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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

‘ककुत्स्थकुलभूषण! आप आत्मासे आत्माको, मनसे मनको तथा सम्पूर्ण लोकोंको भी संयत रखनेमें समर्थ हैं; फिर अपने शोकको काबूमें रखना आपके लिये कौन बड़ी बात है?॥ १३ ॥

‘आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष इस तरहके प्रसङ्ग आनेपर मोहित नहीं होते। रघुनन्दन! यदि आप दुःखी रहेंगे तो वह अपवाद आपके ऊपर फिर आ जायगा॥ १४ ॥

‘नरेश्वर! जिस अपवादके भयसे आपने मिथिलेशकुमारीका त्याग किया है, निःसंदेह वह अपवाद इस नगरमें फिर होने लगेगा (लोग कहेंगे कि दूसरेके घरमें रही हुई स्त्रीका त्याग करके ये रात-दिन उसीकी चिन्तासे दुःखी रहते हैं)॥ १५ ॥

‘अतः पुरुषसिंह! आप धैर्यसे चित्तको एकाग्र करके इस दुर्बल शोक-बुद्धिका त्याग करें—संतप्त न हों’॥ १६ ॥

महात्मा लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर मित्रवत्सल श्रीरघुनाथजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन सुमित्राकुमारसे कहा— ॥ १७ ॥

‘नरश्रेष्ठ वीर लक्ष्मण! तुम जैसा कहते हो, ठीक ऐसी ही बात है। तुमने मेरे आदेशका पालन किया, इससे मुझे बड़ा संतोष है॥ १८ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! अब मैं दुःखसे निवृत्त हो गया। संतापको मैंने हृदयसे निकाल दिया और तुम्हारे सुन्दर वचनोंसे मुझे बड़ी शान्ति मिली है’॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५२॥

तिरपनवाँ सर्ग

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तिरपनवाँ सर्ग

श्रीरामका कार्यार्थी पुरुषोंकी उपेक्षासे राजा नृगको मिलनेवाली शापकी कथा सुनाकर लक्ष्मणको देखभालके लिये आदेश देना

लक्ष्मणके उस अत्यन्त अद्भुत वचनको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले— ॥

‘सौम्य! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। जैसे तुम मेरे मनका अनुसरण करनेवाले हो, ऐसा भाई विशेषतः इस समय मिलना कठिन है॥ २ ॥

‘शुभलक्षण लक्ष्मण! अब मेरे मनमें जो बात है, उसे सुनो और सुनकर वैसा ही करो॥ ३ ॥

‘सौम्य! सुमित्राकुमार! मुझे पुरवासियोंका काम किये बिना चार दिन बीत चुके हैं, यह बात मेरे मर्मस्थलको विदीर्ण कर रही है॥ ४ ॥

‘पुरुषप्रवर! तुम प्रजा, पुरोहित और मन्त्रियोंको बुलाओ। जिन पुरुषों अथवा स्त्रियोंको कोई काम हो, उनको उपस्थित करो॥ ५ ॥

‘जो राजा प्रतिदिन पुरवासियोंके कार्य नहीं करता, वह निस्संदेह सब ओरसे निश्छिद्र अतएव वायुसंचारसे रहित घोर नरकमें पड़ता है॥ ६ ॥

‘सुना जाता है पहले इस पृथ्वीपर नृगनामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी राजा राज्य करते थे। वे भूपाल बड़े ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी तथा आचार-विचारसे पवित्र थे॥

‘उन नरदेवने किसी समय पुष्करतीर्थमें जाकर ब्राह्मणोंको सुवर्णसे भूषित तथा बछड़ोंसे युक्त एक करोड़ गौएँ दान कीं॥ ८ ॥

‘निष्पाप लक्ष्मण! उस समय दूसरी गौओंके साथ-साथ एक दरिद्र, उञ्छवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाले एवं अग्निहोत्री ब्राह्मणकी बछड़ेसहित गाय वहाँ चली गयी और राजाने संकल्प करके उसे किसी ब्राह्मणको दे दिया॥ ९ ॥

‘वह बेचारा ब्राह्मण भूखसे पीड़ित हो उस खोयी हुई गायको बहुत वर्षोंतक सारे राज्योंमें जहाँ-तहाँ ढूँढ़ता फिरा; परंतु वह उसे नहीं दिखायी दी॥ १० ॥

‘अन्तमें एक दिन कनखल पहुँचकर उसने अपनी गाय एक ब्राह्मणके घरमें देखी। वह नीरोग और हृष्ट-पुष्ट थी, किंतु उसका बछड़ा बहुत बड़ा हो गया था॥ ११ ॥

‘ब्राह्मणने अपने रखे हुए ‘शबला’ नामसे उसको पुकारा—‘शबले! आओ! आओ!’ गौने उस स्वरको सुना॥ १२ ॥

‘भूखसे पीड़ित हुए उस ब्राह्मणके उस परिचित स्वरको पहचानकर वह गौ आगे-आगे जाते हुए उस अग्नितुल्य तेजस्वी ब्राह्मणके पीछे हो ली॥ १३ ॥

‘जो ब्राह्मण उन दिनों उसका पालन करता था, वह भी तुरंत उस गायका पीछा करता हुआ गया और जाकर उन ब्रह्मर्षिसे बोला—‘ब्रह्मन्! यह गौ मेरी है। मुझे राजाओंमें श्रेष्ठ नृगने इसे दानमें दिया है’॥ १४ १/२ ॥

‘फिर तो उन दोनों विद्वान् ब्राह्मणोंमें उस गौको लेकर महान् विवाद खड़ा हो गया। वे दोनों परस्पर लड़ते-झगड़ते हुए उन दानी नरेश नृगके पास गये॥ १५ १/२ ॥

