श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उस समय समस्त राक्षसोंका मन दुःखी हो गया। उन सबके मुखपर विषाद छा गया और वे सभी भयभीतचित्त होकर वहाँसे भाग चले॥ ३६ ॥
महोदरका शरीर किसी महान् पर्वतके एक टूटे हुए शिखर-सा जान पड़ता था। उसे पृथ्वीपर गिराकर सूर्यपुत्र सुग्रीव वहाँ विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित होने लगे, मानो प्रचण्ड सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हों॥
इस प्रकार वानरराज सुग्रीव युद्धके मुहानेपर विजय पाकर बड़ी शोभा पाने लगे। उस समय देवता, सिद्ध और यक्षोंके समुदाय तथा भूतलनिवासी प्राणियोंके समूह भी बड़े हर्षसे उनकी ओर देखने लगे॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९७ ॥
अठानबेवाँ सर्ग
अठानबेवाँ सर्ग
अंगदके द्वारा महापार्श्वका वध
सुग्रीवके द्वारा महोदरके मारे जानेपर उनकी ओर देखकर महाबली महापार्श्वके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये॥
उसने अपने बाणोंद्वारा अंगदकी भयंकर सेनामें हलचल मचा दी। वह राक्षस मुख्य-मुख्य वानरोंके मस्तक धड़से काट-काटकर गिराने लगा, मानो वायु वृन्त या डंठलसे फल गिरा रही हो॥ २ १/२ ॥
क्रोधसे भरे हुए महापार्श्वने अपने बाणोंसे कितनोंकी बाँहें काट दीं और कितने ही वानरोंकी पसलियाँ उड़ा दीं॥ ३ १/२ ॥
महापार्श्वकी बाणवर्षासे पीड़ित हो बहुत-से वानर युद्धसे विमुख हो गये। सबकी चेतना जाती रही॥ ४ १/२ ॥
उस राक्षससे पीड़ित वानर-सेनाको उद्विग्न हुई देख महान् वेगशाली अङ्गदने पूर्णिमाके दिन समुद्रकी भाँति अपना भारी वेग प्रकट किया॥ ५ १/२ ॥
उन वानरशिरोमणिने सूर्यकी किरणोंके समान दमकनेवाला एक लोहेका परिघ उठाकर महापार्श्वपर दे मारा॥ ६ १/२ ॥
उस प्रहारसे महापार्श्वकी सुध-बुध जाती रही और वह मूर्च्छित हो सारथिसहित रथसे नीचे जा पड़ा॥
इसी समय काले कोयलेके ढेरके समान कृष्ण वर्णवाले, महान् पराक्रमी और तेजस्वी ऋक्षराज जाम्बवान्ने मेघोंकी घटाके सदृश अपने यूथसे बाहर निकलकर कुपित हो एक पर्वत-शिखरके समान विशाल शिला हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस राक्षसके घोड़ोंको मार डाला तथा उसके रथको भी चूर्ण कर दिया॥
दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर महाबली महापार्श्वने बहुत-से बाणोंद्वारा पुनः अङ्गदको घायल कर दिया और जाम्बवान्की छातीमें भी तीन बाण मारे॥ १०-११ ॥
इतना ही नहीं, उसने रीछोंके राजा गवाक्षको भी बहुत-से बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत कर दिया। गवाक्ष और जाम्बवान्को बाणोंसे पीड़ित देख अङ्गदके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने भयंकर परिघ हाथमें ले लिया॥ १२ १/२ ॥
उनका वह परिघ सूर्यकी किरणोंके समान अपनी प्रभा बिखेर रहा था। वालिपुत्र अङ्गदके नेत्र क्रोधसे लाल हो उठे थे। उन्होंने उस लोहमय परिघको दोनों हाथोंसे पकड़कर घुमाया और दूर खड़े हुए महापार्श्वके वधके लिये वेगपूर्वक चला दिया॥ १३-१४ १/२ ॥
बलवान् वीर अङ्गदके चलाये हुए उस परिघने राक्षस महापार्श्वके हाथसे बाणसहित धनुष और मस्तकसे टोप गिरा दिये॥ १५ १/२ ॥
फिर प्रतापी वालिपुत्र अङ्गद बड़े वेगसे उसके पास जा पहुँचे और कुपित होकर उन्होंने उसके कुण्डलयुक्त कानके पास गालपर एक थप्पड़ मारा॥ १६ १/२ ॥
तब महान् वेगशाली महातेजस्वी महापार्श्वने कुपित होकर एक हाथमें बहुत बड़ा फरसा ले लिया॥ १७ १/२ ॥
उस फरसेको तेलमें डुबोकर साफ किया गया था और वह अच्छे लोहेका बना हुआ एवं सुदृढ़ था। राक्षस महापार्श्वने अत्यन्त कुपित हो वह फरसा वालिपुत्र अङ्गदपर दे मारा॥ १८ १/२ ॥
उसने अङ्गदके बायें कंधेपर बड़े वेगसे उस फरसेका प्रहार किया था, परंतु रोषसे भरे हुए अङ्गदने कतराकर अपनेको बचा लिया और उस फरसेको व्यर्थ कर दिया॥ १९ १/२ ॥
तत्पश्चात् अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए वीर अङ्गदने, जो अपने पिताके समान ही पराक्रमी थे, वज्रके समान मुट्ठी बाँधी॥ २० १/२ ॥
वे हृदयके मर्मस्थानसे परिचित थे; अतः उन्होंने उस राक्षसके स्तनोंके निकट छातीमें बड़े वेगसे मुक्का मारा, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान असह्य था॥
