श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
‘जैसे वर्षाकाल आनेपर समुद्रमें बादलोंका वेग बढ़ जाता है, उसी प्रकार वहाँ आक्रमण करते हुए उन निशाचरोंका वेग बढ़ा हुआ प्रतीत होता था॥ ६८ ॥
‘छोड़ो, छोड़ो, ठहरो, ठहरो’ ऐसा बारम्बार कहते हुए राक्षस अर्जुनकी ओर दौड़े। उस समय प्रहस्तने रणभूमिमें अर्जुनपर मूसल और शूलके प्रहार किये॥ ६९ ॥
‘परंतु अर्जुनको उस समय घबराहट नहीं हुई। उस शत्रुसूदन वीरने प्रहस्त आदि देवद्रोही निशाचरोंके छोड़े हुए उन अस्त्रोंको अपने शरीरतक आनेसे पहले ही पकड़ लिया॥ ७० ॥
‘फिर उन्हीं दुर्धर एवं श्रेष्ठ आयुधोंसे उन सब राक्षसोंको घायल करके उसी तरह भगा दिया, जैसे हवा बादलोंको छिन्न-भिन्न करके उड़ा ले जाती है॥ ७१ ॥
‘उस समय कार्तवीर्य अर्जुनने समस्त राक्षसोंको भयभीत कर दिया और रावणको लेकर वह अपने सुहृदोंके साथ नगरमें आया॥ ७२ ॥
‘नगरके निकट आनेपर ब्राह्मणों और पुरवासियोंने अपने इन्द्रतुल्य तेजस्वी नरेशपर फूलों और अक्षतोंकी वर्षा की और सहस्र नेत्रधारी इन्द्र जैसे बलिको बंदी बनाकर ले गये थे, उसी प्रकार उस राजा अर्जुनने बँधे हुए रावणको साथ लेकर अपनी पुरीमें प्रवेश किया’॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२ ॥
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तैंतीसवाँ सर्ग
तैंतीसवाँ सर्ग
पुलस्त्यजीका रावणको अर्जुनकी कैदसे छुटकारा दिलाना
रावणको पकड़ लेना वायुको पकड़नेके समान था। धीरे-धीरे यह बात स्वर्गमें देवताओंके मुखसे पुलस्त्यजीने सुनी॥ १ ॥
यद्यपि वे महर्षि महान् धैर्यशाली थे तो भी संतानके प्रति होनेवाले स्नेहके कारण कृपापरवश हो गये और माहिष्मती नरेशसे मिलनेके लिये भूतलपर चले आये॥ २ ॥
उनका वेग वायुके समान था और गति मनके समान, वे ब्रह्मर्षि वायुपथका आश्रय ले माहिष्मतीपुरीमें आ पहुँचे॥ ३ ॥
जैसे ब्रह्माजी इन्द्रकी अमरावतीपुरीमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार पुलस्त्यजीने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई और अमरावतीके समान शोभासे सम्पन्न माहिष्मती नगरीमें प्रवेश किया॥ ४ ॥
आकाशसे उतरते समय वे पैरोंसे चलकर आते हुए सूर्यके समान जान पड़ते थे। अत्यन्त तेजके कारण उनकी ओर देखना बहुत ही कठिन जान पड़ता था। अर्जुनके सेवकोंने उन्हें पहचानकर राजा अर्जुनको उनके शुभागमनकी सूचना दी॥ ५ ॥
सेवकोंके कहनेसे जब हैहयराजको यह पता चला कि पुलस्त्यजी पधारे हैं, तब वे सिरपर अञ्जलि बाँधे उन तपस्वी मुनिकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये॥ ६ ॥
राजा अर्जुनके पुरोहित अर्घ्य और मधुपर्क आदि लेकर उनके आगे-आगे चले, मानो इन्द्रके आगे बृहस्पति चल रहे हों॥ ७ ॥
वहाँ आते हुए वे महर्षि उदित होते हुए सूर्यके समान तेजस्वी दिखायी देते थे। उन्हें देखकर राजा अर्जुन चकित रह गया। उसने उन ब्रह्मर्षिके चरणोंमें उसी तरह आदरपूर्वक प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीके आगे मस्तक झुकाते हैं॥ ८ ॥
ब्रह्मर्षिको पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ समर्पित करके राजाधिराज अर्जुनने हर्षगद्गद वाणीमें पुलस्त्यजीसे कहा— ॥ ९ ॥
‘द्विजेन्द्र! आपका दर्शन परम दुर्लभ है, तथापि आज मैं आपके दर्शनका सुख उठा रहा हूँ। इस प्रकार यहाँ पधारकर आपने इस माहिष्मतीपुरीको अमरावतीपुरीके समान गौरवशालिनी
बना दिया॥ १०॥
‘देव! आज मैं आपके देववन्द्य चरणोंकी वन्दना कर रहा हूँ; अतः आज ही मैं वास्तवमें सकुशल हूँ। आज मेरा व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो गया। आज ही मेरा जन्म सफल हुआ और तपस्या भी सार्थक हो गयी। ब्रह्मन्! यह राज्य, ये स्त्री-पुत्र और हम सब लोग आपके ही हैं। आप आज्ञा दीजिये। हम आपकी क्या सेवा करें?’॥ ११-१२॥
तब पुलस्त्यजी हैहयराज अर्जुनके धर्म, अग्नि और पुत्रोंका कुशल-समाचार पूछकर उससे इस प्रकार बोले—॥ १३॥
‘पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले कमलनयन नरेश! तुम्हारे बलकी कहीं तुलना नहीं है; क्योंकि तुमने दशग्रीवको जीत लिया॥ १४॥
‘जिसके भयसे समुद्र और वायु भी चञ्चलता छोड़कर सेवामें उपस्थित होते हैं, उस मेरे रणदुर्जय पौत्रको तुमने संग्राममें बाँध लिया॥ १५॥
‘ऐसा करके तुम मेरे इस बच्चेका यश पी गये और सर्वत्र अपने नामका ढिंढोरा पीट दिया। वत्स! अब मेरे कहनेसे तुम दशाननको छोड़ दो। यह तुमसे मेरी याचना है’॥ १६॥
पुलस्त्यजीकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके अर्जुनने इसके विपरीत कोई बात नहीं कही। उस राजाधिराजने बड़ी प्रसन्नताके साथ राक्षसराज रावणको बन्धनसे मुक्त कर दिया॥ १७॥
