संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
**९—भगवान् वसिष्ठकी जय** (श्रीसूरजचंदजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी')
१० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *
Man it does not mean this or that but humanity.
ऐसा क्यों हो रहा है । इसका एकमात्र कारण यही है कि हमारे विश्वविद्यालयोंका आमूल-चूल परिवर्तन नहीं हो पाता । सभी सुधार-योजनाओंपर भी अमल नहीं किया जाता और न घर और बाहर बालकोंकी शिक्षा-दीक्षापर ही समुचित ध्यान दिया जाता है । ऐसी दशामें तथाकथित आर्य-व्यक्तित्व बालकोंमें कैसे उत्पन्न हो सकता है ? इसी सत्यपर प्रकारान्तरसे राष्ट्रपति डा० राजेन्द्रप्रसादजीके ये शब्द पूर्णतः चरितार्थ होते हैं—
हम अपने सामने कितने भी महान् व उच्च आदर्शोंको लेकर जिस-किसी तरहकी राज-व्यवस्था क्यों न स्थापित कर लें, हमारी आर्थिक व सामाजिक विचारधारा कितनी भी समान व उदार क्यों न हो, पर जबतक हमारी अगली पीढ़ीका शारीरिक एवं मानसिक सौष्ठव व गठन शिशु-जीवनमें ही ठीक न होगा, तबतक देशमें हम सुख व शान्ति स्थापित करनेमें सफल नहीं हो सकते ।
यहाँ योगवासिष्ठ-सम्मत यह बात भी विचारणीय है कि ज्ञान-विकास और आत्म-ज्ञानप्राप्ति न केवल शास्त्र और गुरु-वचन-साध्य ही है प्रत्युत स्वानुभवका भी विषय है—
शास्त्रार्थे बुध्यते नात्मा गुरुवचनतो न च ।
बुध्यते स्वयमेवैष स्वबोधवशतस्ततः ॥
\hfill (यो० वा०)
इस समय हम देखते हैं हमारे विद्यार्थी आत्मनिर्भर नहीं हो पाते । वे केवल पुस्तक-कीट और परप्रत्ययनेय मति ही बने रहते हैं । वे यह भी नहीं समझते कि पेड़ भीतरसे बढ़ता है, माली और उपकरण तो उसके निमित्तमात्र होते हैं । वे प्रायः इस वैदिक सत्यसे भी अनभिज्ञ-से ही रहते हैं—
‘आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत् ।’
एतद्विषयक योगवासिष्ठकी तो यह सम्मति है कि आत्म-शान्ति और विश्व-शान्ति आत्म-विकास और आत्म-ज्ञानसे ही प्राप्त होती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं । अतएव सर्वदुःखहर्त्ता आत्मावलोकनमें ही भूति-विभूतिके इच्छुक व्यक्ति लगा रहे—
करोतु भुवने राज्यं विशत्वम्भोदमम्बुवत् ।
आत्मलाभादृते जन्तुर्विश्रान्तिमधिगच्छति ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ५ । २४)
आत्मावलोकने यत्नः कर्त्तव्यो भूतिमिच्छता ।
सर्वदुःखशिरश्छेद आत्मालोकेन जायते ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ७५ । ४६)
योगवासिष्ठसम्मत आत्मावलोकनसे न केवल आत्म-शान्ति प्राप्त होती है अपितु योगवासिष्ठके बार-बारके पाठ और अवलोकनसे विश्वबन्धुता—प्राणस्पृहणीय नागरिकता भी प्राप्त होती है, जो आजकी अत्यधिक वाञ्छनीय वस्तु है—
एतच्छास्त्राभ्यासात् पौनःपुन्येन वीक्षणात् ।
परा नागरतोदेति महत्त्वगुणशालिनी ॥
\hfill (यो० वा० २ । १८ । ३६, ८)
योगवासिष्ठकारके मतसे योगवासिष्ठ-ग्रन्थावलोकनका एकान्त फल यह भी है—
बोधस्यापि परं बोधं बुद्धिरिति न संशयः ।
जीवन्मुक्तत्वमस्मिंस्तु श्रुतिः समनुभूयते¹ ॥
\hfill (यो० वा० ३ । ८ । १३ । १५)
भगवान् वसिष्ठकी जय
(लेखक—पं० श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी (डाँगीजी))
योगवासिष्ठके प्रवक्ता भगवान् वसिष्ठका परिचय कराना अत्यन्त कठिन है, फिर भी उनके पारमार्थिक स्वरूपका मनन करना हो तो उनका भगवान्के अवतारोंके साथ क्या सम्बन्ध है ? उसे स्मरण किया जाना अनिवार्य आवश्यक है ।
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् रामके गुरु, भगवान् परशुरामके पिता महर्षि जमदग्नि और भगवान् दत्तात्रेयके मौसा, परम सिद्ध भगवान् कपिल और परमहंस नवयोगेश्वर तथा जड़-भरतके पिता भगवान् ऋषभदेवके दादा, राजर्षि आग्नीध्रके बहनोई, भगवान् मनुके पुत्र, आद्य नरेन्द्र प्रियव्रतकी बहन देवी देवहूतिके जामाता भगवान् वसिष्ठकी सदा काल जय हो, विजय हो, जिन्होंने संसार-चक्रको छेदन करनेके लिये पुण्य-कर्मका चक्र बताया और पुण्यकर्मके चक्रको भंग करनेके लिये धर्मचक्र चलाया और फिर गुरुचक्रका प्रवर्त्तन करके सिद्धचक्रमें प्रवेश करा दिया—अजातवादके परम रहस्यमय सिद्धान्तके आद्य प्रणेता भगवान् वसिष्ठ ही हैं ।
इस अद्वैत, तुरीय और अज तत्त्वमे भी परं तुरीयातीत, द्वैताद्वैतातीत और अवाच्यपदगांभीर्य परमतत्त्वके प्रणेता भगवान् वसिष्ठ सर्वत्र सर्वथा, सर्वदा सम्पूर्ण आराध्य बनें ।
१. इस ग्रन्थके श्रवणसे परम ज्ञान प्राप्त होता है, फिर जीवन्मुक्तिका अनुभव होने लगता है ।
**१०—योगवासिष्ठका साध्य-साधन**
* योगवासिष्ठका साध्य-साधन *
११
योगवासिष्ठका साध्य-साधन
योगवासिष्ठ महारामायणका प्रारम्भ होता है—देवराज इन्द्रके द्वारा, महर्षि वाल्मीकिके पास राजा अरिष्टनेमिके भेजे जानेके प्रसङ्गसे । अरिष्टनेमि महर्षि वाल्मीकिसे मोक्षका साधन पूछते हैं । उसके उत्तरमें वाल्मीकिजी महाराज अपने शिष्य भरद्वाजके साथ हुए संवादका वर्णन करते हुए भगवान् रामके प्राकट्यकी बात सुनाते हैं । तदनन्तर महर्षि विश्वामित्र-के दशरथ-दरबारमें आकर यज्ञरक्षार्थ रामको माँगनेका प्रसङ्ग सुनाकर रामके वैराग्य तथा राम-वसिष्ठ-संवादके रूपमें छः प्रकरणोंमें 'योगवासिष्ठ' नामक विशाल ग्रन्थका श्रवण कराते हैं ।
योगवासिष्ठ अजातवाद या केवल ब्रह्मवादका ग्रन्थ है । इसके सिद्धान्तानुसार एकमात्र चेतनतत्त्व परब्रह्मके अतिरिक्त कोई अन्य सत्ता ही नहीं है । जैसे समुद्रमें अनन्त तरङ्गों उठती-मिटती रहती हैं, वे समुद्रसे भिन्न नहीं हैं, इसी प्रकार नित्य समरूप अनादि अनन्त सच्चिदानन्दघन परमात्म-चैतन्यरूप समुद्रमें नाना प्रकारके अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाशकी लीला-तरङ्गें दीखती रहती हैं । चित्त या अहंकार—जो वास्तवमें चेतन-ब्रह्मसे अभिन्न तथा ब्रह्मरूप ही है—इस दृश्य-प्रपञ्चका—सृष्टि, स्थिति-विनाशका कारण है । अहङ्कारका नाश होते ही, जो अहंकारकी सत्ता न माननेसे ही नाश हो जाता है, केवल एक ब्रह्म-चैतन्य ही रह जाता है । इसी एक तत्त्वका विभिन्न आख्यानों, इतिहासों, कथाओंके द्वारा इस विशाल ग्रन्थमें प्रतिपादन किया गया है । यह ग्रन्थ पुनरुक्तिपूर्ण है । एक ही सत्य तत्त्वको दृढ़ता-पूर्वक हृदयमें जमा देनेके लिये, एक ही सत्य तत्त्वकी अनुभूति या प्राप्ति करा देनेके लिये बार-बार विभिन्न रूपोंसे एक-सी ही युक्तियों तथा उपमाओंका उल्लेख किया गया है ।
सृष्टि न कभी हुई, न है—एकमात्र ब्रह्म ही है । इस प्रकार सृष्टिका अभाव प्रतिपादन करनेपर भी इस ग्रन्थमें कहीं भी यथेच्छाचार, शास्त्रनिषिद्ध व्यवहार, रागद्वेष-कामक्रोधादि-जनित अनाचार, भ्रष्टाचार, दुष्ट-सङ्ग आदिका समर्थन नहीं किया गया है; वरं बड़ी कड़ाईके साथ शास्त्राज्ञापालन-रूप सदाचारपरायणता एवं त्यागमय पुण्यमय जीवनकी आवश्यकता बतायी गयी है । राग, ममता, कामना, तृष्णा, इच्छा और इनके मूल अहंकारके त्यागकी महत्ता स्थान-स्थानपर बतलायी गयी है । इन्द्रियभोगोंमें फँसे हुए मनुष्योंकी घोर दुर्दशाका वर्णन करते हुए वैराग्यकी अत्यन्त प्रयोजनीयताका प्रतिपादन किया गया है । साधक पुरुषको अहम्भावनारूप ग्रन्थिका यथार्थ ब्रह्मज्ञानके द्वारा भेदन करके सच्चा ज्ञानी बननेका उपदेश दिया गया है; केवल ज्ञानका कथनमात्र करनेवाले 'ज्ञानबन्धु' ( नकली ज्ञानी ) बननेका नहीं । महर्षि वसिष्ठने यहाँतक कहा है कि 'वे ज्ञानबन्धु ( नकली ज्ञानी ) से तो अज्ञानीको अच्छा समझते हैं ( क्योंकि वह बेचारे अपनेको तथा दूसरोंको धोखा तो नहीं देते । ) महर्षि कहते हैं—
ज्ञानिनैव सदा भाव्यं राम न ज्ञानबन्धुना ।
अज्ञातारं वरं मन्ये न पुनर्ज्ञानबन्धुताम् ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २१ । १ )
फिर भगवान् श्रीरामके पूछनेपर नकली ज्ञानी ( ज्ञान-बन्धु ) के लक्षण बतलाते हैं ।
व्याचष्टे यः पठति च शास्त्रं भोगाय शिल्पिवत् ।
यतते न त्वनुष्ठाने ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥
कर्मस्पन्देषु नो बोधः फलितो यस्य दृश्यते ।
बोधशिल्पोपजीवित्वाज्ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥
वसनाशनमात्रेण तुष्टाः शास्त्रफलानि ये ।
जानन्ति ज्ञानबन्धूंस्तान्विद्याच्छास्त्रार्थदृष्टिरिनः ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २१ । ३–५ )
'जैसे शिल्पी जीविकाके लिये ही शिल्पकला सीखता है, वैसे ही जो मनुष्य केवल भोगप्राप्तिके लिये ही शास्त्रोंको पढ़ता और उसकी व्याख्या करता है, स्वयं शास्त्रके अनुसार आचरणके लिये प्रयत्न नहीं करता, वह ज्ञानबन्धु कहलाता है । शास्त्राध्ययनसे जिसको शाब्दिक बोध हो गया है, परन्तु उस बोधका फल जो विनाशशील भोगों—दृश्याकारोंसे वैराग्य होना चाहिये, सो नहीं हुआ तो उसका यह शास्त्रज्ञान शिल्पमात्र है—तत्त्वज्ञानकी बातें बनाकर दूसरोंको ठगनेके लिये चातुर्यपूर्ण कलामात्र है ।, उस कलासे केवल जीविका चलानेवाला होनेके कारण वह मनुष्य ज्ञानबन्धु कहलाता है । जो केवल भोजन-वस्त्रमें ही संतुष्ट रहकर भोजनादिकी प्राप्तिको ही शास्त्राध्ययनका फल समझते हैं, वे शास्त्रोंके अर्थको एक
१२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *
शिल्पकला ही मानते हैं। ऐसे लोगोंको ज्ञानबन्धु जानना चाहिये।' फिर कहते हैं—
अपुनर्जन्मने यः स्याद् बोधः स ज्ञानशब्दभाक् ।
वसनाशनदा शेषा व्यवस्था शिल्पजीविका ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २२ । ४ )
'जिससे मोक्षकी प्राप्ति होती है, पुनर्जन्मकी नहीं, उसीका नाम ज्ञान है। उसके अतिरिक्त दूसरा जो शब्दज्ञानका चातुर्य है, वह तो रोटी-कपड़ा प्राप्त करनेकी कलामात्र है। उसे केवल भोजन-वस्त्र जुटानेवाली व्यवस्था समझना चाहिये।'
