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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सुन्दरकाण्ड

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॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

सुन्दरकाण्ड

पहला सर्ग

हनुमान्‌जीके द्वारा समुद्रका लङ्घन, मैनाकके द्वारा उनका स्वागत, सुरसापर उनकी विजय तथा सिंहिकाका वध करके उनका समुद्रके उस पार पहुँचकर लंकाकी शोभा देखना

तदनन्तर शत्रुओंका संहार करनेवाले हनुमान्‌जीने रावणद्वारा हरी गयी सीताके निवासस्थानका पता लगानेके लिये उस आकाशमार्गसे जानेका विचार किया, जिसपर चारण (देवजातिविशेष) विचरा करते हैं॥ १ ॥

कपिवर हनुमान्‌जी ऐसा कर्म करना चाहते थे, जो दूसरोंके लिये दुष्कर था तथा उस कार्यमें उन्हें किसी और की सहायता भी नहीं प्राप्त थी। उन्होंने मस्तक और ग्रीवा ऊँची की। उस समय वे हृष्ट-पुष्ट साँड़के समान प्रतीत होने लगे॥ २ ॥

फिर धीर स्वभाववाले वे महाबली पवनकुमार वैदूर्यमणि (नीलम) और समुद्रके जलकी भाँति हरी-हरी घासपर सुखपूर्वक विचरने लगे॥ ३ ॥

उस समय बुद्धिमान् हनुमान्‌जी पक्षियोंको त्रास देते, वृक्षोंको वक्षःस्थलके आघातसे धराशायी करते तथा बहुत-से मृगों (वन-जन्तुओं) को कुचलते हुए पराक्रममें बढ़े-चढ़े सिंहके समान शोभा पा रहे थे॥ ४ ॥

उस पर्वतका जो तलप्रदेश था, वह पहाड़ोंमें स्वभावसे ही उत्पन्न होनेवाली नीली, लाल, मजीठ और कमलके-से रंगवाली श्वेत तथा श्याम वर्णवाली निर्मल धातुओंसे अच्छी तरह अलंकृत था॥ ५ ॥

उसपर देवोपम यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और नाग, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे, निरन्तर परिवारसहित निवास करते थे॥ ६ ॥

बड़े-बड़े गजराजोंसे भरे हुए उस पर्वतके समतल प्रदेशमें खड़े हुए कपिवर हनुमान्‌जी वहाँ जलाशयमें स्थित हुए विशालकाय हाथीके समान जान पड़ते थे॥

उन्होंने सूर्य, इन्द्र, पवन, ब्रह्मा और भूतों (देवयोनिविशेषों) को भी हाथ जोड़कर उस पार जानेका विचार किया॥ ८ ॥

फिर पूर्वाभिमुख होकर अपने पिता पवनदेवको प्रणाम किया। तत्पश्चात् कार्यकुशल हनुमान्‌जी दक्षिण दिशामें जानेके लिये बढ़ने लगे (अपने शरीरको बढ़ाने लगे)॥ ९ ॥

बड़े-बड़े वानरोंने देखा, जैसे पूर्णमाके दिन समुद्रमें ज्वार आने लगता है, उसी प्रकार समुद्र-लङ्घनके लिये दृढ़ निश्चय करनेवाले हनुमान्‌जी श्रीरामकी कार्य-सिद्धिके लिये बढ़ने लगे॥ १० ॥

समुद्रको लाँघनेकी इच्छासे उन्होंने अपने शरीरको बेहद बढ़ा लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणोंसे उस पर्वतको दबाया॥ ११ ॥

कपिवर हनुमान्‌जीके द्वारा दबाये जानेपर तुरंत ही वह पर्वत काँप उठा और दो घड़ीतक डगमगाता रहा। उसके ऊपर जो वृक्ष उगे थे, उनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंसे लदे हुए थे; किंतु उस पर्वतके हिलनेसे उनके वे सारे फूल झड़ गये॥ १२ ॥

वृक्षोंसे झड़ी हुईं उस सुगन्धित पुष्पराशिके द्वारा सब ओरसे आच्छादित हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था, मानो वह फूलोंका ही बना हुआ हो॥ १३ ॥

महापराक्रमी हनुमान्‌जीके द्वारा दबाया जाता हुआ महेन्द्रपर्वत जलके स्रोत बहाने लगा, मानो कोई मदमत्त गजराज अपने कुम्भस्थलसे मदकी धारा बहा रहा हो॥ १४ ॥

बलवान् पवनकुमारके भारसे दबा हुआ महेन्द्रगिरि सुनहरे, रुपहले और काले रंगके जलस्रोत प्रवाहित करने लगा॥ १५ ॥

इतना ही नहीं, जैसे मध्यम ज्वालासे युक्त अग्निरु लगातार धुआँ छोड़ रही हो, उसी प्रकार वह पर्वत मैनसिलसहित बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिराने लगा॥ १६ ॥

हनुमान्‌जीके उस पर्वत-पीड़नसे पीड़ित होकर वहाँके समस्त जीव गुफाओंमें घुसे हुए बुरी तरहसे चिल्लाने लगे॥ १७ ॥

इस प्रकार पर्वतको दबानेके कारण उत्पन्न हुआ वह जीव-जन्तुओंका महान् कोलाहल पृथ्वी, उपवन और सम्पूर्ण दिशाओंमें भर गया॥ १८ ॥

जिनमें स्वस्तिक* चिह्न स्पष्ट दिखायी दे रहे थे, उन स्थूल फणोंसे विषकी भयानक आग उगलते हुए बड़े-बड़े सर्प उस पर्वतकी शिलाओंको अपने दाँतोंसे डँसने लगे॥ १९ ॥

क्रोधसे भरे हुए उन विषैले साँपोंके काटनेपर वे बड़ी- बड़ी शिलाएँ इस प्रकार जल उठीं, मानो उनमें आग लग गयी हो। उस समय उन सबके सहस्रों टुकड़े हो गये॥ २० ॥

उस पर्वतपर जो बहुत-सी ओषधियाँ उगी हुई थीं, वे विषको नष्ट करनेवाली होनेपर भी उन नागोंके विषको शान्त न कर सकीं॥ २१ ॥

उस समय वहाँ रहनेवाले तपस्वी और विद्याधरोंने समझा कि इस पर्वतको भूतलोग तोड़ रहे हैं, इससे भयभीत होकर वे अपनी स्त्रियोंके साथ वहाँसे ऊपर उठकर अन्तरिक्षमें चले गये॥ २२ ॥

मधुपानके स्थानमें रखे हुए सुवर्णमय आसवपात्र, बहुमूल्य बर्तन, सोनेके कलश, भाँति-भाँतिके भक्ष्य पदार्थ, चटनी, नाना प्रकारके फलोंके गूदे, बैलोंकी खालकी बनी हुई ढालें और सुवर्णजटित मूठवाली तलवारें छोड़कर कण्ठमें माला धारण किये, लाल रंगके फूल और अनुलेपन (चन्दन) लगाये, प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर एवं लाल नेत्रवाले वे मतवाले विद्याधरगण भयभीत-से होकर आकाशमें चले गये॥ २३—२५ ॥

उनकी स्त्रियाँ गलेमें हार, पैरोंमें नूपुर, भुजाओंमें बाजूबंद और कलाइयोंमें कंगन धारण किये आकाशमें अपने पतियोंके साथ मन्द-मन्द मुसकराती हुई चकित-सी खड़ी हो गयीं॥ २६ ॥