उस देवद्रोही राक्षसको बन्धनमुक्त करके अर्जुनने दिव्य आभूषण, माला और वस्त्रोंसे उसका पूजन किया और अग्निको साक्षी बनाकर उसके साथ ऐसी मित्रताका सम्बन्ध स्थापित किया, जिसके द्वारा किसीकी हिंसा न हो (अर्थात् उन दोनोंने यह प्रतिज्ञा की कि हमलोग अपनी मैत्रीका उपयोग दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें नहीं करेंगे)। इसके बाद ब्रह्मपुत्र पुलस्त्यजीको प्रणाम करके राजा अर्जुन अपने घरको लौट गया॥ १८॥
इस प्रकार अर्जुनद्वारा आतिथ्य-सत्कार करके छोड़े गये प्रतापी राक्षसराज रावणको पुलस्त्यजीने हृदयसे लगा लिया, परंतु वह पराजयके कारण लज्जित ही रहा॥ १९॥
दशग्रीवको छुड़ाकर ब्रह्माजीके पुत्र मुनिवर पुलस्त्यजी पुनः ब्रह्मलोकको चले गये॥ २०॥
इस प्रकार रावणको कार्तवीर्य अर्जुनके हाथसे पराजित होना पड़ा था और फिर पुलस्त्यजीके कहनेसे उस महाबली राक्षसको छुटकारा मिला था॥ २१ ॥
रघुकुलनन्दन! इस प्रकार संसारमें बलवान्-से-बलवान् वीर पड़े हुए हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे उसे दूसरेकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये॥ २२ ॥
सहस्रबाहुकी मैत्री पाकर राक्षसोंका राजा रावण पुनः घमंडसे भरकर सारी पृथ्वीपर विचरने और नरेशोंका संहार करने लगा॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥
चौंतीसवाँ सर्ग
चौंतीसवाँ सर्ग
वालीके द्वारा रावणका पराभव तथा रावणका उन्हें अपना मित्र बनाना
अर्जुनसे छुटकारा पाकर राक्षसराज रावण निर्वेदरहित हो पुनः सारी पृथ्वीपर विचरण करने लगा॥ १ ॥
राक्षस हो या मनुष्य, जिसको भी वह बलमें बढ़ा-चढ़ा सुनता था, उसीके पास पहुँचकर अभिमानी रावण उसे युद्धके लिये ललकारता था॥ २ ॥
तदनन्तर एक दिन वह वालीद्वारा पालित किष्किन्धापुरीमें जाकर सुवर्णमालाधारी वालीको युद्धके लिये ललकारने लगा॥ ३ ॥
उस समय युद्धकी इच्छासे आये हुए रावणसे वालीके मन्त्री तार, ताराके पिता सुषेण तथा युवराज अङ्गद एवं सुग्रीवने कहा— ॥ ४ ॥
‘राक्षसराज! इस समय वाली तो बाहर गये हुए हैं। वे ही आपकी जोड़के हो सकते हैं। दूसरा कौन वानर आपके सामने ठहर सकता है॥ ५ ॥
‘रावण! चारों समुद्रोंसे सन्ध्योपासन करके वाली अब आते ही होंगे। आप दो घड़ी ठहर जाइये॥ ६ ॥
‘राजन्! देखिये, ये जो शङ्खके समान उज्ज्वल हड्डियोंके ढेर लग रहे हैं, ये वालीके साथ युद्धकी इच्छासे आये हुए आप-जैसे वीरोंके ही हैं। वानरराज वालीके तेजसे ही इन सबका अन्त हुआ है॥ ७ ॥
‘राक्षस रावण! यदि आपने अमृतका रस पी लिया हो तो भी जब आप वालीसे टक्कर लेंगे, तब वही आपके जीवनका अन्तिम क्षण होगा॥ ८ ॥
‘विश्रवाकुमार! वाली सम्पूर्ण आश्चर्यके भण्डार हैं। आप इस समय इनका दर्शन करेंगे। केवल इसी मुहूर्ततक उनकी प्रतीक्षाके लिये ठहरिये; फिर तो आपके लिये जीवन दुर्लभ हो जायगा॥ ९ ॥
‘अथवा यदि आपको मरनेके लिये बहुत जल्दी लगी हो तो दक्षिण समुद्रके तटपर चले जाइये। वहाँ आपको पृथ्वीपर स्थित हुए अग्निदेवके समान वालीका दर्शन होगा’॥ १० ॥
तब लोकोंको रुलानेवाले रावणने तारको भला-बुरा कहकर पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो दक्षिण समुद्रकी ओर प्रस्थान किया॥ ११॥
वहाँ रावणने सुवर्णगिरिके समान ऊँचे वालीको संध्योपासन करते हुए देखा। उनका मुख प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे उद्भासित हो रहा था॥ १२ ॥
उन्हें देखकर काजलके समान काला रावण पुष्पकसे उतर पड़ा और वालीको पकड़नेके लिये जल्दी-जल्दी उनकी ओर बढ़ने लगा। उस समय वह अपने पैरोंकी आहट नहीं होने देता था॥ १३ ॥
दैवयोगसे वालीने भी रावणको देख लिया; किंतु वे उसके पापपूर्ण अभिप्रायको जानकर भी घबराये नहीं॥ १४ ॥
जैसे सिंह खरगोशको और गरुड़ सर्पको देखकर भी उसकी परवा नहीं करता, उसी प्रकार वालीने पापपूर्ण विचार रखनेवाले रावणको देखकर भी चिन्ता नहीं की॥ १५ ॥
उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि जब पापात्मा रावण मुझे पकड़नेकी इच्छासे निकट आयेगा, तब मैं इसे काँखमें दबाकर लटका लूँगा और इसे लिये-दिये शेष तीन महासागरोंपर भी हो आऊँगा॥ १६ ॥
इसकी जाँघ, हाथ-पैर और वस्त्र खिसकते होंगे। यह मेरी काँखमें दबा होगा और उस दशामें लोग मेरे शत्रुको गरुड़के पंजेमें दबे हुए सर्पके समान लटकते देखेंगे॥ १७ ॥
ऐसा निश्चय करके वाली मौन ही रहे और वैदिक मन्त्रोंका जप करते हुए गिरिराज सुमेरुकी भाँति खड़े रहे॥ १८ ॥
इस प्रकार बलके अभिमानसे भरे हुए वे वानरराज और राक्षसराज दोनों एक-दूसरेको पकड़ना चाहते थे। दोनों ही इसके लिये प्रयत्नशील थे और दोनों ही वह काम बनानेकी घातमें लगे थे॥ १९ ॥
