाम अज्ञात सत्ता का है । जैसे अँधेरे में कोई वस्तु रहे, और हम उसे न देखें, किन्तु इस से उस का वहां अभाव नहीं होता । इसी प्रकार सब कार्य अपनी उत्प- त्तिसे पहिले अपने कारण में अप्रकटरूप से रहते उनका वहां अभाव नहीं होता । इसी अज्ञात सत्ताको अव्यक्तता कहते हैं

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ११ ) ( घ ) समन्वय या भिन्न वस्तुओं की समान रूपता होने से महत् आदिकों का कारण अव्यक्त है । जैसे घट कुण्डल आ- दिकों के कारण मृत्तिका-पिण्ड, सुवर्ण-पिण्ड आदि अव्यक्त हैं ॥ १५ ॥ अव्यक्त की प्रवृत्ति का प्रकार । अव्यक्त की प्रवृत्ति दो प्रकार से है। एक सृष्टिकाल की और दूसरी प्रलयकाल की । सृष्टिकाल में अव्यक्त ( प्रकृति ) के तीनों गुण मिलकर प्रवृत्त होते हैं, और वे उस समय आपस में कोई गौण और कोई मुख्य हो जाते हैं। क्योंकि-गौण मुख्य भाव के विना अनेक पदार्थों की मिलकर प्रवृत्ति नहीं हो सकती । तथा अपनी गौणता मुख्यता के लिये वे न्यून अधिक हो जाते हैं, एवम् न्यूनाधिक भाव के लिये वे परस्पर में कोई उपमर्दक और कोई उपमर्दनीय हो जाते हैं। इसी प्रकार प्रलयकाल में अव्यक्त के तीनों गुण परस्पर से पृथक् होकर स्वतन्त्रता से अपने २ स्वरूप से ही प्रवृत्त होते हैं, इसी से सब कार्य जो अनेकतत्वों के मेल से बने हुये हैं, वे नष्ट हो जाते हैं या अपने अव्यक्त कारण में लीन हो जाते हैं। मानों कि- यह शरीर पांच भूतों से बना है, और पांचों पृथिवी आदि भूत अलग २ हो जावें, तो यह शरीर नष्ट ही हो । एक अव्यक्त से विचित्र २ कार्यों की उत्पत्ति । एक २ गुण के भिन्न २ मात्राओं के संमेलन से जल के समान नाना परिणाम होते हैं। जैसे मेघ का जल एक मधुर रस वाला ही नारियल और बिल्व आदिकों में नाना रस वाला हो जाता है ॥ १६ ॥ पुरुष या आत्मा की सिद्धि । संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात् । पुरुषोऽस्तिभोक्तृभावात् कैवल्यार्थप्रवृत्तेश्च ॥१७॥

