शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिवकी पत्नी होऊँगी।'
मुख्य प्रजापति दक्षसे ऐसा कहकर महेश्वरी शिवा उनके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। दुर्गाजीके अन्तर्धान होनेपर दक्ष भी अपने आश्रमको लौट गये और यह सोचकर प्रसन्न रहने लगे कि देवी शिवा मेरी पुत्री होनेवाली हैं।
(अध्याय ११-१२)
ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों और शबलाश्वोंको निवृत्तिमार्गमें भेजनेके कारण दक्षका नारदको शाप देना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! प्रजापति दक्ष अपने आश्रमपर जाकर मेरी आज्ञा पा हर्षभरे मनसे नाना प्रकारकी मानसिक सृष्टि करने लगे। उस प्रजासृष्टिको बढ़ती हुई न देख प्रजापति दक्षने अपने पिता मुझ ब्रह्मासे कहा।
दक्ष बोले—ब्रह्मन्! तात! प्रजानाथ! प्रजा बढ़ नहीं रही है। प्रभो! मैंने जितने जीवोंकी सृष्टि की थी, वे सब उतने ही रह गये हैं। प्रजानाथ! मैं क्या करूँ? जिस उपायसे ये जीव अपने-आप बढ़ने लगें, वह मुझे बताइये। तदनुसार मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा, इसमें संशय नहीं है।
ब्रह्माजीने (मैंने) कहा—तात! प्रजापते दक्ष! मेरी उत्तम बात सुनो और उसके अनुसार कार्य करो। सुरश्रेष्ठ भगवान् शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। प्रजेश! प्रजापति पंचजन (वीरण)-की जो परम सुन्दरी पुत्री असिक्नी है, उसे तुम पत्नीरूपसे ग्रहण करो। स्त्रीके साथ मैथुन-धर्मका आश्रय ले तुम पुनः इस प्रजासर्गको बढ़ाओ। असिक्नी-जैसी कामिनीके गर्भसे तुम बहुत-सी संतानें उत्पन्न कर सकोगे।
तदनन्तर मैथुन-धर्मसे प्रजाकी उत्पत्ति करनेके उद्देश्यसे प्रजापति दक्षने मेरी आज्ञाके अनुसार वीरण प्रजापतिकी पुत्रीके साथ विवाह किया। अपनी पत्नी वीरिणीके गर्भसे प्रजापति दक्षने दस हजार पुत्र उत्पन्न किये, जो हर्यश्व कहलाये। मुने! वे सब-के-सब पुत्र समान धर्मका आचरण करनेवाले हुए। पिताकी भक्तिमें तत्पर रहकर वे सदा वैदिक मार्गपर ही चलते थे। एक समय पिताने उन्हें प्रजाकी सृष्टि करनेका आदेश दिया। तात! तब वे सभी दाक्षायण नामधारी पुत्र सृष्टिके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये। वहाँ नारायण-सर नामक परम पावन तीर्थ है, जहाँ दिव्य सिन्धु नद और समुद्रका संगम हुआ है। उस तीर्थजलका ही निकटसे स्पर्श करते उनका अन्तःकरण शुद्ध एवं ज्ञानसे सम्पन्न हो गया। उनकी आन्तरिक मलराशि धुल गयी और वे परमहंस-धर्ममें स्थित हो गये। दक्षके वे सभी पुत्र पिताके आदेशमें बँधे हुए थे। अतः मनको सुस्थिर करके प्रजाकी वृद्धिके लिये वहाँ तप करने लगे। वे सभी सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे।
नारद! जब तुम्हें पता लगा कि हर्यश्वगण सृष्टिके लिये तपस्या कर रहे हैं, तब भगवान् लक्ष्मीपतिके हार्दिक अभिप्रायको जानकर तुम स्वयं उनके पास गये और आदरपूर्वक यों बोले—'दक्षपुत्र हर्यश्वगण! तुमलोग पृथ्वीका अन्त देखे
- रुद्रसंहिता * १७५
बिना सृष्टि-रचना करनेके लिये कैसे उद्यत हो गये ?'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! हर्यश्व आलस्यसे दूर रहनेवाले थे और जन्मकालसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे सब-के-सब तुम्हारा उपर्युक्त कथन सुनकर स्वयं उसपर विचार करने लगे। उन्होंने यह विचार किया कि 'जो उत्तम शास्त्ररूपी पिताके निवृत्तिपरक आदेशको नहीं समझता, वह केवल रज आदि गुणोंपर विश्वास करनेवाला पुरुष सृष्टिनिर्माणका कार्य कैसे आरम्भ कर सकता है।' ऐसा निश्चय करके वे उत्तम बुद्धि और एकचित्तवाले दक्षकुमार नारदको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके ऐसे पथपर चले गये, जहाँ जाकर कोई वापस नहीं लौटता है। नारद! तुम भगवान् शंकरके मन हो और मुने! तुम समस्त लोकोंमें अकेले विचरा करते हो। तुम्हारे मनमें कोई विकार नहीं है; क्योंकि तुम सदा महेश्वरकी मनोवृत्तिके अनुसार ही कार्य करते हो। जब बहुत समय बीत गया, तब मेरे पुत्र प्रजापति दक्षको यह पता लगा कि मेरे सभी पुत्र नारदसे शिक्षा पाकर नष्ट हो गये (मेरे हाथसे निकल गये)। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे बार-बार कहने लगे—उत्तम संतानोंका पिता होना शोकका ही स्थान है (क्योंकि श्रेष्ठ पुत्रोंके बिछुड़ जानेसे पिताको बड़ा कष्ट होता है)। शिवकी मायासे मोहित होनेसे दक्षको पुत्रवियोगके कारण बहुत शोक होने लगा। तब मैंने आकर अपने बेटे दक्षको बड़े प्रेमसे समझाया और सान्त्वना दी। दैवका विधान प्रबल होता है—इत्यादि बातें बताकर उनके मनको शान्त किया। मेरे सान्त्वना देनेपर दक्ष पुनः पंचजनकन्या असिक्नीके गर्भसे शबलाश्व नामके एक सहस्त्र पुत्र उत्पन्न किये। पिताका आदेश पाकर वे पुत्र भी प्रजासृष्टिके लिये दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञापालनका नियम ले उसी स्थानपर गये, जहाँ उनके सिद्धिको प्राप्त हुए बड़े भाई गये थे। नारायणसरोवरके जलका स्पर्श होनेमात्रसे उनके सारे पाप नष्ट हो गये, अन्तःकरणमें शुद्धता आ गयी और वे उत्तम व्रतके पालक शबलाश्व ब्रह्म (प्रणव)-का जप करते हुए वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगे। उन्हें प्रजासृष्टिके लिये उद्यत जान तुम पुनः पहलेकी ही भाँति ईश्वरीय गतिका स्मरण करते हुए उनके पास गये और वही बात कहने लगे, जो उनके भाइयोंसे पहले कह चुके थे। मुने! तुम्हारा दर्शन अमोघ है, इसलिये तुमने उनको भी भाइयोंका ही मार्ग दिखाया। अतएव वे भाइयोंके ही पथपर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हुए। उसी समय प्रजापति दक्षको बहुत-से उत्पात दिखायी दिये। इससे मेरे पुत्र दक्षको बड़ा विस्मय हुआ और वे मन-ही-मन दुःखी हुए। फिर उन्होंने पूर्ववत् तुम्हारी ही करतूतसे अपने पुत्रोंका नाश हुआ सुना, इससे उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे पुत्रशोकसे मूर्च्छित हो अत्यन्त कष्टका अनुभव करने लगे। फिर दक्षने तुमपर बड़ा क्रोध किया और कहा—'यह नारद बड़ा दुष्ट है।' दैववश उसी समय तुम दक्षपर अनुग्रह करनेके लिये वहाँ आ पहुँचे। तुम्हें देखते ही शोकावेशसे युक्त हुए दक्षके ओठ रोषसे फड़कने लगे। तुम्हें सामने पाकर वे धिक्कारने और निन्दा करने लगे।
दक्षने कहा—ओ नीच! तुमने यह क्या किया? तुमने झूठ-मूठ साधुओंका
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बाना पहन रखा है। इसीके द्वारा ठगकर हमारे भोले-भाले बालकोंको जो तुमने भिक्षुओंका मार्ग दिखाया है, यह अच्छा नहीं किया। तुम निर्दय और शठ हो। इसीलिये तुमने हमारे इन बालकोंके, जो अभी ऋषि$^१$-ऋण, देव$^२$-ऋण और पितृ$^३$-ऋणसे मुक्त नहीं हो पाये थे, लोक और परलोक दोनोंके श्रेयका नाश कर डाला। जो पुरुष इन तीनों ऋणोंको उतारे बिना ही मोक्षकी इच्छा मनमें लिये माता-पिताको त्यागकर घरसे निकल जाता है—संन्यासी हो जाता है, वह अधोगतिको प्राप्त होता है। तुम निर्दय और बड़े निर्लज्ज हो। बच्चोंकी बुद्धिमें भेद पैदा करनेवाले हो और अपने सुयशको स्वयं ही नष्ट कर रहे हो। मूढ़मते! तुम भगवान् विष्णुके पार्षदोंमें व्यर्थ ही घूमते-फिरते हो। अधमाधम! तुमने बारंबार मेरा अमंगल किया है। अतः आजसे तीनों लोकोंमें विचरते हुए तुम्हारा पैर कहीं स्थिर नहीं रहेगा अथवा कहीं भी तुम्हें ठहरनेके लिये सुस्थिर ठौर-ठिकाना नहीं मिलेगा।'
