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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

ता॒स्स्वेव नो॑ऽपि य॒ज्ञे भा॒ग इति॑ ॥ १॥ तद्ध॑ दे॒वा न ज॑ज्ञुः । तऋतवो दे॒वेष्व॑ता- नत्सु॑सु॒रानुप॒ावर्त॑न्ताप्रियान्दे॒वान्यं द्विषतो भ्रातृ॑व्यान् ॥ २॥ ते॒ हैतामृ॑तु॒मेधां च- क्रिरे । य॒न्निषा॑मेतामनुश‍ृण्वन्ति॒ कृष॑न्तो ह॒ स्मैव पूर्वे॑ व॒पन्तो॒ यन्ति॑ लु॒नन्तो॑ऽपरे॒ मृ॒णन्तः॑ शश्व॒द्धेभ्यो॑ऽकृष्टपच्या॒ एवौष॑धयः पेचिरे ॥ ३॥ तद्ध॑ दे॒वानामाग॑ आस । क॒नीय॒ इन्नु॑तो द्विषन्द्धि॒षते॒ऽरातीयति॒ किम्मे॒तावन्मात्रमुप॒ज्ञानीत॒ यथे॒दमितो॒ऽन्यथा॑- स॒दिति॑ ॥ ४॥ ते॒ होचुः । ऋ॒तूनैवानुम॑न्त्रयामहा॒ऽइति॒ केनेति॑ प्रथ॒माने॑वैनान्य॒ज्ञे य॒जामेति॑ ॥ ५॥ स॒ ह्वाग्नि॑रुवाच । अथ॒ यन्मां पु॒रा प्रथ॒मं य॒ज्ञस्य॒ ह्वातुं भ॑वानीति॑ न त्वा॒माय॑तना॒च्चाव॑याम॒ इति॑ ते॒ यदृ॒तून॒भिक्लृ॒प्यमा॑ना अथा॒ग्निमाय॑तना॒न्नाच्या॑वय॒स्त- स्माद॒ग्निरच्युतो॒ न ह॒ वाऽआ॑यतना॒च्च्यवते॒ यस्मि॒न्नाय॑तने॒ भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तम॒ग्नि- मच्युतं वे॒द ॥ ६॥ ते देवा अग्नि॑मब्रुवन् । परे॑ह्ये॒नांस्त्वमे॒वानुम॑न्त्रय॒स्वेति॒ स हे॒त्या- ग्निरु॑वाच॒ऽर्तवो॒ऽवि॑दं वै वो दे॒वेषु य॒ज्ञे भा॒गमिति॑ क॒थं नो॑ऽविद॒ इति॑ प्रथ॒माने॑व वो य॒ज्ञे य॑क्ष्यन्तीति॑ ॥ ७॥ तऋ॒तवो॒ऽग्निम॑ब्रुवन् । आ व॒यं त्वा॒मस्मासु॑ भजामो यो नो दे॒वेषु य॒ज्ञे भा॒गमविद॒ इति॒ स ए॒षो॑ऽग्नि॒रृतु॒ष्वाभ॑क्तः स॒मिधो॑ऽअ॒ग्ने तनू॒न- पाद॒ग्नऽइडो॑ऽअ॒ग्ने ब॒र्हिर॑ग्ने॒ स्वाहा॒ग्निमि॒त्याभ॑क्तो ह॒ वै तस्यां॑ पुण्यकृ॒त्यायां भवति यामस्य॑ समा॒नो ब्रुवाणः॑ करो॒त्य॒ग्निम॑ते ह॒ वाऽअ॒स्माऽअ॒ग्निमन्त॑ ऋ॒तव॒ ओष॑धीः पचन्तीदग्ँ सर्वं य ए॒वमे॒तम॒ग्निमृ॒तुष्वाभ॑क्तं वे॒द ॥ ८॥ तदा॒हुः । यदु॑त्त॒मान्प्र॒याजा॑ना- त्रावृ॑त्त्य॒त्य कस्मा॑देनान्प्रथ॒मान्य॒जन्ती॒त्युत्त॑मान्ह्ये॒नान्य॒ज्ञेऽवा॑कल्पयन्प्रथ॒मान्वो य- ज्ञामि॒त्यृ॒तूंस्तस्मा॑दुत्त॒मानावा॒वृत्त्य॑ प्रथ॒मान्य॑जन्ति ॥ ९॥ चतुर्थेन॒ वै प्र॒यजे॑न दे॒- वाः । य॒ज्ञमा॑प्नुवंस्तं प॒ञ्चमेन॒ सम॑स्थापय॒न्नथ॒ यदूत॑ ऊ॒र्ध्वमस॑त्थ्सि॒तं य॒ज्ञस्य॒ स्वर्ग॒मिव तेन लोकग्ँ समा॑श्नुवत ॥ १०॥ ते स्वर्गं लो॒कं य॒न्तः । असुरर॒क्षसेभ्य आस॑ङ्गाद्द्वि- भयां चक्रुस्ते॒ऽग्निं पु॒रस्ता॑दकुर्वत रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सांमपह॒न्तारम॒ग्निं म॑ध्य॒तोऽकु॑र्वत रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सामपह॒न्तारम॒ग्निं प॒श्चाद॑कुर्वत रक्षोह॒णग्ँ वृत्त॒सामपहन्तारग्ँ ॥ ११॥

का० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / १०६ निकालो। हमारा भी यज्ञ में भाग हो' ॥१॥ देवों ने न माना। देवों के न मानने पर ऋतुएँ असुरों के पास चली गईं जो अप्रिय तथा देवों के शत्रु और अहितकारी थे ॥२॥ उन (असुरों) ने ऐसी उन्नति की कि देवों ने भी सुना। जो असुर आगे-आगे जोतते- बोते जाते थे, पीछे से उसी को दूसरे असुर काटते और इकट्ठा करते जाते थे। इनके लिए मानो बिना जोते ही ओषधियाँ झट से पक जाती थीं (अर्थात् असुर ज्यों ही बोते थे त्यों ही बिना समय बीते फसल पक जाती थी। आगे-आगे बोते थे, पीछे-पीछे काटते थे क्योंकि ऋतुएँ उनके साथ थीं) ॥३॥ इससे देवों को चिन्ता हुई कि इस प्रकार शत्रु, शत्रु को हानि पहुँचावें यह तो छोटी बात है। परन्तु इसकी हद बढ़ गई। अब कोई ऐसा उपाय होना चाहिए जिससे इस प्रकार की अवस्था न रहे ॥४॥ उन्होंने कहा, 'पहले ऋतुओं को बुलावें।' कैसे ? 'पहले इनको यज्ञ में भाग दें' ॥५॥ अग्नि ने कहा, 'तुम पहले मुझको आहुति देते हो, अब मैं कहाँ जाऊँ?' उन्होंने कहा, 'हम तुमको तुम्हारे स्थान से नहीं हटायेंगे।' और क्योंकि ऋतुओं के बुलाने में अग्नि को उन्होंने उसकी जगह से नहीं हटाया, इसलिए अग्नि अच्युत है। जो पुरुष समझता है कि अग्नि अच्युत है वह अपने स्थान से च्युत नहीं होता ॥६॥ देवों ने अग्नि से कहा, 'जाओ और उन्हें यहाँ बुला लाओ।' अग्नि उनके पास गया और बोला, 'हे ऋतुओ, मैंने तुम्हारे लिए यज्ञ में भाग प्राप्त कर लिया।' उन्होंने पूछा, 'तुमने हमारा भाग हमारे लिए कैसे प्राप्त किया?' अग्नि ने उत्तर दिया, 'वे पहले तुम्हारे लिए आहुति देंगे' ॥७॥ ऋतुओं ने अग्नि से कहा, 'हम तुमको अपने साथ यज्ञ में भाग देंगे, क्योंकि तुमने हमारे लिए यज्ञ में देवों के साथ भाग दिलाया है' और क्योंकि अग्नि को ऋतुओं के साथ-साथ आहुति मिली, इसलिए कहते हैं, 'समिधोऽअग्ने', 'तनूनपादग्ने', 'इडोऽअग्ने', 'बर्हिरग्ने', 'स्वाहाग्निम्'। जो इस रहस्य को समझता है उसका उस पुण्य कार्य में भाग होता है जो वह पुरुष करता है, जो अपने को उसके समान कहता है, क्योंकि वह अग्निमान् (अग्निवाला) है। अग्निमान् ऋतुएँ ही ओषधियों तथा अन्य पदार्थों को पकाती हैं ॥८॥ इस पर कुछ लोग आक्षेप करते हैं कि जब ये पिछले प्रयाज हैं तो पहले ही आहुतियाँ क्यों दी जाती हैं ? इसका उत्तर यह है कि इन प्रयाजों की कल्पना ही सबसे पीछे की थी, इसलिए ये पिछले प्रयाज हैं, और क्योंकि कहा कि हम पहले आहुति देंगे इसलिए पहले प्रयाज-आहुतियाँ दी गईं ॥९॥ देवों ने चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त किया और पांचवें प्रयाज से उसकी स्थापना की। उसके बाद जो कुछ असंस्थित (बिना स्थापित हुआ) बच रहा, उसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त किया ॥१०॥ वे स्वर्गलोक को जाने लगे तो असुर और राक्षसों से डरे। उन्होंने अग्नि को अगुवा बनाया, क्योंकि वह राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को मध्य में रक्खा क्योंकि अग्नि राक्षसों का मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को पीछे रक्खा, क्योंकि वह अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है ॥११॥