इस परम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये शम ( मनकी स्ववशता ), दम (इन्द्रियनिग्रह), शास्त्रीय सदाचारका सेवन, दैवी सम्पत्ति-के गुणोंका अर्जन तथा भोग-वैराग्यपूर्वक ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे सद्गुरुके शरणमें जाना आवश्यक है। सद्गुरु वही है, जो शिष्यके अज्ञानान्धकारको अपने निर्मल स्वप्रकाश ज्ञानकी विमल ज्योतिसे हर ले और शिष्य वही है, जो विनय तथा सेवापरायण होकर ज्ञानी गुरुसे प्रश्न करे और उनके आज्ञा-अनुसार अपना जीवन निर्माण करे। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
अतत्त्वज्ञमनादेयवचनं वाग्विदांवर ।
यः पृच्छति नरं तस्मान्नास्ति मूढतरोऽपरः ॥
प्रामाणिकस्य तज्ज्ञस्य वक्तुः पृष्टस्य यत्नतः ।
नानुतिष्ठति यो वाक्यं नान्यस्तस्मान्नराधमः ॥
( मुमुक्षु प्रकरण ११ । ४५-४६ )
"वाग्नेत्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! जो तत्त्वका ज्ञान नहीं रखता, उसके वचन मानने योग्य नहीं हैं। ऐसे तत्त्वज्ञानहीन मनुष्यसे जो तत्त्वविषयक प्रश्न करता है, उससे बढ़कर दूसरा कोई 'मूर्ख' नहीं है।" (साथ ही, जो मनुष्य किसी सच्चे ज्ञानी महात्मासे) "पूछकर भी उस प्रमाणकुशल तथा तत्त्वज्ञानी वक्ताके उपदेशके अनुसार यत्नपूर्वक आचरण नहीं करता, उससे बढ़कर 'नराधम' भी दूसरा कोई नहीं है।"
अतएव न तो बिना जाने-समझे किसीसे पूछना चाहिये तथा न तत्त्वज्ञ महात्माका उपदेश प्राप्त करके उसकी अवहेलना ही करनी चाहिये। साथ ही तत्त्वज्ञ पुरुषको भी चाहिये कि वे यथार्थ अधिकारीको ही तत्त्वका उपदेश दें। महर्षि कहते हैं—
पूर्वापरसमाधानक्षमबुद्धावनिन्दिते ।
पृष्टं प्राज्ञेन वक्तव्यं नाधमे पशुधर्मिणी ॥
प्रामाणिकार्थयोग्यत्वं पृच्छकस्याविचार्य च ।
यो वक्ति तमिह प्राज्ञाः प्राहुर्मूढतरं नरम् ॥
( मुमुक्षु-प्रकरण ११ । ४९-५० )
'ज्ञानी महात्माको चाहिये कि पूर्वापरका विचार करके यथार्थ निश्चय करनेमें जिसकी बुद्धि समर्थ हो, जिसके आचरण निन्दनीय न हों, ऐसे ही पुरुषको उसके पूछे हुए तत्त्वका उपदेश दे। जो आहार-निद्रा, भय-मैथुन आदि पशुधर्मसे संयुक्त है, ऐसे अधमको उपदेश न दे। प्रश्नकर्त्तामें श्रुति आदि प्रमाणोंके द्वारा निर्णय किये हुए तत्त्व-पदार्थको ग्रहण करनेकी योग्यता है या नहीं, इसका विचार किये बिना ही जो वक्ता उसे उपदेश देता है, उसको ज्ञानीजन इस लोकमें महान् मूढ़ बतलाते हैं।'
इसीलिये महर्षि वसिष्ठ आदर्श गुरु हैं तथा भगवान् रामचन्द्र आदर्श शिष्य हैं। गुरु-शिष्यको इन्हींका अनुसरण करनेवाले होना चाहिये।
मुमुक्षुके जीवनमें सहज ही शास्त्रानुकूल आचरण, संयम, सत्य, शम, दम, विषय-वैराग्य और मोक्षकी तीव्र इच्छा होनी ही चाहिये। महर्षि वसिष्ठ तो शम, दम, सत्यादि गुणोंसे रहित मनुष्यको मनुष्य ही नहीं मानते। वे कहते हैं—
येषां गुणेष्वसंतोषो रागो येषां श्रुतं प्रति ।
सत्यव्यसनिनो ये च ते नराः पशवोऽपरे ॥
( स्थिति-प्रकरण ३२ । ४० )
'जिनका (इन शम-दमादि) गुणोंके विषयमें संतोष नहीं है (इनको जो बढ़ाना ही चाहते हैं), जिनका शास्त्रके प्रति अनुराग है तथा जिनको सत्यके आचरणका ही व्यसन है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं, दूसरे तो पशु ही हैं।'
अतएव सच्चे कल्याणकामी पुरुषोंको इन शास्त्रानुमोदित गुणोंसे सम्पन्न होकर परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये पूर्णरूपसे साधनाभ्यास करना चाहिये। इसके लिये सच्चे महात्मा पुरुषोंका सङ्ग तथा सेवन (उनके कथनानुसार जीवन-निर्माण) आवश्यक है। इसके बिना कोरे तप, तीर्थ या शास्त्राध्ययनसे सफलता नहीं मिलती। पर महात्मा सच्चे होने चाहिये। और कुछ न हो तो इतना अवश्य देख ले कि हम जिनका सङ्ग करते हैं, उनकी संगतिसे दुर्गुणों-दुराचारोंका
* योगवासिष्ठका साध्य-साधन * १३
नाश होता है या नहीं। उनके जीवनगत सहस्र शास्त्रप्रतिपादित आचरणोंसे हमें दुराचार-दुर्गुणोंके त्याग और सदाचार-सद्गुणोंके ग्रहणके लिये प्रेरणा मिलती है या नहीं। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
लोभमोहरुषां यस्य तनुतानुदिनं भवेत्।
यथाशास्त्रं विहरति स्वकर्मसु स सज्जनः॥
(स्थिति-प्रकरण ३३।१५)
'जिसके सङ्गसे लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन क्षीण होते हैं और जो शास्त्रके अनुसार अपने कर्मोंका आचरण करनेमें लगा रहता हो, वह सत् पुरुष है।'
मोक्षके द्वारपर निवास करनेवाले ये चार द्वारपाल बतलाये गये हैं—शम, विचार, संतोष और साधुसङ्ग । इन चारोंकी भलीभाँति सेवा की जाती है तो ये मोक्षरूपी राज-प्रासादका द्वार खोल देते हैं।
ऐसे सैकड़ों, हजारों वचन इस महान् ग्रन्थमें हैं, जिनमें शास्त्रोक्त आचरण, संयम, नियम आदि साधनोंकी उपादेयता और नितान्त प्रयोजनीयताका उपदेश भरा है।
योगवासिष्ठमें दैवकी बड़ी निन्दा तथा पौरुषकी प्रशंसा की गयी है। एवं निष्कामभावसे सावधानीके साथ शास्त्रानुकूल सत्कर्म करनेपर बहुत जोर दिया गया है। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
यस्तूदारचमत्कारः सदाचारविहारवान्।
स निर्याति जगन्मोहान्मृगेन्द्रः पञ्जरादिव॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ६।२८)
व्यवहारसहस्राणि यान्युपायान्ति यान्ति च।
यथाशास्त्रं विहर्तव्यं तेषु त्यक्त्वा सुखासुखे॥
यथाशास्त्रमनुच्छिन्नां मर्यादां स्वामनुज्झतः।
उपतिष्ठन्ति सर्वाणि रत्नान्यम्बुनिधाविव॥
स्वार्थप्रापककार्यैकप्रयत्नपरता बुधैः।
प्रोक्ता पौरुषशब्देन सा सिद्धयै शास्त्रयन्त्रिता॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ६।३०-३२)
'जो पुरुष उदार-स्वभाव तथा सत्कर्मके सम्पादनमें कुशल है, सदाचार ही जिसका विहार है, वह जगत्के मोह-पाशसे
सं० यो० व० अं० २—
वैसे ही निकल जाता है, जैसे पिंजरेसे सिंह । संसारमें आने-जानेवाले सहस्रों व्यवहार हैं। उनमें सुख और दुःख-बुद्धिका त्याग करके शास्त्रानुकूल आचरण करना चाहिये । शास्त्रके अनुकूल और कभी उच्छिन्न न होनेवाली अपनी मर्यादाका जो त्याग नहीं करता, उस पुरुषको समस्त अभीष्ट वस्तुएँ वैसे ही प्राप्त हो जाती हैं, जैसे सागरमें गोता लगानेवालेको रत्नोंका समूह । जिसमें अपना मानव-जीवनका प्रधान कार्य—स्वार्थ सधता हो, उस स्वार्थकी प्राप्ति करानेवाले साधनोंमें ही तत्पर हो रहनेको विद्वान्लोग 'पौरुष' कहते हैं'।
ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः॥
(मुमुक्षु प्रकरण ७।३)
'जो लोग उद्योगका त्याग करके केवल दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोका नाश कर डालते हैं। वे आलसी मनुष्य आप ही अपने शत्रु हैं।'
अशुभेषु समाविष्टं शुभेष्वेवावतारयेत्।
प्रयत्नाच्चित्तमित्येष सर्वशास्त्रार्थसंग्रहः॥
यच्छ्रेयो यदनुच्छं च यदपायविवर्जितम्।
तत्तदाचर यत्नेन पुत्रेति गुरवः स्थिताः॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ७।१२-१३)
'अशुभ कर्मोंमें लगे हुए मनको वहाँसे हटाकर प्रयत्नपूर्वक शुभ कर्मोंमें लगाना चाहिये। यह सब शास्त्रोंके सारका संग्रह है। जो वस्तु कल्याणकारी है, वह तुच्छ नहीं है (वही सबसे श्रेष्ठ है)। तथा जिसका कभी नाश नहीं होता, उसीका यत्नपूर्वक आचरण करना चाहिये—गुरुजन यही उपदेश देते हैं।'
जीवनमुक्तके लक्षण बतलाते हुए महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
यथास्थितमिदं यस्य व्यवहारवतोऽपि च।
अस्तं गतं स्थितं व्योम जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
नोदैत्यनिष्टतां यातो जाग्रत्येव सुषुप्तवत्।
य आस्ते व्यवहर्तैव जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
नोदेति नास्तमायाति सुखे दुःखे मुखप्रभा।
यथाप्राप्तस्थितेर्यस्य जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *
यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधो जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ यस्य नाहंकृतो भावो यस्य बुद्धिर्न लिप्यते । कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्योन्मेषनिमेषार्द्धाद्विदः प्रलयसम्भवौ । पश्येत् त्रिलोक्याः स्वसमः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोन्मुक्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ( उत्पत्ति-प्रकरण ९ । ४-७, ९-१२ )
'यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी दृष्टिमें यह जगत् ज्यों-का-त्यों बना हुआ ही विलीन हो जाता है और आकाशके समान शून्य प्रतीत होने लगता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो व्यवहारमें लगा हुआ ही एकमात्र बोधनिष्ठा-को प्राप्त होकर जाग्रद्-अवस्थामें भी सुषुप्त पुरुषकी भाँति राग-द्वेष, हर्ष-शोकादिसे रहित हो जाता है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं। जिसके मुखकी कान्ति सुखमें उदित नहीं होती-जगमगाती नहीं और दुःखमें अस्त-फीकी नहीं हो जाती और जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तोषपूर्वक जो जीवन-निर्वाह करता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो निर्विकार आत्मामें सुषुप्तिकी तरह स्थित रहता हुआ भी अविद्यारूप निद्राका निवारण हो जानेसे सदा जागता रहता है, पर जो जाग्रत् भी नहीं है, भोग-जगत्में सदा सोया हुआ है अर्थात् भोगबुद्धिसे जो किसी भी पदार्थका उपभोग नहीं करता और जिसका ज्ञान वासनारहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसमें अहङ्कारका भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म करते समय कर्तृत्वके और कर्म न करते समय अकर्तृत्वके अभिमानसे लिप्त नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप परमात्माके किञ्चित् उन्मेष तथा निमेषमें ही तीनों लोकोंकी प्रलय तथा उत्पत्ति देखता है और जिसका सबके प्रति समान आत्मभाव है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। न तो जिससे लोगोंको उद्वेग होता है और न लोगोंसे जिसको उद्वेग होता है तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिसकी संसारके प्रति सत्यता-बुद्धि नहीं रही है, जो अवयवयुक्त दीखनेपर भी वस्तुतः अवयव-