रावणके पैरोंकी हलकी-सी आहटसे वाली यह समझ गये कि अब रावण हाथ बढ़ाकर मुझे पकड़ना चाहता है। फिर तो दूसरी ओर मुँह किये होनेपर भी वालीने उसे उसी तरह सहसा पकड़ लिया, जैसे गरुड़ सर्पको दबोच लेता है॥ २० ॥
पकड़नेकी इच्छावाले उस राक्षसराजको वालीने स्वयं ही पकड़कर अपनी काँखमें लटका लिया और बड़े वेगसे वे आकाशमें उछले॥ २१ ॥
रावण अपने नखोंसे बारम्बार वालीको बकोटता और पीड़ा देता रहा, तो भी जैसे वायु बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वाली रावणको बगलमें दबाये लिये फिरते थे॥ २२ ॥
इस प्रकार रावणके हर लिये जानेपर उसके मन्त्री उसे वालीसे छुड़ानेके लिये कोलाहल करते हुए उनके पीछे-पीछे दौड़ते रहे॥ २३ ॥
पीछे-पीछे राक्षस चलते थे और आगे-आगे वाली। इस अवस्थामें वे आकाशके मध्यभागमें पहुँचकर मेघसमूहोंसे अनुगत हुए आकाशवर्ती अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पाते थे॥ २४ ॥
वे श्रेष्ठ राक्षस बहुत प्रयत्न करनेपर भी वालीके पासतक न पहुँच सके। उनकी भुजाओं और जाँघोंके वेगसे उत्पन्न हुई वायुके थपेड़ोंसे थककर वे खड़े हो गये॥ २५ ॥
वालीके मार्गसे उड़ते हुए बड़े-बड़े पर्वत भी हट जाते थे; फिर रक्त-मांसमय शरीर धारण करनेवाला और जीवनकी रक्षा चाहनेवाला प्राणी उनके मार्गसे हट जाय, इसके लिये तो कहना ही क्या है॥ २६ ॥
जितनी देरमें वाली समुद्रोंतक पहुँचते थे, उतनी देरमें तीव्रगामी पक्षियोंके समूह भी नहीं पहुँच पाते थे। उन महावेगशाली वानरराजने क्रमशः सभी समुद्रोंके तटपर पहुँचकर संध्या-वन्दन किया॥ २७ ॥
समुद्रोंकी यात्रा करते हुए आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ वालीकी सभी खेचर प्राणी पूजा एवं प्रशंसा करते थे। वे रावणको बगलमें दबाये हुए पश्चिम समुद्रके तटपर आये॥ २८ ॥
वहाँ स्नान, संध्योपासन और जप करके वे वानरवीर दशाननको लिये-दिये उत्तर समुद्रके तटपर जा पहुँचे॥ २९ ॥
वायु और मनके समान वेगवाले वे महावानर वाली कई सहस्र योजनतक रावणको ढोते रहे। फिर अपने उस शत्रुके साथ ही वे उत्तर समुद्रके किनारे गये॥
उत्तरसागरके तटपर संध्योपासना करके दशाननका भार वहन करते हुए वाली पूर्व दिशावर्ती महासागरके किनारे गये॥ ३१ ॥
वहाँ भी संध्योपासना सम्पन्न करके वे इन्द्रपुत्र वानरराज वाली दशमुख रावणको बगलमें दबाये फिर किष्किन्धापुरीके निकट आये॥ ३२ ॥
इस तरह चारों समुद्रोंमें संध्योपासनाका कार्य पूरा करके रावणको ढोनेके कारण थके हुए वानरराज वाली किष्किन्धाके उपवनमें आ पहुँचे॥ ३३॥
वहाँ आकर उन कपिश्रेष्ठने रावणको अपनी काँखसे छोड़ दिया और बारम्बार हँसते हुए पूछा— ‘कहो जी, तुम कहाँसे आये हो’॥ ३४॥
रावणकी आँखें श्रमके कारण चञ्चल हो रही थीं। वालीके इस अद्भुत पराक्रमको देखकर उसे महान् आश्चर्य हुआ और उस राक्षसराजने उन वानरराजसे इस प्रकार कहा— ॥ ३५॥
‘महेन्द्रके समान पराक्रमी वानरेन्द्र! मैं राक्षसेन्द्र रावण हूँ और युद्ध करनेकी इच्छासे यहाँ आया था, सो वह युद्ध तो आपसे मिल ही गया॥ ३६॥
‘अहो! आपमें अद्भुत बल है, अद्भुत पराक्रम है और आश्चर्यजनक गम्भीरता है। आपने मुझे पशुकी तरह पकड़कर चारों समुद्रोंपर घुमाया है॥ ३७॥
‘वानरवीर! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा शूरवीर होगा, जो मुझे इस प्रकार बिना थके-माँदे शीघ्रतापूर्वक ढो सके॥ ३८॥
‘वानरराज! ऐसी गति तो मन, वायु और गरुड़— इन तीन भूतोंकी ही सुनी गयी है। निःसंदेह इस जगतमें चौथे आप भी ऐसे तीव्र वेगवाले हैं॥ ३९॥
‘कपिश्रेष्ठ! मैंने आपका बल देख लिया। अब मैं अग्निको साक्षी बनाकर आपके साथ सदाके लिये स्नेहपूर्ण मित्रता कर लेना चाहता हूँ॥ ४०॥
‘वानरराज! स्त्री, पुत्र, नगर, राज्य, भोग, वस्त्र और भोजन—इन सभी वस्तुओंपर हम दोनोंका साझेका अधिकार होगा’॥ ४१॥
तब वानरराज और राक्षसराज दोनोंने अग्नि प्रज्वलित करके एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर आपसमें भाईचारेका सम्बन्ध जोड़ा॥ ४२॥
फिर वे दोनों वानर और राक्षस एक-दूसरेका हाथ पकड़े बड़ी प्रसन्नताके साथ किष्किन्धापुरीके भीतर गये, मानो दो सिंह किसी गुफामें प्रवेश कर रहे हों॥ ४३॥
रावण वहाँ सुग्रीवकी तरह सम्मानित हो महीनेभर रहा। फिर तीनों लोकोंको उखाड़ फेंकनेकी इच्छा रखनेवाले उसके मन्त्री आकर उसे लिवा ले गये॥ ४४॥
प्रभो! इस प्रकार यह घटना पहले घटित हो चुकी है। वालीने रावणको हराया और फिर अग्निके समीप उसे अपना भाई बना लिया॥ ४५॥
श्रीराम! वालीमें बहुत अधिक और अनुपम बल था, परंतु आपने उसको भी अपनी बाणाग्निसे उसी तरह दग्ध कर डाला, जैसे आग पतिंगेको जला देती है॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ सर्ग
पैंतीसवाँ सर्ग
