शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* रुद्रसंहिता * २६१
वर्णन किया है कि आप दीनवत्सल हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरा जीवन सफल हुआ और आज मेरा सब कुछ सफल हो गया; क्योंकि आपने यहाँ पदार्पण करनेका कष्ट उठाया है। महेश्वर! आप मुझे अपना दास समझकर शान्तभावसे मुझे सेवाके लिये आज्ञा दीजिये। मैं बड़ी प्रसन्नतासे अनन्यचित्त होकर आपकी सेवा करूँगा।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! गिरिराजका यह वचन सुनकर महेश्वरने किंचित् आँखें खोलीं और सेवकोंसहित हिमवान्को देखा। सेवकोंसहित गिरिराजको उपस्थित देख ध्यानयोगमें स्थित हुए जगदीश्वर वृषभध्वजने मुसकराते हुए-से कहा।
महेश्वर बोले—शैलराज! मैं तुम्हारे शिखरपर एकान्तमें तपस्या करनेके लिये आया हूँ। तुम ऐसा प्रबन्ध करो, जिससे कोई भी मेरे निकट न आ सके। तुम महात्मा हो, तपस्याके धाम हो तथा मुनियों, देवताओं, राक्षसों और अन्य महात्माओंको भी सदा आश्रय देनेवाले हो। द्विज आदिका तुम्हारे ऊपर सदा ही निवास रहता है। तुम गंगासे अभिषिक्त होकर सदाके लिये पवित्र हो गये हो। दूसरोंका उपकार करनेवाले तथा सम्पूर्ण पर्वतोंके सामर्थ्यशाली राजा हो। गिरिराज! मैं यहाँ गंगावतरण-स्थलमें तुम्हारे आश्रित होकर आत्मसंयमपूर्वक बड़ी प्रसन्नताके साथ तपस्या करूँगा। शैलराज! गिरिश्रेष्ठ! जिस साधनसे यहाँ मेरी तपस्या बिना किसी विघ्न-बाधाके चालू रह सके, उसे इस समय प्रयत्नपूर्वक करो। पर्वतप्रवर! मेरी यही सबसे बड़ी सेवा है। तुम अपने घर जाओ और मैंने जो कुछ कहा है, उसका उत्तम प्रीतिसे यत्नपूर्वक प्रबन्ध करो।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर सृष्टिकर्ता जगदीश्वर भगवान् शम्भु चुप हो गये। उस समय गिरिराजने शम्भुसे प्रेमपूर्वक यह बात कही—'जगन्नाथ! परमेश्वर! आज मैंने अपने प्रदेशमें स्थित हुए आपका स्वागतपूर्वक पूजन किया है, यही मेरे लिये महान् सौभाग्यकी बात है। अब आपसे और क्या प्रार्थना करूँ। महेश्वर! कितने ही देवता बड़े-बड़े यत्नका आश्रय ले महान् तप करके भी आपको नहीं पाते। वे ही आप यहाँ स्वयं उपस्थित हो गये। मुझसे बढ़कर श्रेष्ठ सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि आप मेरे पृष्ठभागपर तपस्याके लिये उपस्थित हुए हैं। परमेश्वर! आज मैं अपनेको देवराज इन्द्रसे भी अधिक भाग्यवान् मानता हूँ; क्योंकि सेवकोंसहित आपने यहाँ आकर मुझे अनुग्रहका भागी बना दिया। देवेश! आप स्वतन्त्र हैं। यहाँ बिना किसी विघ्न-बाधाके उत्तम तपस्या कीजिये। प्रभो! मैं आपका दास हूँ। अतः सदा आपकी आज्ञाके अनुसार सेवा करूँगा।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर गिरिराज हिमालय तुरंत अपने घरको लौट आये। उन्होंने अपनी प्रिया मेनाको बड़े आदरसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तत्पश्चात् शैलराजने साथ जानेवाले परिजनों तथा समस्त सेवकगणोंको बुलाकर उन्हें ठीक-ठीक समझाया।
हिमालय बोले—आजसे कोई भी
२६२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
गंगावतरण नामक स्थानमें, जो मेरे पृष्ठ-भागमें ही है, मेरी आज्ञा मानकर न जाय। यह मैं सच्ची बात कहता हूँ। यदि कोई वहाँ जायगा तो उस महादुष्टको मैं विशेष दण्ड दूँगा। मुने! इस प्रकार अपने समस्त गणोंको शीघ्र ही नियन्त्रित करके हिमवान्ने विघ्ननिवारणके लिये जो सुन्दर प्रयत्न किया, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो। (अध्याय ११)
हिमवान्का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना और शिवका कारण बताते हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तदनन्तर शैलराज हिमालय उत्तम फल-फूल लेकर अपनी पुत्रीके साथ हर्षपूर्वक भगवान् हरके समीप गये। वहाँ जाकर उन्होंने ध्यान-परायण त्रिलोकीनाथ शिवको प्रणाम किया और अपनी अद्भुत कन्या कालीको हृदयसे उनकी सेवामें अर्पित कर दिया। फल-फूल आदि सारी सामग्री उनके सामने रखकर पुत्रीको आगे करके शैलराजने शम्भुसे कहा—'भगवन्! मेरी पुत्री आप भगवान् चन्द्रशेखरकी सेवा करनेके लिये उत्सुक है। अतः आपके आराधनकी इच्छासे मैं इसको साथ लाया हूँ। यह अपनी दो सखियोंके साथ सदा आप शंकरकी ही सेवामें रहे। नाथ! यदि आपका मुझपर अनुग्रह है तो इस कन्याको सेवाके लिये आज्ञा दीजिये।'
तब भगवान् शंकरने उस परम मनोहर कामरूपिणी कन्याको देखकर आँखें मूँद लीं और अपने त्रिगुणातीत, अविनाशी, परमतत्त्वमय उत्तम रूपका ध्यान आरम्भ किया। उस समय सर्वेश्वर एवं सर्वव्यापी जटाजूटधारी वेदान्तवेद्य चन्द्रकलाविभूषण शम्भु उत्तम आसनपर बैठकर नेत्र बंद किये तप (ध्यान)-में ही लग गये। यह देख हिमाचलने मस्तक झुकाकर पुनः उनके चरणोंमें प्रणाम किया। यद्यपि उनके हृदयमें दीनता नहीं थी, तो भी वे उस समय इस संशयमें पड़ गये कि न जाने भगवान् मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे या नहीं। वक्ताओंमें श्रेष्ठ गिरिराज हिमवान्ने जगत्के एकमात्र बन्धु भगवान् शिवसे इस प्रकार कहा।
हिमालय बोले—देवदेव! महादेव! करुणाकर! शंकर! विभो! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आँखें खोलकर मेरी ओर देखिये। शिव! शर्व! महेशान! जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले प्रभो! महादेव! आप सम्पूर्ण आपत्तियोंका निवारण करनेवाले हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। स्वामिन्! प्रभो! मैं अपनी इस पुत्रीके साथ प्रतिदिन आपका दर्शन करनेके लिये आऊँगा। इसके लिये आदेश दीजिये।
उनकी यह बात सुनकर देवदेव महेश्वरने आँखें खोलकर ध्यान छोड़ दिया और कुछ सोच-विचारकर कहा।
महेश्वर बोले—गिरिराज! तुम अपनी इस कुमारी कन्याको घरमें रखकर ही नित्य मेरे दर्शनको आ सकते हो, अन्यथा मेरा दर्शन नहीं हो सकता।
महेश्वरकी ऐसी बात सुनकर शिवाके पिता हिमवान् मस्तक झुकाकर उन भगवान् शिवसे बोले—'प्रभो! यह तो बताइये, किस कारणसे मैं इस कन्याके साथ आपके
* रुद्रसंहिता * २६३
दर्शनके लिये नहीं आ सकता। क्या यह आपकी सेवाके योग्य नहीं है? फिर इसे नहीं लानेका क्या कारण है, यह मेरी समझमें नहीं आता।'
यह सुनकर भगवान् वृषभध्वज शम्भु हँसने लगे और विशेषतः दुष्ट योगियोंको लोकाचारका दर्शन कराते हुए वे हिमालयसे बोले—'शैलराज! यह कुमारी सुन्दर कटिप्रदेशसे सुशोभित, तन्वंगी, चन्द्रमुखी और शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न है। इसलिये इसे मेरे समीप तुम्हें नहीं लाना चाहिये। इसके लिये मैं तुम्हें बारंबार रोकता हूँ। वेदके पारंगत विद्वानोंने नारीको मायारूपिणी कहा है। विशेषतः युवती स्त्री तो तपस्वीजनोंके तपमें विघ्न डालनेवाली ही होती है। गिरिश्रेष्ठ! मैं तपस्वी, योगी और सदा मायासे निर्लिप्त रहनेवाला हूँ। मुझे युवती स्त्रीसे क्या प्रयोजन है। तपस्वियोंके श्रेष्ठ आश्रय हिमालय! इसलिये फिर तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये, क्योंकि तुम वेदोक्त धर्ममें प्रवीण, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और विद्वान् हो। अचलराज! स्त्रीके संगसे मनमें शीघ्र ही विषयवासना उत्पन्न हो जाती है। उससे वैराग्य नष्ट होता है और वैराग्य न होनेसे पुरुष उत्तम तपस्यासे भ्रष्ट हो जाता है। इसलिये शैल! तपस्वीको स्त्रियोंका संग नहीं करना चाहिये; क्योंकि स्त्री महाविषय-वासनाकी जड़ एवं ज्ञान-वैराग्यका विनाश करनेवाली होती है।'*