( १३ ) हिन्दी सांख्य दर्शन व्यक्त (शरीर आदि) और अव्यक्त (मूल प्रकृति) से भिन्न पुरुष है। क्योंकि— (क) जो २ वस्तु संघात रूप है, अर्थात् अनेक वस्तुओं से मिल कर बनी है, जैसे शय्या आसन आदि, वह सब दूसरे के अर्थ देखी जाती है, ऐसे ही ये महत् तत्त्व और शरीर आदि हैं, इस लिये ये पर के अर्थ हैं। जो पर वस्तु है, वही आत्मा ( पुरुष ) है। संघात दूसरे संघात के लिये नहीं। ऐसा प्रश्न हो सकता है कि-एक संघात रूप वस्तु दूसरे संघात के लिये मान ली जावे, तो अन्य पुरुष वस्तु की कल्पना न करना पड़े ? इस का उत्तर यह है कि-यदि एक संघात दूसरे संघात के लिये माना जावेगा, तो वह भी संघात है, उस की परार्थता के लिये तीसरा संघात मानना होगा, एवम् उस की परार्थता के अर्थ ४था संघात कल्पित करना होगा। सुतराम् संघात को दूसरे संघात की अपेक्षा रहने से उसकी संख्या पूरी न होगी। इसे अनवस्था दोष कहते हैं। इसी के कारण उक्त प्रश्न नहीं उठ सकता, अतः संघात असंघात रूप पुरुष के अर्थ ही मानने से सुगति होती है। दूसरा हेतु यह है कि जो २ त्रिगुण रथ आदि संघात हैं, वे सब दूसरे से अधिष्ठित या दूसरे के वश में रहते हुये देखे जाते हैं, अतः उन के समान त्रिगुण महत्तत्त्व और शरीर आदि के लिये भी दूसरे अधिष्ठाता की अपेक्षा होती है एवम् अधिष्ठित के अधिष्ठाता के रूप में पुरुष सिद्ध होता है। तीसरा हेतु यह है कि-जो २ त्रिगुण संघात शय्या आसन आदि हैं, वे सब भोग्य वस्तु हैं, अतः उन्हें अपनैं से विलक्षण (अत्रिगुण) भोक्ता की अपेक्षा रहती है। एवम् उन भोग्य वस्तुओं के भोक्तारूप से पुरुष की सिद्धि होती है।

हिन्दी सांख्य दर्शन ( १३ ) ४ था हेतु यह है कि महत्‌तत्व और शरीर आदि, जितने प्रकृति से उत्पन्न हुये संसार में पदार्थ हैं, वे सब सुख, दुःख और मोह रूप हैं, अतः सुख को अनुकूलनीय या सुखी करने के लिये, दुःख को प्रतिकूलनीय या दुःखित करने के लिये, तथा मोह को मोहित करने के लिये दूसरे २ की अपेक्षा होती है। क्योंकि-सुख आदि सुख आदि को ही सुखित दुःखित तथा मोहित नहीं कर सकता । सुतराम् उन से विलक्षण सुखी आदि होने वाला दूसरा पदार्थ (पुरुष) सिद्ध होता है। ५वां हेतु सब से अधिक या बलवान यह है कि शास्त्र कैवल्य या मोक्ष को प्रतिपादन करते हैं, और महापुरुष उस के लिये यत्न करते आये हैं। यदि संघात ही संघात है, तो फिर उस से अलग होने की इच्छा किस को हो और उससे वह अलग हो भी कैसे सकता है। सुतराम्-आत्मा संघात से अलग पदार्थ है ॥ १७ ॥ पुरुष (आत्मा) बहुत हैं। पुरुष है,-यह प्रतिपादन किया गया, अब यह प्रश्न है कि-क्या वह पुरुष सब शरीरों में एक है, या प्रति शरीर अलग २ ? इस के उत्तर में प्रति शरीर पुरुष अलग २ है, यह प्रतिपादन करने के लिये कहते हैं— जननमरणकरणानां प्रतिनियमाद् युगपत्प्रवृत्तेश्च पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥ पुरुष (आत्मा) बहुत हैं। क्योंकि- (क) जन्म, मरण, और इन्द्रियें प्रति पुरुष अलग २ हैं। (ख) सब पुरुष एक साथ एक कर्म में नहीं लगते। (ग) और भिन्न २ पुरुषों में सत्व आदि तीनों गुण