हनुमान्जीकी उत्पत्ति, शैशवावस्थामें इनका सूर्य, राहु और ऐरावतपर आक्रमण, इन्द्रके वज्रसे इनकी मूर्च्छा, वायुके कोपसे संसारके प्राणियोंको कष्ट और उन्हें प्रसन्न करनेके लिये देवताओंसहित ब्रह्माजीका उनके पास जाना
तब भगवान् श्रीरामने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशामें निवास करनेवाले अगस्त्य मुनिसे विनयपूर्वक यह अर्थयुक्त बात कही— ॥ १ ॥
‘महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि वाली और रावणके इस बलकी कहीं तुलना नहीं थी; परंतु मेरा ऐसा विचार है कि इन दोनोंका बल भी हनुमान्जीके बलकी बराबरी नहीं कर सकता था॥ २ ॥
‘शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव—इन सभी सद्गुणोंने हनुमान्जीके भीतर घर कर रखा है॥ ३ ॥
‘समुद्रको देखते ही वानर-सेना घबरा उठी है— यह देख ये महाबाहु वीर उसे धैर्य बँधाकर एक ही छलाँगमें सौ योजन समुद्रको लाँघ गये॥ ४ ॥
‘फिर लङ्कापुरीके आधिदैविक रूपको परास्त कर रावणके अन्तःपुरमें गये, सीताजीसे मिले, उनसे बातचीत की और उन्हें धैर्य बँधाया॥ ५ ॥
‘वहाँ अशोकवनमें इन्होंने अकेले ही रावणके सेनापतियों, मन्त्रिपुत्रों, किंकरों तथा रावणपुत्र अक्षको मार गिराया॥ ६ ॥
‘फिर ये मेघनादके नागपाशसे बँधे और स्वयं ही मुक्त हो गये। तत्पश्चात् इन्होंने रावणसे वार्तालाप किया। जैसे प्रलयकालकी आगने यह सारी पृथ्वी जलायी थी, उसी प्रकार लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर दिया॥ ७ ॥
‘युद्धमें हनुमान्जीके जो पराक्रम देखे गये हैं, वैसे वीरतापूर्ण कर्म न तो कालके, न इन्द्रके, न भगवान् विष्णुके और न वरुणके ही सुने जाते हैं॥ ८ ॥
‘मुनीश्वर! मैंने तो इन्हींके बाहुबलसे विभीषणके लिये लङ्का, शत्रुओंपर विजय, अयोध्याका राज्य तथा सीता, लक्ष्मण, मित्र और बन्धुजनोंको प्राप्त किया है॥
‘यदि मुझे वानरराज सुग्रीवके सखा हनुमान् न मिलते तो जानकीका पता लगानेमें भी कौन समर्थ हो सकता था?॥ १० ॥
‘जिस समय वाली और सुग्रीवमें विरोध हुआ, उस समय सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये इन्होंने जैसे दावानल वृक्षको जला देता है, उसी प्रकार वालीको क्यों नहीं भस्म कर डाला? यह समझमें नहीं आता॥ ११ ॥
‘मैं तो ऐसा मानता हूँ कि उस समय हनुमान्जीको अपने बलका पता ही नहीं था। इसीसे ये अपने प्राणोंसे भी प्रिय वानरराज सुग्रीवको कष्ट उठाते देखते रहे॥ १२ ॥
‘देववन्द्य महामुने! भगवन्! आप हनुमान्जीके विषयमें ये सब बातें यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बताइये’॥
श्रीरामचन्द्रजीके ये युक्तियुक्त वचन सुनकर महर्षि अगस्त्यजी हनुमान्जीके सामने ही उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १४ ॥
‘रघुकुलतिलक श्रीराम! हनुमान्जीके विषयमें आप जो कुछ कहते हैं, यह सब सत्य ही है। बल, बुद्धि और गतिमें इनकी बराबरी करनेवाला दूसरा कोऽइ नहीं है॥ १५ ॥
‘शत्रुसूदन रघुनन्दन! जिनका शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता, ऐसे मुनियोंने पूर्वकालमें इन्हें यह शाप दे दिया था कि बल रहनेपर भी इनको अपने पूरे बलका पता नहीं रहेगा॥ १६ ॥
‘महाबली श्रीराम! इन्होंने बचपनमें भी जो महान् कर्म किया था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उन दिनों वे बालभावसे—अनजानकी तरह रहते थे॥ १७ ॥
‘रघुनन्दन! यदि हनुमान्जीका चरित्र सुननेके लिये आपकी हार्दिक इच्छा हो तो चित्तको एकाग्र करके सुनिये। मैं सारी बातें बता रहा हूँ॥ १८ ॥
‘भगवान् सूर्यके वरदानसे जिसका स्वरूप सुवर्णमय हो गया है, ऐसा एक सुमेरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ हनुमान्जीके पिता केसरी राज्य करते हैं॥ १९ ॥
‘उनकी अञ्जना नामसे विख्यात प्रियतमा पत्नी थीं। उनके गर्भसे वायुदेवने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया॥
‘अञ्जनाने जब इनको जन्म दिया, उस समय इनकी अङ्गकान्ति जाड़ेमें पैदा होनेवाले धानके अग्रभागकी भाँति पिंगल वर्णकी थी। एक दिन माता अञ्जना फल लानेके लिये आश्रमसे निकलीं और गहन वनमें चली गयीं॥ २१ ॥
‘उस समय मातासे बिछुड़ जाने और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण शिशु हनुमान् उसी तरह जोर-जोरसे रोने लगे, जैसे पूर्वकालमें सरकंडोंके वनके भीतर कुमार कार्तिकेय रोये थे॥ २२ ॥
‘इतनेहीमें इन्हें जपाकुसुमके समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये। हनुमान्जीने उन्हें कोई फल समझा और ये उस फलके लोभसे सूर्यकी ओर उछले॥ २३ ॥
‘बालसूर्यकी ओर मुँह किये मूर्तिमान् बालसूर्यके समान बालक हनुमान् बालसूर्यको पकड़नेकी इच्छासे आकाशमें उड़ते चले जा रहे थे॥ २४ ॥