उनका वह घूसा लगते ही उस महासमरमें राक्षस महापार्श्वका हृदय फट गया और वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २२ १/२ ॥
उसके मरकर पृथ्वीपर गिर जानेके पश्चात् उसकी सेना विक्षुब्ध हो उठी तथा समरभूमिमें रावणको भी महान् क्रोध हुआ॥ २३ १/२ ॥
उस समय हर्षसे भरे हुए वानरोंका महान् सिंहनाद होने लगा। वह अट्टालिकाओं तथा गोपुरोंसहित लङ्कापुरीको फोड़ता हुआ-सा प्रतीत हुआ। अङ्गदसहित वानरोंका वह महानाद इन्द्रसहित देवताओंके गम्भीर घोष-सा जान पड़ता था॥ २४-२५ ॥
युद्धस्थलमें देवताओं और वानरोंकी वह बड़ी भारी गर्जना सुनकर इन्द्रद्रोही राक्षसराज रावण पुनः रोषपूर्वक युद्धके लिये उत्सुक हो वहाँ खड़ा हो गया॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ९८ ॥
न्यानबेवाँ सर्ग
न्यानबेवाँ सर्ग
श्रीराम और रावणका युद्ध
महाबली वीर विरूपाक्ष तो मारा ही गया था; महोदर और महापार्श्व भी कालके गालमें डाल दिये गये—यह देख उस महासमरके भीतर रावणके हृदयमें महान् क्रोधका आवेश हुआ। उसने सारथिको रथ आगे बढ़ानेकी आज्ञा दी और इस प्रकार कहा— ॥ १-२ ॥
‘सूत! मेरे मन्त्री मारे गये और लङ्कापुरीपर चारों ओरसे घेरा डाला गया। इसके लिये मुझे बड़ा दुःख है। आज राम और लक्ष्मणका वध करके ही मैं अपने इस दुःखको दूर करूँगा॥ ३ ॥
‘रणभूमिमें उस रामरूपी वृक्षको उखाड़ फेंकूँगा, जो सीतारूपी फूलके द्वारा फल देनेवाला है तथा सुग्रीव, जाम्बवान्, कुमुद, नल, द्विविद, मैन्द, अङ्गद, गन्धमादन, हनुमान् और सुषेण आदि समस्त वानर-यूथपति जिसकी शाखा-प्रशाखाएँ हैं’॥ ४-५ ॥
ऐसा कहकर महान् अतिरथी वीर रावण अपने रथकी घर्घर्राहटसे दसों दिशाओंको गुँजाता हुआ बड़ी तेजीके साथ श्रीरघुनाथजीकी ओर बढ़ा॥ ६ ॥
रथकी आवाजसे नदी, पर्वत और जंगलोंसहित वहाँकी सारी भूमि गूँज उठी, धरती डोलने लगी और वहाँके सारे पशु-पक्षी भयसे थर्रा उठे॥ ७ ॥
उस समय रावणने तामस* नामवाले अत्यन्त भयंकर महाघोर अस्त्रको प्रकट करके समस्त वानरोंको भस्म करना आरम्भ किया। सब ओर उनकी लाशें गिरने लगीं॥ ८ ॥
उनके पाँव उखड़ गये और वे इधर-उधर भागने लगे, इससे रणभूमिमें बहुत धूल उड़ने लगी। वह तामस-अस्त्र साक्षात् ब्रह्माजीका बनाया हुआ था, इसलिये वानर-योद्धा उसके वेगको सह न सके॥ ९ ॥
रावणके उत्तम बाणोंसे आहत हो वानरोंकी सैकड़ों सेनाएँ तितर-बितर हो गयी हैं—यह देख भगवान् श्रीराम युद्धके लिये उद्यत हो सुस्थिरभावसे खड़े हो गये॥ १० ॥
उधर वानर-सेनाको खदेड़कर राक्षससिंह रावणने देखा कि किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीराम अपने भाई लक्ष्मणके साथ उसी तरह खड़े हैं, जैसे इन्द्र अपने छोटे भाई भगवान् विष्णु (उपेन्द्र)-के साथ खड़े होते हैं॥ ११ १/२ ॥
वे अपने विशाल धनुषको उठाकर आकाशमें रेखा खींचते-से प्रतीत होते थे। उनके नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं और वे शत्रुओंका दमन करनेमें पूर्णतः समर्थ थे॥ १२ १/२ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणसहित खड़े हुए महातेजस्वी महाबली श्रीरामने रणभूमिमें वानरोंको भागते और रावणको आते देख मनमें बड़े हर्षका अनुभव किया और धनुषके मध्यभागको दृढ़ताके साथ पकड़ा॥ १३-१४ ॥
उन्होंने अपने महान् वेगशाली और महानाद प्रकट करनेवाले उत्तम धनुषको इस तरह खींचना और उसकी टङ्कार करना आरम्भ किया, मानो वे पृथ्वीको विदीर्ण कर डालेंगे॥ १५ ॥
रावणके बाण-समूहोंसे तथा श्रीरामचन्द्रजीके धनुषकी टङ्कारसे जो भयंकर शब्द प्रकट हुआ, उससे आतङ्कित होकर सैकड़ों राक्षस तत्काल धराशायी हो गये॥ १६ ॥
उन दोनों राजकुमारोंके बाणोंके मार्गमें आकर रावण चन्द्रमा और सूर्यके समीप स्थित हुए राहुकी भाँति शोभा पाने लगा॥ १७ ॥
लक्ष्मण अपने पैने बाणोंके द्वारा रावणके साथ पहले स्वयं ही युद्ध करना चाहते थे; इसलिये धनुष तानकर वे अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाण छोड़ने लगे॥ १८ ॥
धनुर्धर लक्ष्मणके धनुषसे छूटते ही उन बाणोंको महातेजस्वी रावणने अपने सायकोंद्वारा आकाशमें ही काट गिराया॥ १९ ॥
वह अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाता हुआ लक्ष्मणके एक बाणको एक बाणसे, तीन बाणोंको तीन बाणसे और दस बाणोंको उतने ही बाणोंसे काट देता था॥
समरविजयी रावण सुमित्राकुमारको लाँघकर रणभूमिमें दूसरे पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े हुए श्रीरामके पास जा पहुँचा॥ २१ ॥