नारद! यद्यपि तुम साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित हो, तथापि उस समय दक्षने शोकवश तुम्हें वैसा शाप दे दिया। वे ईश्वरकी इच्छाको नहीं समझ सके। शिवकी मायाने उन्हें अत्यन्त मोहित कर दिया था। मुने! तुमने उस शापको चुपचाप ग्रहण कर लिया और अपने चित्तमें विकार नहीं आने दिया। यही ब्रह्मभाव है। ईश्वरकोटिके महात्मा पुरुष स्वयं शापको मिटा देनेमें समर्थ होनेपर भी उसे सह लेते हैं।
(अध्याय १३)
दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्ष और वीरिणीके यहाँ देवी शिवाका अवतार, दक्षद्वारा उनकी स्तुति तथा सतीके सद्गुणों एवं चेष्टाओंसे माता-पिताकी प्रसन्नता
ब्रह्माजी कहते हैं—देवर्षे! इसी समय दक्षके इस बर्तावको जानकर मैं भी वहाँ आ पहुँचा और पूर्ववत् उन्हें शान्त करनेके लिये सान्त्वना देने लगा। तुम्हारी प्रसन्नताको बढ़ाते हुए मैंने दक्षके साथ तुम्हारा सुन्दर स्नेहपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कराया। तुम मेरे पुत्र हो, मुनियोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण देवताओंके प्रिय हो। अतः बड़े प्रेमसे तुम्हें
१-३. ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे ऋषि-ऋण, यज्ञ और पूजा आदिसे देव-ऋण तथा पुत्रके उत्पादनसे पितृ-ऋणका निवारण होता है।
* रुद्रसंहिता * १७७
आश्वासन देकर मैं फिर अपने स्थानपर आ गया। तदनन्तर प्रजापति दक्षने मेरी अनुनयके अनुसार अपनी पत्नीके गर्भसे साठ सुन्दरी कन्याओंको जन्म दिया और आलस्यरहित हो धर्म आदिके साथ उन सबका विवाह कर दिया। मुनीश्वर ! मैं उसी प्रसंगको बड़े प्रेमसे कह रहा हूँ, तुम सुनो। मुने! दक्षने अपनी दस कन्याएँ विधिपूर्वक धर्मको ब्याह दीं, तेरह कन्याएँ कश्यप मुनिको दे दीं और सत्ताईस कन्याओंका विवाह चन्द्रमाके साथ कर दिया। भूत (या बहुपुत्र), अंगिरा तथा कृशाश्वको उन्होंने दो-दो कन्याएँ दीं और शेष चार कन्याओंका विवाह तार्क्ष्य (या अरिष्टनेमि)-के साथ कर दिया। इन सबकी संतान-परम्पराओंसे तीनों लोक भरे पड़े हैं। अतः विस्तार-भयसे उनका वर्णन नहीं किया जाता। कुछ लोग शिवा या सतीको दक्षकी ज्येष्ठ पुत्री बताते हैं। दूसरे लोग उन्हें मझली पुत्री कहते हैं तथा कुछ अन्य लोग सबसे छोटी पुत्री मानते हैं। कल्पभेदसे ये तीनों मत ठीक हैं। पुत्र और पुत्रियोंकी उत्पत्तिके पश्चात् पत्नीसहित प्रजापति दक्षने बड़े प्रेमसे मन-ही-मन जगदम्बिकाका ध्यान किया। साथ ही गद्गदवाणीसे प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति भी की। बारंबार अंजलि बाँध नमस्कार करके वे विनीतभावसे देवीको मस्तक झुकाते थे। इससे देवी शिवा संतुष्ट हुईं और उन्होंने अपने प्रणकी पूर्तिके लिये मन-ही-मन यह विचार किया कि अब मैं वीरिणीके गर्भसे अवतार लूँ। ऐसा विचार कर वे जगदम्बा दक्षके हृदयमें निवास करने लगीं। मुनिश्रेष्ठ ! उस समय दक्षकी बड़ी शोभा होने लगी। फिर उत्तम मुहूर्त देखकर दक्षने अपनी पत्नीमें प्रसन्नतापूर्वक गर्भाधान किया। तब दयालु शिवा दक्ष-पत्नीके चित्तमें निवास करने लगीं। उनमें गर्भधारणके सभी चिह्न प्रकट हो गये। तात! उस अवस्थामें वीरिणीकी शोभा बढ़ गयी और उसके चित्तमें अधिक हर्ष छा गया। भगवती शिवाके निवासके प्रभावसे वीरिणी महामंगलरूपिणी हो गयी। दक्षने अपने कुल-सम्प्रदाय, वेदज्ञान और हार्दिक उत्साहके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक पुंसवन आदि संस्कारसम्बन्धी श्रेष्ठ क्रियाएँ सम्पन्न कीं। उन कर्मोंके अनुष्ठानके समय महान् उत्सव हुआ। प्रजापतिने ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दिया।
उस अवसरपर वीरिणीके गर्भमें देवीका निवास हुआ जानकर श्रीविष्णु आदि सब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई।
१७८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उन सबने वहाँ आकर जगदम्बाका स्तवन किया और समस्त लोकोंका उपकार करनेवाली देवी शिवाको बारंबार प्रणाम किया। वे सब देवता प्रसन्नचित्त हो दक्ष प्रजापति तथा वीरिणीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके अपने-अपने स्थानको लौट गये। नारद! जब नौ महीने बीत गये, तब लौकिक गतिका निर्वाह कराकर दसवें महीनेके पूर्ण होनेपर चन्द्रमा आदि ग्रहों तथा ताराओंकी अनुकूलतासे युक्त सुखद मुहूर्तमें देवी शिवा शीघ्र ही अपनी माताके सामने प्रकट हुईं। उनके अवतार लेते ही प्रजापति दक्ष बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें महान् तेजसे देदीप्यमान देख उनके मनमें यह विश्वास हो गया कि साक्षात् वे शिवादेवी ही मेरी पुत्रीके रूपमें प्रकट हुई हैं। उस समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और मेघ जल बरसाने लगे। मुनीश्वर! सतीके जन्म लेते ही सम्पूर्ण दिशाओंमें तत्काल शान्ति छा गयी। देवता आकाशमें खड़े हो मांगलिक बाजे बजाने लगे। अग्निशालाओंकी बुझी हुई अग्नियाँ सहसा प्रज्वलित हो उठीं और सब कुछ परम मंगलमय हो गया। वीरिणीके गर्भसे साक्षात् जगदम्बाको प्रकट हुई देख दक्षने दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया और बड़े भक्ति-भावसे उनकी बड़ी स्तुति की।
बुद्धिमान् दक्षके स्तुति करनेपर जगन्माता शिवा उस समय दक्षसे इस प्रकार बोलीं, जिससे माता वीरिणी न सुन सके।
देवी बोलीं—प्रजापते! तुमने पहले पुत्रीरूपमें मुझे प्राप्त करनेके लिये मेरी आराधना की थी, तुम्हारा वह मनोरथ आज सिद्ध हो गया। अब तुम उस तपस्याके फलको ग्रहण करो।
उस समय दक्षसे ऐसा कहकर देवीने अपनी मायासे शिशुरूप धारण कर लिया और शैशवभाव प्रकट करती हुई वे वहाँ रोने लगीं। उस बालिकाका रोदन सुनकर सभी स्त्रियाँ और दासियाँ बड़े वेगसे प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आ पहुँचीं। असिक्नीकी पुत्रीका अलौकिक रूप देखकर उन सभी स्त्रियोंको बड़ा हर्ष हुआ। नगरके सब लोग उस समय जय-जयकार करने लगे। गीत और वाद्योंके साथ बड़ा भारी उत्सव होने लगा। पुत्रीका मनोहर मुख देखकर सबको बड़ी ही प्रसन्नता हुई। दक्षने वैदिक और कुलोचित आचारका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। ब्राह्मणोंको दान दिया और दूसरोंको भी धन बाँटा। सब ओर यथोचित गान और नृत्य होने लगे। भाँति-भाँतिके मंगल-कृत्योंके साथ बहुत-से बाजे बजने लगे। उस समय दक्षने समस्त सद्गुणोंकी सत्तासे प्रशंसित होनेवाली अपनी उस पुत्रीका नाम प्रसन्नतापूर्वक ‘उमा’ रखा। तदनन्तर संसारमें लोगोंकी ओरसे उसके और भी नाम प्रचलित किये गये, जो सब-के-सब महान् मंगल-दायक तथा विशेषतः समस्त दुःखोंका नाश करनेवाले हैं। वीरिणी और महात्मा दक्ष अपनी पुत्रीका पालन करने लगे तथा वह शुक्लपक्षकी चन्द्रकलाके समान दिनोदिन बढ़ने लगी। द्विजश्रेष्ठ! बाल्यावस्थामें भी समस्त उत्तमोत्तम गुण उसमें उसी तरह प्रवेश करने लगे, जैसे शुक्लपक्षके बाल चन्द्रमामें भी समस्त मनोहारिणी कलाएँ प्रविष्ट हो जाती हैं। दक्षकन्या सती सखियोंके बीच बैठी-बैठी जब अपने भावमें निमग्न होती थी, तब बारंबार
* रुद्रसंहिता * १७९
भगवान् शिवकी मूर्तिको चित्रित करने लगती थी। मंगलमयी सती जब बाल्योचित सुन्दर गीत गाती, तब स्थाणु, हर एवं रुद्र नाम लेकर स्मरशत्रु शिवका स्मरण किया करती थी।
(अध्याय १४)
o
