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श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

तब मेरी ओरसे निराश होकर उस कन्याने मेरी सम्मतिसे यवनराज भयके पास जाकर उसका पतिरूपसे वरण किया ।।२३।। और कहा, ‘वीरवर! आप यवनोंमें श्रेष्ठ हैं, मैं आपसे प्रेम करती हूँ और पति बनाना चाहती हूँ। आपके प्रति किया हुआ जीवोंका संकल्प कभी विफल नहीं होता ।।२४।। जो मनुष्य लोक अथवा शास्त्रकी दृष्टिसे देनेयोग्य वस्तुका दान नहीं करता और जो शास्त्रदृष्टिसे अधिकारी होकर भी ऐसा दान नहीं लेता, वे दोनों ही दुराग्रही और मूढ़ हैं, अतएव शोचनीय हैं ।।२५।। भद्र! इस समय मैं आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ, आप मुझे स्वीकार करके अनुगृहीत कीजिये। पुरुषका सबसे बड़ा धर्म दीनोंपर दया करना ही है’ ।।२६।।

कालकन्याकी बात सुनकर यवनराजने विधाताका एक गुप्त कार्य करानेकी इच्छासे मुसकराते हुए उससे कहा ।।२७।। ‘मैंने योगदृष्टिसे देखकर तेरे लिये एक पति निश्चय किया है। तू सबका अनिष्ट करनेवाली है, इसलिये किसीको भी अच्छी नहीं लगती और इसीसे लोग तुझे स्वीकार नहीं करते। अतः इस कर्मजनित लोकको तू अलक्षित होकर बलात् भोग। तू मेरी सेना लेकर जा; इसकी सहायतासे तू सारी प्रजाका नाश करनेमें समर्थ होगी, कोई भी तेरा सामना न कर सकेगा ।।२८-२९।। यह प्रज्वार नामका मेरा भाई है और तू मेरी बहिन बन जा। तुम दोनोंके साथ मैं अव्यक्त गतिसे भयंकर सेना लेकर सारे लोकोंमें विचरूँगा’ ।।३०।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्याने सप्तविंशोऽध्यायः ।।२७।।


१. प्रा० पा०—आससादाथ वै। २. प्रा० पा०—पुरीं। ३. प्रा० पा०—उपानीतं। ४. प्रा० पा०—दौर्भागेन।

अथाष्टाविंशोऽध्यायः

पुरंजनको स्त्रीयोनिकी प्राप्ति और अविज्ञातके उपदेशसे उसका मुक्त होना

नारद उवाच

सैनिका भयनाम्नो ये बर्हिष्मन् दिष्टकारिणः ।
प्रज्वारकालकन्याभ्यां विचेरुरवनीमिमाम् ।।१

त एकदा तु रभसा पुरंजनपुरीं नृप ।
रुरुधुर्भौमभोगाढ्यां जरत्पन्नगपालिताम् ।।२

कालकन्यापि बुभुजे पुरंजनपुरं बलात् ।
ययाभिभूतः पुरुषः सद्यो निःसारतामियात् ।।३

तयोपभुज्यमानां वै यवनाः सर्वतोदिशम् ।
द्वाद्भिः प्रविश्य सुभृशं प्रार्दयन् सकलां पुरीम् ।।४

तस्यां प्रपीड्यमानायामभिमानी पुरंजनः ।
अवापोरुविधांस्तापान्¹ कुटुम्बी ममताकुलः ।।५

कन्योपगूढो नष्टश्रीः कृपणो विषयात्मकः ।
नष्टप्रज्ञो हृतैश्वर्यो गन्धर्वयवनैर्बलात् ।।६

विशीर्णां स्वपुरीं वीक्ष्य प्रतिकूलाननादृतान् ।
पुत्रान् पौत्रानुगामात्याञ्जायां च गतसौहृदाम् ।।७

आत्मानं कन्यया ग्रस्तं पंचालानरिदूषितान् ।
दुरन्तचिन्तामापन्नो न लेभे तत्प्रतिक्रियाम् ।।८

कामानभिलषन्दीनो यातयामांश्च कन्यया ।
विगतात्मगतिस्नेहः पुत्रदारांश्च लालयन् ।।९

श्रीनारदजी कहते हैं—राजन्! फिर भय नामक यवनराजके आज्ञाकारी सैनिक प्रज्वार

और कालकन्याके साथ इस पृथ्वीतलपर सर्वत्र विचरने लगे ।।१।। एक बार उन्होंने बड़े वेगसे बूढ़े साँपसे सुरक्षित और संसारकी सब प्रकारकी सुख-सामग्रीसे सम्पन्न पुरंजनपुरीको घेर लिया ।।२।। तब, जिसके चंगुलमें फँसकर पुरुष शीघ्र ही निःसार हो जाता है, वह कालकन्या बलात् उस पुरीकी प्रजाको भोगने लगी ।।३।। उस समय वे यवन भी कालकन्याके द्वारा भोगी जाती हुई उस पुरीमें चारों ओरसे भिन्न-भिन्न द्वारोंसे घुसकर उसका विध्वंस करने लगे ।।४।। पुरीके इस प्रकार पीड़ित किये जानेपर उसके स्वामित्वका अभिमान रखनेवाले तथा ममताग्रस्त, बहुकुटुम्बी राजा पुरंजनको भी नाना प्रकारके क्लेश सताने लगे ।।५।।

कालकन्याके आलिंगन करनेसे उसकी सारी श्री नष्ट हो गयी तथा अत्यन्त विषयासक्त होनेके कारण वह बहुत दीन हो गया, उसकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी। गन्धर्व और यवनोंने बलात् उसका सारा ऐश्वर्य लूट लिया ।।६।। उसने देखा कि सारा नगर नष्ट-भ्रष्ट हो गया है; पुत्र, पौत्र, भृत्य और अमात्यवर्ग प्रतिकूल होकर अनादर करने लगे हैं; स्त्री स्नेहशून्य हो गयी है, मेरी देहको कालकन्याने वशमें कर रखा है और पांचालदेश शत्रुओंके हाथमें पड़कर भ्रष्ट हो गया है। यह सब देखकर राजा पुरंजन अपार चिन्तामें डूब गया और उसे उस विपत्तिसे छुटकारा पानेका कोई उपाय न दिखायी दिया ।।७-८।। कालकन्याने जिन्हें निःसार कर दिया था, उन्हीं भोगोंकी लालसासे वह दीन था। अपनी पारलौकिकी गति और बन्धुजनोंके स्नेहसे वंचित रहकर उसका चित्त केवल स्त्री और पुत्रके लालन-पालनमें ही लगा हुआ था ।।९।।