रहित है। जो चित्तयुक्त होकर भी वास्तवमें चित्तसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है।' जीवन्मुक्तकी इस स्वरूप-व्याख्यासे पता लगता है कि यथार्थ ज्ञान ही जीवन्मुक्तका स्वरूप होता है। केवल मौखिक ज्ञान तो प्रदर्शनमात्र तथा ढोंगकी चीज है।
योगवासिष्ठमें योगके साधन तथा योगसिद्धियोंका एवं योगभूमिकाओंका भी महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन है। उनका मर्म बिना अनुभवी योगसिद्ध गुरुके समझमें आना बहुत कठिन है। योगवासिष्ठमें दर्शन तथा योगसम्बन्धी ऐसे-ऐसे शब्द आये हैं, जिनका अर्थ समझना केवल भाषाज्ञानसाध्य नहीं, परन्तु साधन-साध्य है।
योगवासिष्ठमें कर्म और भक्तिका कहीं निषेध नहीं है। कर्मकी तो परमावश्यकता ही बतलायी है। पौरुष कर्ममय ही होता है। अवश्य ही वह कर्म होना चाहिये कामना, आसक्ति तथा अहंकारसे रहित। यद्यपि भक्तिका वैष्णवशास्त्रों-जैसा वर्णन नहीं है, तथापि सदाचार-सत्सङ्गमूलक उपासनाका जगह-जगह प्रतिपादन है। प्रह्लादके प्रसङ्गसे भक्तिकी भी बहुत बातें आयी हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रको पूर्णब्रह्म बतलाकर स्वयं वसिष्ठने नमस्कार किया है। महर्षि भरद्वाजने अपने तथा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीमें भेद बतलाते हुए महर्षि वाल्मीकिजीसे कहा है—
श्रीरामचन्द्रजी तो परम योगी, समस्त विश्वके वन्दनीय, देवताओंके ईश्वर, अजन्मा, अविनाशी, विशुद्ध ज्ञान-स्वभाव, समस्त गुणोंके निधान, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके आधार एव तीनों लोकोंके उत्पादन, संरक्षण और अनुग्रह करनेवाले हैं—
स खलु परमयोगी विश्ववन्द्यः सुरेश्वरो जननमरणहीनः शुद्धबोधस्वभावः। सकलगुणनिधानं सन्निधानं रमाया- स्त्रिजगदुदयरक्षानुग्रहाणामधीशः ॥ नि० प्र० पूर्वार्ध ० १२७ । २)
महर्षि विश्वामित्रने भगवान श्रीरामचन्द्रकी बहुत बड़ी महिमाका गान किया है और वसिष्ठादि सभी उसे सुनकर अत्यन्त आह्लादित हुए हैं।
.. इसी श्रीरामचन्द्रजीका अज्ञानी बनकर ज्ञान प्राप्त करनेकी
**११—योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये**<br>(भक्त श्रीरामशरणदासजी)
* योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये * १५
बात, सो लीलामय भगवान्के लिये इसमें कौन-सी दोषकी बात है। जो भगवान् श्रीरामचन्द्र विद्यार्थी बनकर गुरु वसिष्ठसे विद्याध्ययन करते हैं, विश्वामित्रसे अस्त्र-शिक्षा ग्रहण करते हैं, सच्चे पतिके रूपमें सीताके दुःखसे महान् दुखी होते हैं, स्त्रैण तथा अज्ञकी भाँति सीताके लिये वन-वन रोते फिरते और जिस किसीसे सीताका पता पूछते हैं, लक्ष्मण के लिये विलाप-प्रलाप करते हैं, वे भगवान् यदि लोक-संग्रहके लिये अज्ञानी, वैराग्यवान् तथा मुमुक्षु बनकर आदर्श शिष्य लीलामें प्रवृत्त होकर महर्षि वसिष्ठको ज्ञानशास्त्रके प्रतिपादन-में प्रवृत्त करते हैं और उसे सुनकर अपनेको कृतार्थ मानते हैं तो इससे उनकी परात्परता, परब्रह्मरूपता, विशुद्धज्ञानस्वरूपता, ईश्वरता आदिमें कहीं कुछ कमी आ जाती हो-यह तो मानना ही भूल है।
कुछ सज्जनोंका कथन है कि योगवासिष्ठमें बहुत अनुचित रूपसे नारी-निन्दा की गयी है; पर वस्तुतः ऐसी भी बात नहीं है। यों तो भोगदृष्टिसे जो कुछ भी आसक्ति-कामना बढ़ानेवाली चीजें हैं, परमार्थ क्षेत्रमें वे सभी निन्दनीय तथा त्याज्य हैं—नारी, धन, राज्य, इन्द्रियोंके प्रत्येक विषय। पर योगवासिष्ठमें 'नारी-गौरव' की प्रतिष्ठा है। शिखिध्वज-जैसे राज्यत्यागी अरण्यवासी तपोमूर्ति पुरुषको चूडाला नारी ही विशुद्ध ज्ञानका उपदेश करके उन्हें परमपद प्राप्त करवाती है तथा अहंकारशून्य होकर राजकर्मके प्रतिपालनमें प्रवृत्त कराती है। चूडाला-जैसी योगसिद्धा, ज्ञान-विज्ञानसम्पन्ना, ब्रह्मकनिष्ठ ब्रह्मस्वरूपा नारीका जिस ग्रन्थमें विशद वर्णन हो और नारी इतनी उच्च स्तरतक पहुँच सकती है; इसका जिसमें प्रतिपादन हो, उस ग्रन्थको नारी-निन्दक मानना कभी युक्तिसंगत नहीं है।
योगवासिष्ठमें सुन्दर-सुन्दर आख्यानों, इतिहासोंके द्वारा बड़ी ही सुन्दर रीतिसे ब्रह्मतत्त्वका प्रतिपादन हुआ है, जो एक महान् कार्य है। इसमें दोषदृष्टि न करके सभीको अपनी रुचि तथा भावके अनुसार यथासाध्य लाभ उठाना चाहिये।
योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये
( लेखक—भक्त श्रीरामशरणदासजी )
'कल्याण'का विशेषाङ्क योगवासिष्ठाङ्क निकल रहा है, यह बड़े ही आनन्दकी बात है। यह बड़ा ही उपादेय सर्वश्रेष्ठ ज्ञानप्रतिपादक महान् ग्रन्थ है। इसमें आत्मा-परमात्मा, जीव-जगत्, बन्धन-मोक्ष आदि दुरुह विषयोंका बहुत ही सुन्दर स्पष्टीकरण किया गया है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक स्वयं परमात्मा भगवान् श्रीराघवेन्द्र और परम पूज्य ज्ञानस्वरूप महर्षि वसिष्ठके संवादरूपमें यह निस्सन्देह अत्युत्कृष्ट रचना है। इसलिये इसका प्रकाशन बहुत ही आदरणीय है। परंतु बड़े खेदके साथ निवेदन करते हुए मैं यह नम्रताके साथ चेतावनी देता हूँ कि इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये। मैंने देखा है कि ढोंगी लोग संतों-का वेष बनाकर 'योगवासिष्ठ' और 'विचारसागर' लिये गाँव-गाँव घूमते हैं, चेला-चेली बनाते हैं। शास्त्रीय वर्णाश्रमधर्म, सदाचार, शम, दम, ईश्वरभक्ति, भगवत्पूजन, नामजप-कीर्तन, संध्या-अर्चना, श्राद्ध-तर्पण आदिका घोर विरोध करके लोगोंको उच्छृङ्खल बनाते हैं। उनको मनमाना आचरण करनेके लिये प्रेरणा देते हैं और अपना उल्लू सीधा करनेके लिये जगत्को तथा जागतिक व्यवहारोंको मिथ्या बताकर 'अहं ब्रह्मास्मि' की रट लगाकर 'एक ब्रह्म' बने हुए ये अनधिकारी कलियुगी पाखण्डीलोग खुले-आम शास्त्राचारके सर्वथा विरुद्ध आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता, विलास, व्यभिचार, अभक्ष्य-भक्षणका प्रचार करते हैं और जनताको ब्रह्मज्ञानके नामपर नरकानलमें झोंकते हैं। ऐसे लोगोंके द्वारा इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये। यही मेरा नम्र निवेदन है।
**१२—श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन [ कविता ]**<br>(पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री)
१६ * अविच्छिन्नश्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *
श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन
( रचयिता—पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री )
तप-तेज-पुंज जगदाभिराम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
चारों वेदोंका रस वरिष्ठ।
वेदान्त विषय जो था गरिष्ठ ॥
कर सरल कथाओंमें प्रविष्ट।
कर दिया उसे लघुतम सुमिष्ट ॥
यह देख तुम्हारा कलित काम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
यह युक्ति दिखाकर तुम न्यारी।
बन गये विश्वके हितकारी ॥
अतएव ज्ञानके अधिकारी।
हैं सभी तुम्हारे आभारी ॥
गा रहे तुम्हारे गुणग्राम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
जिस समय सूर्यवंशी नरेश।
संचालित करते थे स्वदेश ॥
उस समय उन्हें दे सदुपदेश।
हरते थे तुम मानसिक क्लेश ॥
पाते थे वे जगसे विराम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
श्रीरामचन्द्रको पात्र जान।
जो दिया उन्हें था महाज्ञान ॥
मुनि वाल्मीकिने अमृत मान।
वह भर सुछन्दोंमें निदान ॥
रच ग्रन्थ योगवासिष्ठ नाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
यह ग्रन्थ मिटा विष-विषय चाव।
अध्यात्म ओर करता झुकाव ॥
हर जीव ब्रह्मका भेदभाव।
बन रहा भवाम्बुधि हेतु नाव ॥
यह श्रेय तुम्हींको है ललाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
हैं इसमें वर्णित वे सुयोग।
हरते हैं जो भवजनित रोग ॥
जिनका समयोचित कर प्रयोग।
पाते हैं शुभगति साधु लोग ॥
खण्डित कर माया मोह दाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
उपदेश तुम्हारा है विचित्र।
जो करता है हियको पवित्र ॥
जिससे जन बनकर सच्चरित्र।
हो जाते हैं ब्रह्मज्ञ 'मित्र' ॥
मिलता है उनको परम धाम।
गुरुवर वसिष्ठ ! तुमको प्रणाम ॥
**१—सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना**
श्रीपरमात्मने नमः
संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वैराग्य-प्रकरण
सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना
यतः सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च।
यत्रैवोपशमं यान्ति तस्मै सत्यात्मने नमः॥
सृष्टिके आरम्भमें सम्पूर्ण भूत जिनसे प्रकट होकर प्रतीतिके विषय होते हैं, स्थितिकालमें जिनमें ही स्थित होते हैं और प्रलयकाल आनेपर जिनमें ही लीन हो जाते हैं, उन सत्यस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।
ज्ञाता ज्ञानं तथा ज्ञेयं द्रष्टा दर्शनदृश्यभूः।
कर्ता हेतुः क्रिया यस्मात् तस्मै ज्ञप्त्यात्मने नमः॥
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तथा कर्ता, कारण और क्रिया—इन सबका जिनसे ही आविर्भाव होता है, उन ज्ञानस्वरूप परमात्माको नमस्कार है।
स्फुरन्ति सीकरा यस्मादानन्द्याम्बरेऽवनौ।
सर्वेषां जीवनं तस्मै ब्रह्मानन्दात्मने नमः॥
जिनसे स्वर्ग और भूतल आदि सभी लोकोंमें आनन्द-रूपी जलके कण स्फुरित होते हैं—प्राणियोंके अनुभवमें आते हैं तथा जो समस्त जीवोंके जीवनाधार हैं, उन पूर्ण चिन्मय आनन्दके महासागररूप परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है!
