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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

‘इसलिये मैं तो महर्षि कण्डुके उस यथार्थ और उत्तम वचनका ही पालन करूँगा; क्योंकि वह परिणाममें धर्म, यश और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है॥ ३२ ॥

‘जो एक बार भी शरणमें आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे रक्षाकी प्रार्थना करता है, उसे मैं समस्त प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ। यह मेरा सदाके लिये व्रत है॥ ३३ ॥

‘अतः कपिश्रेष्ठ सुग्रीव! वह विभीषण हो या स्वयं रावण आ गया हो। तुम उसे ले आओ। मैंने उसे अभयदान दे दिया’॥ ३४ ॥

भगवान् श्रीरामका यह वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने सौहार्दसे भरकर उनसे कहा— ॥ ३५ ॥

धर्मज्ञ! लोकेश्वरशिरोमणे! आपने जो यह श्रेष्ठ धर्मकी बात कही है, इसमें क्या आश्चर्य है? क्योंकि आप महान् शक्तिशाली और सन्मार्गपर स्थित हैं॥ ३६ ॥

‘यह मेरी अन्तरात्मा भी विभीषणको शुद्ध समझती है। हनुमान्जीने भी अनुमान और भावसे उनकी भीतर-बाहर सब ओरसे भलीभाँति परीक्षा कर ली हैं॥ ३७ ॥

‘अतः रघुनन्दन! अब विभीषण शीघ्र ही यहाँ हमारे-जैसे होकर रहें और हमारी मित्रता प्राप्त करें’॥ ३८ ॥

तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी कही हुई वह बात सुनकर राजा श्रीराम शीघ्र आगे बढ़कर विभीषणसे मिले, मानो देवराज इन्द्र पक्षिराज गरुड़से मिल रहे हों॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८ ॥

उन्नीसवाँ सर्ग

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उन्नीसवाँ सर्ग

विभीषणका आकाशसे उतरकर भगवान् श्रीरामके चरणोंकी शरण लेना, उनके पूछनेपर रावणकी शक्तिका परिचय देना और श्रीरामका रावण-वधकी प्रतिज्ञा करके विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त कर उनकी सम्मतिसे समुद्रतटपर धरना देनेके लिये बैठना

इस प्रकार श्रीरघुनाथजीके अभय देनेपर विनयशील महाबुद्धिमान् विभीषणने नीचे उतरनेके लिये पृथ्वीकी ओर देखा॥ १ ॥

वे अपने भक्त सेवकोंके साथ हर्षसे भरकर आकाशसे पृथ्वीपर उतर आये। उतरकर चारों राक्षसोंके साथ धर्मात्मा विभीषण श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ २१/२ ॥

उस समय विभीषणने श्रीरामसे धर्मानुकूल, युक्तियुक्त, समयोचित और हर्षवर्द्धक बात कही— ॥ ३१/२ ॥

‘भगवन्! मैं रावणका छोटा भाई हूँ। रावणने मेरा अपमान किया है। आप समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं, इसलिये मैंने आपकी शरण ली है॥ ४१/२ ॥

‘अपने सभी मित्र, धन और लङ्कापुरीको मैं छोड़ आया हूँ। अब मेरा राज्य, जीवन और सुख सब आपके ही अधीन हैं’॥ ५१/२ ॥

विभीषणके ये वचन सुनकर श्रीरामने मधुर वाणीद्वारा उन्हें सान्त्वना दी और नेत्रोंसे मानो उन्हें पी जायँगे, इस प्रकार प्रेमपूर्वक उनकी ओर देखते हुए कहा— ॥ ६१/२ ॥

‘विभीषण! तुम मुझे ठीक-ठीक राक्षसोंका बलाबल बताओ।’ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके ऐसा कहनेपर राक्षस विभीषणने रावणके सम्पूर्ण बलका परिचय देना आरम्भ किया— ॥ ७-८ ॥

‘राजकुमार! ब्रह्माजीके वरदानके प्रभावसे दशमुख रावण (केवल मनुष्यको छोड़कर) गन्धर्व, नाग और पक्षी आदि सभी प्राणियोंके लिये अवध्य है॥ ९ ॥

‘रावणसे छोटा और मुझसे बड़ा जो मेरा भाई कुम्भकर्ण है, वह महातेजस्वी और पराक्रमी है। युद्धमें वह इन्द्रके समान बलशाली है॥ १० ॥

‘श्रीराम! रावणके सेनापतिका नाम प्रहस्त है। शायद आपने भी उसका नाम सुना होगा। उसने कैलासपर घटित हुए युद्धमें कुबेरके सेनापति मणिभद्रको भी पराजित कर दिया था॥ ११

'रावणका पुत्र जो इन्द्रजित् है, वह गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहनकर अवध्य कवच धारण करके हाथमें धनुष ले जब युद्धमें खड़ा होता है, उस समय अदृश्य हो जाता है॥ १२ ॥

'रघुनन्दन! श्रीमान् इन्द्रजित्ने अग्निदेवको तृप्त करके ऐसी शक्ति प्राप्त कर ली है कि वह विशाल व्यूहसे युक्त संग्राममें अदृश्य होकर शत्रुओंपर प्रहार करता है॥ १३ ॥

'महोदर, महापार्श्व और अकम्पन—ये तीनों राक्षस रावणके सेनापति हैं और युद्धमें लोकपालोंके समान पराक्रम प्रकट करते हैं॥ १४ ॥

'लङ्कामें रक्त और मांसका भोजन करनेवाले और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ जो दस कोटि सहस्र (एक खरब) राक्षस निवास करते हैं, उन्हें साथ लेकर राजा रावणने लोकपालोंसे युद्ध किया था। उस समय देवताओंसहित वे सब लोकपाल दुरात्मा रावणसे पराजित हो भाग खड़े हुए'॥ १५-१६ ॥

विभीषणकी यह बात सुनकर रघुकुलतिलक श्रीरामने मन-ही-मन उस सबपर बारंबार विचार किया और इस प्रकार कहा— ॥ १७ ॥

'विभीषण! तुमने रावणके युद्धविषयक जिनजि न पराक्रमोंका वर्णन किया है, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूँ॥ १८ ॥

'परंतु सुनो! मैं सच कहता हूँ कि प्रहस्त और पुत्रोंके सहित रावणका वध करके मैं तुम्हें लङ्काका राजा बनाऊँगा॥ १९ ॥