विद्याधर और महर्षि अपनी महाविद्या (आकाशमें निराधार खड़े होनेकी शक्ति)-का परिचय देते हुए अन्तरिक्षमें एक साथ खड़े हो गये और उस पर्वतकी ओर देखने लगे॥ २७ ॥

उन्होंने उस समय निर्मल आकाशमें खड़े हुए भावितात्मा (पवित्र अन्तःकरणवाले) महर्षियों, चारणों और सिद्धोंकी ये बातें सुनीं—॥ २८ ॥

‘अहा! ये पर्वतके समान विशालकाय महान् वेगशाली पवनपुत्र हनुमान्‌जी वरुणालय समुद्रको पार करना चाहते हैं॥ २९ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी और वानरोंके कार्यकी सिद्धिके लिये दुष्कर कर्म करनेकी इच्छा रखनेवाले ये पवनकुमार समुद्रके दूसरे तटपर पहुँचना चाहते हैं, जहाँ जाना अत्यन्त कठिन है’॥ ३० ॥

इस प्रकार विद्याधरोंने उन तपस्वी महात्माओंकी कही हुई ये बातें सुनकर पर्वतके ऊपर अतुलित बलशाली वानरशिरोमणि हनुमान्जीको देखा॥ ३१ ॥

उस समय हनुमान्जी अग्निके समान जान पड़ते थे। उन्होंने अपने शरीरको हिलाया और रोएँ झाड़े तथा महान् मेघके समान बड़े जोर-जोरसे गर्जना की॥ ३२ ॥

हनुमान्जी अब ऊपरको उछलना ही चाहते थे। उन्होंने क्रमशः गोलाकार मुड़ी तथा रोमावलियोंसे भरी हुई अपनी पूँछको उसी प्रकार आकाशमें फेंका, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्पको फेंकते हैं॥ ३३ ॥

अत्यन्त वेगशाली हनुमान्जीके पीछे आकाशमें फैली हुई उनकी कुछ-कुछ मुड़ी हुई पूँछ गरुड़के द्वारा ले जाये जाते हुए महान् सर्पके समान दिखायी देती थी॥ ३४ ॥

उन्होंने अपनी विशाल परिघके समान भुजाओंको पर्वतपर जमाया। फिर ऊपरके सब अंगोंको इस तरह सिकोड़ लिया कि वे कटिकी सीमामें ही आ गये; साथ ही उन्होंने दोनों पैरोंको भी समेट लिया॥ ३५ ॥

तत्पश्चात् तेजस्वी और पराक्रमी हनुमान्जीने अपनी दोनों भुजाओं और गर्दनको भी सिकोड़ लिया। इस समय उनमें तेज, बल और पराक्रम—सभीका आवेश हुआ॥ ३६ ॥

उन्होंने अपने लम्बे मार्गपर दृष्टि दौड़ानेके लिये नेत्रोंको ऊपर उठाया और आकाशकी ओर देखते हुए प्राणोंको हृदयमें रोका॥ ३७ ॥

इस प्रकार ऊपरको छलाँग मारनेकी तैयारी करते हुए कपिश्रेष्ठ महाबली हनुमान्ने अपने पैरोंको अच्छी तरह जमाया और कानोंको सिकोड़कर उन वानरशिरोमणिने अन्य वानरोंसे इस प्रकार कहा—॥ ३८१/२ ॥

‘जैसे श्रीरामचन्द्रजीका छोड़ा हुआ बाण वायुवेगसे चलता है, उसी प्रकार मैं रावणद्वारा पालित लंकापुरीमें जाऊँगा॥ ३९१/२ ॥

‘यदि लंकामें जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखूँगा तो इसी वेगसे मैं स्वर्गलोकमें चला जाऊँगा॥ ४०१/२ ॥

‘इस प्रकार परिश्रम करनेपर यदि मुझे स्वर्गमें भी सीताका दर्शन नहीं होगा तो राक्षसराज रावणको बाँधकर लाऊँगा॥ ४११/२ ॥

‘सर्वथा कृतकृत्य होकर मैं सीताके साथ लौटूंगा अथवा रावणसहित लंकापुरीको ही उखाड़कर लाऊँगा’॥ ४२ ॥

ऐसा कहकर वेगशाली वानरप्रवर श्रीहनुमान्‌जीने विघ्न-बाधाओंका कोऽइ विचार न करके बड़े वेगसे ऊपरकी ओर छलाँग मारी। उस समय उन वानरशिरोमणिने अपनेको साक्षात् गरुड़के समान ही समझा॥ ४३-४४ ॥

जिस समय वे कूदे, उस समय उनके वेगसे आकृष्ट हो पर्वतपर उगे हुए सब वृक्ष उखड़ गये और अपनी सारी डालियोंको समेटकर उनके साथ ही सब ओरसे वेगपूर्वक उड़ चले॥ ४५ ॥

वे हनुमान्‌जी मतवाले कोयष्टि आदि पक्षियोंसे युक्त, बहुसंख्यक पुष्पशोभित वृक्षोंको अपने महान् वेगसे ऊपरकी ओर खींचते हुए निर्मल आकाशमें अग्रसर होने लगे॥ ४६ ॥

उनकी जाँघोंके महान् वेगसे ऊपरको उठे हुए वृक्ष एक मुहूर्ततक उनके पीछे-पीछे इस प्रकार गये, जैसे दूर-देशके पथपर जानेवाले अपने भाऽइ-बन्धुको उसके बन्धु-बान्धव पहुँचाने जाते हैं॥ ४७ ॥

हनुमान्‌जीकी जाँघोंके वेगसे उखड़े हुए साल तथा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष उनके पीछे-पीछे उसी प्रकार चले, जैसे राजाके पीछे उसके सैनिक चलते हैं॥ ४८ ॥

जिनकी डालियोंके अग्रभाग फूलोंसे सुशोभित थे, उन बहुतेरे वृक्षोंसे संयुक्त हुए पर्वताकार हनुमान्‌जी अद्भुत शोभासे सम्पन्न दिखायी दिये॥ ४९ ॥

उन वृक्षोंमेंसे जो भारी थे, वे थोड़ी ही देरमें गिरकर क्षारसमुद्रमें डूब गये। ठीक उसी तरह, जैसे कितने ही पंखधारी पर्वत देवराज इन्द्रके भयसे वरुणालयमें निमग्नरू हो गये थे॥ ५० ॥

मेघके समान विशालकाय हनुमान्‌जी अपने साथ खींचकर आये हुए वृक्षोंके अंकुर और कोरसहित फूलोंसे आच्छादित हो जुगुनुओंकी जगमगाहटसे युक्त पर्वतके समान शोभा पाते थे॥ ५१ ॥

वे वृक्ष जब हनुमान्‌जीके वेगसे मुक्त हो जाते (उनके आकर्षणसे छूट जाते), तब अपने फूल बरसाते हुए इस प्रकार समुद्रके जलमें डूब जाते थे, जैसे सुहृद्वर्गके लोग परदेश जानेवाले अपने किसी बन्धुको दूरतक पहुँचाकर लौट आते हैं॥ ५२ ॥

हनुमान्‌जीके शरीरसे उठी हुऽइ वायुसे प्रेरित हो वृक्षोंके भाँति-भाँतिके पुष्प अत्यन्त हलके होनेके कारण जब समुद्रमें गिरते थे, तब डूबते नहीं थे। इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी।

