श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
‘देवताओ और महर्षियो! तुम इसी उद्योगको सामने रखकर तत्काल भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ। वे प्रभु अवश्य उनका नाश करेंगे’॥ ११ ॥
यह सुनकर सब देवता जय-जयकारके द्वारा महेश्वरका अभिनन्दन करके उन निशाचरोंके भयसे पीड़ित हो भगवान् विष्णुके समीप आये॥ १२ ॥
शङ्ख, चक्र धारण करनेवाले उन नारायणदेवको नमस्कार करके देवताओंने उनके प्रति बहुत अधिक सम्मानका भाव प्रकट किया और सुकेशके पुत्रोंके विषयमें बड़ी घबराहटके साथ इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥
‘देव! सुकेशके तीन पुत्र त्रिविध अग्नियोंके तुल्य तेजस्वी हैं। उन्होंने वरदानके बलसे आक्रमण करके हमारे स्थान छीन लिये हैं॥ १४ ॥
त्रिकूटपर्वतके शिखरपर जो लङ्का नामवाली दुर्गम नगरी है, वहीं रहकर वे निशाचर हम सभी देवताओंको क्लेश पहुँचाते रहते हैं॥ १५ ॥
‘मधुसूदन! आप हमारा हित करनेके लिये उन असुरोंका वध करें। देवेश्वर! हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हमारे आश्रयदाता हों॥ १६ ॥
‘अपने चक्रसे उनका कमलोपम मस्तक काटकर आप यमराजको भेंट कर दीजिये। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो इस भयके अवसरपर हमें अभय दान दे सके॥ १७ ॥
‘देव! वे राक्षस मदसे मतवाले हो रहे हैं। हमें कष्ट देकर हर्षसे फूले नहीं समाते हैं; अतः आप समराङ्गणमें सगे-सम्बन्धियोंसहित उनका वध करके हमारे भयको उसी तरह दूर कर दीजिये, जैसे सूर्यदेव कुहरेको नष्ट कर देते हैं’॥ १८ ॥
देवताओंके ऐसा कहनेपर शत्रुओंको भय देनेवाले देवाधिदेव भगवान् जनार्दन उन्हें अभय दान देकर बोले— ॥ १९ ॥
‘देवताओ! मैं सुकेश नामक राक्षसको जानता हूँ। वह भगवान् शंकरका वर पाकर अभिमानसे उन्मत्त हो उठा है। इसके उन पुत्रोंको भी जानता हूँ, जिनमें माल्यवान् सबसे बड़ा है। वे नीच राक्षस धर्मकी मर्यादाका उल्लङ्घन कर रहे हैं, अतः मैं क्रोधपूर्वक उनका विनाश करूँगा। तुमलोग निश्चिन्त हो जाओ’॥ २०-२१ ॥
सब कुछ करनेमें समर्थ भगवान् विष्णुके इस प्रकार आश्वासन देनेपर देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ। वे उन जनार्दनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानको चले गये॥ २२ ॥
देवताओंके इस उद्योगका समाचार सुनकर निशाचर माल्यवान्ने अपने दोनों वीर भाइयोंसे इस प्रकार कहा—॥ २३ ॥
‘सुननेमें आया है कि देवता और ऋषि मिलकर हमलोगोंका वध करना चाहते हैं। इसके लिये उन्होंने भगवान् शंकरके पास जाकर यह बात कही॥ २४ ॥
‘देव! सुकेशके पुत्र आपके वरदानके बलसे उद्दण्ड और अभिमानसे उन्मत्त हो उठे हैं। वे भयंकर राक्षस पग-पगपर हमलोगोंको सता रहे हैं॥ २५ ॥
‘प्रजानाथ! राक्षसोंसे पराजित होकर हम उन दुष्टोंके भयसे अपने घरोंमें नहीं रहने पाते हैं॥ २६ ॥
‘त्रिलोचन! आप हमारे हितके लिये उन असुरोंका वध कीजिये। दाहकोंमें श्रेष्ठ रुद्रदेव! आप अपने हुंकारसे ही राक्षसोंको जलाकर भस्म कर दीजिये’॥ २७ ॥
‘देवताओंके ऐसा कहनेपर अन्धकशन्रु भगवान् शिवने अस्वीकृति सूचित करनेके लिये अपने सिर और हाथको हिलाते हुए इस प्रकार कहा—॥ २८ ॥
‘देवताओ! सुकेशके पुत्र रणभूमिमें मेरे हाथसे मारे जानेयोग्य नहीं हैं, परंतु मैं तुम्हें ऐसे पुरुषके पास जानेकी सलाह दूँगा, जो निश्चय ही उन सबका वध कर डालेंगे॥
‘जिनके हाथमें चक्र और गदा सुशोभित हैं, जो पीताम्बर धारण करते हैं, जिन्हें जनार्दन और हरि कहते हैं तथा जो श्रीमान् नारायणके नामसे विख्यात हैं, उन्हीं भगवान्की शरणमें तुम सब लोग जाओ’॥ ३० ॥
भगवान् शङ्करसे यह सलाह पाकर उन कामदाहक महादेवजीको प्रणाम करके देवता नारायणके धाममें जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने उनसे सब बातें बतायीं॥ ३१ ॥
तब उन नारायणदेवने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—‘देवगण! मैं उन देवद्रोहियोंका नाश कर डालूँगा, अतः तुमलोग निर्भय हो जाओ’॥ ३२ ॥
‘राक्षसशिरोमणियो! इस प्रकार भयभीत देवताओंके समक्ष श्रीहरिने हमें मारनेकी प्रतिज्ञा की है; अतः अब इस विषयमें हमलोगोंके लिये जो उचित कर्तव्य हो, उसका विचार करना चाहिये॥ ३३ ॥
‘हिरण्यकशिपु तथा अन्य देवद्रोही दैत्योंकी मृत्यु इन्हीं विष्णुके हाथसे हुई है। नमुचि, कालनेमि, वीरशिरोमणि संह्राद, नाना प्रकारकी माया जाननेवाला राधेय, धर्मनिष्ठ लोकपाल,
यमलार्जुन, हार्दिक्य, शुम्भ और निशुम्भ आदि महाबली शक्तिशाली समस्त असुर और दानव समरभूमिमें भगवान् विष्णुका सामना करके पराजित न हुए हों, ऐसा नहीं सुना जाता॥ ३४—३६ ॥
‘उन सभी असुरोंने सैकड़ों यज्ञ किये थे। वे सब-के-सब माया जानते थे। सभी सम्पूर्ण अस्त्रोंमें कुशल तथा शत्रुओंके लिये भयंकर थे॥ ३७ ॥