पुरुष का बहुत्व सिद्ध करके अब विवेकज्ञान के लिये,

( १४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन भिन्न २ प्रकार से हैं। जैसे कोई अधिक सात्विक है, कोई अधिक रजोगुणी है और कोई अधिक तमोगुणी है । पुरुष के धर्म । पुरुष का बहुत्व सिद्ध करके अब विवेकज्ञान के लिये, उसके धर्मों को कहते हैं- तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य । कैवल्यमाध्यस्थ्यं द्रष्टृत्व मकर्त्तृभावश्च ॥ १९ ॥ पुरुष का बहुत्व तो सिद्ध हो ही चुका है, किन्तु उस विपर्यास या विपरीत भाव, जो गत ११ वीं कारिका में दि- खाया गया है, उससे इसके साक्षित्व (साक्षीपना) कैवल्य (दुःखत्रय से रहित होना) माध्यस्थ्य (उदासीनता) द्रष्टृत्व (दर्शन) और अकर्त्तृत्व (अकर्त्तापन) ये पांच धर्म भी सिद्ध होते हैं। उक्त ११ वीं कारिका में कहा गया है कि- व्यक्त- और प्रधान,–'त्रिगुण, अविवेकी, विषय,सामान्य,अचेतन और प्रसवधर्मी हैं, और पुरुष इन दोनों से विरुद्ध धर्म वाला है'। इस से कहागया होता है, कि- पुरुष, अत्रिगुण (तीनों गुणों से रहित) विवेकी, अविषय असामान्य, चेतन, और अप्रसव- धर्मी है। यही वहां का विपर्यास है। अब ध्यान देंगे, तो, प्रतीत होगा कि-सच मुच ही उस विपर्यास से पुरुष में साक्षित्व आदि ५ धर्म सिद्ध होते हैं। अर्थात्--चेतन और अविषय होने से वह साक्षी और द्रष्टा होता है। क्योंकि- चेतन हीं साक्षी हो सकता है, किन्तु अचेतन वस्तु नहीं। अर्थात् साक्षी वह होता है, जिसे कोई विषय दिखाया जावे । लोक में जिस प्रकार वादी प्रतिवादी दोनों अपने विवाद की बात को साक्षी के लिये दिखाते हैं, ऐसे ही प्रकृति भी अपने आचरण किये हुवे विषय को पुरुष के प्रति दिखाती है, अतः पुरुष उसका

हिन्दी सांख्य दर्शन (१५)

साक्षी है। क्योंकि अचेतन विषय को विषय नहीं दिखाया जासकता। इस कारण चेतन और अविषय होने से पुरुष सा- क्षी औरद्रष्टा होता है। एवम् त्रिगुण रहित होने से ही वह दुःखत्रय से रहित है। अर्थात् सत्व आदि गुण ही सुख दुःख आदि रूप हैं, और वे उसमें हैं नहीं अतएव वह दुःखमात्र से रहित है तथा दुःखत्रय का अभाव ही कैवल्य या मोक्ष का स्वरूप है, अतः अत्रिगुण होने से उस का कैवल्य सिद्ध होता है। इसी प्रकार अत्रिगुण होने से ही यह मध्यस्थ या उदासीन है। क्योंकि सुखी सुख से तृप्त होता हुवा और दुःखी दुःख से द्वेष करताहुआ मित्रशत्रु की कक्षा में आजाता है, किन्तु.मध्यस्थ नहीं होता। सुतराम् आत्मा सत्व आदि गुणों से रहित होने के कारण सुख दुःख से भी रहित है, और अतएव वह मध्यस्थ या उदासीन है। ऐसे ही विवेकी और अप्रसव- धर्मी होने से वह अकर्ता है। प्रयोजन यह है कि- क्रिया जिस में होती है, वह कारक होता है, और क्रिया सब परिच्छिन्न (परिमित) वस्तु में होती है। परिमित वस्तु महत्तत्व से आरम्भ करके प्रकृति के सकल कार्य हैं। आत्मवस्तु व्यापक (विभु) है, उसमें क्रिया का संभव नहीं, अतः वह अकर्ता है अकर्ता पद से कर्त्ताके साथ करण, सम्प्रदान आदि अन्य का- रकों का भी निषेध समझना चाहिये। कारण वे कारक भी क्रिया के सम्बन्धसे ही होते हैं। यहां 'प्रसव' नाम कार्य मात्र का है। कार्य पद में प्रकृति और पुरुष दोनों से अतिरिक्त सकल जड़समूहं आता है, उन्हीं में चलन आदि क्रियायें भी हैं जबकि आत्मा अप्रकृति है, तो उससे कोई कार्य होना संभव नहीं, अतः वह अप्रसवधर्मी होने से अकर्ता है, इसी प्रकार 'विवेकी' विशेषण भी उसे अकर्त्ताही सिद्ध करता है। क्योकि हमारी समझ में 'विवेकी' नाम यहां विविक्त या अलग रहने