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस तरहकी बहुत-सी बातें कहकर महायोगिशिरोमणि भगवान् महेश्वर चुप हो गये। देवर्षे! शम्भुका यह निरामय, निःस्पृह और निष्ठुर वचन सुनकर कालीके पिता हिमवान् चकित, कुछ-कुछ व्याकुल और चुप हो गये। तपस्वी शिवकी कही हुई बात सुनकर और गिरिराज हिमवान्को चकित हुआ जानकर भवानी पार्वती उस समय भगवान् शिवको प्रणाम करके विशद वचन बोलीं।
(अध्याय १२)
* भवत्यचल तत्सङ्गाद् विषयोत्पत्तिराशु वै। विनश्यति च वैराग्यं ततो भ्रश्यति सत्तपः ॥
अतस्तपस्विना शैल न कार्या स्त्रीषु संगतिः। महाविषयमूलं सा ज्ञानवैराग्यनाशिनी ॥
(शि० पु० रू० सं० पा० खं० १२। ३१-३२)
२६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पार्वती और शिवका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना तथा पार्वतीद्वारा भगवान्की प्रतिदिन सेवा
भवानीने कहा—योगिन्! आपने तपस्वी होकर गिरिराजसे यह क्या बात कह डाली? प्रभो! आप ज्ञानविशारद हैं, तो भी अपनी बातका उत्तर मुझसे सुनिये। शम्भो! आप तपःशक्तिसे सम्पन्न होकर ही बड़ा भारी तप करते हैं। उस शक्तिके कारण ही आप महात्माको तपस्या करनेका विचार हुआ है। सभी कर्मोंको करनेकी जो वह शक्ति है, उसे ही प्रकृति जानना चाहिये। प्रकृतिसे ही सबकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं। भगवन्! आप कौन हैं? और सूक्ष्म प्रकृति क्या है? इसका विचार कीजिये। प्रकृतिके बिना लिंगरूपी महेश्वर कैसे हो सकते हैं? आप सदा प्राणियोंके लिये जो अर्चनीय, वन्दनीय और चिन्तनीय हैं, वह प्रकृतिके ही कारण हैं। इस बातको हृदयसे विचारकर ही आपको जो कहना हो, वह सब कहिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पार्वतीजीके इस वचनको सुनकर महती लीला करनेमें लगे हुए प्रसन्नचित्त महेश्वर हँसते हुए बोले।
महेश्वरने कहा—मैं उत्कृष्ट तपस्याद्वारा ही प्रकृतिका नाश करता हूँ और तत्त्वतः प्रकृतिरहित शम्भुके रूपमें स्थित होता हूँ। अतः सत्पुरुषोंको कभी या कहीं प्रकृतिका संग्रह नहीं करना चाहिये। लोकाचारसे दूर एवं निर्विकार रहना चाहिये।
नारद! जब शम्भुने लौकिक व्यवहारके अनुसार यह बात कही, तब काली मन-ही-मन हँसकर मधुर वाणीमें बोलीं।
कालीने कहा—कल्याणकारी प्रभो! योगिन्! आपने जो बात कही है, क्या वह वाणी प्रकृति नहीं है? फिर आप उससे परे क्यों नहीं हो गये? (क्यों प्रकृतिका सहारा लेकर बोलने लगे?) इन सब बातोंको विचार करके तात्त्विक दृष्टिसे जो यथार्थ बात हो, उसीको कहना चाहिये। यह सब कुछ सदा प्रकृतिसे बँधा हुआ है। इसलिये आपको न तो बोलना चाहिये और न कुछ करना ही चाहिये; क्योंकि कहना और करना—सब व्यवहार प्राकृत ही है। आप अपनी बुद्धिसे इसको समझिये। आप जो कुछ सुनते, खाते, देखते और करते हैं, वह सब प्रकृतिका ही कार्य है। झूठे वाद-विवाद करना व्यर्थ है। प्रभो! शम्भो! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं तो इस समय इस हिमवान् पर्वतपर आप तपस्या किसलिये करते हैं? हर! प्रकृतिने आपको निगल लिया है। अतः आप अपने स्वरूपको नहीं जानते। ईश! आप यदि अपने स्वरूपको जानते हैं तो किसलिये तप करते हैं? योगिन्! मुझे आपके साथ वाद-विवाद करनेकी क्या आवश्यकता है? प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध होनेपर विद्वान् पुरुष अनुमान प्रमाणको नहीं मानते। जो कुछ प्राणियोंकी इन्द्रियोंका विषय होता है, वह सब ज्ञानी पुरुषोंको बुद्धिसे विचारकर प्राकृत ही मानना चाहिये। योगीश्वर! बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरी उत्तम बात सुनिये। मैं प्रकृति हूँ। आप पुरुष हैं। यह सत्य है, सत्य है। इसमें संशय नहीं है। मेरे अनुग्रहसे ही
- रुद्रसंहिता * २६५
आप सगुण और साकार माने गये हैं। मेरे बिना तो आप निरीह हैं। कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप जितेन्द्रिय होनेपर भी प्रकृतिके अधीन हो सदा नाना प्रकारके कर्म करते रहते हैं। फिर निर्विकार कैसे हैं? और मुझसे लिप्त कैसे नहीं? शंकर! यदि आप प्रकृतिसे परे हैं और यदि आपका यह कथन सत्य है तो आपको मेरे समीप रहनेपर भी डरना नहीं चाहिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—पार्वतीका यह सांख्य-शास्त्रके अनुसार कहा हुआ वचन सुनकर भगवान् शिव वेदान्तमतमें स्थित हो उनसे यों बोले।
श्रीशिवने कहा—सुन्दर भाषण करनेवाली गिरिजें! यदि तुम सांख्य-मतको धारण करके ऐसी बात कहती हो तो प्रतिदिन मेरी सेवा करो; परंतु वह सेवा शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये।
गिरिजासे ऐसा कहकर भक्तोंपर अनुग्रह और उनका मनोरंजन करनेवाले भगवान् शिव हिमवान्से बोले।
शिवने कहा—गिरिराज! मैं यहीं तुम्हारे अत्यन्त रमणीय श्रेष्ठ शिखरकी भूमिपर उत्तम तपस्या तथा अपने आनन्दमय परमार्थस्वरूपका विचार करता हुआ विचरूँगा। पर्वतराज! आप मुझे यहाँ तपस्या करनेकी अनुमति दें। आपकी अनुज्ञाके बिना कोई तप नहीं किया जा सकता।
देवाधिदेव शूलधारी भगवान् शिवका यह कथन सुनकर हिमवान्ने उन्हें प्रणाम करके कहा—'महादेव! देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत् तो आपका ही है। मैं तुच्छ होकर आपसे क्या कहूँ?'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! गिरिराज हिमवान्के ऐसा कहनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शंकर हँस पड़े और आदरपूर्वक उनसे बोले—'अब तुम जाओ।' शंकरकी आज्ञा पाकर हिमवान् अपने घर लौट गये। वे गिरिजाके साथ प्रतिदिन उनके दर्शनके लिये आते थे। काली अपने पिताके बिना भी दोनों सखियोंके साथ नित्य शंकरजीके पास जातीं और भक्तिपूर्वक उनकी सेवामें लगी रहतीं। नन्दीश्वर आदि कोई भी गण उन्हें रोकता नहीं था। तात! महेश्वरके आदेशसे ही ऐसा होता था। प्रत्येक गण पवित्रतापूर्वक रहकर उनकी आज्ञाका पालन करता था। जो विचार करनेसे परस्पर अभिन्न सिद्ध होते हैं, उन्हीं शिवा और शिवने सांख्य और वेदान्त-मतमें स्थित हो जो कल्याणदायक संवाद किया, वह सर्वदा सुख देनेवाला है। वह संवाद मैंने यहाँ कह सुनाया। इन्द्रियातीत भगवान् शंकरने गिरिराजके कहनेसे उनका गौरव मानकर उनकी पुत्रीको अपने पास रहकर सेवा करनेके लिये स्वीकार कर लिया।
काली अपनी दो सखियोंके साथ चन्द्रशेखर महादेवजीकी सेवाके लिये प्रतिदिन आती-जाती रहती थीं। वे भगवान् शंकरके चरण धोकर उस चरणामृतका पान करती थीं। आगसे तपाकर शुद्ध किये हुए वस्त्रसे (अथवा गरम जलसे धोये हुए वस्त्रके द्वारा) उनके शरीरका मार्जन करतीं, उसे मलती-पोंछती थीं। फिर सोलह उपचारोंसे विधिवत् हरकी पूजा करके बारंबार उनके चरणोंमें प्रणाम करनेके पश्चात् प्रतिदिन पिताके घर लौट जाती रहीं। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार
२६६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ध्यानपरायण शंकरकी सेवामें लगी हुई शिवाका महान् समय व्यतीत हो गया, तो भी वे अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर पूर्ववत् उनकी सेवा करती रहीं। महादेवजीने जब फिर उन्हें अपनी सेवामें नित्य तत्पर देखा, तब वे दयासे द्रवित हो उठे और इस प्रकार विचार करने लगे—'यह काली जब तपश्चर्याव्रत करेगी और इसमें गर्वका बीज नहीं रह जायगा, तभी मैं इसका पाणिग्रहण करूँगा।'
ऐसा विचार करके महालीला करनेवाले महायोगीश्वर भगवान् भूतनाथ तत्काल ध्यानमें स्थित हो गये। मुने! परमात्मा शिव जब ध्यानमें लग गये, तब उनके हृदयमें दूसरी कोई चिन्ता नहीं रह गयी। काली प्रतिदिन महात्मा शिवके रूपका निरन्तर चिन्तन करती हुई उत्तम भक्तिभावसे उनकी सेवामें लगी रही। ध्यानपरायण भगवान् हर शुद्धभावसे वहाँ रहती हुई कालीको नित्य देखते थे। फिर भी पूर्व चिन्ताको भुलाकर उन्हें देखते हुए भी नहीं देखते थे।
इसी बीचमें इन्द्र आदि देवताओं तथा मुनियोंने ब्रह्माजीकी आज्ञासे कामदेवको वहाँ आदरपूर्वक भेजा। वे कामकी प्रेरणासे कालीका रुद्रके साथ संयोग कराना चाहते थे। उनके ऐसा करनेमें कारण यह था कि महापराक्रमी तारकासुरसे वे बहुत पीड़ित थे (और शंकरजीसे किसी महान् बलवान् पुत्रकी उत्पत्ति चाहते थे)। कामदेवने वहाँ पहुँचकर अपने सब उपायोंका प्रयोग किया, परंतु महादेवजीके मनमें तनिक भी क्षोभ नहीं हुआ। उलटे उन्होंने कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया। मुने! तब सती पार्वतीने भी गर्वरहित हो उनकी आज्ञासे बहुत बड़ी तपस्या करके शिवको पतिरूपमें प्राप्त किया। फिर वे पार्वती और परमेश्वर परस्पर अत्यन्त प्रेमसे और प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। उन दोनोंने परोपकारमें तत्पर रहकर देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया।
(अध्याय १३)
तारकासुरके सताये हुए देवताओंका ब्रह्माजीको अपनी कष्टकथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन्हें पार्वतीके साथ शिवके विवाहके लिये उद्योग करनेका आदेश देना, ब्रह्माजीके समझानेसे तारकासुरका स्वर्गको छोड़ना और देवताओंका वहाँ रहकर लक्ष्यसिद्धिके लिये यत्नशील होना
सूतजी कहते हैं—तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर पार्वतीके विवाहके विस्तृत प्रसंगको उपस्थित करते हुए ब्रह्माजीने तारकासुरकी उत्पत्ति, उसके उग्र तप, मनोवांछित वरप्राप्ति तथा देवता और असुर—सबको जीतकर स्वयं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हो जानेकी कथा सुनायी।
तत्पश्चात् ब्रह्माजीने कहा—तारकासुर तीनों लोकोंको अपने वशमें करके जब स्वयं इन्द्र हो गया, तब उसके समान दूसरा कोई शासक नहीं रह गया। वह जितेन्द्रिय असुर त्रिभुवनका एकमात्र स्वामी होकर अद्भुत ढंगसे राज्यका संचालन करने लगा। उसने समस्त देवताओंको निकालकर उनकी जगह
* रुद्रसंहिता *
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दैत्योंको स्थापित कर दिया और विद्याधर आदि देवयोनियोंको स्वयं अपने कर्ममें लगाया। मुने! तदनन्तर तारकासुरके सताये हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता अत्यन्त व्याकुल और अनाथ होकर मेरी शरणमें आये। उन सबने मुझ प्रजापतिको प्रणाम करके बड़ी भक्तिसे मेरा स्तवन किया और अपने दारुण दुःखकी बातें बताकर कहा—'प्रभो! आप ही हमारी गति हैं। आप ही हमें कर्तव्यका उपदेश देनेवाले हैं और आप ही हमारे धाता एवं उद्धारक हैं। हम सब देवता तारकासुर नामक अग्निमें जलकर अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं। जैसे संनिपात रोगमें प्रबल औषधें भी निर्बल हो जाती हैं, उसी प्रकार उस असुरने हमारे सभी क्रूर उपायोंको बलहीन बना दिया है। भगवान् विष्णुके सुदर्शन-चक्रपर ही हमारी विजयकी आशा अवलम्बित रहती है। परंतु वह भी उसके कण्ठपर कुण्ठित हो गया। उसके गलेमें पड़कर वह ऐसा प्रतीत होने लगा था, मानो उस असुरको फूलकी माला पहनायी गयी हो।
मुने! देवताओंका यह कथन सुनकर मैंने उन सबसे समयोचित बात कही—'देवताओ! मेरे ही वरदानसे दैत्य तारकासुर इतना बढ़ गया है। अतः मेरे हाथों ही उसका वध होना उचित नहीं। जो जिससे पलकर बढ़ा हो, उसका उसीके द्वारा वध होना योग्य कार्य नहीं है। विषके वृक्षको भी यदि स्वयं सींचकर बड़ा किया गया हो तो उसे स्वयं काटना अनुचित माना गया है। तुमलोगोंका सारा कार्य करनेके योग्य भगवान् शंकर हैं। किंतु वे तुम्हारे कहनेपर भी स्वयं उस असुरका सामना नहीं कर सकते। तारक दैत्य स्वयं अपने पापसे नष्ट होगा। मैं जैसा उपदेश करता हूँ, तुम वैसा कार्य करो। मेरे वरके प्रभावसे न मैं तारकासुरका वध कर सकता हूँ, न भगवान् विष्णु कर सकते हैं और न भगवान् शंकर ही उसका वध कर सकते हैं। दूसरा कोई वीर पुरुष अथवा सारे देवता मिलकर भी उसे नहीं मार सकते, यह मैं सत्य कहता हूँ। देवताओ! यदि शिवजीके वीर्यसे कोई पुत्र उत्पन्न हो तो वही तारक दैत्यका वध कर सकता है, दूसरा नहीं। सुरश्रेष्ठगण! इसके लिये जो उपाय मैं बताता हूँ, उसे करो। महादेवजीकी कृपासे वह उपाय अवश्य सिद्ध होगा। पूर्वकालमें जिस दक्षकन्या सतीने दक्षके यज्ञमें अपने शरीरको त्याग दिया था, वही इस समय हिमालय-पत्नी मेनकाके गर्भसे उत्पन्न हुई है। यह बात तुम्हें भी विदित ही है। महादेवजी उस कन्याका पाणिग्रहण अवश्य करेंगे, तथापि देवताओ! तुम स्वयं भी इसके लिये प्रयत्न करो। तुम अपने यत्नसे ऐसा उद्योग करो, जिससे मेनकाकुमारी पार्वतीमें भगवान् शंकर अपने वीर्यका आधान कर सकें। भगवान् शंकर ऊर्ध्वरेता हैं (उनका वीर्य ऊपरकी ओर उठा हुआ है), उनके वीर्यको प्रस्खलित करनेमें केवल पार्वती ही समर्थ हैं। दूसरी कोई अबला अपनी शक्तिसे ऐसा नहीं कर सकती। गिरिराजकी पुत्री वे पार्वती इस समय युवावस्थामें प्रवेश कर चुकी हैं और हिमालयपर तपस्यामें लगे हुए महादेवजीकी प्रतिदिन सेवा करती हैं। अपने पिता हिमवान्के कहनेसे काली शिवा अपनी दो सखियोंके साथ ध्यानपरायण परमेश्वर शिवकी साग्रह सेवा करती हैं। तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दरी पार्वती
२६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिवके सामने रहकर प्रतिदिन उनकी पूजा करती हैं, तथापि वे ध्यानमग्न महेश्वर मनसे भी ध्यानहीन स्थितिमें नहीं आते। अर्थात् ध्यान भंग करके पार्वतीकी ओर देखनेका विचार भी मनमें नहीं लाते। देवताओ! चन्द्रशेखर शिव जिस प्रकार कालीको अपनी भार्या बनानेकी इच्छा करें, वैसी चेष्टा तुमलोग शीघ्र ही प्रयत्नपूर्वक करो। मैं उस दैत्यके स्थानपर जाकर तारकासुरको बुरे हठसे हटानेकी चेष्टा करूँगा। अतः अब तुमलोग अपने स्थानको जाओ।'
नारद! देवताओंसे ऐसा कहकर मैं शीघ्र ही तारकासुरसे मिला और बड़े प्रेमसे बुलाकर मैंने उससे इस प्रकार कहा—
