शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* वायवीयसंहिता * ६६५
किया है तथा इसमें धर्म प्रतिष्ठित है। वेदव्यासने इस एक लाख श्लोकवाले शिवपुराणको संक्षिप्त करके चौबीस हजार श्लोकोंका कर दिया है। इसमें सात संहिताएँ हैं। पहली विद्येश्वरसंहिता, दूसरी रुद्रसंहिता, तीसरी शतरुद्रसंहिता, चौथी कोटिरुद्रसंहिता, पाँचवीं उमासंहिता, छठी कैलाससंहिता और सातवीं वायवीयसंहिता है। इस प्रकार इसमें सात ही संहिताएँ हैं। विद्येश्वरसंहितामें दो हजार, रुद्रसंहितामें दस हजार पाँच सौ, शतरुद्रसंहितामें दो हजार एक सौ अस्सी, कोटिरुद्रसंहितामें दो हजार दो सौ चालीस, उमासंहितामें एक हजार आठ सौ चालीस, कैलाससंहितामें एक हजार दो सौ चालीस और वायवीयसंहितामें चार हजार श्लोक हैं। इस परम पवित्र शिवपुराणको आपलोगोंने सुन लिया। केवल चार हजार श्लोकोंकी वायवीयसंहिता रह गयी है, जो दो भागोंसे युक्त है। उसका वर्णन मैं करूँगा। जो वेदोंका विद्वान् न हो, उससे इस उत्तम शास्त्रका वर्णन नहीं करना चाहिये। जो पुराणोंको न जानता हो और जिसकी पुराणपर श्रद्धा न हो उससे भी इसकी कथा नहीं कहनी चाहिये। जो भगवान् शिवका भक्त हो, शिवोक्त धर्मका पालन करता हो और दोषदृष्टिसे रहित हो, उस जाँचे-बूझे हुए धर्मात्मा शिष्यको ही इसका उपदेश देना चाहिये। जिनकी कृपासे मुझको पुराणसंहिताका ज्ञान है, उन अमिततेजस्वी भगवान् व्यासको नमस्कार है। (अध्याय १)
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ऋषियोंका ब्रह्माजीके पास जा उनकी स्तुति करके उनसे परमपुरुषके विषयमें प्रश्न करना और ब्रह्माजीका आनन्दमग्न हो 'रुद्र' कहकर उत्तर देना
सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! पहले अनेक कल्पोंके बारंबार बीतनेपर सुदीर्घकालके पश्चात् जब यह वर्तमान कल्प उपस्थित हुआ और सृष्टिका कार्य आरम्भ हुआ, जब जीविका-साधक कर्म—कृषि, गोरक्षा और वाणिज्यकी प्रतिष्ठा हुई तथा प्रजावर्गके लोग सजग एवं सचेत हो गये, तब छः कुलोंमें उत्पन्न हुए महर्षियोंमें परस्पर बहस छिड़ गयी। 'यह परब्रह्म है या नहीं है' इस प्रकार उनमें महान् विवाद होने लगा, किंतु परम तत्त्वका निरूपण अत्यन्त कठिन होनेके कारण उस समय वहाँ कुछ निश्चय न हो सका। तब वे सब लोग जगत्-स्रष्टा अविनाशी ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर गये, जहाँ देवताओं और असुरोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए भगवान् ब्रह्मा विराजमान थे। देवताओं और दानवोंसे भरे हुए सुन्दर रमणीय मेरुशिखरपर, जहाँ सिद्ध और चारण परस्पर बातचीत करते हैं, यक्ष और गन्धर्व सदा रहते हैं, विहंगोंके समुदाय कलरव करते हैं, मणि और मूँगे जिसकी शोभा बढ़ाते हैं तथा निकुंज, कन्दराएँ, छोटी गुफाएँ और अनेकानेक निर्झर जिसे सुशोभित करते हैं,
६६६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
एक ब्रह्मवन नामसे प्रसिद्ध वन है। उसमें नाना प्रकारके वन्यपशु भरे हुए हैं। उसकी लंबाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजनकी है। उसके भीतर एक रमणीय सरोवर है, जो सुस्वादु निर्मल जलसे भरा रहता है। वहाँके रमणीय पुष्पित वृक्षोंपर मतवाले भौंरे छाये रहते हैं। उस वनमें एक मनोहर एवं विशाल नगर है, जो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता रहता है। वहाँ दुर्धर्ष शक्तिसे युक्त बलाभिमानी दैत्य, दानव तथा राक्षसोंका निवास है। वह नगर तपाये हुए सुवर्णका बना जान पड़ता है। उसकी चहारदीवारियाँ और सदर फाटक बहुत ऊँचे हैं। छोटे बुर्जों, ढालू छतों, आवासस्थानों तथा सैकड़ों गलियोंसे उस नगरकी बड़ी शोभा है। वह विचित्र बहुमूल्य मणियोंसे आकाशको चूमता-सा प्रतीत होता है तथा कई करोड़ विशाल भवनोंसे अलंकृत है।
उस नगरमें प्रजापति ब्रह्मा अपने सभासदोंके साथ निवास करते हैं। वहाँ जाकर उन मुनियोंने साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माजीको देखा। देवर्षियोंके समुदाय उनकी सेवामें बैठे थे। उनकी अंगकान्ति शुद्ध सुवर्णके समान थी। वे सब आभूषणोंसे विभूषित थे। उनका मुख प्रसन्न था, उससे सौम्यभाव प्रकट होता था। उनके नेत्र कमलदलके समान विशाल थे। दिव्य कान्तिसे सम्पन्न, दिव्य गन्ध एवं अनुलेपनसे चर्चित, दिव्य श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित ब्रह्माजीके चरणारविन्दोंकी वन्दना सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा योगीन्द्र भी करते थे। जैसे प्रभा दिवाकरकी सेवा करती है, उसी प्रकार समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त साक्षात् सरस्वतीदेवी हाथमें चँवर ले उनकी सेवा कर रही थीं, इससे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी।
ब्रह्माजीका दर्शन करके उन सभी महर्षियोंके मुख और नेत्र खिल उठे। उन्होंने मस्तकपर अंजलि बाँधकर उन सुर-श्रेष्ठकी स्तुति की।
ऋषि बोले—संसारकी सृष्टि, पालन और संहारके हेतु तीन रूप धारण करनेवाले आप पुराणपुरुष परमात्मा ब्रह्माको नमस्कार है। प्रकृति जिनका शरीर है, जो प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं तथा प्रकृतिरूपमें तेईस विकारोंसे युक्त होनेपर भी जो वास्तवमें निर्विकार हैं, उन ब्रह्मदेवको नमस्कार है। ब्रह्माण्ड जिनकी देह है, तो भी जो ब्रह्माण्डके उदरमें निवास करते हैं तथा वहाँ रहकर जिनके कार्य और करण सम्यक्-रूपसे सिद्ध होते हैं, उन ब्रह्माजीको नमस्कार है।
जो सर्वलोकस्वरूप तथा समस्त लोकोंके
* वायवीयसंहिता * ६६७
स्रष्टा हैं, जो सम्पूर्ण जीवोंका शरीरसे संयोग और वियोग करानेमें हेतु हैं, उन ब्रह्माजीको नमस्कार है। नाथ! पितामह! आपसे ही सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, पालन और संहार होते हैं, तथापि मायासे आवृत्त होनेके कारण हम आपको नहीं जानते।
सूतजी कहते हैं—उन महाभाग महर्षियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर ब्रह्माजी उन मुनियोंको आह्लाद प्रदान करते हुए गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले।
ब्रह्माजीने कहा—महान् सत्त्वगुणसे सम्पन्न महाभाग महातेजस्वी महर्षियो! तुम सब लोग एक साथ यहाँ किसलिये आये हो?