‘ऐसे सैकड़ों और हजारों असुरोंको नारायणदेवने मौतके घाट उतार दिया है। इस बातको जानकर हम सबके लिये जो उचित कर्तव्य हो, वही करना चाहिये। जो नारायणदेव हमारा वध करना चाहते हैं, उन्हें जीतना अत्यन्त दुष्कर कार्य है’॥ ३८ ॥
माल्यवान्की यह बात सुनकर सुमाली और माली अपने उस बड़े भाईसे उसी प्रकार बोले, जैसे दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्रसे वार्तालाप कर रहे हों॥
वे बोले—राक्षसराज! हमलोगोंने स्वाध्याय, दान और यज्ञ किये हैं। ऐश्वर्यकी रक्षा तथा उसका उपभोग भी किया है। हमें रोग-व्याधिसे रहित आयु प्राप्त हुई है और हमने कर्तव्य-मार्गमें उत्तम धर्मकी स्थापना की है॥
‘यही नहीं, हमने अपने शस्त्रोंके बलसे देवसेनारूपी अगाध समुद्रमें प्रवेश करके ऐसे-ऐसे शत्रुओंपर विजय पायी है, जो वीरतामें अपना सानी नहीं रखते थे; अतः हमें मृत्युसे कोई भय नहीं है॥ ४१ ॥
‘नारायण, रुद्र, इन्द्र तथा यमराज ही क्यों न हों, सभी सदा हमारे सामने खड़े होनेमें डरते हैं॥ ४२ ॥
‘राक्षसेश्वर! विष्णुके मनमें भी हमारे प्रति द्वेषका कोई कारण तो नहीं है। (क्योंकि हमने उनका कोई अपराध नहीं किया है) केवल देवताओंके चुगली खानेसे उनका मन हमारी ओरसे फिर गया है॥ ४३ ॥
‘इसलिये हम सब लोग एकत्र हो एक-दूसरेकी रक्षा करते हुए साथ-साथ चलें और आज ही देवताओंका वध कर डालनेकी चेष्टा करें, जिनके कारण यह उपद्रव खड़ा हुआ है’॥ ४४ ॥
ऐसा निश्चय करके उन सभी महाबली राक्षसपतियोंने युद्धके लिये अपने उद्योगकी घोषणा कर दी और समूची सेना साथ ले जम्भ एवं वृत्र आदिकी भाँति कुपित हो वे युद्धके लिये निकले॥ ४५ १/२ ॥
श्रीराम! पूर्वोक्त मन्त्रणा करके उन सभी महाबली विशालकाय राक्षसोंने पूरी तैयारी की और युद्धके लिये कूच कर दिया॥ ४६ १/२ ॥
अपने बलका घमण्ड रखनेवाले वे समस्त देवद्रोही राक्षस रथ, हाथी, हाथी-जैसे घोड़े, गदहे, बैल, ऊँट, शिशुमार, सर्प, मगर, कछुआ, मत्स्य, गरुड़-तुल्य पक्षी, सिंह, बाघ, सूअर, मृग और नीलगाय आदि वाहनोंपर सवार हो लङ्का छोड़कर युद्धके लिये देवलोककी ओर चल दिये॥ ४७—४९ १/२ ॥
लङ्कामें रहनेवाले जो प्राणी अथवा ग्रामदेवता आदि थे, वे सब अपशकुन आदिके द्वारा लङ्काके भावी विध्वंसको देखकर भयका अनुभव करते हुए मन-ही-मन खिन्न हो उठे॥ ५० १/२ ॥
उत्तम रथोंपर बैठे हुए सैकड़ों और हजारों राक्षस तुरंत ही प्रयत्नपूर्वक देवलोककी ओर बढ़ने लगे। उस नगरके देवता राक्षसोंके मार्गसे ही पुरी छोड़कर निकल गये॥ ५१-५२ ॥
उस समय कालकी प्रेरणासे पृथ्वी और आकाशमें अनेक भयंकर उत्पात प्रकट होने लगे, जो राक्षसोंके विनाशकी सूचना दे रहे थे॥ ५३ ॥
बादल गरम-गरम रक्त और हड्डियोंकी वर्षा करने लगे, समुद्र अपनी सीमाका उल्लङ्घन करके आगे बढ़ गये और पर्वत हिलने लगे॥ ५४ ॥
मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले प्राणी विकट अट्टहास करने लगे और भयंकर दिखायी देनेवाली गीदड़ियाँ कठोर आवाजमें चीत्कार करने लगीं॥ ५५ ॥
पृथ्वी आदि भूत क्रमशः गिरते—विलीन होते-से दिखायी देने लगे, गीधोंका विशाल समूह मुखसे आगकी ज्वाला उगलता हुआ राक्षसोंके ऊपर कालके समान मँडराने लगा॥ ५६ १/२ ॥
कबूतर, तोता और मैना लङ्का छोड़कर भाग चले। कौए वहीं काँव-काँव करने लगे। बिल्लियाँ भी वहीं गुर्राने लगीं तथा हाथी आदि पशु आर्तनाद करने लगे॥ ५७ १/२ ॥
राक्षस बलके घमण्डमें मतवाले हो रहे थे। वे कालके पाशमें बँध चुके थे। इसलिये उन उत्पातोंकी अवहेलना करके युद्धके लिये चलते ही गये, लौटे नहीं॥
माल्यवान्, सुमाली और महाबली माली—ये तीनों प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी शरीरसे समस्त राक्षसोंके आगे-आगे चल रहे थे॥ ५९ १/२ ॥
जैसे देवता ब्रह्माजीका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार उन सब निशाचरोंने माल्यवान् पर्वतके समान अविचल माल्यवान्का ही आश्रय ले रखा था॥ ६० १/२ ॥
राक्षसोंकी वह सेना महान् मेघोंकी गर्जनाके समान कोलाहल करती हुई विजय पानेकी इच्छासे देवलोककी ओर बढ़ती जा रही थी। उस समय वह सेनापति मालीके नियन्त्रणमें थी॥ ६१ १/२ ॥
देवताओंके दूतसे राक्षसोंके उस युद्धविषयक उद्योगकी बात सुनकर भगवान् नारायणने भी युद्ध करनेका विचार किया॥ ६२ १/२ ॥
वे सहस्रों सूर्योंके समान दीप्तिमान् दिव्य कवच धारण करके बाणोंसे भरा तरकस लिये गरुड़पर सवार हुए॥
इसके अतिरिक्त भी उन्होंने सायकोंसे पूर्ण दो चमचमाते हुए तूणीर बाँध रखे थे। उन कमलनयन श्रीहरिने अपनी कमरमें पट्टी बाँधकर उसमें चमकती हुई तलवार भी लटका ली थी॥ ६४ १/२ ॥
इस प्रकार शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और खड्ग आदि उत्तम आयुधोंको धारण किये सुन्दर पंखवाले पर्वताकार गरुड़पर आरूढ़ हो वे प्रभु उन राक्षसोंका संहार करनेके लिये तुरंत चल दिये॥ ६५-६६ ॥