'रावण रसातल या पातालमें प्रवेश कर जाय अथवा पितामह ब्रह्माजीके पास चला जाय तो भी वह अब मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा॥ २० ॥

'मैं अपने तीनों भाइयोंकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि युद्धमें पुत्र, भृत्यजन और बन्धु-बान्धवोंसहित रावणका वध किये बिना अयोध्यापुरीमें प्रवेश नहीं करूँगा'॥ २१ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर धर्मात्मा विभीषणने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ २२ ॥

'प्रभो! राक्षसोंके संहारमें और लङ्कापुरीपर आक्रमण करके उसे जीतनेमें मैं आपकी यथाशक्ति सहायता करूँगा तथा प्राणोंकी बाजी लगाकर युद्धके लिये रावणकी सेनामें भी प्रवेश करूँगा'॥ २३ ॥

विभीषणके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्न होकर लक्ष्मणसे कहा— 'दूसरोंको मान देनेवाले सुमित्रानन्दन! तुम समुद्रसे जल ले आओ और उसके द्वारा इन परम बुद्धिमान् राक्षसराज विभीषणका लङ्काके राज्यपर शीघ्र ही अभिषेक कर दो। मेरे प्रसन्न होनेपर इन्हें यह लाभ मिलना ही चाहिये'॥ २४-२५ ॥

उनके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने मुख्य-मुख्य वानरोंके बीच महाराज श्रीरामके आदेशसे विभीषणका राक्षसोंके राजाके पदपर अभिषेक कर दिया॥ २६ ॥

भगवान् श्रीरामका यह तात्कालिक प्रसाद (अनुग्रह) देखकर सब वानर हर्षध्वनि करने और महात्मा श्रीरामको साधुवाद देने लगे॥ २७ ॥

तत्पश्चात् हनुमान् और सुग्रीवने विभीषणसे पूछा— 'राक्षसराज! हम सब लोग इस अक्षोभ्य समुद्रको महाबली वानरोंकी सेनाओंके साथ किस प्रकार पार कर सकेंगे? 'जिस उपायसे हम सब लोग सेनासहित नदों और नदियोंके स्वामी वरुणालय समुद्रके पार जा सकें, वह बताओ'॥ २९ ॥

उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्मात्मा विभीषणने यों उत्तर दिया— 'रघुवंशी राजा श्रीरामको समुद्रकी शरण लेनी चाहिये॥ ३० ॥

'इस अपार महासागरको राजा सगरने खुदवाया था। श्रीरामचन्द्रजी सगरके वंशज हैं। इसलिये समुद्रको इनका काम अवश्य करना चाहिये'॥ ३१ ॥

विद्वान् राक्षस विभीषणके ऐसा कहनेपर सुग्रीव उस स्थानपर आये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विद्यमान थे॥ ३२ ॥

वहाँ विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने समुद्रपर धरना देनेके विषयमें जो विभीषणका शुभ वचन था, उसे कहना आरम्भ किया॥ ३३ ॥

भगवान् श्रीराम स्वभावसे ही धर्मशील थे, अतः उन्हें भी विभीषणकी यह बात अच्छी लगी। वे महातेजस्वी रघुनाथजी लक्ष्मणसहित कार्यदक्ष वानरराज सुग्रीवका सत्कार करते हुए उनसे मुसकराकर बोले—॥ ३४१/२ ॥

'लक्ष्मण! विभीषणकी यह सम्मति मुझे भी अच्छी लगती है; परंतु सुग्रीव राजनीतिके बड़े पण्डित हैं और तुम भी समयोचित सलाह देनेमें सदा ही कुशल हो। इसलिये तुम दोनों प्रस्तुत कार्यपर अच्छी तरह विचार करके जो ठीक जान पड़े, वह बताओ'॥ ३५-३६ ॥

भगवान् श्रीरामके ऐसा कहनेपर वे दोनों वीर सुग्रीव और लक्ष्मण उनसे आदरपूर्वक बोले— ॥ ३७ ॥

पुरुषसिंह रघुनन्दन! इस समय विभीषणने जो सुखदायक बात कही है, वह हम दोनोंको क्यों नहीं अच्छी लगेगी?॥ ३८ ॥

‘इस भयंकर समुद्रमें पुल बाँधे बिना इन्द्रसहित देवता और असुर भी इधरसे लङ्कापुरीमें नहीं पहुँच सकते॥ ३९ ॥

‘इसलिये आप शूरवीर विभीषणके यथार्थ वचनके अनुसार ही कार्य करें। अब अधिक विलम्ब करना ठीक नहीं है। इस समुद्रसे यह अनुरोध किया जाय कि वह हमारी सहायता करे, जिससे हम सेनाके साथ रावणपालित लङ्कापुरीमें पहुँच सकें’॥ ४० ॥

उन दोनोंके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी उस समय समुद्रके तटपर कुश बिछाकर उसके ऊपर उसी तरह बैठे, जैसे वेदीपर अग्निदेव प्रतिष्ठित होते हैं॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९ ॥

बीसवाँ सर्ग

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बीसवाँ सर्ग

शार्दूलके कहनेसे रावणका शुकको दूत बनाकर सुग्रीवके पास संदेश भेजना, वहाँ वानरोंद्वारा उसकी दुर्दशा, श्रीरामकी कृपासे उसका संकटसे छूटना और सुग्रीवका रावणके लिये उत्तर देना

इसी बीचमें दुरात्मा राक्षसराज रावणके गुप्तचर पराक्रमी राक्षस शार्दूलने वहाँ आकर सागर-तटपर छावनी डाले पड़ी हुई सुग्रीवद्वारा सुरक्षित वानरी सेनाको देखा। सब ओर शान्तभावसे स्थित हुई उस विशाल सेनाको देखकर वह राक्षस लौट गया और जल्दीसे लङ्कापुरीमें जाकर राजा रावणसे यों बोला— ॥ १-२ १/२ ॥

‘महाराज! लङ्काकी ओर वानरों और भालुओंका एक प्रवाह-सा बढ़ा चला आ रहा है। वह दूसरे समुद्रके समान अगाध और असीम है॥ ३ १/२ ॥

‘राजा दशरथके ये पुत्र दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण बड़े ही रूपवान् और श्रेष्ठ वीर हैं। वे सीताका उद्धार करनेके लिये आ रहे हैं॥ ४ १/२ ॥