‘शैशवावस्थामें हनुमान्जी जब इस तरह उड़ रहे थे, उस समय उन्हें देखकर देवताओं, दानवों तथा यक्षोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २५ ॥
‘वे सोचने लगे—‘यह वायुका पुत्र जिस प्रकार ऊँचे आकाशमें वेगपूर्वक उड़ रहा है, ऐसा वेग न तो वायुमें है, न गरुड़में है और न मनमें ही है॥ २६ ॥
‘यदि बाल्यावस्थामें ही इस शिशुका ऐसा वेग और पराक्रम है तो यौवनका बल पाकर इसका वेग कैसा होगा’॥ २७ ॥
‘अपने पुत्रको सूर्यकी ओर जाते देख उसे दाहके भयसे बचानेके लिये उस समय वायुदेव भी बर्फके ढेरकी भाँति शीतल होकर उसके पीछे-पीछे चलने लगे॥
‘इस प्रकार बालक हनुमान् अपने और पिताके बलसे कई सहस्र योजन आकाशको लाँघते चले गये और सूर्यदेवके समीप पहुँच गये॥ २९ ॥
‘सूर्यदेवने यह सोचकर कि अभी यह बालक है, इसे गुण-दोषका ज्ञान नहीं है और इसके अधीन देवताओंका भी बहुत-सा भावी कार्य है—इन्हें जलाया नहीं॥ ३० ॥
‘जिस दिन हनुमान्जी सूर्यदेवको पकड़नेके लिये उछले थे, उसी दिन राहु सूर्यदेवपर ग्रहण लगाना चाहता था॥ ३१ ॥
‘हनुमान्जीने सूर्यके रथके ऊपरी भागमें जब राहुका स्पर्श किया, तब चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला राहु भयभीत हो वहाँसे भाग खड़ा हुआ॥ ३२ ॥
‘सिंहिकाका वह पुत्र रोषसे भरकर इन्द्रके भवनमें गया और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके सामने भौंहें टेढ़ी करके बोला—॥ ३३ ॥
‘बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले वासव! आपने चन्द्रमा और सूर्यको मुझे अपनी भूख दूर करनेके साधनके रूपमें दिया था; किंतु अब आपने उन्हें दूसरेके हवाले कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ?॥ ३४ ॥
‘आज पर्व (अमावास्या)-के समय मैं सूर्यदेवको ग्रस्त करनेकी इच्छासे गया था। इतनेहीमें दूसरे राहुने आकर सहसा सूर्यको पकड़ लिया’॥ ३५ ॥
‘राहुकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र घबरा गये और सोनेकी माला पहने अपना सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए॥ ३६ ॥
‘फिर कैलास-शिखरके समान उज्ज्वल, चार दाँतोंसे विभूषित, मदकी धारा बहानेवाले, भाँति-भाँतिके शृङ्गारसे युक्त, बहुत ही ऊँचे और सुवर्णमयी घण्टाके नादरूप अट्टहास करनेवाले गजराज ऐरावतपर आरूढ़ हो देवराज इन्द्र राहुको आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ हनुमान्जीके साथ सूर्यदेव विराजमान थे॥ ३७-३८ ॥
‘इधर राहु इन्द्रको छोड़कर बड़े वेगसे आगे बढ़ गया। इसी समय पर्वत-शिखरके समान आकारवाले दौड़ते हुए राहुको हनुमान्जीने देखा॥ ३९ ॥
‘तब राहुको ही फलके रूपमें देखकर बालक हनुमान् सूर्यदेवको छोड़ उस सिंहिकापुत्रको ही पकड़नेके लिये पुनः आकाशमें उछले॥ ४० ॥
‘श्रीराम! सूर्यको छोड़कर अपनी ओर धावा करनेवाले इन वानर हनुमान्को देखते ही राहु जिसका मुखमात्र ही शेष था, पीछेकी ओर मुड़कर भागा॥ ४१ ॥
‘उस समय सिंहिकापुत्र राहु अपने रक्षक इन्द्रसे ही अपनी रक्षाके लिये कहता हुआ भयके मारे बारम्बार ‘इन्द्र! इन्द्र!’ की पुकार मचाने लगा॥ ४२ ॥
‘चीखते हुए राहुके स्वरको जो पहलेका पहचाना हुआ था, सुनकर इन्द्र बोले—‘डरो मत। मैं इस आक्रमणकारीको मार डालूँगा’॥ ४३ ॥
‘तत्पश्चात् ऐरावतको देखकर इन्होंने उसे भी एक विशाल फल समझा और उस गजराजको पकड़नेके लिये ये उसकी ओर दौड़े॥ ४४ ॥
‘ऐरावतको पकड़नेकी इच्छासे दौड़ते हुए हनुमान्जीका रूप दो घड़ीके लिये इन्द्र और अग्निके समान प्रकाशमान एवं भयंकर हो गया॥ ४५ ॥
‘बालक हनुमान्को देखकर शचीपति इन्द्रको अधिक क्रोध नहीं हुआ। फिर भी इस प्रकार धावा करते हुए इन्द्र बालक वानरपर उन्होंने अपने हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा प्रहार किया॥ ४६ ॥
‘इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर ये एक पहाड़पर गिरे। वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गयी॥ ४७ ॥
‘वज्रके आघातसे व्याकुल होकर इनके गिरते ही वायुदेव इन्द्रपर कुपित हो उठे। उनका यह क्रोध प्रजाजनोंके लिये अहितकारक हुआ॥ ४८ ॥
‘सामर्थ्यशाली मारुतने समस्त प्रजाके भीतर रहकर भी वहाँ अपनी गति समेट ली—श्वास आदिके रूपमें संचार रोक दिया और अपने शिशुपुत्र हनुमान्को लेकर वे पर्वतकी गुफामें घुस गये॥ ४९ ॥
‘जैसे इन्द्र वर्षा रोक देते हैं, उसी प्रकार वे वायुदेव प्रजाजनोंके मलाशय और मूत्राशयको रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा देने लगे। उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंके प्राण-संचारका अवरोध कर दिया॥ ५० ॥