गरुड़की पीठपर बैठे हुए वे पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि सुवर्णमय मेरुपर्वतके शिखरपर स्थित हुए विद्युत्सहित मेघके समान शोभा पा रहे थे॥ ६७ ॥
उस समय सिद्ध, देवर्षि, बड़े-बड़े नाग, गन्धर्व और यक्ष उनके गुण गा रहे थे। असुरोंकी सेनाके शत्रु वे श्रीहरि हाथोंमें शङ्ख, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष लिये सहसा वहाँ आ पहुँचे॥ ६८ ॥
गरुड़के पंखोंकी तीव्र वायुके झोंके खाकर वह सेना क्षुब्ध हो उठी। सैनिकोंके रथोंकी पताकाएँ चक्कर खाने लगीं और सबके हाथोंसे अस्त्र-शस्त्र गिर गये। इस प्रकार राक्षसराज माल्यवान्की समूची सेना काँपने लगी। उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो पर्वतका नील शिखर अपनी शिलाओंको बिखेरता हुआ हिल रहा हो॥ ६९ ॥
राक्षसोंके उत्तम अस्त्र-शस्त्र तीखे, रक्त और मांसमें सने हुए तथा प्रलयकालीन अग्निके समान दीप्तिमान् थे। उनके द्वारा वे सहस्रों निशाचर भगवान् लक्ष्मीपतिको चारों ओरसे घेरकर
उनपर चोट करने लगे॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छठाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६
॥
सातवाँ सर्ग
सातवाँ सर्ग
भगवान् विष्णुद्वारा राक्षसोंका संहार और पलायन
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) जैसे बादल जलकी वर्षासे किसी पर्वतको आप्लावित करते हैं, उसी प्रकार गर्जना करते हुए वे राक्षसरूपी मेघ अस्त्ररूपी जलकी वर्षासे नारायणरूपी पर्वतको पीड़ित करने लगे॥ १ ॥
भगवान् विष्णुका श्रीविग्रह उज्ज्वल श्यामवर्णसे सुशोभित था और अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए वे श्रेष्ठ निशाचर नीले रंगके दिखायी देते थे; इसलिये ऐसा जान पड़ता था, मानो अञ्जनगिरिको चारों ओरसे घेरकर मेघ उसपर जलकी धारा बरसा रहे हों॥ २ ॥
जैसे टिड्डीदल धान आदिके खेतोंमें, पतिंगे आगमें, डंक मारनेवाली मक्खियाँ मधुसे भरे हुए घड़ेमें और मगर समुद्रमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार राक्षसोंके धनुषसे छूटे हुए वज्र, वायु तथा मनके समान वेगवाले बाण भगवान् विष्णुके शरीरमें प्रवेश करके इस प्रकार लीन हो जाते थे, जैसे प्रलयकालमें समस्त लोक उन्हींमें प्रवेश कर जाते हैं॥ ३-४ ॥
रथपर बैठे हुए योद्धा रथोंसहित, हाथीसवार हाथियोंके साथ, घुड़सवार घोड़ोंसहित तथा पैदल पाँव-पयादे ही आकाशमें खड़े थे॥ ५ ॥
उन राक्षसराजोंके शरीर पर्वतके समान विशाल थे। उन्होंने सब ओरसे शक्ति, ऋष्टि, तोमर और बाणोंकी वर्षा करके भगवान् विष्णुका साँस लेना बंद कर दिया। ठीक उसी तरह, जैसे प्राणायाम द्विजके श्वासको रोक देते हैं॥ ६ ॥
जैसे मछली महासागरपर प्रहार करे, उसी तरह वे निशाचर अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा श्रीहरिपर चोट करते थे। उस समय दुर्जय देवता भगवान् विष्णुने अपने शार्ङ्गधनु षको खींचकर राक्षसोंपर बाण बरसाना आरम्भ किया॥ ७ ॥
वे बाण धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े गये थे; अतः वज्रके समान असह्य और मनके समान वेगवान् थे। उन पैने बाणोंद्वारा भगवान् विष्णुने सैकड़ों और हजारों निशाचरोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ ८ ॥
जैसे हवा उमड़ी हुई बदली एवं वर्षाको उड़ा देती है, उसी प्रकार अपनी बाणवर्षासे राक्षसोंको भगाकर पुरुषोत्तम श्रीहरिने अपने पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्खको बजाया॥ ९ ॥
सम्पूर्ण प्राणशक्तिसे श्रीहरिके द्वारा बजाया गया वह जल-जनित शङ्खराज भयंकर आवाजसे तीनों लोकोंको व्यथित करता हुआ-सा गूँजने लगा॥ १० ॥
जैसे वनमें दहाड़ता हुआ सिंह मतवाले हाथियोंको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार उस शङ्खराजकी ध्वनिने समस्त राक्षसोंको भय और घबराहटमें डाल दिया॥ ११ ॥
वह शङ्खध्वनि सुनकर शक्ति और साहससे हीन हुए घोड़े युद्धभूमिमें खड़े न रह सके, हाथियोंके मद उतर गये और वीर सैनिक रथोंसे नीचे गिर पड़े॥ १२ ॥
सुन्दर पंखवाले उन बाणोंके मुखभाग वज्रके समान कठोर थे। वे शार्ङ्गधनुषसे छूटकर राक्षसोंको विदीर्ण करते हुए पृथ्वीमें घुस जाते थे॥ १३ ॥
संग्रामभूमिमें भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए उन बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न हुए निशाचर वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति धराशायी होने लगे॥ १४ ॥
श्रीहरिके चक्रके आघातसे शत्रुओंके शरीरोंमें जो घाव हो गये थे, उनसे उसी तरह रक्तकी धारा बह रही थी, मानो पर्वतोंसे गेरुमिश्रित जलका झरना गिर रहा हो॥ १५ ॥
शङ्खराजकी ध्वनि, शार्ङ्गधनुषकी टंकार तथा भगवान् विष्णुकी गर्जना—इन सबके तुमुल नादने राक्षसोंके कोलाहलको दबा दिया॥ १६ ॥