ब्रह्माजीके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उन सभी मुनियोंने हाथ जोड़ विनयभरी वाणीमें कहा।
मुनि बोले—भगवन्! हमलोग अज्ञानके महान् अन्धकारसे आवृत्त हो खिन्न हो रहे हैं। परस्पर विवाद करते हुए हमें परमतत्त्वका साक्षात्कार नहीं हो रहा है। आप सम्पूर्ण जगत्के धारण-पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणोंके भी कारण हैं। नाथ! यहाँ कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको विदित न हो। कौन ऐसा पुरुष है, जो सम्पूर्ण जीवोंसे पुरातन, अन्तर्यामी, उत्कृष्ट विशुद्ध परिपूर्ण एवं सनातन परमेश्वर है? कौन अपने अद्भुत क्रियाकलापद्वारा सबसे प्रथम संसारकी सृष्टि करता है? महाप्राज्ञ! हमारे इस संदेहका निवारण करनेके लिये आप हमें परमार्थतत्त्वका उपदेश दें।
मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर ब्रह्माजीके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। वे देवताओं, दानवों और मुनियोंके निकट खड़े हो गये और चिरकालतक ध्यानमग्न हो ‘रुद्र’ ऐसा कहते हुए आनन्दविभोर हो गये। उनका सारा शरीर पुलकित हो उठा और वे हाथ जोड़कर बोले।
(अध्याय २)
ब्रह्माजीके द्वारा परमतत्त्वके रूपमें भगवान् शिवकी ही महत्ताका प्रतिपादन, उनकी कृपाको ही सब साधनोंका फल बताना तथा उनकी आज्ञासे सब मुनियोंका नैमिषारण्यमें आना
ब्रह्माजीने कहा—मुनियो! जिन्हें न पाकर मनसहित वाणी लौट आती है, जिनके आनन्दमय स्वरूपका अनुभव करनेवाला पुरुष कभी किसीसे नहीं डरता, जिनसे सम्पूर्ण भूतों और इन्द्रियोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्रपूर्वक यह समस्त जगत् पहले प्रकट होता है, जो कारणोंके भी स्रष्टा और विचारक परम कारण हैं, जिनके सिवा और किसीसे कभी भी जगत्की उत्पत्ति नहीं होती, * सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न होनेके
* यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं यस्य वै विद्वान् न बिभेति कुतश्चन॥
यस्मात् सर्वमिदं ब्रह्मविष्णुरुद्रेन्द्रपूर्वकम्। सह भूतेन्द्रियैः सर्वैः प्रथमं सम्प्रसूयते॥
कारणानां च यो धाता ध्याता परमकारणम्। न सम्प्रसूयतेऽन्यस्मात् कुतश्चन कदाचन॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ३। १–३)
६६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
कारण जो स्वयं ही सर्वेश्वर नाम धारण करते हैं, सब मुमुक्षु जिन शम्भुका अपने हृदय-आकाशके भीतर ध्यान करते हैं, जिन्होंने सबसे पहले मुझे ही अपने पुत्रके रूपमें उत्पन्न किया और मुझे ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान दिया, जिनके कृपाप्रसादसे मैंने यह प्रजापतिका पद प्राप्त किया है, जो ईश्वर अकेले ही वृक्षकी भाँति निश्चल-भावसे प्रकाशमान आकाशमें विराजमान है, जिन परमपुरुष परमात्मासे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है, जो अकेले ही बहुत-से निष्क्रिय जीवोंके शासक एवं उन्हें सक्रियता प्रदान करनेवाले हैं, जो महेश्वर एक बीजको अनेक रूपोंमें परिणत कर देते हैं, जो सबका शासन करनेवाले ईश्वर इन जीवोंसहित इन समस्त लोकोंको वशमें रखते हैं, सब रूपोंमें जो एकमात्र भगवान् रुद्र ही हैं, दूसरा कोई नहीं है, जो सदा ही मनुष्योंके हृदयमें भलीभाँति प्रविष्ट होकर स्थित हैं, जो स्वयं सम्पूर्ण विश्वको देखते हुए भी दूसरोंसे कदापि लक्षित नहीं होते और सदा समस्त जगत्के अधिष्ठाता हैं, जो अनन्त शक्तिशाली एकमात्र भगवान् रुद्र कालसे मुक्त समस्त कारणोंपर भी शासन करते हैं, जिनके लिये न दिन है न रात्रि है, जिनके समान भी कोई नहीं है, फिर अधिक तो हो ही कैसे सकता है, जिनकी ज्ञान, बल और क्रियारूपा पराशक्ति स्वाभाविक एवं नित्य है।$^१$ जो इस क्षर (विनाशशील), अव्यक्त (प्रकृति)-पर तथा अमृतस्वरूप अक्षर (अविनाशी) जीवात्मापर शासन करते हैं, उनका निरन्तर ध्यान करनेसे, मनको उनमें लगाये रहनेसे तथा उन्हींके तत्त्वकी भावना करते हुए उनमें तन्मय रहनेसे जीव अन्तमें उन्हींको प्राप्त हो जाता है। फिर तो सारी माया अपने-आप दूर हो जाती है। उनके पास न तो बिजली प्रकाश करती है और न सूर्य तथा चन्द्रमा ही अपनी प्रभा फैलाते हैं, अपितु उन्हींके प्रकाशसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। ऐसा सनातन श्रुतिका कथन है।$^२$ एकमात्र महादेव महेश्वरको ही अपना आराध्यदेव जानना चाहिये। उनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई पद उपलब्ध नहीं होता। ये स्वयं ही सबके आदि हैं, किंतु इनका न आदि है न अन्त। ये स्वभावसे ही निर्मल, स्वतन्त्र, परिपूर्ण, स्वेच्छाधीन तथा चराचररूप हैं। इनका शरीर अप्राकृतिक (दिव्य) है। ये श्रीमान् महेश्वर लक्ष्य और लक्षणसे रहित हैं। ये नित्यमुक्त होकर सबको बन्धनसे मुक्त करनेवाले हैं। कालकी सीमासे परे रहकर कालको प्रेरित करने-वाले हैं।$^३$ ये सबके ऊपर निवास करते हैं। स्वयं ही सबके आवासस्थान हैं, सर्वज्ञ हैं तथा छः प्रकारके अध्वा (मार्ग)-से
१-न यस्य दिवसो रात्रिर्न समानो न चाधिकः। स्वाभाविकी पराशक्तिर्नित्या ज्ञानक्रिये अपि॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड ३।१९)
२-यस्मिन्न भासते विद्युन्न सूर्यो न च चन्द्रमाः। यस्य भासा विभातीदमित्येषा शाश्वती श्रुतिः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड ३।१४)
३-अप्राकृतवपुः श्रीमान् लक्ष्यलक्षणवर्जितः। अयं मुक्तो मोचकश्च ह्यकालः कालचोदकः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खंड ३।१७)
* वायवीयसंहिता * ६६९
युक्त इस सम्पूर्ण जगत्के पालक हैं। उत्तरोत्तर उत्कृष्ट भूतोंसे वे परम उत्कृष्ट हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। अनन्त आनन्दराशिरूपी मकरन्दका पान करनेवाले मधुव्रत (भ्रमर) हैं। अखण्ड ब्रह्माण्डोंको मसलकर मृत्पिण्डके समान कर देनेकी कलामें पण्डित हैं। उदारता, वीरता, गम्भीरता और मधुरताके महासागर हैं। इनके समान भी कोई वस्तु नहीं है, फिर इनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकती है। ये उपमारहित हैं। समस्त प्राणियोंके राजाधिराजके रूपमें विराजमान हैं। ये ही सृष्टिके प्रारम्भमें अपने अद्भुत क्रियाकलापद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं और अन्तकालमें यह फिर इन्हींमें लीन हो जायगा। सब प्राणी इन्हींके वशमें हैं। ये ही सबको विभिन्न कार्योंमें नियुक्त करनेवाले हैं। पराभक्तिसे ही इनका दर्शन होता है, अन्य किसी प्रकारसे कभी नहीं।
व्रत, सम्पूर्ण दान, तपस्या और नियम—इन सब साधनोंको पूर्वकालमें सत्पुरुषोंने भावशुद्धि तथा अनुरागकी उत्पत्तिके लिये ही बताया था, इसमें संशय नहीं है। मैं, भगवान् विष्णु, रुद्रदेव तथा दूसरे-दूसरे देवता एवं असुर आज भी उग्र तपस्याओंके द्वारा उनके दर्शनकी इच्छा रखते हैं। धर्मभ्रष्ट, मूढ़, दुष्ट और घृणित आचार-विचारवाले लोगोंको उनका दर्शन होना असम्भव है। भक्तजन भीतर और बाहर भी उन्हींका पूजन एवं ध्यान करते हैं। यह रूप तीन प्रकारका है—स्थूल, सूक्ष्म और इन दोनोंसे परे। हम सब देवता आदि जिस रूपको प्रत्यक्ष देखते हैं, वह स्थूल है। सूक्ष्मरूपका दर्शन केवल योगियोंको होता है और उससे भी परे जो नित्य, ज्ञानस्वरूप आनन्दमय तथा अविनाशी भगवत्स्वरूप है, वह उसमें निष्ठा रखनेवाले भजनपरायण भक्तोंकी ही दृष्टिमें आता है। भगवद्व्रतका आश्रय लेनेवाले भक्त ही उसको देख पाते हैं। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, गुह्यसे भी गुह्यतर एवं उत्कृष्ट साधन है भगवान् शिवके प्रति भक्ति। जो उस भक्तिसे युक्त है, वह संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है। वह भक्ति भगवान् शिवकी कृपासे ही उपलब्ध होती है और उनकी कृपा भी भक्तिसे ही सम्भव होती है—इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरेके आश्रित हैं—ठीक वैसे ही, जैसे अंकुरसे बीज और बीजसे अंकुर होता है। जीवको भगवत्कृपासे ही सर्वत्र सिद्धियाँ मिलती हैं। सम्पूर्ण साधनोंसे अन्तमें भगवान्की कृपा ही साध्य है। अन्तःकरणकी शुद्धि या प्रसादका साधन है धर्म और उस धर्मके स्वरूपका प्रतिपादन वेदने किया है। वेदोंके अभ्याससे पहलेके पुण्य और पापोंमें समता आती है, उस समतासे प्रसाद (प्रसन्नता या अन्तःशुद्धि)-का सम्पर्क प्राप्त होता है और उससे धर्मकी वृद्धि होती है। धर्मकी वृद्धिसे पशु (जीव)-के पापोंका क्षय होता है। इस तरह जिसके पाप क्षीण हो गये हैं, उस जीवको अनेक जन्मोंके अभ्याससे क्रमशः उमा-महेश्वरके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त होकर उसके हृदयमें उनके प्रति भक्तिका उदय होता है। उस भक्तिभावके अनुरूप ही महेश्वरके कृपाप्रसादका उद्रेक होता है। उस प्रसादसे कर्मोंका त्याग होता है। कर्मोंके त्यागका अभिप्राय उनके फलोंके त्यागसे है, कर्मोंके स्वरूपतः त्यागसे नहीं। अतः यह सिद्ध