श्रीरघुनाथजीके निकट जाकर क्रोधसे लाल आँखें किये राक्षसराज रावण उनके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा॥ २२ ॥
रावणके धनुषसे गिरती हुई उन बाण-धाराओंपर दृष्टिपात करके श्रीरामने बड़ी उतावलीके साथ शीघ्र ही कई भल्ल हाथमें लिये॥ २३ ॥
रघुकुलभूषण श्रीरामने रावणके विषधर सर्पोंके समान महाभयंकर एवं दीप्तिमान् बाणसमूहोंको उन तीखे भल्लोंसे काट डाला॥ २४ ॥
फिर श्रीरामने रावणको और रावणने श्रीरामको अपना लक्ष्य बनाया और दोनों ही शीघ्रतापूर्वक एक-दूसरेपर भाँति-भाँतिके पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे॥ २५॥
वे दोनों चिरकालतक वहाँ विचित्र दायें-बायें पैंतरेसे विचरते रहे। बाणके वेगसे एक-दूसरेको घायल करते हुए वे दोनों वीर पराजित नहीं होते थे॥ २६॥
एक साथ जूझते और सायकोंकी वर्षा करते हुए श्रीराम और रावण यमराज और अन्तकके समान भयंकर जान पड़ते थे। उनके युद्धसे सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे॥ २७॥
जैसे वर्षा-ऋतुमें विद्युत्-समूहोंसे व्याप्त मेघोंकी घटासे आकाश आच्छादित हो जाता है, उसी प्रकार उस समय नाना प्रकारके बाणोंसे वह ढक गया था॥ २८॥
गीधकी पाँखके सुन्दर परोंसे सुशोभित और तेज धारवाले महान् वेगशाली बाणोंकी अनवरत वर्षासे आकाश ऐसा जान पड़ता था, मानो उसमें बहुत-से झरोखे लग गये हों॥ २९॥
दो बड़े-बड़े मेघोंकी भाँति उठे हुए श्रीराम और रावणने सूर्यके अस्त और उदित होनेपर भी बाणोंके गहन अन्धकारसे आकाशको ढक रखा था॥ ३०॥
दोनों एक-दूसरेका वध करना चाहते थे; अतः वृत्रासुर और इन्द्रकी भाँति उन दोनोंमें ऐसा महान् युद्ध होने लगा, जो दुर्लभ तथा अचिन्त्य है॥ ३१॥
दोनों ही महान् धनुर्धर और दोनों ही युद्धकी कलामें निपुण थे। दोनों ही अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे; अतः दोनों बड़े ही उत्साहसे रणभूमिमें विचरने लगे॥ ३२॥
वे जिस-जिस मार्गसे जाते, उसी-उसीसे बाणोंकी लहर-सी उठने लगती थी। ठीक उसी तरह, जैसे वायुके थपेड़े खाकर दो समुद्रोंके जलमें उत्ताल तरंगें उठ रही हों॥ ३३॥
तदनन्तर जिसके हाथ बाण छोड़नेमें ही लगे हुए थे, समस्त लोकोंको रुलानेवाले उस रावणने श्रीरामचन्द्रजीके ललाटमें नाराचोंकी माला-सी पहना दी॥ ३४॥
भयंकर धनुषसे छूटी और नील कमलदलके समान श्याम कान्तिसे प्रकाशित होती हुई उस नाराच-मालाको श्रीरामचन्द्रजीने अपने सिरपर धारण किया; किंतु वे व्यथित नहीं हुए॥ ३५ ॥
तत्पश्चात् क्रोधसे भरे हुए श्रीरामने पुनः बहुत-से बाण लेकर मन्त्रजपपूर्वक रौद्रास्त्रका प्रयोग किया॥ ३६॥
फिर उन महातेजस्वी, महापराक्रमी और अविच्छिन्न-रूपसे बाणवर्षा करनेवाले श्रीरघुवीरने धनुषको कानतक खींचकर वे सभी बाण राक्षसराज रावणपर छोड़ दिये॥ ३७॥
वे बाण राक्षसराज रावणके महामेघके समान काले रंगके अभेद्य कवचपर गिरे थे; इसलिये उस समय उसे व्यथित न कर सके॥ ३८॥
सम्पूर्ण अस्त्रोंके संचालनमें कुशल भगवान् श्रीरामने पुनः रथपर बैठे हुए राक्षसराज रावणके ललाटमें उत्तम अस्त्रोंका प्रहार करके उसे घायल कर दिया॥ ३९॥
श्रीरामके वे उत्तम बाण रावणको घायल करके उसके निवारण करनेपर फुफकारते हुए पाँच सिरवाले सर्पोंके समान धरतीमें समा गये॥ ४०॥
श्रीरघुनाथजीके अस्त्रका निवारण करके क्रोधसे मूर्च्छित हुए रावणने आसुर नामक दूसरा महाभयंकर अस्त्र प्रकट किया॥ ४१॥
उससे सिंह, बाघ, कङ्क, चक्रवाक, गीध, बाज, सियार, भेड़िये, गदहे, सूअर, कुत्ते, मुर्गे, मगर और जहरीले साँपोंके समान मुखवाले बाणोंकी वृष्टि होने लगी। वे बाण मुँह फैलाये, जबड़े चाटते हुए पाँच मुखवाले भयंकर सर्पोंके समान जान पड़ते थे। फुफकारते हुए सर्पकी भाँति कुपित हुए महातेजस्वी रावणने इनका तथा अन्य प्रकारके तीखे बाणोंका भी श्रीरामके ऊपर प्रयोग किया॥ ४२—४५॥
उस आसुरास्त्रसे आवृत हुए अग्नितुल्य तेजस्वी महान् उत्साही रघुकुलतिलक श्रीरामने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया॥ ४६॥
उसके द्वारा उन्होंने अग्नि, सूर्य, चन्द्र, अर्धचन्द्र, धूमकेतु, ग्रह, नक्षत्र, उल्का तथा बिजलीकी प्रभाके समान प्रज्वलित मुखवाले नाना प्रकारके बाण प्रकट किये॥ ४७ १/२॥