भगवान्ने राक्षसोंके काँपते हुए मस्तकों, बाणों, ध्वजाओं, धनुषों, रथों, पताकाओं और तरकसोंको अपने बाणोंसे काट डाला॥ १७ ॥
जैसे सूर्यसे भयंकर किरणें, समुद्रसे जलके प्रवाह, पर्वतसे बड़े-बड़े सर्प और मेघसे जलकी धाराएँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार भगवान् नारायणके चलाये और शार्ङ्गधनुषसे छूटे हुए सैकड़ों और हजारों बाण तत्काल इधर-उधर दौड़ने लगे॥ १८-१९ ॥
जैसे शरभसे सिंह, सिंहसे हाथी, हाथीसे बाघ, बाघसे चीते, चीतेसे कुत्ते, कुत्तेसे बिलाव, बिलावसे साँप और साँपसे चूहे डरकर भागते हैं, उसी प्रकार वे सब राक्षस प्रभावशाली भगवान् विष्णुकी मार खाकर भागने लगे। उनके भगाये हुए बहुत-से राक्षस धराशायी हो गये॥ २०—२२ ॥
सहस्रों राक्षसोंका वध करके भगवान् मधुसूदनने अपने शङ्ख पाञ्चजन्यको उसी तरह गम्भीर ध्वनिसे पूर्ण किया, जैसे देवराज इन्द्र मेघको जलसे भर देते हैं॥
भगवान् नारायणके बाणोंसे भयभीत और शङ्खनादसे व्याकुल हुर्इ राक्षस-सेना लङ्काकी ओर भाग चली॥ २४ ॥
नारायणके सायकोंसे आहत हुर्इ राक्षससेना जब भागने लगी, तब सुमालीने रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करके उन श्रीहरिको आगे बढ़नेसे रोका॥ २५ ॥
जैसे कुहरा सूर्यदेवको ढक लेता है, उसी तरह सुमालीने बाणोंसे भगवान् विष्णुको आच्छादित कर दिया। यह देख शक्तिशाली राक्षसोंने पुनः धैर्य धारण किया॥ २६ ॥
उस बलाभिमानी निशाचरने बड़े जोरसे गर्जना करके राक्षसोंमें नूतन जीवनका संचार करते हुए-से रोषपूर्वक आक्रमण किया॥ २७ ॥
जैसे हाथी सूँड़को उठाकर हिलाता हो, उसी तरह लटकते हुए आभूषणसे युक्त हाथको ऊपर उठाकर हिलाता हुआ वह राक्षस विद्युतसहित सजल जलधरके समान बड़े हर्षसे गर्जना करने लगा॥ २८ ॥
तब भगवान्ने अपने बाणोंद्वारा गर्जते हुए सुमालीके सारथिका जगमगाते हुए कुण्डलोंसे मण्डित मस्तक काट डाला। इससे उस राक्षसके घोड़े बेलगाम होकर चारों ओर चक्कर काटने लगे॥ २९ ॥
उन घोड़ोंके चक्कर काटनेसे उनके साथ ही राक्षसराज सुमाली भी चक्कर काटने लगा। ठीक उसी तरह, जैसे अजितेन्द्रिय मनुष्य विषयोंमें भटकनेवाली इन्द्रियोंके साथ-साथ स्वयं भी भटकता फिरता है॥ ३० ॥
जब घोड़े रणभूमिमें सुमालीके रथको इधर-उधर लेकर भागने लगे, तब माली नामक राक्षसने युद्धके लिये उद्यत हो धनुष लेकर गरुड़की ओर धावा किया। राक्षसोंपर टूटते हुए महाबाहु विष्णुपर आक्रमण किया॥ ३१ १/२ ॥
मालीके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण भगवान् विष्णुके शरीरमें उसी तरह घुसने लगे, जैसे पक्षी क्रौञ्चपर्वतके छिद्रमें प्रवेश करते हैं॥ ३२ १/२ ॥
जैसे जितेन्द्रिय पुरुष मानसिक व्यथाओंसे विचलित नहीं होता, उसी प्रकार रणभूमिमें भगवान् विष्णु मालीके छोड़े हुए सहस्रों बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी क्षुब्ध नहीं हुए॥ ३३ १/२ ॥
तदनन्तर खड्ग और गदा धारण करनेवाले भूतभावन भगवान् विष्णुने अपने धनुषकी टङ्कार करके मालीके ऊपर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ ३४ १/२ ॥
वज्र और बिजलीके समान प्रकाशित होनेवाले वे बाण मालीके शरीरमें घुसकर उसका रक्त पीने लगे, मानो सर्प अमृतरसका पान कर रहे हों॥ ३५ १/२ ॥
अन्तमें मालीको पीठ दिखानेके लिये विवश करके शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिने उस राक्षसके मुकुट, ध्वज और धनुषको काटकर घोड़ोंको भी मार गिराया॥ ३६ १/२ ॥
रथहीन हो जानेपर राक्षसप्रवर माली गदा हाथमें लेकर कूद पड़ा, मानो कोर्इ सिंह पर्वतके शिखरसे छलाँग मारकर नीचे आ गया हो॥ ३७ १/२ ॥
जैसे यमराजने भगवान् शिवपर गदाका और इन्द्रने पर्वतपर वज्रका प्रहार किया हो, उसी तरह मालीने पक्षिराज गरुड़के ललाटमें अपनी गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी॥
मालीकी गदासे अत्यन्त आहत हुए गरुड़ वेदनासे व्याकुल हो उठे। उन्होंने स्वयं युद्धसे विमुख होकर भगवान् विष्णुको भी विमुख-सा कर दिया॥ ३९ १/२ ॥
मालीने गरुड़के साथ ही जब भगवान् विष्णुको भी युद्धसे विमुख-सा कर दिया, तब वहाँ जोर-जोरसे गर्जते हुए राक्षसोंका महान् शब्द गूँज उठा॥ ४० १/२ ॥
गर्जते हुए राक्षसोंका वह सिंहनाद सुनकर इन्द्रके छोटे भार्इ भगवान् विष्णु अत्यन्त कुपित हो पक्षिराजकी पीठपर तिरछे होकर बैठ गये। (इससे वह राक्षस उन्हें दीखने लगा) उस समय पराङ्मुख होनेपर भी श्रीहरिने मालीके वधकी इच्छासे पीछेकी ओर मुड़कर अपना सुदर्शनचक्र चलाया॥ ४१-४२ ॥
सूर्यमण्डलके समान उद्दीप्त होनेवाले कालचक्र-सदृश उस चक्रने अपनी प्रभासे आकाशको उद्भासित करते हुए वहाँ मालीके मस्तकको काट गिराया॥ ४३ ॥