६७० * संक्षिप्त शिवपुराण *
हुआ कि कर्मफलोंके त्यागसे शिवधर्ममें मंगलमयी प्रवृत्ति होती है।
इसलिये शिवका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके उद्देश्यसे तुम सब लोग अपने स्त्री-पुत्रों और अग्नियोंके साथ वाणी और मनके दोषोंसे रहित होकर एकमात्र भगवान् शिवका ही ध्यान करते रहो। उन्हींमें निष्ठा रखकर उनके भजनमें तत्पर हो जाओ। उन्हींमें मन लगाकर उनके आश्रित होकर रहो। सब कार्य करते हुए मनसे उन्हींका चिन्तन किया करो। एक सहस्र दिव्य वर्षोंके लिये दीर्घकालिक यज्ञका आरम्भ करके उसे पूर्ण करो। यज्ञके अन्तमें मन्त्रद्वारा आवाहन करनेपर साक्षात् वायुदेवता वहाँ पधारेंगे। फिर वे ही तुम सब लोगोंके कल्याणका साधन एवं उपाय बतायेंगे। तत्पश्चात् तुम सब लोग परम सुन्दर पुण्यमयी वाराणसी-पुरीको जाना, जहाँ पिनाकपाणि श्रीमान् भगवान् विश्वनाथ भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवी पार्वतीके साथ सदा विहार करते हैं। द्विजोत्तमो! वहाँ तुम्हें बड़ा भारी आश्चर्य दिखायी देगा। उस आश्चर्यको देखकर तुम फिर मेरे पास आना, तब मैं तुम्हें मोक्षका उपाय बताऊँगा। उस उपायसे एक ही जन्ममें मुक्ति तुम्हारे हाथमें आ जायगी, जो अनेक जन्मोंके संसारबन्धनसे छुटकारा दिलानेवाली होगी। यह मैंने मनोमय चक्रका निर्माण किया है। इस चक्रको मैं यहाँसे छोड़ता हूँ। जहाँ जाकर इसकी नेमि विशीर्ण हो जाय—टूट-फूट जाय, वही तपस्याके लिये शुभ देश है।
ऐसा कहकर पितामह ब्रह्माने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोमय चक्रकी ओर देखा और महादेवजीको प्रणाम करके उसे छोड़ दिया। वे सब ब्राह्मण उन लोकनाथ ब्रह्माजीको प्रणाम करके उस स्थानके लिये चल दिये, जहाँ उस चक्रकी नेमि जीर्ण-शीर्ण होनेवाली थी। ब्रह्माजीका फेंका हुआ वह सुन्दर चक्र मनोहर शिलाखण्डोंसे युक्त और निर्मल एवं स्वादिष्ठ जलसे पूर्ण किसी वनमें गिरा। उस चक्रकी नेमिके शीर्ण होनेसे वह मुनिपूजित वन नैमिष नामसे विख्यात हुआ। अनेक यक्ष, गन्धर्व और विद्याधर वहाँ आकर रहने लगे। पूर्वकालमें जगत्की सृष्टिकी इच्छा रखनेवाले विश्वस्रष्टा एवं गार्हपत्य अग्निके उपासक ब्रह्मज्ञ प्रजापतियोंने वहीं दिव्य यज्ञका आरम्भ किया था। वहीं शब्दशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा न्यायशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् महर्षियोंने शक्ति, ज्ञान और क्रियायोगके द्वारा शास्त्रीय विधिक अनुष्ठान किया था। उसी स्थानपर वेदवेत्ता विद्वान् सदा वाद और जल्पके बलसे युक्त वचनोंद्वारा अतिवाद करनेवाले वेदबहिष्कृत नास्तिकोंको पराहत या पराजित
* वायवीयसंहिता * ६७१
करते थे। तभीसे नैमिषारण्य ऋषियोंकी तपस्याके योग्य स्थान बन गया। स्फटिक-मणिमय पर्वतकी शिलाओंसे झरते हुए अमृतके समान मधुर एवं स्वच्छ जलके कारण वह वन बड़ा रमणीय प्रतीत होता है। वहाँ प्रायः अत्यन्त रसीले फल देनेवाले वृक्ष हैं तथा उस वनमें हिंसक जीव-जन्तुओंका अभाव है।
(अध्याय ३)
नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन, उनका सत्कार तथा ऋषियोंके पूछनेपर वायुके द्वारा पशु, पाश एवं पशुपतिका तात्त्विक विवेचन
सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो ! उस समय उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महाभाग महर्षियोंने उस देशमें महादेवजीकी आराधना करते हुए एक महान् यज्ञका आयोजन किया। वह यज्ञ जब आरम्भ हुआ, तब महर्षियोंको सर्वथा आश्चर्यजनक जान पड़ा। तदनन्तर समय बीतनेपर जब प्रचुर दक्षिणाओंसे युक्त वह यज्ञ समाप्त हुआ, तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे वायुदेव स्वयं वहाँ पधारे। उनको आया देख दीर्घकालिक यज्ञका अनुष्ठान करनेवाले वे मुनि ब्रह्माजीकी बातको याद करके अनुपम हर्षका अनुभव करने लगे। उन सबने उठकर आकाशजन्मा वायुदेवताको प्रणाम किया और उन्हें बैठनेके लिये एक सोनेका बना हुआ आसन दिया। वायुदेवता उस आसनपर बैठे। मुनियोंने उनकी विधिवत् पूजा की। तदनन्तर उन सबका अभिनन्दन करके वे कुशल-मंगल पूछने लगे।
वायुदेवता बोले—ब्राह्मणो! इस महान् यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण होनेतक तुम सब लोग सकुशल रहे न? यज्ञहन्ता देवद्रोही दैत्योंने तुम्हें बाधा तो नहीं पहुँचायी ? तुम्हें कोई प्रायश्चित्त तो नहीं करना पड़ा ? तुम्हारे यज्ञमें कोई दोष तो नहीं आया ? क्या तुमलोगोंने स्तोत्र और शस्त्रग्रहोंद्वारा देवताओंका तथा पितृकर्मोंद्वारा पितरोंका भलीभाँति पूजन करके यज्ञ-विधिका अनुष्ठान भलीभाँति सम्पन्न किया ? इस महायज्ञकी समाप्ति हो जानेपर अब आपलोग क्या करना चाहते हैं?
मुनियोंने कहा—प्रभो! हमारे कल्याणकी वृद्धिके लिये जब आप स्वयं यहाँ आ गये, तब अब हमारा सब प्रकारसे
६७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
[बायाँ स्तम्भ]
कुशल-मंगल ही है तथा हमारी तपस्या भी उत्तम होगी। अब पहलेका वृत्तान्त सुनिये। हमारा हृदय अज्ञानान्धकारसे आक्रान्त हो गया था, तब हमने विज्ञानकी प्राप्तिके लिये पूर्वकालमें प्रजापतिकी उपासना की। शरणागतवत्सल प्रजापतिने हम शरणागतों-पर कृपा करके इस प्रकार कहा—'ब्राह्मणो! रुद्रदेव सबसे श्रेष्ठ हैं। वे ही परम कारण हैं। उन्हें तर्कसे नहीं जाना जा सकता। भक्तिमान् पुरुष ही उनके स्वरूपको ठीक-ठीक देखता और समझता है। भक्ति भी उनकी कृपासे ही मिलती है और उस कृपासे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है। अतः उनके कृपाप्रसादको प्राप्त करनेके लिये तुमलोग नैमिषारण्यमें यज्ञका आयोजन करो। दीर्घकालतक चलनेवाले उस यज्ञके द्वारा परम कारण रुद्रदेवकी आराधना करो। यज्ञके अन्तमें उन रुद्रदेवके कृपा-प्रसादसे वायुदेवता वहाँ पधारेंगे। उनके मुखसे वहाँ तुम्हें ज्ञानलाभ होगा और उससे कल्याणकी प्राप्ति होगी।' महाभाग! ऐसा आदेश देकर परमेष्ठीने हम सबको यहाँ भेजा। हम इस देशमें आपके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए एक सहस्त्र दिव्य वर्षोंतक दीर्घकालिक यज्ञके अनुष्ठानमें लगे रहे हैं। अतः इस समय आपके आगमनके सिवा हमारे लिये दूसरी कोई प्रार्थनीय वस्तु नहीं है।
दीर्घकालसे यज्ञानुष्ठानमें लगे हुए उन महर्षियोंका यह पुरातन वृत्तान्त सुनकर वायुदेवता मन-ही-मन प्रसन्न हो मुनियोंसे घिरे हुए वहाँ बैठे रहे। फिर उन सबके पूछनेपर उनके भक्तिभावकी वृद्धिके लिये उन्होंने भगवान् शंकरके सृष्टि आदि ऐश्वर्यको संक्षेपसे बताया।
[दायाँ स्तम्भ]
नैमिषारण्यके ऋषियोंने पूछा—देव! आपने ईश्वरविषयक ज्ञान कैसे प्राप्त किया? तथा आप अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके शिष्य किस प्रकार हुए?
वायुदेवता बोले—महर्षियो! उन्नीसवें कल्पका नाम श्वेतलोहितकल्प समझना चाहिये। उसी कल्पमें चतुर्मुख ब्रह्माने सृष्टिकी कामनासे तपस्या की। उनकी उस तीव्र तपस्यासे संतुष्ट हो स्वयं उनके पिता देवदेव महेश्वरने उन्हें दर्शन दिया। वे दिव्य कुमारावस्थासे युक्त रूप धारण करके रूपवानोंमें श्रेष्ठ श्वेत नामक मुनि होकर दिव्य वाणी बोलते हुए उनके सामने उपस्थित हुए। वेदोंके अधिपति तथा सबके पालक पिता महेश्वरका दर्शन करके गायत्रीसहित ब्रह्माजीने उन्हें प्रणाम किया और उन्हींसे उत्तम ज्ञान पाया। ज्ञान पाकर विश्वकर्मा चतुर्मुख ब्रह्मा सम्पूर्ण चराचर भूतोंकी सृष्टि करने लगे। साक्षात् परमेश्वर शिवसे सुनकर ब्रह्माजीने अमृतस्वरूप ज्ञान प्राप्त किया था, इसलिये मैंने तपस्याके बलसे उन्हींके मुखसे उस ज्ञानको उपलब्ध किया।
मुनियोंने पूछा—आपने वह कौन-सा ज्ञान प्राप्त किया, जो सत्यसे भी परम सत्य एवं शुभ है तथा जिसमें उत्तम निष्ठा रखकर पुरुष परमानन्दको प्राप्त करता है?
