श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
श्रीराम! वालीमें बहुत अधिक और अनुपम बल था, परंतु आपने उसको भी अपनी बाणाग्निसे उसी तरह दग्ध कर डाला, जैसे आग पतिंगेको जला देती है॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ सर्ग
पैंतीसवाँ सर्ग
हनुमान्जीकी उत्पत्ति, शैशवावस्थामें इनका सूर्य, राहु और ऐरावतपर आक्रमण, इन्द्रके वज्रसे इनकी मूर्च्छा, वायुके कोपसे संसारके प्राणियोंको कष्ट और उन्हें प्रसन्न करनेके लिये देवताओंसहित ब्रह्माजीका उनके पास जाना
तब भगवान् श्रीरामने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशामें निवास करनेवाले अगस्त्य मुनिसे विनयपूर्वक यह अर्थयुक्त बात कही— ॥ १ ॥
‘महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि वाली और रावणके इस बलकी कहीं तुलना नहीं थी; परंतु मेरा ऐसा विचार है कि इन दोनोंका बल भी हनुमान्जीके बलकी बराबरी नहीं कर सकता था॥ २ ॥
‘शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव—इन सभी सद्गुणोंने हनुमान्जीके भीतर घर कर रखा है॥ ३ ॥
‘समुद्रको देखते ही वानर-सेना घबरा उठी है— यह देख ये महाबाहु वीर उसे धैर्य बँधाकर एक ही छलाँगमें सौ योजन समुद्रको लाँघ गये॥ ४ ॥
‘फिर लङ्कापुरीके आधिदैविक रूपको परास्त कर रावणके अन्तःपुरमें गये, सीताजीसे मिले, उनसे बातचीत की और उन्हें धैर्य बँधाया॥ ५ ॥
‘वहाँ अशोकवनमें इन्होंने अकेले ही रावणके सेनापतियों, मन्त्रिपुत्रों, किंकरों तथा रावणपुत्र अक्षको मार गिराया॥ ६ ॥
‘फिर ये मेघनादके नागपाशसे बँधे और स्वयं ही मुक्त हो गये। तत्पश्चात् इन्होंने रावणसे वार्तालाप किया। जैसे प्रलयकालकी आगने यह सारी पृथ्वी जलायी थी, उसी प्रकार लङ्कापुरीको जलाकर भस्म कर दिया॥ ७ ॥
‘युद्धमें हनुमान्जीके जो पराक्रम देखे गये हैं, वैसे वीरतापूर्ण कर्म न तो कालके, न इन्द्रके, न भगवान् विष्णुके और न वरुणके ही सुने जाते हैं॥ ८ ॥
‘मुनीश्वर! मैंने तो इन्हींके बाहुबलसे विभीषणके लिये लङ्का, शत्रुओंपर विजय, अयोध्याका राज्य तथा सीता, लक्ष्मण, मित्र और बन्धुजनोंको प्राप्त किया है॥
‘यदि मुझे वानरराज सुग्रीवके सखा हनुमान् न मिलते तो जानकीका पता लगानेमें भी कौन समर्थ हो सकता था?॥ १० ॥
‘जिस समय वाली और सुग्रीवमें विरोध हुआ, उस समय सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये इन्होंने जैसे दावानल वृक्षको जला देता है, उसी प्रकार वालीको क्यों नहीं भस्म कर डाला? यह समझमें नहीं आता॥ ११ ॥
‘मैं तो ऐसा मानता हूँ कि उस समय हनुमान्जीको अपने बलका पता ही नहीं था। इसीसे ये अपने प्राणोंसे भी प्रिय वानरराज सुग्रीवको कष्ट उठाते देखते रहे॥ १२ ॥
‘देववन्द्य महामुने! भगवन्! आप हनुमान्जीके विषयमें ये सब बातें यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बताइये’॥
श्रीरामचन्द्रजीके ये युक्तियुक्त वचन सुनकर महर्षि अगस्त्यजी हनुमान्जीके सामने ही उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १४ ॥
‘रघुकुलतिलक श्रीराम! हनुमान्जीके विषयमें आप जो कुछ कहते हैं, यह सब सत्य ही है। बल, बुद्धि और गतिमें इनकी बराबरी करनेवाला दूसरा कोऽइ नहीं है॥ १५ ॥
‘शत्रुसूदन रघुनन्दन! जिनका शाप कभी व्यर्थ नहीं जाता, ऐसे मुनियोंने पूर्वकालमें इन्हें यह शाप दे दिया था कि बल रहनेपर भी इनको अपने पूरे बलका पता नहीं रहेगा॥ १६ ॥
‘महाबली श्रीराम! इन्होंने बचपनमें भी जो महान् कर्म किया था, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उन दिनों वे बालभावसे—अनजानकी तरह रहते थे॥ १७ ॥
‘रघुनन्दन! यदि हनुमान्जीका चरित्र सुननेके लिये आपकी हार्दिक इच्छा हो तो चित्तको एकाग्र करके सुनिये। मैं सारी बातें बता रहा हूँ॥ १८ ॥
‘भगवान् सूर्यके वरदानसे जिसका स्वरूप सुवर्णमय हो गया है, ऐसा एक सुमेरु नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ हनुमान्जीके पिता केसरी राज्य करते हैं॥ १९ ॥
‘उनकी अञ्जना नामसे विख्यात प्रियतमा पत्नी थीं। उनके गर्भसे वायुदेवने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया॥
‘अञ्जनाने जब इनको जन्म दिया, उस समय इनकी अङ्गकान्ति जाड़ेमें पैदा होनेवाले धानके अग्रभागकी भाँति पिंगल वर्णकी थी। एक दिन माता अञ्जना फल लानेके लिये आश्रमसे निकलीं और गहन वनमें चली गयीं॥ २१ ॥
‘उस समय मातासे बिछुड़ जाने और भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण शिशु हनुमान् उसी तरह जोर-जोरसे रोने लगे, जैसे पूर्वकालमें सरकंडोंके वनके भीतर कुमार कार्तिकेय रोये थे॥ २२ ॥
‘इतनेहीमें इन्हें जपाकुसुमके समान लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखायी दिये। हनुमान्जीने उन्हें कोई फल समझा और ये उस फलके लोभसे सूर्यकी ओर उछले॥ २३ ॥