११० शतपथ ब्राह्मण स॒ यद्ये॑नान्पुर॒स्तात् । अ॒सुररक्ष॒सान्यासि॑संक्षन्नग्निरि॑व तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑साम- पह॒न्ता यदि॑ मध्यत॒ आ॑सि॒संक्षन्नग्निरि॑व॒ तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ प- श्चादासि॑संक्षन्नग्निरि॑व॒ तान्य॒पाहन्ग् रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्तात् एव॒ग्॒ सर्व॑तोऽग्निभिर्गू- र्ध्यमा॑नः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्व॑वत ॥ १२॥ तयो॒ऽत्वै॑ष ए॒तत् । च॒तुर्थेनै॑व॒ प्रया॒- जेन य॒ज्ञमाप्नो॑ति॒ तं प॑ञ्च॒मेन॒ संस्ता॒पयत्य॑थ॒ यद॑त ऊ॒र्ध्वमस॑ऽस्थितं य॒ज्ञस्य स्व॒र्गमे॒- व ते॑न लो॒कं स॒मश्रु॑ते ॥ १३॥ स यद॒ग्नेयम॒ाज्यभा॒गं यज॑ति । अ॒ग्निमे॒वैतत्पुर॒स्ता- त्कुरुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपह॒न्तार॒मथ॒ यदा॑ग्ने॒यः पु॑रो॒डाशो भव॑त्य॒ग्निमे॒वैतन्मध्य॑तः कुरुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपह॒न्तार॒मथ॒ यद॒ग्निः॑ स्विष्ट॒कृत् यज॑त्य॒ग्निमे॒वैतत्पश्चात्कु- रुते रक्षो॒हणं रक्ष॑सामपहन्ता॒रं ॥ १४॥ स यद्ये॑नं पु॒रस्ता॑त् । अ॒सुररक्ष॒सान्या- सि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ मध्य॒त अ॒सुररक्ष॒सा- न्यासि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता यदि॑ प॒श्चादसुररक्ष॒सा- न्यासि॑संक्षन्त्य॒ग्निरि॑व॒ तान्यप॑हन्ति रक्षो॒हा रक्ष॑सामपह॒न्ता स एव॒ग्॒ सर्व॑तोऽग्निभि- र्गु॑प्यमा॑नः स्व॒र्गं लो॒कं स॒मश्रु॑ते ॥ १५॥ स यद्ये॑नं पु॒रस्ता॑त् । य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑तं प्रति॑ ब्रूयान्मुख्यामार्तिम॑रिष्य॒न्त्यो वा ब॑धि॒रो वा भ॑विष्यसीत्ये॒ता वै मु॑ख्या आ- र्तयस्तथा॒ हैव स्यात् ॥ १६॥ यदि॑ मध्य॒तो य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑त् । तं प्रति॑ ब्रूयात्प्र- जा अ॑प॒शुर्भवि॑ष्यसी॑ति प्र॒जा वै प॒शवो॒ मध्यं॒ तथा॒ हैव॒ स्यात् ॥ १७॥ यद्यन्त॑तो य॒ज्ञस्यानुव्याहुरे॑त् । तं प्रति॑ ब्रूयादप्रति॑ष्ठितो द॒रिद्रः क्षि॒प्रेऽमुं लो॒कमे॑ष्यसी॑ति त- था॒ हैव स्यात्तस्मादङ्ग॒ नानु॑व्याहा॒रीव स्यादुत॒ ह्येवं॑वि॒त्परो भव॑ति ॥ १८॥ संव- त्स॒रो ह वै प्र॑या॒जैर्जय॑मान्त्स॒न्तनो॑ति । स ह॒ त्वे॒वैनं॑ जय॑ति योऽस्य द्वारा॑णि वे॒द किग् हि स तैर्गृ॒हैः कुर्या॒द्यानन्तरतो न व्यव॑विद्या॒द्यास्य ते भव॑न्ति तस्य वस॒न्त ए॒व द्वार॒ग्॒ हेम॒न्तो द्वारं॒ तं वा॒ऽए॒तग्ं संवत्सर॒ग्॒ स्वर्गं॑ लो॒कं प्र॒पद्य॑ते सर्वं॒ वै संवत्स॒- रः सर्वं वा॒ऽअक्षय्य॑मे॒तेन हास्याक्षय्य॒ग्ं सु॒कृतं भवत्यक्षय्यो॑ लो॒कः ॥ १९॥ तदा-

कां० १, अ० ६, ब्रा० १, क० १२-१६ शतपथब्राह्मण / १११ यदि असुर और राक्षस सामने आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि बीच से आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने तथा भगानेवाला है। यदि पीछे से आक्रमण करते तो अग्नि उनको हटा देता, क्योंकि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से अग्नियों से रक्षित होकर वे स्वर्ग में पहुँच गये ॥१२॥ इसी प्रकार यह (यजमान) भी चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त करता है, पांचवें यज्ञ को स्थापित करता है और जो यज्ञ से बच रहता है उससे स्वर्गलोक को प्राप्त करता है ॥१३॥ वह जब आग्नेय आज्यभाग से यज्ञ करता है तो अग्नि को सामने रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। वह जब आग्नेय पुरोडाश से यज्ञ करता है तो अग्नि को बीच में रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारने और भगानेवाला है। जब वह स्विष्टकृत् अग्नि में यज्ञ करता है तो अग्नि को पीछे रखता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगाने- वाला है ॥१४॥ असुर राक्षस जब आगे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब असुर राक्षस बीच से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको पीछे हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। जब असुर राक्षस पीछे से आक्रमण करते हैं तो अग्नि उनको हटा देता है, क्योंकि अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और हटानेवाला है। इस प्रकार सब ओर से अग्नि द्वारा सुरक्षित होकर स्वर्गलोक को प्राप्त होता है ॥१५॥ यदि कोई उसके साथ यज्ञ के पहले दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'मुख के रोग तुझे लग जायें । तू अन्धा या बहरा हो जायगा ।' यही मुख के रोग हैं। ऐसा ही हो जाय ॥१६॥ यदि कोई उसके साथ यज्ञ के बीच दुष्ट व्यवहार करे तो उसको उत्तर दें—'तू प्रजाहीन और पशुहीन हो जायगा।' क्योंकि प्रजा और पशु मध्य के हैं। ऐसा ही हो जायगा ॥१७॥ यदि कोई उससे यज्ञ के पीछे दुष्ट व्यवहार करे तो उससे कहना चाहिए—'तू- प्रतिष्ठाहीन और दरिद्र शीघ्र ही दूसरे लोक को चला जायगा।' ऐसा ही होवे। इसलिए किसी को दुष्ट व्यवहार नहीं करना चाहिए। जो इस रहस्य को जानता है वही लाभ में रहता है ॥१८॥ प्रयाजों से संवत्सर को जीतता है। वही जीतता है जो उसके द्वारों को जानता है। वे लोग घरों से क्या लाभ उठा सकते हैं जो भीतर घुसने के द्वारों को नहीं जानते ? जिस प्रकार यज्ञ के द्वार प्रयाज हैं उसी प्रकार संवत्सर के द्वार वसन्त और हेमन्त हैं। इस संवत्सर में स्वर्गलोक करके प्रविष्ट होता है, क्योंकि वस्तुतः संवत्सर 'सब' है। 'सब' अक्षय है। इस प्रकार उसको अक्षय पुण्य और अक्षय लोक की प्राप्ति होती है ॥१९॥

अध्याय-६, ब्राह्मण-२

११२ शतपथ ब्राह्मण ङ्गः । किं दे॒वत्या॒न्या॒ज्यानी॑ति प्रा॒जाप॑त्यानीति ह ब्रूया॒दनिरु॑क्तो॒ वै प्र॒जाप॑ति॒रनि॑- रु॒क्तान्या॒ज्यानि॒ तानि॒ हैता॒नि य॒जमान॑दे॒वत्या॒न्येव य॒जमानो॒ ह्ये॑व॒ स्वे य॒ज्ञे प्र॒जा- प॑ति॒स्तेन॒ व्युक्ता ऋ॒त्विज॒स्तन्व॑ते॒ तं ज॑नयन्ति ॥ २०॥ सो ऽआ॒ज्यस्योपस्तीर्य॑ । द्विर्ह- वि॒षोऽव॑दा॒याथोपरि॒ष्टादा॒ज्यस्या॒भिघा॑रयति॒ सैषाऽऽज्येन॑ मिश्रा॒हुति॑र्ह्रूयते यजमानेन ह्ये॒वैषैतन्मिश्रा॒ हूयते॒ यदि॑ ह॒ वाऽअपि॑ दू॒रे स॒न्यज॑ते॒ यद्यन्ति॑के॒ यथा॒ हैवा॑न्ते॒ सत॑ इ॒ष्टꣳ स्या॒देवꣳ॒ है॒वैवं॒ वि॒दुष॒ इ॒ष्टं भ॑वति॒ यद्यु॒ ह्यापि॒ ब॒ह्विव॒ पापं॒ करो॑ति॒ नो है॒व ब॒र्हिर्धा य॒ज्ञाद्भवति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ २१॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [६. १.] ॥ ॥ चतुर्थः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥ य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जिग्युर्यैषा॑मि॒यं जि॒तिस्ते होचुः क॒थं न इ॒दं मनु॑- ष्यैरन॒भ्यारो॒ह्यꣳ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒र्विदु॑- ग्व्य य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवंन्नथ॒ यदेने॒नायो॑पयं॒स्तस्मा॒द्यू॒पो नाम॒ तदृष॑- षीणामनु॑श्रुतमास ॥ १॥ य॒ज्ञेन ह॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॒तिं जि॑ग्यु॒र्यैषा॑मि॒यं जि॒तिस्ते होचुः क॒थं न इ॒दं मनु॑ष्यैरन॒भ्यारो॒ह्यꣳ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒र्विदु॑ग्ध्य य॒ज्ञं यूपेन॑ योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवन्निति॒ तमन्वे॑ष्टुं दधिरे ॥ २॥ ते॒ऽर्च॑न्तः श्राम्य॑न्तश्चेरुः । श्रमे॑ण ह॒ स्म वै तद्दे॒वा जय॑न्ति॒ यदे॑षां जय्यमा॒सूर्ष॑- यश्च॒ तेभ्यो॑ दे॒वा वैव॒ प्ररो॑चयां चक्रुः स्व॒यं वैव द॑धिरे॒ प्रेत॒ तदि॑ष्यामो॒ यतो॑ दे॒वाः स्व॒र्गं लो॒कꣳ स॒माश्नु॑व॒तेति॒ ते किं प्ररो॑चते॒ किं प्ररो॑चत॒ऽइति॑ चेरु॒रेत्पुरोडाश॑मेव॒ कू॒र्मं भू॒त्वा सर्प॑न्तं ते॒ ह सर्व॑ऽएव॒ मेनि॑रि॒दं वै य॒ज्ञ इति॑ ॥ ३॥ ते होचुः । अ॒श्वि- भ्यां तिष्ठ॒ सर॑स्वत्यै तिष्ठेन्द्रा॑य तिष्ठेति॒ स स॒र्पन्नेवाग्रे॑ तिष्ठेति तत॒स्तस्थावग्रे॑ वा॒ऽअस्यादिति॒ तमग्रा॑वे॒व परि॑गृह्य॒ सर्व॑ङ्गतमङ्गुरु॒राहु॑तिर्हि दे॒वानां तत एभ्यो य॒ज्ञः प्रारो॑चत॒ तम॑सृजन्त॒ तम॑तन्वत॒ सोऽयं प॒रोऽव॑रं य॒ज्ञोऽनूच्य॑ते पि॒तैव पु॒त्राय॑ ब्रह्मचारि॑णे ॥४॥ स वा॒ऽए॒भ्यस्तत्पुरो॒डाशायत॒ । य ए॒भ्यो य॒ज्ञं प्रारो॑चयत्तस्मा-