श्रीरघुनाथजीके आग्नेयास्त्रसे आहत हो रावणके वे भयंकर बाण आकाशमें ही विलीन हो गये, तथापि उनके द्वारा सहस्रों वानर मारे गये थे॥ ४८ १/२॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने उस आसुरास्त्रको नष्ट कर दिया, यह देख इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि सभी वीर वानर श्रीरामको चारों ओरसे घेरकर हर्षनाद करने लगे॥ ४९-५०॥
दशरथनन्दन महात्मा श्रीराम रावणके हाथोंसे छूटे हुए उस आसुरास्त्रका बलपूर्वक विनाश करके बड़े प्रसन्न हुए और वानर-यूथपति आनन्दमग्न हो उच्च स्वरसे सिंहनाद करने लगे॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९९ ॥
* इस अस्त्रका देवता तमोग्रह राहु है, इसलिये इसको 'तामस' कहते हैं।
सौवाँ सर्ग
सौवाँ सर्ग
राम और रावणका युद्ध, रावणकी शक्तिसे लक्ष्मणका मूर्च्छित होना तथा रावणका युद्धसे भागना
अपने उस अस्त्रके नष्ट हो जानेपर महातेजस्वी राक्षसराज रावणने दूना क्रोध प्रकट किया। उसने क्रोधवश श्रीरामके ऊपर एक दूसरे भयंकर अस्त्रको छोड़नेका आयोजन किया, जिसे मयासुरने बनाया था॥ १-२ ॥
उस समय रावणके धनुषसे वज्रके समान दृढ़ और दमकते हुए शूल, गदा, मूसल, मुद्गर, कूटपाश तथा चमचमाती अशनि आदि भाँति-भाँतिके तीखे अस्त्र छूटने लगे, मानो प्रलयकालमें वायुके विविध रूप प्रकट हो रहे हों॥ ३-४ ॥
तब उत्तम अस्त्रके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी श्रीमान् रघुनाथजीने गान्धर्व नामक श्रेष्ठ अस्त्रके द्वारा रावणके उस अस्त्रको शान्त कर दिया॥ ५ ॥
महात्मा रघुनाथजीके द्वारा उस अस्त्रके प्रतिहत हो जानेपर रावणके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और उसने सूर्यास्त्रका प्रयोग किया॥ ६ ॥
फिर तो भयानक वेगशाली बुद्धिमान् राक्षस दशग्रीवके धनुषसे बड़े-बड़े तेजस्वी चक्र प्रकट होने लगे॥ ७ ॥
चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रहोंके समान आकारवाले वे दीप्तिमान् अस्त्र-शस्त्र सब ओर प्रकट होते और गिरते थे। उनसे आकाशमें प्रकाश छा गया और सम्पूर्ण दिशाएँ उद्भासित हो उठीं॥ ८ ॥
परंतु श्रीरामचन्द्रजीने अपने बाणसमूहोंद्वारा सेनाके मुहानेपर रावणके उन चक्रों और विचित्र आयुधोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ ९ ॥
उस अस्त्रको नष्ट हुआ देख राक्षसराज रावणने दस बाणोंद्वारा श्रीरामके सारे मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी॥ १० ॥
रावणके विशाल धनुषसे छूटे हुए उन दस बाणोंसे घायल होनेपर भी महातेजस्वी श्रीरघुनाथजी विचलित नहीं हुए॥ ११ ॥
तत्पश्चात् समरविजयी श्रीरघुवीरने अत्यन्त कुपित हो बहुत-से बाण मारकर रावणके सारे अङ्गोंमें घाव कर दिया॥ १२ ॥
इसी बीचमें शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबली रामानुज लक्ष्मणने कुपित हो सात सायक हाथमें लिये॥
उन महान् वेगशाली सायकोंद्वारा उन महातेजस्वी सुमित्राकुमारने रावणकी ध्वजाके, जिसमें मनुष्यकी खोपड़ीका चिह्न था, कई टुकड़े कर डाले॥ १४ ॥
इसके बाद महाबली श्रीमान् लक्ष्मणने एक बाणसे उस राक्षसके सारथिका जगमगाते हुए कुण्डलोंसे मण्डित मस्तक भी काट लिया॥ १५ ॥
इतना ही नहीं, लक्ष्मणने पाँच पैने बाण मारकर उस राक्षसराजके हाथीकी सूँड़के समान मोटे धनुषको भी काट डाला॥ १६ ॥
तदनन्तर विभीषणने उछलकर अपनी गदासे रावणके नील मेघके समान कान्तिवाले सुन्दर पर्वताकार घोड़ोंको भी मार गिराया॥ १७ ॥
घोड़ोंके मारे जानेपर रावण अपने विशाल रथसे वेगपूर्वक कूद पड़ा और अपने भाईपर उसे बड़ा क्रोध आया॥ १८ ॥
तब उस महान् शक्तिशाली प्रतापी राक्षसराजने विभीषणको मारनेके लिये एक वज्रके समान प्रज्वलित शक्ति चलायी॥ १९ ॥
वह शक्ति अभी विभीषणतक पहुँचने भी नहीं पायी थी कि लक्ष्मणने तीन बाण मारकर उसे बीचमें ही काट दिया। यह देख उस महासमरमें वानरोंका महान् हर्षनाद गूँज उठा॥ २० ॥
सोनेकी मालासे अलंकृत वह शक्ति तीन भागोंमें विभक्त होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी, मानो आकाशसे चिनगारियोंसहित बड़ी भारी उल्का टूटकर गिरी हो॥
तदनन्तर रावणने विभीषणको मारनेके लिये एक ऐसी विशाल शक्ति हाथमें ली, जो अपनी अमोघताके लिये विशेष विख्यात थी। काल भी उसके वेगको नहीं सह सकता था। वह शक्ति अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थी॥