‘वहाँ राजभवनके दरवाजेपर जाकर वे कई दिनोंतक टिके रहे, परंतु उन्हें राजाका न्याय नहीं प्राप्त हुआ (वे उनसे मिले ही नहीं)। इससे उन दोनोंको बड़ा क्रोध हुआ॥ १६ १/२ ॥

‘वे दोनों श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मण अत्यन्त संतप्त और कुपित हो राजाको शाप देते हुए यह घोर वाक्य बोले—॥

‘राजन्! अपने विवादका निर्णय करानेकी इच्छासे आये हुए प्रार्थी पुरुषोंके कार्यकी सिद्धिके लिये तुम उन्हें दर्शन नहीं देते हो; इसलिये तुम सब प्राणियोंसे छिपकर रहनेवाले गिरगिट हो जाओगे और सहस्रों वर्षोंके दीर्घकालतक गड्ढेमें गिरगिट होकर ही पड़े रहोगे॥ १८-१९ १/२ ॥

‘जब यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वासुदेवनामसे विख्यात भगवान् विष्णु पुरुषरूपसे इस जगत्में अवतार लेंगे, उस समय वे ही तुम्हें इस शापसे छुड़ायेंगे, इसलिये इस समय तो तुम गिरगिट हो ही जाओगे, फिर श्रीकृष्णावतारके समयमें ही तुम्हारा उद्धार होगा। कलियुग उपस्थित होनेसे कुछ ही पहले महापराक्रमी नर और नारायण दोनों इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण होंगे’॥ २०—२२ १/२ ॥

‘इस प्रकार शाप देकर वे दोनों ब्राह्मण शान्त हो गये। उन्होंने वह बूढ़ी और दुबली गाय किसी ब्राह्मणको दे दी॥ २३ १/२ ॥

‘इस प्रकार राजा नृग उस अत्यन्त दारुण शापका उपभोग कर रहे हैं। अतः कार्यार्थी पुरुषोंका विवाद यदि निर्णीत न हो तो वह राजाओंके लिये महान् दोषकी प्राप्ति करानेवाला

होता है॥ २४ १/२ ॥

‘अतः कार्यार्थी मनुष्य शीघ्र मेरे सामने उपस्थित हों। प्रजापालनरूप पुण्यकर्मका फल क्या राजाको नहीं मिलता है? अवश्य प्राप्त होता है। अतः सुमित्रानन्दन! तुम जाओ, राजद्वारपर प्रतीक्षा करो कि कौन कार्यार्थी पुरुष आ रहा है’॥ २५-२६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥

चौवनवाँ सर्ग

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चौवनवाँ सर्ग

राजा नृगका एक सुन्दर गढ्ढा बनवाकर अपने पुत्रको राज्य दे स्वयं उसमें प्रवेश करके शाप भोगना

श्रीरामका यह भाषण सुनकर परमार्थवेत्ता लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ १ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! उन दोनों ब्राह्मणोंने थोड़े-से ही अपराधपर राजर्षि नृगको द्वितीय यमदण्डके समान ऐसा महान् शाप दे दिया॥ २ ॥

‘पुरुषप्रवर! अपनेको शापरूपी पापसे संयुक्त हुआ सुनकर राजा नृगने उन क्रोधी ब्राह्मणोंसे क्या कहा?’॥ ३ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरघुनाथजी फिर बोले—‘सौम्य! पूर्वकालमें शापग्रस्त होकर राजा नृगने जो कुछ कहा, उसे बताता हूँ, सुनो॥ ४ ॥

‘जब राजा नृगको यह पता लगा कि वे दोनों ब्राह्मण चले गये और कहीं रास्तेमें होंगे, तब उन्होंने मन्त्रियोंको, समस्त पुरवासियोंको, पुरोहितोंको तथा समस्त प्रकृतियोंको भी बुलाकर दुःखसे पीड़ित होकर कहा—‘आपलोग सावधान होकर मेरी बात सुनें—॥ ५-६ ॥

‘नारद और पर्वत—ये दोनों कल्याणकारी और अनिन्द्य देवर्षि मेरे पास आये थे। वे दोनों ब्राह्मणोंके दिये हुए शापकी बात बताकर मुझे महान् भय दे वायुके समान तीव्र गतिसे ब्रह्मलोकको चले गये॥ ७ ॥

‘ये जो वसु नामक राजकुमार हैं, इन्हें इस राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय और कारीगर मेरे लिये एक ऐसा गढ्ढा तैयार करें, जिसका स्पर्श सुखद हो॥ ८ ॥

‘ब्राह्मणके मुखसे निकले हुए उस शापको वहीं रहकर मैं बिताऊँगा। एक गढ्ढा ऐसा होना चाहिये, जो वर्षाके कष्टका निवारण करनेवाला हो। दूसरा सर्दीसे बचानेवाला हो और शिल्पीलोग तीसरा एक ऐसा गढ्ढा तैयार करें जो गर्मीका निवारण करे और जिसका स्पर्श सुखदायक हो॥ ९ १/२ ॥

‘जो फल देनेवाले वृक्ष हैं और फूल देनेवाली लताएँ हैं, उन्हें उन गड्डोंमें लगाया जाय। घनी छायावाले अनेक प्रकारके वृक्षोंका वहाँ आरोपण किया जाय। उन गड्डोंके चारों ओर डेढ़-

डेढ़ योजन (छः-छः कोस)-की भूमि घेरकर खूब रमणीय बना दी जाय। जबतक शापका समय बीतेगा, तबतक मैं वहीं सुखपूर्वक रहूँगा। उन गड्डोंमें प्रतिदिन सुगन्धित पुष्प संचित किये जायँ'॥ १०—१२ १/२ ॥