'तारक! यह स्वर्ग हमारे तेजका सारतत्त्व है। परंतु तुम यहाँके राज्यका पालन कर रहे हो। जिसके लिये तुमने उत्तम तपस्या की थी, उससे अधिक चाहने लगे हो। मैंने तुम्हें इससे छोटा ही वर दिया था। स्वर्गका राज्य कदापि नहीं दिया था। इसलिये तुम स्वर्गको छोड़कर पृथ्वीपर राज्य करो। असुरश्रेष्ठ! देवताओंके योग्य जितने भी कार्य हैं, वे सब तुम्हें वहीं सुलभ होंगे। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।'
ऐसा कहकर उस असुरको समझानेके बाद मैं शिवा और शिवका स्मरण करके वहाँसे अदृश्य हो गया। तारकासुर भी स्वर्गको छोड़कर पृथ्वीपर आ गया और शोणितपुरमें रहकर वह राज्य करने लगा। फिर सब देवता भी मेरी बात सुनकर मुझे प्रणाम करके इन्द्रके साथ प्रसन्नतापूर्वक बड़ी सावधानीके साथ इन्द्रलोकमें गये। वहाँ जाकर परस्पर मिलकर आपसमें सलाह करके वे सब देवता इन्द्रसे प्रेमपूर्वक बोले—'भगवन्! शिवकी शिवामें जैसे भी काममूलक रुचि हो, वैसा ब्रह्माजीका बताया हुआ सारा प्रयत्न आपको करना चाहिये।'
इस प्रकार देवराज इन्द्रसे सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदन करके वे देवता प्रसन्नतापूर्वक सब ओर अपने-अपने स्थानपर चले गये।
(अध्याय १४–१६)
इन्द्रद्वारा कामका स्मरण, उसके साथ उनकी बातचीत तथा उनके कहनेसे कामका शिवको मोहनेके लिये प्रस्थान
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! देवताओंके चले जानेपर दुरात्मा तारक दैत्यसे पीड़ित हुए इन्द्रने कामदेवका स्मरण किया। कामदेव तत्काल वहाँ आ पहुँचा। तब इन्द्रने मित्रताका धर्म बतलाते हुए कामसे कहा—'मित्र! कालवशात् मुझपर असाध्य दुःख आ पड़ा है। उसे तुम्हारे बिना कोई भी दूर नहीं कर सकता। दाताकी परीक्षा दुर्भिक्षमें, शूरवीरकी परीक्षा रणभूमिमें, मित्रकी परीक्षा आपत्तिकालमें तथा स्त्रियोंके कुलकी परीक्षा पतिके असमर्थ हो जानेपर होती है। तात! संकट पड़नेपर विनयकी
* रुद्रसंहिता * २६१
परीक्षा होती है और परोक्षमें सत्य एवं उत्तम स्नेहकी, अन्यथा नहीं। यह मैंने सच्ची बात कही है।* मित्रवर! इस समय मुझपर जो विपत्ति आयी है, उसका निवारण दूसरे किसीसे नहीं हो सकता। अतः आज तुम्हारी परीक्षा हो जायगी। यह कार्य केवल मेरा ही है और मुझे ही सुख देनेवाला है, ऐसी बात नहीं। अपितु यह समस्त देवता आदिका कार्य है, इसमें संशय नहीं है।'
इन्द्रकी यह बात सुनकर कामदेव मुस्कराया और प्रेमपूर्ण गम्भीर वाणीमें बोला।
कामने कहा—देवराज! आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? मैं आपको उत्तर नहीं दे रहा हूँ (आवश्यक निवेदनमात्र कर रहा हूँ)। लोकमें कौन उपकारी मित्र है और कौन बनावटी—यह स्वयं देखनेकी वस्तु है, कहनेकी नहीं। जो संकटके समय बहुत बातें करता है, वह काम क्या करेगा? तथापि महाराज! प्रभो! मैं कुछ कहता हूँ, उसे सुनिये। मित्र! जो आपके इन्द्रपदको छीननेके लिये दारुण तपस्या कर रहा है, आपके उस शत्रुको मैं सर्वथा तपस्यासे भ्रष्ट कर दूँगा। जो काम जिससे पूरा हो सके, बुद्धिमान् पुरुष उसे उसी काममें लगाये। मेरे योग्य जो कार्य हो, वह सब आप मेरे जिम्मे कीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—कामदेवका यह कथन सुनकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए। वे कामिनियोंको सुख देनेवाले कामको प्रणाम करके उससे इस प्रकार बोले।
इन्द्रने कहा—तात! मनोभव! मैंने अपने मनमें जिस कार्यको पूर्ण करनेका उद्देश्य रखा है, उसे सिद्ध करनेमें केवल तुम्हीं समर्थ हो। दूसरे किसीसे उस कार्यका होना सम्भव नहीं है। मित्रवर! मनोभव काम! जिसके लिये आज तुम्हारे सहयोगकी अपेक्षा हुई है, उसे ठीक-ठीक बता रहा हूँ; सुनो। तारक नामसे प्रसिद्ध जो महान् दैत्य है, वह ब्रह्माजीका अद्भुत वर पाकर अजेय हो गया है और सभीको दुःख दे रहा है। वह सारे संसारको पीड़ा दे रहा है। उसके द्वारा बारंबार धर्मका नाश हुआ है। उससे सब देवता और समस्त ऋषि दुःखी हुए हैं। सम्पूर्ण देवताओंने पहले उसके साथ अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध किया था;
* दातुः परीक्षा दुर्भिक्षे रणे शूरस्य जायते। आपत्काले तु मित्रस्याशक्तौ स्त्रीणां कुलस्य हि॥
विनतेः संकटे प्राप्तेऽवितथस्य परोक्षतः। सुस्नेहस्य तथा तात नान्यथा सत्यमीरितम्॥
(शि० पु० रु० सं० पा० खं० १७। १२-१३)
२७० * संक्षिप्त शिवपुराण *
परंतु उसके ऊपर सबके अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो गये। जलके स्वामी वरुणका पाश टूट गया। श्रीहरिका सुदर्शनचक्र भी वहाँ सफल नहीं हुआ। श्रीविष्णुने उसके कण्ठपर चक्र चलाया, किंतु वह वहाँ कुण्ठित हो गया। ब्रह्माजीने महायोगीश्वर भगवान् शम्भुके वीर्यसे उत्पन्न हुए बालकके हाथसे इस दुरात्मा दैत्यकी मृत्यु बतायी है। यह कार्य तुम्हें अच्छी तरह और प्रयत्नपूर्वक करना है। मित्रवर! उसके हो जानेसे हम देवताओंको बड़ा सुख मिलेगा। भगवान् शम्भु गिरिराज हिमालयपर उत्तम तपस्यामें लगे हैं। वे हमारे भी प्रभु हैं, कामनाके वशमें नहीं हैं, स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। मैंने सुना है कि गिरिराजनन्दिनी पार्वती पिताकी आज्ञा पाकर अपनी दो सखियोंके साथ उनके समीप रहकर उनकी सेवामें रहती हैं। उनका यह प्रयत्न महादेवजीको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये ही है। परंतु भगवान् शिव अपने मनको संयम-नियमसे वशमें रखते हैं। मार! जिस तरह भी उनकी पार्वतीमें अत्यन्त रुचि हो जाय, तुम्हें वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये। यही कार्य करके तुम कृतार्थ हो जाओगे और हमारा सारा दुःख नष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं, लोकमें तुम्हारा स्थायी प्रताप फैल जायगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इन्द्रके ऐसा कहनेपर कामदेवका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा। उसने देवराजसे प्रेमपूर्वक कहा—'मैं इस कार्यको करूँगा। इसमें संशय नहीं है।' ऐसा कहकर शिवकी मायासे मोहित हुए कामने उस कार्यके लिये स्वीकृति दे दी और शीघ्र ही उसका भार ले लिया। वह अपनी पत्नी रति और वसन्तको साथ ले बड़ी प्रसन्नताके साथ उस स्थानपर गया, जहाँ साक्षात् योगीश्वर शिव उत्तम तपस्या कर रहे थे।
(अध्याय १७)
रुद्रकी नेत्राग्निसे कामका भस्म होना, रतिका विलाप, देवताओंकी प्रार्थनासे शिवका कामको द्वापरमें प्रद्युम्नरूपसे नूतन शरीरकी प्राप्तिके लिये वर देना और रतिका शम्बर-नगरमें जाना
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! काम अपने साथी वसन्त आदिको लेकर वहाँ पहुँचा। उसने भगवान् शिवपर अपने बाण चलाये। तब शंकरजीके मनमें पार्वतीके प्रति आकर्षण होने लगा और उनका धैर्य छूटने लगा। अपने धैर्यका ह्रास होता देख महायोगी महेश्वर अत्यन्त विस्मित हो मन-ही-मन इस प्रकार चिन्तन करने लगे।
शिव बोले—मैं तो उत्तम तपस्या कर रहा था, उसमें विघ्न कैसे आ गये? किस कुकर्मीने यहाँ मेरे चित्तमें विकार पैदा कर दिया?