‘महातेजस्वी महाराज! ये दोनों रघुवंशी बन्धु भी इस समय समुद्र-तटपर ही आकर ठहरे हुए हैं। वानरोंकी वह सेना सब ओरसे दस योजनतकके खाली स्थानको घेरकर वहाँ ठहरी हुई है। यह बिलकुल ठीक बात है। आप शीघ्र ही इस विषयमें विशेष जानकारी प्राप्त करें॥ ५-६ ॥

‘राक्षससम्राट्! आपके दूत शीघ्र सारी बातोंका पता लगा लेनेके योग्य हैं, अतः उन्हें भेजें। तत्पश्चात् जैसा उचित समझें, वैसा करें—चाहे उन्हें सीताको लौटा दें, चाहे सुग्रीवसे मीठी-मीठी बातें करके उन्हें अपने पक्षमें मिला लें अथवा सुग्रीव और श्रीराममें फूट डलवा दें’॥ ७ ॥

शार्दूलकी बात सुनकर राक्षसराज रावण सहसा व्यग्र हो उठा और अपने कर्तव्यका निश्चय करके अर्थवेत्ताओंमें श्रेष्ठ शुक नामक राक्षससे यह उत्तम वचन बोला— ॥

‘दूत! तुम मेरे कहनेसे शीघ्र ही वानरराज सुग्रीवके पास जाओ और मधुर एवं उत्तम वाणीद्वारा निर्भीकतापूर्वक उनसे मेरा यह संदेश कहो— ॥ ९ ॥

वानरराज! आप वानरोंके महाराजके कुलमें उत्पन्न हुए हैं। आदरणीय ऋक्षरजाके पुत्र हैं और स्वयं भी बड़े बलवान् हैं। मैं आपको अपने भाईके समान समझता हूँ। यदि मुझसे

आपका कोई लाभ नहीं हुआ है तो मेरे द्वारा आपकी कोई हानि भी नहीं हुई है॥ १० ॥

सुग्रीव! यदि मैं बुद्धिमान् राजपुत्र रामकी स्त्रीको हर लाया हूँ तो इसमें आपकी क्या हानि है? अतः आप किष्किन्धाको लौट जाइये॥ ११ ॥

हमारी इस लङ्कामें वानरलोग किसी तरह भी नहीं पहुँच सकते। यहाँ देवताओं और गन्धर्वोंका भी प्रवेश होना असम्भव है; फिर मनुष्यों और वानरोंकी तो बात ही क्या है?’’॥ १२ ॥

राक्षसराज रावणके इस प्रकार संदेश देनेपर उस समय निशाचर शुक तोता नामक पक्षीका रूप धारण करके तुरंत आकाशमें उड़ चला॥ १३ ॥

समुद्रके ऊपर-ही-ऊपर बहुत दूरका रास्ता तय करके वह सुग्रीवके पास जा पहुँचा और आकाशमें ही ठहरकर उसने दुरात्मा रावणकी आज्ञाके अनुसार वे सारी बातें सुग्रीवसे कहीं॥ १४ १/२ ॥

जिस समय वह संदेश सुना रहा था, उसी समय वानर उछलकर तुरंत उसके पास जा पहुँचे। वे चाहते थे कि हम शीघ्र ही इसकी पाँखें नोच लें और इसे घूसोंसे ही मार डालें॥ १५ १/२ ॥

इस निश्चयके साथ सारे वानरोंने उस निशाचरको बलपूर्वक पकड़ लिया और उसे कैद करके तुरंत आकाशसे भूतलपर उतारा॥ १६ १/२ ॥

इस प्रकार वानरोंके पीड़ा देनेपर शुक पुकार उठा— ‘रघुनन्दन! राजालोग दूतोंका वध नहीं करते हैं, अतः आप इन वानरोंको भलीभाँति रोकिये। जो स्वामीके अभिप्रायको छोड़कर अपना मत प्रकट करने लगता है, वह दूत बिना कही हुई बात कहनेका अपराधी है; अतः वही वधके योग्य होता है’॥ १७-१८ ॥

शुकके वचन और विलापको सुनकर भगवान् श्रीरामने उसे पीटनेवाले प्रमुख वानरोंको पुकारकर कहा— ‘इसे मत मारो’॥ १९ ॥

उस समयतक शुकके पंखोंका भार कुछ हलका हो गया था; (क्योंकि वानरोंने उन्हें नोंच डाला था) फिर उनके अभय देनेपर शुक आकाशमें खड़ा हो गया और पुनः बोला—॥ २० ॥

‘महान् बल और पराक्रमसे युक्त शक्तिशाली सुग्रीव! समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणको मुझे आपकी ओरसे क्या उत्तर देना चाहिये’॥ २१ ॥

शुकके इस प्रकार पूछनेपर उस समय कपिशिरोमणि महाबली उदारचेता वानरराज सुग्रीवने उस निशाचरके दूतसे यह स्पष्ट एवं निश्छल बात कही—॥ २२ ॥

‘(दूत! तुम रावणसे इस प्रकार कहना—)वधके योग्य दशानन! तुम न तो मेरे मित्र हो, न दयाके पात्र हो, न मेरे उपकारी हो और न मेरे प्रिय व्यक्तियोंमेंसे ही कोई हो। भगवान् श्रीरामके शत्रु हो, इस कारण अपने सगे-सम्बन्धियोंसहित तुम वालीकी भाँति ही मेरे लिये वध्य हो॥ २३ ॥

‘निशाचरराज! मैं पुत्र, बन्धु और कुटुम्बीजनों-सहित तुम्हारा संहार करूँगा और बड़ी भारी सेनाके साथ आकर समस्त लङ्कापुरीको भस्म कर डालूँगा॥ २४ ॥

‘मूर्ख रावण! यदि इन्द्र आदि समस्त देवता तुम्हारी रक्षा करें तो भी श्रीरघुनाथजीके हाथसे अब तुम जीवित नहीं छूट सकोगे। तुम अन्तर्धान हो जाओ, आकाशमें चले जाओ, पातालमें घुस जाओ अथवा महादेवजीके चरणारविन्दोंका आश्रय लो; फिर भी अपने भाइयोंसहित तुम अवश्य श्रीरामचन्द्रजीके हाथोंसे मारे जाओगे॥ २५ ॥

‘तीनों लोकोंमें मुझे कोई भी पिशाच, राक्षस, गन्धर्व या असुर ऐसा नहीं दिखायी देता, जो तुम्हारी रक्षा कर सके॥ २६ ॥