( १६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन वालेका है। वह क्रिया तथा विकार (प्रसव) वालों से अलग है, इससे वह अकर्त्ता है ॥ १८ ॥ लिङ्ग चेतन के समान और पुरुष कर्त्ता के समान । तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् । गुणकर्त्तृत्वे च तथा कर्त्तेवभवत्युदासीनः ॥२०॥ यद्यपि पहिली कारिका में यह युक्तियों से सिद्ध होचुका है कि-आत्मा अकर्त्ता है, किन्तु यह अनुभव के विरुद्ध है। अर्थात् सर्व साधारण को ऐसा अनुभव होता है कि-'मैं चेतन करने की इच्छा से क्रिया (कर्म) करता हूं' इस अनुभव में चेतन और कर्त्ता एक ही प्रतीत होता है। इस से सांख्य के उक्त मत में यह अनुभव नहीं घटता। क्योंकि-उसमें चेतनअकर्त्ता और कर्त्ता अचेतन है। इसी प्रश्न का उत्तर यहां यह दिया गया है, कि-उक्त अनुभव, जिसमें आत्मा अकर्त्ता प्रतीत होता है भ्रान्ति रूप है। क्योंकि-आत्मा या पुरुष का अकर्त्तृत्व (अक- र्त्तापन) युक्ति से सिद्ध होचुका। आत्मा में जो कर्त्तृत्व की प्रतीति होती है, वह लिङ्ग शरीर, जो महत् तत्व आदि १८ तत्त्वों के संयोग से बताया जायगा, उसके सम्बन्ध से प्रतीत होता है। अर्थात्-जैसे लाल पुष्प की लाली उसके संयोग से काच में प्रतीत होती है, किन्तु वह लाली पुष्प ही की है, काच की नहीं, ऐसे ही, लिङ्ग शरीरका कर्त्तृत्व पुरुष में प्रतीत होता है, वह लिङ्ग शरीर का ही है, वास्तव में पुरुष का नहीं अतः पुरुष कर्त्ता नहीं, कर्त्ता जैसा है। तथा कर्त्तृत्व का अनु- भव भ्रान्तिरूप है। सर्वथा पुरुष उदासीन है। जिस प्रकार लिङ्ग के संयोग से अकर्त्ता पुरुष कर्त्ता जैसा प्रतीत होता है, वैसे ही पुरुष के संयोगसे अचेतन लिङ्ग चेतन जैसा प्रतीत होता है, उस में भी चेतनत्व बुद्धि उसी प्रकार भ्रान्ति है ॥ २० ॥