‘बालसूर्यकी ओर मुँह किये मूर्तिमान् बालसूर्यके समान बालक हनुमान् बालसूर्यको पकड़नेकी इच्छासे आकाशमें उड़ते चले जा रहे थे॥ २४ ॥
‘शैशवावस्थामें हनुमान्जी जब इस तरह उड़ रहे थे, उस समय उन्हें देखकर देवताओं, दानवों तथा यक्षोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २५ ॥
‘वे सोचने लगे—‘यह वायुका पुत्र जिस प्रकार ऊँचे आकाशमें वेगपूर्वक उड़ रहा है, ऐसा वेग न तो वायुमें है, न गरुड़में है और न मनमें ही है॥ २६ ॥
‘यदि बाल्यावस्थामें ही इस शिशुका ऐसा वेग और पराक्रम है तो यौवनका बल पाकर इसका वेग कैसा होगा’॥ २७ ॥
‘अपने पुत्रको सूर्यकी ओर जाते देख उसे दाहके भयसे बचानेके लिये उस समय वायुदेव भी बर्फके ढेरकी भाँति शीतल होकर उसके पीछे-पीछे चलने लगे॥
‘इस प्रकार बालक हनुमान् अपने और पिताके बलसे कई सहस्र योजन आकाशको लाँघते चले गये और सूर्यदेवके समीप पहुँच गये॥ २९ ॥
‘सूर्यदेवने यह सोचकर कि अभी यह बालक है, इसे गुण-दोषका ज्ञान नहीं है और इसके अधीन देवताओंका भी बहुत-सा भावी कार्य है—इन्हें जलाया नहीं॥ ३० ॥
‘जिस दिन हनुमान्जी सूर्यदेवको पकड़नेके लिये उछले थे, उसी दिन राहु सूर्यदेवपर ग्रहण लगाना चाहता था॥ ३१ ॥
‘हनुमान्जीने सूर्यके रथके ऊपरी भागमें जब राहुका स्पर्श किया, तब चन्द्रमा और सूर्यका मर्दन करनेवाला राहु भयभीत हो वहाँसे भाग खड़ा हुआ॥ ३२ ॥
‘सिंहिकाका वह पुत्र रोषसे भरकर इन्द्रके भवनमें गया और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके सामने भौंहें टेढ़ी करके बोला—॥ ३३ ॥
‘बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले वासव! आपने चन्द्रमा और सूर्यको मुझे अपनी भूख दूर करनेके साधनके रूपमें दिया था; किंतु अब आपने उन्हें दूसरेके हवाले कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ?॥ ३४ ॥
‘आज पर्व (अमावास्या)-के समय मैं सूर्यदेवको ग्रस्त करनेकी इच्छासे गया था। इतनेहीमें दूसरे राहुने आकर सहसा सूर्यको पकड़ लिया’॥ ३५ ॥
‘राहुकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र घबरा गये और सोनेकी माला पहने अपना सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए॥ ३६ ॥
‘फिर कैलास-शिखरके समान उज्ज्वल, चार दाँतोंसे विभूषित, मदकी धारा बहानेवाले, भाँति-भाँतिके शृङ्गारसे युक्त, बहुत ही ऊँचे और सुवर्णमयी घण्टाके नादरूप अट्टहास करनेवाले गजराज ऐरावतपर आरूढ़ हो देवराज इन्द्र राहुको आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ हनुमान्जीके साथ सूर्यदेव विराजमान थे॥ ३७-३८ ॥
‘इधर राहु इन्द्रको छोड़कर बड़े वेगसे आगे बढ़ गया। इसी समय पर्वत-शिखरके समान आकारवाले दौड़ते हुए राहुको हनुमान्जीने देखा॥ ३९ ॥
‘तब राहुको ही फलके रूपमें देखकर बालक हनुमान् सूर्यदेवको छोड़ उस सिंहिकापुत्रको ही पकड़नेके लिये पुनः आकाशमें उछले॥ ४० ॥
‘श्रीराम! सूर्यको छोड़कर अपनी ओर धावा करनेवाले इन वानर हनुमान्को देखते ही राहु जिसका मुखमात्र ही शेष था, पीछेकी ओर मुड़कर भागा॥ ४१ ॥
‘उस समय सिंहिकापुत्र राहु अपने रक्षक इन्द्रसे ही अपनी रक्षाके लिये कहता हुआ भयके मारे बारम्बार ‘इन्द्र! इन्द्र!’ की पुकार मचाने लगा॥ ४२ ॥
‘चीखते हुए राहुके स्वरको जो पहलेका पहचाना हुआ था, सुनकर इन्द्र बोले—‘डरो मत। मैं इस आक्रमणकारीको मार डालूँगा’॥ ४३ ॥
‘तत्पश्चात् ऐरावतको देखकर इन्होंने उसे भी एक विशाल फल समझा और उस गजराजको पकड़नेके लिये ये उसकी ओर दौड़े॥ ४४ ॥
‘ऐरावतको पकड़नेकी इच्छासे दौड़ते हुए हनुमान्जीका रूप दो घड़ीके लिये इन्द्र और अग्निके समान प्रकाशमान एवं भयंकर हो गया॥ ४५ ॥
‘बालक हनुमान्को देखकर शचीपति इन्द्रको अधिक क्रोध नहीं हुआ। फिर भी इस प्रकार धावा करते हुए इन्द्र बालक वानरपर उन्होंने अपने हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा प्रहार किया॥ ४६ ॥
‘इन्द्रके वज्रकी चोट खाकर ये एक पहाड़पर गिरे। वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गयी॥ ४७ ॥
‘वज्रके आघातसे व्याकुल होकर इनके गिरते ही वायुदेव इन्द्रपर कुपित हो उठे। उनका यह क्रोध प्रजाजनोंके लिये अहितकारक हुआ॥ ४८ ॥
‘सामर्थ्यशाली मारुतने समस्त प्रजाके भीतर रहकर भी वहाँ अपनी गति समेट ली—श्वास आदिके रूपमें संचार रोक दिया और अपने शिशुपुत्र हनुमान्को लेकर वे पर्वतकी गुफामें घुस गये॥ ४९ ॥
‘जैसे इन्द्र वर्षा रोक देते हैं, उसी प्रकार वे वायुदेव प्रजाजनोंके मलाशय और मूत्राशयको रोककर उन्हें बड़ी पीड़ा देने लगे। उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंके प्राण-संचारका अवरोध कर दिया॥ ५० ॥
‘वायुके प्रकोपसे समस्त प्राणियोंकी साँस बंद होने लगी। उनके सभी अङ्गोंके जोड़ टूटने लगे और वे सब-के-सब काठके समान चेष्टाशून्य हो गये॥ ५१ ॥