उन फूलोंके कारण वह महासागर तारोंसे भरे हुए आकाशके समान सुशोभित होता था॥ ५३ ॥

अनेक रंगकी सुगन्धित पुष्पराशिसे उपलक्षित वानर-वीर हनुमान्जी बिजली-से सुशोभित होकर उठते हुए मेघके समान जान पड़ते थे॥ ५४ ॥

उनके वेगसे झड़े हुए फूलोंके कारण समुद्रका जल उगे हुए रमणीय तारोंसे खचित आकाशके समान दिखायी देता था॥ ५५ ॥

आकाशमें फैलायी गयी उनकी दोनों भुजाएँ ऐसी दिखायी देती थीं, मानो किसी पर्वतके शिखरसे पाँच फनवाले दो सर्प निकले हुए हों॥ ५६ ॥

उस समय महाकपि हनुमान् ऐसे प्रतीत होते थे, मानो तरङ्गमालाओंसहित महासागरको पी रहे हों। वे ऐसे दिखायी देते थे, मानो आकाशको भी पी जाना चाहते हों॥ ५७ ॥

वायुके मार्गका अनुसरण करनेवाले हनुमान्जीके बिजलीकी-सी चमक पैदा करनेवाले दोनों नेत्र ऐसे प्रकाशित हो रहे थे, मानो पर्वतपर दो स्थानोंमें लगे हुए दावानल दहक रहे हों॥ ५८ ॥

पिंगल नेत्रवाले वानरोंमें श्रेष्ठ हनुमान्जीकी दोनों गोल बड़ी-बड़ी और पीले रंगकी आँखें चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित हो रही थीं॥ ५९ ॥

लाल-लाल नासिकाके कारण उनका सारा मुँह लाली लिये हुए था, अतः वह संध्याकालसे संयुक्त सूर्यमण्डलके समान सुशोभित होता था॥ ६० ॥

आकाशमें तैरते हुए पवनपुत्र हनुमान्की उठी हुई टेढ़ी पूँछ इन्द्रकी ऊँची ध्वजाके समान जान पड़ती थी॥ ६१ ॥

महाबुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमान्जीकी दाढ़ें सफेद थीं और पूँछ गोलाकार मुड़ी हुई थी। इसलिये वे परिधिसे घिरे हुए सूर्यमण्डलके समान जान पड़ते थे॥

उनकी कमरके नीचेका भाग बहुत लाल था।

इससे वे महाकपि हनुमान् फटे हुए गेरूसे युक्त विशाल पर्वतके समान शोभा पाते थे॥ ६३ ॥

ऊपर-ऊपरसे समुद्रको पार करते हुए वानरसिंह हनुमान्की काँखसे होकर निकली हुई वायु बादलके समान गरजती थी॥ ६४ ॥

जैसे ऊपरकी दिशासे प्रकट हुई पुच्छयुक्त उल्का आकाशमें जाती देखी जाती है, उसी प्रकार अपनी पूँछके कारण कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी भी दिखायी देते थे॥ ६५ ॥

चलते हुए सूर्यके समान विशालकाय हनुमान्जी अपनी पूँछके कारण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो कोई बड़ा गजराज अपनी कमरमें बँधी हुई रस्सीसे सुशोभित हो रहा हो॥ ६६ ॥

हनुमान्जीका शरीर समुद्रसे ऊपर-ऊपर चल रहा था और उनकी परछाईं जलमें डूबी हुई-सी दिखायी देती थी। इस प्रकार शरीर और परछाईं दोनोंसे उपलक्षित हुए वे कपिवर हनुमान् समुद्रके जलमें पड़ी हुई उस नौकाके समान प्रतीत होते थे, जिसका ऊपरी भाग (पाल) वायुसे परिपूर्ण हो और निम्नभाग समुद्रके जलसे लगा हुआ हो॥ ६७ ॥

वे समुद्रके जिस-जिस भागमें जाते थे, वहाँ-वहाँ उनके अंगके वेगसे उत्ताल तरंगें उठने लगती थीं। अतः वह भाग उन्मत्त (विक्षुब्ध)-सा दिखायी देता था॥ ६८ ॥

महान् वेगशाली महाकपि हनुमान् पर्वतोंके समान ऊँची महासागरकी तरङ्गमालाओंको अपनी छातीसे चूर-चूर करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ ६९ ॥

कपिश्रेष्ठ हनुमान्के शरीरसे उठी हुई तथा मेघोंकी घटामें व्याप्त हुई प्रबल वायुने भीषण गर्जना करनेवाले समुद्रमें भारी हलचल मचा दी॥ ७० ॥

वे कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेगसे समुद्रमें बहुत-सी ऊँची-ऊँची तरङ्गोंको आकर्षित करते हुए इस प्रकार उड़े जा रहे थे, मानो पृथ्वी और आकाश दोनोंको विक्षुब्ध कर रहे हों॥ ७१ ॥

वे महान् वेगशाली वानरवीर उस महासमुद्रमें उठी हुई सुमेरु और मन्दराचलके समान उत्ताल तरङ्गोंकी मानो गणना करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ ७२ ॥

उस समय उनके वेगसे ऊँचे उठकर मेघमण्डलके साथ आकाशमें स्थित हुआ समुद्रका जल शरत्कालके फैले हुए मेघोंके समान जान पड़ता था॥ ७३ ॥

जल हट जानेके कारण समुद्रके भीतर रहनेवाले मगर, नाकेरु, मछलियाँ और कछुए साफ-साफ दिखायी देते थे। जैसे वस्त्र खींच लेनेपर देहधारियोंके शरीर नंगे दीखने लगते हैं॥ ७४ ॥

समुद्रमें विचरनेवाले सर्प आकाशमें जाते हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीको देखकर उन्हें गरुड़के ही समान समझने लगे॥ ७५ ॥

कपिकेसरी हनुमान्जीकी दस योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी छाया वेगके कारण अत्यन्त रमणीय जान पड़ती थी॥ ७६ ॥

खारे पानीके समुद्रमें पड़ी हुई पवनपुत्र हनुमान्‌का अनुसरण करनेवाली उनकी वह छाया श्वेत बादलोंकी पंक्तिके समान शोभा पाती थी॥ ७७ ॥

वे परम तेजस्वी महाकाय महाकपि हनुमान् आलम्बनहीन आकाशमें पंखधारी पर्वतके समान जान पड़ते थे॥ ७८ ॥

वे बलवान् कपिश्रेष्ठ जिस मार्गसे वेगपूर्वक निकल जाते थे, उस मार्गसे संयुक्त समुद्र सहसा कठौते या कड़ाहके समान हो जाता था (उनके वेगसे उठी हुई वायुके द्वारा वहाँका जल हट जानेसे वह स्थान कठौते आदिके समान गहरा-सा दिखायी पड़ता था)॥ ७९ ॥

पक्षी-समूहोंके उड़नेके मार्गमें पक्षिराज गरुड़की भाँति जाते हुए हनुमान् वायुके समान मेघमालाओंको अपनी ओर खींच लेते थे॥ ८० ॥

हनुमान्‌जीके द्वारा खींचे जाते हुए वे श्वेत, अरुण, नील और मजीठके-से रंगवाले बड़े-बड़े मेघ वहाँ बड़ी शोभा पाते थे॥ ८१ ॥