‘वायुके प्रकोपसे समस्त प्राणियोंकी साँस बंद होने लगी। उनके सभी अङ्गोंके जोड़ टूटने लगे और वे सब-के-सब काठके समान चेष्टाशून्य हो गये॥ ५१ ॥
‘तीनों लोकोंमें न कहीं वेदोंका स्वाध्याय होता था और न यज्ञ। सारे धर्म-कर्म बन्द हो गये। त्रिभुवनके प्राणी ऐसे कष्ट पाने लगे, मानो नरकमें गिर गये हों॥ ५२ ॥
‘तब गन्धर्व, देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्रजा व्यथित हो सुख पानेकी इच्छासे प्रजापति ब्रह्माजीके पास दौड़ी गयी॥ ५३ ॥
‘उस समय देवताओंके पेट इस तरह फूल गये थे, मानो उन्हें महोदरका रोग हो गया हो। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! स्वामिन्! आपने चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि की है। आपने हम सबको हमारी आयुके अधिपतिके रूपमें वायुदेवको अर्पित किया है। साधुशिरोमणे! ये पवनदेव हमारे प्राणोंके ईश्वर हैं तो भी क्या कारण है कि आज इन्होंने अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी भाँति हमारे शरीरके भीतर अपने संचारको रोक दिया है और इस प्रकार ये हमारे लिये दुःखजनक हो गये हैं॥ ५४-५५½ ॥
‘वायुसे पीड़ित होकर आज हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। दुःखहारी प्रजापते! आप हमारे इस वायुरोधजनित दुःखको दूर कीजिये’॥ ५६½ ॥
‘प्रजाजनोंकी यह बात सुनकर उनके पालक और रक्षक ब्रह्माजीने कहा— ‘इसमें कुछ कारण है’ ऐसा कहकर वे प्रजाजनोंसे फिर बोले— ॥ ५७½ ॥
‘प्रजाओ! जिस कारणको लेकर वायुदेवताने क्रोध और अपनी गतिका अवरोध किया है, उसे बताता हूँ, सुनो। वह कारण तुम्हारे सुनने योग्य और उचित है॥
‘आज देवराज इन्द्रने राहुकी बात सुनकर वायुके पुत्रको मार गिराया है, इसीलिये वे कुपित हो उठे हैं॥
‘वायुदेव स्वयं शरीर धारण न करके समस्त शरीरोंमें उनकी रक्षा करते हुए विचरते हैं। वायुके बिना यह शरीर सूखे काठके समान हो जाता है॥ ६०½ ॥
‘वायु ही सबका प्राण है। वायु ही सुख है और वायु ही यह सम्पूर्ण जगत् है। वायुसे परित्यक्त होकर जगत् कभी सुख नहीं पा सकता॥ ६१½ ॥
‘वायु ही जगत्की आयु है। इस समय वायुने संसारके प्राणियोंको त्याग दिया है, इसलिये वे सब-के-सब निष्प्राण होकर काठ और दीवारके समान हो गये हैं॥ ६२½ ॥
‘अदिति-पुत्रो! अतः अब हमें उस स्थानपर चलना चाहिये, जहाँ हम सबको पीड़ा देनेवाले वायुदेव छिपे बैठे हैं। कहीं ऐसा न हो कि उन्हें प्रसन्न किये बिना हम सबका विनाश हो जाय’॥ ६३ ॥
‘तदनन्तर देवता, गन्धर्व, नाग और गुह्यक आदि प्रजाओंको साथ ले प्रजापति ब्रह्माजी उस स्थानपर गये, जहाँ वायुदेव इन्द्रद्वारा मारे गये अपने पुत्रको लेकर बैठे हुए थे॥ ६४ ॥
‘तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माजीने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा यक्षोंके साथ वहाँ पहुँचकर वायुदेवताकी गोदमें सोये हुए उनके पुत्रको देखा, जिसकी अङ्गकान्ति सूर्य, अग्नि और सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी। उसकी वैसी दशा देखकर ब्रह्माजीको उसपर बड़ी दया आयी’॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥
छत्तीसवाँ सर्ग
छत्तीसवाँ सर्ग
ब्रह्मा आदि देवताओंका हनुमान्जीको जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायुका उन्हें लेकर अञ्जनाके घर जाना, ऋषियोंके शापसे हनुमान्जीको अपने बलकी विस्मृति, श्रीरामका अगस्त्य आदि ऋषियोंसे अपने यज्ञमें पधारनेके लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना
'पुत्रके मारे जानेसे वायुदेवता बहुत दुःखी थे। ब्रह्माजीको देखकर वे उस शिशुको लिये हुए ही उनके आगे खड़े हो गये॥ १ ॥
'उनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे थे, माथेपर मुकुट और कण्ठमें हार शोभा दे रहे थे और वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थे। वायुदेवता तीन बार उपस्थान करके ब्रह्माजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ २ ॥
'वेदवेत्ता ब्रह्माजीने अपने लम्बे, फैले हुए और आभरणभूषित हाथसे वायुदेवताको उठाकर खड़ा किया तथा उनके उस शिशुपर भी हाथ फेरा॥ ३ ॥
'जैसे पानीसे सींच देनेपर सूखती हुई खेती हरी हो जाती है, उसी प्रकार कमलयोनि ब्रह्माजीके हाथका लीलापूर्वक स्पर्श पाते ही शिशु हनुमान् पुनः जीवित हो गये॥ ४ ॥
'हनुमान्को जीवित हुआ देख जगत्के प्राण-स्वरूप गन्धवाहन वायुदेव समस्त प्राणियोंके भीतर अवरुद्ध हुए प्राण आदिका पूर्ववत् प्रसन्नतापूर्वक संचार करने लगे॥ ५ ॥
वायुके अवरोधसे छूटकर सारी प्रजा प्रसन्न हो गयी। ठीक उसी तरह, जैसे हिमयुक्त वायुके आघातसे मुक्त होकर खिले हुए कमलोंसे युक्त पुष्करिणियाँ सुशोभित होने लगती हैं॥ ६ ॥