‘ऐसी व्यवस्था करके राजकुमार वसुको राजसिंहासनपर बिठाकर राजाने उस समय उनसे कहा— ‘बेटा! तुम प्रतिदिन धर्मपरायण रहकर क्षत्रियध र्मके अनुसार प्रजाका पालन करो॥ १३ १/२ ॥

‘दोनों ब्राह्मणोंने मुझपर जिस प्रकार शापद्वारा प्रहार किया है, वह तुम्हारी आँखोंके सामने है। नरश्रेष्ठ! वैसे थोड़े-से अपराधपर भी रुष्ट होकर उन्होंने मुझे शाप दे दिया है॥ १४ १/२ ॥

‘पुरुषप्रवर! तुम मेरे लिये संताप न करो। बेटा! जिसने मुझे व्यसनी बनाया—संकटमें डाला है, अपना किया हुआ वह प्राचीन कर्म ही अनुकूल-प्रतिकूल फल देनेमें समर्थ होता है॥ १५ १/२ ॥

‘वत्स! पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके अनुसार मनुष्य उन्हीं वस्तुओंको पाता है, जिन्हें पानेका वह अधिकारी है। उन्हीं स्थानोंपर जाता है, जहाँ जाना उसके लिये अनिवार्य है तथा उन्हीं दुःखों और सुखोंको उपलब्ध करता है, जो उसके लिये नियत हैं; अतः तुम विषाद न करो’॥ १६-१७ ॥

‘नरश्रेष्ठ! अपने पुत्रसे ऐसा कहकर महायशस्वी नरपाल राजा नृगने अपने रहनेके लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किये गये गड्ढेमें प्रवेश किया॥ १८ ॥

‘इस तरह उस रत्नविभूषित महान् गर्तमें प्रवेश करके उस समय महात्मा राजा नृगने ब्राह्मणोंद्वारा रोषपूर्वक दिये गये उस शापको भोगना आरम्भ किया’॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५४॥

पचपनवाँ सर्ग

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पचपनवाँ सर्ग

राजा निमि और वसिष्ठका एक-दूसरेके शापसे देहत्याग

(श्रीरामने कहा—) ‘लक्ष्मण! इस तरह मैंने तुम्हें राजा नृगके शापका प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक बताया है। यदि सुननेकी इच्छा हो तो दूसरी कथा भी सुनो’॥ १ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार फिर बोले— ‘नरेश्वर! इन आश्चर्यजनक कथाओंके सुननेसे मुझे कभी तृप्ति नहीं होती है’॥ २ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामने पुनः उत्तम धर्मसे युक्त कथा कहनी आरम्भ की—॥ ३ ॥

‘सुमित्रानन्दन! महात्मा इक्ष्वाकु-पुत्रोंमें निमि नामक एक राजा हो गये हैं, जो इक्ष्वाकुके बारहवें* पुत्र थे। वे पराक्रम और धर्ममें पूर्णतः स्थिर रहनेवाले थे॥ ४ ॥

‘उन पराक्रमसम्पन्न नरेशने उन दिनों गौतम-आश्रमके निकट देवपुरीके समान एक नगर बसाया॥ ५ ॥

‘महायशस्वी राजर्षि निमिने जिस नगरमें अपना निवासस्थान बनाया, उसका सुन्दर नाम रखा गया वैजयन्त। इसी नामसे उस नगरकी प्रसिद्धि हुई (देवराज इन्द्रके प्रासादका नाम वैजयन्त है, उसीकी समतासे निमिके नगरका भी यही नाम रखा गया था)॥ ६ ॥

‘उस महान् नगरको बसाकर राजाके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं पिताके हृदयको आह्लाद प्रदान करनेके लिये एक ऐसे यज्ञका अनुष्ठान करूँ, जो दीर्घकालतक चालू रहनेवाला हो॥ ७ ॥

‘तदनन्तर इक्ष्वाकुनन्दन राजर्षि निमिने अपने पिता मनुपुत्र इक्ष्वाकुसे पूछकर अपना यज्ञ करानेके लिये सबसे पहले ब्रह्मर्षिशिरोमणि वसिष्ठजीका वरण किया। उसके बाद अत्रि, अङ्गिरा तथा तपोनिधि भृगुको भी आमन्त्रित किया॥ ८-९ ॥

‘उस समय ब्रह्मर्षि वसिष्ठने राजर्षियोंमें श्रेष्ठ निमिसे कहा— ‘देवराज इन्द्रने एक यज्ञके लिये पहलेसे ही मेरा वरण कर लिया है; अतः वह यज्ञ जबतक समाप्त न हो जाय तबतक तुम मेरे आगमनकी प्रतीक्षा करो’॥ १० ॥

‘वसिष्ठजीके चले जानेके बाद महान् ब्राह्मण महर्षि गौतमने आकर उनके कामको पूरा कर दिया। उधर महातेजस्वी वसिष्ठ भी इन्द्रका यज्ञ पूरा कराने लगे॥ ११ ॥

‘नरेश्वर राजा निमिने उन ब्राह्मणोंको बुलाकर हिमालयके पास अपने नगरके निकट ही यज्ञ आरम्भ कर दिया, राजा निमिने पाँच हजार वर्षोंतकके लिये यज्ञकी दीक्षा ली॥ १२ ॥

उधर इन्द्र-यज्ञकी समाप्ति होनेपर अनिन्द्य भगवान् वसिष्ठ ऋषि राजा निमिके पास होतृकर्म करनेके लिये आये। वहाँ आकर उन्होंने देखा कि जो समय प्रतीक्षाके लिये दिया था, उसे गौतमने आकर पूरा कर दिया॥ १३ १/२ ॥

‘यह देख ब्रह्मकुमार वसिष्ठ महान् क्रोधसे भर गये और राजासे मिलनेके लिये दो घड़ी वहाँ बैठे रहे। परंतु उस दिन राजर्षि निमि अत्यन्त निद्राके वशीभूत हो सो गये थे॥ १४-१५ ॥