चक्रसे कटा हुआ राक्षसराज मालीका वह भयंकर मस्तक पूर्वकालमें कटे हुए राहुके सिरकी भाँति रक्तकी धारा बहाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ४४ ॥
इससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुर्इ। वे ‘साधु भगवन्! साधु!’ ऐसा कहते हुए सारी शक्ति लगाकर जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे॥ ४५ ॥
मालीको मारा गया देख सुमाली और माल्यवान् दोनों राक्षस शोकसे व्याकुल हो सेनासहित लङ्काकी ओर ही भागे॥ ४६ ॥
इतनेहीमें गरुड़की पीड़ा कम हो गयी, वे पुनः सँभलकर लौटे और कुपित हो पूर्ववत् अपने पंखोंकी हवासे राक्षसोंको खदेड़ने लगे॥ ४७ ॥
कितने ही राक्षसोंके मुखकमल चक्रके प्रहारसे कट गये। गदाओंके आघातसे बहुतोंके वक्षःस्थल चूरचूर हो गये। हलके फालसे कितनोंके गर्दनें उतर गयीं। मूसलोंकी मारसे बहुतोंके मस्तकोंकी धज्जियाँ उड़ गयीं॥
तलवारका हाथ पड़नेसे कितने ही राक्षस टुकड़े-टुकड़े हो गये। बहुतेरे बाणोंसे पीड़ित हो तुरंत ही आकाशसे समुद्रके जलमें गिर पड़े॥ ४९ ॥
भगवान् विष्णु भी अपने धनुषसे छूटे हुए श्रेष्ठ बाणों और अशनियोंद्वारा राक्षसोंको विदीर्ण करने लगे। उस समय उन निशाचरोंके खुले हुए केश हवासे उड़ रहे थे और पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि विद्युन्माला-मण्डित महान् मेघके समान सुशोभित हो रहे थे॥ ५० ॥
राक्षसोंकी वह सारी सेना अत्यन्त उन्मत्त-सी प्रतीत होती थी। बाणोंसे उसके छत्र कट गये थे, अस्त्र-शस्त्र गिर गये थे, सौम्य वेष दूर हो गया था, आँतें बाहर निकल आयी थीं और सबके नेत्र भयसे चञ्चल हो रहे थे॥ ५१ ॥
जैसे सिंहोंद्वारा पीड़ित हुए हाथियोंके चीत्कार और वेग एक साथ ही प्रकट होते हैं, उसी प्रकार उन पुराणप्रसिद्ध नृसिंहवपुधारी श्रीहरिके द्वारा रौंदे गये उन निशाचररूपी गजराजोंके हाहाकार और वेग साथ-साथ प्रकट हो रहे थे॥ ५२ ॥
भगवान् विष्णुके बाणसमूहोंसे आवृत हो अपने सायकोंका परित्याग करके वे निशाचररूपी काले मेघ उसी प्रकार भागे जा रहे थे, जैसे हवाके उड़ाये हुए वर्षाकालीन मेघ आकाशमें भागते देखे जाते हैं॥ ५३ ॥
चक्रके प्रहारोंसे राक्षसोंके मस्तक कट गये थे, गदाओंकी मारसे उनके शरीर चूर-चूर हो रहे थे तथा तलवारोंके आघातसे उनके दो-दो टुकड़े हो गये थे। इस तरह वे राक्षसराज पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे थे॥ ५४ ॥
लटकते हुए मणिमय हारों और कुण्डलोंके साथ गिराये जाते हुए नील मेघ-सदृश उन निशाचरोंकी लाशोंसे वह रणभूमि पट गयी थी। वहाँ धराशायी हुए वे राक्षस नीलपर्वतोंके समान जान पड़ते थे। उनसे वहाँका भूभाग इस तरह आच्छादित हो गया था कि कहीं तिल रखनेकी भी जगह नहीं दिखायी देती थी॥ ५५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
७ ॥
आठवाँ सर्ग
आठवाँ सर्ग
माल्यवान्का युद्ध और पराजय तथा सुमाली आदि सब राक्षसोंका रसातलमें प्रवेश
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) पद्मनाभ भगवान् विष्णुने जब भागती हुई राक्षसोंकी सेनाको पीछेकी ओरसे मारना आरम्भ किया, तब माल्यवान् लौट पड़ा, मानो महासागर अपनी तटभूमितक जाकर निवृत्त हो गया हो॥
उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे और मुकुट हिल रहा था। उस निशाचरने पुरुषोत्तम भगवान् पद्मनाभसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
‘नारायणदेव! जान पड़ता है पुरातन क्षात्रधर्मको बिलकुल नहीं जानते हो, तभी तो साधारण मनुष्यकी भाँति तुम जिनका मन युद्धसे विरत हो गया है तथा जो डरकर भागे जा रहे हैं, ऐसे हम राक्षसोंको भी मार रहे हो॥ ३ ॥
‘सुरेश्वर! जो युद्धसे विमुख हुए सैनिकोंके वधका पाप करता है, वह घातक इस शरीरका त्याग करके परलोकमें जानेपर पुण्यकर्मा पुरुषोंको मिलनेवाले स्वर्गको नहीं पाता है॥ ४ ॥
‘शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवता! यदि तुम्हारे हृदयमें युद्धका हौसला है तो मैं खड़ा हूँ। देखता हूँ, तुममें कितना बल है? दिखाओ अपना पराक्रम’॥ ५ ॥
माल्यवान् पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हुए राक्षसराज माल्यवान्को देखकर देवराज इन्द्रके छोटे भाई महाबली भगवान् विष्णुने उससे कहा— ॥ ६ ॥
‘देवताओंको तुमलोगोंसे बड़ा भय उपस्थित हुआ है, मैंने राक्षसोंके संहारकी प्रतिज्ञा करके उन्हें अभय दान दिया है; अतः इस रूपमें मेरे द्वारा उस प्रतिज्ञाका ही पालन किया जा रहा है॥ ७ ॥
‘मुझे अपने प्राण देकर भी सदा ही देवताओंका प्रिय कार्य करना है; इसलिये तुमलोग भागकर रसातलमें चले जाओ तो भी मैं तुम्हारा वध किये बिना नहीं रहूँगा’॥ ८ ॥
लाल कमलके समान नेत्रवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अत्यन्त कुपित हुए राक्षसराज माल्यवान्ने अपनी शक्तिके द्वारा प्रहार करके भगवान् विष्णुका वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिया॥ ९ ॥