दुरात्मा बलवान् रावणके द्वारा हाथमें ली हुई वह वेगशालिनी, महातेजस्विनी और वज्रके समान दीप्तिमती शक्ति अपने दिव्य तेजसे प्रज्वलित हो उठी॥ २३ ॥
इसी बीचमें विभीषणको प्राण-संशयकी अवस्थामें पड़ा देख वीर लक्ष्मणने तुरंत उनकी रक्षा की। उन्हें पीछे करके वे स्वयं शक्तिके सामने खड़े हो गये॥ २४ ॥
विभीषणको बचानेके लिये वीर लक्ष्मण अपने धनुषको खींचकर हाथमें शक्ति लिये खड़े हुए रावणपर बाणोंकी वर्षा करने लगे॥ २५ ॥
महात्मा लक्ष्मणके छोड़े हुए बाण-समूहोंका निशाना बनकर रावण अपने भाईको मारनेके पराक्रमसे विमुख हो गया। अब उसके मनमें प्रहार करनेकी इच्छा नहीं रह गयी॥ २६ ॥
लक्ष्मणने मेरे भाईको बचा लिया, यह देख रावण उनकी ओर मुँह करके खड़ा हो गया और इस प्रकार बोला— ॥ २७ ॥
‘अपने बलपर घमंड रखनेवाले लक्ष्मण! तुमने ऐसा प्रयास करके विभीषणको बचा लिया है, इसलिये अब उस राक्षसको छोड़कर मैं तुम्हारे ऊपर ही इस शक्तिका प्रहार करता हूँ॥ २८ ॥
‘यह शक्ति स्वभावसे ही शत्रुओंके खूनसे नहानेवाली है, यह मेरे हाथसे छूटते ही तुम्हारे हृदयको विदीर्ण करके प्राणोंको अपने साथ ले जायगी’॥ २९ ॥
ऐसा कहकर अत्यन्त कुपित हुए रावणने मयासुरकी मायासे निर्मित, आठ घण्टोंसे विभूषित तथा महाभयंकर शब्द करनेवाली, उस अमोघ एवं शत्रुघातिनी शक्तिको, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रही थी, लक्ष्मणको लक्ष्य करके चला दिया और बड़े जोरसे गर्जना की॥ ३०-३१ ॥
वज्र और अशनिके समान गड़गड़ाहट पैदा करनेवाली वह शक्ति युद्धके मुहानेपर भयानक वेगसे चलायी गयी और लक्ष्मणको वेगपूर्वक लगी॥ ३२ ॥
लक्ष्मणकी ओर आती हुई उस शक्तिको लक्ष्य करके भगवान् श्रीरामने कहा—‘लक्ष्मणका कल्याण हो, तेरा प्राणनाशविषयक उद्योग नष्ट हो; अतएव तू व्यर्थ हो जा’॥ ३३ ॥
वह शक्ति विषधर सर्पके समान भयंकर थी। रणभूमिमें कुपित हुए रावणने जब उसे छोड़ा, तब वह तुरंत ही निर्भय वीर लक्ष्मणकी छातीमें डूब गयी॥ ३४ ॥
नागराज वासुकिकी जिह्वाके समान देदीप्यमान वह महातेजस्विनी और महावेगवती शक्ति जब लक्ष्मणके विशाल वक्षःस्थलपर गिरी, तब रावणके वेगसे बहुत गहराईतक धँस गयी। उस शक्तिसे हृदय विदीर्ण हो जानेके कारण लक्ष्मण पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ३५-३६ ॥
महातेजस्वी रघुनाथजी पास ही खड़े थे। वे लक्ष्मणको इस अवस्थामें देखकर भ्रातृस्नेहके कारण मन-ही-मन विषादमें डूब गये॥ ३७ ॥
वे दो घड़ीतक चिन्तामें डूबे रहे। फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर प्रलयकालमें प्रज्वलित हुई अग्निके समान अत्यन्त रोषसे उद्दीप्त हो उठे॥ ३८ ॥
‘यह विषादका समय नहीं है’ ऐसा सोचकर श्रीरघुनाथजी रावणके वधका निश्चय करके महान् प्रयत्नके द्वारा सारी शक्ति लगाकर और लक्ष्मणकी ओर देखकर अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् श्रीरामने उस महासमरमें शक्तिसे विदीर्ण हुए लक्ष्मणकी ओर देखा। वे खूनसे लथपथ होकर पड़े थे और सर्पयुक्त पर्वतके समान जान पड़ते थे॥ ४० ॥
अत्यन्त बलवान् रावणकी चलायी हुई उस शक्तिको लक्ष्मणकी छातीसे निकालनेके लिये बहुत प्रयत्न करनेपर भी वे श्रेष्ठ वानरगण सफल न हो सके॥ ४१ ॥
क्योंकि वे वानर भी राक्षसशिरोमणि रावणके बाण-समूहोंसे बहुत पीड़ित थे। वह शक्ति सुमित्राकुमारके शरीरको विदीर्ण करके धरतीतक पहुँच गयी थी॥ ४२ ॥
तब महाबली रघुनाथजीने उस भयंकर शक्तिको अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर लक्ष्मणके शरीरसे निकाला और समराङ्गणमें कुपित हो उसे तोड़ डाला॥ ४३ ॥
श्रीरामचन्द्रजी जब लक्ष्मणके शरीरसे शक्ति निकाल रहे थे, उस समय महाबली रावण उनके सम्पूर्ण अङ्गोंपर मर्मभेदी बाणोंकी वर्षा करता रहा॥ ४४ ॥
परंतु उन बाणोंकी परवा न करके लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर भगवान् श्रीराम हनुमान् और महाकपि सुग्रीवसे बोले— ॥ ४५ ॥
‘कपिवरो! तुमलोग लक्ष्मणको इसी तरह सब ओरसे घेरकर खड़े रहो। अब मेरे लिये उस पराक्रमका अवसर आया है, जो मुझे चिरकालसे अभीष्ट था॥ ४६ ॥
‘इस पापात्मा एवं पापपूर्ण विचार रखनेवाले दशमुख रावणको अब मार डाला जाय, यही उचित है। जैसे पपीहेको ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें मेघके दर्शनकी इच्छा रहती है, उसी प्रकार मैं भी इसका वध करनेके लिये चिरकालसे इसे देखना चाहता हूँ॥ ४७ ॥