‘तीनों लोकोंमें न कहीं वेदोंका स्वाध्याय होता था और न यज्ञ। सारे धर्म-कर्म बन्द हो गये। त्रिभुवनके प्राणी ऐसे कष्ट पाने लगे, मानो नरकमें गिर गये हों॥ ५२ ॥
‘तब गन्धर्व, देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्रजा व्यथित हो सुख पानेकी इच्छासे प्रजापति ब्रह्माजीके पास दौड़ी गयी॥ ५३ ॥
‘उस समय देवताओंके पेट इस तरह फूल गये थे, मानो उन्हें महोदरका रोग हो गया हो। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! स्वामिन्! आपने चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि की है। आपने हम सबको हमारी आयुके अधिपतिके रूपमें वायुदेवको अर्पित किया है। साधुशिरोमणे! ये पवनदेव हमारे प्राणोंके ईश्वर हैं तो भी क्या कारण है कि आज इन्होंने अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी भाँति हमारे शरीरके भीतर अपने संचारको रोक दिया है और इस प्रकार ये हमारे लिये दुःखजनक हो गये हैं॥ ५४-५५½ ॥
‘वायुसे पीड़ित होकर आज हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। दुःखहारी प्रजापते! आप हमारे इस वायुरोधजनित दुःखको दूर कीजिये’॥ ५६½ ॥
‘प्रजाजनोंकी यह बात सुनकर उनके पालक और रक्षक ब्रह्माजीने कहा— ‘इसमें कुछ कारण है’ ऐसा कहकर वे प्रजाजनोंसे फिर बोले— ॥ ५७½ ॥
‘प्रजाओ! जिस कारणको लेकर वायुदेवताने क्रोध और अपनी गतिका अवरोध किया है, उसे बताता हूँ, सुनो। वह कारण तुम्हारे सुनने योग्य और उचित है॥
‘आज देवराज इन्द्रने राहुकी बात सुनकर वायुके पुत्रको मार गिराया है, इसीलिये वे कुपित हो उठे हैं॥
‘वायुदेव स्वयं शरीर धारण न करके समस्त शरीरोंमें उनकी रक्षा करते हुए विचरते हैं। वायुके बिना यह शरीर सूखे काठके समान हो जाता है॥ ६०½ ॥
‘वायु ही सबका प्राण है। वायु ही सुख है और वायु ही यह सम्पूर्ण जगत् है। वायुसे परित्यक्त होकर जगत् कभी सुख नहीं पा सकता॥ ६१½ ॥
‘वायु ही जगत्की आयु है। इस समय वायुने संसारके प्राणियोंको त्याग दिया है, इसलिये वे सब-के-सब निष्प्राण होकर काठ और दीवारके समान हो गये हैं॥ ६२½ ॥
‘अदिति-पुत्रो! अतः अब हमें उस स्थानपर चलना चाहिये, जहाँ हम सबको पीड़ा देनेवाले वायुदेव छिपे बैठे हैं। कहीं ऐसा न हो कि उन्हें प्रसन्न किये बिना हम सबका विनाश हो जाय’॥ ६३ ॥
‘तदनन्तर देवता, गन्धर्व, नाग और गुह्यक आदि प्रजाओंको साथ ले प्रजापति ब्रह्माजी उस स्थानपर गये, जहाँ वायुदेव इन्द्रद्वारा मारे गये अपने पुत्रको लेकर बैठे हुए थे॥ ६४ ॥
‘तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माजीने देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा यक्षोंके साथ वहाँ पहुँचकर वायुदेवताकी गोदमें सोये हुए उनके पुत्रको देखा, जिसकी अङ्गकान्ति सूर्य, अग्नि और सुवर्णके समान प्रकाशित हो रही थी। उसकी वैसी दशा देखकर ब्रह्माजीको उसपर बड़ी दया आयी’॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥
छत्तीसवाँ सर्ग
छत्तीसवाँ सर्ग
ब्रह्मा आदि देवताओंका हनुमान्जीको जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायुका उन्हें लेकर अञ्जनाके घर जाना, ऋषियोंके शापसे हनुमान्जीको अपने बलकी विस्मृति, श्रीरामका अगस्त्य आदि ऋषियोंसे अपने यज्ञमें पधारनेके लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना
'पुत्रके मारे जानेसे वायुदेवता बहुत दुःखी थे। ब्रह्माजीको देखकर वे उस शिशुको लिये हुए ही उनके आगे खड़े हो गये॥ १ ॥
'उनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे थे, माथेपर मुकुट और कण्ठमें हार शोभा दे रहे थे और वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थे। वायुदेवता तीन बार उपस्थान करके ब्रह्माजीके चरणोंमें गिर पड़े॥ २ ॥
'वेदवेत्ता ब्रह्माजीने अपने लम्बे, फैले हुए और आभरणभूषित हाथसे वायुदेवताको उठाकर खड़ा किया तथा उनके उस शिशुपर भी हाथ फेरा॥ ३ ॥
'जैसे पानीसे सींच देनेपर सूखती हुई खेती हरी हो जाती है, उसी प्रकार कमलयोनि ब्रह्माजीके हाथका लीलापूर्वक स्पर्श पाते ही शिशु हनुमान् पुनः जीवित हो गये॥ ४ ॥
'हनुमान्को जीवित हुआ देख जगत्के प्राण-स्वरूप गन्धवाहन वायुदेव समस्त प्राणियोंके भीतर अवरुद्ध हुए प्राण आदिका पूर्ववत् प्रसन्नतापूर्वक संचार करने लगे॥ ५ ॥
वायुके अवरोधसे छूटकर सारी प्रजा प्रसन्न हो गयी। ठीक उसी तरह, जैसे हिमयुक्त वायुके आघातसे मुक्त होकर खिले हुए कमलोंसे युक्त पुष्करिणियाँ सुशोभित होने लगती हैं॥ ६ ॥
तदनन्तर तीन युग्मोंसे१ सम्पन्न, प्रधानतः तीन मूर्ति२
धारण करनेवाले, त्रिलोकरूपी गृहमें रहनेवाले तथा तीन दशाओंसे३ युक्त देवताओंद्वारा पूजित ब्रह्माजी वायुदेवताका प्रिय करनेकी इच्छासे देवगणोंसे बोले—॥ ७ ॥