सतीकी तपस्यासे संतुष्ट देवताओंका कैलासमें जाकर भगवान् शिवका स्तवन करना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! एक दिन मैंने तुम्हारे साथ जाकर पिताके पास खड़ी हुई सतीको देखा। वह तीनों लोकोंकी सारभूता सुन्दरी थी। उसके पिताने मुझे नमस्कार करके तुम्हारा भी सत्कार किया। यह देख लोक-लीलाका अनुसरण करनेवाली सतीने भक्ति और प्रसन्नताके साथ मुझको और तुमको भी प्रणाम किया। नारद! तदनन्तर सतीकी ओर देखते हुए हम और तुम दक्षके दिये हुए शुभ आसनपर बैठ गये। तत्पश्चात् मैंने उस विनयशीला बालिकासे कहा—'सती! जो केवल तुम्हें ही चाहते हैं और तुम्हारे मनमें भी एकमात्र जिनकी ही कामना है, उन्हीं सर्वज्ञ जगदीश्वर महादेवजीको तुम पतिरूपमें प्राप्त करो। शुभे! जो तुम्हारे सिवा दूसरी किसी स्त्रीको पत्नीरूपमें न तो ग्रहण कर सके हैं, न करते हैं और न भविष्यमें ही ग्रहण करेंगे, वे ही भगवान् शिव तुम्हारे पति हों। वे तुम्हारे ही योग्य हैं, दूसरेके नहीं।'
नारद ! सतीसे ऐसा कहकर मैं दक्षके घरमें देरतक ठहरा रहा। फिर उनसे विदा ले मैं और तुम दोनों अपने-अपने स्थानको चले आये। मेरी बातको सुनकर दक्षको बड़ी प्रसन्नता हुई। उनकी सारी मानसिक चिन्ता दूर हो गयी और उन्होंने अपनी पुत्रीको परमेश्वरी समझकर गोदमें उठा लिया। इस प्रकार कुमारोचित सुन्दर लीला-विहारोंसे सुशोभित होती हुई भक्तवत्सला सती, जो स्वेच्छासे मानवरूप धारण करके प्रकट हुई थीं, कौमारावस्था पार कर गयीं। बाल्यावस्था बिताकर किंचित् युवावस्थाको प्राप्त हुई सती अत्यन्त तेज एवं शोभासे सम्पन्न हो सम्पूर्ण अंगोंसे मनोहर दिखायी देने लगीं। लोकेश दक्षने देखा कि सतीके शरीरमें युवावस्थाके लक्षण प्रकट होने लगे हैं। तब उनके मनमें यह चिन्ता हुई कि मैं महादेवजीके साथ इनका विवाह कैसे करूँ ? सती स्वयं भी महादेवजीको पानेकी प्रतिदिन अभिलाषा रखती थीं। अतः पिताके मनोभावको समझकर वे माताके निकट गयीं। विशाल बुद्धिवाली सतीरूपिणी परमेश्वरी शिवाने अपनी माता वीरिणीसे भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके निमित्त तपस्या करनेके लिये आज्ञा माँगी। माताकी आज्ञा मिल गयी। अतः दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाली सतीने महेश्वरको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये अपने घरपर ही उनकी आराधना आरम्भ की।
आश्विन मासमें नन्दा (प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी) तिथियोंमें उन्होंने भक्तिपूर्वक गुड़, भात और नमक चढ़ाकर भगवान् शिवका पूजन किया और उन्हें
१८० * संक्षिप्त शिवपुराण *
नमस्कार करके उसी नियमके साथ उस मासको व्यतीत किया। कार्तिक मासकी चतुर्दशीको सजाकर रखे हुए मालपूओं और खीरसे परमेश्वर शिवकी आराधना करके वे निरन्तर उनका चिन्तन करने लगीं। मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको तिल, जौ और चावलसे हरकी पूजा करके ज्योतिर्मय दीप दिखाकर अथवा आरती करके सती दिन बिताती थीं। पौष मासके शुक्लपक्षकी सप्तमीको रातभर जागरण करके प्रातःकाल खिचड़ीका नैवेद्य लगा वे शिवकी पूजा करती थीं। माघकी पूर्णिमाको रातमें जागरण करके सबेरे नदीमें नहातीं और गीले वस्त्रसे ही तटपर बैठकर भगवान् शंकरकी पूजा करती थीं। फाल्गुन मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको रातमें जागरण करके उस रात्रिके चारों पहरोंमें शिवजीकी विशेष पूजा करतीं और नटोंद्वारा नाटक भी कराती थीं। चैत्र मासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको वे दिन-रात शिवका स्मरण करती हुई समय बितातीं और ढाकके फूलों तथा दवनोंसे भगवान् शिवकी पूजा करती थीं। वैशाख शुक्ला तृतीयाको सती तिलका आहार करके रहतीं और नये जौके भातसे रुद्रदेवकी पूजा करके उस महीनेको बिताती थीं। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको रातमें सुन्दर वस्त्रों तथा भटकटैयाके फूलोंसे शंकरजीकी पूजा करके वे निराहार रहकर ही वह मास व्यतीत करती थीं। आषाढ़के शुक्लपक्षकी चतुर्दशीको काले वस्त्र और भटकटैयाके फूलोंसे वे रुद्रदेवका पूजन करती थीं। श्रावण मासके शुक्लपक्षकी अष्टमी एवं चतुर्दशीको वे यज्ञोपवीतों, वस्त्रों तथा कुशकी पवित्रीसे शिवकी पूजा किया करती थीं। भाद्रपद मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको नाना प्रकारके फूलों और फलोंसे शिवका पूजन करके सती चतुर्दशी तिथिको केवल जलका आहार किया करतीं। भाँति-भाँतिके फलों, फूलों और उस समय उत्पन्न होनेवाले अन्नोंद्वारा वे शिवकी पूजा करतीं और महीनेभर अत्यन्त नियमित आहार करके केवल जपमें लगी रहती थीं। सभी महीनोंमें सारे दिन सती शिवकी आराधनामें ही संलग्न रहती थीं। अपनी इच्छासे मानवरूप धारण करनेवाली वे देवी दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करती थीं। इस प्रकार नन्दाव्रतको पूर्णरूपसे समाप्त करके भगवान् शिवमें अनन्यभाव रखनेवाली सती एकाग्रचित्त हो बड़े प्रेमसे भगवान् शिवका ध्यान करने लगीं तथा उस ध्यानमें ही निश्चलभावसे स्थित हो गयीं।
- रुद्रसंहिता * १८१
मुने! इसी समय सब देवता और ऋषि भगवान् विष्णु और मुझको आगे करके सतीकी तपस्या देखनेके लिये गये। वहाँ आकर देवताओंने देखा, सती मूर्तिमती दूसरी सिद्धिके समान जान पड़ती हैं। वे भगवान् शिवके ध्यानमें निमग्न हो उस समय सिद्धावस्थाको पहुँच गयी थीं। समस्त देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ दोनों हाथ जोड़कर सतीको नमस्कार किया, मुनियोंने भी मस्तक झुकाये तथा श्रीहरि आदिके मनमें प्रीति उमड़ आयी। श्रीविष्णु आदि सब देवता और मुनि आश्चर्यचकित हो सती देवीकी तपस्याकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। फिर देवीको प्रणाम करके वे देवता और मुनि तुरंत ही गिरिश्रेष्ठ कैलासको गये, जो भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय है। सावित्रीके साथ मैं और लक्ष्मीके साथ भगवान् वासुदेव भी प्रसन्नतापूर्वक महादेवजीके निकट गये। वहाँ जाकर भगवान् शिवको देखते ही बड़े वेगसे प्रणाम करके सब देवताओंने दोनों हाथ जोड़ विनीतभावसे नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके अन्तमें कहा—
प्रभो! आपकी सत्त्व, रज और तम नामक जो तीन शक्तियाँ हैं, उनके राग आदि वेग असह्य हैं। वेदत्रयी अथवा लोकत्रयी आपका स्वरूप है। आप शरणागतोंके पालक हैं तथा आपकी शक्ति बहुत बड़ी है—उसकी कहीं कोई सीमा नहीं है; आपको नमस्कार है। दुर्गापते! जिनकी इन्द्रियाँ दुष्ट हैं—वशमें नहीं हो पातीं, उनके लिये आपकी प्राप्तिका कोई मार्ग सुलभ नहीं है। आप सदा भक्तोंके उद्धारमें तत्पर रहते हैं, आपका तेज छिपा हुआ है; आपको नमस्कार है। आपकी मायाशक्तिरूपा जो अहंबुद्धि है, उससे आत्माका स्वरूप ढक गया है; अतएव यह मूढ़बुद्धि जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता। आपकी महिमाका पार पाना अत्यन्त कठिन (ही नहीं, सर्वथा असम्भव) है। हम आप महाप्रभुको मस्तक झुकाते हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके श्रीविष्णु आदि सब देवता उत्तम भक्तिसे मस्तक झुकाये प्रभु शिवजीके आगे चुपचाप खड़े हो गये।
(अध्याय १५)
~~ ० ~~
ब्रह्माजीका रुद्रदेवसे सतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, श्रीविष्णुद्वारा अनुमोदन और श्रीरुद्रकी इसके लिये स्वीकृति