‘चिरकालके बूढ़े गृध्रराज जटायुको तुमने क्यों मारा? यदि तुममें बड़ा बल था तो श्रीराम और लक्ष्मणके पाससे तुमने विशाललोचना सीताका अपहरण क्यों नहीं किया? तुम सीताजीको ले जाकर अपने सिरपर आयी हुई विपत्तिको क्यों नहीं समझ रहे हो?॥ २७ ॥

‘रघुकुलतिलक श्रीराम महाबली, महात्मा और देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं, किंतु तुम उन्हें अभीतक समझ नहीं सके। (तुमने छिपकर सीताका हरण किया है, परंतु) वे (सामने आकर) तुम्हारे प्राणोंका अपहरण करेंगे’॥ २८ ॥

तत्पश्चात् वानरशिरोमणि वालिकुमार अङ्गदने कहा—‘महाराज! मुझे तो यह दूत नहीं, कोई गुप्तचर प्रतीत होता है। इसने यहाँ खड़े-खड़े आपकी सारी सेनाका माप-तौल कर लिया है—पूरा-पूरा अंदाजा लगा लिया है। अतः इसे पकड़ लिया जाय, लङ्काको न जाने पाये। मुझे यही ठीक जान पड़ता है’॥ २९-३० ॥

फिर तो राजा सुग्रीवके आदेशसे वानरोंने उछलकर उसे पकड़ लिया और बाँध दिया। वह बेचारा अनाथकी भाँति विलाप करता रहा॥ ३१ ॥

उन प्रचण्ड वानरोंसे पीड़ित हो शुकने दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामको बड़े जोरसे पुकारा और कहा—'प्रभो! बलपूर्वक मेरी पाँखें नोची और आँखें फोड़ी जा रही हैं। यदि आज मैंने प्राणोंका त्याग किया तो जिस रातमें मेरा जन्म हुआ था और जिस रातको मैं मरूँगा, जन्म और मरणके इस मध्यवर्ती कालमें, मैंने जो भी पाप किया है, वह सब आपको ही लगेगा'॥ ३२-३३ ॥

उस समय उसका वह विलाप सुनकर श्रीरामने उसका वध नहीं होने दिया। उन्होंने वानरोंसे कहा— 'छोड़ दो। यह दूत होकर ही आया था'॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
२०॥

इक्कीसवाँ सर्ग

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इक्कीसवाँ सर्ग

श्रीरामका समुद्रके तटपर कुशा बिछाकर तीन दिनोंतक धरना देनेपर भी समुद्रके दर्शन न देनेसे कुपित हो उसे बाण मारकर विक्षुब्ध कर देना

तदनन्तर श्रीरघुनाथजी समुद्रके तटपर कुशा बिछा महासागरके समक्ष हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो वहाँ लेट गये॥ १ ॥

उस समय शत्रुसूदन श्रीरामने सर्पके शरीरकी भाँति कोमल और वनवासके पहले सोनेके बने हुए सुन्दर आभूषणोंसे सदा विभूषित रहनेवाली अपनी एक (दाहिनी) बाँहको तकिया बना रखा था॥ २ ॥

अयोध्यामें रहते समय मातृकोटिकी अनेक उत्तम नारियाँ (धायें) मणि और सुवर्णके बने हुए केयूरों तथा मोतीके श्रेष्ठ आभूषणोंसे विभूषित अपने कर-कमलोंद्वारा नहलाने-धुलाने आदिके समय अनेक बार श्रीरामके उस बाँहको सहलाती और दबाती थीं॥ ३ ॥

पहले चन्दन और अगुरुसे उस बाँहकी सेवा होती थी। प्रातःकालके सूर्यकी-सी कान्तिवाले लाल चन्दन उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ४ ॥

सीताहरणसे पहले शयनकालमें सीताका सिर उस बाँहकी शोभा बढ़ाता था और श्वेत शय्यापर स्थित एवं लाल चन्दनसे चर्चित हुई वह बाँह गङ्गाजलमें निवास करनेवाले तक्षकके* शरीरकी भाँति सुशोभित होती थी॥ ५ ॥

युद्धस्थलमें जूएके समान वह विशाल भुजा शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाली और सुहृदोंको दीर्घकालतक आनन्दित करनेवाली थी। समुद्रपर्यन्त अखण्ड भूमण्डलकी रक्षाका भार उनकी उसी भुजापर प्रतिष्ठित था॥ ६ ॥

बायीं ओरको बारंबार बाण चलानेके कारण प्रत्यञ्चाके आघातसे जिसकी त्वचापर रगड़ पड़ गयी थी, जो विशाल परिघके समान सुदृढ़ एवं बलिष्ठ थी तथा जिसके द्वारा उन्होंने सहस्रों गौओंका दान किया था, उस विशाल दाहिनी भुजाका तकिया लगाकर उदारता आदि गुणोंसे युक्त महाबाहु श्रीराम ‘आज या तो मैं समुद्रके पार जाऊँगा या मेरे द्वारा समुद्रका संहार होगा’ ऐसा निश्चय करके मौन हो मन, वाणी और शरीरको संयममें रखकर महासागरको अनुकूल करनेके उद्देश्यसे विधिपूर्वक धरना देते हुए उस कुशासनपर सो गये॥ ७—९ ॥

कुश बिछी हुई भूमिपर सोकर नियमसे असावधान न होते हुए श्रीरामकी वहाँ तीन रातें व्यतीत हो गयीं॥

इस प्रकार उस समय वहाँ तीन रात लेटे रहकर नीतिके ज्ञाता, धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सरिताओंके स्वामी समुद्रकी उपासना करते रहे; परंतु नियमपूर्वक रहते हुए श्रीरामके द्वारा यथोचित पूजा और सत्कार पाकर भी उस मन्दमति महासागरने उन्हें अपने आधिदैविक रूपका दर्शन नहीं कराया—वह उनके समक्ष प्रकट नहीं हुआ॥ ११-१२ ॥

तब अरुणनेत्रप्रान्तवाले भगवान् श्रीराम समुद्रपर कुपित हो उठे और पास ही खड़े हुए शुभलक्षणयुक्त लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले— ॥ १३ ॥

‘समुद्रको अपने ऊपर बड़ा अहङ्कार है, जिससे वह स्वयं मेरे सामने प्रकट नहीं हो रहा है। शान्ति, क्षमा, सरलता और मधुर भाषण—ये जो सत्पुरुषोंके गुण हैं, इनका गुणहीनोंके प्रति प्रयोग करनेपर यही परिणाम होता है कि वे उस गुणवान् पुरुषको भी असमर्थ समझ लेते हैं॥ १४ १/२ ॥