का० १, अ० ६, ब्रा० २, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ११३ यदि कोई पूछे कि आज्य आहुतियां किस देव के लिए हैं तो उत्तर देना चाहिए—'प्रजा- पति के लिए।' क्योंकि प्रजापति अनिरुक्त (अस्पष्ट) है और ये आहुतियां भी अनिरुक्त हैं। यजमान ही उनका देवता है। अपने यज्ञ में यजमान ही प्रजापति है, क्योंकि इसी के कहने से ऋत्विज लोग यज्ञ को फैलाते और उत्पन्न करते हैं ॥२०॥ हवि के ऊपर घी लगाकर उसमें से दो टुकड़े काटकर उन पर घी डालता है। इस प्रकार घी से मिश्रित आहुति दी जाती है, मानो यजमान से ही मिश्रित आहुति दी जाती है। चाहे वह दूर हो या निकट, यज्ञ इसी प्रकार किया जाता है मानो वह निकट ही है। यदि वह इस रहस्य को समझता है, यदि वह इसको जानता है तो वह यज्ञ से कभी बाहर नहीं होता है चाहे कितना ही पाप क्यों न करे ॥२१॥ अध्याय ६—ब्राह्मण २ यज्ञ से ही देवों ने यह (स्वर्गलोक) जीता। जब जीत चुके तो कहने लगे कि इसको मनुष्य के न प्राप्त करने योग्य कैसे बनाया जाय ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु- मक्खी मधु को चूसती है। यज्ञ को दूह अर्थात् चूसकर, यूप से छिपाकर छिप गये। चूंकि उन्होंने इसे यूप से छिपाया (आयोपयन्), अतः इसका 'यूप' नाम पड़ा। अब ऋषियों ने सुना—॥१॥ 'यज्ञ से ही देवों ने (स्वर्गलोक) को जीता और जीतने पर उन्होंने कहा किस प्रकार हम इसको मनुष्य से प्राप्त न करने योग्य बनावें ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे मधु- मक्खी मधु को, और यज्ञ को दुहकर उसे छिपा दिया और आप छिप गये।' (ऋषि लोग) उसको ढूंढ़ने लगे ॥२॥ उन्होंने पूजा और श्रम करना आरम्भ किया। श्रम से ही देवों ने जो कुछ जीतना चाहा जीता, और ऋषियों ने भी। या तो इनको देवों ने आकर्षित किया या ये स्वयं ही चले। उन्होंने कहा, 'आओ' उस स्थान को चलें जहाँ देवों ने स्वर्गलोक को प्राप्त किया था।' वे यह कहकर फिरने लगे, 'यह क्या चमकता है ? यह क्या चमकता है?' पुरोडाश को कूर्म (कछुआ) के रूप में रेंगते देखकर उन्होंने समझा कि यही यज्ञ है ॥३॥ उन्होंने कहा, 'अश्विनों के लिए ठहर ! सरस्वती के लिए ठहर ! इन्द्र के लिए ठहर !' वह चलता ही गया। जब उन्होंने कहा, 'अग्नि के लिए ठहर' तो वह ठहर गया। यह समझकर कि यह अग्नि के लिए ठहर गया, उन्होंने उसे अग्नि में लपेटकर सबकी आहुति दे दी। क्योंकि देवों के लिए यह आहुति थी, उनको यज्ञ रोचक मालूम हुआ। उन्होंने यज्ञ को किया, उसको फैलाया। यह यज्ञ परम्परा से कहा जाता है। पिता ब्रह्मचारी पुत्र के लिए उपदेश करता है ॥४॥ उन्होंने उनके लिए इसे 'पुरो' अर्थात् आगे 'अदाशयत्' अर्थात् रक्खा, जिसने इनके लिए

अध्याय-६, ब्राह्मण-३

त्यु॑रोडाशः पुरो॒दाशो॑ ह॒ वै ना॑मैतद्यत्पुरो॒डाश॒ इति॒ स ए॒ष उ॑भय॒त्राच्यु॑त॒ आ॒ग्ने॒यो ऽष्टाक॑पालः पुरो॒दाशो॑ भवति ॥ ५॥ स न पौर्णमा॒सँ ह॒विः । नामा॑वास्यम॒ग्नी- षोमी॑य ए॒व पौर्णमा॒सँ ह॒विः सांना॒य्यमा॑मावा॒स्यं॑ य॒ज्ञ उ॒वैष उ॑भय॒त्रावकॢ॑प्तो ने- द्य॒ज्ञाद्यानीति॒ न्वे॑व पुरस्ता॑त्पौर्णमा॒सस्य॑ क्रिय॒तऽए॒वमा॑मावा॒स्य॑स्यैतन्नु॒ तयो॒स्मा- द॒त्र क्रि॑यते ॥ ६॥ य॒द्युऽएन॑मुप॒धावे॑त् । ऋ॒ध्या मा॒ याज॑ये॒त्येतै॑रे॒व याज॑ये॒द्यत्कामा वाऽए॒तमृषयो॑ऽजुहुवुः स ए॒भ्यः काम॑ः सम॑र्ध्यत॒ यत्कामो ह॒ वाऽए॒तेन य॒ज्ञेन॒ य- ज॑ते॒ सोऽस्मै॒ काम॑ः समृध्यते॒ यस्यै॒ वै कस्यै॑ च दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॑ह्यते॒ऽग्नौ वै तस्यै॑ जुह्व॒त्यग्ना॒ऽउ चेद्बो॑ष्य॒न्त्यात्किमन्यस्यै॑ दे॒वता॑या॒ऽआदिशे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ७॥ अ- ग्निर्वै सर्वा॑ दे॒वता॑ः । अ॒ग्नौ हि सर्वा॑भ्यो दे॒वता॑भ्यो जु॒ह्वति॒ तद्यथा सर्वा॑ दे॒वता॑ उप॑धावे॒देवं तत्त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ८॥ ॥ शतम् ५०० ॥ ॥ अ॒ग्निर्वै दे॒वाना॑मद्धा तमा॑म् । यं वाऽअ॒द्धातमां म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ९॥ अ॒ग्निर्वै दे॒वानां॑ मृदु॒हृद॑यतमः । यं वै मृदु॒हृद॑यतमं म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ १०॥ अ- ग्निर्वै दे॒वानां॒ नेदि॑ष्ठम् । यं वै नेदि॑ष्ठमुपसर्त॒व्यानां॑ म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ ऽए॒व ॥ ११॥ स यदी॑ष्टिं कु॒र्वीत॑ । स॒प्तद॒श सामि॑धेनी॒रनु॑ब्रूया॒ऽपाङ्क्षु दे॒वतां॑ यज- ति तद्दीक्षि॑त॒रूपं मूर्धन्व॑त्यौ याज्यानुवा॒क्ये॑ स्यातां वार्त्रघ्नावा॒ज्यभा॒गौ वि॒राज्ञी सं- याज्ये॑ ॥ १२॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ १ [६. २.] ॥ ॥ त्वष्टु॒र्ह वै पुत्रः । त्रि॒शीर्षा ष॑ड॒क्ष आस॒ तस्य॒ त्रीण्ये॑व मु॒खान्या॑सु॒स्तद्य॒द्विश्व॑रूप आ॑स॒ तस्मा॑द्वि॒श्वरू॑पो नाम ॥ १॥ तस्य॒ सोम॑पान॒मेवै॒कं मुख॑मास । सु॒रापा॒णमेक॑- मन्य॒स्माऽअश॑नायै॒कं तमिन्द्रो॑ दिद्वेष॒ तस्य॒ तानि॒ शीर्षाणि॑ प्रचि॒च्छेद॑ ॥ २॥ स य- त्सोम॑पानमास । ततः कपि॑ञ्जलः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्स ब॒भ्रुक॑-इव ब॒भ्रुरि॑व॒ हि सो- मो राजा॑ ॥ ३॥ अथ॒ यत्सु॒रापा॑णमास । ततः कल॑वि॒ङ्कः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्सोऽभि॑मा- द्यत्क॑-इव वद॒त्यभि॑माद्यन्निव॒ हि सुरां॑ पी॒त्वा व॑दति ॥ ४॥ अथ॒ यद॒न्यस्मा॒ऽअश॑

का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ११५ यज्ञ को रोचक बनाया, इसलिए इसका नाम 'पुरोडाश' हुआ। पुरोडाश ही पुरोडाश है। अग्नि के लिए आठ कपालों का पुरोडाश दोनों जगह (अर्थात् दर्श और पूर्णमास यज्ञ में) आवश्यक है ॥५॥ यह हवि न पूर्णमासी की है न अमावस्या की। पूर्णमासी की हवि अग्नि-षोमीय है और अमावस्या की सान्नाय्य। दोनों समय यह यज्ञ ही है। कहीं यह यज्ञ हवि-यज्ञ से अलग न रह जाय, इसलिए यह पूर्णमासी को भी दी जाती है और अमावस्या को भी। यही कारण है कि यह यहाँ दी जाती है ॥६॥ यदि कोई (गृहस्थी) (अध्वर्यु के पास) जावे और कहे कि मेरे लिए यज्ञ (इष्टि) करो, तो उसे यज्ञ करना चाहिए। ऋषियों ने जब यज्ञ किया तो जो कुछ कामनायें कीं, वे सब पूरी हुईं। इसी प्रकार यजमान इष्टि के करने में जो कुछ कामना करता है वह पूरी ही जाती है। जिस किसी देवता के लिए हवि दी जाती है, उस-उसके लिए अग्नि में दी जाती है। यदि आहुति अग्नि में दी जाती है तो दूसरे देवता के लिए क्यों घोषित की जाय ? इसलिए यह अग्नि के लिए ही है ॥७॥ अग्नि ही सब देवता हैं। अग्नि में ही सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। इसलिए अग्नि के लिए घोषणा करे, इससे सब देवताओं तक जा सकता है ॥८॥ यहाँ ॥५००॥ समाप्त हुए ॥ अग्नि ही सब देवताओं में अधिक फल देनेवाला है। जिसको सबसे अधिक फल देनेवाला समझे उसी के पास जावे। इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥६॥ अग्नि देवताओं में सबसे मृदु हृदय अर्थात् नरम दिल वाला है। जिसको सबसे अधिक नरम दिल वाला समझे उसी के पास जावे। इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥१०॥ अग्नि देवों में निकटतम हैं। जहाँ जाना हो, उनमें जिसको निकटतम समझे वहीं जावे। इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥११॥ यदि वह कोई इष्टि करे तो १७ सामिधेनियों को बोले। वह इनको धीरे-धीरे बोले, यही इष्टि का रूप है। याज्य और अनुवाक्य में 'मूर्धा' शब्द हो। दो आज्य भाग वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए हों और विराज छन्द में ॥१२॥ अध्याय ६—ब्राह्मण ३ त्वष्टा के एक पुत्र था। उसके तीन सिर और छः आँखें थीं, तथा तीन मुख थे। उसका ऐसा रूप था इसलिए उसका नाम विश्वरूप था ॥१॥ उसका एक मुँह सोम पीने के लिए था, एक सुरा पीने के लिए और एक अन्य प्रकार के भोजन करने के लिए। इन्द्र उससे द्वेष करता था, इसलिए उसने उन सिरों को काट डाला ॥२॥ जो सोम पीने का मुँह था उसमें से चातक पक्षी उत्पन्न हुआ। इसलिए वह भूरा होता है। सोम राजा भूरा है ॥३॥ और जो मद्य पीने का (मुँह) था उससे गौरय्या (कलविक पक्षी) उत्पन्न हुई, इसलिए वह लड़खड़ाती आवाज में बोलती है। क्योंकि जो शराब पीता है उसकी आवाज लड़खड़ाने लगती है ॥४॥ और जो अन्य खाना खानेवाला मुख था उससे तित्तिरी उत्पन्न हुई, इसलिए उसके शरीर