ब्रह्माजी कहते हैं—श्रीविष्णु आदि देवताओंद्वारा की हुई उस स्तुतिको सुनकर सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और जोर-जोरसे हँसने लगे। मुझ ब्रह्मा और विष्णुको अपनी-अपनी पत्नीके साथ आया हुआ देख महादेवजीने हमलोगोंसे यथोचित वार्तालाप किया और हमारे आगमनका कारण पूछा।
रुद्र बोले—हे हरे! हे विधे! तथा हे देवताओ और महर्षियो! आज निर्भय होकर यहाँ अपने आनेका ठीक-ठीक कारण बताओ। तुमलोग किसलिये यहाँ आये हो और कौन-सा कार्य आ पड़ा है? वह सब मैं सुनना चाहता हूँ; क्योंकि
१८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तुम्हारे द्वारा की गयी स्तुतिसे मेरा मन बहुत प्रसन्न है।
मुने! महादेवजीके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् विष्णुकी आज्ञासे मैंने वार्तालाप आरम्भ किया।
मुझ ब्रह्माने कहा—देवदेव! महादेव! करुणासागर! प्रभो! हम दोनों इन देवताओं और ऋषियोंके साथ जिस उद्देश्यसे यहाँ आये हैं, उसे सुनिये। वृषभध्वज! विशेषतः आपके ही लिये हमारा यहाँ आगमन हुआ है; क्योंकि हम तीनों सहार्थी हैं—सृष्टि-चक्रके संचालनरूप प्रयोजनकी सिद्धिके लिये एक-दूसरेके सहायक हैं। सहार्थीको सदा परस्पर यथायोग्य सहयोग करना चाहिये अन्यथा यह जगत् टिक नहीं सकता। महेश्वर! कुछ ऐसे असुर उत्पन्न होंगे, जो मेरे हाथसे मारे जायँगे। कुछ भगवान् विष्णुके और कुछ आपके हाथों नष्ट होंगे। महाप्रभो! कुछ असुर ऐसे होंगे, जो आपके वीर्यसे उत्पन्न हुए पुत्रके हाथसे ही मारे जा सकेंगे। प्रभो! कभी कोई विरले ही असुर ऐसे होंगे, जो मायाके हाथोंद्वारा वधको प्राप्त होंगे। आप भगवान् शंकरकी कृपासे ही देवताओंको सदा उत्तम सुख प्राप्त होगा। घोर असुरोंका विनाश करके आप जगत्को सदा स्वास्थ्य एवं अभय प्रदान करेंगे अथवा यह भी सम्भव है कि आपके हाथसे कोई भी असुर न मारे जायँ; क्योंकि आप सदा योगयुक्त रहते हुए राग-द्वेषसे रहित हैं तथा एकमात्र दया करनेमें ही लगे रहते हैं। ईश! यदि वे असुर भी आराधित हों—आपकी दयासे अनुगृहीत होते रहें तो सृष्टि और पालनका कार्य कैसे चल सकता है। अतः वृषभध्वज! आपको प्रतिदिन सृष्टि आदिके उपयुक्त कार्य करनेके लिये उद्यत रहना चाहिये। यदि सृष्टि, पालन और संहार-रूप कर्म न करने हों तब तो हमने मायासे जो भिन्न-भिन्न शरीर धारण किये हैं, उनकी कोई उपयोगिता अथवा औचित्य ही नहीं है। वास्तवमें हम तीनों एक ही हैं, कार्यके भेदसे भिन्न-भिन्न देह धारण करके स्थित हैं। यदि कार्यभेद न सिद्ध हो, तब तो हमारे रूपभेदका कोई प्रयोजन ही नहीं है। देव! एक ही परमात्मा महेश्वर तीन स्वरूपोंमें अभिव्यक्त हुए हैं। इस रूपभेदमें उनकी अपनी माया ही कारण है। वास्तवमें प्रभु स्वतन्त्र हैं। वे लीलाके उद्देश्यसे ही ये सृष्टि आदि कार्य करते हैं। भगवान् श्रीहरि उनके बायें अंगसे प्रकट हुए हैं, मैं ब्रह्मा उनके दायें अंगसे प्रकट हुआ हूँ और आप रुद्रदेव उन सदाशिवके हृदयसे आविर्भूत हुए हैं; अतः आप ही शिवके पूर्ण रूप हैं। प्रभो! इस प्रकार अभिन्नरूप होते हुए भी हम तीन रूपोंमें प्रकट हैं। सनातनदेव! हम तीनों उन्हीं भगवान् सदाशिव और शिवाके पुत्र हैं, इस यथार्थ तत्त्वका आप हृदयसे अनुभव कीजिये। प्रभो! मैं और श्रीविष्णु आपके आदेशसे प्रसन्नता-पूर्वक लोककी सृष्टि और पालनके कार्य कर रहे हैं तथा कार्य-कारणवश सपत्नीक भी हो गये हैं; अतः आप भी विश्वहितके लिये तथा देवताओंको सुख पहुँचानेके लिये एक परम सुन्दरी रमणीको अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करें। महेश्वर! एक बात और है, उसे सुनिये; मुझे पहलेके वृत्तान्तका स्मरण हो आया है। पूर्वकालमें आपने ही शिवरूपसे जो बात हमारे सामने कही थी, वही इस समय सुना
* रुद्रसंहिता * १८३
रहा हूँ। आपने कहा था, 'ब्रह्मन्! मेरा ऐसा ही उत्तम रूप तुम्हारे अंगविशेष—ललाटसे प्रकट होगा, जिसकी लोकमें 'रुद्र' नामसे प्रसिद्धि होगी। तुम ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हो गये, श्रीहरि जगत्का पालन करनेवाले हुए और मैं सगुण रुद्ररूप होकर संहार करनेवाला होऊँगा। एक स्त्रीके साथ विवाह करके लोकके उत्तम कार्यकी सिद्धि करूँगा।' अपनी कही हुई इस बातको याद करके आप अपनी ही पूर्वप्रतिज्ञाको पूर्ण कीजिये। स्वामिन्! आपका यह आदेश है कि मैं सृष्टि करूँ, श्रीहरि पालन करें और आप स्वयं संहारके हेतु बनकर प्रकट हों; सो आप साक्षात् शिव ही संहारकर्ताके रूपमें प्रकट हुए हैं। आपके बिना हम दोनों अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ नहीं हैं; अतः आप एक ऐसी कामिनीको स्वीकार करें, जो लोकहितके कार्यमें तत्पर रहे। शम्भो! जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुकी और सावित्री मेरी सहधर्मिणी हैं, उसी प्रकार आप इस समय अपनी जीवनसहचरी प्राणवल्लभाको ग्रहण करें।
मेरी यह बात सुनकर लोकेश्वर महादेवजीके मुखपर मुसकराहट दौड़ गयी। वे श्रीहरिके सामने मुझसे इस प्रकार बोले।
ईश्वरने कहा—ब्रह्मन्! हरे! तुम दोनों मुझे सदा ही अत्यन्त प्रिय हो। तुम दोनोंको देखकर मुझे बड़ा आनन्द मिलता है। तुमलोग समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ तथा त्रिलोकीके स्वामी हो। लोकहितके कार्यमें मन लगाये रहनेवाले तुम दोनोंका वचन मेरी दृष्टिमें अत्यन्त गौरवपूर्ण हैं। किंतु सुरश्रेष्ठगण! मेरे लिये विवाह करना उचित नहीं होगा; क्योंकि मैं तपस्यामें संलग्न रहकर सदा संसारसे विरक्त ही रहता हूँ और योगीके रूपमें मेरी प्रसिद्धि है। जो निवृत्तिके सुन्दर मार्गपर स्थित है, अपने आत्मामें ही रमण करता—आनन्द मानता है, निरंजन (मायासे निर्लिप्त) है, जिसका शरीर अवधूत (दिगम्बर) है, जो ज्ञानी, आत्मदर्शी और कामनासे शून्य है, जिसके मनमें कोई विकार नहीं है, जो भोगोंसे दूर रहता है तथा जो सदा अपवित्र और अमंगलवेशधारी है, उसे संसारमें कामिनीसे क्या प्रयोजन है—यह इस समय मुझे बताओ तो सही!* मुझे तो सदा केवल योगमें लगे रहनेपर ही आनन्द आता है। ज्ञानहीन पुरुष ही योगको छोड़कर भोगको अधिक महत्त्व देता है। संसारमें विवाह करना पराये बन्धनमें बँधना है। इसे बहुत बड़ा बन्धन समझना चाहिये। इसलिये मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, विवाहके लिये मेरे मनमें थोड़ी-सी भी अभिरुचि नहीं है। आत्मा ही अपना उत्तम अर्थ या स्वार्थ है। उसका भलीभाँति चिन्तन करनेके कारण मेरी लौकिक स्वार्थमें प्रवृत्ति नहीं होती। तथापि जगत्के हितके लिये तुमने जो कुछ कहा है, उसे करूँगा। तुम्हारे वचनको गरिष्ठ मानकर अथवा अपनी कही हुई बातको पूर्ण करनेके लिये मैं अवश्य विवाह करूँगा; क्योंकि मैं सदा भक्तोंके वशमें
* यो निवृत्तिसुमार्गस्थः स्वात्मारामो निरञ्जनः। अवधूततनुर्ज्ञानी स्वद्रष्टा कामवर्जितः॥
अविकारी ह्यभोगी च सदा शुचिरमङ्गलः। तस्य प्रयोजनं लोके कामिन्या किं वदाधुना॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० १५। ३१-३२)