माल्यवान्के हाथसे छूटकर घंटानाद करती हुई वह शक्ति श्रीहरिकी छातीसे जा लगी और मेघके अङ्कमें प्रकाशित होनेवाली बिजलीके समान शोभा पाने लगी॥ १०॥
शक्तिधारी कार्तिकेय जिन्हें प्रिय हैं अथवा जो शक्तिधर स्कन्दके प्रियतम हैं, उन भगवान् कमलनयन विष्णुने उसी शक्तिको अपनी छातीसे खींचकर माल्यवान्पर दे मारा॥ ११ ॥
स्कन्दकी छोड़ी हुई शक्तिके समान गोविन्दके हाथसे निकली हुई वह शक्ति उस राक्षसको लक्ष्य करके चली, मानो अञ्जनगिरिपर कोई बड़ी भारी उल्का गिर रही हो॥ १२ ॥
हारोंके समूहसे प्रकाशित होनेवाले उस राक्षसराजके विशाल वक्षःस्थलपर वह शक्ति गिरी, मानो किसी पर्वतके शिखरपर वज्रपात हुआ हो॥ १३ ॥
उससे माल्यवान्का कवच कट गया तथा वह गहरी मूर्च्छामें डूब गया; किंतु थोड़ी ही देरमें पुनः सँभलकर माल्यवान् पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा हो गया॥
तत्पश्चात् उसने काले लोहेके बने हुए और बहुसंख्यक काँटोंसे जड़े हुए शूलको हाथमें लेकर भगवान्की छातीमें गहरा आघात किया॥ १५ ॥
इसी प्रकार वह युद्धप्रेमी राक्षस भगवान् विष्णुको मुक्केसे मारकर एक धनुष पीछे हट गया॥ १६ ॥
उस समय आकाशमें राक्षसोंका महान् हर्षनाद गूँज उठा—वे एक साथ बोल उठे—‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’। भगवान् विष्णुको घूँसा मारकर उस राक्षसने गरुड़पर भी प्रहार किया॥ १७ ॥
यह देख विनतानन्दन गरुड़ कुपित हो उठे और उन्होंने अपने पंखोंकी हवासे उस राक्षसको उसी तरह उड़ा दिया, जैसे प्रबल आँधी सूखे पत्तोंके ढेरको उड़ा देती है॥ १८ ॥
अपने बड़े भाईको पक्षिराजके पंखोंकी हवासे उड़ा हुआ देख सुमाली अपने सैनिकोंके साथ लङ्काकी ओर चल दिया॥ १९ ॥
गरुड़के पंखोंकी हवाके बलसे उड़ा हुआ राक्षस माल्यवान् भी लज्जित होकर अपनी सेनासे जा मिला और लङ्काकी ओर चला गया॥ २० ॥
कमलनयन श्रीराम! इस प्रकार उन राक्षसोंका भगवान् विष्णुके साथ अनेक बार युद्ध हुआ और प्रत्येक संग्राममें प्रधान-प्रधान नायकोंके मारे जानेपर उन सबको भागना पड़ा॥ २१ ॥
वे किसी प्रकार भगवान् विष्णुका सामना नहीं कर सके। सदा ही उनके बलसे पीड़ित होते रहे। अतः समस्त निशाचर लङ्का छोड़कर अपनी स्त्रियोंके साथ पातालमें रहनेके लिये चले गये॥ २२ ॥
रघुश्रेष्ठ! वे विख्यात पराक्रमी निशाचर सालकटङ्कटवंश् ामें विद्यमान राक्षस सुमालीका आश्रय लेकर रहने लगे॥
श्रीराम! आपने पुलस्त्यवंशके जिन-जिन राक्षसोंका विनाश किया है, उनकी अपेक्षा प्राचीन राक्षसोंका पराक्रम अधिक था। सुमाली, माल्यवान् और माली तथा उनके आगे चलनेवाले योद्धा—ये सभी महाभाग निशाचर रावणसे बढ़कर बलवान् थे॥ २४ ॥
देवताओंके लिये कण्टकरूप उन देवद्रोही राक्षसोंका वध शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् नारायणदेवके सिवा दूसरा कोर्ऽइ नहीं कर सकता॥ २५ ॥
आप चार भुजाधारी सनातन देव भगवान् नारायण ही हैं। आपको कोर्ऽइ परास्त नहीं कर सकता। आप अविनाशी प्रभु हैं और राक्षसोंका वध करनेके लिये इस लोकमें अवतीर्ण हुए हैं॥ २६ ॥
आप ही इन प्रजाओंके स्रष्टा हैं और शरणागतोंपर दया रखते हैं। जब-जब धर्मकी व्यवस्थाको नष्ट करनेवाले दस्यु पैदा हो जाते हैं, तब-तब उन दस्युओंका वध करनेके लिये आप समय-समयपर अवतार लेते रहते हैं॥ २७ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार मैंने आपको राक्षसोंकी उत्पत्तिका यह पूरा प्रसंग ठीक-ठीक सुना दिया। रघुवंशशिरोमणे! अब आप रावण तथा उसके पुत्रोंके जन्म और अनुपम प्रभावका सारा वर्णन सुनिये॥ २८ ॥
भगवान् विष्णुके भयसे पीड़ित होकर राक्षस सुमाली सुदीर्घ कालतक अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ रसातलमें विचरता रहा। इसी बीचमें धनाध्यक्ष कुबेरने लङ्काको अपना निवास-स्थान बनाया॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें आठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
८ ॥
नवाँ सर्ग
नवाँ सर्ग
रावण आदिका जन्म और उनका तपके लिये गोकर्ण-आश्रममें जाना
कुछ कालके पश्चात् नीले मेघके समान श्याम वर्णवाला राक्षस सुमाली तपाये हुए सोनेके कुण्डलोंसे अलंकृत हो अपनी सुन्दरी कन्याको, जो बिना कमलकी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, साथ ले रसातलसे निकला और सारे मर्त्यलोकमें विचरने लगा॥ १-२ ॥
उस समय भूतलपर विचरते हुए उस राक्षसराजने अग्निके समान तेजस्वी तथा देवतुल्य शोभा धारण करनेवाले धनेश्वर कुबेरको देखा, जो पुष्पकविमानद्वारा अपने पिता पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका दर्शन करनेके लिये जा रहे थे। उन्हें देखकर वह अत्यन्त विस्मित हो मर्त्यलोकसे रसातलमें प्रविष्ट हुआ॥ ३-४ १/२ ॥