वे बारम्बार बादलोंके समूहमें घुस जाते और बाहर निकल आते थे। इस तरह छिपते और प्रकाशित होते हुए चन्द्रमाके समान दृष्टिगोचर होते थे॥ ८२ ॥

उस समय तीव्रगतिसे आगे बढ़ते हुए वानरवीर हनुमान्‌जीको देखकर देवता, गन्धर्व और चारण उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ ८३ ॥

वे श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये जा रहे थे, अतः उस समय वेगसे जाते हुए वानरराज हनुमान्‌को सूर्यदेवने ताप नहीं पहुँचाया और वायुदेवने भी उनकी सेवा की॥ ८४ ॥

आकाशमार्गसे यात्रा करते हुए वानरवीर हनुमान्‌की ऋषि-मुनि स्तुति करने लगे तथा देवता और गन्धर्व उनकी प्रशंसाके गीत गाने लगे॥ ८५ ॥

उन कपिश्रेष्ठको बिना थकावटके सहसा आगे बढ़ते देख नाग, यक्ष और नाना प्रकारके राक्षस सभी उनकी स्तुति करने लगे॥ ८६ ॥

जिस समय कपिकेसरी हनुमान्‌जी उछलकर समुद्र पार कर रहे थे, उस समय इक्ष्वाकुकुलका सम्मान करनेकी इच्छासे समुद्रने विचार किया— ॥ ८७ ॥

‘यदि मैं वानरराज हनुमान्‌जीकी सहायता नहीं करूँगा तो बोलनेकी इच्छावाले सभी लोगोंकी दृष्टिमें मैं सर्वथा निन्दनीय हो जाऊँगा॥ ८८ ॥

‘मुझे इक्ष्वाकुकुलके महाराज सगरने बढ़ाया था। इस समय ये हनुमान्‌जी भी इक्ष्वाकुवंशी वीर श्रीरघुनाथजीकी सहायता कर रहे हैं, अतः इन्हें इस यात्रामें किसी प्रकारका कष्ट नहीं होना चाहिये॥ ८९ ॥

‘मुझे ऐसा कोँऽइ उपाय करना चाहिये, जिससे वानरवीर यहाँ कुछ विश्राम कर लें। मेरे आश्रयमें विश्राम कर लेनेपर मेरे शेष भागको ये सुगमतासे पार कर लेंगे’॥

यह शुभ विचार करके समुद्रने अपने जलमें छिपे हुए सुवर्णमय गिरिश्रेष्ठ मैनाकसे कहा— ॥ ९१ ॥

‘शैलप्रवर! महामना देवराज इन्द्रने तुम्हें यहाँ पातालवासी असुरसमूहोंके निकलनेके मार्गको रोकनेके लिये परिघरूपसे स्थापित किया है॥ ९२ ॥

‘इन असुरोंका पराक्रम सर्वत्र प्रसिद्ध है। वे फिर पातालसे ऊपरको आना चाहते हैं, अतः उन्हें रोकनेके लिये तुम अप्रमेय पाताललोकके द्वारको बंद करके खड़े हो॥ ९३ ॥

‘शैल! ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें सब ओर बढ़नेकी तुममें शक्ति है। गिरिश्रेष्ठ! इसीलिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम ऊपरकी ओर उठो॥ ९४ ॥

‘देखो, ये पराक्रमी कपिकेसरी हनुमान् तुम्हारे ऊपर होकर जा रहे हैं। ये बड़ा भयंकर कर्म करनेवाले हैं, इस समय श्रीरामका कार्य सिद्ध करनेके लिये इन्होंने आकाशमें छलाँग मारी है॥ ९५ ॥

‘ये इक्ष्वाकुवंशी रामके सेवक हैं, अतः मुझे इनकी सहायता करनी चाहिये। इक्ष्वाकुवंशके लोग मेरे पूजनीय हैं और तुम्हारे लिये तो वे परम पूजनीय हैं॥

‘अतः तुम हमारी सहायता करो। जिससे हमारे कर्तव्य-कर्मका (हनुमान्‌जीके सत्काररूपी कार्यका) अवसर बीत न जाय। यदि कर्तव्यका पालन नहीं किया जाय तो वह सत्पुरुषोंके क्रोधको जगा देता है॥ ९७ ॥

‘इसलिये तुम पानीसे ऊपर उठो, जिससे ये छलाँग मारनेवालोंमें श्रेष्ठ कपिवर हनुमान् तुम्हारे ऊपर कुछ कालतक ठहरें—विश्राम करें। वे हमारे पूजनीय अतिथि भी हैं॥ ९८ ॥

‘देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा सेवित तथा सुवर्णमय विशाल शिखरवाले मैनाक! तुम्हारे ऊपर विश्राम करनेके पश्चात् हनुमान्‌जी शेष मार्गको सुखपूर्वक तय कर लेंगे॥ ९९ ॥

‘ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजीकी दयालुता, मिथिलेशकुमारी सीताका परदेशमें रहनेके लिये विवश होना तथा वानरराज हनुमान्‌का परिश्रम देखकर तुम्हें अवश्य ऊपर उठना चाहिये’॥ १०० ॥

यह सुनकर बड़े-बड़े वृक्षों और लताओंसे आवृत सुवर्णमय मैनाक पर्वत तुरंत ही क्षार समुद्रके जलसे ऊपरको उठ गया॥ १०१ ॥

जैसे उद्दीप्त किरणोंवाले दिवाकर (सूर्य) मेघोंके आवरणको भेदकर उदित होते हैं, उसी प्रकार उस समय महासागरके जलका भेदन करके वह पर्वत बहुत ऊँचा उठ गया॥ १०२ ॥

समुद्रकी आज्ञा पाकर जलमें छिपे रहनेवाले उस विशालकाय पर्वतने दो ही घड़ीमें हनुमान्‌जीको अपने शिखरोंका दर्शन कराया॥ १०३ ॥

उस पर्वतके वे शिखर सुवर्णमय थे। उनपर किन्नर और बड़े-बड़े नाग निवास करते थे। सूर्योदयके समान तेजःपुञ्जसे विभूषित वे शिखर इतने ऊँचे थे कि आकाशमें रेखा-सी खींच रहे थे॥ १०४ ॥

उस पर्वतके उठे हुए सुवर्णमय शिखरोंके कारण शस्त्रके समान नील वर्णवाला आकाश सुनहरी प्रभासे उद्भासित होने लगा॥ १०५ ॥

उन परम कान्तिमान् और तेजस्वी सुवर्णमय शिखरोंसे वह गिरिश्रेष्ठ मैनाक सैकड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान हो रहा था॥ १०६ ॥

क्षार समुद्रके बीचमें अविलम्ब उठकर सामने खड़े हुए मैनाकको देखकर हनुमान्‌जीने मन-ही-मन निश्चित किया कि यह कोई विघ्न उपस्थित हुआ है॥ १०७ ॥

अतः वायु जैसे बादलको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार महान् वेगशाली महाकपि हनुमान्‌ने बहुत ऊँचे उठे हुए मैनाक पर्वतके उस उच्चतर शिखरको अपनी छातीके धक्केसे नीचे गिरा दिया॥ १०८ ॥

इस प्रकार कपिवर हनुमान्‌जीके द्वारा नीचा देखनेपर उनके उस महान् वेगका अनुभव करके पर्वतश्रेष्ठ मैनाक बड़ा प्रसन्न हुआ और गर्जना करने लगा॥ १०९ ॥