| १८४ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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रहता हूँ। परंतु मैं जैसी नारीको प्रिय पत्नीके रूपमें ग्रहण करूँगा और जैसी शर्तके साथ करूँगा, उसे सुनो। हरे! ब्रह्मन्! मैं जो कुछ कहता हूँ, वह सर्वथा उचित ही है। जो नारी मेरे तेजको विभागपूर्वक ग्रहण कर सके, जो योगिनी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली हो, उसीको तुम पत्नी बनानेके लिये मुझे बताओ। जब मैं योगमें तत्पर रहूँ, तब उसे भी योगिनी बनकर रहना होगा और जब मैं कामासक्त होऊँ, तब उसे भी कामिनीके रूपमें ही मेरे पास रहना होगा। वेदवेत्ता विद्वान् जिन्हें अविनाशी बतलाते हैं, उन ज्योतिःस्वरूप सनातन शिवका मैं सदा चिन्तन करता हूँ और करता रहूँगा। ब्रह्मन्! उन सदाशिवके चिन्तनमें जब मैं न लगा होऊँ तभी उस भामिनीके साथ मैं समागम कर सकता हूँ। जो मेरे शिवचिन्तनमें विघ्न डालनेवाली होगी, वह जीवित नहीं रह सकती, उसे अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा। तुम, विष्णु और मैं तीनों ही ब्रह्मस्वरूप शिवके अंशभूत हैं। अतः महाभागगण! हमारे लिये उनका निरन्तर चिन्तन करना ही उचित है। कमलासन! उनके चिन्तनके लिये मैं बिना विवाहके भी रह लूँगा। (किंतु उनका चिन्तन छोड़कर विवाह नहीं करूँगा।) अतः तुम मुझे ऐसी पत्नी प्रदान करो, जो सदा मेरे कर्मके अनुकूल चल सके। ब्रह्मन्! उसमें भी मेरी एक और शर्त है, उसे तुम सुनो; यदि उस स्त्रीका मुझपर और मेरे वचनपर अविश्वास होगा तो मैं उसे त्याग दूँगा।
उनकी यह बात सुनकर मैंने और श्रीहरिने मन्द मुसकानके साथ मन-ही-मन प्रसन्नताका अनुभव किया; फिर मैं विनम्र होकर बोला— 'नाथ! महेश्वर! प्रभो! आपने जैसी नारीकी खोज आरम्भ की है, वैसी ही स्त्रीके विषयमें मैं आपको प्रसन्नतापूर्वक कह रहा हूँ। साक्षात् सदाशिवकी धर्मपत्नी जो उमा हैं, वे ही जगत्का कार्य सिद्ध करनेके लिये भिन्न-भिन्न रूपमें प्रकट हुई हैं। प्रभो! सरस्वती और लक्ष्मी— ये दो रूप धारण करके वे पहले ही यहाँ आ चुकी हैं। इनमें लक्ष्मी तो श्रीविष्णुकी प्राणवल्लभा हो गयीं और सरस्वती मेरी। अब हमारे लिये वे तीसरा रूप धारण करके प्रकट हुई हैं। प्रभो! लोकहितका कार्य करनेकी इच्छावाली देवी शिवा दक्षपुत्रीके रूपमें अवतीर्ण हुई हैं। उनका नाम सती है। सती ही ऐसी भार्या हो सकती हैं, जो सदा आपके लिये हितकारिणी हो। देवेश! महातेजस्विनी सती आपके लिये, आपको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये दृढ़तापूर्वक कठोर व्रतका पालन करती हुई तपस्या कर रही हैं। महेश्वर! आप उन्हें वर देनेके लिये जाइये, कृपा कीजिये और बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें उनकी तपस्याके अनुरूप वर देकर उनके साथ विवाह कीजिये। शंकर! भगवान् विष्णुकी, मेरी तथा इन सम्पूर्ण देवताओंकी यही इच्छा है। आप अपनी शुभ दृष्टिसे हमारी इस इच्छाको पूर्ण कीजिये, जिससे हम आदरपूर्वक इस उत्सवको देख सकें। ऐसा होनेसे तीनों लोकोंमें सुख देनेवाला परम मंगल होगा और सबकी सारी चिन्ता मिट जायगी, इसमें संशय नहीं है।'
तदनन्तर मेरी बात समाप्त होनेपर लीला-विग्रह धारण करनेवाले भक्तवत्सल
* रुद्रसंहिता * १८५
महेश्वरसे मधुसूदन अच्युतने इसीका समर्थन किया।
तब भक्तवत्सल भगवान् शिवने हँसकर कहा, 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा।' उनके ऐसा कहनेपर हम दोनों उनसे आज्ञा ले अपनी पत्नी तथा देवताओं और मुनियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्न हो अपने अभीष्ट स्थानको चले आये। (अध्याय १६)
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सतीको शिवसे वरकी प्राप्ति तथा भगवान् शिवका ब्रह्माजीको दक्षके पास भेजकर सतीका वरण करना
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! उधर सतीने आश्विन मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास करके भक्तिभावसे सर्वेश्वर शिवका पूजन किया। इस प्रकार नन्दाव्रत पूर्ण होनेपर नवमी तिथिको दिनमें ध्यानमग्न हुई सतीको भगवान् शिवने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनका श्रीविग्रह सर्वांगसुन्दर एवं गौरवर्णका था। उनके पाँच मुख थे और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। भालदेशमें चन्द्रमा शोभा दे रहा था। उनका चित्त प्रसन्न था और कण्ठमें नील चिह्न दृष्टिगोचर होता था। उनके चार भुजाएँ थीं। उन्होंने हाथोंमें त्रिशूल, ब्रह्मकपाल, वर तथा अभय धारण कर रखे थे। भस्ममय अंगरागसे उनका सारा शरीर उद्भासित हो रहा था। गंगाजी उनके मस्तककी शोभा बढ़ा रही थीं। उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। वे महान् लावण्यके धाम जान पड़ते थे। उनके मुख करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान एवं आह्लादजनक थे। उनकी अंगकान्ति करोड़ों कामदेवोंको तिरस्कृत कर रही थी तथा उनकी आकृति स्त्रियोंके लिये सर्वथा ही प्रिय थी। सतीने ऐसे सौन्दर्य-माधुर्यसे युक्त प्रभु महादेवजीको प्रत्यक्ष देखकर उनके चरणोंकी वन्दना की। उस समय उनका मुख लज्जासे झुका हुआ था। तपस्याके पुंजका फल प्रदान करनेवाले महादेवजी उन्हींके लिये कठोर व्रत धारण करनेवाली सतीको पत्नी बनानेके लिये प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हुए भी उनसे इस प्रकार बोले।
महादेवजीने कहा—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली दक्षकनन्दिनि! मैं तुम्हारे इस व्रतसे बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिये कोई वर माँगो। तुम्हारे मनको जो अभीष्ट होगा, वही वर मैं तुम्हें दूँगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! जगदीश्वर महादेवजी यद्यपि सतीके मनोभावको जानते थे तो भी उनकी बात सुननेके लिये बोले—'कोई वर माँगो।' परंतु सती लज्जाके अधीन हो गयी थीं; इसलिये उनके हृदयमें जो बात थी, उसे वे स्पष्ट शब्दोंमें कह न सकीं। उनका जो अभीष्ट मनोरथ था, वह लज्जासे आच्छादित हो गया। प्राणवल्लभ शिवका प्रिय वचन सुनकर सती अत्यन्त प्रेममें मग्न हो गयीं। इस बातको जानकर भक्तवत्सल भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और शीघ्रतापूर्वक बारंबार कहने लगे—'वर माँगो, वर माँगो।' सत्पुरुषोंके आश्रय-भूत अन्तर्यामी शम्भु सतीकी भक्तिके वशीभूत हो गये थे। तब सतीने अपनी लज्जाको रोककर महादेवजीसे कहा—'वर देनेवाले प्रभो! मुझे मेरी इच्छाके अनुसार
१८६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ऐसा वर दीजिये जो टल न सके।' भक्त-वत्सल भगवान् शंकरने देखा सती अपनी बात पूरी नहीं कह पा रही हैं, तब वे स्वयं ही उनसे बोले—'देवि! तुम मेरी भार्या हो जाओ।' अपने अभीष्ट फलको प्रकट करनेवाले उनके इस वचनको सुनकर आनन्दमग्न हुई सती चुपचाप खड़ी रह गयीं; क्योंकि वे मनोवांछित वर पा चुकी थीं। फिर दक्षकन्या प्रसन्न हो दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुका भक्तवत्सल शिवसे बारंबार कहने लगीं।
सती बोलीं—देवाधिदेव महादेव! प्रभो! जगतपते! आप मेरे पिताको कहकर वैवाहिक विधिसे मेरा पाणिग्रहण करें।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! सतीकी यह बात सुनकर भक्तवत्सल महेश्वरने प्रेमसे उनकी ओर देखकर कहा—'प्रिये! ऐसा ही होगा।' तब दक्षकन्या सती भी भगवान् शिवको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक विदा माँग—जानेकी आज्ञा प्राप्त करके मोह और आनन्दसे युक्त हो माताके पास लौट गयीं। इधर भगवान् शिव भी हिमालयपर अपने आश्रममें प्रवेश करके दक्षकन्या सतीके वियोगसे कुछ कष्टका अनुभव करते हुए उन्हींका चिन्तन करने लगे। देवर्षे! फिर मनको एकाग्र करके लौकिक गतिका आश्रय ले भगवान् शंकरने मन-ही-मन मेरा स्मरण किया। त्रिशूलधारी महेश्वरके स्मरण करनेपर उनकी सिद्धिसे प्रेरित हो मैं तुरंत ही उनके सामने जा खड़ा हुआ। तात! हिमालयके शिखरपर जहाँ सतीके वियोगका अनुभव करनेवाले महादेवजी विद्यमान थे, वहीं मैं सरस्वतीके साथ उपस्थित हो गया। देवर्षे! सरस्वतीसहित मुझे आया देख सतीके प्रेमपाशमें बँधे हुए शिव उत्सुकतापूर्वक बोले।