‘जो अपनी प्रशंसा करनेवाला, दुष्ट, धृष्ट, सर्वत्र धावा करनेवाला और अच्छे-बुरे सभी लोगोंपर कठोर दण्डका प्रयोग करनेवाला होता है, उस मनुष्यका सब लोग सत्कार करते हैं॥ १५ १/२ ॥

‘लक्ष्मण! सामनीति (शान्ति)-के द्वारा इस लोकमें न तो कीर्ति प्राप्त की जा सकती है, न यशका प्रसार हो सकता है और न संग्राममें विजय ही पायी जा सकती है॥

‘सुमित्रानन्दन! आज मेरे बाणोंसे खण्ड-खण्ड हो मगर और मत्स्य सब ओर उतराकर बहने लगेंगे और उनकी लाशोंसे इस मकरालय (समुद्र)-का जल आच्छादित हो जायगा। तुम यह दृश्य आज अपनी आँखों देख लो॥ १७ १/२ ॥

‘लक्ष्मण! तुम देखो कि मैं यहाँ जलमें रहनेवाले सर्पोंके शरीर, मत्स्योंके विशाल कलेवर और जल-हस्तियोंके शुण्ड-दण्डके किस तरह टुकड़े-टुकड़े कर डालता हूँ॥ १८ १/२ ॥

‘आज महान् युद्ध ठानकर शङ्खों और सीपियोंके समुदाय तथा मत्स्यों और मगरोंसहित समुद्रको मैं अभी सुखाये देता हूँ॥ १९ १/२ ॥

‘मगरोंका निवासभूत यह समुद्र मुझे क्षमासे युक्त देख असमर्थ समझने लगा है। ऐसे मूर्खोंके प्रति की गयी क्षमाको धिक्कार है॥ २० १/२ ॥

‘सुमित्रानन्दन! सामनीतिका आश्रय लेनेसे यह समुद्र मेरे सामने अपना रूप नहीं प्रकट कर रहा है, इसलिये धनुष तथा विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण ले आओ। मैं समुद्रको सुखा डालूँगा; फिर वानरलोग पैदल ही लङ्कापुरीको चलें॥ २१-२२ ॥

‘यद्यपि समुद्रको अक्षोभ्य कहा गया है; फिर भी आज कुपित होकर मैं इसे विक्षुब्ध कर दूँगा। इसमें सहस्रों तरङ्गें उठती रहती हैं; फिर भी यह सदा अपने तटकी मर्यादा (सीमा) में ही रहता है। किंतु अपने बाणोंसे मारकर मैं इसकी मर्यादा नष्ट कर दूँगा। बड़े-बड़े दानवोंसे भरे हुए इस महासागरमें हलचल मचा दूँगा—तूफान ला दूँगा’॥ २३-२४ ॥

यों कहकर दुर्धर्ष वीर भगवान् श्रीरामने हाथमें धनुष ले लिया। वे क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे और प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे॥ २५ ॥

उन्होंने अपने भयंकर धनुषको धीरेसे दबाकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसकी टङ्कारसे सारे जगत्को कम्पित करते हुए बड़े भयंकर बाण छोड़े, मानो इन्द्रने बहुत-से वज्रोंका प्रहार किया हो॥ २६ ॥

तेजसे प्रज्वलित होते हुए वे महान् वेगशाली श्रेष्ठ बाण समुद्रके जलमें घुस गये। वहाँ रहनेवाले सर्प भयसे थर्रा उठे॥ २७ ॥

‘मत्स्यों और मगरोंसहित महासागरके जलका महान् वेग सहसा अत्यन्त भयंकर हो गया। वहाँ तूफानका कोलाहल छा गया॥ २८ ॥

बड़ी-बड़ी तरङ्ग-मालाओंसे सारा समुद्र व्याप्त हो उठा। शङ्ख और सीपियाँ पानीके ऊपर छा गयीं। वहाँ धुआँ उठने लगा और सारे महासागरमें सहसा बड़ी-बड़ी लहरें चक्कर काटने लगीं॥ २९ ॥

चमकीले फन और दीप्तिशाली नेत्रोंवाले सर्प व्यथित हो उठे तथा पातालमें रहनेवाले महापराक्रमी दानव भी व्याकुल हो गये॥ ३० ॥

सिन्धुराजकी सहस्रों लहरें जो विन्ध्याचल और मन्दराचलके समान विशाल एवं विस्तृत थीं, नाकों और मकरोंको साथ लिये ऊपरको उठने लगीं॥ ३१ ॥

सागरकी उत्ताल तरङ्ग-मालाएँ झूमने और चक्कर काटने लगीं। वहाँ निवास करनेवाले नाग और राक्षस घबरा गये। बड़े-बड़े ग्राह ऊपरको उछलने लगे तथा वरुणके निवासभूत उस समुद्रमें सब ओर भारी कोलाहल मच गया॥ ३२ ॥

तदनन्तर श्रीरघुनाथजी रोषसे लंबी साँस लेते हुए अपने भयंकर वेगशाली अनुपम धनुषको पुनः खींचने लगे। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण उछलकर उनके पास जा पहुँचे और ‘बस, बस, अब नहीं, अब नहीं’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका धनुष पकड़ लिया॥ ३३ ॥

(फिर वे बोले—) ‘भैया! आप वीर-शिरोमणि हैं। इस समुद्रको नष्ट किये बिना भी आपका कार्य सम्पन्न हो जायगा। आप-जैसे महापुरुष क्रोधके अधीन नहीं होते हैं। अब आप सुदीर्घकालतक उपयोगमें लाये जानेवाले किसी अच्छे उपायपर दृष्टि डालें—कोई दूसरी उत्तम युक्ति सोचें’॥ ३४ ॥

इसी समय अन्तरिक्षमें अव्यक्तरूपसे स्थित महर्षियों और देवर्षियोंने भी ‘हाय! यह तो बड़े कष्टकी बात है’ ऐसा कहते हुए ‘अब नहीं, अब नहीं’ कहकर बड़े जोरसे कोलाहल किया॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१ ॥


* तक्षकनागका रंग लाल माना गया है। (देखिये महाभारत, आदिपर्व ४४। २-३)