वायुदेवता बोले—महर्षियो! मैंने पूर्वकालमें पशु-पाश और पशुपतिका जो ज्ञान प्राप्त किया था, सुख चाहनेवाले पुरुषको उसीमें ऊँची निष्ठा रखनी चाहिये। अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला दुःख ज्ञानसे ही दूर होता है। वस्तुके विवेकका नाम ज्ञान है। वस्तुके तीन भेद माने गये हैं—जड (प्रकृति), चेतन (जीव) और उन दोनोंका
* वायवीयसंहिता *
६७३
नियन्ता (परमेश्वर)। इन्हीं तीनोंको क्रमसे पाश, पशु तथा पशुपति कहते हैं। तत्त्वज्ञ पुरुष प्रायः इन्हीं तीन तत्त्वोंको क्षर, अक्षर तथा उन दोनोंसे अतीत कहते हैं। अक्षर ही पशु कहा गया है। क्षर तत्त्वका ही नाम पाश है तथा क्षर और अक्षर दोनोंसे परे जो परमतत्त्व है, उसीको पति या पशुपति कहते हैं। प्रकृतिको ही क्षर कहा गया है। पुरुष (जीव)-को ही अक्षर कहते हैं और जो इन दोनोंको प्रेरित करता है, वह क्षर और अक्षर दोनोंसे भिन्न तत्त्व परमेश्वर कहा गया है। मायाका ही नाम प्रकृति है। पुरुष उस मायासे आवृत है। मल और कर्मके द्वारा प्रकृतिका पुरुषके साथ सम्बन्ध होता है। शिव ही इन दोनोंके प्रेरक ईश्वर हैं। माया महेश्वरकी शक्ति है। चित्स्वरूप जीव उस मायासे आवृत है। चेतन जीवको आच्छादित करनेवाला अज्ञानमय पाश ही मल कहलाता है। उससे शुद्ध हो जानेपर जीव स्वतः शिव हो जाता है। वह विशुद्ध ही शिवत्व है।
मुनियोंने पूछा—सर्वव्यापी चेतनको माया किस हेतुसे आवृत करती है? किसलिये पुरुषको आवरण प्राप्त होता है? और किस उपायसे उसका निवारण होता है?
वायुदेवता बोले—व्यापक तत्त्वको भी आंशिक आवरण प्राप्त होता है; क्योंकि कला आदि भी व्यापक हैं। भोगके लिये किया गया कर्म ही उस आवरणमें कारण है। मलका नाश होनेसे वह आवरण दूर हो जाता है। कला, विद्या, राग, काल और नियति—इन्हींको कला आदि कहते हैं। कर्मफलका जो उपभोग करता है, उसीका नाम पुरुष (जीव) है। कर्म दो प्रकारके हैं—पुण्यकर्म और पापकर्म। पुण्यकर्मका फल सुख और पापकर्मका फल दुःख है। कर्म अनादि है और फलका उपभोग कर लेनेपर उसका अन्त हो जाता है। यद्यपि जड कर्मका चेतन आत्मासे कुछ सम्बन्ध नहीं है, तथापि अज्ञानवश जीवने उसे अपने-आपमें मान रखा है। भोग कर्मका विनाश करनेवाला है, प्रकृतिको भोग्य कहते हैं और भोगका साधन है शरीर। बाह्य इन्द्रियाँ और अन्तःकरण उसके द्वार हैं। अतिशय भक्तिभावसे उपलब्ध हुए महेश्वरके कृपाप्रसादसे मलका नाश होता है और मलका नाश हो जानेपर पुरुष निर्मल—शिवके समान हो जाता है। विद्या पुरुषकी ज्ञानशक्तिको और कला उसकी क्रियाशक्तिको अभिव्यक्त करनेवाली है। राग भोग्य वस्तुके लिये क्रियामें प्रवृत्त करनेवाला होता है। काल उसमें अवच्छेदक होता है और नियति उसे नियन्त्रणमें रखनेवाली है। अव्यक्तरूप जो कारण है, वह त्रिगुणमय है; उसीसे जड जगत्की उत्पत्ति होती है और उसीमें उसका लय होता है। तत्त्व-चिन्तक पुरुष उस अव्यक्तको ही प्रधान और प्रकृति कहते हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण प्रकृतिसे प्रकट होते हैं; तिलमें तेलकी भाँति वे प्रकृतिमें सूक्ष्मरूपसे विद्यमान रहते हैं। सुख और उसके हेतुको संक्षेपसे सात्त्विक कहा गया है, दुःख और उसके हेतु राजस कार्य हैं तथा जडता और मोह—वे तमोगुणके कार्य हैं। सात्त्विकी वृत्ति ऊर्ध्वको ले जानेवाली है, तामसी वृत्ति अधोगतिमें डालनेवाली है तथा राजसी वृत्ति मध्यम स्थितिमें रखनेवाली है। पाँच
789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 A
६७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तन्मात्राएँ, पाँच भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा प्रधान (चित्त), महत्तत्त्व (बुद्धि), अहंकार और मन—ये चार अन्तःकरण—सब मिलकर चौबीस तत्त्व होते हैं। इस प्रकार संक्षेपसे ही विकाससहित अव्यक्त (प्रकृति)-का वर्णन किया गया। कारणावस्थामें रहनेपर ही इसे अव्यक्त कहते हैं और शरीर आदिके रूपमें जब वह कार्यावस्थाको प्राप्त होता है, तब उसकी 'व्यक्त' संज्ञा होती है—ठीक उसी तरह, जैसे कारणावस्थामें स्थित होनेपर जिसे हम 'मिट्टी' कहते हैं वही कार्यावस्थामें 'घट' आदि नाम धारण कर लेती है। जैसे घट आदि कार्य मृत्तिका आदि कारणसे अधिक भिन्न नहीं है, उसी प्रकार शरीर आदि व्यक्त पदार्थ अव्यक्तसे अधिक भिन्न नहीं हैं। इसलिये एकमात्र अव्यक्त ही कारण, करण, उनका आधारभूत शरीर तथा भोग्य वस्तु है, दूसरा कोई नहीं।
मुनियोंने पूछा—प्रभो! बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरसे व्यतिरिक्त किसी आत्मा नामक वस्तुकी वास्तविक स्थिति कहाँ है?
वायुदेवता बोले—महर्षियो! सर्वव्यापी चेतनका बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरसे पार्थक्य अवश्य है। आत्मा नामक कोई पदार्थ निश्चय ही विद्यमान है; परन्तु उसकी सत्तामें किसी हेतुकी उपलब्धि बहुत ही कठिन है! सत्पुरुष बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरको आत्मा नहीं मानते; क्योंकि स्मृति (बुद्धिका ज्ञान) अनियत है तथा उसे सम्पूर्ण शरीरका एक साथ अनुभव नहीं होता। इसीलिये वेदों और वेदान्तोंमें आत्माको पूर्वानुभूत विषयोंका स्मरणकर्ता, सम्पूर्ण ज्ञेय पदार्थोंमें व्यापक तथा अन्तर्यामी कहा जाता है। यह न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है। न ऊपर है, न अगल-बगलमें है, न नीचे है और न किसी स्थान-विशेषमें। यह सम्पूर्ण चल शरीरोंमें अविचल, निराकार एवं अविनाशीरूपसे स्थित है। ज्ञानी पुरुष निरन्तर विचार करनेसे उस आत्मतत्त्वका साक्षात्कार कर पाते हैं।$^१$
पुरुषका जो वह शरीर कहा गया है, इससे बढ़कर अशुद्ध, पराधीन, दुःखमय और अस्थिर दूसरी कोई वस्तु नहीं है। शरीर ही सब विपत्तियोंका मूल कारण है। उससे युक्त हुआ पुरुष अपने कर्मके अनुसार सुखी, दुःखी और मूढ़ होता है।$^२$ जैसे पानीसे सींचा हुआ खेत अंकुर उत्पन्न करता है, उसी प्रकार अज्ञानसे आप्लावित हुआ कर्म नूतन शरीरको जन्म देता है। ये शरीर अत्यन्त दुःखोंके आलय माने जाते हैं। इनकी मृत्यु अनिवार्य होती है। भूतकालमें कितने ही शरीर नष्ट हो गये और
१-न च स्त्री न पुमानेष नैव चापि नपुंसकः। नैवोर्ध्वं नापि तिर्यक् च नाधस्तान्न कुतश्चन ॥
अशरीरं शरीरेषु चलेषु स्थाणुमव्ययम्। सदा पश्यति तं धीरो नरः प्रत्यवमर्शनात् ॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ५ । ४८-४९)
२-यच्छरीरमिदं प्रोक्तं पुरुषस्य ततः परम्। अशुद्धमवशं दुःखमध्रुवं न च विद्यते॥
विपदां बीजभूतेन पुरुषस्तेन संयुतः। सुखी दुःखी च मूढश्च भवति स्वेन कर्मणा॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ५ । ५१-५२)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 B
* वायवीयसंहिता * ६७५
भविष्यकालमें सहस्रों शरीर आनेवाले हैं, वे सब आ-आकर जब जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं, तब पुरुष उन्हें छोड़ देता है। कोई भी जीवात्मा किसी भी शरीरमें अनन्त कालतक रहनेका अवसर नहीं पाता। यहाँ स्त्रियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंसे जो मिलन होता है, वह पथिकको मार्गमें मिले हुए दूसरे पथिकोंके समागमके ही समान है। जैसे महासागरमें एक काष्ठ कहींसे और दूसरा काष्ठ कहींसे बहता आता है, वे दोनों काष्ठ कहीं थोड़ी देरके लिये मिल जाते हैं और मिलकर फिर बिछड़ जाते हैं। उसी प्रकार प्राणियोंका यह समागम भी संयोग-वियोगसे युक्त है।* ब्रह्माजीसे लेकर स्थावर प्राणियोंतक सभी जीव पशु कहे गये हैं। उन सभी पशुओंके लिये ही यह दृष्टान्त या दर्शन-शास्त्र कहा गया है। यह जीव पाशोंमें बँधता और सुख-दुःख भोगता है, इसलिये 'पशु' कहलाता है। यह ईश्वरकी लीलाका साधन-भूत है, ऐसा ज्ञानी महात्मा कहते हैं।