शम्भुने कहा—ब्रह्मन्! मैं जबसे विवाहके कार्यमें स्वार्थबुद्धि कर बैठा हूँ, तबसे अब मुझे इस स्वार्थमें ही स्वत्व-सा प्रतीत होता है। दक्षकन्या सतीने बड़ी भक्तिसे मेरी आराधना की है। उसके नन्दाव्रतके प्रभावसे मैंने उसे अभीष्ट वर देनेकी घोषणा की। ब्रह्मन्! तब उसने मुझसे यह वर माँगा कि 'आप मेरे पति हो जाइये।' यह सुनकर सर्वथा संतुष्ट हो मैंने भी कह दिया कि 'तुम मेरी पत्नी हो जाओ।' तब दाक्षायणी सती मुझसे बोलीं—'जगतपते! आप मेरे पिताको सूचित करके वैवाहिक विधिसे मुझे ग्रहण करें।' ब्रह्मन्! उसकी भक्तिसे संतोष होनेके कारण मैंने उसका वह अनुरोध भी स्वीकार कर लिया। विधातः! तब सती अपनी माताके घर चली गयी और मैं यहाँ चला आया। इसलिये अब तुम मेरी आज्ञासे दक्षके घर जाओ और ऐसा यत्न करो, जिससे प्रजापति दक्ष शीघ्र ही मुझे अपनी कन्याका दान कर दें।
उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैं कृतकृत्य और प्रसन्न हो गया तथा उन भक्तवत्सल विश्वनाथसे इस प्रकार बोला।
मुझ ब्रह्माने कहा—भगवन्! शम्भो! आपने जो कुछ कहा है, उसपर भलीभाँति विचार करके हमलोगोंने पहले ही उसे सुनिश्चित कर दिया है। वृषभध्वज! इसमें मुख्यतः देवताओंका और मेरा भी स्वार्थ है। दक्ष स्वयं ही आपको अपनी पुत्री प्रदान करेंगे, किंतु आपकी आज्ञासे मैं भी उनके सामने आपका संदेश कह दूँगा।
- रुद्रसंहिता * १८७
सर्वेश्वर महाप्रभु महादेवजीसे ऐसा कहकर मैं अत्यन्त वेगशाली रथके द्वारा दक्षके घर जा पहुँचा।
नारदजीने पूछा—वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग! विधातः! बताइये—जब सती घरपर लौटकर आयीं, तब दक्षने उनके लिये क्या किया?
ब्रह्माजीने कहा—तपस्या करके मनोवांछित वर पाकर सती जब घरको लौट गयीं, तब वहाँ उन्होंने माता-पिताको प्रणाम किया। सतीने अपनी सखीके द्वारा माता-पिताको तपस्या-सम्बन्धी सब समाचार कहलवाया। सखीने यह भी सूचित किया कि 'सतीको महेश्वरसे वरकी प्राप्ति हुई है, वे सतीकी भक्तिसे बहुत संतुष्ट हुए हैं।' सखीके मुँहसे सारा वृत्तान्त सुनकर माता-पिताको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ और उन्होंने महान् उत्सव किया। उदारचेता दक्ष और महामनस्विनी वीरिणीने ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार द्रव्य दिया तथा अन्यान्य अंधों और दीनोंको भी धन बाँटा।
प्रसन्नता बढ़ानेवाली अपनी पुत्रीको हृदयसे लगाकर माता वीरिणीने उसका मस्तक सूँघा और आनन्दमग्न होकर उसकी बारंबार प्रशंसा की। तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होनेपर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ दक्ष इस चिन्तामें पड़े कि 'मैं अपनी इस पुत्रीका विवाह भगवान् शंकरके साथ किस तरह करूँ? महादेवजी प्रसन्न होकर आये थे, पर वे तो चले गये। अब मेरी पुत्रीके लिये वे फिर कैसे यहाँ आयेंगे? यदि किसीको शीघ्र ही भगवान् शिवके निकट भेजा जाय तो यह भी उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि यदि वे इस तरह अनुरोध करनेपर भी मेरी पुत्रीको ग्रहण न करें तो मेरी याचना निष्फल हो जायगी।'
इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े हुए प्रजापति दक्षके सामने मैं सरस्वतीके साथ सहसा उपस्थित हुआ। मुझ पिताको आया देख दक्ष प्रणाम करके विनीतभावसे खड़े हो गये। उन्होंने मुझ स्वयंभूको यथायोग्य आसन दिया। तदनन्तर दक्षने जब मेरे आनेका कारण पूछा, तब मैंने सब बातें बताकर उनसे कहा—'प्रजापते! भगवान् शंकरने तुम्हारी पुत्रीको प्राप्त करनेके लिये निश्चय ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है; इस विषयमें जो श्रेष्ठ कृत्य हो, उसका निश्चय करो। जैसे सतीने नाना प्रकारके भावोंसे तथा सात्त्विक व्रतके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की है, उसी तरह वे भी सतीकी आराधना करते हैं। इसलिये दक्ष! भगवान् शिवके लिये ही संकल्पित एवं प्रकट हुई अपनी इस पुत्रीको तुम अविलम्ब उनकी
१८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सेवामें सौंप दो, इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगे। मैं नारदके साथ जाकर उन्हें तुम्हारे घर ले आऊँगा। फिर तुम उन्हींके लिये उत्पन्न हुई अपनी यह पुत्री उनके हाथमें दे दो।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेरी यह बात सुनकर मेरे पुत्र दक्षको बड़ा हर्ष हुआ। वे अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—'पिताजी! ऐसा ही होगा।' मुने ! तब मैं अत्यन्त हर्षित हो वहाँसे उस स्थानको लौटा, जहाँ लोक-कल्याणमें तत्पर रहनेवाले भगवान् शिव बड़ी उत्सुकतासे मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। नारद ! मेरे लौट आनेपर स्त्री और पुत्रीसहित प्रजापति दक्ष भी पूर्णकाम हो गये। वे इतने संतुष्ट हुए, मानो अमृत पीकर अघा गये हों।
(अध्याय १७)
ब्रह्माजीसे दक्षकी अनुमति पाकर देवताओं और मुनियोंसहित भगवान् शिवका दक्षके घर जाना, दक्षद्वारा सबका सत्कार तथा सती और शिवका विवाह
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर मैं हिमालयके कैलास-शिखरपर रहनेवाले परमेश्वर महादेव शिवको लानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक उनके पास गया और उनसे इस प्रकार बोला—'वृषभध्वज ! सतीके लिये मेरे पुत्र दक्षने जो बात कही है, उसे सुनिये और जिस कार्यको वे अपने लिये असाध्य मानते थे, उसे सिद्ध हुआ ही समझिये। दक्षने कहा है कि 'मैं अपनी पुत्री भगवान् शिवके ही हाथमें दूँगा; क्योंकि उन्हींके लिये यह उत्पन्न हुई है। शिवके साथ सतीका विवाह हो यह कार्य तो मुझे स्वतः ही अभीष्ट है; फिर आपके भी कहनेसे इसका महत्त्व और अधिक बढ़ गया। मेरी पुत्रीने स्वयं इसी उद्देश्यसे भगवान् शिवकी आराधना की है और इस समय शिवजी भी मुझसे इसीके विषयमें अन्वेषण (पूछताछ) कर रहे हैं; इसलिये मुझे अपनी कन्या अवश्य ही भगवान् शिवके हाथमें देनी है। विधातः! वे भगवान् शंकर शुभ लग्न और शुभ मुहूर्तमें यहाँ पधारें। उस समय मैं उन्हें शिक्षाके तौरपर अपनी यह पुत्री दे दूँगा।' वृषभध्वज! मुझसे दक्षने ऐसी बात कही है। अतः आप शुभ मुहूर्तमें उनके घर चलिये और सतीको ले आइये।'
मुने! मेरी यह बात सुनकर भक्त-वत्सल रुद्र लौकिक गतिका आश्रय ले
* रुद्रसंहिता * १८९
हँसते हुए मुझसे बोले—‘संसारकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्माजी! मैं तुम्हारे और नारदके साथ ही दक्षके घर चलूँगा! अतः नारदका स्मरण करो। अपने मरीचि आदि मानसपुत्रोंको भी बुला लो। विधे! मैं उन सबके साथ दक्षके निवासस्थानपर चलूँगा। मेरे पार्षद भी मेरे साथ रहेंगे।’