तदनन्तर तीन युग्मोंसे१ सम्पन्न, प्रधानतः तीन मूर्ति२
धारण करनेवाले, त्रिलोकरूपी गृहमें रहनेवाले तथा तीन दशाओंसे३ युक्त देवताओंद्वारा पूजित ब्रह्माजी वायुदेवताका प्रिय करनेकी इच्छासे देवगणोंसे बोले—॥ ७ ॥
'इन्द्र, अग्नि, वरुण, महादेव और कुबेर आदि देवताओ! यद्यपि आप सब लोग जानते हैं तथापि मैं आपलोगोंके हितकी सारी बातें बताऊँगा, सुनिये॥ ८ ॥
‘इस बालकके द्वारा भविष्यमें आपलोगोंके बहुत-से कार्य सिद्ध होंगे, अतः वायुदेवताकी प्रसन्नताके लिये आप सब लोग इसे वर दें’ ॥ ९ ॥
तब सुन्दर मुखवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्रने शिशु हनुमान्के गलेमें बड़ी प्रसन्नताके साथ कमलोंकी माला पहना दी और यह बात कही—॥ १० ॥
‘मेरे हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा इस बालककी हनु (ठुड्डी) टूट गयी थी; इसलिये इस कपिश्रेष्ठका नाम ‘हनुमान्’ होगा॥ ११ ॥
‘इसके सिवा मैं इसे दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ कि आजसे यह मेरे वज्रके द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा’ ॥ १२ ॥
इसके बाद वहाँ अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यने कहा—‘मैं इसे अपने तेजका सौवाँ भाग देता हूँ॥ १३ ॥
१. तीन युग्मोंका तात्पर्य यहाँ छः प्रकारके ऐश्वर्यसे है। ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये ही छः प्रकारके ऐश्वर्य हैं। २. ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये ही तीन मूर्तियाँ हैं। ३. बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर—ये ही देवताओंकी तीन अवस्थाएँ हैं।
‘इसके सिवा जब इसमें शास्त्राध्ययन करनेकी शक्ति आ जायगी, तब मैं ही इसे शास्त्रोंका ज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा। शास्त्रज्ञानमें कोई भी इसकी समानता करनेवाला न होगा’ ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् वरुणने वर देते हुए कहा—‘दस लाख वर्षोंकी आयु हो जानेपर भी मेरे पाश और जलसे इस बालककी मृत्यु नहीं होगी’ ॥ १५ ॥
फिर यमने वर दिया—‘यह मेरे दण्डसे अवध्य और नीरोग होगा।’ तदनन्तर पिंगलवर्णकी एक आँखवाले कुबेरने कहा—‘मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्धमें कभी इसे विषाद न होगा तथा मेरी यह गदा संग्राममें इसका वध न कर सकेगी’ ॥ १६-१७ ॥
इसके बाद भगवान् शङ्करने यह उत्तम वर दिया कि ‘यह मेरे और मेरे आयुधोंके द्वारा भी अवध्य होगा’ ॥
शिल्पियोंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् विश्वकर्माने बालसूर्यके समान अरुण कान्तिवाले उस शिशुको देखकर उसे इस प्रकार वर दिया—॥ १९ ॥
‘मेरे बनाये हुए जितने दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे अवध्य होकर यह बालक चिरञ्जीवी होगा’॥ २०॥
अन्तमें ब्रह्माजीने उस बालकको लक्ष्य करके कहा—‘यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकारके ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य होगा’॥ २१॥
तत्पश्चात् हनुमान्जीको इस प्रकार देवताओंके वरोंसे अलंकृत देख चार मुखोंवाले जगद्गुरु ब्रह्माजीका मन प्रसन्न हो गया और वे वायुदेवसे बोले—॥ २२॥
‘मारुत! तुम्हारा यह पुत्र मारुति शत्रुओंके लिये भयंकर और मित्रोंके लिये अभयदाता होगा। युद्धमें कोई भी इसे जीत न सकेगा॥ २३॥
‘यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ चाहेगा जा सकेगा। इसकी गति इसकी इच्छाके अनुसार तीव्र या मन्द होगी तथा वह कहीं भी रुक नहीं सकेगी। यह कपिश्रेष्ठ बड़ा यशस्वी होगा॥ २४॥
‘यह युद्धस्थलमें रावणका संहार और भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताका सम्पादन करनेवाले अनेक अद्भुत एवं रोमाञ्चकारी कर्म करेगा’॥ २५॥
इस प्रकार हनुमान्जीको वर देकर वायुदेवताकी अनुमति ले ब्रह्मा आदि सब देवता जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थानको चले गये॥ २६॥
गन्धवाहन वायु भी पुत्रको लेकर अञ्जनाके घर आये और उसे देवताओंके दिये हुए वरदानकी बात बताकर चले गये॥ २७॥
श्रीराम! इस प्रकार ये हनुमान्जी बहुत-से वर पाकर वरदानजनित शक्तिसे सम्पन्न हो गये और अपने भीतर विद्यमान अनुपम वेगसे पूर्ण हो भरे हुए महासागरके समान शोभा पाने लगे॥ २८॥
उन दिनों वेगसे भरे हुए ये वानरशिरोमणि हनुमान् निर्भय हो महर्षियोंके आश्रमोंमें जा-जाकर उपद्रव किया करते थे॥ २९॥
ये शान्तचित्त महात्माओंके यज्ञोपयोगी पात्र फोड़ डालते, अग्निहोत्रके साधनभूत स्रुक्, स्रुवा आदिको तोड़ डालते और ढेर-के-ढेर रखे गये वल्कलोंको चीर-फाड़ देते थे॥ ३०॥
