शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
३४ हरिदास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।
है। उत्तम अम्रक टीक गुलाबके फूलके रंगकी और बिल्कुल चिकनी होती है। बेसी अम्रक खानेसे ही इतने गुण होते हैं। बेसी अम्रक हमारे पास है। (दाम ४०) रुपया तोले। यह १००० आँचकी है। ५०० पुटोका (दाम १५) २० तोले और ३०० पुटोका (है) तोले है। अपने-अपने दामोंके अनुसार सभी गुण करती हैं। हमारी ३०० पुटी अम्रक खाकर ही गुण देखलें। जिन्हें भगवान्ने धन दिया है, वे १००० पुटो ही खावें। दूसरा अमृत है। यह सभी आतुओंसे अधिक गुणकारी है।
जस्ता भस्म।
यह भस्म कड़वी, शीतल और कफपित्त नाशक है। यह दस्तावर, नेत्रोंको हितकारी, प्रमेह, पाण्डु और श्वास-नाशक है। इससे शरीर पुष्ट होता और उबर वगैरः नाश होते हैं। मात्रा १ रत्तोसे २ रत्ती तक। नपुंसकतामें जायफल, इलायची, मिश्रो और गायके दूधके साथ तथा प्रमेहमें पानके रसके साथ सेवन करनी चाहिये। (मूल्य २) २० तोले।
शीशा भस्म।
यह भस्म प्रमेह रोग नाश करनेमें बहुत अच्छी है। जो इसे खाता रहता है, वह हाथोंके समान बलवान हो जाता है। इससे रोग नाश होते, जीवन बढ़ता, अग्नि दीप्त होती, कामशक्ति बढ़ती और अकाल मृत्यु दूर होती है। व्रत रोग, कफ रोग, गुल्म, बवासीर, मूल, प्रमेह, क्षय, खाँसी, श्वास, कुम्भ, भ्रम,
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मन्दाग्नि, संग्रहणी और पीलिया आदि रोग नाश हो जाते हैं। मात्रा आधो रस्तीसे दो रस्ती तक है। शरीर-पुष्टिके लिए शोशा भस्म—मिश्रों, जायफल, पीपल और मावेमें खाई जाती है। कमजोरीसे दम फूलनेमें भी इसी तरह खाई जाती है। घोर प्रदर रोगमें पीपलके चूर्ण और काकमाचीके रसमें सेवन की जाती है। (दाम ३) रु० तोले।
लोहा भस्म।
इस भस्मसे बलवीर्ण और आयु बढ़ती है। बहुत दिन सेवन करनेसे कामदेव खूब जोर करता है। इसके सेवन करनेवालेके पास रोग नहीं आते। बड़ी ही ताकतवर चीज़ है। प्रमेहमें त्रिकलाके चूर्णके साथ; पाँचों खाँसियोंमें अङ्गुसेके रसके साथ; शरीर-पुष्टिको छोटी हरड और मिश्रीके साथ—अथवा पीपलके चूर्ण और शहदके साथ; श्वास रोगोंमें लहसन और घाके साथ लोहभस्म सेवन करनी चाहिये। (दाम ४) रु० तोले।
मूगा भस्म।
• यह भस्म मधुर, दीपक, हल्की, वीर्ण और कान्तिवद्धक है। इस भस्मसे त्रिदोष, राजयक्ष्मा, खाँसी, त्रिषदोष और उन्माद आदि रोग नाश होते हैं। हमने इसे क्षय और खाँसी में बहुत आजमाया है। इससे कमजोर और दुबला पतला आदमों खूब बलवान और मोटा-ताज़ा हो जाता है। जो लोग कोई भी
३६ हरिदास पण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता।
भस्म खाना नहीं चाहते, वे मूँगको भस्म बेखटक खावे। उनका शरीर तैयार होगा, धातुकी कमी पूरी होगी, क्षयका नाश होगा और नेत्र-ज्योति बढ़ेगी। अमोर और गरीब सभी तरहके स्त्री-पुरुषोंके लिये मूँगभस्म सर्वोत्तम महोषधि है। दाम १०) रुपया तोले।