गन्धर्वयवनाक्रान्तां कालकन्योपमर्दिताम् ।
हातुं प्रचक्रमे राजा९तां पुरीमनिकामतः ॥१०

भयनाम्नोऽग्रजो भ्राता प्रज्वारः प्रत्युपस्थितः ।
ददाह तां पुरीं कृत्स्नां भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ।।११

तस्यां सन्दह्यमानायां सपौरः सपरिच्छदः ।
कौटुम्बिकः कुटुम्बिन्या उपात्तप्यत सान्वयः ।।१२

यवनोपसुरुद्धायतनो ग्रस्तायां कालकन्यया ।
पुर्यां प्रज्वारसंस्पृष्टः पुरपालोऽन्वतप्यत ।।१३

न शेके सोऽवितुं तत्र पुरुकृच्छ्रोरुवेपथुः ।
गन्तुमैच्छत्ततो वृक्षकोटरादिव सानलात् ।।१४

शिथिलावयवो यर्हि गन्धर्वैर्हृतपौरुषः ।
यवनैररिभी राजन्नुपरुद्धो रुरोद ह ।।१५

दुहितॄः पुत्रपौत्रांश्च जामिजामातृपार्वदान्२ । स्वत्वावशिष्टं यत्किञ्चिद् गृहकोशपरिच्छदम् ॥१६

अहं ममेति स्वीकृत्य गृहेषु कुमतिर्गृही । दध्यौ प्रमदया दीनो विप्रयोग उपस्थिते ॥१७

लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी । वर्तिष्यते कथं त्वेषा३ बालकाननुशोचती ॥१८

ऐसी अवस्थामें उनसे बिछुड़नेकी इच्छा न होनेपर भी उसे उस पुरीको छोड़नेके लिये बाध्य होना पड़ा; क्योंकि उसे गन्धर्व और यवनोंने घेर रखा था तथा कालकन्याने कुचल दिया था ।।१०।। इतनेमें ही यवनराज भयके बड़े भाई प्रज्वारने अपने भाईका प्रिय करनेके लिये उस सारी पुरीमें आग लगा दी ।।११।। जब वह नगरी जलने लगी, तब पुरवासी, सेवकवृन्द, सन्तानवर्ग और कुटुम्बकी स्वामिनीके सहित कुटुम्बवत्सल पुरंजनको बड़ा दुःख हुआ ।।१२।। नगरको कालकन्याके हाथमें पड़ा देख उसकी रक्षा करनेवाले सर्पको भी बड़ी पीड़ा हुई, क्योंकि उसके निवासस्थानपर भी यवनोंने अधिकार कर लिया था और प्रज्वार उसपर भी आक्रमण कर रहा था ।।१३।। जब उस नगरकी रक्षा करनेमें वह सर्वथा असमर्थ हो गया, तब जिस प्रकार जलते हुए वृक्षके कोटरमें रहनेवाला सर्प उससे निकल जाना चाहता है, उसी प्रकार उसने भी महान् कष्टसे काँपते हुए वहाँसे भागनेकी इच्छा की ।।१४।। उसके अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ गये थे तथा गन्धर्वोंने उसकी सारी शक्ति नष्ट कर दी थी; अतः जब यवन शत्रुओंने उसे जाते देखकर रोक दिया, तब वह दुःखी होकर रोने लगा ।।१५।।

गृहासक्त पुरंजन देह-गेहादिमें मैं-मेरेपनका भाव रखनेसे अत्यन्त बुद्धिहीन हो गया था। स्त्रीके प्रेमपाशमें फँसकर वह बहुत दीन हो गया था। अब जब इनसे बिछुड़नेका समय उपस्थित हुआ, तब वह अपने पुत्री, पुत्र, पौत्र, पुत्रवधू, दामाद, नौकर और घर, खजाना तथा अन्यान्य जिन पदार्थोंमें उसकी ममताभर शेष थी (उनका भोग तो कभीका छूट गया था), उन सबके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगा ।।१६-१७।। 'हाय! मेरी भार्या तो बहुत घर-गृहस्थीवाली है; जब मैं परलोकको चला जाऊँगा, तब यह असहाय होकर किस प्रकार अपना निर्वाह करेगी? इसे इन बाल-बच्चोंकी चिन्ता ही खा जायगी ।।१८।।

न मय्यनाशिते भुङ्क्ते नास्नाते स्नाति मत्परा । मयि रुष्टे सुसंत्रस्ता१ भर्त्सिते यतवाग्भयात् ॥१९

प्रबोधयति माविज्ञं व्युषिते शोककर्शिता । वर्त्मैतद् गृहमेधीयं वीरसूरपि२नेष्यति ॥२०

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कथं नु दारका दीना दारकीर्वापरायणाः । वर्तिष्यन्ते मयि गते³ भिन्ननाव इवोदधौ ॥२१

एवं कृपणया बुद्ध्या शोचन्तमतदर्हणम् । ग्रहीतुं कृतधीरेनं भयनामाभ्यपद्यत ॥२२

पशुवद्यवनैरेष नीयमानः स्वकं क्षयम् । अन्वद्रवन्ननुपथाः शोचन्तो भृशमातुराः ॥२३

पुरीं विहायोपगत उपरुद्धो भुजंगमः । यदा तमेवानु पुरी विशीर्णा प्रकृतिं गता ॥२४

विकृष्यमाणः प्रसभं यवनेन बलीयसा । नाविन्दत्तमसाऽऽविष्टः सखायं सुहृदं पुरः ॥२५

तं यज्ञपशवोऽनेन संज्ञप्ता येऽदयालुना । कुठारैश्चिच्छिदुः क्रुद्धाः स्मरन्तोऽमीवमस्य तत् ॥२६

अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृतिः समाः । शाश्वतीरनुभूयार्तिं प्रमदासंगदूषितः ॥२७

यह मेरे भोजन किये बिना भोजन नहीं करती थी और स्नान किये बिना स्नान नहीं करती थी, सदा मेरी ही सेवामें तत्पर रहती थी। मैं कभी रूठ जाता था तो यह बड़ी भयभीत हो जाती थी और झिड़कने लगता तो डरके मारे चुप रह जाती थी ।।१९।। मुझसे कोई भूल हो जाती तो यह मुझे सचेत कर देती थी। मुझमें इसका इतना अधिक स्नेह है कि यदि मैं कभी परदेश चला जाता था तो यह विरहव्यथासे सूखकर काँटा हो जाती थी। यों तो यह वीरमाता है, तो भी मेरे पीछे क्या यह गृहस्थाश्रमका व्यवहार चला सकेगी? ।।२०।। मेरे चले जानेपर एकमात्र मेरे ही सहारे रहनेवाले ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्रमें नाव टूट जानेसे व्याकुल हुए यात्रियोंके समान बिलबिलाने लगेंगे' ।।२१।।