‘राजा मिले नहीं, इस कारण महात्मा वसिष्ठ मुनिको बड़ा क्रोध हुआ। वे राजर्षिको लक्ष्य करके बोलने लगे—

‘भूपाल निमे! तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरे पुरोहितका वरण कर लिया है, इसलिये तुम्हारा यह शरीर अचेतन होकर गिर जायगा’॥ १७ ॥

‘तदनन्तर राजाकी नींद खुली। वे उनके दिये हुए शापकी बात सुनकर क्रोधसे मूर्च्छित हो गये और ब्रह्मयोनि वसिष्ठसे बोले— ॥ १८ ॥

‘मुझे आपके आगमनकी बात मालूम नहीं थी, इसलिये सो रहा था। परंतु आपने क्रोधसे कलुषित होकर मेरे ऊपर दूसरे यमदण्डकी भाँति शापाग्निका प्रहार किया है॥ १९ ॥

‘अतः ब्रह्मर्षे! चिरन्तन शोभासे युक्त जो आपका शरीर है, वह भी अचेतन होकर गिर जायगा—इसमें संशय नहीं है’॥ २० ॥

‘इस प्रकार उस समय रोषके वशीभूत हुए वे दोनों नृपेन्द्र और द्विजेन्द्र परस्पर शाप दे सहसा विदेह हो गये। उन दोनोंके प्रभाव ब्रह्माजीके समान थे’॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५५॥


* श्रीमद्भागवत (नवम स्कन्ध ६। ४)-में, विष्णुपुराण (४। २। ११)-में तथा महाभारत (अनुशासनपर्व २। ५)-में इक्ष्वाकुके सौ पुत्र बताये गये हैं। इनमें प्रधान थे—विकुक्षि, निमि और दण्ड। इस दृष्टिसे निमि द्वितीय पुत्र सिद्ध होते हैं; परंतु यहाँ मूलमें इनको बारहवाँ बताया गया है। सम्भव है गुण-विशेषके कारण ये तीन प्रधान कहे गये हों और अवस्था-क्रमसे बारहवें ही हों।

छप्पनवाँ सर्ग

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छप्पनवाँ सर्ग

ब्रह्माजीके कहनेसे वसिष्ठका वरुणके वीर्यमें आवेश, वरुणका उर्वशीके समीप एक कुम्भमें अपने वीर्यका आधान तथा मित्रके शापसे उर्वशीका भूतलमें राजा पुरूरवाके पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना

श्रीरामचन्द्रजीके मुखसे कही गयी यह कथा सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मण उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथजीसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ १ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! वे ब्रह्मर्षि और वे भूपाल दोनों देवताओंके भी सम्मानपात्र थे। उन्होंने अपने शरीरोंका त्याग करके फिर नूतन शरीर कैसे ग्रहण किया?’॥ २ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार पूछनेपर इक्ष्वाकुकुलनन्दन महातेजस्वी पुरुषप्रवर श्रीरामने उनसे इस प्रकार कहा— ॥

‘सुमित्रानन्दन! एक-दूसरेके शापसे देह त्याग करके तपस्याके धनी वे धर्मात्मा राजर्षि और ब्रह्मर्षि वायुरूप हो गये॥ ४ ॥

‘महातेजस्वी महामुनि वसिष्ठ शरीररहित हो जानेपर दूसरे शरीरकी प्राप्तिके लिये अपने पिता ब्रह्माजीके पास गये॥ ५ ॥

‘धर्मके ज्ञाता वायुरूप वसिष्ठजीने देवाधिदेव ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम करके उन पितामहसे इस प्रकार कहा— ॥

‘ब्रह्माण्डकटाहसे प्रकट हुए देवाधिदेव महादेव! भगवन्! मैं राजा निमिके शापसे देहहीन हो गया हूँ; अतः वायुरूपमें रह रहा हूँ॥ ७ ॥

‘प्रभो! समस्त देहहीनोंको महान् दुःख होता है और होता रहेगा; क्योंकि देहहीन प्राणीके सभी कार्य लुप्त हो जाते हैं। अतः दूसरे शरीरकी प्राप्तिके लिये आप मुझपर कृपा करें’॥ ८ १/२ ॥

तब अमित तेजस्वी स्वयम्भू ब्रह्माने उनसे कहा— ‘महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ! तुम मित्र और वरुणके छोड़े हुए तेज (वीर्य)-में प्रविष्ट हो जाओ। वहाँ जानेपर भी तुम अयोनिज रूपसे ही उत्पन्न होओगे और महान् धर्मसे युक्त हो पुत्ररूपसे मेरे वशमें आ जाओगे (मेरे पुत्र होनेके कारण तुम्हें पूर्ववत् प्रजापतिका पद प्राप्त होगा।)’॥

‘ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर उनके चरणोंमें प्रणाम तथा उनकी परिक्रमा करके वायुरूप वसिष्ठजी वरुणलोकको चले गये॥ ११ ॥

‘उन्हीं दिनों मित्रदेवता भी वरुणके अधिकारका पालन कर रहे थे। वे वरुणके साथ रहकर समस्त देवेश्वरोंद्वारा पूजित होते थे॥ १२ ॥

‘इसी समय अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशी सखियोंसे घिरी हुई अकस्मात् उस स्थानपर आ गयी॥ १३ ॥

‘उस परम सुन्दरी अप्सराको क्षीरसागरमें नहाती और जलक्रीडा करती देख वरुणके मनमें उर्वशीके लिये अत्यन्त उल्लास प्रकट हुआ॥ १४ ॥

‘उन्होंने प्रफुल्ल कमलके समान नेत्र और पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली उस सुन्दरी अप्सराको समागमके लिये आमन्त्रित किया॥ १५ ॥