इस तरह विचार करके सत्पुरुषोंके आश्रयदाता महायोगी परमेश्वर शिव शंका-युक्त हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे। इसी समय वामभागमें बाण खींचे खड़े हुए कामपर उनकी दृष्टि पड़ी। वह मूढ़चित्त मदन अपनी शक्तिके घमंडमें आकर पुनः अपना बाण छोड़ना ही चाहता था। नारद! इस अवस्थामें कामपर दृष्टि
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पड़ते ही परमात्मा गिरीशको तत्काल रोष चढ़ आया। मुने! उधर आकाशमें बाणसहित धनुष लिये खड़े हुए कामने भगवान् शंकरपर अपना अमोघ अस्त्र छोड़ दिया, जिसका निवारण करना बहुत कठिन था। परंतु परमात्मा शिवपर वह अमोघ अस्त्र भी मोघ (व्यर्थ) हो गया, कुपित हुए परमेश्वरके पास जाते ही शान्त हो गया। भगवान् शिवपर अपने अस्त्रके व्यर्थ हो जानेपर मन्मथ (काम)-को बड़ा भय हुआ। भगवान् मृत्युंजयको सामने देखकर वह काँप उठा और इन्द्र आदि समस्त देवताओंका स्मरण करने लगा। मुनिश्रेष्ठ! अपना प्रयास निष्फल हो जानेपर काम भयसे व्याकुल हो उठा था। मुनीश्वर! कामदेवके स्मरण करनेपर वे इन्द्र आदि सब देवता वहाँ आ पहुँचे और शम्भुको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे।
देवता स्तुति कर ही रहे थे कि कुपित हुए भगवान् हरके ललाटके मध्यभागमें स्थित तृतीय नेत्रसे बड़ी भारी आग तत्काल प्रकट होकर निकली। उसकी ज्वालाएँ ऊपरकी ओर उठ रही थीं। वह आग धू-धू करके जलने लगी। उसकी प्रभा प्रलयाग्निके समान जान पड़ती थी। वह आग तुरंत ही आकाशमें उछली और पृथ्वीपर गिर पड़ी। फिर अपने चारों ओर चक्कर काटती हुई धराशायिनी हो गयी। साधो! 'भगवान्! क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये' यह बात जबतक देवताओंके मुखसे निकले, तबतक ही उस आगने कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया। उस वीर कामदेवके मारे जानेपर देवताओंको बड़ा दुःख हुआ। वे व्याकुल हो 'हाय! यह क्या हुआ?' ऐसा कह-कहकर जोर-जोरसे चीत्कार करते हुए रोने-बिलखने लगे।
उस समय विकृतचित्त हुई पार्वतीका सारा शरीर सफेद पड़ गया—काटो तो खून नहीं। वे सखियोंको साथ ले अपने भवनको चली गयीं। कामदेवके जल जानेपर रति वहाँ एक क्षणतक अचेत पड़ी रही। पतिकी मृत्युके दुःखसे वह इस तरह पड़ी थी, मानो मर गयी हो। थोड़ी देरमें जब होश हुआ, तब अत्यन्त व्याकुल हो रति उस समय तरह-तरहकी बातें कहकर विलाप करने लगी।
रति बोली—हाय! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? देवताओंने यह क्या किया। मेरे उद्दण्ड स्वामीको बुलाकर नष्ट करा दिया। हाय! हाय! नाथ! स्मर! स्वामिन्! प्राणप्रिय! हा मुझे सुख देनेवाले प्रियतम! हा प्राणनाथ! यह यहाँ क्या हो गया?
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! इस प्रकार रोती, बिलखती और अनेक प्रकारकी बातें कहती हुई रति हाथ-पैर पटकने और अपने सिरके बालोंको नोचने लगी। उस समय उसका विलाप सुनकर वहाँ रहनेवाले समस्त
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वनवासी जीव तथा वृक्ष आदि स्थावर प्राणी भी बहुत दुःखी हो गये। इसी बीचमें इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता महादेवजीका स्मरण करते हुए रतिको आश्वासन दे इस प्रकार बोले।
देवताओंने कहा—तुम कामके शरीरका थोड़ा-सा भस्म लेकर उसे यत्नपूर्वक रखो और भय छोड़ो। हम सबके स्वामी महादेवजी कामदेवको पुनः जीवित कर देंगे और तुम फिर अपने प्रियतमको प्राप्त कर लोगी। कोई किसीको न तो सुख देनेवाला है और न कोई दुःख ही देनेवाला है। सब लोग अपनी-अपनी करनीका फल भोगते हैं। तुम देवताओंको दोष देकर व्यर्थ ही शोक करती हो।
इस प्रकार रतिको आश्वासन दे सब देवता भगवान् शिवके पास आये और उन्हें भक्तिभावसे प्रसन्न करके यों बोले।
देवताओंने कहा—भगवन्! शरणागत-वत्सल महेश्वर! आप कृपा करके हमारे इस शुभ वचनको सुनिये। शंकर! आप कामदेवकी करतूतपर भलीभाँति प्रसन्नतापूर्वक विचार कीजिये। महेश्वर! कामने जो यह कार्य किया है, इसमें इसका कोई स्वार्थ नहीं था। दुष्ट तारकासुरसे पीड़ित हुए हम सब देवताओंने मिलकर उससे यह काम कराया है। नाथ! शंकर! इसे आप अन्यथा न समझें। सब कुछ देनेवाले देव! गिरीश! सती-साध्वी रति अकेली अति दुःखी होकर विलाप कर रही है। आप उसे सान्त्वना प्रदान करें। शंकर! यदि इस क्रोधके द्वारा आपने कामदेवको मार डाला तो हम यही समझेंगे कि आप देवताओंसहित समस्त प्राणियोंका अभी संहार कर डालना चाहते हैं। रतिका दुःख देखकर देवता नष्टप्राय हो रहे हैं; इसलिये आपको रतिका शोक दूर कर देना चाहिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! सम्पूर्ण देवताओंका यह वचन सुनकर भगवान् शिव प्रसन्न हो उनसे इस प्रकार बोले।
शिवने कहा—देवताओ और ऋषियो! तुम सब आदरपूर्वक मेरी बात सुनो। मेरे क्रोधसे जो कुछ हो गया है, वह तो अन्यथा नहीं हो सकता, तथापि रतिका शक्तिशाली पति कामदेव तभीतक अनंग ( शरीररहित ) रहेगा, जबतक रुक्मिणीपति श्रीकृष्णका धरतीपर अवतार नहीं हो जाता। जब श्रीकृष्ण द्वारकामें रहकर पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे; तब वे रुक्मिणीके गर्भसे कामको भी जन्म देंगे। उस कामका ही नाम उस समय 'प्रद्युम्न' होगा—इसमें संशय नहीं है। उस पुत्रके जन्म लेते ही शम्बरासुर उसे हर लेगा। हरणके पश्चात् दानवशिरोमणि शम्बर उस शिशुको समुद्रमें डाल देगा। फिर वह मूढ़ उसे मरा हुआ समझकर अपने नगरको लौट जायगा। रते! उस समयतक तुम्हें शम्बरासुरके नगरमें सुखपूर्वक निवास करना चाहिये। वहीं तुम्हें अपने पति प्रद्युम्नकी प्राप्ति होगी। वहाँ तुमसे मिलकर काम युद्धमें शम्बरासुरका वध करेगा और सुखी होगा। देवताओ! प्रद्युम्ननामधारी काम अपनी कामिनी रतिको तथा शम्बरासुरके धनको लेकर उसके साथ पुनः नगरमें जायगा। मेरा यह कथन सर्वथा सत्य होगा।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! भगवान् शिवकी यह बात सुनकर देवताओंके चित्तमें
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कुछ उल्लास हुआ और वे उन्हें प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ विनीतभावसे बोले।
देवताओंने कहा—देवदेव ! महादेव ! करुणासागर ! प्रभो ! आप कामदेवको शीघ्र जीवन-दान दें तथा रतिके प्राणोंकी रक्षा करें।
देवताओंकी यह बात सुनकर सबके स्वामी करुणासागर परमेश्वर शिव पुनः प्रसन्न होकर बोले—'देवताओ! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैं कामको सबके हृदयमें जीवित कर दूँगा। वह सदा मेरा गण होकर विहार करेगा। अब अपने स्थानको जाओ। मैं तुम्हारे दुःखका सर्वथा नाश करूँगा।'
ऐसा कहकर रुद्रदेव उस समय स्तुति करनेवाले देवताओंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। देवताओंका विस्मय दूर हो गया और वे सब-के-सब प्रसन्न हो गये। मुने ! तदनन्तर रुद्रकी बातपर भरोसा करके स्थिर रहनेवाले देवता रतिको उनका कथन सुनाकर आश्वासन दे अपने-अपने स्थानको चले गये। मुनीश्वर ! कामपत्नी रति शिवके बताये हुए शम्बरनगरको चली गयी तथा रुद्रदेवने जो समय बताया था, उसकी प्रतीक्षा करने लगी। (अध्याय १८-१९)