यद्यपि ज्ञानदृष्टिसे उसे शोक करना उचित न था, फिर भी अज्ञानवश राजा पुरंजन इस प्रकार दीनबुद्धिसे अपने स्त्री-पुत्रादिके लिये शोकाकुल हो रहा था। इसी समय उसे पकड़नेके लिये वहाँ भय नामक यवनराज आ धमका ।।२२।। जब यवनलोग उसे पशुके समान बाँधकर अपने स्थानको ले चले, तब उसके अनुचरगण अत्यन्त आतुर और शोकाकुल होकर उसके साथ हो लिये ।।२३।। यवनोंद्वारा रोका हुआ सर्प भी उस पुरीको छोड़कर इन सबके साथ ही चल दिया। उसके जाते ही सारा नगर छिन्न-भिन्न होकर अपने कारणमें लीन हो गया ।।२४।।

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इस प्रकार महाबली यवनराजके बलपूर्वक खींचनेपर भी राजा पुरंजनने अज्ञानवश अपने हितैषी एवं पुराने मित्र अविज्ञातका स्मरण नहीं किया ॥२५॥ उस निर्दय राजाने जिन यज्ञपशुओंकी बलि दी थी, वे उसकी दी हुई पीड़ाको याद करके उसे क्रोधपूर्वक कुठारोंसे काटने लगे ॥२६॥ वह वर्षोंतक विवेकहीन अवस्थामें अपार अन्धकारमें पड़ा निरन्तर कष्ट भोगता रहा। स्त्रीकी आसक्तिसे उसकी यह दुर्गति हुई थी ॥२७॥

तामेव मनसा गृह्णन् बभूव प्रमदोत्तमा । अनन्तरं विदर्भस्य राजसिंहस्य वेश्मनि ॥२८

उपयेमे वीर्यपर्णां वैदर्भीं मलयध्वजः । युधि निर्जित्य राजन्यान् पाण्ड्यः परपुरंजयः ॥२९

तस्यां स जनयांचक्र आत्मजामसितेक्षणाम् । यवीयसः सप्त सुतान् सप्त द्रविडभूभृतः ॥३०

एकैकस्याभवत्तेषां राजन्नर्बुदमर्बुदम् । भोक्ष्यते यद्वंशधरैर्मही मन्वन्तरं परम् ॥३१

अगस्त्यः प्राग्दुहितरमुपयेमे धृतव्रताम् । यस्यां दृढच्युतो जात इध्मवाहात्मजो मुनिः ॥३२

विभज्य तनयेभ्यः क्ष्मा राजर्षिर्मलयध्वजः । आरिराधयिषुः कृष्णं स जगाम कुलाचलम् ॥३३

हित्वा गृहान् सुतान् भोगान् वैदर्भी मदिरेक्षणा । अन्वधावत पाण्ड्येशं ज्योत्स्नेव रजनीकरम् ॥३४

तत्र चन्द्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका । तत्पुण्यसलिलैर्नित्यमुभयत्रात्मनो मृजन् ॥३५

कन्दाष्टिभिर्मूलफलैः पुष्पपर्णैस्तृणोदकैः । वर्तमानः शनैर्गात्रकर्शनं तप आस्थितः ॥३६

शीतोष्णवातवर्षाणि क्षुत्पिपासे प्रियाप्रिये ।

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सुखदुःख इति द्वन्द्वान्यजयत्समदर्शनः ॥३७

तपसा विद्यया पक्वकषायो नियमैर्यमैः । युयुजे ब्रह्मण्यात्मानं विजिताक्षानिलाशयः ॥३८

अन्त समयमें भी पुरंजनको उसीका चिन्तन बना हुआ था। इसलिये दूसरे जन्ममें वह नृपश्रेष्ठ विदर्भराजके यहाँ सुन्दरी कन्या होकर उत्पन्न हुआ ॥२८॥ जब यह विदर्भनन्दिनी विवाहयोग्य हुई, तब विदर्भराजने घोषित कर दिया कि इसे सर्वश्रेष्ठ पराक्रमी वीर ही ब्याह सकेगा। तब शत्रुओंके नगरोंको जीतनेवाले पाण्ड्यनरेश महाराज मलयध्वजने समरभूमिमें समस्त राजाओंको जीतकर उसके साथ विवाह किया ॥२९॥ उससे महाराज मलयध्वजने एक श्यामलोचना कन्या और उससे छोटे सात पुत्र उत्पन्न किये, जो आगे चलकर द्रविडदेशके सात राजा हुए ॥३०॥ राजन्! फिर उनमेंसे प्रत्येक पुत्रके बहुत-बहुत पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके वंशधर इस पृथ्वीको मन्वन्तरके अन्ततक तथा उसके बाद भी भोगेंगे ॥३१॥ राजा मलयध्वजकी पहली पुत्री बड़ी व्रतशीला थी। उसके साथ अगस्त्य ऋषिका विवाह हुआ। उससे उनके दृढ़च्युत नामका पुत्र हुआ और दृढ़च्युतके इध्मवाह हुआ ॥३२॥

अन्तमें राजर्षि मलयध्वज पृथ्वीको पुत्रोंमें बाँटकर भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करनेकी इच्छासे मलय पर्वतपर चले गये ॥३३॥ उस समय—चन्द्रिका जिस प्रकार चन्द्रदेवका अनुसरण करती है—उसी प्रकार मत्तलोचना वैदर्भीने अपने घर, पुत्र और समस्त भोगोंको तिलांजलि दे पाण्ड्यनरेशका अनुगमन किया ॥३४॥ वहाँ चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी और वेटोदका नामकी तीन नदियाँ थीं। उनके पवित्र जलमें स्नान करके वे प्रतिदिन अपने शरीर और अन्तःकरणको निर्मल करते थे ॥३५॥ वहाँ रहकर उन्होंने कन्द, बीज, मूल, फल, पुष्प, पत्ते, तृण और जलसे ही निर्वाह करते हुए बड़ा कठोर तप किया। इससे धीरे-धीरे उनका शरीर बहुत सूख गया ॥३६॥ महाराज मलयध्वजने सर्वत्र समदृष्टि रखकर शीत-उष्ण, वर्षा-वायु, भूख-प्यास, प्रिय-अप्रिय और सुख-दुःखादि सभी द्वन्द्वोंको जीत लिया ॥३७॥ तप और उपासनासे वासनाओंको निर्मूल कर तथा यम-नियमादिके द्वारा इन्द्रिय, प्राण और मनको वशमें करके वे आत्मामें ब्रह्मभावना करने लगे ॥३८॥