‘तब उर्वशीने हाथ जोड़कर वरुणसे कहा— ‘सुरेश्वर! साक्षात् मित्रदेवताने पहलेसे ही मेरा वरण कर लिया है’॥ १६ ॥

यह सुनकर वरुणने कामदेवके बाणोंसे पीड़ित होकर कहा— ‘सुन्दर रूप-रंगवाली सुश्रोणि! यदि तुम मुझसे समागम करना नहीं चाहती तो मैं तुम्हारे समीप इस देवनिर्मित कुम्भमें अपना यह वीर्य छोड़ दूँगा और इस प्रकार छोड़कर ही सफलमनोरथ हो जाऊँगा’॥

लोकनाथ वरुणका यह मनोहर वचन सुनकर उर्वशीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह बोली—॥ १९ ॥

‘प्रभो! आपकी इच्छाके अनुसार ऐसा ही हो। मेरा हृदय विशेषतः आपमें अनुरक्त है और आपका अनुराग भी मुझमें अधिक है; इसलिये आप मेरे उद्देश्यसे उस कुम्भमें वीर्याधान कीजिये। इस शरीरपर तो इस समय मित्रका अधिकार हो चुका है’॥ २० ॥

‘उर्वशीके ऐसा कहनेपर वरुणने प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशमान अपने अत्यन्त अद्भुत तेज (वीर्य)-को उस कुम्भमें डाल दिया॥ २१ ॥

‘तदनन्तर उर्वशी उस स्थानपर गयी, जहाँ मित्रदेवता विराजमान थे। उस समय मित्र अत्यन्त कुपित हो उस उर्वशीसे इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥

‘दुराचारिणि! पहले मैंने तुझे समागमके लिये आमन्त्रित किया था; फिर किसलिये तूने मेरा त्याग किया और क्यों दूसरे पतिका वरण कर लिया?॥ २३ ॥

‘अपने इस पापके कारण मेरे क्रोधसे कलुषित हो तू कुछ कालतक मनुष्यलोकमें जाकर निवास करेगी॥ २४ ॥

‘दुर्बुद्धे! बुधके पुत्र राजर्षि पुरूरवा, जो काशिदेशके राजा हैं, उनके पास चली जा, वे ही तेरे पति होंगे’॥

‘तब वह शाप-दोषसे दूषित हो प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग-झूसी)-में बुधके औरस पुत्र पुरूरवाके पास गयी॥ २६ ॥

‘पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे श्रीमान् आयु नामक महाबली पुत्र हुआ, जिसके पुत्र इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज नहुष थे॥ २७ ॥

‘वृत्रासुरपर वज्रका प्रहार करके जब देवराज इन्द्र ब्रह्महत्याके भयसे दुःखी हो छिप गये थे, तब नहुषने ही एक लाख वर्षोंतक ‘इन्द्र’ पदपर प्रतिष्ठित हो त्रिलोकीके राज्यका शासन किया था॥ २८ ॥

‘मनोहर दाँत और सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी मित्रके दिये हुए उस शापसे भूतलपर चली गयी। वहाँ वह सुन्दरी बहुत वर्षोंतक रही। फिर शापका क्षय होनेपर इन्द्रसभामें चली गयी’॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥

सत्तावनवाँ सर्ग

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सत्तावनवाँ सर्ग

वसिष्ठका नूतन शरीर-धारण और निमिका प्राणियोंके नयनोंमें निवास

उस दिव्य एवं अद्भुत कथाको सुनकर लक्ष्मणको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ १ ॥

‘काकुत्स्थ! वे ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तथा राजर्षि निमि जो देवताओंद्वारा भी सम्मानित थे, अपने-अपने शरीरको छोड़कर फिर नूतन शरीरसे किस प्रकार संयुक्त हुए?’॥ २ ॥

उनका यह प्रश्न सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने महात्मा वसिष्ठके शरीर-ग्रहणसे सम्बन्ध रखनेवाली उस कथाको पुनः कहना आरम्भ किया—॥ ३ ॥

‘रघुश्रेष्ठ! महामना मित्र और वरुणदेवताके तेज (वीर्य) से युक्त जो वह प्रसिद्ध कुम्भ था, उससे दो तेजस्वी ब्राह्मण प्रकट हुए। वे दोनों ही ऋषियोंमें श्रेष्ठ थे॥ ४ ॥

‘पहले उस घटसे महर्षि भगवान् अगस्त्य उत्पन्न हुए और मित्रसे यह कहकर कि ‘मैं आपका पुत्र नहीं हूँ’ वहाँसे अन्यत्र चले गये॥ ५ ॥

‘वह मित्रका तेज था, जो उर्वशीके निमित्तसे पहले ही उस कुम्भमें स्थापित किया गया था। तत्पश्चात् उस कुम्भमें वरुणदेवताका तेज भी सम्मिलित हो गया था॥ ६ ॥

‘तत्पश्चात् कुछ कालके बाद मित्रावरुणके उस वीर्यसे तेजस्वी वसिष्ठ मुनिका प्रादुर्भाव हुआ। जो इक्ष्वाकुकुलके देवता (गुरु या पुरोहित) हुए॥ ७ ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! महातेजस्वी राजा इक्ष्वाकुने उनके वहाँ जन्म ग्रहण करते ही उन अनिन्द्य मुनि वसिष्ठका हमारे इस कुलके हितके लिये पुरोहितके पदपर वरण कर लिया॥ ८ ॥

सौम्य! इस प्रकार नूतन शरीरसे युक्त वसिष्ठ मुनिकी उत्पत्तिका प्रकार बताया गया। अब निमिका जैसा वृत्तान्त है, वह सुनो॥ ९ ॥

‘राजा निमिको देहसे पृथक् हुआ देख उन सभी मनीषी ऋषियोंने स्वयं ही यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके उस यज्ञको पूरा किया॥ १० ॥