पूर्वकालमें सुतीक्ष्ण नामसे प्रसिद्ध कोई ब्राह्मण थे, जिनके मनमें संशय छा गया था; अतः उन्होंने महर्षि अगस्तिके आश्रममें जाकर उन महामुनिसे आदरपूर्वक पूछा—'भगवन्! आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं। आपको सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तका सुनिश्चित ज्ञान है। मेरे हृदयमें एक महान् संदेह है, आप कृपापूर्वक इसका समाधान कीजिये। मोक्षका साधन कर्म है या ज्ञान है अथवा दोनों ही हैं? इन तीनों पक्षोंमेंसे किसी एकका निश्चय करके जो वास्तवमें मोक्षका कारण हो, उसका प्रतिपादन कीजिये।'
अगस्तिने कहा—ब्रह्मन्! जैसे दोनों ही पक्षोंसे पक्षियोंका आकाशमें उड़ना सम्भव होता है, उसी प्रकार ज्ञान और निष्काम कर्म दोनोंसे ही परमपदकी प्राप्ति होती है। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास है, जिसका
१. अगस्ति और अगस्त्य एक ही महर्षिके नाम हैं।
१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मैं तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ। पहलेकी बात है, कारुण्य नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो अग्निवेश्यके पुत्र थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था तथा वे वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् थे। गुरुके यहाँसे विद्या पढकर अपने घर लौटनेके बाद वे संध्या-वन्दन आदि कोई भी कर्म न करते हुए चुपचाप बैठे रहने लगे। उनके मनमें संशय भरा हुआ था। पिता अग्निवेश्यने देखा कि मेरा पुत्र शास्त्रोक्त कर्मोंका परित्याग करके निन्दनीय हो गया है, तब वे उसके हितके लिये इस प्रकार बोले।
अग्निवेश्यने कहा—'बेटा ! यह क्या बात है ! तुम अपने कर्त्तव्य-कर्मोंका पालन क्यों नहीं करते ? बताओ तो सही। यदि सत्कर्मोंके अनुष्ठानमें नहीं लगोगे तो तुम्हें परम सिद्धि कैसे प्राप्त होगी ? तुम जो इस कर्त्तव्य-कर्मसे निवृत्त हो रहे हो, इसमें क्या कारण है ? यह मुझसे कहो।
कारुण्य बोले—पिताजी ! आजीवन अग्निहोत्र और प्रतिदिन संध्योपासना करे—इस प्रवृत्तिरूप धर्मका श्रुति और स्मृतिने विधान अथवा प्रतिपादन किया है। साथ ही एक दूसरी श्रुति भी है, जिसके अनुसार न धनसे, न कर्मसे और न संतानके उत्पादनसे ही मोक्ष प्राप्त होता है। मुख्य-मुख्य यतियोंने एकमात्र त्यागसे ही अमृतत्वरूप मोक्ष सुखका अनुभव किया है १। पूज्य पिताजी ! इन दो प्रकारकी श्रुतियोंमेंसे मुझे किसके आदेशका पालन करना चाहिये ?' इस संशयमें पड़कर मैं कर्मकी ओरसे उदासीन हो गया हूँ।
अगस्ति कहते हैं—तात सुतीक्ष्ण ! पितासे यों कहकर वे ब्राह्मण कारुण्य चुप हो गये। पुत्रको इस प्रकार कर्मसे उदासीन हुआ देख पिताने पुनः उससे कहा !
अग्निवेश्य बोले—बेटा ! मैं तुमसे एक कथा कहता हूँ, उसे सुनो और उसके सम्पूर्ण तात्पर्यका अपने हृदयमें निश्चय कर लेनेके पश्चात् तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो।
सुरुचि नामसे प्रसिद्ध कोई देवलोककी स्त्री थी, जो अप्सराओंमें श्रेष्ठ समझी जाती थी। एक दिन वह मयूरोंके झुंडसे घिरे हुए हिमालयके एक शिखरपर बैठी थी। उसी समय उसने अन्तरिक्षमें इन्द्रके एक दूतको कहीं जाते देखा। उसे देखकर अप्सराओंमें श्रेष्ठ महाभागा सुरुचिने इस प्रकार पूछा—'महाभाग देवदूत ! आप कहाँसे आ रहे हैं और इस समय कहाँ जायेंगे ? यह सब कृपा करके मुझे बताइये।'
देवदूतने कहा—भद्रे ! सुनो; जो वृत्तान्त जैसे घटित हुआ है, वह सब मैं तुम्हें विस्तारसे बता रहा हूँ। सुन्दर भौंहोंवाली सुन्दरी ! धर्मात्मा राजा अरिष्टनेमि अपने पुत्रको राज्य देकर स्वयं वीतराग हो तपस्याके लिये वनमें चले गये और अब गन्धमादन पर्वतपर वे तपस्या
१. न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। ( कैवल्य० २ तथा महानारायणोपनिषद् १० । ५ )
वैराग्य-प्रकरण ] * भगवान्के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना *- १६
कर रहे हैं। वहाँ वनमें ज्यों ही उन्होंने दुस्तर तपस्या आरम्भ की, त्यों ही देवराज इन्द्रने मुझे आदेश दिया—'दूत ! तुम यह विमान लेकर शीघ्र वहाँ जाओ। इस विमानमें अप्सराओंके समुदायको भी साथ ले लो। नाना प्रकारके वाद्य इसकी शोभा बढ़ाते रहें। गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और किंनर आदिसे भी यह सुशोभित होना चाहिये। इसमें ताल, वेणु और मृदङ्ग आदि भी रख लो। इस प्रकार भाँति भाँतिके वृक्षोंसे भरे हुए सुन्दर गन्धमादन पर्वतपर पहुँचकर तुम राजा अरिष्टनेमिको इस विमानपर चढ़ा लो और उन्हें स्वर्गका सुख भोगनेके लिये अमरावती नगरीमें ले जाओ।'
देवराज इन्द्रकी यह आज्ञा पाकर मैं सामग्रियोंसे संयुक्त विमान ले उस पर्वतपर गया। वहाँ पहुँचकर राजा अरिष्टनेमिके आश्रमपर गया; फिर मैंने देवराज इन्द्रकी सारी आज्ञा राजासे कह सुनायी। शुभे ! वे मेरी बात सुनकर संदेहमें पड़ गये और इस प्रकार बोले—'देवदूत ! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, आप मेरे इस प्रश्नका उत्तर दें। स्वर्गमें कौन-कौन-से गुण हैं और कौन-कौन-से दोष ? आप मेरे सामने उनका सुस्पष्ट वर्णन कीजिये। स्वर्गलोकमें रहनेके गुण-दोषको जाननेके पश्चात् मेरी जैसी रुचि होगी, वैसा करूँगा।'
मैंने कहा—'राजन् ! स्वर्गलोकमें जीव अपने पुण्यकी सामग्रीके अनुसार उत्तम सुखका उपभोग करता है। उत्तम पुण्यसे उत्तम स्वर्गकी प्राप्ति होती है, मध्यम पुण्यसे मध्यम स्वर्ग मिलता है और इनकी अपेक्षा निम्न श्रेणीके पुण्यमे उसके अनुरूप स्वर्ग सुलभ होता है। इसके विपरीत कुछ नहीं होता। स्वर्गमें भी दूसरोंको अपनेसे ऊँची स्थितिमें देखकर लोगोंके लिये उनका उत्कर्ष असह्य हो उठता है। जो लोग समान स्थितिमें होते हैं, वे भी अपने बराबरवालोंके साथ स्पर्धा (लागडाँट) रखते हैं तथा जो स्वर्गवासी अपनेसे हीन स्थितिमें होते हैं, उनको अपनी अपेक्षा अल्पसुखी देखकर अधिक सुखवालोंको संतोष होता है। इस प्रकार असहिष्णुता, स्पर्धा और संतोषका अनुभव करते हुए पुण्यात्मा पुरुष तभीतक स्वर्गमें रहते हैं, जबतक उनके पुण्योंका भोग समाप्त नहीं हो जाता। पुण्योंका क्षय हो जानेपर वे जीव पुनः इस मर्त्यलोकमें प्रवेश करते हैं और पार्थिव-शरीर धारण करते रहते हैं। राजन् ! स्वर्गमें इसी तरहके गुण और दोष विद्यमान हैं।'
भद्रे ! मेरी यह बात सुनकर राजाने इस प्रकार उत्तर दिया—'देवदूत ! जहाँ ऐसा फल प्राप्त होता है, उस स्वर्गलोकमें मैं नहीं जाना चाहता। आप इस विमानको लेकर जैसे आये थे, वैसे ही देवराज इन्द्रके पास चले जाइये। आपको नमस्कार है।'
भद्रे ! जब राजाने मुझसे ऐसी बात कही, तब मैं इन्द्रके समक्ष यह वृत्तान्त निवेदन करनेके लिये लौट गया। वहाँ जब मैंने सब बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं, तब देवराज इन्द्रको महान् आश्चर्य हुआ और वे स्निग्ध एवं मधुर वाणीमें मुझसे पुनः बोले।
इन्द्रने कहा—दूत ! तुम फिर वहाँ जाओ और उस विरक्त राजाको आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये तत्त्वज्ञ महर्षि वाल्मीकिके आश्रममें ले जाओ। वहाँ महर्षि वाल्मीकिसे मेरा यह संदेश कह देना—'महामुने ! इन विनयशील, वीतराग तथा स्वर्गकी भी इच्छा न रखनेवाले नरेशको आप तत्त्वज्ञानका उपदेश दीजिये। ये जन्म-मरणरूप संसार-दुःखसे पीड़ित हैं; अतः आपके दिये हुए तत्त्व-ज्ञानके उपदेशसे इन्हें मोक्ष प्राप्त होगा।'
यों कहकर देवराजने मुझे राजा अरिष्टनेमिके पास भेजा। तब मैंने पुन वहाँ जाकर राजाको वाल्मीकिजीके पास पहुँचाया, उनसे देवराज इन्द्रका संदेश कहा तथा राजाने उन महर्षिसे मोक्षका साधन पूछा। तदनन्तर वाल्मीकिजीने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कुशलप्रश्नोंकी बात आरम्भ करते हुए राजासे उनके आरोग्यका समाचार पूछा।
२० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
राजाने कहा—भगवन् ! आपको धर्मके तत्त्वका ज्ञान है। जाननेयोग्य जितनी भी बातें हैं, वे सब आपको ज्ञात हैं। विद्वानोंमें श्रेष्ठ महर्षे ! आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया। यही मेरी कुशल है। भगवन् ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। आप बिना किसी विघ्न-बाधाके मेरी शङ्काका समाधान करें। संसार-बन्धनके दुःखसे मुझे जो पीड़ा हो रही है, उससे किस प्रकार मेरा छुटकारा होगा ? यह बताइये।