तब आकाशमें स्थित हुए उस पर्वतने आकाशगत वीर वानर हनुमान्‌जीसे प्रसन्नचित्त होकर कहा। वह मनुष्यरूप धारण करके अपने ही शिखरपर स्थित हो इस प्रकार बोला—॥ ११० १/२ ॥

‘वानरशिरोमणे! आपने यह दुष्कर कर्म किया है। अब उतरकर मेरे इन शिखरोंपर सुखपूर्वक विश्राम कर लीजिये, फिर आगेकी यात्रा कीजियेगा॥ ११११/२ ॥

‘श्रीरघुनाथजीके पूर्वजोंने समुद्रकी वृद्धि की थी, इस समय आप उनका हित करनेमें लगे हैं; अतः समुद्र आपका सत्कार करना चाहता है॥ ११२१/२ ॥

‘किसीने उपकार किया हो तो बदलेमें उसका भी उपकार किया जाय—यह सनातन धर्म है। इस दृष्टिसे प्रत्युपकार करनेकी इच्छावाला यह सागर आपसे सम्मान पानेके योग्य है (आप इसका सत्कार ग्रहण करें, इतनेसे ही इसका सम्मान हो जायगा)॥ ११३१/२ ॥

‘आपके सत्कारके लिये समुद्रने बड़े आदरसे मुझे नियुक्त किया है और कहा है—‘इन कपिवर हनुमान्‌ने सौ योजन दूर जानेके लिये आकाशमें छलाँग मारी है, अतः कुछ देरतक तुम्हारे शिखरोंपर ये विश्राम कर लें, फिर शेष भागका लङ्घन करेंगे’॥ ११४-११५ ॥

‘अतः कपिश्रेष्ठ! आप कुछ देरतक मेरे ऊपर विश्राम कर लीजिये, फिर जाइयेगा। इस स्थानपर ये बहुत-से सुगन्धित और सुस्वादु कन्द, मूल तथा फल हैं। वानरशिरोमणे! इनका आस्वादन करके थोड़ी देरतक सुस्ता लीजिये। उसके बाद आगेकी यात्रा कीजियेगा॥ ११६१/२ ॥

‘कपिवर! आपके साथ हमारा भी कुछ सम्बन्ध है। आप महान् गुणोंका संग्रह करनेवाले और तीनों लोकोंमें विख्यात हैं॥ ११७ ॥

‘कपिश्रेष्ठ पवननन्दन! जो-जो वेगशाली और छलाँग मारनेवाले वानर हैं, उन सबमें मैं आपको ही श्रेष्ठतम मानता हूँ॥ ११८ ॥

‘धर्मकी जिज्ञासा रखनेवाले विज्ञ पुरुषके लिये एक साधारण अतिथि भी निश्चय ही पूजाके योग्य माना गया है। फिर आप-जैसे असाधारण शौर्यशाली पुरुष कितने सम्मानके योग्य हैं, इस विषयमें तो कहना ही क्या है?॥ ११९ ॥

‘कपिश्रेष्ठ! आप देवशिरोमणि महात्मा वायुके पुत्र हैं और वेगमें भी उन्हींके समान हैं॥ १२० ॥

‘आप धर्मके ज्ञाता हैं। आपकी पूजा होनेपर साक्षात् वायुदेवका पूजन हो जायगा। इसलिये आप अवश्य ही मेरे पूजनीय हैं। इसमें एक और भी कारण है, उसे सुनिये॥ १२१ ॥

‘तात! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है। उन दिनों पर्वतोंके भी पंख होते थे। वे भी गरुड़के समान वेगशाली होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें उड़ते फिरते थे॥ १२२ ॥

‘उनके इस तरह वेगपूर्वक उड़ने और आने-जानेपर देवता, ऋषि और समस्त प्राणियोंको उनके गिरनेकी आशङ्कासे बड़ा भय होने लगा॥ १२३ ॥

‘इससे सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपने वज्रसे लाखों पर्वतोंके पंख काट डाले॥ १२४ ॥

‘उस समय कुपित हुए देवराज इन्द्र वज्र उठाये मेरी ओर भी आये, किन्तु महात्मा वायुने सहसा मुझे इस समुद्रमें गिरा दिया॥ १२५ ॥

‘वानरश्रेष्ठ! इस क्षार समुद्रमें गिराकर आपके पिताने मेरे पंखोंकी रक्षा कर ली और मैं अपने सम्पूर्ण अंशसे सुरक्षित बच गया॥ १२६ ॥

‘पवननन्दन! कपिश्रेष्ठ! इसीलिये मैं आपका आदर करता हूँ, आप मेरे माननीय हैं। आपके साथ मेरा यह सम्बन्ध महान् गुणोंसे युक्त है॥ १२७ ॥

‘महामते! इस प्रकार चिरकालके बाद जो यह प्रत्युपकाररूप कार्य (आपके पिताके उपकारका बदला चुकानेका अवसर) प्राप्त हुआ है, इसमें आप प्रसन्नचित्त होकर मेरी और समुद्रकी भी प्रीतिका सम्पादन करें (हमारा आतिथ्य ग्रहण करके हमें संतुष्ट करें)॥ १२८ ॥

‘वानरशिरोमणे! आप यहाँ अपनी थकान उतारिये, हमारी पूजा ग्रहण कीजिये और मेरे प्रेमको भी स्वीकार कीजिये। मैं आप-जैसे माननीय पुरुषके दर्शनसे बहुत प्रसन्न हुआ हूँ'॥ १२९ ॥

मैनाकके ऐसा कहनेपर कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जीने उस उत्तम पर्वतसे कहा—‘मैनाक! मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है। मेरा आतिथ्य हो गया। अब आप अपने मनसे यह दुःख अथवा चिन्ता निकाल दीजिये कि इन्होंने मेरी पूजा ग्रहण नहीं की॥ १३० ॥

‘मेरे कार्यका समय मुझे बहुत जल्दी करनेके लिये प्रेरित कर रहा है। यह दिन भी बीता जा रहा है। मैंने वानरोंके समीप यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं यहाँ बीचमें कहीं नहीं ठहर सकता'॥ १३१ ॥

ऐसा कहकर महाबली वानरशिरोमणि हनुमान्‌ने हँसते हुएसे वहाँ मैनाकका अपने हाथसे स्पर्श किया और आकाशमें ऊपर उठकर चलने लगे॥ १३२ ॥

उस समय पर्वत और समुद्र दोनोंने ही बड़े आदरसे उनकी ओर देखा, उनका सत्कार किया और यथोचित आशीर्वादोंसे उनका अभिनन्दन किया॥ १३३ ॥

फिर पर्वत और समुद्रको छोड़कर उनसे दूर ऊपर उठकर अपने पिताके मार्गका आश्रय ले हनुमान्जी निर्मल आकाशमें चलने लगे॥ १३४ ॥

तत्पश्चात् और भी ऊँचे उठकर उस पर्वतको देखते हुएकपिश्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमान्जी बिना किसी आधारके आगे बढ़ने लगे॥ १३५ ॥

हनुमान्जीका यह दूसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देखकर सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और महर्षिगण उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १३६ ॥

वहाँ आकाशमें ठहरे हुए देवता तथा सहस्र नेत्रधारी इन्द्र उस सुन्दर मध्य भागवाले सुवर्णमय मैनाक पर्वतके उस कार्यसे बहुत प्रसन्न हुए॥ १३७ ॥