(अध्याय ४-५)
महेश्वरकी महत्ताका प्रतिपादन
वायुदेवता कहते हैं—महर्षियो! इस विश्वका निर्माण करनेवाला कोई पति है, जो अनन्त रमणीय गुणोंका आश्रय कहा गया है। वही पशुओंको पाशसे मुक्त करनेवाला है। उसके बिना संसारकी सृष्टि कैसे हो सकती है; क्योंकि पशु अज्ञानी और पाश अचेतन है। प्रधान परमाणु आदि जितने भी जड तत्त्व हैं, उन सबका कर्ता वह पति ही है—यह बात स्वयं समझमें आ जाती है। किसी बुद्धिमान् या चेतन कारणके बिना इन जड तत्त्वोंका निर्माण कैसे सम्भव है। पशु, पाश और पतिका जो वास्तवमें पृथक्-पृथक् स्वरूप है, उसे जानकर ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष योनिसे मुक्त होता है। क्षर और अक्षर—ये दोनों एक-दूसरेसे संयुक्त होते हैं। पति या महेश्वर ही व्यक्ताव्यक्त जगत्का भरण-पोषण करते हैं। वे ही जगत्को बन्धनसे छुड़ानेवाले हैं। भोक्ता, भोग्य और प्रेरक—ये तीन ही तत्त्व जाननेयोग्य हैं। विज्ञ पुरुषोंके लिये इनसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु जाननेयोग्य नहीं है। सृष्टिके आरम्भमें एक ही रुद्रदेव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत्की सृष्टि करके इसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें सबका संहार कर डालते हैं। उनके सब ओर नेत्र हैं, सब ओर मुख हैं, सब ओर भुजाएँ हैं और सब ओर चरण हैं। ये ही सबसे पहले देवताओंमें ब्रह्माजीको उत्पन्न करते हैं। श्रुति कहती है कि 'रुद्रदेव सबसे श्रेष्ठ महान् ऋषि हैं। मैं इन महान् अमृतस्वरूप अविनाशी पुरुष
* नैवास्य भविता कश्चिन्नासौ भवति कस्यचित्। पथि संगम एवायं दारैः पुत्रैश्च बन्धुभिः॥
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ। समेत्य च व्यपेयातां तद्वद् भूतसमागमः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ५। ५८-५९)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 C
६७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
परमेश्वरको जानता हूँ। इनकी अंगकान्ति सूर्यके समान है। ये प्रभु अज्ञानान्धकारसे परे विराजमान हैं।$^{१}$ इन परमात्मासे परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इनसे अत्यन्त सूक्ष्म और इनसे अधिक महान् भी कुछ नहीं है। इनसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है। इनके सब ओर हाथ, पैर, नेत्र, मस्तक, मुख और कान हैं। ये लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित हैं। ये सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाले हैं, परंतु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित हैं। सबके स्वामी, शासक, शरणदाता और सुहृद् हैं। ये नेत्रके बिना भी देखते हैं और कानके बिना भी सुनते हैं। ये सबको जानते हैं, किंतु इनको पूर्णरूपसे जाननेवाला कोई नहीं है। इन्हें परम पुरुष कहते हैं। ये अणुसे भी अत्यन्त अणु और महान्से भी परम महान् हैं। ये अविनाशी महेश्वर इस जीवकी हृदय-गुफामें निवास करते हैं।$^{२}$
एक साथ रहनेवाले दो पक्षी एक ही वृक्ष (शरीर)-का आश्रय लेकर रहते हैं। उनमेंसे एक तो उस वृक्षके कर्मरूप फलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु दूसरा उस वृक्षके फलका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है।$^{३}$ जीवात्मा इस वृक्षके प्रति आसक्तिमें डूबा हुआ है, अतः मोहित होकर शोक करता रहता है। वह जब कभी भगवत्कृपासे भक्तसेवित परम कारणरूप परमेश्वरका और उनकी महिमाका साक्षात्कार कर लेता है, तब शोकरहित हो सुखी हो जाता है। छन्द, यज्ञ, क्रतु तथा भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण विश्वको वह मायावी रचता है और मायासे ही उसमें प्रविष्ट होकर रहता है। प्रकृतिको ही माया समझना चाहिये और महेश्वर ही वह मायावी है।$^{४}$ ये विश्वकर्मा महेश्वर ही परम देवता परमात्मा हैं, जो सबके हृदयमें विराजमान हैं। उन्हें जानकर ही पुरुष परमानन्दमय अमृतका अनुभव करता है। ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, असीम एवं अविनाशी परमात्मामें विद्या और अविद्या दोनों गूढ़भावसे स्थित
१-विश्वस्मादधिको रुद्रो महर्षिरिति हि श्रुतिः॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तममृतं ध्रुवम्। आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्संस्थितं प्रभुम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। १७-१८)
२-सर्वतःपाणिपादोऽयं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः। सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासः सर्वेन्द्रियविवर्जितः। सर्वस्य प्रभुरीशानः सर्वस्य शरणं सुहृत्॥
अचक्षुरपि यः पश्यत्यकर्णोऽपि शृणोति यः। सर्वं वेत्ति न वेत्तास्य तमाहुः पुरुषं परम्॥
अणोरणीयान्महतो महीयानयमव्ययः। गुहायां निहितश्चापि जन्तोरस्य महेश्वरः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। २१-२४)
३-द्वौ सुपर्णौ च सयुजौ समानं वृक्षमाश्रितौ। एकोऽत्ति पिप्पलं स्वादु परोऽनश्नन् प्रपश्यति॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ३०)
४-छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो यद्भूतं भव्यमेव च।
माया विश्वं सृजत्यस्मिन्निविष्टो मायया परः। मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ३२-३३)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—22 D
* वायवीयसंहिता * ६७७
हैं। विनाशशील जडवर्गको ही यहाँ अविद्या कहा गया है और अविनाशी जीवको विद्या नाम दिया गया है; जो उन दोनों विद्या और अविद्यापर शासन करते हैं, वे महेश्वर उनसे सर्वथा भिन्न—विलक्षण हैं। ये प्रतापी महेश्वर इस जगत्में समष्टिभूत और इन्द्रियवर्गरूप एक-एक जालको अनेक प्रकारसे रचकर इसका विस्तार करते हैं। फिर अन्तमें संहार करके सबको अनेकसे एकमें परिणत कर देते हैं तथा पुनः सृष्टिकालमें सबकी पूर्ववत् रचना करके सबपर आधिपत्य करते हैं। जैसे सूर्य अकेला ही ऊपर-नीचे तथा अगल-बगलकी दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ स्वयं भी देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार ये भजनीय परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप पृथ्वी आदि तत्त्वोंका नियमन करते हैं। श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होनेयोग्य, आश्रयरहित कहे जानेवाले, जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले, कल्याण-स्वरूप एवं सोलह कलाओंकी रचना कर उन महादेवको जो जानते हैं, वे शरीरके बन्धनको सदाके लिये त्याग देते हैं अर्थात् जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं।