बाईसवाँ सर्ग

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बाईसवाँ सर्ग

समुद्रकी सलाहके अनुसार नलके द्वारा सागरपर सौ योजन लंबे पुलका निर्माण तथा उसके द्वारा श्रीराम आदिसहित वानरसेनाका उस पार पहुँचकर पड़ाव डालना

तब रघुकुलतिलक श्रीरामने समुद्रसे कठोर शब्दोंमें कहा—‘महासागर! आज मैं पातालसहित तुझे सुखा डालूँगा’॥ १ ॥

‘सागर! मेरे बाणोंसे तुम्हारी सारी जलराशि दग्ध हो जायगी, तू सूख जायगा और तेरे भीतर रहनेवाले सब जीव नष्ट हो जायँगे। उस दशामें तेरे यहाँ जलके स्थानमें विशाल बालुकाराशि पैदा हो जायगी॥ २ ॥

‘समुद्र! मेरे धनुषद्वारा की गयी बाण-वर्षासे जब तेरी ऐसी दशा हो जायगी, तब वानरलोग पैदल ही चलकर तेरे उस पार पहुँच जायँगे॥ ३ ॥

‘दानवोंके निवासस्थान! तू केवल चारों ओरसे बहकर आयी हुई जलराशिका संग्रह करता है। तुझे मेरे बल और पराक्रमका पता नहीं है। किंतु याद रख, (इस उपेक्षाके कारण) तुझे मुझसे भारी संताप प्राप्त होगा’॥ ४ ॥

यों कहकर महाबली श्रीरामने एक ब्रह्मदण्डके समान भयंकर बाणको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने श्रेष्ठ धनुषपर चढ़ाकर खींचा॥ ५ ॥

श्रीरघुनाथजीके द्वारा सहसा उस धनुषके खींचे जाते ही पृथ्वी और आकाश मानो फटने लगे और पर्वत डगमगा उठे॥ ६ ॥

सारे संसारमें अन्धकार छा गया। किसीको दिशाओंका ज्ञान न रहा। सरिताओं और सरोवरोंमें तत्काल हलचल पैदा हो गयी॥ ७ ॥

चन्द्रमा और सूर्य नक्षत्रोंके साथ तिर्यक्-गतिसे चलने लगे। सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित होनेपर भी आकाशमें अन्धकार छा गया॥ ८ ॥

उस समय आकाशमें सैकड़ों उल्काएँ प्रज्वलित होकर उसे प्रकाशित करने लगीं तथा अन्तरिक्षसे अनुपम एवं भारी गड़गड़ाहटके साथ वज्रपात होने लगे॥ ९ ॥

परिवह आदि वायुभेदोंका समूह बड़े वेगसे बहने लगा। वह मेघोंकी घटाको उड़ाता हुआ बारंबार वृक्षोंको तोड़ने, बड़े-बड़े पर्वतोंसे टकराने और उनके शिखरोंको खण्डित करके गिराने

लगा॥ १० १/२ ॥

आकाशमें महान् वेगशाली विशाल वज्र भारी गड़गड़ाहटके साथ टकराकर उस समय वैद्युत अग्निकी वर्षा करने लगे। जो प्राणी दिखायी दे रहे थे और जो नहीं दिखायी देते थे, वे सब बिजलीकी कड़कके समान भयंकर शब्द करने लगे॥ ११-१२ १/२ ॥

उनमेंसे कितने ही अभिभूत होकर धराशायी हो गये। कितने ही भयभीत और उद्विग्न हो उठे। कोऽइ व्यथासे व्याकुल हो गये और कितने ही भयके मारे जडवत् हो गये॥ १३ १/२ ॥

समुद्र अपने भीतर रहनेवाले प्राणियों, तरङ्गों, सर्पों और राक्षसोंसहित सहसा भयानक वेगसे युक्त हो गया और प्रलयकालके बिना ही तीव्रगतिसे अपनी मर्यादा लाँघकर एक-एक योजन आगे बढ़ गया॥ १४-१५ ॥

इस प्रकार नदों और नदियोंके स्वामी उस उद्धत समुद्रके मर्यादा लाँघकर बढ़ जानेपर भी शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजी अपने स्थानसे पीछे नहीं हटे॥ १६ ॥

तब समुद्रके बीचसे सागर स्वयं मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ, मानो महाशैल मेरुपर्वतके अङ्गभूत उदयाचलसे सूर्यदेव उदित हुए हों॥ १७ ॥

चमकीले मुखवाले सर्पोंके साथ समुद्रका दर्शन हुआ। उसका वर्ण स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान श्याम था। उसने जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए आभूषण पहन रखे थे॥ १८ ॥

लाल रंगके फूलोंकी माला तथा लाल ही वस्त्र धारण किये थे। उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर थे। उसने सिरपर एक दिव्य पुष्पमाला धारण कर रखी थी, जो सब प्रकारके फूलोंसे बनायी गयी थी॥

सुवर्ण और तपे हुए काञ्चनके आभूषण उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह अपने ही भीतर उत्पन्न हुए रत्नोंके उत्तम आभूषणोंसे विभूषित था॥ २० ॥

इसीलिये नाना प्रकारके धातुओंसे अलंकृत हिमवान् पर्वतके समान शोभा पाता था। वह अपने विशाल वक्षःस्थलपर कौस्तुभ मणिके सहोदर (सदृश) एक श्वेत प्रभासे युक्त मुख्य रत्न धारण किये हुए था, जो मोतियोंकी इकहरी मालाके मध्यभागमें प्रकाशित हो रहा था॥ २१ १/२ ॥

चञ्चल तरङ्गें उसे घेरे हुए थीं। मेघमाला और वायुसे वह व्याप्त था तथा गङ्गा और सिन्धु आदि नदियाँ उसे सब ओरसे घेरकर खड़ी थीं॥ २२ १/२ ॥

उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राह उद्भ्रान्त हो रहे थे, नाग और राक्षस घबराये हुए थे। देवताओंके समान सुन्दर रूप धारण करके आयी हुईं विभिन्न रूपवाली नदियोंके साथ शक्तिशाली नदीपति समुद्रने निकट आकर पहले धनुर्धर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधित किया और फिर हाथ जोड़कर कहा— ॥ २३–२५ ॥

‘सौम्य रघुनन्दन! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये सर्वदा अपने स्वभावमें स्थित रहते हैं। अपने सनातन मार्गको कभी नहीं छोड़ते—सदा उसीके आश्रित रहते हैं॥ २६ ॥