आस्ते स्थाणुरिवैकत्र दिव्यं वर्षशतं स्थिरः । वासुदेवे भगवति नान्यद्देदोद्वहन् रतिम् ॥३९

स व्यापकतयाऽऽत्मानं व्यतिरिक्ततयाऽऽत्मनि । विद्वान् स्वप्न इवामर्शसाक्षिणं विरराम ह ॥४०

साक्षाद्भगवतोक्तेन गुरुणा हरिणा नृप । विशुद्धज्ञानदीपेन स्फुरता विश्वतोमुखम् ॥४१

परे ब्रह्मणि चात्मानं परं ब्रह्म तथाऽऽत्मनि । वीक्षमाणो विहायेक्षामस्मादुपरराम ह ॥४२

पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम् । प्रेम्णा पर्यचरद्धित्वा भोगान् सा पतिदेवता ॥४३

चीरवासा व्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा । बभावुप पतिं शान्ता शिखा शान्तमिवानलम् ॥४४

अजानती प्रियतमं यदोपरतमंगना । सुस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत् ॥४५

यदा नोपलभेताङ्घावूष्माणं पत्युरर्चती । आसीत्संविग्नहृदया यूथभ्रष्टा मृगी यथा ॥४६

आत्मानं शोचती दीनबन्धुं विक्लवाश्रुभिः । स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्ररुरोद सा ॥४७

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे इमामुदधिमेखलाम् । दस्युभ्यः क्षत्रबन्धुभ्यो बिभ्यतीं पातुमर्हसि ॥४८

इस प्रकार सौ दिव्य वर्षोंतक स्थाणुके समान निश्चलभावसे एक ही स्थानपर बैठे रहे। भगवान् वासुदेवमें सुदृढ़ प्रेम हो जानेके कारण इतने समयतक उन्हें शरीरादिका भी भान न हुआ ॥३९॥ राजन्! गुरुस्वरूप साक्षात् श्रीहरिके उपदेश किये हुए तथा अपने अन्तःकरणमें सब ओर स्फुरित होनेवाले विशुद्ध ज्ञानदीपकसे उन्होंने देखा कि अन्तःकरणकी वृत्तिका प्रकाशक आत्मा स्वप्नावस्थाकी भाँति देहादि समस्त उपाधियोंमें व्याप्त तथा उनसे पृथक् भी है। ऐसा अनुभव करके वे सब ओरसे उदासीन हो गये ॥४०-४१॥ फिर अपनी आत्माको परब्रह्ममें और परब्रह्मको आत्मामें अभिन्नरूपसे देखा और अन्तमें इस अभेद चिन्तनको भी त्यागकर सर्वथा शान्त हो गये ॥४२॥

राजन्! इस समय पतिपरायणा वैदर्भी सब प्रकारके भोगोंको त्यागकर अपने परमधर्मज्ञ पति मलयध्वजकी सेवा बड़े प्रेमसे करती थी ॥४३॥ वह चीर-वस्त्र धारण किये रहती, व्रत उपवासादिके कारण उसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था और सिरके बाल आपसमें उलझ जानेके कारण उनमें लटें पड़ गयी थीं। उस समय अपने पतिदेवके पास वह अंगारभावको प्राप्त धूमरहित अग्निके समीप अग्निकी शान्त शिखाके समान सुशोभित हो रही थी ॥४४॥ उसके पति परलोकवासी हो चुके थे, परन्तु पूर्ववत् स्थिर आसनसे विराजमान थे। इस

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रहस्यको न जाननेके कारण वह उनके पास जाकर उनकी पूर्ववत् सेवा करने लगी ।।४५।। चरणसेवा करते समय जब उसे अपने पतिके चरणोंमें गरमी बिलकुल नहीं मालूम हुई, तब तो वह झुंडसे बिछुड़ी हुई मृगीके समान चित्तमें अत्यन्त व्याकुल हो गयी ।।४६।। उस बीहड़ वनमें अपनेको अकेली और दीन अवस्थामें देखकर वह बड़ी शोकाकुल हुई और आँसुओंकी धारासे स्तनोंको भिगोती हुई बड़े जोर-जोरसे रोने लगी ।।४७।। वह बोली, 'राजर्षे! उठिये, उठिये; समुद्रसे घिरी हुई यह वसुन्धरा लुटेरों और अधार्मिक राजाओंसे भयभीत हो रही है, आप इसकी रक्षा कीजिये' ।।४८।।

एवं विलपती बाला विपिनेऽनुगता पतिम् । पतिता पादयोर्भर्तू रुदत्यश्रूण्यवर्तयत् ।।४९ चितिं१ दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम् । आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे ।।५० तत्र पूर्वतरः कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान् । सान्त्वयन् वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो ।।५१

ब्राह्मण उवाच

का त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि । जानासि२ किं सखायं मां येनाग्रे विचचर्थ३ ह ।।५२ अपि स्मरसि चात्मानमविज्ञातसखं सखे । हित्वा मां पदमन्विच्छन् भौमभोगरतो गतः ।।५३ हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ । अभूतामन्तरा वौकः सहस्रपरिवत्सरान् ।।५४ स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम् । विचरन् पदमद्राक्षीः कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया ।।५५ पंचारामं नवद्वारमेकपालं त्रिकोष्ठकम् । षट्कुलं पंचविपणं पंचप्रकृति स्त्रीधवम् ।।५६ पंचेन्द्रियार्था आरामा द्वारः प्राणा नव प्रभो । तेजोऽबन्नानि कोष्ठानि कुलमिन्द्रियसंग्रहः ।।५७ विपणस्तु क्रियाशक्तिर्भूतप्रकृतिरव्यया । शक्त्यधीशः पुमांस्त्वत्र प्रविष्टो नावबुध्यते ।।५८

पतिके साथ वनमें गयी हुई वह अबला इस प्रकार विलाप करती पतिके चरणोंमें गिर

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गयी और रो-रोकर आँसू बहाने लगी ॥४९॥ लकड़ियोंकी चिता बनाकर उसने उसपर पतिकी शव रखा और अग्नि लगाकर विलाप करते-करते स्वयं सती होनेका निश्चय किया ॥५०॥ राजन्! इसी समय उसका कोई पुराना मित्र एक आत्मज्ञानी ब्राह्मण वहाँ आया। उसने उस रोती हुई अबलाको मधुर वाणीसे समझाते हुए कहा ॥५१॥