उस समय स्वयं बुद्धिमान् शचीपति इन्द्रने अत्यन्त संतुष्ट होकर पर्वतश्रेष्ठ सुनाभ मैनाकसे गद्गद वाणीमें कहा— ॥ १३८ ॥

‘सुवर्णमय शैलराज मैनाक! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। सौम्य! तुम्हें अभय दान देता हूँ। तुम सुखपूर्वक जहाँ चाहो, जाओ॥ १३९ ॥

‘सौ योजन समुद्रको लाँघते समय जिनके मनमें कोॱइ भय नहीं रहा है, फिर भी जिनके लिये हमारे हृदयमें यह भय था कि पता नहीं इनका क्या होगा ? उन्हीं हनुमान्जीको विश्रामका अवसर देकर तुमने उनकी बहुत बड़ी सहायता की है॥ १४० ॥

‘ये वानरश्रेष्ठ हनुमान् दशरथनन्दन श्रीरामकी सहायताके लिये ही जा रहे हैं। तुमने यथाशक्ति इनका सत्कार करके मुझे पूर्ण संतोष प्रदान किया है'॥ १४१ ॥

देवताओंके स्वामी शतक्रतु इन्द्रको संतुष्ट देखकर पर्वतोंमें श्रेष्ठ मैनाकको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ॥ १४२ ॥

इस प्रकार इन्द्रका दिया हुआ वर पाकर मैनाक उस समय जलमें स्थित हो गया और हनुमान्जी समुद्रके उस प्रदेशको उसी मुहूर्तमें लाँघ गये॥ १४३ ॥

तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियोंने सूर्यतुल्य तेजस्विनी नागमाता सुरसासे कहा— ॥ १४४ ॥

‘ये पवननन्दन श्रीमान् हनुमान्जी समुद्रके ऊपर होकर जा रहे हैं। तुम दो घड़ीके लिये इनके मार्गमें विघ्न डाल दो॥ १४५ ॥

‘तुम पर्वतके समान अत्यन्त भयंकर राक्षसीका रूप धारण करो। उसमें विकराल दाढ़ें, पीले नेत्र और आकाशको स्पर्श करनेवाला विकट मुँह बनाओ॥ १४६॥

‘हमलोग पुनः हनुमान्‌जीके बल और पराक्रमकी परीक्षा लेना चाहते हैं। या तो किसी उपायसे ये तुम्हें जीत लेंगे अथवा विषादमें पड़ जायँगे (इससे इनके बलाबलका ज्ञान हो जायगा)’॥ १४७॥

देवताओंके सत्कारपूर्वक इस प्रकार कहनेपर देवी सुरसाने समुद्रके बीचमें राक्षसीका रूप धारण किया। उसका वह रूप बड़ा ही विकट, बेडौल और सबके लिये भयावना था। वह समुद्रके पार जाते हुए हनुमान्‌जीको घेरकर उनसे इस प्रकार बोली—॥ १४८-१४९॥

‘कपिश्रेष्ठ! देवेश्वरोंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताकर मुझे अर्पित कर दिया है, अतः मैं तुम्हें खाऊँगी। तुम मेरे इस मुँहमें चले आओ॥ १५०॥

‘पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझे यह वर दिया था।’ ऐसा कहकर वह तुरंत ही अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान्‌जीके सामने खड़ी हो गयी॥ १५१॥

सुरसाके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीने प्रसन्नमुख होकर कहा—‘देवि! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और धर्मपत्नी सीताजीके साथ दण्डकारण्यमें आये थे॥ १५२॥

‘वहाँ परहित-साधनमें लगे हुए श्रीरामका राक्षसोंके साथ वैर बँध गया। अतः रावणने उनकी यशस्विनी भार्या सीताको हर लिया॥ १५३॥

‘मैं श्रीरामकी आज्ञासे उनका दूत बनकर सीताजीके पास जा रहा हूँ। तुम भी श्रीरामके राज्यमें निवास करती हो। अतः तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिये॥ १५४॥

‘अथवा (यदि तुम मुझे खाना ही चाहती हो तो) मैं सीताजीका दर्शन करके अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीसे जब मिल लूँगा, तब तुम्हारे मुखमें आ जाऊँगा—यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’॥ १५५॥

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली सुरसा बोली—‘मुझे यह वर मिला है कि कोई भी मुझे लाँघकर आगे नहीं जा सकता’॥ १५६॥

फिर भी हनुमान्‌जीको जाते देख उनके बलको जाननेकी इच्छा रखनेवाली नागमाता सुरसाने उनसे कहा—॥ १५७॥

‘वानरश्रेष्ठ! आज मेरे मुखमें प्रवेश करके ही तुम्हें आगे जाना चाहिये। पूर्वकालमें विधाताने मुझे ऐसा ही वर दिया था।’ ऐसा कहकर सुरसा तुरंत अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान्जीके सामने खड़ी हो गयी॥ १५८१/२ ॥

सुरसाके ऐसा कहनेपर वानरशिरोमणि हनुमान्जी कुपित हो उठे और बोले—‘तुम अपना मुँह इतना बड़ा बना लो जिससे उसमें मेरा भार सह सको’ यों कहकर जब वे मौन हुए, तब सुरसाने अपना मुख दस योजन विस्तृत बना लिया। यह देखकर कुपित हुए हनुमान्जी भी तत्काल दस योजन बड़े हो गये। उन्हें मेघके समान दस योजन विस्तृत शरीरसे युक्त हुआ देख सुरसाने भी अपने मुखको बीस योजन बड़ा बना लिया॥ १५९—१६१ ॥

तब हनुमान्जीने क्रुरुद्ध होकर अपने शरीरको तीस योजन अधिक बढ़ा दिया। फिर तो सुरसाने भी अपने मुँहको चालीस योजन ऊँचा कर लिया॥ १६२ ॥

यह देख वीर हनुमान् पचास योजन ऊँचे हो गये। तब सुरसाने अपना मुँह साठ योजन ऊँचा बना लिया॥

फिर तो वीर हनुमान् उसी क्षण सत्तर योजन ऊँचे हो गये। अब सुरसाने अस्सी योजन ऊँचा मुँह बना लिया॥ १६४ ॥

तदनन्तर अग्निके समान तेजस्वी हनुमान् नब्बे योजन ऊँचे हो गये। यह देख सुरसाने भी अपने मुँहका विस्तार सौ योजनका कर लिया*॥ १६५ ॥

सुरसाके फैलाये हुए उस विशाल जिह्वासे युक्त और नरकके समान अत्यन्त भयंकर मुँहको देखकर बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान्ने मेघकी भाँति अपने शरीरको संकुचित कर लिया। वे उसी क्षण अँगूठेके बराबर छोटे हो गये॥ १६६-१६७ ॥

फिर वे महाबली श्रीमान् पवनकुमार सुरसाके उस मुँहमें प्रवेश करके तुरंत निकल आये और आकाशमें खड़े होकर इस प्रकार बोले—॥ १६८ ॥

‘दक्षककुमारी! तुम्हें नमस्कार है। मैं तुम्हारे मुँहमें प्रवेश कर चुका। लो तुम्हारा वर भी सत्य हो गया। अब मैं उस स्थानको जाऊँगा, जहाँ विदेहकुमारी सीता विद्यमान हैं’॥ १६९ ॥