‘महाबली पवनकुमार इस तरहके उपद्रवपूर्ण कार्य करने लगे। कल्याणकारी भगवान् ब्रह्माने इन्हें सब प्रकारके ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य कर दिया है—यह बात सभी ऋषि जानते थे; अतः
इनकी शक्तिसे विवश हो वे इनके सारे अपराध चुपचाप सह लेते थे॥ ३१½ ॥
यद्यपि केसरी तथा वायुदेवताने भी इन अञ्जनी-कुमारको बारम्बार मना किया तो भी ये वानरवीर मर्यादाका उल्लङ्घन कर ही देते थे॥ ३२½ ॥
इससे भृगु और अङ्गिराके वंशमें उत्पन्न हुए महर्षि कुपित हो उठे। रघुश्रेष्ठ! उन्होंने अपने हृदयमें अधिक खेद पा दुःखको स्थान न देकर इन्हें शाप देते हुए कहा— ॥ ३३½ ॥
‘वानरवीर! तुम जिस बलका आश्रय लेकर हमें सता रहे हो, उसे हमारे शापसे मोहित होकर तुम दीर्घकालतक भूले रहोगे—तुम्हें अपने बलका पता ही नहीं चलेगा। जब कोई तुम्हें तुम्हारी कीर्तिका स्मरण दिला देगा, तभी तुम्हारा बल बढ़ेगा’॥ ३४-३५ ॥
इस प्रकार महर्षियोंके इस वचनके प्रभावसे इनका तेज और ओज घट गया। फिर ये उन्हीं आश्रमोंमें मृदुल प्रकृतिके होकर विचरने लगे॥ ३६ ॥
वाली और सुग्रीवके पिताका नाम ऋक्षरजा था। वे सूर्यके समान तेजस्वी तथा समस्त वानरोंके राजा थे॥ ३७ ॥
वे वानरराज ऋक्षरजा चिरकालतक वानरोंके राज्यका शासन करके अन्तमें कालधर्म (मृत्यु)-को प्राप्त हुए॥ ३८ ॥
उनका देहावसान हो जानेपर मन्त्रवेत्ता मन्त्रियोंने पिताके स्थानपर वालीको राजा और वालीके स्थानपर सुग्रीवको युवराज बनाया॥ ३९ ॥
जैसे अग्निके साथ वायुकी स्वाभाविक मित्रता है,
उसी प्रकार सुग्रीवके साथ वालीका बचपनसे ही सख्यभाव था। उन दोनोंमें परस्पर किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था। उनमें अटूट प्रेम था॥ ४० ॥
श्रीराम! फिर जब वाली और सुग्रीवमें वैर उठ खड़ा हुआ, उस समय ये हनुमान्जी शापवश ही अपने बलको न जान सके। देव! वालीके भयसे भटकते रहनेपर भी न तो इन सुग्रीवको इनके बलका स्मरण हुआ और न स्वयं ये पवनकुमार ही अपने बलका पता पा सके॥ ४१-४२ ॥
सुग्रीवके ऊपर जब वह विपत्ति आयी थी, उन दिनों ऋषियोंके शापके कारण इनको अपने बलका ज्ञान भूल गया था, इसीलिये जैसे कोई सिंह हाथीके द्वारा अवरुद्ध होकर चुपचाप खड़ा रहे, उसी प्रकार ये वाली और सुग्रीवके युद्धमें चुपचाप खड़े-खड़े तमाशा देखते रहे, कुछ कर न सके॥ ४३ ॥
संसारमें ऐसा कौन है जो पराक्रम, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, सुशीलता, मधुरता, नीति-अनीतिके विवेक, गम्भीरता, चतुरता, उत्तम बल और धैर्यमें हनुमान्जीसे बढ़कर हो॥ ४४ ॥
ये असीम शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान् व्याकरणका अध्ययन करनेके लिये शङ्काएँ पूछनेकी इच्छासे सूर्यकी ओर मुँह रखकर महान् ग्रन्थ धारण किये उनके आगे-आगे उदयाचलसे अस्ताचलतक जाते थे॥ ४५ ॥
इन्होंने सूत्र, वृत्ति, वार्तिक, महाभाष्य और संग्रह— इन सबका अच्छी तरह अध्ययन किया है। अन्यान्य शास्त्रोंके ज्ञान तथा छन्दःशास्त्रके अध्ययनमें भी इनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई विद्वान् नहीं है॥ ४६ ॥
सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञान तथा तपस्याके अनुष्ठानमें ये देवगुरु बृहस्पतिकी बराबरी करते हैं। नव व्याकरणोंके सिद्धान्तको जाननेवाले ये हनुमान्जी आपकी कृपासे साक्षात् ब्रह्माके समान आदरणीय होंगे॥ ४७ ॥
प्रलयकालमें भूतलको आप्लावित करनेके लिये भूमिके भीतर प्रवेश करनेकी इच्छावाले महासागर, सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध कर डालनेके लिये उद्यत हुए संवर्तक अग्नि तथा लोकसंहारके लिये उठे हुए कालके समान प्रभावशाली इन हनुमान्जीके सामने कौन ठहर सकेगा॥ ४८ ॥
श्रीराम! वास्तवमें ये तथा इन्हींके समान दूसरे-दूसरे जो सुग्रीव, मैन्द, द्विविद, नील, तार, तारेय (अङ्गद), नल तथा रम्भ आदि महाकपीश्वर हैं; इन सबकी सृष्टि देवताओंने आपकी सहायताके लिये ही की है॥ ४९ ॥
श्रीराम! गज, गवाक्ष, गवय, सुदंष्ट्र, मैन्द, प्रभ, ज्योतिर्मुख और नल—इन सब वानरेश्वरों तथा रीछोंकी सृष्टि देवताओंने आपके सहयोगके लिये ही की है॥ ५० ॥
रघुनन्दन! आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। हनुमान्जीकी बाल्यावस्थाके इस चरित्रका भी वर्णन कर दिया॥ ५१ ॥
अगस्त्यजीका यह कथन सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण बड़े विस्मित हुए। वानरों और राक्षसोंको भी बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ५२ ॥
तत्पश्चात् अगस्त्यजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— 'योगियोंके हृदयमें रमण करनेवाले श्रीराम! आप यह सारा प्रसङ्ग सुन चुके। हमलोगोंने आपका दर्शन और आपके साथ वार्तालाप कर लिया। इसलिये अब हम जा रहे हैं'॥ ५३ ॥