ब्रह्माजीका शिवकी क्रोधाग्निको वडवानलकी संज्ञा दे समुद्रमें स्थापित करके संसारके भयको दूर करना, शिवके विरहसे पार्वतीका शोक तथा नारदजीके द्वारा उन्हें तपस्याके लिये उपदेशपूर्वक पंचाक्षर-मन्त्रकी प्राप्ति
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद ! जब भगवान् रुद्रके तीसरे नेत्रसे प्रकट हुई अग्निने कामदेव-को शीघ्र जलाकर भस्म कर दिया, तब वह बिना किसी प्रयोजनके ही प्रज्वलित हो सब ओर फैलने लगी। इससे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें महान् हाहाकार मच गया। तात ! सम्पूर्ण देवता और ऋषि तुरंत मेरी शरणमें आये। उन सबने अत्यन्त व्याकुल होकर मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़ मुझे प्रणाम किया और मेरी स्तुति करके वह दुःख निवेदन किया। वह सुनकर मैं भगवान् शिवका स्मरण करके उसके हेतुका भलीभाँति विचारकर तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये विनीतभावसे वहाँ पहुँचा। वह अग्नि ज्वालामालाओंसे अत्यन्त उद्दीप्त हो जगत्को जला देनेके लिये उद्यत थी। परंतु भगवान् शिवकी कृपासे प्राप्त हुए उत्तम तेजके द्वारा मैंने उसे तत्काल स्तम्भित कर दिया। मुने ! त्रिलोकीको दग्ध करनेकी इच्छा रखनेवाली उस क्रोधमय अग्निको मैंने एक ऐसे घोड़ेके रूपमें परिणत कर दिया, जिसके मुखसे सौम्य ज्वाला प्रकट हो रही थी। भगवान् शिवकी इच्छासे उस वाडव शरीर (घोड़े)-वाली अग्निको लेकर मैं लोकहितके लिये समुद्रतटपर गया। मुने ! मुझे आया देख समुद्र एक दिव्य पुरुषका रूप धारण करके हाथ जोड़े हुए मेरे पास आया। मुझ सम्पूर्ण लोकोंके पितामहकी भलीभाँति विधिवत् स्तुति-वन्दना करके सिन्धुने मुझसे प्रसन्नतापूर्वक कहा।
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सागर बोला—सर्वेश्वर ब्रह्मन्! आप यहाँ किसलिये पधारे हैं? मुझे अपना सेवक समझ इस बातको प्रीतिपूर्वक कहिये।
सागरकी बात सुनकर भगवान् शंकरका स्मरण करके लोकहितका ध्यान रखते हुए मैंने उससे प्रसन्नतापूर्वक कहा—'तात समुद्र! तुम बड़े बुद्धिमान् और सम्पूर्ण लोकोंके हितकारी हो। मैं शिवकी इच्छासे प्रेरित हो हार्दिक प्रीतिपूर्वक तुमसे कह रहा हूँ। यह भगवान् महेश्वरका क्रोध है, जो महान् शक्तिशाली अश्वके रूपमें यहाँ उपस्थित है। यह कामदेवको दग्ध करके तुरंत ही सम्पूर्ण जगत्को भस्म करनेके लिये उद्यत हो गया था। यह देख पीड़ित हुए देवताओंकी प्रार्थनासे मैं शंकरेच्छावश वहाँ गया और इस अग्निको स्तम्भित किया। फिर इसने घोड़ेका रूप धारण किया और इसे लेकर मैं यहाँ आया। जलाधार! मैं जगत्पर दया करके तुम्हें यह आदेश दे रहा हूँ—इस महेश्वरके क्रोधको, जो वाडवका रूप धारण करके मुखसे ज्वाला प्रकट करता हुआ खड़ा है, तुम प्रलयकालपर्यन्त धारण किये रहो। सरित्पते! जब मैं यहाँ आकर वास करूँगा, तब तुम भगवान् शंकरके इस अद्भुत क्रोधको छोड़ देना। तुम्हारा जल ही प्रतिदिन इसका भोजन होगा। तुम यत्नपूर्वक इसे ऊपर ही धारण किये रहना, जिससे यह तुम्हारी अनन्त जलराशिके भीतर न चला जाय।'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! मेरे ऐसा कहनेपर समुद्रने रुद्रकी क्रोधाग्निरूप वडवानलको धारण करना स्वीकार कर लिया, जो दूसरेके लिये असम्भव था। तदनन्तर वह वडवाग्नि समुद्रमें प्रविष्ट हुई और ज्वालामालाओंसे प्रदीप्त हो सागरकी जलराशिका दहन करने लगी। मुने! इससे संतुष्टचित्त होकर मैं अपने लोकको चला आया और वह दिव्यरूपधारी समुद्र मुझे प्रणाम करके अदृश्य हो गया। महामुने! रुद्रकी उस क्रोधाग्निके भयसे छूटकर सम्पूर्ण जगत् स्वस्थताका अनुभव करने लगा और देवता तथा मुनि सुखी हो गये।
नारदजी बोले—दयानिधे! मदन-दहनके पश्चात् गिरिराजनन्दिनी पार्वती देवीने क्या किया? वे अपनी दोनों सखियोंके साथ कहाँ गयीं? यह सब मुझे बताइये।
ब्रह्माजीने कहा—भगवान् शंकरके नेत्रसे उत्पन्न हुई आगने जब कामदेवको दग्ध किया, तब वहाँ महान् अद्भुत शब्द प्रकट हुआ, जिससे सारा आकाश गूँज उठा। उस महान् शब्दके साथ ही कामदेवको दग्ध
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हुआ देख भयभीत और व्याकुल हुई पार्वती दोनों सखियोंके साथ अपने घर चली गयीं। उस शब्दसे परिवारसहित हिमवान् भी बड़े विस्मयमें पड़ गये और वहाँ गयी हुई अपनी पुत्रीका स्मरण करके उन्हें बड़ा क्लेश हुआ। इतनेमें ही पार्वती दूरसे आती हुई दिखायी दीं। वे शम्भुके विरहसे रो रही थीं। अपनी पुत्रीको अत्यन्त विह्वल हुई देख शैलराज हिमवान्को बड़ा शोक हुआ और वे शीघ्र ही उसके पास जा पहुँचे। वे फिर हाथसे उसकी दोनों आँखें पोंछकर बोले—'शिवे! डरो मत, रोओ मत।' ऐसा कहकर अचलेश्वर हिमवान्ने अत्यन्त विह्वल हुई पार्वतीको शीघ्र ही गोदमें उठा लिया और उसे सान्त्वना देते हुए वे अपने घर ले आये।
कामदेवका दाह करके महादेवजी अदृश्य हो गये थे। अतः उनके विरहसे पार्वती अत्यन्त व्याकुल हो उठी थीं। उन्हें कहीं भी सुख या शान्ति नहीं मिलती थी। पिताके घर जाकर जब वे अपनी मातासे मिलीं, उस समय पार्वती शिवाने अपना नया जन्म हुआ माना। वे अपने रूपकी निन्दा करने लगीं और बोलीं—'हाय! मैं मारी गयी।' सखियोंके समझानेपर भी वे गिरिराजकुमारी कुछ समझ नहीं पाती थीं। वे सोते-जागते, खाते-पीते, नहाते-धोते, चलते-फिरते और सखियोंके बीचमें खड़े होते समय भी कभी किंचिन्मात्र भी सुखका अनुभव नहीं करती थीं। 'मेरे स्वरूपको तथा जन्म-कर्मको भी धिक्कार है' ऐसा कहती हुई वे सदा महादेवजीकी प्रत्येक चेष्टाका चिन्तन करती थीं। इस प्रकार पार्वती भगवान् शिवके विरहसे मन-ही-मन अत्यन्त क्लेशका अनुभव करती और किंचिन्मात्र भी सुख नहीं पाती थीं। वे सदा 'शिव, शिव' का जप किया करती थीं। शरीरसे पिताके घरमें रहकर भी वे चित्तसे पिनाकपाणि भगवान् शंकरके पास पहुँची रहती थीं। तात! शिवा शोकमग्न हो बारंबार मूर्च्छित हो जाती थीं। शैलराज हिमवान् उनकी पत्नी मेनका तथा उनके मैनाक आदि सभी पुत्र, जो बड़े उदारचेता थे, उन्हें सदा सान्त्वना देते रहते थे। तथापि वे भगवान् शंकरको भूल न सकीं।
बुद्धिमान् देवर्षे! तदनन्तर एक दिन इन्द्रकी प्रेरणासे इच्छानुसार घूमते हुए तुम हिमालय पर्वतपर आये। उस समय महात्मा हिमवान्ने तुम्हारा स्वागत-सत्कार किया और कुशल-मंगल पूछा। फिर तुम उनके दिये हुए उत्तम आसनपर बैठे। तदनन्तर शैलराजने अपनी कन्याके चरित्रका आरम्भसे ही वर्णन किया। किस तरह उसने महादेवजीकी सेवा आरम्भ की और किस तरह उनके द्वारा कामदेवका दहन हुआ—यह सब कुछ बताया। मुने! यह सब सुनकर तुमने गिरिराजसे कहा— 'शैलेश्वर! भगवान् शिवका भजन करो।' फिर उनसे विदा लेकर तुम उठे और मन-ही-मन शिवका स्मरण करके शैलराजको छोड़ शीघ्र ही एकान्तमें कालीके पास आ गये। मुने! तुम लोकोपकारी, ज्ञानी तथा शिवके प्रिय भक्त हो; समस्त ज्ञानवानोंके शिरोमणि हो, अतः कालीके पास आ उसे सम्बोधित करके उसीके हितमें स्थित हो उससे सादर यह सत्य वचन बोले।