'इन्द्र, अग्नि, वरुण, महादेव और कुबेर आदि देवताओ! यद्यपि आप सब लोग जानते हैं तथापि मैं आपलोगोंके हितकी सारी बातें बताऊँगा, सुनिये॥ ८ ॥
‘इस बालकके द्वारा भविष्यमें आपलोगोंके बहुत-से कार्य सिद्ध होंगे, अतः वायुदेवताकी प्रसन्नताके लिये आप सब लोग इसे वर दें’ ॥ ९ ॥
तब सुन्दर मुखवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्रने शिशु हनुमान्के गलेमें बड़ी प्रसन्नताके साथ कमलोंकी माला पहना दी और यह बात कही—॥ १० ॥
‘मेरे हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा इस बालककी हनु (ठुड्डी) टूट गयी थी; इसलिये इस कपिश्रेष्ठका नाम ‘हनुमान्’ होगा॥ ११ ॥
‘इसके सिवा मैं इसे दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ कि आजसे यह मेरे वज्रके द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा’ ॥ १२ ॥
इसके बाद वहाँ अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यने कहा—‘मैं इसे अपने तेजका सौवाँ भाग देता हूँ॥ १३ ॥
१. तीन युग्मोंका तात्पर्य यहाँ छः प्रकारके ऐश्वर्यसे है। ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये ही छः प्रकारके ऐश्वर्य हैं। २. ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये ही तीन मूर्तियाँ हैं। ३. बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर—ये ही देवताओंकी तीन अवस्थाएँ हैं।
‘इसके सिवा जब इसमें शास्त्राध्ययन करनेकी शक्ति आ जायगी, तब मैं ही इसे शास्त्रोंका ज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा। शास्त्रज्ञानमें कोई भी इसकी समानता करनेवाला न होगा’ ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् वरुणने वर देते हुए कहा—‘दस लाख वर्षोंकी आयु हो जानेपर भी मेरे पाश और जलसे इस बालककी मृत्यु नहीं होगी’ ॥ १५ ॥
फिर यमने वर दिया—‘यह मेरे दण्डसे अवध्य और नीरोग होगा।’ तदनन्तर पिंगलवर्णकी एक आँखवाले कुबेरने कहा—‘मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्धमें कभी इसे विषाद न होगा तथा मेरी यह गदा संग्राममें इसका वध न कर सकेगी’ ॥ १६-१७ ॥
इसके बाद भगवान् शङ्करने यह उत्तम वर दिया कि ‘यह मेरे और मेरे आयुधोंके द्वारा भी अवध्य होगा’ ॥
शिल्पियोंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् विश्वकर्माने बालसूर्यके समान अरुण कान्तिवाले उस शिशुको देखकर उसे इस प्रकार वर दिया—॥ १९ ॥
‘मेरे बनाये हुए जितने दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे अवध्य होकर यह बालक चिरञ्जीवी होगा’॥ २०॥
अन्तमें ब्रह्माजीने उस बालकको लक्ष्य करके कहा—‘यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकारके ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य होगा’॥ २१॥
तत्पश्चात् हनुमान्जीको इस प्रकार देवताओंके वरोंसे अलंकृत देख चार मुखोंवाले जगद्गुरु ब्रह्माजीका मन प्रसन्न हो गया और वे वायुदेवसे बोले—॥ २२॥
‘मारुत! तुम्हारा यह पुत्र मारुति शत्रुओंके लिये भयंकर और मित्रोंके लिये अभयदाता होगा। युद्धमें कोई भी इसे जीत न सकेगा॥ २३॥
‘यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ चाहेगा जा सकेगा। इसकी गति इसकी इच्छाके अनुसार तीव्र या मन्द होगी तथा वह कहीं भी रुक नहीं सकेगी। यह कपिश्रेष्ठ बड़ा यशस्वी होगा॥ २४॥
‘यह युद्धस्थलमें रावणका संहार और भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताका सम्पादन करनेवाले अनेक अद्भुत एवं रोमाञ्चकारी कर्म करेगा’॥ २५॥
इस प्रकार हनुमान्जीको वर देकर वायुदेवताकी अनुमति ले ब्रह्मा आदि सब देवता जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थानको चले गये॥ २६॥
गन्धवाहन वायु भी पुत्रको लेकर अञ्जनाके घर आये और उसे देवताओंके दिये हुए वरदानकी बात बताकर चले गये॥ २७॥
श्रीराम! इस प्रकार ये हनुमान्जी बहुत-से वर पाकर वरदानजनित शक्तिसे सम्पन्न हो गये और अपने भीतर विद्यमान अनुपम वेगसे पूर्ण हो भरे हुए महासागरके समान शोभा पाने लगे॥ २८॥
उन दिनों वेगसे भरे हुए ये वानरशिरोमणि हनुमान् निर्भय हो महर्षियोंके आश्रमोंमें जा-जाकर उपद्रव किया करते थे॥ २९॥
ये शान्तचित्त महात्माओंके यज्ञोपयोगी पात्र फोड़ डालते, अग्निहोत्रके साधनभूत स्रुक्, स्रुवा आदिको तोड़ डालते और ढेर-के-ढेर रखे गये वल्कलोंको चीर-फाड़ देते थे॥ ३०॥
‘महाबली पवनकुमार इस तरहके उपद्रवपूर्ण कार्य करने लगे। कल्याणकारी भगवान् ब्रह्माने इन्हें सब प्रकारके ब्रह्मदण्डोंसे अवध्य कर दिया है—यह बात सभी ऋषि जानते थे; अतः
इनकी शक्तिसे विवश हो वे इनके सारे अपराध चुपचाप सह लेते थे॥ ३१½ ॥
यद्यपि केसरी तथा वायुदेवताने भी इन अञ्जनी-कुमारको बारम्बार मना किया तो भी ये वानरवीर मर्यादाका उल्लङ्घन कर ही देते थे॥ ३२½ ॥