श्रीवाल्मीकिजीने कहा—राजन् ! सुनो; मैं तुमसे अखण्ड रामायणकी कथा कहूँगा। उसे सुनकर यत्नपूर्वक हृदयमें धारण कर लेनेपर तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे। राजेन्द्र ! वह रामायण महर्षि वसिष्ठ और श्रीरामके संवादरूपमें वर्णित है। वह मोक्षप्राप्तिके उपायकी मङ्गलमयी कथा है। मैंने तुम्हारे स्वभावको समझ लिया है; अतः तुम्हें अधिकारी मानकर मैं तुमसे वह कथा कहूँगा। विद्वान् नरेश ! सुनो।
राजाने पूछा—तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महामुने ! श्रीराम कौन हैं ? उनका स्वरूप कैसा है ? वे किसके वंशज थे ? वे बद्ध थे या मुक्त ? पहले आप मुझे इन्हीं बातों-का निश्चिन ज्ञान प्रदान कीजिये ।
श्रीवाल्मीकिजीने कहा—स्वयं भगवान् श्रीहरि ही शाप-के पालनके बहाने राजा श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। वे प्रभु सर्वज्ञ होनेपर भी ( अपने भक्त महर्षियोंकी वाणीको सत्य करनेके लिये ही ) आरोपित अथवा स्वेच्छासे गृहीत अज्ञानसे युक्त हो साधारण मनुष्योंकी भाँति अल्पज्ञ-से हो गये।
राजाने पूछा—महर्षे ! श्रीराम तो सच्चिदानन्द-स्वरूप चैतन्यघनविग्रह थे । उन्हें शाप प्राप्त होनेका क्या कारण था ? यह बताइये । साथ ही यह भी कहिये कि उन्हें शाप देनेवाला कौन था ?
श्रीवाल्मीकिजीने कहा – राजन् ! ( ब्रह्माजीके मानस पुत्र ) सनत्कुमार, जो सर्वथा निष्काम थे, ब्रह्मलोकमें निवास करते थे। एक दिन त्रिलोकीनाथ सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णु वैकुण्ठलोकसे वहाँ पधारे। उस समय ब्रह्माजीने वहाँ उनका पूजन किया। सत्यलोकमें निवास करनेवाले दूसरे-दूसरे महात्माओंने भी उनका स्वागत-सत्कार किया। केवल सनत्कुमारने उनके आदर-सत्कारमें कोई भाग नहीं लिया—वे चुपचाप बैठे ही रह गये। तब उनकी ओर देखकर सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरिने कहा—'सनत्कुमार ! तुम अपनेको निष्काम समझकर अहंकारी हो गये हो, इसीलिये जडवत् स्तम्भ बने बैठे हो। इस गर्वयुक्त चेष्टाके कारण तुम शाप या दण्ड पानेके योग्य हो, अतः शरजन्मा कुमारके नामसे विख्यात हो दूसरा शरीर धारण करो।' यह सुनकर सनत्कुमारने भी भगवान् विष्णुको शाप दिया—'देवेश्वर ! आप भी अपनी सर्वज्ञताको कुछ कालके लिये छोड़कर अज्ञानी जीवके समान हो जायेंगे।' एक समय अपनी पत्नीको श्रीहरिके चक्रसे मारी गयी देख महर्षि भृगुका क्रोध बहुत बढ़ गया। वे उन्हें शाप देते हुए बोले—'विष्णो !
**२—इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा, भरद्वाजको ब्रह्माजीका वरदान तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे वाल्मीकिका भरद्वाजको संसार-दुःखसे छुटकारा पानेके निमित्त उपदेश देनेके लिये प्रवृत्त होना**
वैराग्य-प्रकरण ] * इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा * २१
आपको भी कुछ कालके लिये अपनी पत्नीसे वियोगका कष्ट सहना पड़ेगा।' इस प्रकार सनत्कुमार और भृगुके शाप देनेपर (उनकी वाणी सत्य करनेके लिये) भगवान् विष्णु उस शापसे मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए। राजन्! भगवान् विष्णुको शापका बहाना क्यों लेना पड़ा, इसका सब कारण मैंने तुम्हें बता दिया, अब तुम्हारे प्रश्नके अनुसार अन्य सारी बातें भी बता रहा हूँ। तुम सावधान होकर सुनो। ( सर्ग १ )
इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा, भरद्वाजको ब्रह्माजीका वरदान तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे वाल्मीकिका भरद्वाजको संसार-दुःखसे छुटकारा पानेके निमित्त उपदेश देनेके लिये प्रवृत्त होना
दिवि भूमौ तथाऽऽकाशे बहिरन्तश्च मे विभुः ।
यो विभात्यवभासात्मा तस्मै सर्वात्मने नमः ॥
जो प्रकाश (ज्ञान) स्वरूप सर्वव्यापी परमात्मा स्वर्गमें, भूतलमें, आकाशमें तथा हमारे अंदर और बाहर—सर्वत्र प्रकाशित हो रहे हैं, उन सर्वात्माको नमस्कार है।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं— राजन् ! 'मैं संसाररूपी बन्धनमें बँधा हुआ हूँ, किंतु इससे मुक्त हो सकता हूँ—ऐसा जिसका निश्चय है तथा जो न तो अत्यन्त अज्ञानी है और न तत्त्वज्ञानी ही है, वही इस शास्त्रको सुनने अथवा पढ़नेका अधिकारी है। जो पहले कथारूपी उपायसे युक्त रामायणके बाल, अयोध्या आदि सभी काण्डोंका विचार (परिशीलन) करके मोक्षके उपायभूत इन वैराग्य आदि छः प्रकरणोंका विचार (अनुशीलन) करता है, वह विद्वान् पुरुष फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता (वह यहाँके जन्म आदि दुःखोंसे सदाके लिये छुटकारा पा जाता है)। शत्रुओंका मर्दन करनेवाले नरेश ! यह रामायण पूर्व और उत्तर—दो खण्डोंसे युक्त है। इसमें राग-द्वेष आदि दोषोंको दूर करनेके लिये रामकथारूपी प्रबल उपाय बताये गये हैं। पहले इन बाल आदि सात काण्डोंकी रचना करके मैंने एकाग्रचित्त हो अपने बुद्धिमान् एवं विनयशील शिष्य भरद्वाजको इसका ज्ञान प्रदान किया; ठीक उसी तरह, जैसे समुद्र मणि या रत्नकी इच्छा रखनेवाले याचकको मणि प्रदान करता है। बुद्धिमान् भरद्वाजने मुझसे कथारूपी उपायवाले इन सात काण्डोंका अध्ययन करनेके पश्चात् मेरुपर्वतके किसी गहन वनमें ब्रह्माजीके सामने इनका वर्णन किया। इससे महान् आशयवाले लोकपितामह भगवान् ब्रह्मा भरद्वाजके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उनसे बोले—'बेटा ! तुम मुझसे कोई वर माँग लो।'
**५—मेरुपर्वतपर भरद्वाजकी लोक-पितामह ब्रह्मासे वर-याचना** ... **२१**
२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भरद्वाजने कहा—भगवन् ! भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी पितामह ! जिस उपायसे यह समस्त मानव-समुदाय सम्पूर्ण दुःखसे छुटकारा पा जाय, वह मुझे बताइये । आज मुझे यही वर अच्छा लगता है ।
श्रीब्रह्माजीने कहा—वत्स ! तुम इस विषयमें शीघ्र ही प्रयत्नपूर्वक अपने गुरु वाल्मीकिजीसे प्रार्थना करो । उन्होंने जिस निर्दोष रामायणकी रचना आरम्भ की है, उसका श्रवण कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण मोहसे पार हो जायेंगे ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाजसे यों कहकर सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा भगवान् ब्रह्मा उनके साथ ही मेरे आश्रमपर आये । उस समय मैंने शीघ्र ही अर्घ्य, पाद्य आदिके द्वारा उन भगवान् ब्रह्माजीका पूजन किया । तत्पश्चात् समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले ब्रह्माजीने मुझसे कहा—'श्रेष्ठ महर्षे ! श्रीरामचन्द्रजीके स्वभाव एवं स्वरूपका वर्णन करनेवाले इस निर्दोष रामायणका आरम्भ करके जबतक इसकी समाप्ति न हो जाय, तबतक कितना ही उद्वेग क्यों न हो, तुम इसका परित्याग न करना । इस ग्रन्थके अनुशीलनसे यह जगत् इस संसाररूपी क्लेशसे उसी प्रकार शीघ्र पार हो जायगा, जैसे जहाजके द्वारा लोग अविलम्ब समुद्रसे पार हो जाते हैं। तुम लोकहितके लिये इस रामायण नामक शास्त्रकी रचना करो । इसी बातको कहनेके लिये मैं स्वयं यहाँतक आया हूँ ।' तत्पश्चात् वे मेरे उस पवित्र आश्रमसे उसी क्षण अदृश्य हो गये । तब भरद्वाजने कहा—'भगवन् ! महामना श्रीरामचन्द्रजी, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, यशस्विनी सीतादेवी तथा श्रीरामचन्द्रजीका अनुसरण करनेवाले परम बुद्धिमान् मन्त्रिपुत्र—इन सबने इस संसाररूपी संकटमें पड़कर कैसा व्यवहार किया था, यह बात मुझे बताइये । इसे सुनकर अन्य लोगोंके साथ मैं भी वैसा ही बर्ताव करूँगा ।'
राजेन्द्र ! जब भरद्वाजने आदरपूर्वक मुझसे पूर्वोक्त विषयका प्रतिपादन करनेके लिये अनुरोध किया, तब मैं भगवान् ब्रह्माजीकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उक्त विषयके वर्णनमें प्रवृत्त हुआ और बोला—'वत्स भरद्वाज ! सुनो; तुमने जैसा पूछा है, उसके अनुसार तुम्हें सब कुछ बताता हूँ । मेरे उपदेशको सुननेसे तुम अपना सारा मोह दूर कर सकोगे । बुद्धिमान् भरद्वाज ! तुम वैसा ही व्यवहार करो, जैसा कि आनन्दस्वरूप कमलनयन भगवान् श्रीरामने समस्त संसारमें अनासक्तभावसे रहकर किया था ।'