ब्राह्मणने कहा—तू कौन है? किसकी पुत्री है? और जिसके लिये तू शोक कर रही है, वह यह सोया हुआ पुरुष कौन है? क्या तुम मुझे नहीं जानती? मैं वही तेरा मित्र हूँ, जिसके साथ तू पहले विचरा करती थी ॥५२॥ सखे! क्या तुम्हें अपनी याद आती है, किसी समय मैं तुम्हारा अविज्ञात नामका सखा था? तुम पृथ्वीके भोग भोगनेके लिये निवास-स्थानकी खोजमें मुझे छोड़कर चले गये थे ॥५३॥ आर्य! पहले मैं और तुम एक-दूसरेके मित्र एवं मानसनिवासी हंस थे। हम दोनों सहस्रों वर्षोंतक बिना किसी निवास-स्थानके ही रहे थे ॥५४॥ किन्तु मित्र! तुम विषयभोगोंकी इच्छासे मुझे छोड़कर यहाँ पृथ्वीपर चले आये! यहाँ घूमते-घूमते तुमने एक स्त्रीका रचा हुआ स्थान देखा ॥५५॥ उसमें पाँच बगीचे, नौ दरवाजे, एक द्वारपाल, तीन परकोटे, छः वैश्यकुल और पाँच बाजार थे। वह पाँच उपादान-कारणोंसे बना हुआ था और उसकी स्वामिनी एक स्त्री थी ॥५६॥ महाराज! इन्द्रियोंके पाँच विषय उसके बगीचे थे, नौ इन्द्रिय-छिद्र द्वार थे; तेज, जल और अन्न—तीन परकोटे थे; मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—छः वैश्यकुल थे; क्रियाशक्तिरूप कर्मेन्द्रियाँ ही बाजार थीं; पाँच भूत ही उसके कभी क्षीण न होनेवाले उपादान कारण थे और बुद्धिशक्ति ही उसकी स्वामिनी थी। यह ऐसा नगर था, जिसमें प्रवेश करनेपर पुरुष ज्ञानशून्य हो जाता है—अपने स्वरूपको भूल जाता है ॥५७-५८॥

तस्मिंस्त्वं रमया स्पृष्टो रममाणोऽश्रुतस्मृतिः । तत्संगादीदृशीं प्राप्तो दशां पापीयसीं प्रभो ॥५९

न त्वं विदर्भदुहिता नायं वीरः सुहृत्तव । न पतिस्त्वं पुरंजन्या रुद्धो नवमुखे यया ॥६०

माया ह्येषा मया सृष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम्१ । मन्यसे नोभयं यद्धै हंसौ पश्यावयोर्र्गतिम् ॥६१

अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः । न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥६२

यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचक्षुषोः । द्विधाभूतमवेक्षेत तथैवान्तरमावयोः ॥६३

एवं स मानसो हंसो हंसेन प्रतिबोधितः ।

स्वस्थस्तदव्यभिचारेण नष्टामाप पुनः स्मृतिम् ॥६४

बर्हिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम्। यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान् विश्वभावनः ॥६५

भाई! उस नगरमें उसकी स्वामिनीके फंदेमें पड़कर उसके साथ विहार करते-करते तुम भी अपने स्वरूपको भूल गये और उसीके संगसे तुम्हारी यह दुर्दशा हुई है ॥५९॥

देखो, तुम न तो विदर्भराजकी पुत्री ही हो और न यह वीर मलयध्वज तुम्हारा पति ही। जिसने तुम्हें नौ द्वारोंके नगरमें बंद किया था, उस पुरंजनके पति भी तुम नहीं हो ॥६०॥

तुम पहले जन्ममें अपनेको पुरुष समझते थे और अब सती स्त्री मानते हो—यह सब मेरी ही फैलायी हुई माया है। वास्तवमें तुम न पुरुष हो न स्त्री। हम दोनों तो हंस हैं; हमारा जो वास्तविक स्वरूप है, उसका अनुभव करो ॥६१॥

मित्र! जो मैं (ईश्वर) हूँ, वही तुम (जीव) हो। तुम मुझसे भिन्न नहीं हो और तुम विचारपूर्वक देखो, मैं भी वही हूँ जो तुम हो। ज्ञानी पुरुष हम दोनोंमें कभी थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं देखते ॥६२॥

जैसे एक पुरुष अपने शरीरकी परछाईंको शीशेमें और किसी व्यक्तिके नेत्रमें भिन्न-भिन्न रूपसे देखता है वैसे ही—एक ही आत्मा विद्या और अविद्याकी उपाधिके भेदसे अपनेको ईश्वर और जीवके रूपमें दो प्रकारसे देख रहा है ॥६३॥

इस प्रकार जब हंस (ईश्वर)-ने उसे सावधान किया, तब वह मानसरोवरका हंस (जीव) अपने स्वरूपमें स्थित हो गया और उसे अपने मित्रके विछोहसे भूला हुआ आत्मज्ञान फिर प्राप्त हो गया ॥६४॥

प्राचीनबर्हि! मैंने तुम्हें परोक्षरूपसे यह आत्मज्ञानका दिग्दर्शन कराया है; क्योंकि जगत्कर्ता जगदीश्वरको परोक्ष वर्णन ही अधिक प्रिय है ॥६५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पुरंजनोपाख्यानेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥


१. प्रा० पा०—आवापो०।
१. प्रा० पा०—राजन् तां पुरीमभिनिकामतः। २. प्रा० पा०—जामातृमित्रपार्षदान्। ३. प्रा० पा०—त्वेका।
१. प्रा० पा०—तु संत्र०। २. प्रा० पा०—रभिनेष्यति। ३. प्रा० पा०—मृते।
१. प्रा० पा०—चिता। २. प्रा० पा०—किं जानासि। ३. प्रा० पा०—विचरेम हि।
१. प्रा० पा०—ततः।

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अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः पुरंजनोपाख्यानका तात्पर्य

प्राचीनबर्हिरुवाच

भगवंस्ते वचोऽस्माभिर्न सम्यगवगम्यते । कवयस्तद्विजानन्ति न वयं कर्ममोहिताः ।।१

नारद उवाच

पुरुषं पुरंजनं विद्याद्यद् व्यक्त्यात्मनः पुरम् । एकद्वित्रिचतुष्पादं बहुपादमपादकम् ।।२

योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वरः । यन्न विज्ञायते पुम्भिर्नामभिर्वा क्रियागुणैः ।।३

यदा जिघृक्षन् पुरुषः कात्स्न्येन प्रकृतेर्गुणान् । नवद्वारं द्विहस्ताङ्घ्रिं तत्रामनुत साध्विति ।।४

बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम् । यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान् भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान् ।।५

सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम् । सख्यस्तद्वृत्तयः प्राणः पंचवृत्तिर्यथोरगः ।।६

बृहद्बलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम् । पंचालाः पंच विषया यन्मध्ये नवखं पुरम् ।।७

अक्षिणी नासिके कर्णौ मुखं शिश्नगुदाविति । द्वे द्वे द्वारौ बहिर्याति यस्तदिन्द्रियसंयुतः ।।८