हिन्दी सांख्य दर्शन (१७) पुरुष और लिङ्ग के संयोग का कारण । पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतःसर्गः ॥२१॥ पहिली कारिका के व्याख्यान में यह बात समझी गई कि- पुरुष और प्रधान या लिङ्ग के संयोग से उनमें परस्पर के कर्त्तृत्व और चेतनत्व धर्म भ्रान्ति से प्रतीत होते हैं। किन्तु अभी यह बात समझ में नहीं आई, कि- इनका संयोग ही पहिले कैसे हुआ ? इस प्रश्न के उत्तरके लिये ही यह कारिका आई है। इसमें कहा गया है कि- भोक्ता और भोग्य की योग्यता से ही इन दोनों का किसी अनादि काल में संयोग होगया था, और उनके संयोग से ही यह महत् आदि तत्वों या संसार की सृष्टि हुई। अर्थात्-जैसे-किसी भूखे आदमी को कोई फल मोदक आदि भक्ष्य वस्तु मिले और वह उसे खाने लगे । इस बात को ध्यान में देने से प्रतीत होगा कि-आदमी में भोजन करने की योग्यता है और फल आदि में भोग्यता की, वृक्षों से उस के संयोग होते ही भोजन रूप क्रिया की सृष्टि होने लगती है यदि उनका संयोग न हो अथवा भोक्ता का भोक्ता के साथ तथा भोग्य का भोग्यके साथ संयोग हो भी जावे तो उनकी योग्यता वहां सृष्टि को प्रवृत्त नहीं कर सकती, बल कि- वह व्यर्थ ही रहेगी। ऐसे ही पुरुष की भोक्तृत्व योग्यता और प्रधान की भोग्यत्व योग्यता से उनका कभी संयोग हुआ,और उसी से सृष्टिका आरम्भ हुआ ऐसे ही कारिका में पंगु और अन्ध का दृष्टान्त भी है। इस की व्याख्या यों है कि- जैसे कोई पंगु और अन्ध दो मनुष्य हैं, और वे दोनों ही अपने संघ के साथ बनमें जाते हुये डाकुओंके उपद्रव से अपने साथियों से अलग होगये, तथा वनमें कहीं २

( १८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन टकराते हुये आपस में दैव योग से मिले और उनका परस्पर में विश्वास हुआ । अन्धे में चलने की शक्ति है, और पंगु में देखने की, इसीसे अब वे दोनों मिलकर गमन और दर्शन क्रियाओं को कर सकते हैं, अतः पंगु अन्धे के कन्धे पर चढा, तो अन्धा चला और पंगुने उसे राह बताई, सुखराम् वे अपने घर पर पहुंचे और दोनों ने अपना सम्बन्ध छोड़ा अर्थात् संयोग का त्याग किया । ऐसे ही चेतन पुरुष प्रकृति के साथ मिलकर उसके संयोग से ज्ञान गुण को प्राप्त होकर उसे छोड़ देता है, और वह भी अपना कार्य पूरा करके उसे छोड़ देती है । यही मोक्ष का स्थान है, तथा संयोग और उस से सृष्टि क्रम है ॥ २१ ॥ सृष्टि का क्रम । प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्चषोडशकः । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥२२॥ प्रकृति से महत् तत्व, उससे अहंकार, इस से १६ तत्त्व ( ५ ज्ञानेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें १ मन ५ तन्मात्र ) और उनमें से भी ५ तन्मात्रों से ५ महाभूत ( पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ) उत्पन्न होते हैं ॥ अर्थात् शब्द तन्मात्रसे शब्द गुण वाला आकाश, (१) शब्द तन्मात्र से सहित; स्पर्श तन्मात्र से शब्द और स्पर्शगुणवाला वायु, (२) शब्द और स्पर्श तन्मात्र से सहित रूप तन्मात्र से शब्द स्पर्श और रूप गुण वाला अग्नि ( ३ ) शब्द, स्पर्श, रूप तन्मात्र से संयुक्त रस तन्मात्र से शब्द, स्पर्श, रूप, और रस गुण वाला जल (४) और शब्द, स्पर्श, रूप, तथा रस तन्मात्र से युक्त गन्ध तन्मात्र से शब्द, स्पर्श, रूप, गन्धगुण वाली पृथिवी ( ५ ) उत्पन्न होती है ॥