११६ शतपथ ब्राह्मण नाया॒स । त॒तस्तित्ति॒रिः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्स वि॒द्युद्रूपतम॒ इव॒ सत्ये॒व घृ॒तस्तोका॒-इव तन्मधु॑स्तोका॒-इव त्वत्प॑र्षिध्वाश्रुतिता ए॒वꣳ रूपꣳ हि स तेना॒शनमा॒वय॑त् ॥ ५ ॥ स त्वष्टा॑ चुक्रोध । कु॒विन्मे॑ पु॒त्रमब॑धी॒दिति॒ सो॒ऽपेन्द्र॑मेव॒ सोम॒माज॑ह्रे स॒ यथाऽच्छ सो- मः प्रसु॒त ए॒वम॑पेन्द्र ए॒वास॑ ॥ ६ ॥ इन्द्रो॑ ह वाऽईक्षां च॑क्रे । इ॒दं वै मा॒ सोमा- दन्त॑र्यन्तीति स॒ यथा॒ बली॑यान॒बली॑यस ए॒वमनु॑पहूत ए॒व यो द्रो॑णकल॒शे शु॒क्र आसी॒त्तं भ॒क्षयां च॑कार॒ स हैनं॑ जिहि॒ꣳस॒ सो॒ऽस्य विष्व॒ङ्गेव प्रा॒णेभ्यो॒ दुद्राव मु- खाद्वै॒वास्य॒ न दु॒द्रावाथ॒ सर्वे॑भ्यो॒ऽन्येभ्यः॑ प्रा॒णेभ्यो॒ऽद्रवत्तद॒दः सौ॑त्रामणीतीष्टि॒स्त- स्यां तद्व्या॒ख्याय॑ते॒ यथै॒नं दे॒वा अ॑भिषज्य॒न् ॥ ७ ॥ स त्वष्टा॑ चुक्रोध । कु॒विन्मे॒ऽनुप- हूतः सो॒मम॑भक्षयदि॒ति स स्व॒यमे॒व य॒ज्ञविश॑सं चक्रे स यो द्रो॑णकल॒शे शु॒क्रः प- रिशि॑ष्ट॒ आसी॒त्तं प्रव॑र्त्तयां च॒कारिन्द्रा॑शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॒ सो॒ऽग्निमे॒व प्राप्य॒ सम्ब॑भूवाथै॒व सम्ब॑भूवेत्यु॒ हैक॑ऽआहुः सो॒ऽग्नीषोमा॑वे॒वाभि॒सम्ब॑भूव॒ सर्वा॑ वि॒द्याः सर्वं॒ यशः॒ सर्व- म॒न्नाद्यꣳ सर्वा॒ꣳ श्रीम् ॥ ८ ॥ स यद्वर्त॑मानः सम॑भवत् । तस्मा॒द्वृत्रोऽथ यदपात्स॒म- भव॒त्तस्मा॒दहि॒स्तं दनु॑श्च दना॒यूश्च॑ मा॒तेव॑ च पि॒तेव॑ च परि॑जगृहतु॒स्तस्माद्दानव इ- त्याहुः॑ ॥ ९ ॥ अथ॒ यदब्र॑वीदिन्द्र॑शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॑ । तस्मा॒द्ध हैन॒मिन्द्र॑ ए॒व ज॑घानाथ॑ यद्ध॑ शश्वद॒वक्ष्य॒दिन्द्र॑स्य शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॑ शश्वद्ध ह स ए॒वेन्द्र॑म॒हनि॑ष्यत् ॥ १० ॥ अथ॒ यद॑ब्रवीद॒र्धस्वेति॑ । तस्मा॒द्ध ह स्वेषु॒मात्र॑मेव॒ तिर्य॑ङ्र्धत॒ऽइषु॑मात्रं प्राङ्क्सो॒ऽवेवा- वरं॑ समु॒द्रं द॑धाव॒व पूर्वाꣳ स याव॑त्स आ॒स सहै॑व ताव॒दन्ना॑द॒ आस॑ ॥ ११ ॥ तस्मै॑ ह स्म पूर्वा॒ह्णे दे॒वाः । अशनम॑भि॒हर॑न्ति मध्यान्दि॒ने मनु॑ष्या अपराह्णे पि॒तरः॑ ॥ १२ ॥ स वा॒ऽइन्द्र॒स्तथै॒व नु॒त्तश्च॑रन् । अ॒ग्नीषोमा॒ऽउप॑मन्त्रयां च॒क्रेऽग्नी॑षोमौ यु॒वं वै मम॑ स्थो यु॒वयोर॒हम॑स्मि॒ न यु॒वयोरिषं॒ किं चन॒ कं म॒ऽइमं॑ दस्युं॑ वर्धय

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ५-१४ :शतपथब्राह्मण/ ११७ पर चितकबरे दाग होते हैं। कहीं घी के-से दाग, कहीं शहद के, से दाग, क्योंकि भिन्न-भिन्न रंग की वस्तुयें थीं जो उसने खाईं ॥५॥ त्वष्टा को क्रोध हुआ। उसने कहा, 'क्या सचमुच मेरे पुत्र को मार डाला?' वह उस उपेन्द्र सोम (वह सोम, जिसमें इन्द्र को भाग नहीं दिया गया) को ले आया। इस प्रकार यह सोम निचोड़ा गया, तब वह इन्द्र के भाग से शून्य था ॥६॥ इन्द्र ने सोचा, 'यह मुझे सोम से निकालते हैं!' बस उसने बिना बुलाये ही कलश में जो शुक्र अर्थात् शुद्ध सोम था पी लिया, जैसे बली पुरुष निर्बलों की चीज पी जाते हैं। उस (सोम) ने उसको पीड़ा पहुंचाई। वह उसके सब प्राणों से होकर बहने लगा। केवल मुख से न बहा; सब अन्य प्राणों से बहने लगा। इससे सौत्रामणि इष्टि हुई। उसी में यह बताया जाता है कि देवों ने उसको किस प्रकार चंगा किया ॥७॥ त्वष्टा को क्रोध आया- 'क्या यह बिना बुलाये ही सोम पी गया?' उसने स्वयं ही यज्ञ को बिगाड़ दिया। कलश में जो शुद्ध सोम बचा था उसको (अग्नि में) उँडेलकर कहा- 'इन्द्र- शत्रुर्वर्द्धस्व'—"हे अग्नि तू 'इन्द्र है शत्रु जिसका' ऐसा होकर बढ़।" वह अग्नि में पहुँचते पहुँचते (मनुष्य-रूप) हो गया। कुछ कहते हैं कि बीच में ही वह 'अग्निषोम' हो गया अर्थात् सब विद्या, सब यश, सब अन्न और सब श्री ॥८॥ चूंकि यह वर्त्तमान (वृत् धातु का अर्थ बहना है) अर्थात् बहकर उत्पन्न हुआ, इसलिए 'वृत्र' हो गया। चूंकि बिना पैरों के उत्पन्न हुआ, इसलिए अहि (सर्प) हुआ। दनु और दनायु ने माता-पिता के समान उसे लिया, इसलिए उसको 'दानव' कहते हैं ॥९॥ चूंकि उसने कहा, 'इन्द्र-शत्रु (बहुव्रीहि समास) बढ़ो' इसलिए इन्द्र ने उसको मार डाला। यदि कहता, 'इन्द्र के शत्रु बढ़ो' तो अवश्य ही वह इन्द्र को मार डालता ॥१०॥ चूंकि उसने कहा, 'बढ़ो', इसलिए वह तीर के बराबर टेढ़ा और तीर के बराबर सामने बढ़ा। उसने पश्चिमी और पूर्वी समुद्र को पीछे हटा दिया, और जितना वह बढ़ा उसी के अनुसार उसने भोजन खाया ॥११॥ सबेरे उसको देव खाना देते हैं, दोपहर को मनुष्य और तीसरे पहर को पितर ॥१२॥ जब इन्द्र उसका पीछा कर रहा था तो उसने 'अग्नीषोम' को बुलाया और कहा, 'हे अग्नि-सोम ! तुम दोनों मेरे हो, मैं तुम दोनों का हूँ। वह तो तुम्हारा कोई नहीं लगता। तुम उस दस्यु को क्यों बढ़ाते हो? मेरे पास आओ' ॥१३॥ उन दोनों ने उत्तर दिया, 'हमको क्या मिलेगा?' उसने कहा कि ग्यारह कपालों का पुरोडाश अग्नि-सोम को मिलेगा। इसलिए ग्यारह कपालों का पुरोडाश अग्नि-सोम का होता