नारद! लोकाचारके निर्वाहमें लगे हुए भगवान् शिवके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैंने तुम्हारा और मरीचि आदि पुत्रोंका भी स्मरण किया। मेरे याद करते ही तुम्हारे साथ मेरे सभी मानस-पुत्र मनमें आदरकी भावना लिये शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे। उस समय तुम सब लोग हर्षसे उत्फुल्ल हो रहे थे। फिर रुद्रके स्मरण करनेपर शिवभक्तोंके सम्राट् भगवान् विष्णु भी अपने सैनिकों तथा कमलादेवीके साथ गरुड़पर आरूढ़ हो तुरंत वहाँ आ गये। तदनन्तर चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिमें रविवारको पूर्वा-फाल्गुनी नक्षत्रमें मुझ ब्रह्मा और विष्णु आदि समस्त देवताओंके साथ महेश्वरने विवाहके लिये यात्रा की। मार्गमें उन देवताओं और ऋषियोंके साथ यात्रा करते हुए भगवान् शंकर बड़ी शोभा पा रहे थे। वहाँ जाते हुए देवताओं, मुनियों तथा आनन्दमग्न मनवाले प्रमथगणोंका रास्तेमें बड़ा उत्सव हो रहा था। भगवान् शिवकी इच्छासे वृषभ, व्याघ्र, सर्प, जटा और चन्द्रकला आदि सब-के-सब उनके लिये यथायोग्य आभूषण बन गये। तदनन्तर वेगसे चलनेवाले बलवान् बलीवर्द नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ हुए महादेवजी श्रीविष्णु आदि देवताओंको साथ लिये क्षणभरमें प्रसन्नतापूर्वक दक्षके घर जा पहुँचे।
वहाँ विनीतचित्तवाले प्रजापति दक्ष समस्त आत्मीय जनोंके साथ भगवान् शिवकी अगवानीके लिये उनके सामने आये। उस समय उनके समस्त अंगोंमें हर्षजनित रोमांच हो आया था। स्वयं दक्षने अपने द्वारपर आये हुए समस्त देवताओंका सत्कार किया। वे सब लोग सुरश्रेष्ठ शिवको बिठाकर उनके पार्श्वभागमें स्वयं भी मुनियोंके साथ क्रमशः बैठ गये। इसके बाद दक्षने मुनियोंसहित समस्त देवताओंकी परिक्रमा की और उन सबके साथ भगवान् शिवको घरके भीतर ले आये। उस समय दक्षके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। उन्होंने सर्वेश्वर शिवको उत्तम आसन देकर स्वयं ही विधिपूर्वक उनका पूजन किया। तत्पश्चात् श्रीविष्णुका, मेरा, ब्राह्मणोंका, देवताओंका और समस्त शिवगणोंका भी यथोचित विधिसे उत्तम भक्तिभावके साथ पूजन किया। इस तरह पूजनीय पुरुषों तथा अन्य लोगोंसहित उन सबका यथोचित आदर-सत्कार करके दक्षने मेरे मानस-पुत्र मरीचि आदि मुनियोंके साथ आवश्यक सलाह की। इसके बाद मेरे पुत्र दक्षने मुझ पितासे मेरे चरणोंमें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक कहा—‘प्रभो! आप ही वैवाहिक कार्य करायें।’
तब मैं भी हर्षभरे हृदयसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर उठा और वह सारा कार्य कराने लगा। तदनन्तर ग्रहोंके बलसे युक्त शुभ लग्न और मुहूर्तमें दक्षने हर्षपूर्वक अपनी पुत्री सतीका हाथ भगवान् शंकरके हाथमें दे दिया। उस समय हर्षसे भरे हुए भगवान् वृषभध्वजने भी वैवाहिक विधिसे सुन्दरी दक्षकन्याका पाणिग्रहण किया। फिर मैंने, श्रीहरिने, तुम तथा अन्य मुनियोंने, देवताओं
१९० * संक्षिप्त शिवपुराण *
और प्रमथगणोंने भगवान् शिवको प्रणाम किया और सबने नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा उन्हें संतुष्ट किया। उस समय नाच-गानके साथ महान् उत्सव मनाया गया। समस्त देवताओं और मुनियोंको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। भगवान् शिवके लिये कन्यादान करके मेरे पुत्र दक्ष कृतार्थ हो गये। शिवा और शिव प्रसन्न हुए तथा सारा संसार मंगलका निकेतन बन गया। (अध्याय १८)
~~०~~
सती और शिवके द्वारा अग्निकी परिक्रमा, श्रीहरिद्वारा शिवतत्त्वका वर्णन, शिवका ब्रह्माजीको दिये हुए वरके अनुसार वेदीपर सदाके लिये अवस्थान तथा शिव और सतीका विदा हो कैलासपर जाना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! कन्यादान करके दक्षने भगवान् शंकरको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दहेजमें दीं। यह सब करके वे बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने ब्राह्मणोंको भी नाना प्रकारके धन बाँटे। तत्पश्चात् लक्ष्मी-सहित भगवान् विष्णु शम्भुके पास आ हाथ जोड़कर खड़े हुए और यों बोले—'देवदेव महादेव! दयासागर! प्रभो! तात! आप सम्पूर्ण जगत्के पिता हैं और सती देवी सबकी माता हैं। आप दोनों सत्पुरुषोंके कल्याण तथा दुष्टोंके दमनके लिये सदा लीलापूर्वक अवतार ग्रहण करते हैं—यह सनातन श्रुतिका कथन है। आप चिकने नील अंजनके समान शोभावाली सतीके साथ जिस प्रकार शोभा पा रहे हैं, मैं उससे उलटे लक्ष्मीके साथ शोभा पा रहा हूँ—अर्थात् सती नीलवर्णा तथा आप गौरवर्ण हैं, उससे उलटे मैं नीलवर्ण तथा लक्ष्मी गौरवर्णा हैं।'
नारद! मैं देवी सतीके पास आकर गृह्यसूत्रोक्त विधिसे विस्तारपूर्वक सारा अग्निकार्य कराने लगा। मुझ आचार्य तथा ब्राह्मणोंकी आज्ञासे शिवा और शिवने बड़े हर्षके साथ विधिपूर्वक अग्निकी परिक्रमा की। उस समय वहाँ बड़ा अद्भुत उत्सव मनाया गया। गाजे, बाजे और नृत्यके साथ होनेवाला वह उत्सव सबको बड़ा सुखद जान पड़ा।
तदनन्तर भगवान् विष्णु बोले—सदाशिव! मैं आपकी आज्ञासे यहाँ शिवतत्त्वका वर्णन करता हूँ। समस्त देवता तथा दूसरे-दूसरे मुनि अपने मनको एकाग्र करके इस विषयको सुनें। भगवन्! आप प्रधान और अप्रधान (प्रकृति और उससे अतीत) हैं। आपके अनेक भाग हैं। फिर भी आप भागरहित हैं। ज्योतिर्मय स्वरूपवाले आप परमेश्वरके ही हम तीनों देवता अंश हैं। आप कौन, मैं कौन और ब्रह्मा कौन हैं? आप परमात्माके ही ये तीन अंश हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेके कारण एक-दूसरेसे भिन्न प्रतीत होते हैं। आप अपने स्वरूपका चिन्तन कीजिये। आपने स्वयं ही लीलापूर्वक शरीर धारण किया है। आप निर्गुण ब्रह्मरूपसे एक हैं। आप ही सगुण ब्रह्म हैं और हम ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र—तीनों आपके अंश हैं। जैसे एक
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ही शरीरके भिन्न-भिन्न अवयव मस्तक, ग्रीवा आदि नाम धारण करते हैं तथापि उस शरीरसे वे भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार हम तीनों अंश आप परमेश्वरके ही अंग हैं। जो ज्योतिर्मय, आकाशके समान सर्वव्यापी एवं निर्लेप, स्वयं ही अपना धाम, पुराण, कूटस्थ, अव्यक्त, अनन्त, नित्य तथा दीर्घ आदि विशेषणोंसे रहित निर्विशेष ब्रह्म है, वही आप शिव हैं, अतः आप ही सब कुछ हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर! भगवान् विष्णुकी यह बात सुनकर महादेवजी बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर उस विवाह-यज्ञके स्वामी (यजमान) परमेश्वर शिव प्रसन्न हो लौकिकी गतिका आश्रय ले हाथ जोड़कर खड़े हुए मुझ ब्रह्मासे प्रेमपूर्वक बोले।
शिवने कहा—ब्रह्मन्! आपने सारा वैवाहिक कार्य अच्छी तरह सम्पन्न करा दिया। अब मैं प्रसन्न हूँ। आप मेरे आचार्य हैं। बताइये, आपको क्या दक्षिणा दूँ! सुरज्येष्ठ! आप उस दक्षिणाको माँगिये। महाभाग! यदि वह अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी उसे शीघ्र कहिये। मुझे आपके लिये कुछ भी अदेय नहीं है।
मुने! भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर मैं हाथ जोड़ विनीत चित्तसे उन्हें बारंबार प्रणाम करके बोला—‘देवेश! यदि आप प्रसन्न हों और महेश्वर! यदि मैं वर पानेके योग्य होऊँ तो प्रसन्नतापूर्वक जो बात कहता हूँ, उसे आप पूर्ण कीजिये। महादेव! आप इसी रूपमें इसी वेदीपर सदा विराजमान रहें, जिससे आपके दर्शनसे मनुष्योंके पाप धुल जायँ। चन्द्रशेखर! आपका सांनिध्य होनेसे मैं इस वेदीके समीप आश्रम बनाकर तपस्या करूँ—यह मेरी अभिलाषा है। चैत्रके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें रविवारके दिन इस भूतलपर जो मनुष्य भक्तिभावसे आपका दर्शन करे, उसके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जायँ, विपुल पुण्यकी वृद्धि हो और समस्त रोगोंका सर्वथा नाश हो जाय। जो नारी दुर्भागा, वन्ध्या, कानी अथवा रूपहीना हो, वह भी आपके दर्शनमात्रसे ही अवश्य निर्दोष हो जाय।'