इससे भृगु और अङ्गिराके वंशमें उत्पन्न हुए महर्षि कुपित हो उठे। रघुश्रेष्ठ! उन्होंने अपने हृदयमें अधिक खेद पा दुःखको स्थान न देकर इन्हें शाप देते हुए कहा— ॥ ३३½ ॥
‘वानरवीर! तुम जिस बलका आश्रय लेकर हमें सता रहे हो, उसे हमारे शापसे मोहित होकर तुम दीर्घकालतक भूले रहोगे—तुम्हें अपने बलका पता ही नहीं चलेगा। जब कोई तुम्हें तुम्हारी कीर्तिका स्मरण दिला देगा, तभी तुम्हारा बल बढ़ेगा’॥ ३४-३५ ॥
इस प्रकार महर्षियोंके इस वचनके प्रभावसे इनका तेज और ओज घट गया। फिर ये उन्हीं आश्रमोंमें मृदुल प्रकृतिके होकर विचरने लगे॥ ३६ ॥
वाली और सुग्रीवके पिताका नाम ऋक्षरजा था। वे सूर्यके समान तेजस्वी तथा समस्त वानरोंके राजा थे॥ ३७ ॥
वे वानरराज ऋक्षरजा चिरकालतक वानरोंके राज्यका शासन करके अन्तमें कालधर्म (मृत्यु)-को प्राप्त हुए॥ ३८ ॥
उनका देहावसान हो जानेपर मन्त्रवेत्ता मन्त्रियोंने पिताके स्थानपर वालीको राजा और वालीके स्थानपर सुग्रीवको युवराज बनाया॥ ३९ ॥
जैसे अग्निके साथ वायुकी स्वाभाविक मित्रता है,
उसी प्रकार सुग्रीवके साथ वालीका बचपनसे ही सख्यभाव था। उन दोनोंमें परस्पर किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था। उनमें अटूट प्रेम था॥ ४० ॥
श्रीराम! फिर जब वाली और सुग्रीवमें वैर उठ खड़ा हुआ, उस समय ये हनुमान्जी शापवश ही अपने बलको न जान सके। देव! वालीके भयसे भटकते रहनेपर भी न तो इन सुग्रीवको इनके बलका स्मरण हुआ और न स्वयं ये पवनकुमार ही अपने बलका पता पा सके॥ ४१-४२ ॥
सुग्रीवके ऊपर जब वह विपत्ति आयी थी, उन दिनों ऋषियोंके शापके कारण इनको अपने बलका ज्ञान भूल गया था, इसीलिये जैसे कोई सिंह हाथीके द्वारा अवरुद्ध होकर चुपचाप खड़ा रहे, उसी प्रकार ये वाली और सुग्रीवके युद्धमें चुपचाप खड़े-खड़े तमाशा देखते रहे, कुछ कर न सके॥ ४३ ॥
संसारमें ऐसा कौन है जो पराक्रम, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, सुशीलता, मधुरता, नीति-अनीतिके विवेक, गम्भीरता, चतुरता, उत्तम बल और धैर्यमें हनुमान्जीसे बढ़कर हो॥ ४४ ॥
ये असीम शक्तिशाली कपिश्रेष्ठ हनुमान् व्याकरणका अध्ययन करनेके लिये शङ्काएँ पूछनेकी इच्छासे सूर्यकी ओर मुँह रखकर महान् ग्रन्थ धारण किये उनके आगे-आगे उदयाचलसे अस्ताचलतक जाते थे॥ ४५ ॥
इन्होंने सूत्र, वृत्ति, वार्तिक, महाभाष्य और संग्रह— इन सबका अच्छी तरह अध्ययन किया है। अन्यान्य शास्त्रोंके ज्ञान तथा छन्दःशास्त्रके अध्ययनमें भी इनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई विद्वान् नहीं है॥ ४६ ॥
सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञान तथा तपस्याके अनुष्ठानमें ये देवगुरु बृहस्पतिकी बराबरी करते हैं। नव व्याकरणोंके सिद्धान्तको जाननेवाले ये हनुमान्जी आपकी कृपासे साक्षात् ब्रह्माके समान आदरणीय होंगे॥ ४७ ॥
प्रलयकालमें भूतलको आप्लावित करनेके लिये भूमिके भीतर प्रवेश करनेकी इच्छावाले महासागर, सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध कर डालनेके लिये उद्यत हुए संवर्तक अग्नि तथा लोकसंहारके लिये उठे हुए कालके समान प्रभावशाली इन हनुमान्जीके सामने कौन ठहर सकेगा॥ ४८ ॥
श्रीराम! वास्तवमें ये तथा इन्हींके समान दूसरे-दूसरे जो सुग्रीव, मैन्द, द्विविद, नील, तार, तारेय (अङ्गद), नल तथा रम्भ आदि महाकपीश्वर हैं; इन सबकी सृष्टि देवताओंने आपकी सहायताके लिये ही की है॥ ४९ ॥
श्रीराम! गज, गवाक्ष, गवय, सुदंष्ट्र, मैन्द, प्रभ, ज्योतिर्मुख और नल—इन सब वानरेश्वरों तथा रीछोंकी सृष्टि देवताओंने आपके सहयोगके लिये ही की है॥ ५० ॥
रघुनन्दन! आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया। हनुमान्जीकी बाल्यावस्थाके इस चरित्रका भी वर्णन कर दिया॥ ५१ ॥
अगस्त्यजीका यह कथन सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण बड़े विस्मित हुए। वानरों और राक्षसोंको भी बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ५२ ॥
तत्पश्चात् अगस्त्यजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— 'योगियोंके हृदयमें रमण करनेवाले श्रीराम! आप यह सारा प्रसङ्ग सुन चुके। हमलोगोंने आपका दर्शन और आपके साथ वार्तालाप कर लिया। इसलिये अब हम जा रहे हैं'॥ ५३ ॥
उग्र तेजस्वी अगस्त्यजीकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ विनयपूर्वक उन महर्षिसे इस प्रकार कहा— ॥ ५४ ॥
‘मुनीश्वर! आज मुझपर देवता, पितर और पितामह आदि विशेषरूपसे संतुष्ट हैं। बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोगोंको तो आप-जैसे महात्माओंके दर्शनसे ही सदा संतोष है॥ ५५ ॥