महामना भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, सीता, राजा दशरथ, श्रीरामसखा कृताङ्ग और अविरोध, पुरोहित वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्यान्य आठ मन्त्री—ये सभी ज्ञानमें पारंगत थे । धृष्टि, जयन्त, भास, सत्यवादी विजय, विभीषण, सुपंपण, हनुमान् और इन्द्रजित्—ये श्रीरामके आठ मन्त्री बताये गये हैं । ये सब-के-सब समदर्शी थे । इनका चित्त विषयोंमें आसक्त नहीं था । ये सभी जीवन्मुक्त महात्मा थे और प्रारब्धवश जो कुछ प्राप्त होता, उसीमें संतुष्ट रहकर तदनुकूल व्यवहार करते थे । बेटा ! इन लोगोंने जिस प्रकार होम, दान और आदान-प्रदान किया था, इन्होंने जगत्में जिस प्रकार निवास किया था और जिस प्रकार स्मरण-चिन्तन अथवा श्रौत-स्मार्त कर्मोंका पालन किया था, उसी प्रकार यदि तुम भी बर्ताव करते हो तो संसाररूपी संकटसे छूटे हुए ही हो । उदार एवं सत्त्वगुणसे सम्पन्न पुरुष अपार संसार-समुद्रमें गिरनेपर भी यदि उपर्युक्त उत्कृष्ट साधनको अपना ले तो उसे न तो शोक प्राप्त होता है और न वह दीनता अथवा दुःखमें ही पड़ता है। सब प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त हो वह परमानन्द-सुधाका पान करके सदाके लिये परम तृप्त हो जाता है।
(सर्ग २)
**३—जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन**
वैराग्य-प्रकरण ] * जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थयात्राका वर्णन * २३
जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन
भरद्वाज बोले—ब्रह्मन् ! आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथासे आरम्भ करके क्रमशः जीवन्मुक्तकी स्थितिका मुझसे वर्णन कीजिये जिससे मैं सदाके लिये परम सुखी हो जाऊँ ।
श्रीवाल्मीकिजीने कहा—साधु पुरुष भरद्वाज ! जैसे रूपरहित आकाशमें नील-पीत आदि वर्णोंका भ्रम होता है उसी प्रकार निर्गुण निराकार ब्रह्ममें अज्ञानवश जगत्की सत्ताका भ्रम होता है । यह जो जगत्सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न हो गया है, इसे इस तरह भुला दिया जाय कि फिर कभी इसका स्मरण ही न हो—इसीको मैं उत्तम ज्ञान मानता हूँ । इस दृश्य-प्रपञ्चका अत्यन्त अभाव है—यह बिना हुए ही भासित हो रहा है, जबतक ऐसा बोध नहीं होता, तबतक कोई कभी भी उस उत्कृष्ट आत्मज्ञानका अनुभव नहीं कर सकता; इसलिये आत्मज्ञानका अन्वेषण—उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये । इस (योग-वासिष्ठरूप) शास्त्रका ज्ञान होनेपर इसी जीवनमें उस आत्मतत्त्वका बोध हो जाय—यह सर्वथा सम्भव ही है—वह होकर ही रहेगा । इसी उद्देश्यसे इस शास्त्रका विस्तार (प्रचार-प्रसार) किया जाता है । यदि तुम (श्रद्धा-भक्तिके साथ) इस शास्त्रका श्रवण करोगे तो निश्चय ही तुम्हें उस आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो जायगा; अन्यथा उसकी प्राप्ति असम्भव है ।
निष्पाप भरद्वाज ! यह जगत्रूपी भ्रम यद्यपि प्रत्यक्ष दिखायी देता है, तो भी इस शास्त्रके विचारसे अनायास ही ऐसा अनुभव हो जाता है कि 'यह है ही नहीं'—ठीक उसी तरह जैसे आकाशमें नील आदि वर्ण प्रत्यक्ष दीखनेपर भी विचार करनेसे बिना परिश्रमके ही यह समझमें आ जाता है कि इसका अस्तित्व नहीं है । यह दृश्य-जगत् वास्तवमें है ही नहीं, ऐसा बोध होनेपर जब मनसे दृश्य-प्रपञ्चका मार्जन (निवारण या अभाव) हो जाय, तब परमनिर्वाणरूप शान्तिका स्वतः अनुभव होने लगता है । ब्रह्मन् ! सम्पूर्णरूपसे वासनाओंका जो परित्याग (अत्यन्त अभाव) है, वही उत्तम मोक्ष कहलाता है । उसे अविद्यारूपी मलसे रहित ज्ञानी ही प्राप्त कर सकते हैं । विप्रवर ! जैसे शीतके नष्ट होनेपर हिमकण तुरंत गल जाते हैं, उसी प्रकार वासनाओंके क्षीण हो जानेपर (वासना-पुञ्जरूप) चित्त भी शीघ्र ही गल जाता है (उसका अभाव-सा हो जाता है) ।
वासना दो प्रकारकी बतायी गयी है—एक शुद्ध वासना और दूसरी मलिन वासना । मलिन वासना जन्मकी हेतुभूत है—उसके द्वारा जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ता है और शुद्ध वासना जन्मका नाश करनेवाली (अर्थात् मोक्षकी साधिका) है । विद्वानोंने मलिन वासनाको पुनर्जन्मकी प्राप्ति करानेवाली बताया है । अज्ञान ही उसकी घनीभूत आकृति है तथा वह बढ़े हुए अहङ्कारसे सुशोभित होती है । जो भुने हुए बीजके समान पुनर्जन्मरूपी अङ्कुरको उत्पन्न करनेकी शक्तिको त्यागकर केवल शरीरधारण मात्रके लिये स्थित रहती है, वह वासना 'शुद्धा' कही गयी है । जो लोग शुद्ध वासनासे युक्त हैं, वे फिर जन्मरूप अनर्थके भाजन नहीं होते । जानने योग्य परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले वे परम बुद्धिमान् पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहलाते हैं ।
महामते भरद्वाज ! अब तुम श्रीरामचन्द्रजीकी जीवन-चर्यासे सम्बन्ध रखनेवाली इस मङ्गलकारिणी कथाका क्रमशः श्रवण करो । मैं उसका वर्णन करूँगा, उसीके द्वारा तुम सदाके लिये सम्पूर्ण तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लोगे । वत्स ! जिन्हें कहींसे भी कोई भय नहीं है, वे कमल-नयन भगवान् श्रीराम जब अध्ययनके पश्चात् विद्यालयसे निकलकर घरको लौटे, तब भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते हुए उन्होंने राजभवनमें कुछ दिन व्यतीत किये । तदनन्तर
२४ * अविच्छिन्नचिदारामैः पुमांस्तीर्ण नेतरेत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कुछ समय बीतनेपर, जब कि राजा दशरथ भूमण्डलके पालनमें लगे थे और प्रजावर्गके लोग रोग-शोकसे रहित हो बड़े सुखसे दिन बिता रहे थे, एक दिन अनन्त कल्याणमय गुणोंसे सुशोभित होनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तीर्थों तथा पुण्यमय आश्रमोंके दर्शनकी अत्यन्त उत्कण्ठा जाग उठी। तब श्रीरामने पिताके पास जाकर उनके चरण-कमलोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।
श्रीराम बोले—पिताजी ! मेरे स्वामी महाराज ! मेरे मनमें तीर्थों, देवमन्दिरों, वनों तथा आश्रमोंका दर्शन करनेके लिये बड़ी उत्कंठा हो रही है। आपके समक्ष मेरी यह पहली याचना है, आप इसे सफल करने योग्य हैं। नाथ ! संसारमें ऐसा कोई याचक नहीं है, जिसे अभीष्ट वस्तु देकर आपने उसका आदर न किया हो।
श्रीराम पहली बार प्रार्थी होकर राजाके समक्ष उपस्थित हुए थे। उनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर राजा दशरथने वसिष्ठजीके साथ विचार करके उन्हें तीर्थ-दर्शनके लिये आज्ञा दे दी। उस समय शुभ नक्षत्र और शुभ दिनमें ब्राह्मणोंने आकर उनके लिये स्वस्तिवाचन किया। उनके शरीरको माङ्गलिक वेष-भूषासे अलंकृत किया गया। माताओंने उन्हें हृदयसे लगा-लगाकर आशीर्वाद दिये और आभूषण पहनाये। फिर वे रघुनाथजी तीर्थ-यात्राके लिये उद्यत हो लक्ष्मण और शत्रुघ्न—इन दो भाइयों, वसिष्ठजीके भेजे हुए शास्त्रज्ञ ब्राह्मणों तथा अपने ऊपर स्नेह रखनेवाले कुछ इने-गिने राजकुमारोंके साथ अपने उस राजभवनसे बाहर निकले। श्रीरामचन्द्रजी दान-मान आदिसे ब्राह्मणोंको अपने अनुकूल बनाते, सब ओरसे प्रजाओंके आशीर्वाद सुनते और सम्पूर्ण दिशाओंके दृश्योंपर दृष्टिपात करते वन्य-प्रदेशोंमें भ्रमण करने लगे। उन्होंने अपने निवास-स्थान उस कोसल जनपदसे आरम्भ करके स्नान, दान, तप और ध्यानपूर्वक क्रमशः समस्त तीर्थ-स्थानोंका दर्शन किया। नदियोंके पवित्र तट, पुण्य वन, पावन आश्रम, जंगल, जनपदोंकी सीमाओंमें स्थित समुद्र और पर्वतोंके तट, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल आभावाली गङ्गा, नील कमलकी-सी कान्तिवाली निर्मल कलिन्दनन्दिनी यमुना, सरस्वती, शतद्रू (सतलज), चन्द्रभागा (चिनाब), इरावती (रावी), वेणी, कृष्णवेणी, निर्विन्ध्या, सरयू, चर्मण्वती (चम्बल), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), बाहुदा, प्रयाग, नैमिषारण्य, धर्मारण्य, गया, वाराणसी (काशीपुरी), श्रीशैल, केदारनाथ, पुष्कर, क्रमप्राप्त मानस सरोवर, उत्तरमानस, वड़वामुख, अन्य तीर्थसमुदाय, अग्नितीर्थ, महातीर्थ, इन्द्रद्युम्न सरोवर आदि पुण्यतीर्थ, सरोवर, सरिताएँ, नद, तालाब या कुण्ड—इन सबका उन्होंने आदरपूर्वक दर्शन किया।
१. वेणी नदी कृष्णामें मिलनेसे पहले केवल वेणी कहलाती है, कृष्णामें संगम होनेके पश्चात् उसका नाम कृष्णवेणी हो जाता है।
२. कुछ लोगोंकी मान्यताके अनुसार बाहुदा सुप्रसिद्ध राप्ती नदीकी एक सहायक नदी है।
**४—तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास, राजा दशरथके यहाँ विश्वामित्रका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार**
वैराग्य-प्रकरण ] * तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास * २५