मेरी यह बात उनकी आत्माको सुख देनेवाली थी। इसे सुनकर भगवान् शिवने प्रसन्नचित्तसे कहा—'विधातः! ऐसा ही होगा। मैं तुम्हारे कहनेसे सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये अपनी पत्नी सतीके साथ इस वेदीपर सुस्थिरभावसे स्थित रहूँगा।'
ऐसा कहकर पत्नीसहित भगवान् शिव अपनी अंशरूपिणी मूर्तिको प्रकट करके वेदीके मध्यभागमें विराजमान हो गये।
तत्पश्चात् स्वजनोंपर स्नेह रखनेवाले परमेश्वर शंकर दक्षसे विदा ले अपनी पत्नी सतीके साथ कैलास जानेको उद्यत हुए। उस समय उत्तम बुद्धिवाले दक्षने विनयसे मस्तक झुका हाथ जोड़ भगवान् वृषभध्वजकी प्रेम-
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पूर्वक स्तुति की। फिर श्रीविष्णु आदि समस्त देवताओं, मुनियों और शिवगणोंने नमस्कारपूर्वक नाना प्रकारकी स्तुति करके बड़े आनन्दसे जय-जयकार किया। तदनन्तर दक्षकी आज्ञासे भगवान् शिवने प्रसन्नतापूर्वक सतीको वृषभकी पीठपर बिठाया और स्वयं भी उसपर आरूढ़ हो वे प्रभु हिमालय पर्वतकी ओर चले। भगवान् शंकरके समीप वृषभपर बैठी हुई सुन्दर दाँत और मनोहर हासवाली सती अपने नील-श्यामवर्णके कारण चन्द्रमामें नीली रेखाके समान शोभा पा रही थीं। उस समय उन नवदम्पतिकी शोभा देख श्रीविष्णु आदि समस्त देवता, मरीचि आदि महर्षि तथा दूसरे लोग ठगे-से रह गये। हिल-डुल भी न सके तथा दक्ष भी मोहित हो गये। तत्पश्चात् कोई बाजे बजाने लगे और दूसरे लोग मधुर स्वरसे गीत गाने लगे। कितने ही लोग प्रसन्नतापूर्वक शिवके कल्याणमय उज्ज्वल यशका गान करते हुए उनके पीछे-पीछे चले। भगवान् शंकरने बीच रास्तेसे दक्षको प्रसन्नतापूर्वक लौटा दिया और स्वयं प्रेमाकुल हो प्रमथगणोंके साथ अपने धामको जा पहुँचे। यद्यपि भगवान् शिवने विष्णु आदि देवताओंको भी विदा कर दिया था, तो भी वे बड़ी प्रसन्नता और भक्तिके साथ पुनः उनके साथ हो लिये। उन सब देवताओं, प्रमथगणों तथा अपनी पत्नी सतीके साथ हर्षभरे शम्भु हिमालय पर्वतसे सुशोभित अपने कैलासधाममें जा पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने देवताओं, मुनियों तथा दूसरे लोगोंका बहुत आदर-सम्मान करके उन्हें प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। शम्भुकी आज्ञा ले वे विष्णु आदि सब देवता तथा मुनि नमस्कार और स्तुति करके मुखपर प्रसन्नताकी छाप लिये अपने-अपने धामको चले गये। सदाशिवका चिन्तन करनेवाले भगवान् शिव भी अत्यन्त आनन्दित हो हिमालयके शिखरपर रहकर अपनी पत्नी दक्षकन्या सतीके साथ विहार करने लगे।
सूतजी कहते हैं—मुनियो! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें भगवान् शंकर और सतीका जिस प्रकार विवाह हुआ, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह दिया। जो विवाहकालमें, यज्ञमें अथवा किसी भी शुभ कार्यके आरम्भमें भगवान् शंकरकी पूजा करके शान्तचित्तसे इस कथाको सुनता है, उसका सारा कर्म तथा वैवाहिक आयोजन बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण होता है और दूसरे शुभ कर्म भी सदा निर्विघ्न पूर्ण होते हैं। इस शुभ उपाख्यानको प्रेमपूर्वक सुनकर विवाहित होनेवाली कन्या भी सुख, सौभाग्य, सुशीलता और सदाचार आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न साध्वी स्त्री तथा पुत्रवती होती है।
(अध्याय १९-२०)
सतीका प्रश्न तथा उसके उत्तरमें भगवान् शिवद्वारा ज्ञान एवं नवधा भक्तिके स्वरूपका विवेचन
कैलास तथा हिमालय पर्वतपर श्रीशिव और सतीके विविध विहारोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके पश्चात् ब्रह्माजीने कहा—मुने! एक दिनकी बात है, देवी सती एकान्तमें
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भगवान् शंकरसे मिलीं और उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं। प्रभु शंकरको पूर्ण प्रसन्न जान नमस्कार करके विनीतभावसे खड़ी हुई दक्षकुमारी सती भक्तिभावसे अंजलि बाँधे बोलीं।
सतीने कहा—देवदेव महादेव! करुणासागर! प्रभो! दीनोद्धारपरायण! महायोगिन्! मुझपर कृपा कीजिये। आप परम पुरुष हैं। सबके स्वामी हैं। रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणसे परे हैं। निर्गुण भी हैं, सगुण भी हैं। सबके साक्षी, निर्विकार और महाप्रभु हैं। हर! मैं धन्य हूँ, जो आपकी कामिनी और आपके साथ सुन्दर विहार करनेवाली आपकी प्रिया हुई। स्वामिन्! आप अपनी भक्तवत्सलतासे ही प्रेरित होकर मेरे पति हुए हैं। नाथ! मैंने बहुत वर्षोंतक आपके साथ विहार किया है। महेशान! इससे मैं बहुत संतुष्ट हुई हूँ और अब मेरा मन उधरसे हट गया है। देवेश्वर हर! अब तो मैं उस परम तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना चाहती हूँ, जो निरतिशय सुख प्रदान करनेवाला है तथा जिसके द्वारा जीव संसार-दुःखसे अनायास ही उद्धार पा सकता है। नाथ! जिस कर्मका अनुष्ठान करके विषयी जीव भी परम पदको प्राप्त कर ले और संसारबन्धनमें न बँधे, उसे आप बताइये, मुझपर कृपा कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार आदिशक्ति महेश्वरी सतीने केवल जीवोंके उद्धारके लिये जब उत्तम भक्तिभावके साथ भगवान् शंकरसे प्रश्न किया, तब उनके उस प्रश्नको सुनकर स्वेच्छासे शरीर धारण करनेवाले तथा योगके द्वारा भोगसे विरक्त चित्तवाले स्वामी शिवने अत्यन्त प्रसन्न होकर सतीसे इस प्रकार कहा।
शिव बोले—देवि! दक्षनन्दिनि! महेश्वरि! सुनो; मैं उसी परमतत्त्वका वर्णन करता हूँ, जिससे वासनाबद्ध जीव तत्काल मुक्त हो सकता है। परमेश्वरि! तुम विज्ञानको परमतत्त्व जानो। विज्ञान वह है, जिसके उदय होनेपर 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाता है, ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुका स्मरण नहीं रहता तथा उस विज्ञानी पुरुषकी बुद्धि सर्वथा शुद्ध हो जाती है। प्रिये! वह विज्ञान दुर्लभ है। इस त्रिलोकीमें उसका ज्ञाता कोई विरला ही होता है। वह जो और जैसा भी है, सदा मेरा स्वरूप ही है, साक्षात्परातत्पर ब्रह्म है। उस विज्ञानकी माता है मेरी भक्ति, जो भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाली है। वह मेरी कृपासे सुलभ होती है। भक्ति नौ प्रकारकी बतायी गयी है। सती! भक्ति और ज्ञानमें कोई भेद नहीं है। भक्त और ज्ञानी दोनोंको ही सदा सुख प्राप्त होता है। जो भक्तिका विरोधी है, उसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं ही होती। देवि! मैं सदा भक्तके अधीन रहता हूँ और भक्तिके प्रभावसे जातिहीन नीच मनुष्योंके घरोंमें भी चला जाता हूँ, इसमें संशय नहीं है।* सती! वह भक्ति दो प्रकारकी है—
* भक्तौ ज्ञाने न भेदो हि तत्कर्तुः सर्वदा सुखम्। विज्ञानं न भवत्येव सति भक्तिविरोधिनः॥
भक्ताधीनः सदाहं वै तत्प्रभावाद् गृहेष्वपि। नीचानां जातिहीनानां यामि देवि न संशयः॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० २३। १६-१७)
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