राजा प्राचीनबर्हिने कहा—भगवन्! मेरी समझमें आपके वचनोंका अभिप्राय पूरा-पूरा नहीं आ रहा है। विवेकी पुरुष ही इनका तात्पर्य समझ सकते हैं, हम कर्ममोहित जीव नहीं ।।१।।

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श्रीनारदजीने कहा—राजन्! पुरंजन (नगरका निर्माता) जीव है—जो अपने लिये एक, दो, तीन, चार अथवा बहुत पैरोंवाला या बिना पैरोंका शरीररूप पुर तैयार कर लेता है ।।२।। उस जीवका सखा जो अविज्ञात नामसे कहा गया है, वह ईश्वर है; क्योंकि किसी भी प्रकारके नाम, गुण अथवा कर्मोंसे जीवोंको उसका पता नहीं चलता ।।३।। जीवने जब सुख-दुःखरूप सभी प्राकृत विषयोंको भोगनेकी इच्छा की तब उसने दूसरे शरीरोंकी अपेक्षा नौ द्वार, दो हाथ और दो पैरोंवाला मानव-देह ही पसंद किया ।।४।। बुद्धि अथवा अविद्याको ही तुम पुरंजनी नामकी स्त्री जानो; इसीके कारण देह और इन्द्रिय आदिमें मैं-मेरेपनका भाव उत्पन्न होता है और पुरुष इसीका आश्रय लेकर शरीरमें इन्द्रियोंद्वारा विषयोंको भोगता है ।।५।। दस इन्द्रियाँ ही उसके मित्र हैं, जिनसे कि सब प्रकारके ज्ञान और कर्म होते हैं। इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ ही उसकी सखियाँ और प्राण-अपान-व्यान-उदान-समानरूप पाँच वृत्तियोंवाला प्राणवायु ही नगरकी रक्षा करनेवाला पाँच फनका सर्प है ।।६।। दोनों प्रकारकी इन्द्रियोंके नायक मनको ही ग्यारहवाँ महाबली योद्धा जानना चाहिये। शब्दादि पाँच विषय ही पांचालदेश हैं, जिसके बीचमें वह नौ द्वारोंवाला नगर बसा हुआ है ।।७।। उस नगरमें जो एक-एक स्थानपर दो-दो द्वार बताये गये थे—वे दो नेत्रगोलक, दो नासाछिद्र और दो कर्णछिद्र हैं। इनके साथ मुख, लिंग और गुदा—ये तीन और मिलाकर कुल नौ द्वार हैं; इन्हींमें होकर वह जीव इन्द्रियोंके साथ बाह्य विषयोंमें जाता है ।।८।।

अक्षिणी नासिके आस्यमिति पंच पुरः कृताः । दक्षिणा दक्षिणः कर्ण उत्तरा चोत्तरः स्मृतः ।।९

पश्चिमे इत्यधोद्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते१ । खद्योताऽऽविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते । रूपं विभ्राजितं ताभ्यां विचष्टे२ चक्षुषेश्वरः ।।१०

नलिनी नालिनी नासे गन्धः सौरभ उच्यते । घ्राणोऽवधूतो मुख्यास्यं विपणो वाग्रसविद्रसः ।।११

आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धो बहूदनम् । पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः ।।१२

प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पंचालसंज्ञितम् । पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छ्रुतधराद्व्रजेत् ।।१३

आसुरी मेढ्रमर्वाग्द्वार्व्यवायो ग्रामिणां रतिः ।

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उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निर्ऋतिर्गुद उच्यते ॥१४

वैशसं नरकं पायुलुब्धकोऽन्धौ तु मे शृणु । हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥१५

अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते । तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणैः ॥१६

इसमें दो नेत्रगोलक, दो नासाछिद्र और एक मुख—ये पाँच पूर्वके द्वार हैं; दाहिने कानको दक्षिणका और बायें कानको उत्तरका द्वार समझना चाहिये ॥९॥ गुदा और लिंग—ये नीचेके दो छिद्र पश्चिमके द्वार हैं। खद्योता और आविर्मुखी नामके जो दो द्वार एक स्थानपर बतलाये थे, वे नेत्रगोलक हैं तथा रूप विभ्राजित नामका देश है, जिसका इन द्वारोंसे जीव चक्षु-इन्द्रियकी सहायतासे अनुभव करता है। (चक्षु-इन्द्रियोंको ही पहले द्युमान् नामका सखा कहा गया है) ॥१०॥ दोनों नासाछिद्र ही नलिनी और नालिनी नामके द्वार हैं और नासिकाका विषय गन्ध ही सौरभ देश है तथा घ्राणेन्द्रिय अवधूत नामका मित्र है। मुख मुख्य नामका द्वार है। उसमें रहनेवाला वागिन्द्रिय विपण है और रसनेन्द्रिय रसविद् (रसज्ञ) नामका मित्र है ॥११॥ वाणीका व्यापार आपण है और तरह-तरहका अन्न बहूदन है तथा दाहिना कान पितृहू और बायाँ कान देवहू कहा गया है ॥१२॥ कर्मकाण्डरूप प्रवृत्तिमार्गका शास्त्र और उपासनाकाण्डरूप निवृत्तिमार्गका शास्त्र ही क्रमशः दक्षिण और उत्तर पांचाल देश हैं। इन्हें श्रवणेन्द्रियरूप श्रुतधरकी सहायतासे सुनकर जीव क्रमशः पितृयान और देवयान मार्गोंमें जाता है ॥१३॥ लिंग ही आसुरी नामका पश्चिमी द्वार है, स्त्रीप्रसंग ग्रामक नामका देश है और लिंगमें रहनेवाला उपस्थेन्द्रिय दुर्मद नामका मित्र है। गुदा निर्ऋति नामका पश्चिमी द्वार है ॥१४॥ नरक वैशस नामका देश है और गुदामें स्थित पायु-इन्द्रिय लुब्धक नामका मित्र है। इनके सिवा दो पुरुष अंधे बताये गये थे, उनका रहस्य भी सुनो। वे हाथ और पाँव हैं; इन्हींकी सहायतासे जीव क्रमशः सब काम करता और जहाँ-तहाँ जाता है ॥१५॥ हृदय अन्तःपुर है, उसमें रहनेवाला मन ही विषूचि (विषूचीन) नामका प्रधान सेवक है। जीव उस मनके सत्त्वादि गुणोंके कारण ही प्रसन्नता, हर्षरूप विकार अथवा मोहको प्राप्त होता है ॥१६॥

यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा । तथा तथोपद्रष्टाऽऽत्मा तद्वृत्तीरनुकार्यते ॥१७