राहुके मुखसे छूटे हुए चन्द्रमाकी भाँति अपने मुखसे मुक्त हुए हनुमान्जीको देखकर सुरसा देवीने अपने असली रूपमें प्रकट होकर उन वानरवीरसे कहा—॥ १७० ॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम भगवान् श्रीरामके कार्यकी सिद्धिके लिये सुखपूर्वक जाओ। सौम्य! विदेहनन्दिनी सीताको महात्मा श्रीरामसे शीघ्र मिलाओ’॥ १७१॥

कपिवर हनुमान्जीका यह तीसरा अत्यन्त दुष्कर कर्म देख सब प्राणी वाह-वाह करके उनकी प्रशंसा करने लगे॥ १७२ ॥

वे वरुणके निवासभूत अलङ्घ्य समुद्रके निकट आकर आकाशका ही आश्रय ले गरुड़के समान वेगसे आगे बढ़ने लगे॥ १७३ ॥

जो जलकी धाराओंसे सेवित, पक्षियोंसे संयुक्त, गानविद्याके आचार्य तुम्बुरु आदि गन्धर्वोंके विचरणका स्थान तथा ऐरावतके आने-जानेका मार्ग है, सिंह, हाथी, बाघ, पक्षी और सर्प आदि वाहनोंसे जुते और उड़ते हुए निर्मल विमान जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, जिनका स्पर्श वज्र और अशनिके समान दुःसह तथा तेज अग्निके समान प्रकाशमान है तथा जो स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, ऐसे महाभाग पुण्यात्मा पुरुषोंका जो निवासस्थान है, देवताके लिये अधिक मात्रामें हविष्यका भार वहन करनेवाले अग्निदेव जिसका सदा सेवन करते हैं, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और तारे आभूषणकी भाँति जिसे सजाते हैं, महर्षियोंके समुदाय, गन्धर्व, नाग और यक्ष जहाँ भरे रहते हैं, जो जगत्का आश्रयस्थान, एकान्त और निर्मल है, गन्धर्वराज विश्वावसु जिसमें निवास करते हैं, देवराज इन्द्रका हाथी जहाँ चलता-फिरता है, जो चन्द्रमा और सूर्यका भी मङ्गलमय मार्ग है, इस जीव-जगत्के लिये विमल वितान (चाँदोवा) है, साक्षात् परब्रह्म परमात्माने ही जिसकी सृष्टि की है, जो बहुसंख्यक वीरोंसे सेवित और विद्याधरगणोंसे आवृत है, उस वायुपथ आकाशमें पवननन्दन हनुमान्जी गरुड़के समान वेगसे चले॥ १७४—१८० ॥

वायुके समान हनुमान्जी अगरके समान काले तथा लाल, पीले और श्वेत बादलोंको खींचते हुए आगे बढ़ने लगे॥ १८१ ॥

उनके द्वारा खींचे जाते हुए वे बड़े-बड़े बादल अद्भुत शोभा पा रहे थे। वे बारम्बार मेघ-समूहोंमें प्रवेश करते और बाहर निकलते थे। उस अवस्थामें बादलोंमें छिपते तथा प्रकट होते हुए वर्षाकालके चन्द्रमाकी भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ १८२१/२ ॥

सर्वत्र दिखायी देते हुए पवनकुमार हनुमान्जी पंखधारी गिरिराजके समान निराधार आकाशका आश्रय लेकर आगे बढ़ रहे थे॥ १८३१/२ ॥

इस तरह जाते हुए हनुमान्जीको इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली विशालकाया सिंहिका नामवाली राक्षसीने देखा। देखकर वह मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी—॥ १८४१/२ ॥

‘आज दीर्घकालके बाद यह विशाल जीव मेरे वशमें आया है। इसे खा लेनेपर बहुत दिनोंके लिये मेरा पेट भर जायगा’॥ १८५१/२ ॥

अपने हृदयमें ऐसा सोचकर उस राक्षसीने हनुमान्‌जीकी छाया पकड़ ली। छाया पकड़ी जानेपर वानरवीर हनुमान्‌ने सोचा—‘अहो! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया, इस पकड़के सामने मेरा पराक्रम पङ्गु हो गया है। जैसे प्रतिकूल हवा चलनेपर समुद्रमें जहाजकी गति अवरुद्ध हो जाती है, वैसी ही दशा आज मेरी भी हो गयी है’॥ १८६-१८७१/२ ॥

यही सोचते हुए कपिवर हनुमान्‌ने उस समय अगल-बगलमें, ऊपर और नीचे दृष्टि डाली। इतनेहीमें उन्हें समुद्रके जलके ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय प्राणी दिखायी दिया॥ १८८१/२ ॥

उस विकराल मुखवाली राक्षसीको देखकर पवनकुमार हनुमान् सोचने लगे—वानरराज सुग्रीवने जिस महापराक्रमी छायाग्राही अद्भुत जीवकी चर्चा की थी, वह निःसंदेह यही है॥ १८९-१९० ॥

तब बुद्धिमान् कपिवर हनुमान्‌जीने यह निश्चय करके कि वास्तवमें यही सिंहिका है, वर्षाकालके मेघकी भाँति अपने शरीरको बढ़ाना आरम्भ किया। इस प्रकार वे विशालकाय हो गये॥ १९१ ॥

उन महाकपिके शरीरको बढ़ते देख सिंहिकाने अपना मुँह पाताल और आकाशके मध्यभागके समान फैला लिया और मेघोंकी घटाके समान गर्जना करती हुई उन वानरवीरकी ओर दौड़ी॥ १९२१/२ ॥

हनुमान्‌जीने उसका अत्यन्त विकराल और बढ़ा हुआ मुँह देखा। उन्हें अपने शरीरके बराबर ही उसका मुँह दिखायी दिया। उस समय बुद्धिमान् महाकपि हनुमान्‌ने सिंहिकाके मर्मस्थानोंको अपना लक्ष्य बनाया॥

तदनन्तर वज्रोपम शरीरवाले महाकपि पवनकुमार अपने शरीरको संकुचित करके उसके विकराल मुखमें आ गिरे॥ १९४१/२ ॥

उस समय सिद्धों और चारणोंने हनुमान्‌जीको सिंहिकाके मुखमें उसी प्रकार निमग्न होते देखा, जैसे पूर्णिमाकी रातमें पूर्ण चन्द्रमा राहुके ग्रास बन गये हों॥

मुखमें प्रवेश करके उन वानरवीरने अपने तीखे नखोंसे उस राक्षसीके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर डाला। इसके पश्चात् वे मनके समान गतिसे उछलकर वेगपूर्वक बाहर निकल आये॥ १९६१/२ ॥

दैवके अनुग्रह, स्वाभाविक धैर्य तथा कौशलसे उस राक्षसीको मारकर वे मनस्वी वानरवीर पुनः वेगसे बढ़कर बड़े हो गये॥ १९७१/२ ॥

हनुमान्‌जीने प्राणोंके आश्रयभूत उसके हृदयस्थलको ही नष्ट कर दिया, अतः वह प्राणशून्य होकर समुद्रके जलमें गिर पड़ी। विधाताने ही उसे मार गिरानेके लिये हनुमान्‌जीको निमित्त बनाया था॥ १९८ ॥

उन वानरवीरके द्वारा शीघ्र ही मारी जाकर सिंहिका जलमें गिर पड़ी। यह देख आकाशमें विचरनेवाले प्राणी उन कपिश्रेष्ठसे बोले— ॥ १९९ ॥