नारदजीने (तुमने) कहा—कालिके! तुम मेरी बात सुनो। मैं दयावश सच्ची बात कह रहा हूँ। मेरा वचन तुम्हारे लिये सर्वथा
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हितकर, निर्दोष तथा उत्तम काम्य वस्तुओंको देनेवाला होगा। तुमने यहाँ महादेवजीकी सेवा अवश्य की थी, परंतु वह बिना तपस्याके गर्वयुक्त होकर की थी। दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले शिवने तुम्हारे उसी गर्वको नष्ट किया है। शिवे! तुम्हारे स्वामी महेश्वर विरक्त और महायोगी हैं। उन्होंने केवल कामदेवको जलाकर जो तुम्हें सकुशल छोड़ दिया है, उसमें यही कारण है कि वे भगवान् भक्तवत्सल हैं। अतः तुम उत्तम तपस्यामें संलग्न हो चिरकालतक महेश्वरकी आराधना करो। तपस्यासे तुम्हारा संस्कार हो जानेपर रुद्रदेव तुम्हें अपनी सहधर्मिणी बनायेंगे और तुम भी कभी उन कल्याणकारी शम्भुका परित्याग नहीं करोगी। देवि! तुम हठपूर्वक शिवको अपनानेका यत्न करो। शिवके सिवा दूसरे किसीको अपना पति स्वीकार न करना।
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! तुम्हारी यह बात सुनकर गिरिराजकुमारी काली कुछ उल्लसित हो तुमसे हाथ जोड़ प्रसन्नतापूर्वक बोलीं।
शिवाने कहा—प्रभो! आप सर्वज्ञ तथा जगत्का उपकार करनेवाले हैं।
मुने! मुझे रुद्रदेवकी आराधनाके लिये कोई मन्त्र दीजिये।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! पार्वतीका यह वचन सुनकर तुमने पंचाक्षर शिवमन्त्र (नमः शिवाय) का उन्हें विधिपूर्वक उपदेश किया। साथ ही उस मन्त्रराजमें श्रद्धा उत्पन्न करनेके लिये तुमने उसका सबसे अधिक प्रभाव बताया।
नारद (तुम) बोले—देवि! इस मन्त्रका परम अद्भुत प्रभाव सुनो। इसके श्रवणमात्रसे भगवान् शंकर प्रसन्न हो जाते हैं। यह मन्त्र सब मन्त्रोंका राजा और मनोवांछित फलको देनेवाला है। भगवान् शंकरको बहुत ही प्रिय है तथा साधकको भोग और मोक्ष देनेमें समर्थ है। सौभाग्यशालिनि! इस मन्त्रका विधिपूर्वक जप करनेसे तुम्हारे द्वारा आराधित हुए भगवान् शिव अवश्य और शीघ्र तुम्हारी आँखोंके सामने प्रकट हो जायँगे। शिवे! शौच-संतोषादि नियमोंमें तत्पर रहकर भगवान् शिवके स्वरूपका चिन्तन करती हुई तुम पंचाक्षर-मन्त्रका जप करो। इससे आराध्यदेव शिव शीघ्र ही संतुष्ट होंगे। साध्वी! इस तरह तपस्या करो। तपस्यासे महेश्वर वशमें हो सकते हैं। तपस्यासे ही सबको मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं।
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! तुम भगवान् शिवके प्रिय भक्त और इच्छानुसार विचरनेवाले हो। तुमने कालीसे उपर्युक्त बात कहकर देवताओंके हितमें तत्पर हो स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। तुम्हारी बात सुनकर उस समय पार्वती बहुत प्रसन्न हुईं। उन्हें परम उत्तम पंचाक्षर-मन्त्र प्राप्त हो गया था।
(अध्याय २०-२१)
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* रुद्रसंहिता * २७७
श्रीशिवकी आराधनाके लिये पार्वतीजीकी दुष्कर तपस्या
ब्रह्माजी कहते हैं—देवर्षे! तुम्हारे चले जानेपर प्रफुल्लचित्त हुई पार्वतीने महादेवजी-को तपस्यासे ही साध्य माना और तपस्याके लिये ही मनमें निश्चय किया। तब उन्होंने अपनी सखी जया और विजयाके द्वारा पिता हिमाचल और माता मेनासे आज्ञा माँगी। पिताने तो स्वीकार कर लिया; परंतु माता मेनाने स्नेहवश अनेक प्रकारसे समझाया और घरसे दूर वनमें जाकर तप करनेसे पुत्रीको रोका। मेनाने तपस्याके लिये वनमें जानेसे रोकते हुए 'उ', 'मा' ( बाहर न जाओ ) ऐसा कहा; इसलिये उस समय शिवाका नाम उमा हो गया। मुने! शैलराजकी प्यारी पत्नी मेनाने रोकनेसे शिवाको दुःखी हुई जान अपना विचार बदल दिया और पार्वतीको तपस्याके लिये जानेकी आज्ञा दे दी। मुनिश्रेष्ठ! माताकी वह आज्ञा पाकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पार्वतीने भगवान् शंकरका स्मरण करके अपने मनमें बड़े सुखका अनुभव किया। माता-पिताको प्रसन्नता पूर्वक प्रणाम करके शिवके स्मरणपूर्वक दोनों सखियोंके साथ वे तपस्या करनेके लिये चली गयीं। अनेक प्रकारके प्रिय वस्त्रोंका परित्याग करके पार्वतीने कटि प्रदेशमें सुन्दर मूँजकी मेखला बाँध शीघ्र ही वल्कल धारण कर लिये। हारका परिहार करके उत्तम मृगचर्मको हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् वे तपस्याके लिये गंगावतरण ( गंगोत्तरी ) तीर्थकी ओर चलीं।
जहाँ ध्यान लगाते हुए भगवान् शंकरने कामदेवको दग्ध किया था, हिमालयका वह शिखर गंगावतरणके नामसे प्रसिद्ध है। वहीं परम उत्तम शृंगितीर्थमें पार्वतीने तपस्या प्रारम्भ की। गौरीके तप करनेसे ही उसका 'गौरी-शिखर' नाम हो गया। मुने! शिवाने अपने तपकी परीक्षाके लिये वहाँ बहुत-से सुन्दर एवं पवित्र वृक्ष लगाये, जो फल देनेवाले थे। सुन्दरी पार्वतीने पहले भूमि-शुद्ध करके वहाँ एक वेदीका निर्माण किया। तदनन्तर ऐसी तपस्या आरम्भ की, जो मुनियोंके लिये भी दुष्कर थी। वे मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंको शीघ्र ही काबूमें करके उस वेदीपर उच्चकोटिकी तपस्या करने लगीं। ग्रीष्म-ऋतुमें अपने चारों ओर दिन-रात आग जलाये रखकर वे बीचमें बैठतीं और निरन्तर पंचाक्षर-मन्त्रका जप करती रहती थीं। वर्षा-ऋतुमें वेदीपर सुस्थिर आसनसे बैठकर अथवा किसी पत्थरकी चट्टानपर ही आसन लगाकर वे निरन्तर वर्षाकी जलधारासे भीगती रहती थीं। शीतकालमें निराहार रहकर भगवान् शंकरके भजनमें तत्पर हो वे सदा शीतल जलके भीतर खड़ी रहतीं तथा रातभर बरफकी चट्टानोंपर बैठा करती थीं। इस प्रकार तप करती हुई पंचाक्षर-मन्त्रके जपमें संलग्न हो शिवा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंके दाता शिवका ध्यान करती थीं। प्रतिदिन अवकाश मिलनेपर वे सखियोंके साथ अपने लगाये हुए वृक्षोंको प्रसन्नतापूर्वक सींचतीं और वहाँ पधारे हुए अतिथिका आतिथ्य-सत्कार भी करती थीं।
२७८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शुद्ध चित्तवाली पार्वतींने प्रचण्ड आँधी, कड़ाकेकी सर्दी, अनेक प्रकारकी वर्षा तथा दुस्सह धूपका भी सेवन किया। उनके ऊपर वहाँ नाना प्रकारके दुःख आये, परंतु उन्होंने उन सबको कुछ नहीं गिना। मुने! वे केवल शिवमें मन लगाकर वहाँ सुस्थिरभावसे खड़ी या बैठी रहती थीं। उनका पहला वर्ष फलाहारमें बीता और दूसरा वर्ष उन्होंने केवल पत्ते चबाकर बिताया! इस तरह तपस्या करती हुई देवी पार्वतींने क्रमशः असंख्य वर्ष व्यतीत कर दिये। तदनन्तर हिमवान्की पुत्री शिवादेवी पत्ते खाना भी छोड़कर सर्वथा निराहार रहने लगीं, तो भी तपश्चर्यामें उनका अनुराग बढ़ता ही गया। हिमाचलपुत्री शिवाने भोजनके लिये पर्णका भी परित्याग कर दिया। इसलिये देवताओंने उनका नाम ‘अपर्णा’ रख दिया। इसके बाद पार्वती भगवान् शिवके स्मरणपूर्वक एक पैरसे खड़ी हो पंचाक्षर-मन्त्रका जप करती हुई बड़ी भारी तपस्या करने लगीं। उनके अंग चीर और वल्कलसे ढके थे। वे मस्तकपर जटाओंका समूह धारण किये रहती थीं। इस प्रकार शिवके चिन्तनमें लगी हुई पार्वतींने अपनी तपस्याके द्वारा मुनियोंको जीत लिया। उस तपोवनमें महेश्वरके चिन्तनपूर्वक तपस्या करती हुई कालीके तीन हजार वर्ष बीत गये।