स्वामी कार्तिकेय, शालग्रामस्वरूप श्रीविष्णु, भगवान् विष्णु और शिवके चौसठ स्थान, नाना प्रकारके आश्चर्य-जनक दृश्योंसे विचित्र शोभा धारण करनेवाले चारों समुद्रोंके तट, विन्ध्यपर्वत और मन्दराचलके कुञ्ज, हिमालय आदि सात कुल-पर्वतोंके स्थान तथा बड़े-बड़े राजर्षियों, ब्रह्मर्षियों, देवताओं और ब्राह्मणोंके मङ्गलकारी पावन आश्रमोंका भी श्रीरामचन्द्रजीने श्रद्धापूर्वक दर्शन किया। दूसरोंको मान देनेवाले श्रीरघुनाथजी अपने भाइयोंके साथ बारंबार चारों दिशाओंके प्रान्तभागों तथा भूमण्डलके सभी छोरोंमें घूमते फिरे। जैसे देवताओं आदिसे सम्मानित भगवान् शंकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विहार करके पुनः शिवलोकमें लौट आते हैं, उसी प्रकार रघुनन्दन श्रीराम देवताओं, किंनरों तथा मनुष्योंसे सम्मानित हो इस सम्पूर्ण भूमण्डलका अवलोकन करके फिर अपने घर लौट आये। (सर्ग ३)
तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास; राजा दशरथके यहाँ विश्वामित्रका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब श्रीमान् रामचन्द्र नगरको लौटे, उस समय (उनका स्वागत करते हुए) पुरवासीजन उनके ऊपर राशि-राशि पुष्प बिखेरने लगे। उस अवस्थामें, जैसे इन्द्र-पुत्र जयन्त अपने स्वर्गीय भवनमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने अपने महलमें प्रवेश किया। वहाँ पहुँचकर रघुनाथजीने पहले पिताको प्रणाम किया, फिर क्रमशः कुलगुरु वसिष्ठजीको, बड़े बन्धु-बान्धवोंको, ब्राह्मणोंको तथा कुलके बड़े-बूढ़े लोगोंको मस्तक झुकाया। फिर सुहृदों, बन्धुओं, पिता तथा ब्राह्मणसमुदायने श्रीरामको बारंबार हृदयसे लगाया और श्रीरामने भी उनके प्रति अभिवादन एवं प्रिय-भाषण आदि यथोचित आचार-व्यवहारका निर्वाह किया। उस समय श्रीरघुनाथजी आनन्दोल्लाससे फूले नहीं समाते थे। अयोध्यामें श्रीरामचन्द्रजीके शुभागमनके उपलक्ष्यमें लगातार आठ दिनोंतक आनन्दोत्सव मनाया गया। उस समय हर्षसे मतवाली जनताके द्वारा सुखपूर्वक किये गये गीत-वाद्य आदिका मधुर कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया था। तबसे श्रीरघुनाथजी विभिन्न देशोंमें प्रचलित नाना प्रकारके रहन-सहनका जहाँ-तहाँ वर्णन करते हुए घरमें ही सुखपूर्वक रहने लगे।
श्रीरामचन्द्रजी प्रतिदिन सबेरे उठकर (स्नान आदिके पश्चात्) विधिपूर्वक सन्ध्या-वन्दन करके राजसभामें बैठे हुए अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी पिता महाराज दशरथको प्रणाम किया करते थे। वहाँ एक पहरतक मुनियों आदिके साथ बैठकर आदरपूर्वक ज्ञानकी कथा-वार्ता सुना करते थे। भाइयोंके साथ तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरघुनाथजी प्रायः ऐसी ही दिनचर्याको अपनाकर पिताके घरमें सुखपूर्वक रहते थे। निष्पाप भरद्वाज !
**१५—वासनाओंके क्षयका उपाय और ब्रह्मचिन्तनके अभ्यासका निरूपण ... १२९**
२६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीरामचन्द्रजीकी प्रत्येक चेष्टा राजोचित व्यवहारके कारण बड़ी मनोहर प्रतीत होती थी; वह सत्पुरुषोंके चित्तमें चन्द्रमाकी चाँदनीके समान आह्लाद उत्पन्न करती थी। सभी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे तथा वह अमृत-रसके समान मधुर, सुन्दर एवं कोमल होती थी। ऐसी ही चेष्टाके द्वारा वे दिन व्यतीत करते थे।
भरद्वाज! तदनन्तर जब श्रीरघुनाथजीकी अवस्था सोलह वर्षसे कुछ ही कम थी, शत्रुघ्न और लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीका निरन्तर अनुसरण करते थे, भरत सुखपूर्वक अपने नानाके यहाँ विराज रहे थे, महाराज दशरथ इस सारी पृथ्वीका यथोचित रूपसे पालन कर रहे थे तथा वे महाप्राज्ञ नरेश प्रतिदिन मन्त्रियोंके साथ बैठकर अपने पुत्रोंके विवाहके लिये भी परामर्श करने लगे थे, उन्हीं दिनों तीर्थयात्रा पूरी करके अपने घरमें रहते हुए श्रीराम दिन-पर-दिन कृश होने लगे।
भरद्वाज! महाराज दशरथ श्रीरामसे बारंबार स्नेह-युक्त मधुरवाणीमें पूछते—'बेटा! तुम्हारे मनमें कैसी बड़ी भारी चिन्ता पैदा हो गयी है?' वे उत्तर देते—'पिताजी! मुझे कोई कष्ट नहीं है।' इतना ही कहकर कमलनयन श्रीराम पिताजीकी गोदमें चुपचाप बैठ जाते थे।
तदनन्तर एक दिन राजा दशरथने समस्त कार्योंका ज्ञान रखनेवाले, वक्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीसे पूछा—'गुरुदेव! श्रीराम क्यों खिन्न हैं?' उनके इस प्रकार पूछनेपर वसिष्ठ मुनिने कुछ सोचकर राजासे कहा—'श्रीमन्! महाराज! इसमें कुछ कारण है; किंतु इसके लिये आपके मनमें दुःख नहीं होना चाहिये।'
इसी समय महर्षि विश्वामित्र अयोध्यानरेश दशरथसे मिलनेके लिये वहाँ आये। उन दिनों धर्मकार्यमें तत्पर रहनेवाले उन बुद्धिमान् महर्षिके यहाँ एक यज्ञ हो रहा था। माया, बल और वीर्यसे उन्मत्त रहनेवाले राक्षसोंने एक साथ आक्रमण करके उनके उस यज्ञका विध्वंस कर डाला। उस यज्ञकी रक्षाके लिये ही उन्होंने महाराज दशरथसे मिलनेकी इच्छा की थी; क्योंकि राक्षसोंके उत्पातके कारण वे मुनि अपने उस यज्ञको बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण नहीं कर पाते थे। तब उन निशाचरोंके विनाशके लिये उद्यत हो वे तपोनिधि महातेजस्वी विश्वामित्र मुनि अयोध्यापुरीमें आये। वहाँ पहुँचकर राजासे मिलनेकी अभिलाषा लिये वे द्वारपालोंसे बोले—'तुमलोग शीघ्र जाकर महाराजको मेरे आनेकी सूचना दो। उनसे कहना—गाधिके पुत्र कुशिकवंशी विश्वामित्र आये हैं।'
मुनिका यह वचन सुनकर राजद्वारपर रहनेवाले पहरेदारोंने राजमहलमें जाकर अपने स्वामी छड़ीदारसे बताया—'प्रभो! महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं। तब उस छड़ीदारने सभामण्डपमें राजाओंकी मण्डलीसे घिरे बैठे हुए महाराजके पास तुरंत जाकर सूचना दी—'देव! राजद्वारपर नवोदित सूर्यके समान महातेजस्वी तथा अग्निकी ज्वालाके सदृश अरुण जटाजूटधारी एक दीप्तिमान् पुरुष आकर खड़े हैं। वे महामुनि विश्वामित्र हैं।' राजाकी ओर देखकर छड़ीदारने नम्रता
वैराग्य-प्रकरण ] * तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास * २७
वचनोंमें ज्यों ही यह बात कही, उसकी उस बातको सुनते ही मन्त्री और सामन्तोंसहित वे राजशिरोमणि दशरथ तत्काल सोनेके सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये।
राजाओंके समुदायसे घिरे तथा सामन्तोंसे प्रशंसित होते हुए वे नरेश वसिष्ठ और वामदेवजीके साथ सहसा पैदल ही उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ महामुनि विश्वामित्र खड़े थे। राजाने ड्योढ़ीपर खड़े हुए उन मुनिश्रेष्ठको देखा। वे ब्राह्मणोचित तेज तथा महान् क्षात्र-बलसे भी सम्पन्न थे। वृद्धावस्थाके कारण अधिक पकी हुई और तपस्यामें ही लगे रहनेसे रूखी जटावल्लरीके द्वारा उनके कंधे ढके हुए थे। उन्होंने शान्त (सौम्य), कान्तिमान्, उद्दीप्त, प्रतिवातरहित, विनयशील, हृष्ट-पुष्ट अवयवोंसे युक्त तथा तेजस्वी शरीर धारण कर रखा था। उनका तेज सुन्दर होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था, प्रसादगुणसे युक्त तथा दूरतक फैला हुआ था, गम्भीर एवं अतिशय पूर्णताको प्राप्त था। उस तेजसे ऋषिकी अङ्ग-कान्ति अनुरञ्जित थी। उन्होंने अपने हाथमें एक कुण्डी (कमण्डलु) ले रक्खी थी, जो चिकनी, निर्दोष एवं उत्तम थी। वह उनके कल्पान्तस्थायी जीवनकालकी सभी अवस्थाओंमें सहचरीकी भाँति उनका साथ देती थी। मुनिका अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल था। उनके चित्तमें करुणा भरी थी, इसलिये उनकी वाणी बड़ी मधुर एवं प्रसन्नतासूचक होती थी। वे अपनी स्नेहपूर्ण दृष्टिसे इस प्रकार देखते थे, मानो सामने खड़ी हुई जनताको अमृतसे सींच रहे हों। उनके अङ्गमें सुन्दर यज्ञोपवीत शोभा पा रहा था। वे दर्शकोंके मनमें अत्यन्त आश्चर्यका संचार-सा कर रहे थे। उन महर्षिको दूरसे ही देखकर राजाका शरीर विनयसे झुक गया और उन्होंने मुकुटमण्डित मस्तकसे उनके चरणोंमें प्रणाम किया। मुनिने भी, जैसे सूर्यदेव इन्द्रका प्रत्यभिवादन करते हैं, उसी प्रकार मधुर एवं उदारतापूर्ण वचनोंद्वारा आशीर्वाद देकर पृथ्वीनाथ दशरथका प्रत्यभिवादन किया। तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी ब्राह्मणोंने स्वागत आदिके क्रमसे विश्वामित्रजीका सत्कार किया।
दशरथने कहा—महात्मन् ! जैसे भगवान् सूर्य अपने तेजस्वी स्वरूपका दर्शन देकर कमलोंसे भरे हुए सरोवरों-पर अनुग्रह करते हैं, उसी प्रकार आज आपका जो यह असम्भावित तेजोमय दर्शन प्राप्त हुआ है, इससे हम सब लोग अत्यन्त अनुगृहीत हैं।