‘कपिवर! तुमने यह बड़ा ही भयंकर कर्म किया है, जो इस विशालकाय प्राणीको मार गिराया है। अब तुम बिना किसी विघ्न-बाधाके अपना अभीष्ट कार्य सिद्ध करो॥ २०० ॥

‘वानरेन्द्र! जिस पुरुषमें तुम्हारे समान धैर्य, सूझ, बुद्धि और कुशलता—ये चार गुण होते हैं, उसे अपने कार्यमें कभी असफलता नहीं होती’॥ २०१ ॥

इस प्रकार अपना प्रयोजन सिद्ध हो जानेसे उन आकाशचारी प्राणियोंने हनुमान्‌जीका बड़ा सत्कार किया। इसके बाद वे आकाशमें चढ़कर गरुड़के समान वेगसे चलने लगे॥ २०२ ॥

सौ योजनके अन्तमें प्रायः समुद्रके पार पहुँचकर जब उन्होंने सब ओर दृष्टि डाली, तब उन्हें एक हरी-भरी वनश्रेणी दिखायी दी॥ २०३ ॥

आकाशमें उड़ते हुए ही शाखामृगोंमें श्रेष्ठ हनुमान्‌जीने भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे सुशोभित लंका नामक द्वीप देखा। उत्तर तटकी भाँति समुद्रके दक्षिण तटपर भी मलय नामक पर्वत और उसके उपवन दिखायी दिये॥ २०४ ॥

समुद्र, सागरतटवर्ती जलप्राय देश तथा वहाँ उगे हुए वृक्ष एवं सागरपत्नी सरिताओंके मुहानोंको भी उन्होंने देखा॥ २०५ ॥

मनको वशमें रखनेवाले बुद्धिमान् हनुमान्‌जीने अपने शरीरको महान् मेघोंकी घटाके समान विशाल तथा आकाशको अवरुद्ध करता-सा देख मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—॥ २०६ ॥

‘अहो! मेरे शरीरकी विशालता तथा मेरा यह तीव्र वेग देखते ही राक्षसोंके मनमें मेरे प्रति बड़ा कौतूहल होगा—वे मेरा भेद जाननेके लिये उत्सुक हो जायँगे।’ परम बुद्धिमान् हनुमान्जीके मनमें यह धारणा पक्की हो गयी॥ २०७ ॥

मनस्वी हनुमान् अपने पर्वताकार शरीरको संकुचित करके पुनः अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो गये। ठीक उसी तरह, जैसे मनको वशमें रखनेवाला मोहरहित पुरुष अपने मूल स्वरूपमें प्रतिष्ठित होता है॥ २०८ ॥

जैसे बलिके पराक्रमसम्बन्धी अभिमानको हर लेनेवाले श्रीहरिने विराट्रूपसे तीन पग चलकर तीनों लोकोंको नाप लेनेके पश्चात् अपने उस स्वरूपको समेट लिया था, उसी प्रकार हनुमान्जी समुद्रको लाँघ जानेके बाद अपने उस विशाल रूपको संकुचित करके अपने वास्तविक स्वरूपमें स्थित हो गये॥ २०९ ॥

हनुमान्जी बड़े ही सुन्दर और नाना प्रकारके रूप धारण कर लेते थे। उन्होंने समुद्रके दूसरे तटपर, जहाँ दूसरोंका पहुँचना असम्भव था, पहुँचकर अपने विशाल शरीरकी ओर दृष्टिपात किया। फिर अपने कर्तव्यका विचार करके छोटा-सा रूप धारण कर लिया॥ २१० ॥

महान् मेघ-समूहके समान शरीरवाले महात्मा हनुमान्जी केवड़े, लसोड़े और नारियलके वृक्षोंसे विभूषित लम्बपर्वतके विचित्र लघु शिखरोंवाले महान् समृद्धिशाली शृङ्गपर कूद पड़े॥ २११ ॥

तदनन्तर समुद्रके तटपर पहुँचकर वहाँसे उन्होंने एक श्रेष्ठ पर्वतके शिखरपर बसी हुई लंकाको देखा। देखकर अपने पहले रूपको तिरोहित करके वे वानरवीर वहाँके पशु-पक्षियोंको व्यथित करते हुए उसी पर्वतपर उतर पड़े॥ २१२ ॥

इस प्रकार दानवों और सर्पोंसे भरे हुए तथा बड़ी-बड़ी उत्ताल तरङ्गमालाओंसे अलंकृत महासागरको बलपूर्वक लाँघकर वे उसके तटपर उतर गये और अमरावतीके समान सुशोभित लंकापुरीकी शोभा देखने लगे॥ २१३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥

१ ॥


* साँपके फनोंमें दिखायी देनेवाली नील रेखाको ‘स्वस्तिक’ कहते हैं।
* १६२ से लेकर १६५ तकके चार श्लोक कुछ टीकाकारोंने प्रक्षिप्त बताये हैं, किंतु रामायणशिरोमणि नामक टीकामें इनकी व्याख्या उपलब्ध होती है। अतः यहाँ मूलमें इन्हें सम्मिलित कर लिया गया है। ६२१

दूसरा सर्ग

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दूसरा सर्ग

लंकापुरीका वर्णन, उसमें प्रवेश करनेके विषयमें हनुमान्‌जीका विचार, उनका लघुरूपसे पुरीमें प्रवेश तथा चन्द्रोदयका वर्णन

महाबली हनुमान्‌जी अलङ्घनीय समुद्रको पार करके त्रिकूट (लम्ब) नामक पर्वतके शिखरपर स्वस्थ भावसे खड़े हो लंकापुरीकी शोभा देखने लगे॥ १ ॥

उस समय उनके ऊपर वहाँ वृक्षोंसे झड़े हुए फूलोंकी वर्षा होने लगी। इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूलके बने हुए वानरके समान प्रतीत होने लगे॥ २ ॥

उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लम्बी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानिका ही अनुभव करते थे॥ ३ ॥

उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनोंके बहुत-से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्रको पार करना कौन बड़ी बात है?॥ ४ ॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा वानरोंमें उत्तम वे वेगवान् पवनकुमार महासागरको लाँघकर शीघ्र ही लंकामें जा पहुँचे॥ ५ ॥

रास्तेमें हरी-हरी दूब और वृक्षोंसे भरे हुए मकरन्दपूर्ण सुगन्धित वन देखते हुए वे मध्यममार्गसे जा रहे थे॥ ६ ॥

तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान् वृक्षोंसे आच्छादित पर्वतों और फूलोंसे भरी हुई वन-श्रेणियोंमें विचरने लगे॥ ७ ॥

उस पर्वतपर स्थित हो पवनपुत्र हनुमान्‌ने बहुत-से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वतके अग्रभागमें बसी हुई लंकाका भी अवलोकन किया॥ ८ ॥

उन कपिश्रेष्ठने वहाँ सरल (चीड़), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल (चिरौंजी), मुचुलिन्द (जम्बीरी नीबू), कुटज, केतक (केवड़े), सुगन्धपूर्ण प्रियङ्गु (पिप्पली), नीप (कदम्ब या अशोक), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे। फूलोंके भारसे लदे हुए तथा मुकुलित (अधखिले) बहुत-से वृक्ष उन्हें दृष्टिगोचर हुए, जिनमें पक्षी भरे हुए थे और हवाके झोंकेसे जिनकी डालियाँ झूम रही थीं॥ ९— ११ ॥