देहो रथस्त्विन्द्रियाश्वः संवत्सररयोऽगतिः । द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वजः पंचासुबन्धुरः ॥१८

मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हृन्नीडो द्वन्द्वकूबरः ।

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पंचेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ।।१९

आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति । एकादशेन्द्रियचमूः पंचसूनाविनोदकृत् ।।२०

संवत्सरश्चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः । तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रयः स्मृताः । हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ।।२१

कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति । स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः ।।२२

आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चराः । भूतोपसर्गाशुवयः प्रज्वारो द्विविधो ज्वरः ।।२३

बुद्धि (राजमहिषी पुरंजनी) जिस-जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें विकारको प्राप्त होती है और जाग्रत्-अवस्थामें इन्द्रियादिको विकृत करती है, उसके गुणोंसे लिप्त होकर आत्मा (जीव) भी उसी-उसी रूपमें उसकी वृत्तियोंका अनुकरण करनेको बाध्य होता है—यद्यपि वस्तुतः वह उनका निर्विकार साक्षीमात्र ही है ।।१७।। शरीर ही रथ है। उसमें ज्ञानेन्द्रियरूप पाँच घोड़े जुते हुए हैं। देखनेमें संवत्सररूप कालके समान ही उसका अप्रतिहत वेग है, वास्तवमें वह गतिहीन है। पुण्य और पाप—ये दो प्रकारके कर्म ही उसके पहिये हैं, तीन गुण ध्वजा हैं, पाँच प्राण डोरियाँ हैं ।।१८।। मन बागडोर है, बुद्धि सारथि है, हृदय बैठनेका स्थान है, सुख-दुःखादि द्वन्द्व जुए हैं, इन्द्रियोंके पाँच विषय उसमें रखे हुए आयुध हैं और त्वचा आदि सात धातुएँ उसके आवरण हैं ।।१९।। पाँच कर्मेन्द्रियाँ उसकी पाँच प्रकारकी गति हैं। इस रथपर चढ़कर रथीरूप यह जीव मृगतृष्णाके समान मिथ्या विषयोंकी ओर दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियाँ उसकी सेना हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा उन-उन इन्द्रियोंके विषयोंको अन्यायपूर्वक ग्रहण करना ही उसका शिकार खेलना है ।।२०।।

जिसके द्वारा कालका ज्ञान होता है, वह संवत्सर ही चण्डवेग नामक गन्धर्वराज है। उसके अधीन जो तीन सौ साठ गन्धर्व बताये गये थे, वे दिन हैं और तीन सौ साठ गन्धर्वियाँ रात्रि हैं। ये बारी-बारीसे चक्कर लगाते हुए मनुष्यकी आयुको हरते रहते हैं ।।२१।। वृद्धावस्था ही साक्षात् कालकन्या है, उसे कोई भी पुरुष पसंद नहीं करता। तब मृत्युरूप यवनराजने लोकका संहार करनेके लिये उसे बहिन मानकर स्वीकार कर लिया ।।२२।। आधि (मानसिक क्लेश) और व्याधि (रोगादि शारीरिक कष्ट) ही उस यवनराजके पैदल चलनेवाले सैनिक हैं तथा प्राणियोंको पीड़ा पहुँचाकर शीघ्र ही मृत्युके मुखमें ले जानेवाला शीत और उष्ण दो प्रकारका ज्वर ही प्रज्वार नामका उसका भाई है ।।२३।।

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एवं बहुविधैर्दुःखैर्दैवभूतात्मसम्भवैः । क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः ॥२४

प्राणेन्द्रियमनोधर्म्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः । शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत् ॥२५

यदाऽऽत्मानमविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम् । पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक् ॥२६

गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः । शुक्लं कृष्णं लोहितं वा१ यथाकर्माभिजायते ॥२७

शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठाँल्लोकानाप्नोति२ कर्हिचित् । दुःखोदर्कान् क्रियायासांस्तमःशोकोत्कटान् क्वचित् ॥२८

क्वचित्पुमान् क्वचिच्च स्त्री क्वचिन्नोभयमन्धधीः । देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं३ भवः ॥२९

क्षुत्परीतो यथा दीनः सारमेयो गृहं गृहम् । चरन् विन्दति यदिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥३०

तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन् । उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम् ॥३१

दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु । जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया ॥३२

इस प्रकार यह देहाभिमानी जीव अज्ञानसे आच्छादित होकर अनेक प्रकारके आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भोगता हुआ सौ वर्षतक मनुष्यशरीरमें पड़ा रहता है ॥२४॥ वस्तुतः तो वह निर्गुण है, किन्तु प्राण, इन्द्रिय और मनके धर्मोंको अपनेमें आरोपित कर मैं-मेरेपनके अभिमानसे बँधकर क्षुद्र विषयोंका चिन्तन करता हुआ तरह-तरहके कर्म करता रहता है ॥२५॥ यह यद्यपि स्वयंप्रकाश है, तथापि जबतक सबके परमगुरु आत्मस्वरूप श्रीभगवान्‌के स्वरूपको नहीं जानता, तबतक प्रकृतिके गुणोंमें ही बँधा रहता है ॥२६॥ उन गुणोंका अभिमानी होनेसे वह विवश होकर सात्त्विक, राजस और

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तामस कर्म करता है तथा उन कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है ॥२७॥ वह कभी तो सात्त्विक कर्मोंके द्वारा प्रकाशबहुल स्वर्गादि लोक प्राप्त करता है, कभी राजसी कर्मोंके द्वारा दुःखमय रजोगुणी लोकोंमें जाता है—जहाँ उसे तरह-तरहके कर्मोंका क्लेश उठाना पड़ता है—और कभी तमोगुणी कर्मोंके द्वारा शोकबहुल तमोमयी योनियोंमें जन्म लेता है ॥२८॥ इस प्रकार अपने कर्म और गुणोंके अनुसार देवयोनि, मनुष्ययोनि अथवा पशु-पक्षीयोनिमें जन्म लेकर वह अज्ञानान्ध जीव कभी पुरुष, कभी स्त्री और कभी नपुंसक होता है ॥२९॥ जिस प्रकार बेचारा भूखसे व्याकुल कुत्ता दर-दर भटकता हुआ अपने प्रारब्धानुसार कहीं डंडा खाता है और कहीं भात खाता है, उसी प्रकार यह जीव चित्तमें नाना प्रकारकी वासनाओंको लेकर ऊँचे-नीचे मार्गसे ऊपर, नीचे अथवा मध्यके लोकोंमें भटकता हुआ अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगता रहता है ॥३०-३१॥ आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंमेंसे किसी भी एकसे जीवका सर्वथा छुटकारा नहीं हो सकता। यदि कभी वैसा जान पड़ता है तो वह केवल तात्कालिक निवृत्ति ही है ॥३२॥

यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन् । तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रियाः ॥३३

नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम् । द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥३४

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । मनसा लिंगरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥३५

अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरम्परा । संसृतिस्तद्व्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥३६

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः । सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥३७

सोऽचिरादेव राजर्षे स्यादच्युतकथाश्रयः । शृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः ॥३८

यत्र भगवता राजन् साधवो विशदाशयाः । भगवद्गुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतसः ॥३९

तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र- पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति । ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णै- स्तान्न स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहाः ॥ ४०

वह ऐसी ही है जैसे कोई सिरपर भारी बोझा ढोकर ले जानेवाला पुरुष उसे कंधेपर रख ले। इसी तरह सभी प्रतिक्रिया (दुःखनिवृत्ति) जाननी चाहिये—यदि किसी उपायसे मनुष्य एक प्रकारके दुःखसे छुट्टी पाता है, तो दूसरा दुःख आकर उसके सिरपर सवार हो जाता है ।।३३।। शुद्धहृदय नरेन्द्र! जिस प्रकार स्वप्नमें होनेवाला स्वप्नान्तर उस स्वप्नसे सर्वथा छूटनेका उपाय नहीं है, उसी प्रकार कर्मफल-भोगसे सर्वथा छूटनेका उपाय केवल कर्म नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म और कर्मफलभोग दोनों ही अविद्यायुक्त होते हैं ।।३४।। जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें अपने मनोमय लिंगशरीरसे विचरनेवाले प्राणीको स्वप्नके पदार्थ न होनेपर भी भासते हैं, उसी प्रकार ये दृश्यपदार्थ वस्तुतः न होनेपर भी, जबतक अज्ञान-निद्रा नहीं टूटती, बने ही रहते हैं और जीवको जन्म-मरणरूप संसारसे मुक्ति नहीं मिलती। (अतः इनकी आत्यन्तिक निवृत्तिका उपाय एकमात्र आत्मज्ञान ही है) ।।३५।।

राजन्! जिस अविद्याके कारण परमार्थस्वरूप आत्माको यह जन्म-मरणरूप अनर्थपरम्परा प्राप्त हुई है, उसकी निवृत्ति गुरुस्वरूप श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति होनेपर हो सकती है ।।३६।। भगवान् वासुदेवमें एकाग्रतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे किया हुआ भक्तिभाव ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव कर देता है ।।३७।। राजर्षे! यह भक्तिभाव भगवान्की कथाओंके आश्रित रहता है। इसलिये जो श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, उसे बहुत शीघ्र इसकी प्राप्ति हो जाती है ।।३८।। राजन्! जहाँ भगवद्गुणोंको कहने और सुननेमें तत्पर विशुद्धचित्त भक्तजन रहते हैं, उस साधु-समाजमें सब ओर महापुरुषोंके मुखसे निकले हुए श्रीमघुसूदनभगवान्के चरित्ररूप शुद्ध अमृतकी अनेकों नदियाँ बहती रहती हैं। जो लोग अतृप्त-चित्तसे श्रवणमें तत्पर अपने कर्णकुहरोंद्वारा उस अमृतका छककर पान करते हैं, उन्हें भूख-प्यास, भय, शोक और मोह आदि कुछ भी बाधा नहीं पहुँचा सकते ।।३९-४०।।

एतैरुपद्रुतो नित्यं जीवलोकः स्वभावजैः । न करोति हरेर्नूनं कथामृतनिधौ रतिम् ॥ ४१

प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान् गिरिशो मनुः । दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ।।४२

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः ।।४३

अद्यापि वाचस्पतयस्तपोविद्यासमाधिभिः ।

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पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम् ॥४४

शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे । मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदुः परम् ॥४५

यदा यमनुगृह्णाति भगवान्नात्मभावितः । स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥४६

तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन्नज्ञानादर्थकाशिषु । मार्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्रस्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु ॥४७

स्वं लोकं न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः । आहुर्धूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः ॥४८

आस्तीर्य दर्भैः प्रागग्रैः कार्त्स्न्येन क्षितिमण्डलम् । स्तब्धो बृहद्वधान्मानी कर्म नावैषि यत्परम् । तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया ॥४९

हाय! स्वभावतः प्राप्त होनेवाले इन क्षुधा-पिपासादि विघ्नोंसे सदा घिरा हुआ जीव-समुदाय श्रीहरिके कथामृत-सिन्धुसे प्रेम नहीं करता ॥४१॥ साक्षात् प्रजापतियोंके पति ब्रह्माजी, भगवान् शंकर, स्वायम्भुव मनु, दक्षादि प्रजापतिगण, सनकादि नैष्ठिक ब्रह्मचारी, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और मैं—ये जितने ब्रह्मवादी मुनिगण हैं, समस्त वाङ्मयके अधिपति होनेपर भी तप, उपासना और समाधिके द्वारा ढूँढ़-ढूँढ़कर हार गये, फिर भी उस सर्वसाक्षी परमेश्वरको आजतक न देख सके ॥४२-४४॥ वेद भी अत्यन्त विस्तृत हैं, उसका पार पाना हँसी-खेल नहीं है। अनेकों महानुभाव उसकी आलोचना करके मन्त्रोंमें बताये हुए वज्र-हस्तत्वादि गुणोंसे युक्त इन्द्रादि देवताओंके रूपमें, भिन्न-भिन्न कर्मोंके द्वारा, यद्यपि उस परमात्माका ही यजन करते हैं तथापि उसके स्वरूपको वे भी नहीं जानते ॥४५॥ हृदयमें बार-बार चिन्तन किये जानेपर भगवान् जिस समय जिस जीवपर कृपा करते हैं, उसी समय वह लौकिक व्यवहार एवं वैदिक कर्म-मार्गकी बद्धमूल आस्थासे छुट्टी पा जाता है ॥४६॥

बर्हिष्मन्! तुम इन कर्मोंमें परमार्थबुद्धि मत करो। ये सुननेमें ही प्रिय जान पड़ते हैं, परमार्थका तो स्पर्श भी नहीं करते। ये जो परमार्थवत् दीख पड़ते हैं, इसमें केवल अज्ञान ही कारण है ॥४७॥ जो मलिनमति कर्मवादी लोग वेदको कर्मपरक बताते हैं, वे वास्तवमें उसका मर्म नहीं जानते। इसका कारण यही है कि वे अपने स्वरूपभूत लोक (आत्मतत्त्व)-को नहीं जानते, जहाँ साक्षात् श्रीजनार्दन भगवान् विराजमान हैं ॥४८॥ पूर्वकी ओर

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