‘मेरा भी यह स्वभाव ही है जो मैं अगाध और अथाह हूँ—कोई मेरे पार नहीं जा सकता। यदि मेरी थाह मिल जाय तो यह विकार—मेरे स्वभावका व्यतिक्रम ही होगा। इसलिये मैं आपसे पार होनेका यह उपाय बताता हूँ॥ २७ ॥

‘राजकुमार! मैं मगर और नाक आदिसे भरे हुए अपने जलको किसी कामनासे, लोभसे अथवा भयसे किसी तरह स्तम्भित नहीं होने दूँगा॥ २८ ॥

‘श्रीराम! मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे आप मेरे पार चले जायँगे, ग्राह वानरोंको कष्ट नहीं देंगे, सारी सेना पार उतर जायगी और मुझे भी खेद नहीं होगा। मैं आसानीसे सब कुछ सह लूँगा। वानरोंके पार जानेके लिये जिस प्रकार पुल बन जाय, वैसा प्रयत्न मैं करूँगा’॥ २९ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा— ‘वरुणालय! मेरी बात सुनो। मेरा यह विशाल बाण अमोघ है। बताओ, इसे किस स्थानपर छोड़ा जाय’॥ ३० ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर और उस महान् बाणको देखकर महातेजस्वी महासागरने रघुनाथजीसे कहा— ॥ ३१ ॥

‘प्रभो! जैसे जगतमें आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तरकी ओर द्रुमकुल्य नामसे विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है॥ ३२ ॥

‘वहाँ आभीर आदि जातियोंके बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं, जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं। वे सब-के-सब पापी और लुटेरे हैं। वे लोग मेरा जल पीते हैं॥ ३३ ॥

‘उन पापाचारियोंका स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पापको मैं नहीं सह सकता। श्रीराम! आप अपने इस उत्तम बाणको वहीं सफल कीजिये’॥ ३४ ॥

महामना समुद्रका यह वचन सुनकर सागरके दिखाये अनुसार उसी देशमें श्रीरामचन्द्रजीने वह अत्यन्त प्रज्वलित बाण छोड़ दिया॥ ३५ ॥

वह वज्र और अशनिके समान तेजस्वी बाण जिस स्थानपर गिरा था, वह स्थान उस बाणके कारण ही पृथ्वीमें दुर्गम मरुभूमिके नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ ३६ ॥

उस बाणसे पीड़ित होकर उस समय वसुधा आर्तनाद कर उठी। उसकी चोटसे जो छेद हुआ, उसमें होकर रसातलका जल ऊपरको उछलने लगा॥ ३७ ॥

वह छिद्र कुएँके समान हो गया और व्रणके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस कुएँसे सदा निकलता हुआ जल समुद्रके जलकी भाँति ही दिखायी देता है॥ ३८ ॥

उस समय वहाँ भूमिके विदीर्ण होनेका भयंकर शब्द सुनायी पड़ा। उस बाणको गिराकर वहाँके भूतलकी कुक्षिमें (तालाब-पोखरे आदिमें) वर्तमान जलको श्रीरामने सुखा दिया॥ ३९ ॥

तबसे वह स्थान तीनों लोकोंमें मरुकान्तारके नामसे ही विख्यात हो गया। जो पहले समुद्रका कुक्षिप्रदेश था, उसे सुखाकर देवोपम पराक्रमी विद्वान् दशरथनन्दन श्रीरामने उस मरुभूमिको वरदान दिया॥ ४०-४१ ॥

‘यह मरुभूमि पशुओंके लिये हितकारी होगी। यहाँ रोग कम होंगे। यह भूमि फल, मूल और रसोंसे सम्पन्न होगी। यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ होंगे, दूधकी भी बहुतायत होगी। यहाँ सुगन्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न होंगी’॥ ४२ ॥

इस प्रकार भगवान् श्रीरामके वरदानसे वह मरुप्रदेश इस तरहके बहुसंख्यक गुणोंसे सम्पन्न हो सबके लिये मङ्गलकारी मार्ग बन गया॥ ४३ ॥

उस कुक्षिस्थानके दग्ध हो जानेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीसे कहा— ॥ ४४ ॥

‘सौम्य! आपकी सेनामें जो यह नल नामक कान्तिमान् वानर है, साक्षात् विश्वकर्माका पुत्र है। इसे इसके पिताने यह वर दिया है कि ‘तुम मेरे ही समान समस्त शिल्पकलामें निपुण होओगे।’ प्रभो! आप भी तो इस विश्वके स्रष्टा विश्वकर्मा हैं। इस नलके हृदयमें आपके प्रति बड़ा प्रेम है॥ ४५ ॥

‘यह महान् उत्साही वानर अपने पिताके समान ही शिल्पकर्ममें समर्थ है, अतः यह मेरे ऊपर पुलका निर्माण करे। मैं उस पुलको धारण करूँगा’॥ ४६ ॥

यों कहकर समुद्र अदृश्य हो गया। तब वानरश्रेष्ठ नल उठकर महाबली भगवान् श्रीरामसे बोला— ॥ ४७ ॥

'प्रभो! मैं पिताकी दी हुई शक्तिको पाकर इस विस्तृत समुद्रपर सेतुका निर्माण करूँगा। महासागरने ठीक कहा है॥ ४८ ॥

'संसारमें पुरुषके लिये अकृतज्ञोंके प्रति दण्डनीतिका प्रयोग ही सबसे बड़ा अर्थसाधक है, ऐसा मेरा विश्वास है। वैसे लोगोंके प्रति क्षमा, सान्त्वना और दाननीतिके प्रयोगको धिक्कार है॥ ४९ ॥

'इस भयानक समुद्रको राजा सगरके पुत्रोंने ही बढ़ाया है। फिर भी इसने कृतज्ञतासे नहीं, दण्डके भयसे ही सेतुकर्म देखनेकी इच्छा मनमें लाकर श्रीरघुनाथजीको अपनी थाह दी है॥ ५० ॥

'मन्दराचलपर विश्वकर्माजीने मेरी माताको यह वर दिया था कि 'देवि! तुम्हारे गर्भसे मेरे ही समान पुत्र होगा'॥ ५१ ॥