वे ही परमेश्वर तीनों कालोंसे परे, निष्कल, सर्वज्ञ, त्रिगुणाधीश्वर एवं साक्षात् परात्पर ब्रह्म हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका रूप है। वे सबकी उत्पत्तिके कारण होकर भी स्वयं अजन्मा हैं, स्तुतिके योग्य हैं, प्रजाओंके पालक, देवताओंके भी देवता और सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय हैं। अपने हृदयमें विराजमान उन परमेश्वरकी हम उपासना करते हैं। जो काल आदिसे परे, जिनसे यह समस्त प्रपंच प्रकट होता है, जो धर्मके पालक, पापके नाशक, भोगोंके स्वामी तथा सम्पूर्ण विश्वके धाम हैं, जो ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता तथा पतियोंके भी परम पति हैं, उन भुवनेश्वरोंके भी ईश्वर महादेवको हम सबसे परे जानते हैं। उनके शरीररूप कार्य और इन्द्रिय तथा मनरूपी करण नहीं हैं, उनके समान और उनसे अधिक भी इस जगत्में कोई नहीं दिखायी देता। ज्ञान, बल और क्रियारूप उनकी स्वाभाविक पराशक्ति वेदोंमें नाना प्रकारकी सुनी गयी है। उन्हीं शक्तियोंसे इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। उसका न कोई स्वामी है, न कोई निश्चित चिह्न है, न उसपर किसीका शासन है। वह समस्त कारणोंका कारण होता हुआ ही उनका अधीश्वर भी है। उनका न कोई जन्मदाता है, न जन्म है, न जन्मके माया-मलादि हेतु ही हैं। वह एक ही सम्पूर्ण विश्वमें, समस्त भूतोंमें गुहारूपसे व्याप्त है। वही सब भूतोंका अन्तरात्मा और धर्माध्यक्ष कहलाता है। वह सब भूतोंके अंदर बसा हुआ, सबका द्रष्टा, साक्षी, चेतन और निर्गुण है। वह एक है, वशी है, अनेकों विवशात्मा निष्क्रिय पुरुषोंको वशमें रखनेवाला है। वह नित्योंका नित्य, चेतनोंका चेतन है। वह एक है, कामनारहित है और बहुतोंकी कामना पूर्ण करनेवाला ईश्वर है। सांख्य और योग अर्थात् ज्ञानयोग और निष्काम कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य सबके कारणरूप उन जगदीश्वर परमदेवको जानकर जीव सम्पूर्ण पाशों (बन्धनों)-से मुक्त हो जाता है। वे सम्पूर्ण विश्वके स्रष्टा, सर्वज्ञ, स्वयं ही अपने प्राकट्यके हेतु, ज्ञानस्वरूप, कालके भी स्रष्टा, सम्पूर्ण दिव्य गुणोंसे सम्पन्न, प्रकृति और जीवात्माके
| ६७८ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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स्वामी, समस्त गुणोंके शासक तथा संसार-बन्धनसे छुड़ानेवाले हैं। जिन परमदेवने सबसे पहले ब्रह्माजीको उत्पन्न किया और स्वयं उन्हें वेदोंका ज्ञान दिया, अपने स्वरूपविषयक बुद्धिको प्रसन्न (विकसित) करनेवाले उन परमेश्वर शिवको जानकर मैं इस संसारबन्धनसे छूटनेके लिये उनकी शरणमें जाता हूँ।$^१$
यह वेदान्तशास्त्रका परम गोपनीय ज्ञान है; पूर्वकल्पमें मुझे इसका उपदेश किया गया था। मैंने बड़े भारी सौभाग्यसे ब्रह्माजीके मुखसे इस ज्ञानको पाया था। जो शम-दमसे रहित हो, उसे इस परम उत्तम ज्ञानका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो अपना पुत्र, सदाचारी तथा शिष्य न हो, उसे भी नहीं देना चाहिये। जिनकी परमदेव परमेश्वरमें परम भक्ति है, जैसे परमेश्वरमें है, वैसे ही गुरुमें भी है, उस महात्मा पुरुषके हृदयमें ही ये बताये हुए रहस्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं।$^२$ अतः संक्षेपसे यह सिद्धान्तकी बात सुनो। भगवान् शिव प्रकृति और पुरुषसे परे हैं। वे ही सृष्टिकालमें जगत्को रचते और संहारकालमें पुनः सबको आत्मसात् कर लेते हैं। (अध्याय ६)
१-परस्त्रिकालादकलः स एव परमेश्वरः। सर्ववित् त्रिगुणाधीशो ब्रह्म साक्षात् परात्परः॥
तं विश्वरूपमभवं भवमीड्यं प्रजापतिम्। देवदेवं जगत्पूज्यं स्वचित्तस्थमुपास्महे॥
कालादिभिः परो यस्मात् प्रपञ्चः परिवर्तते। धर्मावहं पापनुदं भोगेशं विश्वधाम च॥
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशवरेश्वरम्॥
न तस्य विद्यते कार्यं कारणं च न विद्यते। न तत्समोऽधिकश्चापि क्वचिज्जगति दृश्यते॥
परास्य विविधा शक्तिः श्रुतौ स्वाभाविकी श्रुता। ज्ञानं बलं क्रिया चैव याभ्यो विश्वमिदं कृतम्॥
न तस्यास्ति पतिः कश्चिन्नैव लिङ्गं न चेशिता। कारणं कारणानां च स तेषामधिपाधिपः॥
न चास्य जनिता कश्चिन्न च जन्म कुतश्चन। न जन्महेतवस्तद्वन्मलमायादिसंज्ञकाः॥
स एकः सर्वभूतेषु गूढो व्याप्तश्च विश्वतः। सर्वभूतान्तरात्मा च धर्माध्यक्षः स कथ्यते॥
सर्वभूताधिवासश्च साक्षी चेता च निर्गुणः। एको वशी निष्क्रियाणां बहूनां विवशात्मनाम्॥
नित्यानामप्यसौ नित्यश्चेतनानां च चेतनः। एको बहूनां चाकामः कामानीशः प्रयच्छति॥
सांख्ययोगाधिगम्यं यत् कारणं जगतां पतिम्। ज्ञात्वा देवं पशुः पाशैः सर्वैरेव विमुच्यते॥
विश्वकृद् विश्ववित् स्वात्मयोनिजः कालकृद्गुणी। प्रधानः क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः पाशमोचकः॥
ब्रह्माणं विदधे पूर्वं वेदांश्चोपादिशत्स्वयम्। यो देवस्तमहं बुद्ध्वा स्वात्मबुद्धिप्रसादतः॥
मुमुक्षुरस्मात् संसारात् प्रपद्ये शरणं शिवम्। (शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ५५–६८$\frac{१}{२}$)
२-यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० ६। ७५)
* वायवीयसंहिता * ६७९
ब्रह्माजीकी मूर्च्छा, उनके मुखसे रुद्रदेवका प्राकट्य, सप्राण हुए ब्रह्माजीके द्वारा आठ नामोंसे महेश्वरकी स्तुति तथा रुद्रकी आज्ञासे ब्रह्माद्वारा सृष्टि-रचना
तदनन्तर कालमहिमा, प्रलय, ब्रह्माण्डकी स्थिति तथा सर्ग आदिका वर्णन करके वायु-देवताने कहा—पहले ब्रह्माजीने पाँच मानसपुत्रोंको उत्पन्न किया, जो उनके ही समान थे। उनके नाम इस प्रकार हैं— सनक, सनन्दन, विद्वान् सनातन, ऋभु और सनत्कुमार। वे सब-के-सब योगी, वीतराग और ईर्ष्यादोषसे रहित थे। इन सबका मन ईश्वरके चिन्तनमें लगा रहता था। इसलिये उन्होंने सृष्टिरचनाकी इच्छा नहीं की। सृष्टिसे विरत हो सनक आदि महात्मा जब चले गये, तब ब्रह्माजीने पुनः सृष्टिकी इच्छासे बड़ी भारी तपस्या की। इस प्रकार दीर्घकालतक तपस्या करनेपर भी जब कोई काम न बना, तब उनके मनमें दुःख हुआ। उस दुःखसे क्रोध प्रकट हुआ। क्रोधसे आविष्ट होनेपर ब्रह्माजीके दोनों नेत्रोंसे आँसूकी बूँदें गिरने लगीं। उन अश्रुबिन्दुओंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। अश्रुसे उत्पन्न हुए उन सब भूतों-प्रेतोंको देखकर ब्रह्माजीने अपनी निन्दा की। उस समय क्रोध और मोहके कारण उन्हें तीव्र मूर्च्छा आ गयी। क्रोधसे आविष्ट हुए प्रजापतिने मूर्च्छित होनेपर अपने प्राण त्याग दिये। तब प्राणोंके स्वामी भगवान् नीललोहित रुद्र अनुपम कृपाप्रसाद प्रकट करनेके लिये ब्रह्माजीके मुखसे वहाँ प्रकट हुए। उन जगदीश्वर प्रभुने अपनेको ग्यारह रूपोंमें प्रकट किया। महादेवजीने अपने उन महामना ग्यारह स्वरूपोंसे कहा—'बच्चो! मैंने लोकपर अनुग्रह करनेके लिये तुमलोगोंकी सृष्टि की है; अतः तुम आलस्यरहित हो सम्पूर्ण लोककी स्थापना, हितसाधन तथा प्रजा-संतानकी वृद्धिके लिये प्रयत्न करो।'
महेश्वरके ऐसा कहनेपर वे रोने और चारों ओर दौड़ने लगे। रोने और दौड़नेके कारण उनका नाम 'रुद्र' हुआ। जो रुद्र हैं, वे निश्चय ही प्राण हैं और जो प्राण हैं, वे महात्मा रुद्र हैं। तत्पश्चात् ब्रह्मपुत्र महेश्वरने दया करके मरे हुए देवता परमेष्ठी ब्रह्माजीको पुनः प्राण-दान दिया। ब्रह्माजीके शरीरमें प्राणोंके लौट आनेपर रुद्रदेवका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। उन विश्वनाथने ब्रह्माजीसे यह उत्तम बात कही—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले जगद्गुरु महाभाग विरिंच ! डरो मत ! डरो मत ! मैंने तुम्हारे प्राणोंको नूतन जीवन प्रदान किया है; अतः सुखसे उठो।' स्वप्नमें सुने हुए वाक्यकी भाँति उस मनोहर वचनको सुनकर ब्रह्माजीने प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर नेत्रोंद्वारा धीरेसे भगवान् हरकी ओर देखा। उनके प्राण पहलेकी तरह लौट आये थे। अतः ब्रह्माजीने दोनों हाथ जोड़ स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीद्वारा उनसे कहा—'प्रभो! आप दर्शनमात्रसे मेरे मनको आनन्द प्रदान कर रहे हैं; अतः बताइये, आप कौन हैं? जो सम्पूर्ण जगत्के रूपमें स्थित हैं, क्या वे ही भगवान् आप ग्यारह रूपोंमें प्रकट हुए हैं?'