सुमाली बड़ा बुद्धिमान् था। वह सोचने लगा, क्या करनेसे हम राक्षसोंका भला होगा? कैसे हमलोग उन्नति कर सकेंगे?॥ ५ १/२ ॥
ऐसा विचार करके उस राक्षसने अपनी पुत्रीसे, जिसका नाम कैकसी था, कहा— 'बेटी! अब तुम्हारे विवाहके योग्य समय आ गया है; क्योंकि इस समय तुम्हारी युवावस्था बीत रही है। तुम कहीं इनकार न कर दो, इसी भयसे श्रेष्ठ वर तुम्हारा वरण नहीं कर रहे हैं॥
‘पुत्री! तुम्हें विशिष्ट वरकी प्राप्ति हो, इसके लिये हमलोगोंने बहुत प्रयास किया है; क्योंकि कन्यादानके विषयमें हम धर्मबुद्धि रखनेवाले हैं। तुम तो साक्षात् लक्ष्मीके समान सर्वगुणसम्पन्न हो (अतः तुम्हारा वर भी सर्वथा तुम्हारे योग्य ही होना चाहिये)॥ ८ ॥
‘बेटी! सम्मानकी इच्छा रखनेवाले सभी लोगोंके लिये कन्याका पिता होना दुःखका ही कारण होता है; क्योंकि यह पता नहीं चलता कि कौन और कैसा पुरुष कन्याका वरण करेगा?॥ ९ ॥
‘माताके, पिताके और जहाँ कन्या दी जाती है, उस पतिके कुलको भी कन्या सदा संशयमें डाले रहती है॥
‘अतः बेटी! तुम प्रजापतिके कुलमें उत्पन्न, श्रेष्ठ गुणसम्पन्न, पुलस्त्यनन्दन मुनिवर विश्रवाका स्वयं चलकर पतिके रूपमें वरण करो और उनकी सेवामें रहो॥ ११ ॥
‘पुत्री! ऐसा करनेसे निःसंदेह तुम्हारे पुत्र भी ऐसे ही होंगे, जैसे ये धनेश्वर कुबेर हैं। तुमने तो देखा ही था; वे कैसे अपने तेजसे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहे थे?’ ॥ १२ ॥
पिताकी यह बात सुनकर उनके गौरवका खयाल करके कैकसी उस स्थानपर गयी, जहाँ मुनिवर विश्रवा तप करते थे। वहाँ जाकर वह एक जगह खड़ी हो गयी॥ १३ ॥
श्रीराम! इसी बीचमें पुलस्त्यनन्दन ब्राह्मण विश्रवा सायंकालका अग्निहोत्र करने लगे। वे तेजस्वी मुनि उस समय तीन अग्नियोंके साथ स्वयं भी चतुर्थ अग्निके समान देदीप्यमान हो रहे थे॥ १४ ॥
पिताके प्रति गौरवबुद्धि होनेके कारण कैकसीने उस भयंकर वेलाका विचार नहीं किया और निकट जा उनके चरणोंपर दृष्टि लगाये नीचा मुँह किये वह सामने खड़ी हो गयी॥ १५ ॥
वह भामिनी अपने पैरके अँगूठेसे बारम्बार धरतीपर रेखा खींचने लगी। पूर्ण चन्द्रमाके समान मुख तथा सुन्दर कटि-प्रदेशवाली उस सुन्दरीको जो अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थी, देखकर उन परम उदार महर्षिने पूछा—॥ १६ १/२ ॥
‘भद्रे! तुम किसकी कन्या हो, कहाँसे यहाँ आयी हो, मुझसे तुम्हारा क्या काम है अथवा किस उद्देश्यसे यहाँ तुम्हारा आना हुआ है? शोभने! ये सब बातें मुझे ठीक-ठीक बताओ’॥ १७-१८ ॥
विश्रवाके इस प्रकार पूछनेपर उस कन्याने हाथ जोड़कर कहा—‘मुने! आप अपने ही प्रभावसे मेरे मनोभावको समझ सकते हैं; किंतु ब्रह्मर्षे! मेरे मुखसे इतना अवश्य जान लें कि मैं अपने पिताकी आज्ञासे आपकी सेवामें आयी हूँ और मेरा नाम कैकसी है। बाकी सब बातें आपको स्वतः जान लेनी चाहिये (मुझसे न कहलावें)’॥ १९-२० ॥
यह सुनकर मुनिने थोड़ी देरतक ध्यान लगाया और उसके बाद कहा—‘भद्रे! तुम्हारे मनका भाव मालूम हुआ। मतवाले गजराजकी भाँति मन्दगतिसे चलनेवाली सुन्दरी! तुम मुझसे पुत्र प्राप्त करना चाहती हो; परंतु इस दारुण वेलामें मेरे पास आयी हो, इसलिये यह भी सुन लो कि तुम कैसे पुत्रोंको जन्म दोगी। सुश्रोणि! तुम्हारे पुत्र क्रूर स्वभाववाले और शरीरसे भी भयंकर होंगे तथा उनका क्रूरकर्मा राक्षसोंके साथ ही प्रेम होगा। तुम क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले राक्षसोंको ही पैदा करोगी’॥ २१—२३ १/२ ॥
मुनिका यह वचन सुनकर कैकसी उनके चरणोंपर गिर पड़ी और इस प्रकार बोली—‘भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं। मैं आपसे ऐसे दुराचारी पुत्रोंको पानेकी अभिलाषा नहीं
रखती; अतः आप मुझपर कृपा कीजिये'॥ २४-२५ ॥
उस राक्षसकन्याके इस प्रकार कहनेपर पूर्णचन्द्रमाके समान मुनिवर विश्रवा रोहिणी-जैसे सुन्दरी कैकसीसे फिर बोले—॥ २६ ॥
‘शुभानने! तुम्हारा जो सबसे छोटा एवं अन्तिम पुत्र होगा, वह मेरे वंशके अनुरूप धर्मात्मा होगा; इसमें संशय नहीं है'॥ २७ ॥
श्रीराम! मुनिके ऐसा कहनेपर कैकसीने कुछ कालके अनन्तर अत्यन्त भयानक और क्रूर स्वभाववाले एक राक्षसको जन्म दिया, जिसके दस मस्तक, बड़ी-बड़ी दाढ़ें, ताँबे-जैसे ओठ, बीस भुजाएँ, विशाल मुख और चमकीले केश थे। उसके शरीरका रंग कोयलेके पहाड़-जैसा काला था॥ २८-२९ ॥
उसके पैदा होते ही मुँहमें अङ्गारोंके कौर लिये गीदड़ियाँ और मांसभक्षी गृध्र आदि पक्षी दायीं ओर मण्डलाकार घूमने लगे॥ ३० ॥
इन्द्रदेव रुधिरकी वर्षा करने लगे, मेघ भयंकर स्वरमें गर्जने लगे, सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी, पृथ्वीपर उल्कापात होने लगा, धरती काँप उठी, भयानक आँधी चलने लगी तथा जो किसीके द्वारा क्षुब्ध नहीं किया जा सकता, वह सरिताओंका स्वामी समुद्र विक्षुब्ध हो उठा॥ ३१-३२ ॥