मुनिके प्रति ऐसी ही बातें कहते हुए अन्य राजा तथा महर्षि, सब लोग राजसभामें आकर यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये। राजा दशरथने स्वयं ही मुनिको अर्घ्य निवेदन किया।
राजाके अर्घ्यको स्वीकार करके महर्षिने शास्त्रोक्त विधिसे प्रदक्षिणा करते हुए नरेशकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। राजा दशरथद्वारा पूजित हो विश्वामित्र बडे प्रसन्न हुए। उनका मुखारविन्द खिल उठा। उन्होंने राजासे उनकी कुशल पूछी। तदनन्तर मुनिवर विश्वामित्र हँसकर वसिष्ठजीसे मिले और यथायोग्य सत्कार करके उनके आरोग्यका समाचार पूछने लगे। क्षणभरमें एक दूसरेसे
**५—विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना और राजा दशरथका उन्हें देनेमें अपनी असमर्थता दिखाना**
२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मिलकर यथायोग्य आदर-सत्कार करके वे सब लोग प्रसन्न-चित्त हो महाराजके महलमें यथायोग्य आसनोंपर बैठ गये। एक दूसरेके सम्पर्कमें आनेसे उन सबके तेज बढ़ गये थे। वे सब आदरपूर्वक आपसमें एक दूसरेकी कुशल पूछने लगे। तदनन्तर प्रसन्नचित्त एवं पवित्र राजा दशरथने हाथ जोड़कर मुनिसे कहा—
"विप्रवर! आप परम धर्मात्मा तथा दानके उत्तम पात्र हैं और सौभाग्यवश यहाँ पधार गये हैं। बताइये आपकी सर्वोत्तम अभिलाषा क्या है? मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ? भगवन्! पहले आप 'राजर्षि' कहे जाते थे, किंतु तपस्याने आपके ब्राह्मतेजको प्रकाशित कर दिया। आपने 'ब्रह्मर्षि'का पद प्राप्त कर लिया, अतः आप मेरे द्वारा सर्वथा पूजनीय हैं। जैसे गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार आपके दर्शनसे भी हो रही है। वह प्रसन्नता मेरे हीत्तलको शीतल-सा किये देती है। ब्रह्मन्! आपके अन्तः-करणसे इच्छा, भय और क्रोध निकल गये हैं, राग-द्वेष दूर हो गये हैं, आप सर्वथा रोगरहित हैं; तो भी मेरे पास आये, यह अत्यन्त अद्भुत बात है। यहाँ पधारे हुए आपका दर्शन, पूजन और वन्दन करके मैं अपनेमें ही फूला नहीं समाता—वैसे ही, जैसे समुद्र अपने ही भीतर पूर्ण चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब देखकर अपने आपमें नहीं समाता, तटकी सीमाको लाँघकर आगे बढ़ आता है। मुनिवर! आपका जो कार्य हो, जिस प्रयोजनसे आप यहाँ पधारे हों, उसे आप सिद्ध हुआ ही समझिये; क्योंकि आप सर्वदा मेरे माननीय हैं। कुशिक-कुलनन्दन! आप कोई विचार न कीजिये। भगवन्! आपके लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है; क्योंकि दी हुई वस्तु आप-जैसे सत्पात्रको प्राप्त होकर ही सार्थक होती है। मैं आपका सारा कार्य पूर्ण करूँगा। आप मेरे परम देवता हैं।"
आत्मज्ञानी महाराज दशरथके द्वारा विनयपूर्वक कहे हुए इस अत्यन्त मधुर, श्रवणसुखद एवं गुणविशिष्ट वचनको सुनकर विख्यातगुण और प्रख्यात यशवाले मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई।
(सर्ग ४—६)
विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना और राजा दशरथका उन्हें देनेमें अपनी असमर्थता दिखाना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! तदनन्तर महातेजस्वी विश्वामित्रजीने पुलकित होकर कहा—
'नृपश्रेष्ठ! आप महान् कुलमें उत्पन्न हुए हैं और महर्षि वसिष्ठ जीकी आज्ञाके अधीन रहते हैं; अतः आपके मुखसे जो बात निकली है, वह इस भूतलपर आपके ही योग्य है। महाराज! अब मैं अपना हार्दिक अभिप्राय आपसे निवेदन करता हूँ। जब-जब मैं यज्ञके द्वारा देवसमूहोंका पूजन करता हूँ, तब-तब कुछ निशाचर आकर मेरे उस यज्ञको नष्ट कर देते हैं। मैने अनेक बार यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया, किंतु राक्षसनायकोंने उस यज्ञ-मण्डपकी भूमिमें रक्त और मांस बिखेर दिये। मैं यज्ञके लिये परिश्रम करके भी उसमें सफल नहीं हो रहा हूँ, इसलिये विघ्न-निवारणके उद्देश्यको लेकर मैं उस स्थानसे यहाँ आपके पास आया हूँ। पृथ्वीनाथ! मेरे मनमें यह विचार नहीं होता कि मै क्रोध करके उन्हें शाप दे दूँ। मैं चाहता हूँ, आपके प्रसादसे उस यज्ञको बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण करके उसके महान् पुण्य-फलका भागी होऊँ। अतः आर्त होकर शरण पानेकी इच्छासे आपके पास आया हूँ, आप (उस यज्ञकी रक्षाद्वारा) मेरा संकटसे उद्धार करनेके योग्य हैं। आपके पुत्र श्रीमान् राम मतवाले सिंहके समान पराक्रमी हैं। उनका बल-विक्रम देवराज इन्द्रके तुल्य है। वे उन राक्षसोंको विदीर्ण करनेमें पूर्ण समर्थ हैं। अतः राजसिंह! आपके जो ज्येष्ठ पुत्र काकपक्षधारी
वैराग्य-प्रकरण ] * विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना * २९
सत्यपराक्रमी, शूरवीर श्रीराम हैं उनको मुझे सौंप दीजिये। ये मुझसे सुरक्षित रहकर अपने दिव्य तेजसे उन यज्ञ-विध्वंसक एवं समस्त संसारका अपकार करनेवाले राक्षसोंका मस्तक काटनेमें समर्थ होंगे। मैं इन श्रीरामको (अस्त्र-विद्या प्रदान करके) अनेक प्रकारसे अनन्त कल्याणका भागी बनाऊँगा, जिससे ये तीनों लोकोंके पूजनीय होंगे।
वे पापी राक्षस युद्धमें कालकूटके समान भयानक हैं, उन्हें अपने बल और पराक्रमपर बड़ा गर्व है, वे खर और दूषणके भृत्य हैं तथा कुपित होनेपर यमराजके समान जान पड़ते हैं। किंतु राजसिंह ! वे श्रीरामके सायकोंको उसी प्रकार नहीं सह सकेंगे, जैसे धूलिकण निरन्तर गिरती हुई मेघकी जलधाराको नहीं सह सकते। महाराज ! मैं अपनी तपःशक्तिसे इस बातको निश्चित रूपसे जानता हूँ, आप भी मेरे कथनानुसार उन राक्षसोंको मरा हुआ ही समझिये; क्योंकि हम तथा हमारे-जैसे दूसरे विज्ञ पुरुष संदिग्ध विषयमें नहीं प्रवृत्त होते। कमलनयन श्रीराम कोई साधारण पुरुष नहीं, साक्षात् परमात्मा हैं; इन्हें मैं जानता हूँ, महातेजस्वी वसिष्ठजी जानते हैं तथा दूसरे-दूसरे दीर्घदर्शी महर्षि भी जानते हैं। * यदि आपके हृदयमें धर्म, महत्ता और यशके लिये विशेष स्थान है तो अपने प्रिय पुत्र श्रीरामको आप मुझे दे दीजिये। मेरा वह यज्ञ, जिसमें श्रीरामको यज्ञद्रोही, विघ्नकर्ता राक्षसोंका वध करना है, दस दिनोंमें पूरा हो जायगा। काकुत्स्थ ! इसके लिये भी आपके वसिष्ठ आदि सभी मन्त्री आपको अवश्य अनुमति दे देंगे, अतः आप श्रीरामको मेरे साथ भेज दीजिये। ठीक समयपर किया हुआ थोड़ा-सा भी कार्य बहुत उपकारी होता है और समय बीतनेपर किया हुआ महान् उपकारी भी व्यर्थ हो जाता है।†
इस प्रकार धर्म और अर्थसे युक्त बात कहकर धर्मात्मा, महातेजस्वी मुनीश्वर विश्वामित्र चुप हो गये। मुनिवर विश्वामित्रका वचन सुनकर उन्हें युक्तियुक्त उत्तर देनेके लिये कुछ सोचते हुए महानुभाव राजा दशरथ थोड़ी देरतक चुपचाप बैठे रहे; क्योंकि जिसका मनोरथ पूर्ण न किया गया हो, वह बुद्धिमान् पुरुष युक्तिसंगत उत्तर पाये बिना संतुष्ट नहीं होता है।
भरद्वाज ! विश्वामित्रजीका वह भाषण सुनकर (वात्सल्य-भावापन्न) नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ीतक निश्चेष्ट बैठे रहे, फिर इस प्रकार दीनतापूर्ण वचन बोले—'मुनीश्वर ! कमलनयन श्रीरामकी अवस्था अभी सोलह वर्षसे भी कम है। ये राक्षसोंके साथ युद्ध कर सकें, ऐसी योग्यता मैं इनमें नहीं देखता। प्रभो ! मेरे पास यह पूरी एक अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं ही स्वामी हूँ। इस सेनाके साथ चलकर मैं ही उन पिशाचोंके साथ युद्ध करूँगा। ये सभी सैनिक मेरे भृत्य हैं—मेरे द्वारा पोषित हुए हैं। ये शूरवीर, पराक्रमी और उचित सलाह देनेमें भी चतुर हैं। मैं युद्धके मुहानेपर हाथमें धनुष लेकर इन सबकी रक्षा करूँगा। इनके साथ रहकर मैं महेन्द्रसे भी बढ़े-चढ़े वीरोंको उसी तरह युद्धका अवसर दूँगा, जैसे सिंह मतवाले हाथियोंको देता है। श्रीराम अभी बालक हैं। इन्हें न तो उत्तम शस्त्रोंका ज्ञान है और न ये युद्धकी कलामें ही निपुण हुए हैं। समराङ्गणमें कोटि-कोटि शूरवीरोंके साथ अस्त्रोंद्वारा कैसे युद्ध किया जाता है, इसका भी इनको ज्ञान नहीं है। केवल फुलवाड़ियोंमें, नगरके उपवनोंमें तथा उद्यानवर्ती वनकुञ्जोंमें इनका
* अहं वेद्मि महात्मानं रामं राजीवलोचनम् ।
वसिष्ठश्च महातेजा ये चान्ये दीर्घदर्शिनः ॥
( वा० रा० ७ । २१ )
† कार्यमल्पमपि काले तु कृतमेत्युपकारताम् ।
महानप्युपकारोऽपि रिक्ततामेत्यकालतः ॥
( यो० वा० ७ । २६ )