'इस प्रकार मैं विश्वकर्माका औरस पुत्र हूँ और शिल्पकर्ममें उन्हींके समान हूँ। इस समुद्रने आज मुझे इन सब बातोंका स्मरण दिला दिया है। महासागरने जो कुछ कहा है, ठीक है। मैं बिना पूछे आपलोगोंसे अपने गुणोंको नहीं बता सकता था, इसीलिये अबतक चुप था॥ ५२ ॥

'मैं महासागरपर पुल बाँधनेमें समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दें'॥

तब भगवान् श्रीरामके भेजनेसे लाखों बड़े-बड़े वानर हर्ष और उत्साहमें भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े-बड़े जंगलोंमें घुस गये॥ ५४ ॥

वे पर्वतके समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वतशिखरों और वृक्षोंको तोड़ देते और उन्हें समुद्रतक खींच लाते थे॥ ५५ ॥

वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षोंसे समुद्रको पाटने लगे॥ ५६-५७ ॥

वे श्रेष्ठ वानर वहाँके वृक्षोंको जड़से उखाड़ लाते या जड़के ऊपरसे भी तोड़ लाते थे। इन्द्रध्वजके समान ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको उठाये लिये चले आते थे॥ ५८ ॥

ताड़ों, अनारकी झाड़ियों, नारियल और बहेड़ेके वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीमको भी इधर-उधरसे तोड़-तोड़कर लाने लगे॥ ५९ ॥

महाकाय महाबली वानर हाथीके समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतोंको उखाड़कर यन्त्रों (विभिन्न साधनों) द्वारा समुद्रतटपर ले आते थे॥ ६० ॥

शिलाखण्डोंको फेंकनेसे समुद्रका जल सहसा आकाशमें उठ जाता और फिर वहाँसे नीचेको गिर जाता था॥ ६१ ॥

उन वानरोंने सब ओर पत्थर गिराकर समुद्रमें हलचल मचा दी। कुछ दूसरे वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े हुए थे॥ ६२ ॥

नल नदों और नदियोंके स्वामी समुद्रके बीचमें महान् सेतुका निर्माण कर रहे थे। भयंकर कर्म करनेवाले वानरोंने मिल-जुलकर उस समय सेतुनिर्माणका कार्य आरम्भ किया था॥ ६३ ॥

कोई नापनेके लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई सामग्री जुटाते थे। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा शिरोधार्य करके सैकड़ों वानर जो पर्वतों और मेघोंके समान प्रतीत होते थे, वहाँ तिनकों और काष्ठोंद्वारा भिन्न-भिन्न स्थानोंमें पुल बाँध रहे थे। जिनके अग्रभाग फूलोंसे लदे थे, ऐसे वृक्षोंद्वारा भी वे वानर सेतु बाँधते थे॥ ६४-६५ ॥

पर्वतों-जैसी बड़ी-बड़ी चट्टानें और पर्वतशिखर लेकर सब ओर दौड़ते वानर दानवोंके समान दिखायी देते थे॥ ६६ ॥

उस समय उस महासागरमें फेंकी जाती हुई शिलाओं और गिराये जाते हुए पहाड़ोंके गिरनेसे बड़ा भीषण शब्द हो रहा था॥ ६७ ॥

हाथीके समान विशालकाय वानर बड़े उत्साह और तेजीके साथ काममें लगे हुए थे। पहले दिन उन्होंने चौदह योजन लंबा पुल बाँधा॥ ६८ ॥

फिर दूसरे दिन भयंकर शरीरवाले महाबली वानरोंने तेजीसे काम करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया॥ ६९ ॥

तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काममें जुटे हुए महाकाय कपियोंने समुद्रमें इक्कीस योजन लंबा पुल बाँध दिया॥ ७० ॥

चौथे दिन महान् वेगशाली और शीघ्रकारी वानरोंने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया॥ ७१ ॥

तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करनेवाले उन वानर वीरोंने सुवेल पर्वतके निकटतक तेईस योजन लंबा पुल बाँधा॥

इस प्रकार विश्वकर्माके बलवान् पुत्र कान्तिमान् कपिश्रेष्ठ नलने समुद्रमें सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया। इस कार्यमें वे अपने पिताके समान ही प्रतिभाशाली थे॥ ७३ ॥

मकरालय समुद्रमें नलके द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और शोभाशाली सेतु आकाशमें स्वातीपथ (छायापथ)-के समान सुशोभित होता था॥ ७४ ॥

उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि उस अद्भुत कार्यको देखनेके लिये आकाशमें आकर खड़े थे॥

नलके बनाये हुए सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े उस पुलको देवताओं और गन्धर्वोंने देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम था॥ ७६ ॥

वानरलोग भी इधर-उधर उछल-कूदकर गर्जना करते हुए उस अचिन्त्य, असह्य, अद्भुत और रोमाञ्चकारी पुलको देख रहे थे। समस्त प्राणियोंने ही समुद्रमें सेतु बाँधनेका वह कार्य देखा॥ ७७ १/२ ॥

इस प्रकार उन सहस्र कोटि (एक खरब) महाबली एवं उत्साही वानरोंका दल पुल बाँधते-बाँधते ही समुद्रके उस पार पहुँच गया॥ ७८ १/२ ॥

वह पुल बड़ा ही विशाल, सुन्दरतासे बनाया हुआ, शोभासम्पन्न, समतल और सुसम्बद्ध था। वह महान् सेतु सागरमें सीमन्तके समान शोभा पाता था॥ ७९ १/२ ॥

पुल तैयार हो जानेपर अपने सचिवोंके साथ विभीषण गदा हाथमें लेकर समुद्रके दूसरे तटपर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुल तोड़नेके लिये आवें तो उन्हें दण्ड दिया जा सके॥ ८० १/२ ॥

तदनन्तर सुग्रीवने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— 'वीरवर! आप हनुमान्के कंधेपर चढ़ जाइये और लक्ष्मण अङ्गदकी पीठपर सवार हो लें; क्योंकि यह मकरालय समुद्र बहुत लंबा-चौड़ा है। ये दोनों वानर आकाश-मार्गसे चलनेवाले हैं। अतः ये ही दोनों आप दोनों भाइयोंको धारण कर सकेंगे'॥ ८१-८२ १/२ ॥

इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ उस सेनाके आगे-आगे चले॥

दूसरे वानर सेनाके बीचमें और अगल-बगलमें होकर चलने लगे। कितने ही वानर जलमें कूद पड़ते और तैरते हुए चलते थे। दूसरे पुलका मार्ग पकड़कर जाते थे और कितने ही आकाशमें