उस समय ब्रह्माजीके समान तेजस्वी पिता विश्रवा मुनिने पुत्रका नामकरण किया—‘यह दस ग्रीवाएँ लेकर उत्पन्न हुआ है, इसलिये ‘दशग्रीव' नामसे प्रसिद्ध होगा'॥
उसके बाद महाबली कुम्भकर्णका जन्म हुआ, जिसके शरीरसे बड़ा शरीर इस जगत्में दूसरे किसीका नहीं है॥ ३४ ॥
इसके बाद विकराल मुखवाली शूर्पणखा उत्पन्न हुई। तदनन्तर धर्मात्मा विभीषणका जन्म हुआ, जो कैकसीके अन्तिम पुत्र थे॥ ३५ ॥
उस महान् सत्त्वशाली पुत्रका जन्म होनेपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई और आकाशमें देवोंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। उस समय अन्तरिक्षमें ‘साधु-साधु' की ध्वनि सुनायी देने लगी॥ ३६ ॥
कुम्भकर्ण और दशग्रीव वे दोनों महाबली राक्षस लोकमें उद्वेग पैदा करनेवाले थे। वे दोनों ही उस विशाल वनमें पालित होने और बढ़ने लगे॥ ३७ ॥
कुम्भकर्ण बड़ा ही उन्मत्त निकला। वह भोजनसे कभी तृप्त ही नहीं होता था; अतः तीनों लोकोंमें घूम-घूमकर धर्मात्मा महर्षियोंको खाता फिरता था॥ ३८ ॥
विभीषण बचपनसे ही धर्मात्मा थे। वे सदा धर्ममें स्थित रहते, स्वाध्याय करते और नियमित आहार करते हुए इन्द्रियोंको अपने काबूमें रखते थे॥ ३९ ॥
कुछ काल बीतनेपर धनके स्वामी वैश्रवण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो अपने पिताका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये॥ ४० ॥
वे अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर राक्षस-कन्या कैकसी अपने पुत्र दशग्रीवके पास आयी और इस प्रकार बोली— ॥ ४१ ॥
‘बेटा! अपने भाई वैश्रवणकी ओर तो देखो। वे कैसे तेजस्वी जान पड़ते हैं? भाई होनेके नाते तुम भी इन्हींके समान हो। परंतु अपनी अवस्था देखो, कैसी है?॥ ४२ ॥
‘अमित पराक्रमी दशग्रीव! मेरे बेटे! तुम भी ऐसा कोई यत्न करो, जिससे वैश्रवणकी ही भाँति तेज और विभवसे सम्पन्न हो जाओ’॥ ४३ ॥
माताकी यह बात सुनकर प्रतापी दशग्रीवको अनुपम अमर्ष हुआ। उसने तत्काल प्रतिज्ञा की— ॥ ४४ ॥
‘माँ! तुम अपने हृदयकी चिन्ता छोड़ो। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि अपने पराक्रमसे भाई वैश्रवणके समान या उनसे भी बढ़कर हो जाऊँगा’॥ ४५ ॥
तदनन्तर उसी क्रोधके आवेशमें भाइयोंसहित दशग्रीवने दुष्कर कर्मकी इच्छा मनमें लेकर सोचा— ‘मैं तपस्यासे ही अपना मनोरथ पूर्ण कर सकूँगा, ऐसा विचारकर उसने मनमें तपस्याका ही निश्चय किया और अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये वह गोकर्णके पवित्र आश्रमपर गया॥ ४६-४७ ॥
भाइयोंसहित उस भयंकर पराक्रमी राक्षसने अनुपम तपस्या आरम्भ की। उस तपस्याद्वारा उसने भगवान् ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और उन्होंने प्रसन्न होकर उसे विजय दिलानेवाले वरदान दिये॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९ ॥
॥
दसवाँ सर्ग
दसवाँ सर्ग
रावण आदिकी तपस्या और वर-प्राप्ति
इतनी कथा सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्य मुनिसे पूछा—'ब्रह्मन्! उन तीनों महाबली भाइयोंने वनमें किस प्रकार और कैसी तपस्या की?'॥ १ ॥
तब अगस्त्यजीने अत्यन्त प्रसन्नचित्तवाले श्रीरामसे कहा—'रघुनन्दन! उन तीनों भाइयोंने वहाँ पृथक्-पृथक् धर्मविधियोंका अनुष्ठान किया॥ २ ॥
'कुम्भकर्ण अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर प्रतिदिन धर्मके मार्गमें स्थित हो गर्मीके दिनोंमें अपने चारों ओर आग जला धूपमें बैठकर पञ्चाग्निका सेवन करने लगा॥ ३ ॥
'फिर वर्षा-ऋतुमें खुले मैदानमें वीरासनसे बैठकर मेघोंके बरसाये हुए जलसे भीगता रहा और जाड़ेके दिनोंमें प्रतिदिन जलके भीतर रहने लगा॥ ४ ॥
'इस प्रकार सन्मार्गमें स्थित हो धर्मके लिये प्रयत्नशील हुए उस कुम्भकर्णके दस हजार वर्ष बीत गये॥ ५ ॥
'विभीषण तो सदासे ही धर्मात्मा थे। वे नित्यधर्म-परायण रहकर शुद्ध आचार-विचारका पालन करते हुए पाँच हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे॥ ६ ॥
'उनका नियम समाप्त होनेपर अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। उनके ऊपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुईं और देवताओंने उनकी स्तुति की॥ ७ ॥
'तदनन्तर विभीषणने अपनी दोनों बाँहें और मस्तक ऊपर उठाकर स्वाध्यायपरायण हो पाँच हजार वर्षोंतक सूर्यदेवकी आराधना की॥ ८ ॥
'इस प्रकार मनको वशमें रखनेवाले विभीषणके भी दस हजार वर्ष बड़े सुखसे बीते, मानो वे स्वर्गके नन्दनवनमें निवास करते हों॥ ९ ॥
'दशमुख रावणने दस हजार वर्षोंतक लगातार उपवास किया। प्रत्येक सहस्र वर्षके पूर्ण होनेपर वह अपना एक मस्तक काटकर आगमें होम देता था॥ १० ॥
'इस तरह एक-एक करके उसके नौ हजार वर्ष बीत गये और नौ मस्तक भी अग्निदेवको भेंट हो गये॥