‘मेरे मनमें एक इच्छाका उदय हुआ है, अतः मैं यह सूचित करनेयोग्य बात आपकी सेवामें निवेदन कर रहा हूँ। मुझपर अनुग्रह करके आपलोगोंको मेरे उस अभीष्ट कार्यको पूरा करना होगा॥ ५६ ॥
‘मेरी इच्छा है कि पुरवासी और देशवासियोंको अपने-अपने कार्योंमें लगाकर मैं आप सत्पुरुषोंके प्रभावसे यज्ञोंका अनुष्ठान करूँ॥ ५७ ॥
‘मेरे उन यज्ञोंमें आप महान् शक्तिशाली महात्मा मुझपर अनुग्रह करनेके लिये नित्य सदस्य बने रहें॥ ५८ ॥
‘आप तपस्यासे निष्पाप हो चुके हैं। मैं आपलोगोंका आश्रय लेकर सदा संतुष्ट एवं पितरोंसे अनुगृहीत होऊँगा॥ ५९ ॥
‘यज्ञ-आरम्भके समय सब लोग एकत्र होकर निरन्तर यहाँ आते रहें।’ श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कठोर व्रतका पालन करनेवाले अगस्त्य आदि महर्षि उनसे ‘एवमस्तु (ऐसा ही होगा)’ कहकर वहाँसे जानेको उद्यत हुए॥ ६०½ ॥
इस प्रकार बातचीत करके सब ऋषि जैसे आये थे, वैसे चले गये। इधर श्रीरामचन्द्रजी विस्मित होकर उन्हीं बातोंपर विचार करते रहे॥ ६१½ ॥
तदनन्तर सूर्यास्त होनेपर राजाओं और वानरोंको विदा करके नरेशोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक संध्योपासना की और रात होनेपर वे अन्तःपुरमें पधारे॥ ६२-६३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥
सैंतीसवाँ सर्ग
सैंतीसवाँ सर्ग
श्रीरामका सभासदोंके साथ राजसभामें बैठना
ककुत्स्थकुलभूषण आत्मज्ञानी श्रीरामचन्द्रजीका धर्मपूर्वक राज्याभिषेक हो जानेपर पुरवासियोंका हर्ष बढ़ानेवाली उनकी पहली रात्रि व्यतीत हुई॥ १ ॥
वह रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब प्रातःकाल महाराज श्रीरामको जगानेवाले सौम्य वन्दीजन राजमहलमें उपस्थित हुए॥ २ ॥
उनके कण्ठ बड़े मधुर थे। वे संगीतकी कलामें किन्नरोंके समान सुशिक्षित थे। उन्होंने बड़े हर्षमें भरकर यथावत्-रूपसे वीर नरेश श्रीरघुनाथजीका स्तवन आरम्भ किया॥ ३ ॥
‘श्रीकौसल्याजीका आनन्द बढ़ानेवाले सौम्य-स्वरूप वीर श्रीरघुवीर! आप जागिये। महाराज! आपके सोये रहनेपर तो सारा जगत् ही सोया रहेगा (ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्मानुष्ठानमें नहीं लग सकेगा)॥ ४ ॥
‘आपका पराक्रम भगवान् विष्णुके समान तथा रूप अश्विनीकुमारोंके समान है। बुद्धिमें आप बृहस्पतिके तुल्य हैं और प्रजापालनमें साक्षात् प्रजापतिके सदृश हैं॥
‘आपकी क्षमा पृथिवीके समान और तेज भगवान् भास्करके समान है। वेग वायुके तुल्य और गम्भीरता समुद्रके सदृश है॥ ६ ॥
‘नरेश्वर! आप भगवान् शङ्करके समान युद्धमें अविचल हैं। आपकी-सी सौम्यता चन्द्रमामें ही पायी जाती है। आपके समान राजा न पहले थे और न भविष्यमें होंगे॥ ७ ॥
‘पुरुषोत्तम! आपको परास्त करना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आप सदा धर्ममें संलग्न रहते हुए प्रजाके हित-साधनमें तत्पर रहते हैं, अतः कीर्ति और लक्ष्मी आपको कभी नहीं छोड़ती हैं॥ ८ ॥
‘ककुत्स्थकुलनन्दन! ऐश्वर्य और धर्म आपमें नित्य प्रतिष्ठित हैं।’ वन्दीजनोंने ये तथा और भी बहुत-सी सुमधुर स्तुतियाँ सुनायीं॥ ९ ॥
सूत भी दिव्य स्तुतियोंद्वारा श्रीरघुनाथजीको जगाते रहे। इस प्रकार सुनायी जाती हुई स्तुतियोंके द्वारा भगवान् श्रीराम जागे॥ १० ॥
जैसे पापहारी भगवान् नारायण सर्पशय्यासे उठते हैं, उसी प्रकार वे भी श्वेत बिछौनोंसे ढकी हुई शय्याको छोड़कर उठ बैठे॥ ११॥
महाराजके शय्यासे उठते ही सहस्रों सेवक विनयपूर्वक हाथ जोड़ उज्ज्वल पात्रोंमें जल लिये उनकी सेवामें उपस्थित हुए॥ १२॥
स्नान आदि करके शुद्ध हो उन्होंने समयपर अग्निमें आहुति दी और शीघ्र ही इक्ष्वाकुवंशियोंद्वारा सेवित पवित्र देवमन्दिरमें वे पधारे॥ १३॥
वहाँ देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंका विधिवत् पूजन करके वे अनेक कर्मचारियोंके साथ बाहरकी ड्योढ़ीमें आये॥ १४॥
इसी समय प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी वसिष्ठ आदि सभी महात्मा मन्त्री और पुरोहित वहाँ उपस्थित हुए॥ १५॥
तत्पश्चात् अनेकानेक जनपदोंके स्वामी महामनस्वी क्षत्रिय श्रीरामचन्द्रजीके पास उसी तरह आकर बैठे, जैसे इन्द्रके समीप देवतालोग आकर बैठा करते हैं॥ १६॥
महायशस्वी भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—ये तीनों भाई बड़े हर्षके साथ उसी तरह भगवान् श्रीरामकी सेवामें उपस्थित रहते थे, जैसे तीनों वेद यज्ञकी॥ १७॥
इसी समय मुदित नामसे प्रसिद्ध बहुत-से सेवक भी, जिनके मुखपर प्रसन्नता खेलती रहती थी, हाथ जोड़े सभाभवनमें आये और श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये॥ १८॥
फिर महापराक्रमी महातेजस्वी तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुग्रीव आदि बीस* वानर भगवान् श्रीरामके समीप आकर बैठे॥ १९॥