‘वानरो! मैं इस मुहूर्तमें तुम्हारे सामने यह सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि कुछ ही देरमें यह संसार रावणसे रहित दिखायी देगा या रामसे॥ ४८ ॥
‘मेरे राज्यका नाश, वनका निवास, दण्डकारण्यकी दौड़-धूप, विदेहकुमारी सीताका राक्षसद्वारा अपहरण तथा राक्षसोंके साथ संग्राम—इन सबके कारण मुझे महाघोर दुःख सहना पड़ा है और नरकके समान कष्ट उठाना पड़ा है; किंतु रणभूमिमें रावणका वध करके आज मैं सारे दुःखोंसे छुटकारा पा जाऊँगा॥ ४९-५० ॥
‘जिसके लिये मैं वानरोंकी यह विशाल सेना साथ लाया हूँ, जिसके कारण मैंने युद्धमें वालीका वध करके सुग्रीवको राज्यपर बिठाया है तथा जिसके उद्देश्यसे समुद्रपर पुल बाँधा और उसे पार किया, वह पापी रावण आज युद्धमें मेरी आँखोंके सामने उपस्थित है। मेरे दृष्टिपथमें आकर अब यह जीवित रहने योग्य नहीं है॥ ५१-५२ ॥
‘दृष्टिमात्रसे संहारकारी विषका प्रसार करनेवाले सर्पकी आँखोंके सामने आकर जैसे कोई मनुष्य जीवित नहीं बच सकता अथवा जैसे विनतानन्दन गरुड़की दृष्टिमें पड़कर कोई महान् सर्प जीवित नहीं बच सकता, उसी प्रकार आज रावण मेरे सामने आकर जीवित या सकुशल नहीं लौट सकता॥ ५३ ॥
‘दुर्धर्ष वानरशिरोमणियो! अब तुमलोग पर्वतके शिखरोंपर बैठकर मेरे और रावणके इस युद्धको सुखपूर्वक देखो॥ ५४ ॥
‘आज संग्राममें देवता, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि और चारणोंसहित तीनों लोकोंके प्राणी रामका रामत्व देखें॥
‘आज मैं वह पराक्रम प्रकट करूँगा, जिसकी जबतक यह पृथ्वी कायम रहेगी, तबतक चराचर जगत्के जीव और देवता भी सदा लोकमें एकत्र होकर चर्चा करेंगे और जिस प्रकार युद्ध हुआ है, उसे एक-दूसरेसे कहेंगे’॥ ५६ ॥
ऐसा कहकर भगवान् श्रीराम सावधान हो अपने सुवर्णभूषित तीखे बाणोंसे रणभूमिमें दशानन रावणको घायल करने लगे॥ ५७ ॥
इसी प्रकार जैसे मेघ जलकी धारा गिराता है, उसी तरह रावण भी श्रीरामपर चमकीले नाराचों और मूसलोंकी वर्षा करने लगा॥ ५८ ॥
एक-दूसरेपर चोट करते हुए राम और रावणके छोड़े हुए श्रेष्ठ बाणोंके परस्पर टकरानेसे बड़ा भयंकर शब्द प्रकट होता था॥ ५९ ॥
श्रीराम और रावणके बाण परस्पर छिन्न-भिन्न होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। उस समय उनके अग्रभाग बड़े उद्दीप्त दिखायी देते थे॥ ६० ॥
राम और रावणके धनुषकी प्रत्यञ्चासे प्रकट हुई महान् टंकारध्वनि समस्त प्राणियोंके मनमें त्रास उत्पन्न कर देती थी और बड़ी अद्भुत प्रतीत होती थी॥ ६१ ॥
जैसे वायुके थपेड़े खाकर मेघ छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार दीप्तिमान् धनुष धारण करनेवाले महात्मा श्रीरामके बाण-समूहोंकी वर्षासे आहत एवं पीड़ित हुआ रावण भयके मारे वहाँसे भाग गया॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
१०० ॥
एक सौ एकवाँ सर्ग
एक सौ एकवाँ सर्ग
श्रीरामका विलाप तथा हनुमान्जीकी लायी हुई ओषधिके सुषेणद्वारा किये गये प्रयोगसे लक्ष्मणका सचेत हो उठना
महाबली रावणने शूरवीर लक्ष्मणको अपनी शक्तिसे युद्धमें धराशायी कर दिया था। वे रक्तके प्रवाहसे नहा उठे थे। यह देख भगवान् श्रीरामने दुरात्मा रावणके साथ घोर युद्ध करके बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए ही सुषेणसे इस प्रकार कहा— ॥ १-२ ॥
‘ये वीर लक्ष्मण रावणके पराक्रमसे घायल होकर पृथ्वीपर पड़े हैं और चोट खाये हुए सर्पकी भाँति छटपटा रहे हैं। इस अवस्थामें इन्हें देखकर मेरा शोक बढ़ता जा रहा है॥ ३ ॥
‘ये वीर सुमित्राकुमार मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं, इन्हें लहूलुहान देखकर मेरा मन व्याकुल हो रहा है, ऐसी दशामें मुझमें युद्ध करनेकी शक्ति क्या होगी?॥
‘ये मेरे शुभलक्षण भाई, जो सदा युद्धका हौसला रखते थे, यदि मर गये तो मुझे इन प्राणोंके रखने और सुख भोगनेसे क्या प्रयोजन है?॥ ५ ॥
‘इस समय मेरा पराक्रम लज्जित-सा हो रहा है, हाथसे धनुष खिसकता-सा जा रहा है, मेरे सायक शिथिल हो रहे हैं और नेत्रोंमें आँसू भर आये हैं॥ ६ ॥
‘जैसे स्वप्नमें मनुष्योंके शरीर शिथिल हो जाते हैं, वही दशा मेरे इन अङ्गोंकी है। मेरी तीव्र चिन्ता बढ़ती जा रही है और दुरात्मा रावणके द्वारा घायल होकर मार्मिक आघातसे अत्यन्त पीड़ित एवं दुःखातुर हुए भाई लक्ष्मणको कराहते देख मुझे मर जानेकी इच्छा हो रही है’॥ ७-८ ॥