‘उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंने पुरवासियों और सेवकोंके साथ रहकर गन्ध, पुष्प और वस्त्रोंसहित राजा निमिके उस शरीरको तेलके कड़ाह आदिमें सुरक्षित रखा॥ ११ ॥

‘तदनन्तर जब यज्ञ समाप्त हुआ, तब वहाँ भृगुने कहा—‘राजन्! (राजाके शरीरके अभिमानी जीवात्मन्!) मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, अतः यदि तुम चाहो तो तुम्हारे जीव-चैतन्यको मैं पुनः इस शरीरमें ला दूँगा’॥ १२ ॥

भृगुके साथ ही अन्य सब देवताओंने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर निमिके जीवात्मासे कहा—‘राजर्षे! वर माँगो। तुम्हारे जीव-चैतन्यको कहाँ स्थापित किया जाय’॥

‘समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर निमिके जीवात्माने उस समय उनसे कहा—‘सुरश्रेष्ठ! मैं समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें निवास करना चाहता हूँ’॥ १४ ॥

तब देवताओंने निमिके जीवात्मासे कहा—‘बहुत अच्छा, तुम वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रोंमें विचरते रहोगे॥ १५ ॥

‘पृथ्वीनाथ! वायुरूपसे विचरते हुए आपके सम्बन्धसे जो थकावट होगी, उसका निवारण करके विश्राम पानेके लिये प्राणियोंके नेत्र बारंबार बंद हो जाया करेंगे’॥ १६ ॥

‘ऐसा कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये; फिर महात्मा ऋषियोंने निमिके शरीरको पकड़ा और उसपर अरणि रखकर उसे बलपूर्वक मथना आरम्भ किया॥ १७ १/२ ॥

‘पूर्ववत् मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम करते हुए उन महात्माओंने जब निमिके पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अरणि-मन्थन आरम्भ किया, तब उस मन्थनसे महातपस्वी मिथि उत्पन्न हुए। इस अद्भुत जन्मका हेतु होनेके कारण वे जनक कहलाये तथा विदेह (जीव रहित शरीर)-से प्रकट होनेके कारण उन्हें वैदेह भी कहा गया। इस प्रकार पहले विदेहराज जनकका नाम महातेजस्वी मिथि हुआ, जिससे यह जनकवंश मैथिल कहलाया॥ १८—२० ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! राजाओंमें श्रेष्ठ निमिके शापसे ब्राह्मण वसिष्ठका और ब्राह्मण वसिष्ठके शापसे राजा निमिका जो अद्भुत जन्म घटित हुआ, उसका सारा कारण मैंने तुम्हें कह सुनाया’॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥

अट्ठावनवाँ सर्ग

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अट्ठावनवाँ सर्ग

ययातिको शुक्राचार्यका शाप

श्रीरामके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने तेजसे प्रज्वलित होते हुए-से महात्मा श्रीरामको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘नृपश्रेष्ठ! राजा विदेह (निमि) तथा वसिष्ठ मुनिका पुरातन वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत और आश्चर्य-जनक है॥ २ ॥

‘परंतु राजा निमि क्षत्रिय, शूरवीर और विशेषतः यज्ञकी दीक्षा लिये हुए थे; अतः उन्होंने महात्मा वसिष्ठके प्रति उचित बर्ताव नहीं किया’ ॥ ३ ॥

लक्ष्मणके इस तरह कहनेपर दूसरोंके मनको रमाने (प्रसन्न रखने)-वालोंमें श्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि श्रीरामने सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता और उद्दीप्त तेजस्वी भ्राता लक्ष्मणसे कहा—॥ ४ १/२ ॥

‘वीर सुमित्राकुमार! सभी पुरुषोंमें वैसी क्षमा नहीं दिखायी देती, जैसी राजा ययातिमें थी। राजा ययातिने सत्त्वगुणके अनुकूल मार्गका आश्रय ले दुःसह रोषको क्षमा कर लिया था। वह प्रसंग बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ५-६ ॥

‘सौम्य! नहुषके पुत्र राजा ययाति पुरवासियों, प्रजाजनोंकी वृद्धि करनेवाले थे। उनके दो पत्नियां थीं, जिनके रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं थी॥ ७ ॥

‘नहुषनन्दन राजर्षि ययातिकी एक पत्नीका नाम शर्मिष्ठा था, जो राजाके द्वारा बहुत ही सम्मानित थी। शर्मिष्ठा दैत्यकुलकी कन्या और वृषपर्वाकी पुत्री थी॥

‘पुरुषप्रवर! उनकी दूसरी पत्नी शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी थी। देवयानी सुन्दरी होनेपर भी राजाको अधिक प्रिय नहीं थी। उन दोनोंके ही पुत्र बड़े रूपवान् हुए। शर्मिष्ठाने पूरुको जन्म दिया और देवयानीने यदुको। वे दोनों बालक अपने चित्तको एकाग्र रखनेवाले थे॥ ९-१० ॥

‘अपनी माताके प्रेमयुक्त व्यवहारसे और अपने गुणोंसे पूरु राजाको अधिक प्रिय था। इससे यदुके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वे मातासे बोले— ॥ ११ ॥

‘मा! तुम अनायास ही महान् कर्म करनेवाले देवस्वरूप शुक्राचार्यके कुलमें उत्पन्न हुईँ हो तो भी यहाँ हार्दिक दुःख और दुःसह अपमान सहती हो॥ १२ ॥

‘अतः देवि! हम दोनों एक साथ ही अग्निमें प्रवेश कर जायें। राजा दैत्यपुत्री शर्मिष्ठाके साथ अनन्त रात्रियोंतक रमते रहें॥ १३ ॥