अपने चार राक्षस मन्त्रियोंसे घिरे हुए विभीषण भी उसी प्रकार महात्मा श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए, जैसे गुह्यकगण धनपति कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं॥ २०॥
जो लोग शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े और कुलीन थे, वे चतुर मनुष्य भी महाराजको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके वहाँ बैठ गये॥ २१॥
इस प्रकार बहुत-से श्रेष्ठ एवं तेजस्वी महर्षि, महापराक्रमी राजा, वानर और राक्षसोंसे घिरे राजसभामें बैठे हुए श्रीरघुनाथजी बड़ी शोभा पा रहे थे॥ २२॥
जैसे देवराज इन्द्र सदा ऋषियोंसे सेवित होते हैं, उसी तरह महर्षि-मण्डलीसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उस समय सहस्रलोचन इन्द्रसे भी अधिक शोभा पा रहे थे॥ २३॥
जब सब लोग यथास्थान बैठ गये, तब पुराणवेत्ता महात्मा लोग भिन्न-भिन्न धर्म-कथाएँ कहने लगे*॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७॥
* सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्, जाम्बवान्, सुषेण, तार, नील, नल, मैन्द, द्विविद, कुमुद, शरभ, शतबलि, गन्धमादन, गज, गवाक्ष, गवय, धूम्र, रम्भ तथा ज्योतिर्मुख—ये प्रधान-प्रधान वानर-वीर बीसकी संख्यामें उपस्थित थे।
* इस सर्गके बाद कुछ प्रतियोंमें प्रक्षिप्त रूपसे पाँच सर्ग और उपलब्ध होते हैं, जिनमें वाली और सुग्रीवकी उत्पत्तिका तथा रावणके श्वेतद्वीपमें गमनका इतिहास वर्णित है। इस इतिहासके वक्ता भी अगस्त्यजी ही हैं। परंतु इसके पहले सर्गमें ही अगस्त्यजीके विदा होनेका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इन सर्गोंका उल्लेख असङ्गत प्रतीत होता है। इसीलिये ये सर्ग यहाँ नहीं लिये गये हैं।
अड़तीसवाँ सर्ग
अड़तीसवाँ सर्ग
श्रीरामके द्वारा राजा जनक, युधाजित्, प्रतर्दन तथा अन्य नरेशोंकी विदाई
महाबाहु श्रीरघुनाथजी इसी प्रकार प्रतिदिन राजसभामें बैठकर पुरवासियों और जनपदवासियोंके सारे कार्योंकी देखभाल करते हुए शासनका कार्य चलाते थे॥ १ ॥
तदनन्तर कुछ दिन बीतनेपर श्रीरामचन्द्रजीने मिथिलानरेश विदेहराज जनकजीसे हाथ जोड़कर यह बात कही— ॥ २ ॥
‘महाराज! आप ही हमारे सुस्थिर आश्रय हैं। आपने सदा हमलोगोंका लालन-पालन किया है। आपके ही बढ़े हुए तेजसे मैंने रावणका वध किया है॥ ३ ॥
‘राजन्! समस्त इक्ष्वाकुवंशी और मैथिल नरेशोंमें आपसके सम्बन्धके कारण सब प्रकारसे जो प्रेम बढ़ा है, उसकी कहीं तुलना नहीं है॥ ४ ॥
‘पृथ्वीनाथ! अब आप हमारे द्वारा भेंट किये गये ये रत्न लेकर अपनी राजधानीको पधारें। भरत (तथा उनके साथ-साथ शत्रुघ्न भी) आपकी सहायताके लिये आपके पीछे-पीछे जायँगे’ ॥ ५ ॥
तब जनकजी ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—‘राजन्! मैं आपके दर्शन तथा न्यायानुसार व्यवहारसे बहुत प्रसन्न हूँ॥ ६ ॥
‘आपने मेरे लिये जो रत्न एकत्र किये हैं, वह सब मैं अपनी सीता आदि पुत्रियोंको देता हूँ’ ॥ ७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर श्रीमान् राजा जनक प्रसन्न-चित्त हो श्रीरामकी अनुमति ले मिथिलापुरीको चल दिये॥ ८ ॥
जनकजीके चले जानेके पश्चात् श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर अपने मामा केकय-नरेश युधाजित्से, जो बड़े सामर्थ्यशाली थे, विनयपूर्वक कहा— ॥ ९ ॥
‘राजन्! पुरुषप्रवर! यह राज्य, मैं, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न—सब आपके अधीन हैं। आप ही हमारे आश्रय हैं॥ १० ॥
‘महाराज केकयराज वृद्ध हैं। वे आपके लिये बहुत चिन्तित होंगे। इसलिये पृथ्वीनाथ! आपका आज ही जाना मुझे अच्छा जान पड़ता है॥ ११ ॥
'आप बहुत-सा धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर पधारें। मार्गमें सहायताके लिये लक्ष्मण आपके साथ जायँगे'॥ १२ ॥
तब युधाजित्ने 'तथास्तु' कहकर श्रीरामचन्द्रजीकी बात मान ली और कहा—'रघुनन्दन! ये रत्न और धन सब तुम्हारे ही पास अक्षयरूपसे रहें'॥ १३ ॥
फिर पहले श्रीरघुनाथजीने प्रणामपूर्वक अपने मामाकी परिक्रमा की, इसके बाद केकयकुलकी वृद्धि करनेवाले राजकुमार युधाजित्ने भी राजा श्रीरामकी प्रदक्षिणा की॥ १४ ॥
इसके बाद केकयराजने लक्ष्मणजीके साथ उसी तरह अपने देशको प्रस्थान किया, जैसे वृत्रासुरके मारे जानेपर इन्द्रने भगवान् विष्णुके साथ अमरावतीकी यात्रा की थी॥ १५ ॥
मामाको विदा करके रघुनाथजीने किसीसे भी भय न माननेवाले अपने मित्र काशिराज प्रतर्दनको हृदयसे लगाकर कहा— ॥ १६ ॥
'राजन्! आपने राज्याभिषेकके कार्यमें भरतके साथ पूरा उद्योग किया है और ऐसा करके अपने महान् प्रेम तथा परम सौहार्दका परिचय दिया है॥ १७ ॥
'काशिराज! अब आप सुन्दर परकोटों तथा मनोहर फाटकोंसे सुशोभित और अपने ही द्वारा सुरक्षित रमणीय पुरी वाराणसीको पधारिये'॥ १८ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्रीरामने पुनः अपने उत्तम आसनसे उठकर प्रतर्दनको छातीसे लगा उनका गाढ़