११८ शतपथ ब्राह्मण वति॒ ॥ १४॥ तावे॒नमु॒पाव॑वृततु॒ः । ताव॒नु सर्वे॑ देवाः प्रेयु॒ः सर्वा॑ वि॒द्याः सर्वं॑ य- शः सर्वमन्नाद्यꣳ सर्वा॒ श्रीस्तेने॒ष्टेन्द्र एतदभवद्यदिदमिन्द्र एष उ पौर्णमासस्य ब- न्धुः स यो हैवं वि॒द्वाञ्पौर्णमासेन यजतऽ एताꣳ हैव श्रियं गहत्येवं यशो भव- त्येवमन्नादो भवति ॥ १५॥ तद्धैव खलु हतो वृत्रः । स यथा दृतिर्निष्पीत एवꣳ संलीनः शिश्ये यथा निर्धूतसक्तुर्भस्त्रैवꣳ संलीनः शिश्ये तमिन्द्रोऽभ्याद्रुद्राव हनि- ष्यन् ॥ १६॥ स होवाच । मा नु मे प्रहार्षीस्त्वं वै तदेतर्ह्यसि यदहं व्येव मा कुरु मामुया भूवमिति स वै मेऽन्नमेधीति तथेति तं द्वेधान्वभिनत्तस्य यत्सौम्यं न्यक्तामास तं चन्द्रमसं चकाराथ यदस्यासुर्यमास तेनेमाः प्रजा उदरेणाविध्यत्तस्मा- दाहुर्वृत्र एव तर्ह्यन्नाद आसीद्वृत्र एतर्हीतीदꣳ हि यदसावापूर्यतेऽस्माद्वैतच्छो- कादाप्यायतेऽथ यदिमाः प्रजा अशनमिच्छन्तेऽस्माद्वैतद्वृत्रायोदराय बलिꣳ हरति स यो हैवमेतं वृत्रमन्नादं वेदान्नादो हैव भवति ॥ १७॥ ता उ हैता देवता ऊचुः । या इमा अग्नीषोमावन्वाजग्मुरग्नीषोमौ युवं वै नो भूयिष्ठभाजौ स्थो ययोर्वामिदं युवयोरस्मानन्वाभजतमिति ॥ १८॥ तौ होचतुः । किमावयोस्ततः स्यादिति यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्निर्वपांस्तद्वां पुरस्तादाज्यस्य यजानिति तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्निर्वपन्ति तत्पुरस्तादाज्यभागावग्नीषोमाभ्यां यजन्ति तन्न सौम्येऽध्वरे न पशौ यस्यै कस्यै च देवतायै निर्वपानिति ह्यब्रुवन् ॥ १९॥ स ह्वाग्निरुवाच । मय्येव वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्बोऽहं मय्याभजामीति तस्मादग्नौ सर्वेभ्यो देवेभ्यो जुह्वति तस्मादाहुरग्निः सर्वा देवता इति ॥ २०॥ अथ ह सोम उवाच । मय्येव वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्बोऽहं मय्याभजामीति तस्मात्सोमꣳ सर्वेभ्यो देवेभ्यो जुह्वति तस्मादाहुः सोमः सर्वा देवता इति ॥ २१॥ अथ यदिन्द्रे सर्वे देवास्तस्थानाः । तस्मादाहुरिन्द्रः सर्वा देवता इन्द्रश्रेष्ठा देवा इत्येतद्ध वै देवास्त्र्येकदे॒वत्या अभ- वन्स यो हैवमेतद्द्वैकधा हैव स्वानाꣳ श्रेष्ठो भवति ॥ २२॥ द्वयं वाऽइदं न तृ-

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १४-२३ शतपथब्राह्मण / ११६ है ॥१४॥ वे दोनों उसके पास चले गये, और उनके पीछे-पीछे सब देवता भी चले गये, सब विद्यायें, सब यश, सब अन्न, सब श्री भी । इस इष्टि को करके ही इन्द्र वह हो गया जो अब है । यह पौर्णमास यज्ञ का महत्व है । जो कोई जानकर पौर्णमास यज्ञ करता है, उसके पास श्री जाती है, यश होता है और अन्न का भोग करनेवाला होता है ॥१५॥ पीटा हुआ वृत्र अब ऐसी क्षीण दशा में पड़ा था जैसे मशक से पानी निकल जाय, या सत्तू के थैले में से सत्तू निकल जायें । इन्द्र उसका घात करने के लिए उसकी ओर झपटा ॥१६॥ वह बोला, 'मुझे मत मार ! तू अब वही है जो मैं पहले था । मेरे दो भाग कर दे । ऐसा न कर जिससे मेरा अस्तित्व ही न रहे ।' (इन्द्र ने) कहा, 'तू मेरा खाद्य-पदार्थ होगा ।' उसने कहा, 'अच्छा ।' उसके दो टुकड़े कर दिये । उसका जो सौम्य (सोमयुक्त) टुकड़ा था उसका चन्द्रमा बना दिया, और जो उसका असुर्यं (असुर-युक्त) भाग था उसमें यह प्रजा पेट के रूप में प्रविष्ट हुई अर्थात् उससे लोगों का पेट बना । इसी से लोग कहा करते हैं कि पहले भी वृत्र अन्न का खाने वाला है और अब भी, क्योंकि जब यह चाँद पूर्ण होता है तो इसी लोक से भर जाता है । जब यह प्रजा खाने की इच्छा करती है तो इसी पेट अर्थात् वृत्र को बलि देती है । जो इस वृत्र को अन्न का खानेवाला जानता है, स्वयं भी अन्न का खानेवाला होता है ॥१७॥ उन देवताओं ने कहा, 'हे अग्नि और सोम, हम तुम्हारे पीछे आये और तुम सबसे अच्छा भाग ले लेते हो । जो कुछ तुम पाते हो उसमें से हमको भी भाग दो' ॥१८॥ उन देवों ने कहा, 'फिर हमको क्या मिलेगा ?' उन्होंने उत्तर दिया 'जिस किसी देवता के लिए लोग हवि देंगे, उससे पहले तुमको घी की आहुति देंगे ।' इसीलिए जिस किसी देवता के लिए हवि देते हैं तो पहले घी की दो आहुतियां अग्नि और सोम के लिए दिया करते हैं । यह सोम-यज्ञ में नहीं होता, न पशु-यज्ञ में । क्योंकि उन्होंने कहा, 'जिस किसी देवता के लिए आहुति दें' इत्यादि -॥१९॥ तब अग्नि ने कहा, 'मुझमें ही तुम सबके लिए आहुति देवेंगे, इसलिये मैं तुमको भाग दूंगा ।' इसीलिए अग्नि में सब देवों के लिए यज्ञ करते हैं । इसीलिए कहा था कि 'अग्नि सब देवता है' ॥२०॥ अब सोम ने कहा, 'मुझे ये लोग आप सबके लिए आहुति में देंगे । इसलिए मैं तुमको अपने में भाग दूंगा ।' इसलिए सोम की आहुति सब देवों के लिए दी जाती है । इसीलिए कहा, 'सोम सब देवता है' ॥२१॥ और चूंकि इन्द्र में सब स्थित हैं इसलिए कहते हैं कि इन्द्र सब देवता है । इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ (उच्च) है । इस प्रकार देव तीन प्रकार से एक देवता के रूप में आ गये । जो इस रहस्य को समझता है वह अपने आदमियों में श्रेष्ठ हो जाता है ॥२२॥ यह दो प्रकार से होता है, तीसरे से नहीं—एक आर्द्र (गीला), एक शुष्क (सूखा) । जो

१२० शतपथ ब्राह्मण तीयमस्ति । आर्द्रं॑ चैव शुष्कं॑ च यच्छुष्कं॒ तदा॑ग्नेयं यदार्द्रं॒ तत्सौ॒म्यमथ॒ यदिदं॑ द्वयमे॒- वाथ॒ किमेता॒वत्क्रिय॑त॒ऽइत्य॒ग्नीषोम॑यो॒रेवाज्य॑भागाव॒ग्नीषोम॑यो॒रूपाꣳशुयाजो॒ऽग्नीषो- मयोः॑ पुरोडा॒शो यदृत॒ एक॑तमेनैवेदꣳ सर्व॑माप्नोत्यथ॒ किमेता॒वत्क्रिय॑त॒ऽइत्य॒ग्नीषो- मयो॒र्ह्वेवैताव॑ती विभू॑तिः प्र॒जातिः॑ ॥ २३॥ सूर्य्य॑ ए॒वाग्नेयः॑ । च॒न्द्रमाः॑ सौम्यो॒ऽहरे॒- वाग्नेयꣳ रात्रिः॑ सौम्या॒ य ए॒वापूर्य्य॑ते॒ऽर्धमा॒सः स आ॑ग्ने॒यो यो॒ऽपक्षीय॑ते॒ स सौम्यः॑ ॥ २४॥ आज्य॑भागाभ्यामेव । सूर्याचन्द्रमसावाप्नोत्युपाꣳशुयाजेनैवाहोरत्रे॒ऽआप्नो॑ति पुरोडाशे॒नैवार्धमा॒सावाप्नो॑तीत्यु॒ ह्वैकऽआहुः॑ ॥ २५॥ तदु॑ होवाचासु॒रिः । आज्य॑- भागाभ्यामेवातो॒ यत॑मे वा॒ यत॑मे वा॒ द्वेऽआप्नो॑त्युपाꣳशुयाजे॒नैवातो॒ऽहोरा॒त्रे॒ऽआ- प्रोति॑ पुरोडा॒शेने॑वातो॒ऽर्धमा॒सावाप्नो॑ति॒ सर्वं॑ म॒ऽआप्त॑मस॒त्सर्वं॑ जि॒तꣳ सर्वे॑ण वृ॒त्रꣳ हनानि॒ सर्वे॑ण द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यꣳ हनानीति॒ तस्मा॑द्वा॒ऽएता॒वत्क्रिय॑त॒ऽइति॑ ॥ २६॥ तदा॑हुः । किमि॒दं जा॒मि क्रि॑यते॒ऽग्नीषोम॑योरे॒वाज्य॑स्या॒ग्नीषोम॑योः पुरोडा॒शस्य॒ यद्- नलक्षि॑तं॒ तेन॑ जा॒मीत्यने॑न॒ ह्वेवाज्ञा॒प्याज्य॒स्येत॑रं पुरोडा॒शस्येत॑रं॒ तद॒न्यदि॑वे॒त- रमन्य॒दिवे॑तरं भवत्यृ॒चम॑नू॒च्य जु॑षा॒णेन॑ यजत्यृ॒चम॑नू॒च्य॒र्चा य॑जति॒ तद॒न्यदि॑वे॒तर॑म- न्य॒दिवे॑तरं भवत्य॒नेन॑ ह्वेवाज्ञा॒ग्युपाꣳ॑शुया॒ज्यस्य॑ यजत्यृ॒चैः पुरोडा॒शस्य॑ स यदु॑- पांꣳशु॒ तत्प्रा॑जाप॒त्यꣳ रूपं॒ तस्मा॒त्स्याम॑नु॒ष्टुभ॑मनुवा॒क्याम॒न्वाह॑ वा॒ग्यनु॒ष्टुब्वान्धि॑ प्र॒जाप॑तिः ॥ २७॥ ए॒तेन॒ वै दे॒वाः । उपाꣳ॑शुया॒जेन॒ यंयम॑सुरा॒णामका॑मयन्त॒ तमु॑पा- वर्त्स्य॒ वज्रे॑ण वषट्का॒रेणाघ्नꣳ॑स्तथो॒ऽह्रवैष॑ ए॒तेनो॑पाꣳशुया॒जेन॑ पा॒प्मानं॑ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑- व्यमुपावर्त्स्य॒ वज्रे॑ण वषट्का॒रेण॑ हन्ति॒ तस्मा॑दुपाꣳशुया॒जं य॑जति ॥ २८॥ स वा॒ऽऋच॑- मनू॒च्य जु॑षा॒णेन॑ यजति॒ तद्वि॒न्मा अ॑न्यत॒स्तोद॑त्ताः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ऽस्थि॒ ह्यृगस्थि॑ हि द॒न्तो॒ऽन्यत॑र॒तो ह्ये॑तद॒स्थि करो॑ति ॥२९॥ अथ॒र्चम॑नू॒च्य॒र्चा य॑जति । तद्वि॒न्मा उ॒भय॑तोदत्ताः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ऽस्थि॒ ह्यृगस्थि॑ हि द॒न्त उ॒भय॑तो॒ ह्येतद॒स्थि क॑रोत्ये॒- ता वा॒ऽइमा द्वय्यः॑ प्र॒जा अ॑न्यत॒रतो॑दत्ताश्चै॒वोभय॑तोदत्ताश्च॒ स यो ह्वैवं वि॒द्वानग्नी-