‘यदि तुम्हें यह सब कुछ सहन करना है तो मुझे ही प्राणत्यागकी आज्ञा दे दो। तुम्हीं सहो। मैं नहीं सहूँगा। मैं निःसंदेह मर जाऊँगा’॥ १४॥

‘अत्यन्त आर्त होकर रोते हुए अपने पुत्र यदुकी यह बात सुनकर देवयानीको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तत्काल अपने पिता शुक्राचार्यजीका स्मरण किया॥

‘शुक्राचार्य अपनी पुत्रीकी उस चेष्टाको जानकर तत्काल उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ देवयानी विद्यमान थी॥ १६ ॥

‘बेटीको अस्वस्थ, अप्रसन्न और अचेत-सी देखकर पिताने पूछा—‘वत्से! यह क्या बात है?’॥ १७ ॥

‘उद्दीप्त तेजवाले पिता भृगुनन्दन शुक्राचार्य जब बारंबार इस प्रकार पूछने लगे, तब देवयानीने अत्यन्त कुपित होकर उनसे कहा—‘मुनिश्रेष्ठ! मैं प्रज्वलित अग्नि या अगाध जलमें प्रवेश कर जाऊँगी अथवा विष खा लूँगी; किंतु इस प्रकार अपमानित होकर जीवित नहीं रह सकूँगी॥ १८-१९ ॥

‘आपको पता नहीं है कि मैं यहाँ कितनी दुःखी और अपमानित हूँ। ब्रह्मन्! वृक्षके प्रति अवहेलना होनेसे उसके आश्रित फूलों और पत्तोंको ही तोड़ा और नष्ट किया जाता है (इसी तरह आपके प्रति राजाके द्वारा अवहेलना होनेसे ही मेरा यहाँ अपमान हो रहा है)॥ २० ॥

‘भृगुनन्दन! राजर्षि ययाति आपके अनादरका भाव रखनेके कारण मेरी भी अवहेलना करते हैं और मुझे अधिक आदर नहीं देते हैं’॥ २१ ॥

‘देवयानीकी यह बात सुनकर भृगुनन्दन शुक्राचार्यको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने नहुषपुत्र ययातिको लक्ष्य करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २२ ॥

‘नहुषकुमार! तुम दुरात्मा होनेके कारण मेरी अवहेलना करते हो, इसलिये तुम्हारी अवस्था जरा-जीर्ण वृद्धके समान हो जायगी—तुम सर्वथा शिथिल हो जाओगे’॥ २३ ॥

‘राजासे ऐसा कहकर पुत्रीको आश्वासन दे महायशस्वी ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य पुनः अपने घरको चले गये॥ २४ ॥

‘सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्राह्मणशिरोमणियोंमें अग्रगण्य शुक्राचार्य देवयानीको आश्वासन दे नहुषपुत्र ययातिको ऐसा कहकर उन्हें पूर्वोक्त शाप दे फिर चले गये’॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८ ॥

उनसठवाँ सर्ग

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उनसठवाँ सर्ग

ययातिका अपने पुत्र पूरुको अपना बुढ़ापा देकर बदलेमें उसका यौवन लेना और भोगोंसे तृप्त होकर पुनः दीर्घकालके बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरुका अपने पिताकी गद्दीपर अभिषेक तथा यदुको शाप

शुक्राचार्यके कुपित होनेका समाचार सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ा दुःख हुआ। उन्हें ऐसी वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो दूसरेकी जवानीसे बदली जा सकती थी। उस विलक्षण जरावस्थाको पाकर राजाने यदुसे कहा— ॥ १ ॥

‘यदो! तुम धर्मके ज्ञाता हो। मेरे महायशस्वी पुत्र! तुम मेरे लिये दूसरेके शरीरमें संचारित करनेके योग्य इस जरावस्थाको ले लो। मैं भोगोंद्वारा रमण करूँगा— अपनी भोगविषयक इच्छाको पूर्ण करूँगा॥ २ ॥

‘नरश्रेष्ठ! अभीतक मैं विषयभोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। इच्छानुसार विषयसुखका अनुभव करके फिर अपनी वृद्धावस्था मैं तुमसे ले लूँगा’॥ ३ ॥

उनकी यह बात सुनकर यदुने नरश्रेष्ठ ययातिको उत्तर दिया— ‘आपके लाड़ले बेटे पूरु ही इस वृद्धावस्थाको ग्रहण करें॥ ४ ॥

‘पृथ्वीनाथ! मुझे तो आपने धनसे तथा पास रहकर लाड़-प्यार पानेके अधिकारसे भी वञ्चित कर दिया है; अतः जिनके साथ बैठकर आप भोजन करते हैं, उन्हीं लोगोंसे युवावस्था ग्रहण कीजिये’॥ ५ ॥

यदुकी यह बात सुनकर राजाने पूरुसे कहा— ‘महाबाहो! मेरी सुख-सुविधाके लिये तुम इस वृद्धावस्थाको ग्रहण कर लो’॥ ६ ॥

नहुष-पुत्र ययातिके ऐसा कहनेपर पूरु हाथ जोड़कर बोले— ‘पिताजी! आपकी सेवाका अवसर पाकर मैं धन्य हो गया। यह आपका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह है। आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये मैं हर तरहसे तैयार हूँ’॥ ७ ॥

पूरुका यह स्वीकारसूचक वचन सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्हें अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और उन्होंने अपनी वृद्धावस्था पूरुके शरीरमें संचारित कर दी॥ ८ ॥

तदनन्तर तरुण हुए राजा ययातिने सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए कई हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन किया॥ ९ ॥

इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजाने पूरुसे कहा—'बेटा! तुम्हारे पास धरोहरके रूपमें रखी हुई मेरी वृद्धावस्थाको मुझे लौटा दो॥ १० ॥