आलिङ्गन किया॥ १९ ॥
इस प्रकार कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले श्रीरामने उस समय काशिराजको विदा किया। श्रीरघुनाथजीकी अनुमति पाकर उनसे विदा ले निर्भय काशिराज तत्काल वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये॥ २०½ ॥
काशिराजको विदा करके श्रीरघुनाथजी हँसते हुए अन्य तीन सौ भूपालोंसे मधुर वाणीमें बोले— ॥ २१½ ॥
'मेरे ऊपर आपलोगोंका अविचल प्रेम है, जिसकी रक्षा आपने अपने ही तेजसे की है। आपलोगोंमें सत्य और धर्म नियतरूपसे नित्य-निरन्तर निवास करते हैं॥ २२½ ॥
'आप महापुरुषोंके प्रभाव और तेजसे ही मेरे द्वारा दुर्बुद्धि दुरात्मा राक्षसाधम रावण मारा गया है॥ २३½ ॥
‘मैं तो उसके वधमें निमित्तमात्र बना हूँ। वास्तवमें तो आपलोगोंके तेजसे ही पुत्र, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा सेवकगणोंके सहित रावण युद्धमें मारा गया है॥ २४½ ॥
‘वनसे जनकराजनन्दिनी सीताके अपहरणका समाचार सुनकर महात्मा भरतने आपलोगोंको यहाँ बुलाया था॥ २५½ ॥
‘आप सभी महामना भूपाल राक्षसोंपर आक्रमण करनेके लिये उद्योगशील थे। तबसे आजतक यहाँ आपलोगोंका बहुत समय व्यतीत हो गया है। अतः अब मुझे आपलोगोंका अपने नगरको लौट जाना ही उचित जान पड़ता है’॥ २६½ ॥
इसपर राजाओंने अत्यन्त हर्षसे भरकर कहा— ‘श्रीराम! आप विजयी हुए और अपने राज्यपर भी प्रतिष्ठित हो गये, यह बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २७½ ॥
‘हमारे सौभाग्यसे ही आप सीताको लौटा लाये और उस प्रबल शत्रुको परास्त कर दिया। श्रीराम! यही हमारा सबसे बड़ा मनोरथ है और यही हमारे लिये सबसे बढ़कर प्रसन्नताकी बात है कि आज हमलोग आपको विजयी देख रहे हैं तथा आपकी शत्रु-मण्डली मारी जा चुकी है॥ २८-२९ ॥
‘प्रशंसनीय श्रीराम! आप जो हमलोगोंकी प्रशंसा कर रहे हैं, यह आपहीके योग्य है। हम ऐसी प्रशंसा करनेकी कला नहीं जानते हैं॥ ३० ॥
‘अब हम आज्ञा चाहते हैं। अपनी पुरीको जायँगे। जिस प्रकार आप सदा हमारे हृदयमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार हे महाबाहो! जिसमें हमलोग आपके प्रति प्रेमसे युक्त रहकर आपके हृदयमें बसे रहें, ऐसी प्रीति आपकी हमपर सदा बनी रहनी चाहिये।’ तब श्रीरघुनाथजीने हर्षसे भरे हुए उन राजाओंसे कहा— ‘अवश्य ऐसा ही होगा’॥ ३१-३२ ॥
तत्पश्चात् जानेके लिये उत्सुक हो सबने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा— ‘भगवन्! अब हम जा रहे हैं।’ इस तरह श्रीरामसे सम्मानित हो वे सब राजा अपने-अपने देशको चले गये॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८॥
उनतालीसवाँ सर्ग
उनतालीसवाँ सर्ग
राजाओंका श्रीरामके लिये भेंट देना और श्रीरामका वह सब लेकर अपने मित्रों, वानरों, रीछों और राक्षसोंको बाँट देना तथा वानर आदिका वहाँ सुखपूर्वक रहन ा
अयोध्यासे प्रस्थित हो वे महामना भूपाल सहस्रों हाथी, घोड़े तथा पैदल-समूहोंसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से हर्षपूर्वक आगे बढ़ने लगे॥ १ ॥
भरतकी आज्ञासे श्रीरामचन्द्रजीकी सहायताके लिये वहाँ कऽइ अक्षौहिणी सेनाएँ युद्धके लिये उद्यत होकर आयी थीं। उन सबके सैनिक और वाहन हर्ष एवं उत्साहसे भरे हुए थे॥ २ ॥
वे सभी भूपाल बलके घमंडमें भरकर आपसमें इस तरहकी बातें करने लगे— ‘हमलोगोंने युद्धमें श्रीराम और रावणको आमने-सामने खड़ा नहीं देखा॥ ३ ॥
‘भरतने (पहले तो सूचना नहीं दी) पीछे युद्ध समाप्त हो जानेपर हमें व्यर्थ ही बुला लिया। यदि सब राजा गये होते तो उनके द्वारा समस्त राक्षसोंका संहार बहुत जल्दी हो गया होता, इसमें संशय नहीं है॥ ४ ॥
‘श्रीराम और लक्ष्मणके बाहुबलसे सुरक्षित एवं निश्चिन्त हो हमलोग समुद्रके उस पार सुखपूर्वक युद्ध कर सकते थे’॥ ५ ॥
ये तथा और भी बहुत-सी बातें कहते हुए वे सहस्रों नरेश बड़े हर्षके साथ अपने-अपने राज्यको गये॥
उनके अपने-अपने प्रसिद्ध राज्य समृद्धिशाली, सुख और आनन्दसे परिपूर्ण, धन-धान्यसे सम्पन्न तथा रत्न आदिसे भरे-पूरे थे। उन राज्यों तथा नगरोंमें जाकर उन नरेशोंने श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे नाना प्रकारके रत्न और उपहार भेजे। घोड़े, सवारियाँ, रत्न, मतवाले हाथी, उत्तम चन्दन, दिव्य आभूषण, मणि, मोती, मूँगे, रूपवती दासियाँ, नाना प्रकारकी बकरियाँ और भेड़ें तथा तरह-तरहके बहुत-से रथ भेंट किये॥ ७—१० ॥
महाबली भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न उन रत्नोंको लेकर पुनः अपनी पुरीमें लौट आये। रमणीय पुरी अयोध्यामें आकर उन तीनों पुरुषप्रवर बन्धुओंने ये विचित्र रत्न श्रीरामको समर्पित कर दिये॥ ११-१२ ॥