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० २३-३० शतपथब्राह्मण / १२१ सूखा है वह अग्नि का; जो गीला है वह सोम का। (यहां एक प्रश्न उठता है कि) यदि दो ही प्रकार से है तो इतना खटराग क्यों किया जाता है कि अग्नि-सोम के लिए दो घी की आहुतियां, अग्नि-सोम के लिए दो मन्द स्वर के याज। अग्नि-सोम के लिए पुरोडाश ? जब इनमें से एक के द्वारा ही सब प्राप्ति हो सकती है तो इतना झमेला क्यों किया जाता है ? (इसका उत्तर यह है कि) अग्नि और सोम को उत्पन्न करनेवाली विभूति ऐसी ही है ॥२३॥ सूर्य अग्नि का है, चन्द्रमा सोम का। दिन अग्नि का है और रात सोम की। बढ़ता हुआ आधा मास अग्नि का है और घटता हुआ सोम का ॥२४॥ कुछ लोगों का कहना है कि दो घी की आहुतियों से सूर्य और चांद की प्राप्ति होती है, मन्द स्वर प्रयाजों से दिन-रात की और पुरोडाश से अर्द्धमास की प्राप्ति होती है ॥२५॥ परन्तु आसुरि का कहना है कि घी की दो आहुतियों से किन्हीं दो को प्राप्त होता है, मन्द स्वर के प्रयाजों से दिन-रात को प्राप्त होता है और पुरोडाश से दोनों अर्द्धमासों (पक्षों) को प्राप्त होता है। 'सब मुझे प्राप्त हो गया। मैंने सब जीत लिया। सबसे वृत्त को मार डालूं। सबसे अहितकारी शत्रु को मार डालूं।' वह ऐसा विचारता है। इसलिए यह सब-कुछ किया जाता है ॥२६॥ इस पर कुछ लोगों का आक्षेप है कि एक ही बात का दुहराना क्यों ? अग्नि-सोम की आज्याहुति और अग्नि के पुरोडाश के बीच में जो कुछ किया जाता है वह 'जामि' अर्थात् एक ही बात का दुहराना मात्र है। परन्तु (इसका उत्तर यह है कि) इसी के द्वारा तो दुहराने के दोष से बचते हैं। एक आज्य है, दूसरी पुरोडाश। इस प्रकार एक दूसरे से भिन्न है। एक बार ऋचा को पढ़कर 'जुषाण' से यज्ञ करते हैं, दूसरी बार ऋचा को बोलकर ऋचा बोलते हैं। इस प्रकार एक का दूसरे से भेद हो जाता है। 'जामि' (दुहराने के) दोष से इस प्रकार भी बचते हैं— आज्य आहुति के लिए मन्द स्वर से पढ़ते हैं और पुरोडाश के लिए उच्च स्वर से। जो मन्द स्वर से बोला जाता है वह प्रजापति का रूप है। इसलिए इसको अनुष्टुभ् छन्द में पढ़ते हैं। वाणी ही अनुष्टुभ् है। वाणी प्रजापति है ॥२७॥ इसी मन्द उच्चारण से देवों ने वषट्काररूपी वज्र से जिस-जिस असुर को चाहा उसके पास चुपके से जाकर मार डाला। इसी प्रकार यह (यजमान) भी मन्द उच्चारण से वषट्कार- रूपी वज्र के द्वारा जिस पापी अहितकारी शत्रु को चाहता है उसके पास चुपके से जाकर उसको मार डालता है। इसीलिए मन्द स्वर से उच्चारण किया जाता है ॥२८॥ वह ऋचा को पढ़कर 'जुषाण' को पढ़ता है। इससे एक ओर के दाँतवाली प्रजा उत्पन्न होती है। ऋक् हड्डी है। दाँत भी हड्डी है। इस प्रकार एक ओर की हड्डी उत्पन्न करता है ॥२६॥ अब ऋचा को पढ़कर फिर एक और ऋचा को बोलता है। इससे दोनों ओर के दाँत- वाली प्रजा उत्पन्न होती है। ऋक् हड्डी है। दाँत भी हड्डी है। इस प्रकार वह दोनों ओर हड्डी उत्पन्न करता है। ये प्रजाएँ दो प्रकार की होती हैं— एक वह जिनके दाँत एक ओर हों, एक वह जिनके दाँत दोनों ओर हों। जो अग्नि और सोम की उत्पन्न करनेवाली शक्ति को इस प्रकार

१२२ शतपथ ब्राह्मण ष्टोमयोः प्र॒जा॑तिं प्र॒जा॑ति ब॒हुर्हैव प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भवति ॥३०॥ स वै पौर्णमासिनो- प॒वत्स्यन्‌॑ । न॒ सत्रा सुहित-इव स्यात्तन्नेदु॑दरमुत्सूर्यं वि॒नात्या॑हुतिभिः प्रातर्दे॒वेभ्य॒ ऽ उत्पौ॑र्णमा॒सस्योपचारः॑ ॥३१॥ स वै संप्र॒त्ये॒वोप॑वसेत् । संप्र॑ति वृ॒त्रं हनानि सं- प्रति॑ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं हनानीति॑ ॥३२॥ स वाऽउत्तरामेवोप॑वसेत् । स॒मिव वा ऽए॒ष क्र॑मते यः संप्र॒त्युप॒वस॑त्यनड्वा वै संक्रान्तयोर्यद॒तरो वेतर॑मभिभव॒तीत॑रो वेत॑रमथ य उत्तरामुप॒वस॑ति यथा पु॒राञ्च॒मावृत्तं॑ संपि॑ष्यादे॒वन्तद्यत्प्रत्याल॒भमान॒ꣳ सो॒- ऽन्यतोघात्येव स्यादे॒वं तद्य उत्तरामुप॒वस॑ति ॥३३॥ स वै संप्र॒त्ये॒वोप॑वसेत् । य- था वाऽअन्यस्य कृत॒ꣳ संपि॑ष्यादे॒वं तद्य उत्तरामुप॒वस॑ति सो॒ऽन्यस्यै॒व कृ॒ताम॒नु॑क॒- रो॒ऽन्यस्योप॑ावसायी भवति तस्मात्संप्र॒त्ये॒वोप॑वसेत् ॥३४॥ प्र॒जाप॑ते॒र्ह वै प्र॒जाः ससृ॑जानस्य । पर्वा॑णि विसस्रंसुः स वै सं॑वत्स॒र ए॒व प्र॒जाप॑तिस्तस्यैतानि पर्वा॑- ण्यहोरा॒त्रयोः सं॑धी पौर्णमा॒सी चा॑मावा॒स्या च॒र्तुमु॑खानि ॥३५॥ स विस्रस्तैः पर्व॑- भिः । न शशाक सं॑हातुं तम॑तै॒र्हवि॑र्य॒ज्ञैर्दे॒वा अ॑भिषज्यन्नग्निहो॒त्रेणै॑वाहोरा॒त्रयोः सं॑धी तत्पर्वा॑भिषज्यंस्तत्स॒मदधुः पौर्णमा॒सेन चैवा॑मावास्ये॒न च पौर्णमा॒सीं चा॑मा- वा॒स्यां च॒ तत्पर्वा॑भिषज्यंस्तत्स॒मदधुश्चातुर्मा॒स्यैरे॒वर्तुमु॑खानि तत्पर्वा॑भिषज्यंस्तत्स॒- मदधुः ॥३६॥ स सं॑हिति॑ः पर्व॑भिः । इ॒दमन्नाद्यम॒भ्युत्त॑स्थौ यदि॒दं प्र॒जाप॑तेर॒न्नाद्यं॒ स यो है॒वं वि॒द्वात्संप्र॒त्युप॑वसति संप्र॑ति हैव प्र॒जाप॑तेः पर्व॑ भिषज्यत्यव॑ति हैनं प्र॒जाप॑तिः स ए॒वमे॒वान्नादो॑ भवति य ए॒वं वि॒द्वात्संप्र॒त्युप॑वसति तस्मात्संप्र॒त्ये॒- वोप॑वसेत् ॥३७॥ चक्षु॑षी ह वाऽए॒ते य॒ज्ञस्य यदा॑ज्यभागौ । तस्मात्पुरस्ता॑ज्जुह्वो- ति पु॒रस्ता॒द्धीमे चक्षु॑षी तत्पु॒रस्ता॑दे॒वैतच्चक्षु॑षी दधाति॒ तस्मा॑दि॒मे पु॒रस्ता॑च्चक्षु॑षी ॥३८॥ उत्तरा॒र्धपूर्वार्धे हैके । आग्ने॒यमाज्य॑भागं जुह्वति दक्षिणा॒र्धपूर्वार्धे सौम्यमा॒- ज्यभागमेतत्पुरस्ता॑च्चक्षु॑षी दध्म इति॒ वद॑न्तस्तदु॒ तदवि॑ज्ञान्यमिव ह॒वीꣳषि ह वा ऽआ॒त्मा य॒ज्ञस्य स यदे॑व पु॒रस्ता॑द्ध॒विषां॑ जु॒होति तत्पु॒रस्ता॑च्चक्षु॑षी दधाति यत्रो