'पुत्र! मैंने वृद्धावस्थाको धरोहरके रूपमें ही तुम्हारे शरीरमें संचारित किया था; इसलिये उसे वापस ले लूँगा। तुम अपने मनमें दुःख न मानना॥ ११ ॥

'महाबाहो! तुमने मेरी आज्ञा मान ली, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। अब मैं बड़े प्रेमसे राजाके पदपर तुम्हारा अभिषेक करूँगा'॥ १२ ॥

अपने पुत्र पूरुसे ऐसा कहकर नहुषकुमार राजा ययाति देवयानीके बेटेसे कुपित होकर बोले—॥ १३ ॥

'यदो! मैंने दुर्जय क्षत्रियके रूपमें तुम-जैसे राक्षसको जन्म दिया। तुमने मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है, अतः तुम अपनी संतानोंको राज्याधिकारी बनानेके विषयमें विफल-मनोरथ हो जाओ॥ १४ ॥

'मैं पिता हूँ, गुरु हूँ; फिर भी तुम मेरा अपमान करते हो, इसलिये भयंकर राक्षसों और यातुधानोंको तुम जन्म दोगे॥ १५ ॥

'तुम्हारी बुद्धि बहुत खोटी है। अतः तुम्हारी संतान सोमकुलमें उत्पन्न वंशपरम्परामें राजाके रूपसे प्रतिष्ठित नहीं होगी। तुम्हारी संतति भी तुम्हारे ही समान उद्दण्ड होगी'॥ १६ ॥

यदुसे ऐसा कहकर राजर्षि ययातिने राज्यकी वृद्धि करनेवाले पूरुको अभिषेकके द्वारा सम्मानित करके वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश किया॥ १७ ॥

तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् प्रारब्ध-भोगका क्षय होनेपर नहुषपुत्र राजा ययातिने शरीरको त्याग दिया और स्वर्गलोकको प्रस्थान किया॥ १८ ॥

उसके बाद महायशस्वी पूरुने महान् धर्मसे संयुक्त हो काशिराजकी श्रेष्ठ राजधानी प्रतिष्ठानपुरमें रहकर उस राज्यका पालन किया॥ १९ ॥

राजकुलसे बहिष्कृत यदुने नगरमें तथा दुर्गम क्रौञ्चवनमें सहस्रों यातुधानोंको जन्म दिया॥ २० ॥

शुक्राचार्यके दिये हुए इस शापको राजा ययातिने क्षत्रियधर्मके अनुसार धारण कर लिया। परंतु राजा निमिने वसिष्ठजीके शापको नहीं सहन किया॥ २१ ॥

सौम्य! यह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें सुना दिया। समस्त कृत्योंका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंकी दृष्टि (विचार)-का ही हम अनुसरण करते हैं, जिससे राजा नृगकी भाँति हमें भी दोष न प्राप्त हो॥ २२ ॥

चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले श्रीराम जब इस प्रकार कथा कह रहे थे, उस समय आकाशमें दो-ही-एक तारे रह गये। पूर्व दिशा अरुण किरणोंसे रञ्जित हो लाल दिखायी देने लगी, मानो कुसुम-रंगमें रँगे हुए अरुण वस्त्रसे उसने अपने अङ्गोंको ढक लिया हो॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५९॥

प्रक्षिप्त सर्ग १\

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प्रक्षिप्त सर्ग १*

श्रीरामके द्वारपर कार्यार्थी कुत्तेका आगमन और श्रीरामका उसे दरबारमें लानेका आदेश

तदनन्तर निर्मल प्रभातकालमें पूर्वाह्नकालोचित संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म करके कमलनयन राजा श्रीराम राजधर्मोंका पालन (प्रजाजनोंके विवादका निपटारा) करनेके लिये वेदवेत्ता ब्राह्मणों, पुरोहित वसिष्ठ तथा कश्यप मुनिके साथ राजसभामें उपस्थित हो धर्म (न्याय)-के आसनपर विराजमान हुए॥ १-२ ॥

वह सभा व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले मन्त्रियों, धर्मशास्त्रोंका पाठ करनेवाले विद्वानों, नीतिज्ञों, राजाओं तथा अन्य सभासदोंसे भरी हुई थी॥ ३ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले राजसिंह श्रीरामकी वह सभा इन्द्र, यम और वरुणकी सभाके समान शोभा पाती थी॥ ४ ॥

वहाँ बैठे हुए भगवान् श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे कहा— 'माता सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर! तुम बाहर निकलो और देखो कि कौन-कौन-से कार्यार्थी उपस्थित हैं। सुमित्राकुमार! तुम उन कार्यार्थियोंको बारी-बारीसे बुलाना आरम्भ करो'॥ ५ १/२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर शुभलक्षण लक्ष्मणने द्वारदेशपर आकर स्वयं ही कार्यार्थियोंको पुकारा, परंतु कोई भी वहाँ यह न कह सका कि मुझे यहाँ कोई कार्य है॥ ६-७ ॥

श्रीरामके राज्य-शासन करते समय न तो कहीं किसीको शारीरिक रोग होते थे और न मानसिक चिन्ताएँ ही सताती थीं। पृथ्वीपर सब प्रकारकी ओषधियाँ (अन्न-फल आदि) उत्पन्न होती थीं और पकी हुई खेती शोभा पाती थी॥ ८ ॥

श्रीरामके राज्यमें न तो बालककी मृत्यु होती थी न युवककी और न मध्यम अवस्थाके पुरुषकी ही। सबका धर्मपूर्वक शासन होता था। किसीके सामने कभी कोई बाधा नहीं आती थी॥ ९ ॥

श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी कोई कार्यार्थी (अभियोग लेकर आनेवाला पुरुष) दिखायी नहीं देता था। लक्ष्मणने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको राज्यकी ऐसी स्थिति बतायी॥