श्रीरघुनाथजी बाहर विचरनेवाले प्राणोंके समान प्रिय भाई लक्ष्मणको इस अवस्थामें देख महान् दुःखसे व्याकुल हो गये, चिन्ता और शोकमें डूब गये॥ ९ ॥
उनके मनमें बड़ा विषाद हुआ। इन्द्रियोंमें व्याकुलता छा गयी और वे रणभूमिकी धूलमें घायल होकर पड़े हुए भाई लक्ष्मणकी ओर देखकर विलाप करने लगे— ॥ १० ॥
‘शूरवीर! अब संग्राममें विजय भी मिल जाय तो मुझे प्रसन्नता नहीं होगी। अन्धेके सामने चन्द्रमा अपनी चाँदनी बिखेर दें तो भी वे उसके मनमें कौन-सा आह्लाद पैदा कर सकेंगे?॥ ११ ॥
‘अब इस युद्धसे अथवा प्राणोंकी रक्षासे मुझे क्या प्रयोजन है? अब लड़ने-भिड़नेकी कोई आवश्यकता नहीं है। जब संग्रामके मुहानेपर मारे जाकर लक्ष्मण ही सदाके लिये सो गये, तब युद्ध जीतनेसे क्या लाभ है?॥
‘वनमें आते समय जैसे महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी तरह यमलोकमें जाते समय मैं भी इनके पीछे-पीछे जाऊँगा॥ १३ ॥
‘हाय! जो सदा मुझमें अनुराग रखनेवाले मेरे प्रिय बन्धुजन थे, छलसे युद्ध करनेवाले निशाचरोंने आज उनकी यह दशा कर दी॥ १४ ॥
‘प्रत्येक देशमें स्त्रियाँ मिल सकती हैं, देश-देशमें जाति-भाई उपलब्ध हो सकते हैं; परंतु ऐसा कोई देश मुझे नहीं दिखायी देता, जहाँ सहोदर भाई मिल सके॥
‘दुर्धर्ष वीर लक्ष्मणके बिना मैं राज्य लेकर क्या करूँगा? पुत्रवत्सला माता सुमित्रासे किस तरह बात कर सकूँगा?॥ १६ ॥
‘माता सुमित्राके दिये हुए उलाहनेको कैसे सह सकूँगा? माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा?॥
‘भरत और महाबली शत्रुघ्न जब पूछेंगे कि आप लक्ष्मणके साथ वनमें गये थे, फिर उनके बिना ही कैसे लौट आये तो उन्हें मैं क्या उत्तर दूँगा?॥ १८ ॥
‘अतः मेरे लिये यहीं मर जाना अच्छा है। भाई-बन्धुओंमें जाकर उनकी कही हुई खोटी-खरी बातें सुनना अच्छा नहीं। मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा अपराध किया था, जिसके कारण मेरे सामने खड़ा हुआ मेरा धर्मात्मा भाई मारा गया॥ १९ १/२ ॥
‘हा भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! हा प्रभावशाली शूरप्रवर! तुम मुझे छोड़कर अकेले क्यों परलोकमें जा रहे हो?॥ २० १/२ ॥
‘भैया! मैं तुम्हारे बिना रो रहा हूँ। तुम मुझसे बोलते क्यों नहीं हो? प्रिय बन्धु! उठो। आँख खोलकर देखो। क्यों सो रहे हो? मैं बहुत दुःखी हूँ। मुझपर दृष्टिपात करो॥ २१ १/२ ॥
‘महाबाहो! पर्वतों और वनोंमें जब मैं शोकसे पीड़ित हो प्रमत्त एवं विषादग्रस्त हो जाता था, तब तुम्हीं मुझे धैर्य बँधाते थे (फिर इस समय मुझे क्यों नहीं सान्त्वना देते हो?)’॥ २२ १/२ ॥
इस तरह विलाप करते हुए भगवान् श्रीरामकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठी थीं। उस समय सुषेणने उन्हें आश्वासन देते हुए यह उत्तम बात कही— ॥
‘पुरुषसिंह! व्याकुलता उत्पन्न करनेवाली इस चिन्तायुक्त बुद्धिका परित्याग कीजिये; क्योंकि युद्धके मुहानेपर की हुई चिन्ता बाणोंके समान होती है और केवल शोकको जन्म देती है॥ २४ १/२ ॥
‘आपके भाई शोभावर्द्धक लक्ष्मण मरे नहीं हैं। देखिये, इनके मुखकी आकृति अभी बिगड़ी नहीं है और न इनके चेहरेपर कालापन ही आया है। इनका मुख प्रसन्न एवं कान्तिमान् दिखायी दे रहा है॥ २५-२६ ॥
‘इनके हाथोंकी हथेलियाँ कमल-जैसी कोमल हैं, आँखें भी बहुत साफ हैं। प्रजानाथ! मरे हुए प्राणियोंका ऐसा रूप नहीं देखा जाता है॥ २७ ॥
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! आप विषाद न करें। इनके शरीरमें प्राण हैं। वीर! ये सो गये हैं। इनका शरीर शिथिल होकर भूतलपर पड़ा है। साँस चल रही है और हृदय बारम्बार कम्पित हो रहा है—उसकी गति बंद नहीं हुई है। यह लक्षण इनके जीवित होनेकी सूचना दे रहा है’॥ २८ १/२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् सुषेणने पास ही खड़े हुए महाकपि हनुमान्जीसे कहा— ॥ २९ १/२ ॥
‘सौम्य! तुम शीघ्र ही यहाँसे महोदय पर्वतपर, जिसका पता जाम्बवान् तुम्हें पहले बता चुके हैं, जाओ और उसके दक्षिण शिखरपर उगी हुई विशल्यकरणी^१, सावर्ण्यकरणी^२, संजीवकरणी^३ तथा संधानी^४ नामसे प्रसिद्ध महौषधियोंको यहाँ ले आओ। वीर! उन्हींसे वीरवर लक्ष्मणके जीवनकी रक्षा होगी’॥ ३०—३२ १/२ ॥
उनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जी ओषधिपर्वत (महोदयगिरि)-पर गये; परंतु उन महौषधियोंको न पहचाननेके कारण वे चिन्तामें पड़ गये॥ ३३ ॥
इसी समय अमित तेजस्वी हनुमान्जीके हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘मैं पर्वतके इस शिखरको ही ले चलूँ’॥ ३४ ॥
‘इसी शिखरपर वह सुखदायिनी ओषधि उत्पन्न होती होगी, ऐसा मुझे अनुमानतः ज्ञात होता है; क्योंकि सुषेणने ऐसा ही कहा था॥ ३५ ॥
‘यदि विशल्यकरणीको लिये बिना ही लौट जाऊँ तो अधिक समय बीतनेसे दोषकी सम्भावना है और उससे बड़ी भारी घबराहट हो सकती है’॥ ३६॥
ऐसा सोचकर महाबली हनुमान् तुरंत उस श्रेष्ठ पर्वतके पास जा पहुँचे और उसके शिखरको तीन बार हिलाकर उसे उखाड़ लिया। उसके ऊपर नाना प्रकारके वृक्ष खिले हुए थे। वानरश्रेष्ठ महाबली हनुमान्ने उसे दोनों हाथोंपर उठाकर तौला॥ ३७-३८॥
जलसे भरे हुए नीले मेघके समान उस पर्वतशिखरको लेकर हनुमान्जी ऊपरको उछले॥ ३९॥
उनका वेग महान् था। उस शिखरको सुषेणके पास पहुँचाकर उन्होंने पृथ्वीपर रख दिया और थोड़ी देर विश्राम करके हनुमान्जीने सुषेणसे इस प्रकार कहा—॥
‘कपिश्रेष्ठ! मैं उन ओषधियोंको पहचानता नहीं हूँ। इसलिये उस पर्वतका सारा शिखर ही लेता आया हूँ’॥ ४१॥
ऐसा कहते हुए हनुमान्जीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके वानरश्रेष्ठ सुषेणने उन ओषधियोंको उखाड़ लिया॥ ४२॥
हनुमान्जीका वह कर्म देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर था। उसे देखकर समस्त वानर-यूथपति बड़े विस्मित हुए॥ ४३॥
महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ सुषेणने उस ओषधिको कूट-पीसकर लक्ष्मणजीकी नाकमें दे दिया॥ ४४॥
शत्रुका संहार करनेवाले लक्ष्मणके सारे शरीरमें बाण धँसे हुए थे। उस अवस्थामें उस ओषधिको सूँघते ही उनके शरीरसे बाण निकल गये और वे नीरोग हो शीघ्र ही भूतलसे उठकर खड़े हो गये॥ ४५॥
लक्ष्मणको भूतलसे उठकर खड़ा हुआ देख वे वानर अत्यन्त प्रसन्न हो ‘साधु-साधु’ कहकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ४६॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— ‘आओ-आओ’ ऐसा कहकर उन्होंने उन्हें दोनों भुजाओंमें भर लिया और गाढ़ आलिङ्गन करके हृदयसे लगा लिया। उस समय उनके नेत्रोंमें आँसू छलक रहे थे॥ ४७॥
सुमित्राकुमारको हृदयसे लगाकर श्रीरघुनाथजीने कहा— 'वीर! बड़े सौभाग्यकी बात है कि मैं तुम्हें मृत्युके मुखसे पुनः लौटा हुआ देखता हूँ॥ ४८ ॥
'तुम्हारे बिना मुझे जीवनकी रक्षासे, सीतासे अथवा विजयसे भी कोई मतलब नहीं है। जब तुम्हीं नहीं रहोगे, तब मैं इस जीवनको रखकर क्या करूँगा?'॥ ४९॥
महात्मा रघुनाथजीके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण खिन्न हो शिथिल वाणीमें धीरे-धीरे बोले—॥ ५०॥
'आर्य! आप सत्यपराक्रमी हैं। आपने पहले रावणका वध करके विभीषणको लङ्काका राज्य देनेकी प्रतिज्ञा की थी। वैसी प्रतिज्ञा करके अब किसी ओछे और निर्बल मनुष्यकी भाँति आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये॥ ५१॥
'सत्यवादी पुरुष झूठी प्रतिज्ञा नहीं करते हैं। प्रतिज्ञाका पालन ही बड़प्पनका लक्षण है। निष्पाप रघुवीर! मेरे लिये आपको इतना निराश नहीं होना चाहिये। आज रावणका वध करके आप अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिये॥
'आपके बाणोंका लक्ष्य बनकर शत्रु जीवित नहीं लौट सकता। ठीक उसी तरह, जैसे गरजते हुए तीखी दाढ़वाले सिंहके सामने आकर महान् गजराज जीवित नहीं रह सकता॥ ५४ ॥
'ये सूर्यदेव अपने दिनभरका भ्रमणकार्य पूरा करके अस्ताचलको नहीं चले जाते, तबतक ही जितना शीघ्र सम्भव हो सके, मैं उस दुरात्मा रावणका वध देखना चाहता हूँ॥ ५५ ॥
'आर्य! वीरवर! यदि आप युद्धमें रावणका वध करना चाहते हैं, यदि आपके मनमें अपनी प्रतिज्ञाके पूरी करनेकी इच्छा है तथा आप राजकुमारी सीताको पानेकी अभिलाषा रखते हैं तो आज शीघ्र ही रावणको मारकर मेरी प्रार्थना सफल करें'॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०१ ॥
१. शरीरमें धँसे हुए बाण आदिको निकालकर घाव भरने और पीड़ा दूर करनेवाली।
२. शरीरमें पहलेकी-सी रंगत लानेवाली।
३. मूर्च्छा दूर कर चेतना प्रदान करनेवाली।
४. टूटी हुई हड्डियोंको जोड़नेवाली। ९७३