उनकी यह सब बात सुनकर देवताओंके स्वामी महेश्वर अपने परम सुखदायक
| ६८० | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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करकमलोंद्वारा ब्रह्माजीका स्पर्श करते हुए बोले—'देव! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं परमात्मा हूँ और इस समय तुम्हारा पुत्र होकर प्रकट हुआ हूँ। ये जो ग्यारह रुद्र हैं, तुम्हारी सुरक्षाके लिये यहाँ आये हैं। अतः तुम मेरे अनुग्रहसे इस तीव्र मूर्च्छाको त्यागकर जाग उठो और पूर्ववत् प्रजाकी सृष्टि करो।'
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन विश्वात्माने आठ नामोंद्वारा परमेश्वर शिवका स्तवन किया।
ब्रह्माजी बोले—भगवन्! रुद्र! आपका तेज असंख्य सूर्योंके समान अनन्त है। आपको नमस्कार है। रसस्वरूप और जलमय विग्रहवाले आप भवदेवताको नमस्कार है। नन्दी और सुरभि (कामधेनु) ये दोनों आपके स्वरूप हैं। आप पृथ्वीरूपधारी शर्वको नमस्कार है। स्पर्शमय वायुरूपवाले आपको नमस्कार है। आप ही वसुरूपधारी ईश हैं। आपको नमस्कार है। अत्यन्त तेजस्वी अग्निरूप आप पशुपतिको नमस्कार है। शब्दतन्मात्रासे युक्त आकाशरूपधारी आप भीमदेवको नमस्कार है। उग्ररूपवाले यजमानमूर्ति आपको नमस्कार है। सोमरूप आप अमृतमूर्ति महादेवजीको नमस्कार है। इस प्रकार आठ मूर्ति और आठ नामवाले आप भगवान् शिवको मेरा नमस्कार है।*
इस प्रकार विश्वनाथ महादेवजीकी स्तुति करके लोकपितामह ब्रह्माने प्रणामपूर्वक उनसे प्रार्थना की—'भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी मेरे पुत्र भगवान् महेश्वर! कामनाशन! आप सृष्टिके लिये मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए हैं; इसलिये जगत्प्रभो! इस महान् कार्यमें संलग्न हुए मुझ ब्रह्माकी आप सर्वत्र सहायता करें और स्वयं भी प्रजाकी सृष्टि करें।'
ब्रह्माजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर कल्याणकारी, त्रिपुरनाशक रुद्रदेवने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी बात मान ली। तदनन्तर प्रसन्न हुए महादेवजीका अभिनन्दन करके सृष्टिके लिये उनकी आज्ञा पाकर भगवान् ब्रह्माने अन्यान्य प्रजाओंकी सृष्टि आरम्भ की। उन्होंने अपने मनसे ही मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि और वसिष्ठकी सृष्टि की। ये सब ब्रह्माजीके पुत्र कहे गये हैं। धर्म, संकल्प और रुद्रके साथ इनकी संख्या बारह होती है। ये सब पुराने गृहस्थ हैं। देवगणोंसहित इनके बारह दिव्य वंश कहे गये हैं। जो प्रजावान्, क्रियावान् तथा महर्षियोंसे अलंकृत हैं। तत्पश्चात् जलपर स्थित हुए रुद्रसहित ब्रह्माजीने देवताओं, असुरों, पितरों और
* ब्रह्मोवाच—
नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे। नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयात्मने ॥
शर्वाय क्षितिरूपाय नन्दीसुरभये नमः। ईशाय वसवे तुभ्यं नमः स्पर्शमयात्मने ॥
पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे। भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः ॥
उग्रायोग्रस्वरूपाय यजमानात्मने नमः। महाशिवाय सोमाय नमस्त्वमृतमूर्तये ॥
(शि० पु० वा० सं० पू० खं० १२। ४१–४४)
* वायवीयसंहिता * ६८१
मनुष्योंकी सृष्टि करनेका विचार किया। ब्रह्माजीने सृष्टिके लिये समाधिस्थ हो अपने चित्तको एकाग्र किया। तत्पश्चात् मुखसे देवताओंको, कोखसे पितरोंको, कटिके अगले भागसे असुरोंको तथा प्रजनननेन्द्रिय (लिंग)-से सब मनुष्योंको उत्पन्न किया। उनके गुदास्थानसे राक्षस उत्पन्न हुए, जो सदा भूखसे व्याकुल रहते हैं। उनमें तमोगुण और रजोगुणकी प्रधानता होती है। वे रातको विचरते और बलवान् होते हैं। साँप, यक्ष, भूत और गन्धर्व ये भी ब्रह्माजीके अंगोंसे उत्पन्न हुए। उनके पक्षभागसे पक्षी हुए। वक्षःस्थलसे अजंगम (स्थावर) प्राणियोंका जन्म हुआ। मुखसे बकरों और पार्श्वभागसे भुजंगमोंकी उत्पत्ति हुई। दोनों पैरोंसे घोड़े, हाथी, शरभ, नीलगाय, मृग, ऊँट, खच्चर, न्यंकु नामक मृग तथा पशुजातिके अन्यान्य प्राणी उत्पन्न हुए। रोमावलियोंसे ओषधियों और फल-मूलोंका प्राकट्य हुआ। ब्रह्माजीके पूर्ववर्ती मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत् स्तोम, रथन्तर साम तथा अग्निष्टोम नामक यज्ञकी उत्पत्ति हुई। उनके दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदश स्तोम, बृहत्साम और उक्थ नामक यज्ञकी उत्पत्ति हुई। उन्होंने अपने पश्चिम मुखसे सामवेद, जगती छन्द, सप्तदश स्तोम, वैरूप्य साम और अतिरात्र नामक यज्ञको प्रकट किया। उनके उत्तरवर्ती मुखसे एकविंश स्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्याम नामक यम, अनुष्टुपछन्द और वैराज नामक सामका प्रादुर्भाव हुआ। उनके अंगोंसे और भी बहुत-से छोटे-बड़े प्राणी उत्पन्न हुए। उन्होंने यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, अप्सराओंके समुदाय, मनुष्य, किंनर, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग और सर्प आदि सम्पूर्ण नित्य एवं अनित्य स्थावर-जंगम जगत्की रचना की। उनमेंसे जिन्होंने जैसे-जैसे कर्म पूर्वकल्पोंमें अपनाये थे, पुनः-पुनः सृष्टि होनेपर उन्होंने फिर उन्हीं कर्मोंको अपनाया। उस समय वे अपनी पूर्वभावनासे भावित होकर हिंसा-अहिंसासे युक्त मृदु-कठोर, धर्म-अधर्म तथा सत्य और मिथ्या कर्मको अपनाते हैं; क्योंकि पहलेकी वासनाके अनुकूल कर्म ही उन्हें अच्छे लगते हैं।
इस प्रकार विधाताने ही स्वयं इन्द्रियोंके विषय, भूत और शरीर आदिमें विभिन्नता एवं व्यवहारकी सृष्टि की है। उन पितामहने कल्पके आरम्भमें देवता आदि प्राणियोंके नाम, रूप तथा कार्य-विस्तारको वेदोक्त वर्णनके अनुसार ही निश्चित किया। ऋषियोंके नाम तथा जीविका-साधक कर्म भी उन्होंने वेदोंके अनुसार ही निर्दिष्ट किये। अपनी रात व्यतीत होनेपर अजन्मा ब्रह्माने स्वरचित प्राणियोंको वे ही नाम और कर्म दिये, जो पूर्वकल्पमें उन्हें प्राप्त थे। जिस प्रकार भिन्न-भिन्न ऋतुओंके पुनः-पुनः आनेपर उनके चिह्न और नाम-रूप आदि पूर्ववत् रहते हैं, उसी प्रकार युगादि कालमें भी उनके पूर्वभाव ही दृष्टिगोचर होते हैं। इस प्रकार स्वयम्भू ब्रह्माजीकी लोकसृष्टि उन्हींके विभिन्न अंगोंसे प्रकट हुई हैं। महत्से लेकर विशेषपर्यन्त सब कुछ प्रकृतिका विकार है। यह प्राकृत जगत् चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभासे उद्भासित, ग्रह और नक्षत्रोंसे मण्डित, नदियों, पर्वतों तथा समुद्रोंसे अलंकृत और भाँति-भाँतिके रमणीय नगरों एवं समृद्धिशाली जनपदोंसे सुशोभित है। इसीको ब्रह्माजीका वन या ब्रह्मवृक्ष कहते हैं।
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उस ब्रह्मवनमें अव्यक्त एवं सर्वज्ञ ब्रह्मा विचरते हैं। वह सनातन ब्रह्मवृक्ष अव्यक्त-रूपी बीजसे प्रकट एवं ईश्वरके अनुग्रहपर स्थित है। बुद्धि इसका तना और बड़ी-बड़ी डालियाँ हैं। इन्द्रियाँ भीतरके खोखले हैं। महाभूत इसकी सीमा है। विशेष पदार्थ इसके निर्मल पत्ते हैं। धर्म और अधर्म इसके सुन्दर फूल हैं। इसमें सुख और दुःखरूपी फल लगते हैं तथा यह सम्पूर्ण भूतोंके जीवनका सहारा है। ब्राह्मणलोग द्युलोकको उनका मस्तक, आकाशको नाभि, चन्द्रमा और सूर्यको नेत्र, दिशाओंको कान और पृथ्वीको उनके पैर बताते हैं। वे अचिन्त्य-स्वरूप महेश्वर ही सब भूतोंके निर्माता हैं। उनके मुखसे ब्राह्मण प्रकट हुए हैं। वक्षः-स्थलके ऊपरी भागसे क्षत्रियोंकी उत्पत्ति हुई है, दोनों जाँघोंसे वैश्य और पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार उनके अंगोंसे ही सम्पूर्ण वर्णोंका प्रादुर्भाव हुआ है। (अध्याय ७-१२)