तदनन्तर जहाँ महादेवजीने साठ हजार वर्षोंतक तप किया था, उस स्थानपर क्षणभर ठहरकर शिवादेवी इस प्रकार चिन्ता करने लगीं—‘क्या महादेवजी इस समय यह नहीं जानते कि मैं उनके लिये नियमोंके पालनमें तत्पर हो तपस्या कर रही हूँ? फिर क्या कारण है कि सुदीर्घकालसे तपस्यामें लगी हुई मुझ सेविकाके पास वे नहीं आये? लोकमें, वेदमें और मुनियोंद्वारा सदा गिरीशकी महिमाका गान किया जाता है। सब यही कहते हैं कि भगवान् शंकर सर्वज्ञ, सर्वात्मा, सर्वदर्शी, समस्त ऐश्वर्योंके दाता, दिव्य शक्तिसम्पन्न, सबके मनोभावोंको समझ लेनेवाले, भक्तोंको उनकी अभीष्ट वस्तु देनेवाले और सदा समस्त क्लेशोंका निवारण करनेवाले हैं। यदि मैं समस्त कामनाओंका परित्याग करके भगवान् वृषभध्वजमें अनुरक्त हुई हूँ तो वे कल्याणकारी भगवान् शिव यहाँ मुझपर प्रसन्न हों। यदि मैंने नारदतन्त्रोक्त शिवपंचाक्षर-मन्त्रका सदा उत्तम भक्तिभावसे विधिपूर्वक जप किया हो तो भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों। यदि मैं सर्वेश्वर शिवकी भक्तिसे युक्त एवं निर्विकार
* रुद्रसंहिता * [२७९]
होऊँ तो भगवान् शंकर मुझपर अत्यन्त प्रसन्न हों।'
इस तरह नित्य चिन्तन करती हुई जटा-वल्कलधारिणी निर्विकारा पार्वती मुँह नीचे किये सुदीर्घकालतक तपस्यामें लगी रहीं। उन्होंने ऐसी तपस्या की, जो मुनियोंके लिये भी दुष्कर थी। वहाँ उस तपस्याका स्मरण करके पुरुषोंको बड़ा विस्मय हुआ। महर्षे! पार्वतीकी तपस्याका जो दूसरा प्रभाव पड़ा था, उसे भी इस समय सुनो। जगदम्बा पार्वतीका वह महान् तप परम आश्चर्यजनक था। जो स्वभावतः एक-दूसरेके विरोधी थे, ऐसे प्राणी भी उस आश्रमके पास जाकर उनकी तपस्याके प्रभावसे विरोधरहित हो जाते थे। सिंह और गौ आदि सदा रागादि दोषोंसे संयुक्त रहनेवाले पशु भी पार्वतीके तपकी महिमासे वहाँ परस्पर बाधा नहीं पहुँचाते थे। मुनिश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त जो स्वभावतः एक-दूसरेके वैरी हैं, वे चूहे-बिल्ली आदि दूसरे-दूसरे जीव भी उस आश्रमपर कभी रोष आदि विकारोंसे युक्त नहीं होते थे। वहाँके सभी वृक्षोंमें सदा फल लगे रहते थे। भाँति-भाँतिके तृण और विचित्र पुष्प उस वनकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँका सारा वनप्रान्त कैलासके समान हो गया। पार्वतीके तपकी सिद्धिका साकार रूप बन गया।
(अध्याय २२)
पार्वतीकी तपस्याविषयक दृढ़ता, उनका पहलेसे भी उग्र तप, उससे त्रिलोकीका संतप्त होना तथा समस्त देवताओंके साथ ब्रह्मा और विष्णुका भगवान् शिवके स्थानपर जाना
ब्रह्माजी कहते हैं—मुनीश्वर! शिवकी प्राप्तिके लिये इस प्रकार तपस्या करती हुई पार्वतीके बहुत वर्ष बीत गये, तो भी भगवान् शंकर प्रकट नहीं हुए। तब हिमाचल, मेना, मेरु और मन्दराचल आदिने आकर पार्वतीको समझाया और शिवकी प्राप्तिको अत्यन्त दुष्कर बताकर उनसे यह अनुरोध किया कि तुम तपस्या छोड़कर घरको लौट चलो।
तब उन सबकी बात सुनकर पार्वतीने कहा—पिताजी! माताजी! तथा मेरे सभी बान्धव! मैंने पहले जो बात कही थी, उसे क्या आपलोगोंने भुला दिया है? अस्तु, इस समय भी मेरी जो प्रतिज्ञा है, उसे आपलोग सुन लें। जिन्होंने रोषसे कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया है वे महादेवजी यद्यपि विरक्त हैं, तो भी मैं अपनी तपस्यासे उन भक्तवत्सल भगवान् शंकरको अवश्य संतुष्ट करूँगी। आप सब लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरको जायँ; महादेवजी संतुष्ट होंगे ही, इसमें अन्यथा विचारकी आवश्यकता नहीं है। जिन्होंने कामदेवको जलाया है, जिन्होंने इस पर्वतके वनको भी जलाकर भस्म कर दिया है, उन भगवान् शंकरको मैं केवल तपस्यासे यहीं बुलाऊँगी। महाभागगण! आप यह जान लें कि महान् तपोबलसे ही भगवान् सदाशिवकी सेवा सुलभ हो सकती है। यह मैं आपलोगोंसे सत्य, सत्य कहती हूँ।
सुमधुर भाषण करनेवाली पर्वतराज-कुमारी शिवा माता मेनका, भाई मैनाक,
२८० * संक्षिप्त शिवपुराण *
पिता हिमालय और मन्दराचल आदिसे उपर्युक्त बात कहकर शीघ्र ही चुप हो गयीं। शिवाके ऐसा कहनेपर वे चतुर-चालाक पर्वत, गिरिराज सुमेरु आदि गिरिजाकी बारंबार प्रशंसा करते हुए अत्यन्त विस्मित हो जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये। उन सबके चले जानेपर सखियोंसे घिरी हुई पार्वती मनमें यथार्थ निश्चय करके पहलेसे भी अधिक उग्र तपस्या करने लगीं। मुनिश्रेष्ठ ! देवताओं, असुरों, मनुष्यों और चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी उस महती तपस्यासे संतप्त हो उठी। उस समय समस्त देवता, असुर, यक्ष, किंनर, चारण, सिद्ध, साध्य, मुनि, विद्याधर, बड़े-बड़े नाग, प्रजापति, गुह्यक तथा अन्य लोग महान्-से-महान् कष्टमें पड़ गये। परंतु इसका कोई कारण उनकी समझमें नहीं आया। तब इन्द्र आदि सब देवता मिलकर गुरु बृहस्पतिसे सलाह ले बड़ी विह्वलताके साथ सुमेरु पर्वतपर मुझ विधाताकी शरणमें आये। उस समय उनके सारे अंग संतप्त हो रहे थे। वहाँ आ मुझे प्रणामकर उन सभी व्याकुल और कान्तिहीन देवताओंने मेरी स्तुति करके एक साथ ही मुझसे पूछा—'प्रभो! जगत्के संतप्त होनेका क्या कारण है?'
उनका यह प्रश्न सुनकर मन-ही-मन शिवका स्मरण करके विचारपूर्वक मैंने सब कुछ जान लिया। इस समय विश्वमें जो दाह उत्पन्न हो गया है, वह गिरिजाकी तपस्याका फल है—यह जानकर मैं उन सबके साथ शीघ्र ही क्षीरसागरको गया। वहाँ जानेका उद्देश्य भगवान् विष्णुसे सब कुछ बताना था। वहाँ पहुँचकर देखा, भगवान् श्रीहरि सुखद आसनपर विराजमान हैं। देवताओंके साथ मैंने हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक उनकी स्तुति की और कहा—'महाविष्णो! तपस्यामें लगी हुई पार्वतीके परम उग्र तपसे संतप्त हो हम सब लोग आपकी शरणमें आये हैं। आप हमें बचाइये, बचाइये।' हम सब देवताओंकी यह बात सुनकर शेषशय्यापर बैठे हुए भगवान् लक्ष्मीपति हमसे बोले।
श्रीविष्णुने कहा—देवताओ! मैंने आज पार्वतीजीकी तपस्याका सारा कारण जान लिया है। अतः तुमलोगोंके साथ अब परमेश्वर शिवके समीप चलता हूँ। हम सब लोग मिलकर यह प्रार्थना करेंगे कि वे गिरिजाको ब्याहकर अपने यहाँ ले आवें। अमरो! इस समय समस्त संसारके कल्याणके लिये भगवान्से शिवाके पाणिग्रहणके लिये अनुरोध करना है। देवाधिदेव पिनाकधारी भगवान् शिव शिवाको वर देनेके लिये जैसे भी वहीं उनके आश्रमपर जायें, इस समय हम वैसा ही प्रयत्न करेंगे। अतः परम मंगलमय महाप्रभु रुद्र जहाँ उग्र तपस्यामें लगे हुए हैं, वहीं हम सब लोग चलें।
भगवान् विष्णुकी यह बात सुनकर समस्त देवता आदि हठी, क्रोधी और जलानेके लिये उद्यत रहनेवाले प्रलयंकर रुद्रसे अत्यन्त भयभीत हो बोले।
देवताओेंने कहा—भगवन्! जो महा-भयंकर, कालाग्निके समान दीप्तिमान् और भयानक नेत्रोंसे युक्त हैं, उन रोषभरे महाप्रभु रुद्रके पास हमलोग नहीं जा सकेंगे; क्योंकि जैसे पहले उन्होंने कुपित हो दुर्जय कामको भी जला दिया था, उसी प्रकार वे हमें भी दग्ध कर डालेंगे—इसमें संशय नहीं है।