हिन्दी सांख्य दर्शन ( १६ ) प्रकृति, प्रधान, ब्रह्म, अव्यक्त, बहुधानक, और माया, ये शब्द पर्याय (समान अर्थ के वाचक) हैं। महान्, बुद्धि, आसुरी, मति, ख्याति और ज्ञान ये सब पर्याय हैं । ऐसे ही अहंकार, भूतादि, वैकृत, तैजस और अभिमान, ये पर्याय हैं ॥ २२ ॥ बुद्धि का लक्षण और उस का धर्म । अध्यवसायोबुद्धिर्धर्मोज्ञानं विरागऐश्वर्यम् । सात्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥२३॥ बुद्धि का लक्षण अध्यवसाय है। अर्थात् पुरुष मात्र ही जब किसी कर्म में प्रवृत्त होता है, उस समय अन्तःकरण में तीन वृत्तियें या क्रियाएं होती हैं, जैसे पहिले आलोचन (वस्तु का ज्ञान) फिर ‘मैं इस में अधिकारी हूं’ ऐसा अभि- मान, फिर ‘मुझे यह करना चाहिये’ ऐसा अध्यवसाय या निश्चय ज्ञान होता है। इन में यह तीसरी वृत्ति या ज्ञान जिस में होता है, वही बुद्धि है। बुद्धि में ( १ ) धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य्य ये चार सात्विक धर्म रहते हैं, और अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य्य ये चार तामस धर्म रहते हैं । वैराग्य की चार अवस्थाएं होती हैं, जिन के नाम— ( १ ) यतमानसंज्ज्ञा ( २ ) व्यतिरेकसंज्ज्ञा ( ३ ) एकेन्द्रिय- संज्ज्ञा और ( ४ ) वशीकारसंज्ज्ञा हैं ॥ २३ ॥ अहंकार का लक्षण और उसका कार्य भेद । अभिमानोऽहंकारः तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः । एकादशकश्चगणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥ अभिमान (मैं हूं यह ज्ञान) अहंकार है। उस से दो प्रकार की सृष्टि होती है, ( १ ) ग्यारह इन्द्रियें और ( २ )

( १० ) हिन्दी सांख्य दर्शन पांच तन्मात्र ( कुल १६ ) ॥ २४ ॥ एक अहंकार से जड़ और प्रकाश की उत्पत्ति सात्विक एकादशकः प्रवर्त्ततेवैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्रः स तामसः, तैजसादुभयम् ॥२५॥ अहंकार में तीन गुण होते हैं-सत्व, रज, और तम । जब इन में सत्व गुण से रज और तम दब जाते हैं, उस समय अहंकार की वैकृत संज्ञा (नाम) होती है । उस वैकृत अहंकार से सत्वगुण की सहायता से ग्यारह इन्द्रियें उत्पन्न होती हैं । इसी से ये इन्द्रियें सात्विक कही जाती हैं। जिस समय तमोगुण से सत्व और रज तिरस्कृत हो जाते हैं, उस समय जो अहंकार है, उस की भूतादि संज्ञा और तमो- गुण के आधिक्य से 'तामस' संज्ञा भी हो जाती है, उस भूतादि या तामस नाम अहंकार से उस के समान स्वभाव वाले शब्द आदि ५ तन्मात्र उत्पन्न होते हैं । एवम्-जब रजो गुण से सत्व और तम दब जाते हैं, या जित हो जाते हैं, उस समय उस की तैजस संज्ञा हो जाती है । उस तैजस अहंकार से दोनों ( इन्द्रियें और तन्मात्र ) उत्पन्न होते हैं । क्योंकि-वैकृत अहंकार विकृत हो कर जब ११ इन्द्रियों को उत्पन्न करना चाहता है, तो वह निष्क्रिय होने के कारण अपने कार्य को कर नहीं सकता, अतः वह तैजस अहंकार जो क्रिया स्वभाव है, उस की सहायता लेता है, तथा तामस अहंकार भी निष्क्रिय होने से तन्मात्र रूप अपने कार्य को नहीं कर सकता अतः उसे भी तैजस अहंकार की सहायता लेनी पड़ती है । इस प्रकार वैकृत और भूतादि दोनों अहं- कारों के साथ उनके कार्य में सहायक होने के कारण यह दोनों प्रकार के कार्यों का कारण बनता है ॥ २५ ॥