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भगवान् रुद्रके ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट होनेका रहस्य, रुद्रके महामहिम स्वरूपका वर्णन, उनके द्वारा रुद्रगणोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीके रोकनेसे उनका सृष्टिसे विरत होना
ऋषि बोले—प्रभो! आपने चतुर्मुख ब्रह्माके मुखसे परमात्मा रुद्रदेवकी सृष्टि बतायी है। इस विषयमें हमको संशय होता है। जो प्रलयकालमें कुपित होकर ब्रह्मा, विष्णु और अग्निसहित समस्त लोकका संहार कर डालते हैं; जिन्हें ब्रह्मा और विष्णु भयसे प्रणाम करते हैं, जिन लोकसंहारकारी महेश्वरके वशमें वे दोनों सदा ही रहते हैं, जिन महादेवजीने पूर्वकालमें ब्रह्मा और विष्णुको अपने शरीरसे प्रकट किया था, जो प्रभु सदा ही उन दोनोंके योगक्षेमका निर्वाह करनेवाले हैं, वे आदिदेव पुरातन पुरुष भगवान् रुद्र अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके पुत्र कैसे हो गये ? तात ! भगवान् ब्रह्माने मुनियोंसे जैसी बात बतायी थी, वह सब आप ठीक-ठीक कहिये। भगवान् शिवके उत्तम यशका श्रवण करनेके लिये हमारे हृदयमें बड़ी श्रद्धा है।
वायुदेवताने कहा—ब्राह्मणो! तुम सब लोग जिज्ञासामें कुशल हो, अतः तुमने यह बहुत ही उचित प्रश्न किया है। मैंने भी पूर्वकालमें पितामह ब्रह्माजीके समक्ष यही प्रश्न रखा था। उसके उत्तरमें पितामहने मुझसे जो कुछ कहा था, वही मैं तुम्हें बताऊँगा। जैसे रुद्रदेव उत्पन्न हुए और फिर जिस प्रकार ब्रह्मा और विष्णुकी परस्पर उत्पत्ति हुई, वह सब विषय सुना रहा हूँ। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—तीनों ही कारणात्मा हैं। वे क्रमशः चराचर जगत्की सृष्टि, पालन और संहारके हेतु हैं और साक्षात् महेश्वरसे प्रकट हुए हैं। उनमें परम ऐश्वर्य विद्यमान है। वे परमेश्वरसे भावित और उनकी शक्तिसे अधिष्ठित हो सदा उनके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। पूर्वकालमें पिता महेश्वरने ही उन तीनोंको तीन कर्मोंमें नियुक्त किया था। ब्रह्माकी सृष्टिकार्यमें, विष्णुकी रक्षाकार्यमें
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तथा रुद्रकी संहारकार्यमें नियुक्ति हुई थी। कल्पान्तरमें परमेश्वर शिवके प्रसादसे रुद्रदेवने ब्रह्मा और नारायणकी सृष्टि की थी। इसी तरह दूसरे कल्पमें जगन्मय ब्रह्माने रुद्र तथा विष्णुको उत्पन्न किया था। फिर कल्पान्तरमें भगवान् विष्णुने भी रुद्र तथा ब्रह्माकी सृष्टि की थी। इस तरह पुनः ब्रह्माने नारायणकी और रुद्रदेवने ब्रह्माकी सृष्टि की। इस प्रकार विभिन्न कल्पोंमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर परस्पर उत्पन्न होते और एक-दूसरेका हित चाहते हैं। उन-उन कल्पोंके वृत्तान्तको लेकर महर्षिगण उनके प्रभावका वर्णन किया करते हैं।
प्रत्येक कल्पमें भगवान् रुद्रके आविर्भावका जो कारण है, उसे बता रहा हूँ। उन्हींके प्रादुर्भावसे ब्रह्माजीकी सृष्टिका प्रवाह अविच्छिन्नरूपसे चलता रहता है। ब्रह्माण्डसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्मा प्रत्येक कल्पमें प्रजाकी सृष्टि करके प्राणियोंकी वृद्धि न होनेसे जब अत्यन्त दुःखी हो मूर्च्छित हो जाते हैं, तब उनके दुःखकी शान्ति और प्रजावर्गकी वृद्धिके लिये उन-उन कल्पोंमें रुद्रगणोंके स्वामी कालस्वरूप नीललोहित महेश्वर रुद्र अपने कारणभूत परमेश्वरकी आज्ञासे ब्रह्माजीके पुत्र होकर उनपर अनुग्रह करते हैं। वे ही तेजोराशि, अनामय, अनादि, अनन्त, धाता, भूतसंहारक और सर्वव्यापी भगवान् ईश परम ऐश्वर्यसे संयुक्त, परमेश्वरसे भावित और सदा उन्हींकी शक्तिसे अधिष्ठित हो उन्हींके चिह्न धारण करते हैं। उन्हींके नामसे प्रसिद्ध हो उन्हींके समान रूप धारणकर उनके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। इनका सारा व्यवहार उन्हीं परमेश्वरके समान होता है। ये उनकी आज्ञाके पालक हैं। सहस्रों सूर्योंके समान उनका तेज है। वे अर्धचन्द्रको आभूषणके रूपमें धारण करते हैं। उनके हार, बाजूबंद और कड़े सर्पमय हैं। वे मूँजकी मेखला धारण करते हैं। जलंधर, विरिंच और इन्द्र उनकी सेवामें खड़े रहते हैं तथा हाथमें कपालखण्ड उनकी शोभा बढ़ाता है। गंगाकी ऊँची तरंगोंसे उनके पिंगलवर्णवाले केश और मुख भीगे रहते हैं। उनके कमनीय कैलास पर्वतके विभिन्न प्रान्त टूटी हुई दाढ़वाले सिंह आदि वन्य पशुओंसे आक्रान्त हैं। उनके बायें कानोंके पास गोलाकार कुण्डल झिलमिलाता रहता है। वे महान् वृषभपर सवारी करते हैं। उनकी वाणी महान् मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर है, कान्ति प्रचण्ड अग्निके समान उद्दीप्त है और बल-पराक्रम भी महान् है। इस प्रकार ब्रह्मपुत्र महेश्वरका विशाल रूप बड़ा भयानक है। वे ब्रह्माजीको विज्ञान देकर सृष्टिकार्यमें उनकी सहायता करते हैं। अतः रुद्रके कृपाप्रसादसे प्रत्येक कल्पमें प्रजापतिकी प्रजासृष्टि प्रवाह-रूपसे नित्य बनी रहती है।
एक समय ब्रह्माजीने नीललोहित भगवान् रुद्रसे सृष्टि करनेकी प्रार्थना की। तब भगवान् रुद्रने मानसिक संकल्पके द्वारा बहुत-से पुरुषोंकी सृष्टि की। वे सब-के-सब उनके अपने ही समान थे। सबने जटाजूट धारण कर रखे थे। सभी निर्भय, नीलकण्ठ और त्रिनेत्र थे। जरा और मृत्यु उनके पास नहीं पहुँचने पाती थी। चमकीले शूल उनके श्रेष्ठ आयुध थे। उन रुद्रगणोंने सम्पूर्ण चौदह भुवनोंको आच्छादित कर लिया था। उन विविध रुद्रोंको देखकर पितामहने रुद्रदेवसे
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कहा—'देवदेवेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप ऐसी प्रजाओंकी सृष्टि न कीजिये, आपका कल्याण हो। अब दूसरी प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये, जो मरणधर्मवाली हों।'
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर परमेश्वर रुद्र उनसे हँसते हुए बोले—'मेरी सृष्टि वैसी नहीं होगी। अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि तुम्हीं करो।' ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी भगवान् रुद्र उन रुद्रगणोंके साथ प्रजाकी सृष्टिके कार्यसे निवृत्त हो गये।
(अध्याय १३-१४)
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ब्रह्माजीके द्वारा अर्द्धनारीश्वररूपकी स्तुति तथा उस स्तोत्रकी महिमा
वायुदेव कहते हैं—जब फिर ब्रह्माजीकी रची हुई प्रजा बढ़ न सकी, तब उन्होंने पुनः मैथुनी सृष्टि करनेका विचार किया। इसके पहले ईश्वरसे नारियोंका समुदाय प्रकट नहीं हुआ था। इसलिये तबतक पितामह मैथुनी सृष्टि नहीं कर सके थे। तब उन्होंने मनमें ऐसे विचारको स्थान दिया, जो निश्चितरूपसे उनके मनोरथकी सिद्धिमें सहायक था। उन्होंने सोचा कि प्रजाओंकी वृद्धिके लिये परमेश्वरसे ही पूछना चाहिये; क्योंकि उनकी कृपाके बिना ये प्रजाएँ बढ़ नहीं सकतीं। ऐसा सोचकर विश्वात्मा ब्रह्माने तपस्या करनेकी तैयारी की। तब जो आद्या, अनन्ता, लोकभाविनी, सूक्ष्मतरा, शुद्धा, भावगम्या, मनोहरा, निर्गुणा, निष्प्रपंचा, निष्कला, नित्या तथा सदा ईश्वरके पास रहनेवाली जो उनकी परमा शक्ति है, उसीसे युक्त भगवान् त्रिलोचनका अपने हृदयमें चिन्तन करते हुए ब्रह्माजी बड़ी भारी तपस्या करने लगे। तीव्र तपस्यामें लगे हुए परमेष्ठी ब्रह्मापर उनके पिता महादेवजी थोड़े ही समयमें संतुष्ट हो गये। तदनन्तर अपने अनिर्वचनीय अंशसे किसी अद्भुत मूर्तिमें आविष्ट हो भगवान् महादेव आधे शरीरसे नारी और आधे शरीरसे ईश्वर होकर स्वयं ब्रह्माजीके पास गये। उन सर्वव्यापी, सब कुछ देनेवाले, सत्-असत्से रहित, समस्त उपमाओंसे शून्य, शरणागतवत्सल और सनातन शिवको दण्डवत् प्रणाम करके ब्रह्माजी उठे और हाथ जोड़ महादेवजी तथा महादेवी पार्वतीकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्मा बोले—देव ! महादेव ! आपकी जय हो। ईश्वर ! महेश्वर ! आपकी जय हो। सर्वगुणश्रेष्ठ शिव ! आपकी जय हो।