का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० २०-३६ शतपथब्राह्मण / १२३ समझकर यज्ञ करता है वह बहुत प्रजा और पशु से युक्त होता है ॥३०॥ पौर्णमास उपवास में वह भरपेट न खाये। ऐसा करने से वह पेट को जो आसुरी है क्षीण कर देता है, और दूसरे दिन प्रातःकाल आहुतियों से देवों वाले भाग को (पुष्ट कर देता है)। अब पौर्णमास (यज्ञ) इस प्रकार होता है ॥३१॥ वह उसी समय (पौर्णमास को) उपवास कर सकता है, यह कहकर कि मैं अभी वृत्र को मारूँगा, मैं अभी अहितकारी शत्रु को मारूँगा ॥३२॥ दूसरे दिन भी उपवास कर सकता है। उसी समय उपवास करने से वह 'संम + क्रमते' अर्थात् किसी से मुठभेड़ करता है। दो मुठभेड़ करनेवालों में कौन जाने कौन जीत जाय ! दूसरे दिन उपवास करने से मानो वह शत्रु को पीछे से मारता है, पूर्व इसके कि वह फिर- कर आक्रमण कर सके। इस प्रकार जो दूसरे दिन उपवास करता है वह 'अन्यतो घाति' अर्थात् एक ओर मारता है ॥३३॥ (ऊपर दो बातें दी हैं-एक तो उसी समय अर्थात् पूर्णमासी के दिन ही उपवास करना, दूसरा दूसरे दिन उपवास करना। इसमें पहली को ठीक बताया गया है)। उसको तभी उपवास करना चाहिए, क्योंकि जो दूसरे दिन उपवास करता है वह उसके समान है जो किसी दूसरे के द्वारा मारे हुए को मारता है, या किसी दूसरे के किये हुए का अनुकरण करता है, दूसरे के पीछे चलता है। इसलिए उसी दिन उपवास करे ॥३४॥ प्रजापात जब प्रजा बना चुका तो उसके जोड़ शिथिल हो गये। संवत्सर प्रजापति है और उसके जोड़ हैं रात-दिन की संधियाँ, पूर्णमासी, अमावस्या और ऋतुओं का आरम्भ ॥३५॥ वह थके हुए जोड़ों से उठ नहीं सकता था। देवों ने उसको इन हवियों और यज्ञों द्वारा चंगा किया। अग्निहोत्र द्वारा उन्होंने रात-दिन की संधिवाले जोड़ को चंगा किया, और पौर्ण- मास तथा अमावस्या यज्ञ से पूर्णमासी और अमावस्या के जोड़ को ठीक किया, एवं चातुर्मास्य यज्ञ से उन्होंने ऋतु के आरम्भवाले जोड़ों को चंगा किया ॥३६॥ इन ठीक हुए जोड़ों से उसने अपने अन्न को पाया, उसको जो प्रजापति के लिए है। जो इस रहस्य को जानकर उसी समय उपवास करता है वह प्रजापति के जोड़ों को चंगा करता है और प्रजापति उसकी रक्षा करता है। जो इस भेद को जानकर उसी समय उपवास करता है वह अन्न खानेवाला होता है। इसलिए उसी समय (पूर्णमासी को ही) उपवास करे ॥३७॥ ये जो दो आज्य भाग आहुतियां हैं वे यज्ञ की दो आँखें हैं। इसलिए उनको पहले देता है क्योंकि दो आँखें सामने होती हैं। इस प्रकार वह दोनों आँखों को सामने रखता है। इसीलिए आँखें सामने होती हैं ॥३८॥ कुछ लोग अग्नि की आहुति उत्तरार्द्ध पूर्व की ओर और सोम की आहुति दक्षिणार्द्ध पूर्व की ओर देते हैं, यह समझकर कि हम दोनों आँखों को सामने रखते हैं; परन्तु यह बात समझ में नहीं आती, क्योंकि हवि यज्ञ की आत्मा है; जब वह हवियों से पहले आहुति देता है तो आँखों को सामने रखता है। इसलिए आहुतियों को उस स्थान पर देवे जहाँ आग सबसे अधिक जलती हो,

अध्याय-६, ब्राह्मण-४

ऽइव समि॑द्धतं॒ मन्ये॑त॒ तदाहु॑तीर्जुहुयात्समि॑द्धहोमेनै॒व समृ॑द्धा आहु॑तयः ॥३९॥ स वाऽऋच॑मनू॒च्य जुषा॒णो य॑जति । तस्मा॑दि॒मेऽअ॑स्थ्यत्स्त्यनस्थ्यि॑के॒ चक्षु॑- षीऽआ॒शिषि॑ष्टे॒ऽअथ॒ यदृच॑मनू॒च्यर्चा यजे॒दस्थि॑ हैव कुर्यान्न चक्षुः॑ ॥४०॥ ते वाऽए॒ते । अ॒ग्नीषोम॑योरे॒व रू॒पम॑न्वायत्ते॒ यच्छु॒क्लं तदा॑ग्ने॒यं यत्कृ॑ष्णं॒ तत्सौ॒म्यं॒ यदि॒ वेत॑रथा॒ यदे॑व कृ॒ष्णं तदा॑ग्ने॒यं यच्छु॒क्लं तत्सौ॒म्यं॒ यदे॑व॒ वीक्ष॑ते॒ तदा॑ग्ने॒यं रू॒पं शुष्के॑ऽइव॒ हि वी॑- क्षमा॑णास्या॒क्षिणी॑ भवतः॒ शुष्क॑मिव॒ ह्या॑ग्ने॒यं यदे॑व॒ स्वपि॑ति॒ तत्सौ॒म्यं रू॒पमा॒र्द्रे- ऽइ॑व॒ हि सु॑षुपू॒षोऽक्षि॑णी भवत आ॒र्द्रऽइ॑व॒ हि सो॒म आ॒न्तरं॑ ह॒ वाऽअ॑स्मिं ल्लो॒के चक्षु॑ष्मान्भवति॒ सच॑क्षुर॒मुष्मिँ॑ल्लो॒के सं॑भवति॒ य ए॒वमे॒तौ चक्षु॑षीऽआ॒ज्यभा॑- गौ वेद॑ ॥४१॥ ॥ ब्राह्मणम् २ [६. ३.] ॥ ॥ इन्द्रो॑ ह॒ यत्र॑ वृ॒त्राय॒ वज्रं॑ प्रज॒हार॑ । सो॒ऽबली॑यान्म॒न्यमा॑नो॒ नास्तृ॑षीतीव बिभ्य॒न्निल॑यां चक्रे॒ स पराः॒ परा॑वतो जगाम देवा ह वै वि॒दां च॑क्रुर्ह॒तो वै वृ॒त्रो ऽथेन्द्रो॒ न्यले॑ष्टेति ॥१॥ तम॒न्वेष्टुं॑ दधिरे । अ॒ग्निर्दे॒वानाꣳ॒ हिर॑ण्यस्तूप॒ ऋषी॑णां बृ॒ह॒ती छन्द॑सां॒ तम॒ग्निर॑नुवि॒वेद॒ तेनै॒ताꣳ रा॒त्रिꣳ स॒हाऽऽज॑गाम॒ स वै दे॒वानां॒ वसु॑- र्वी॒रो ह्ये॑षा॒म् ॥२॥ ते दे॒वा अ॑ब्रुवन् । अ॒मा वै नो॒ऽद्य व॑सु॒रव॑सति॒ यो नः॒ प्रा- वात्सी॒दिति॒ ताभ्या॑मि॒तश्चा॒था ज्ञा॒तिभ्यां॑ वा॒ सखि॑भ्यां वा स॒हाग॑ताभ्याꣳ समा॒नमो॑- दनं॒ पचे॒दङ्गं॑ वा॒ तदृङ् मानु॑षꣳ ह॒विर्दे॒वाना॑मिवो॒भाभ्या॑मि॒तत्स॑मा॒नꣳ ह॒विर्निर्व॑पन्ने- न्द्रा॒ग्नं द्वाद॑शकपालं पुरो॒डाशं॒ तस्मा॑दैन्द्रा॒ग्नो द्वाद॑शकपालः पुरो॒डाशो॑ भवति ॥३॥ स इन्द्रो॒ऽब्रवी॑त् । यत्र॒ वै वृ॒त्राय॒ वज्रं॒ प्राह॑रं॒ तद्ध्य॑स्म्ये॒ स कृ॒श-इ॑वास्मि॒ न वै मे॒दं धि॑नोति॒ यन्मा॒ धिनव॒त्तन्मे॑ कुरु॒तेति॒ तथेति॑ दे॒वा अ॑ब्रुवन् ॥४॥ ते दे॒वा अ॑- ब्रुवन् । न वा॒ऽइम॑म॒न्यत्सोमा॑द्धिनुया॒त्सोम॑मे॒वास्मै॒ संभ॑रामेति॒ तस्मै॒ सोमꣳ॒ सम॑- भर॒न्ने॒ष वै सोमो॒ राजा दे॒वाना॒मन्नं॒ यच्च॒न्द्रमाः॒ स यत्रै॑ष ए॒तां रा॒त्रिं न पु॒रस्ता॒न्न प॒श्चाद्द॑दृ॒शे तदि॒मं लो॒कमा॒गच्छ॑ति॒ स इ॒हैवाप॑श्चौष॒धीश्च॒ प्रवि॑शति॒ स वै दे॒वानां॑

कां० १, अ० ६, ब्रा० ४, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / १२५ क्योंकि सबसे अधिक जलती हुई आग में ही आहुतियां ठीक होती हैं ॥३६॥ ऋचा को कहकर 'जुषाण' को कहता है। इस प्रकार हड्डी-शून्य आँखों को हड्डी-युक्त स्थान में रखता है। यदि वह ऋचा के पीछे ऋचा पढ़े तो मानो आँख न रखे, हड्डी रखे ॥४०॥ ये दो अग्नि और सोम के रूप हैं—जो शुक्ल है वह अग्नि का, जो कृष्ण है वह सोम का। यदि इसके विरुद्ध कहा जाय तो जो कृष्ण है वह अग्नि का और जो शुक्ल है वह सोम का। जो देखता है वह अग्नि का रूप है, क्योंकि देखनेवाले की आँखें सूखी होती हैं और सूखापन अग्नि का है। जो सोता है वह सोम का रूप है, क्योंकि सोनेवाले की आँखें गीली होती हैं। गीलापन सोम का गुण है। जो इस प्रकार आज्य भाग आहुतियों को दो आँखें जानता है वह बुढ़ापे तक इस लोक में आँखोंवाला होता है और परलोक में भी आँखोंवाला होता है ॥४१॥ अध्याय ६—ब्राह्मण ४ जब इन्द्र ने वृत्र के लिए वज्र फेंका तो अपने को निर्बल समझकर और यह समझकर कि (वृत्र) अभी मरा नहीं, वह छिप गया, और बहुत दूर चला गया। अब देवों ने जान लिया कि वृत्र मारा गया और इन्द्र छिप गया ॥१॥ देवताओं में अग्नि, ऋषियों में हिरण्यस्तूप और छन्दों में बृहती छन्द उसको खोजने लगे। अग्नि ने उसे पा लिया, और उसके साथ एक रात रहा। वह देवों में वसु और उनमें वीर है ॥२॥ देवों ने कहा, 'अमा' अर्थात् 'हमारा' वसु जो हमसे अलग चला गया था आज अग्नि के साथ रहता है। जैसे दो सम्बन्धियों या मित्रों के लिए या मेहमानों के लिए ओदन (चावल) या अज (बकरा) पकावें वैसे ही मनुष्यों की हवि है। देवों में इन दो के लिए (इन्द्र और अग्नि के लिए) यह समान हवि है। इन्द्र और अग्नि के लिए १२ कपालों का पुरोडाश होता है, इसलिए इन्द्र-अग्नि के लिए १२ कपालोंवाला पुरोडाश होता है ॥३॥ इन्द्र ने कहा, 'जब मैंने वृत्र के वज्र मारा तो मैं डर गया और दुबला हो गया। यह हवि मुझे काफी नहीं है। ऐसी तैयार करो जो काफी हो जाय।' देवों ने कहा, 'अच्छा' ॥४॥ उन देवों ने कहा, 'इसको सोम के सिवाय और कुछ काफी न होगा। अतः इसके लिए सोम को ही भरें।' उसके लिए सोम को भरा। यह सोम राजा जो देवों का अन्न है चन्द्रमा ही है। जब वह इस (अमावस्या की) रात को न पूर्व में, न पश्चिम में दीखता है तो उस समय इस लोक में आ जाता है और जलों और ओषधियों में प्रविष्ट हो जाता है। वह देवों का वसु या

व॒स्वन्व॑ꣳश्चैषां तथ्द्ये॑ष ए॒ताꣳ रात्रिम॒हामा वस॑ति तस्मादमावा॒स्या नाम॑ ॥ ५ ॥ तं गोभि॑रनुवि॒ष्ठाप्य॒ सम॑भरन् । यदोष॑धीरा॒शꣳस्तदोष॑धिभ्यो॒ यद॒पोऽपि॑बꣳस्तद॒द्द्भ्यस्त- मेवꣳ संभृ॒त्यात॑प्य ती॒व्रीकृत्य॒ तम॑स्मै प्रायच्छन् ॥ ६ ॥ सोऽब्रवीत् । धिनोत्ये॒व मे॒- दं नेव तु म॒यि श्रय॑ति॒ यथे॒दं म॒यि श्रय॑ति तथो॒पजानी॒तेति॒ तꣳ शृ॒तेनैवाश्र॑यन् ॥ ७ ॥ तद्धाऽशृतम् । समान॒मिव स॒त्यथ् एव सदिन्द्र॑स्यैव सन्तत्पुनर्नार्नेवाचक्षते यद॒ब्रवीद्धिनो॑ति मेति॒ तस्माद्दध्यथ॒ यदेनं शृ॒तेनैवाश्र॑यंस्तस्माच्छृतꣳ ॥ ८ ॥ स य- थाऽश्राव्या॑येत । एवमाप्यायताष पाप्मान॑ꣳ ह॒रिमाण॑मपह॒तेष उ॑ऽअ॒मावा॒स्यस्या बन्धुः स यो है॒वं वि॒द्वाꣳसंन॑यतयेवꣳ है॒व प्र॒जया प॒शुभि॒राप्या॑यतेऽप पाप्मानं॑ ह॒ते तस्मा॑द्वि संन॑येत् ॥ ९ ॥ तदाहुः । नासो॑मयाजी संन॑येत्सोमाहु॒तिर्वाऽए॒षा मा- नवरुद्धासो॑मयाजिनस्तस्मान्नासो॑मयाजी स॒नये॒दिति॑ ॥ १० ॥ तदु॒ समे॑व॒ नये॑त् । न- न्वत्रा॑न्तरेण शुश्रुम सोमे॑न नु मा या॒जयताथ मऽए॒तदाप्याय॑नꣳ संभ॑रिष्यथेत्यब- वी॒दिति॒ न वै मे॒दं धिनो॑ति यन्मा धि॒न्वन्तन्मे॑ कुरु॒तेति॒ तस्मा॑ऽए॒तदाप्याय॑नꣳ सं- म॑भरꣳस्तस्माद्यद्यसो॑मयाजी स॒मेव॒ नये॑त् ॥ ११॥ वार्त्र॒घ्नं वै पौर्णमा॒सम् । इन्द्रो॒ ह्ये- तेन वृ॒त्रमह॑न्नथैतदे॑व वृत्र॒हत्यं यद॑मावा॒स्यं वृ॒त्रꣳ ह्यस्माऽए॒तत्स॒मृष॒ऽआ॒प्याय॑न- मकु॑र्वन् ॥ १२ ॥ तद्धाऽए॒तदेव वार्त्र॒घ्नम् । यत्पौर्णमासमथैष ए॒व वृ॒त्रो यच्चन्द्रमाः स य॑त्रैष ए॒ताꣳ रात्रिं न पु॒रस्ता॒न्न प॒श्चाद्ददृशे॒ तदेनमे॒तेन॒ सर्वꣳ॑ ह॒न्ति नास्य॒ किं चन परि॑शिनष्टि॒ सर्वꣳ॑ ह॒ वै पाप्मानं॑ ह॒न्ति न पाप्मनः॒ किं चन परि॑शिनष्टि य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ १३ ॥ तद्धैके । दृष्टोप॑वसन्ति श्वो नोदे॒तेत्यदो॒ है॒व दे॒वाना॒मवि- क्षीणा॒मन्नं भ॑वत्यथैभ्यो वयमि॒त उप॑प्रदास्याम॒ इति॒ तद्धि समृ॑द्धं यद॒क्षीण॑ऽए॒व पूर्व॑- स्मिन्न॒न्नेऽथाप॑र॒मन्नमागच्छ॑ति॒ स ह ब॒ह्वन्न॑ ए॒व भव॑त्यसोमयाजी तु क्षीर्या॒ड्यदो॒ है॒व सोमो राजा भव॑ति ॥ १४॥ अथ॒ यथै॑व पु॒रा । केव॑लीरोषधी॒रश्न॑न्ति॒ केव॑लीर॒पः पिब॑न्ति ताः केवल॑मेव॒ पयो दुह्रऽए॒व तदे॒ष वै सोमो राजा दे॒वाना॒मन्नं यच्चन्द्र-

कां० १, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ५-१५ शतपथब्राह्मण / १२७ अन्न है। और चूंकि इस रात को वह यहाँ साथ रहता है (अमा वसति) इसलिए इसका नाम अमावस्या है ॥५॥ उन्होंने इस (सोम) को गौओं द्वारा इकट्ठा करा-कराके तैयार किया। जो औषध खाई उस औषध से, और जो जल पिया उस जल से, उसी को बनाकर और तीव्र (तेज) करके उन्होंने (इन्द्र को) दिया ॥६॥ उस (इन्द्र) ने कहा, 'इससे मेरा पेट तो भर जाता है पर यह मुझे अच्छा नहीं लगता। ऐसा उपाय करो कि वह मुझे अच्छा लगने लगे। उन्होंने उसे औटे हुए (दूध) के द्वारा रुचिकर बना दिया ॥७॥ यद्यपि यह एक ही चीज है, दूध ही है और इन्द्र का ही है, फिर भी इसको नाना (अनेक) कहते हैं। चूंकि इन्द्र ने कहा 'धिनोति मे' (मेरा पेट भर जाता है) इसलिए इसका नाम हुआ 'दधि' और चूंकि इसमें 'श्रुत' अर्थात् औटा हुआ दूध मिलाया इसलिए उसको 'श्रुत' कहते हैं ॥८॥ जैसे सोम का डण्ठल मजबूत हो जाता है इसी प्रकार (इन्द्र भी) मजबूत हो गया और उसका रोगी हरापन जाता रहा । अमावस्या यज्ञ का यही महत्त्व है और जो कोई इस रहस्य को समझकर (अमावस्या के यज्ञ में दूध और दही) मिलाता है वह प्रजा और पशु से पूर्ण होता है। उसका दोष छूट जाता है। इसलिये उसको दूध और दधि मिलाना चाहिए ॥६॥ इस पर कुछ लोग आक्षेप करते हैं कि जो सोमयाजी न हो उसे सान्नाय्य आहुति न देनी चाहिए, क्योंकि सान्नाय्य हीसोम आहुति हैं। और जो सोमयाजी न हो उसको सोम आहुति देने का अधिकार नहीं। इसलिए जो सोमयाजी नहीं उसको सान्नाय्य आहुति नहीं देनी चाहिए ॥१०॥ परन्तु उसे सान्नाध्य आहुति देनी चाहिए। हमने इसी सम्बन्ध में सुना है कि इन्द्र ने कहा कि, 'इस समय मुझे सोम आहुति दे दो, फिर तुम मेरे लिए उस शक्ति देनेवाली वस्तु (सान्नाय्य आहुति) को तैयार करना। इससे मेरा पेट नहीं भरता। वह बनाओ जिससे मेरी सन्तुष्टि हो।' उस शक्ति देनेवाली वस्तु को उन्होंने अवश्य ही तैयार किया और इसलिए जो सोमयाजी नहीं हैं वे भी सान्नाय्य आहुति दें ॥११॥ पूर्णमास यज्ञ वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है, क्योंकि इसी के द्वारा इन्द्र ने वृत्र को मारा। और अमावस्या यज्ञ भी वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है, क्योंकि वह शक्ति देनेवाली चीज भी उन्होंने उसी के लिए तैयार की जिसने वृत्र को मारा ॥१२॥ यज्ञ जो पूर्णमास यज्ञ है वह वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है। यह जो चन्द्रमा है वही वृत्र है। जब वह उस रात को न पूर्व में दीखता है, न पश्चिम में, तो इस यज्ञ के द्वारा (वह इन्द्र) इस सब (वृत्र) को मार डालता है, और उसका कुछ भी शेष नहीं रहने देता। जो इस रहस्य को जानता है वह सब पाप का नाश कर देता है, कुछ भी नहीं छोड़ता ॥१३॥ कुछ लोग (चौदस को) देखकर ही उपवास करते हैं कि कल (अमावस्या को यह चाँद) उदय न होगा। यह देवों का निश्चय करके दीखता हुआ भोजन है। (कल से) उनके लिए हम इसमें से देंगे। वह पुरुष वस्तुतः समृद्ध है जिसके पास अभी पुराना अन्न होता है और नया आ जाता है, क्योंकि उसके पास बहुत अन्न होता है। परन्तु वह इस समय सोमयाजी नहीं है; क्षीरयाजी है। इसी दूध का सोम राजा होता है ॥१४॥ इसलिए यह (दूध सोम से युक्त नहीं किन्तु) पूर्ववत् ही है क्योंकि (गायें) केवल ओषधि ही खाती हैं, केवल जल ही पीती हैं। इसलिए यह केवल दूध ही होता है (सोम नहीं); सोम तब होता जब अमावस्या के दिन चन्द्रमा वनस्पति और जलों में मिल जाता (ऊपर कह चुके हैं कि