मोती भस्म।
मोती भस्म मधुर और शोतल है। राजयक्ष्मा, उरःक्षत, नेत्ररोग, वीर्यकी कमज़ोरी और नाताकृती आदि रोग इससे नाश होते हैं। जिन्हें इनमें से कोई रोग हो, वे "मोती-भस्म" सेवन करें; क्योंकि इससे खाँसो, श्वास, कफक्षय और मन्दाग्नि भी नाश होती है। लगातार खानेसे शरीर हृष्पुष्ट और बलिष्ट होता है। जीर्णज्वरी और सोज़ाक वालोंको भी इससे बड़ा लाभ होता है। जिनको भगवान् ने धन दिया है, वे असल मोती-भस्म सेवन करें। बहुतसे वैद्य मोतियोंको गुलाब-जलमें घोट देते हैं, वह भस्म उतना लाभ नहीं करती। इसके सिवा, वैद्य लोग सस्ते मोती लाकर भस्म बनाते हैं। जो मोती फोका, चपटा, मछली की आँखकी तरह लाल, टेढ़ा-मेढ़ा, खुट्टेवाला, रूखा और ऊँचा नीचा होता है, वह न तो खानेके कामका होता है और न पहननेके। जो मोती आकाशके तारोंकी तरह अमकदार, मोटा, चिकना, गोल, चन्द्रमाकी तरह सफेद, तोलमें भारी और बिना छेदवाला होता है, वही खाने और पहननेके कामका होता है, ऐसा मोती ४०) ५०) रुपये भरसे
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कम नहीं मिलता। फिर इसे पारे और गंधक की कजलीके योगसे फूंकनेमें पूरी मिहनत होती है। शोधनेमें और फूंकनेमें डीज़ भी जाता है। अब आप ही सोचिये, अगर ४०) रुपये भरीके भी मोती लाकर फूँके जायें, तो भस्म किस भाव बेची जाय। आज-कलके भावमें ७०) रुपये भरीसे कममें असल मोतीभस्म मिल नहीं सकती। जो लोग ३०) रु० भरी मोती-भस्म बेचते हैं, वह असल गुणकारक मोती कैसे लगा सकते हैं? हम चीज़ असल बनाते हैं, तभी हमारी दवा गुण करती है। जिसे असल चीज़ लेने होगी, वह आप हो पूरी कीमत देगा। हम ख़राब चीज़ देकर बदनामी क्यों ले? दाम ६०) और ७०) तोले।
मोती-भस्मकी मात्रा आधी रस्तीसे २ रस्ती तक है। ताक़त के लिए १ रस्ती मोती-भस्म "सितोप्लादि चूर्ण" और चाँदीके बर्कोंके साथ सेवन करनी चाहिये। १ रस्ती मोती-भस्म, १ चाँदी का बर्क, १ छोटी हलायची, १ रस्ती वंगेश्वर और १ रस्ती सार—इन सबको शहद या शर्बत अनारमें मिलाकर चाटनेसे महा बलहीन भी बलवान हो जाता है। जिस आदमीको अधिक वीर्यपातके कारण उबर हो, उसे यही मात्रा देनेसे पन्द्रह मिनटमें आराम हो जाता है। देर करनेसे रोगी मर जाता है।
शुद्ध गंधक।
अगर गंधक अच्छी तरह शुद्ध की गई हो, तो परम लाभ करती है। असल शुद्ध गंधक दस्तावर, बुहापा, मृत्यु, खुजली,
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विसर्प, कोढ़, पारैके दोष, क्षय, तिल्ली और वात-कफ नाशक है। प्रमेहकी यह बड़ी ही उत्तम दवा है। गरीब लोग प्रमेहमें हमारे कहनेसे इस अमृत-समान गरीबी दवाको सेवन करें। ई माहोसे तोले भर तक गंधक पुराने गुड़में मिलाकर खाने और ऊपर से धारोण्य दूध पीनेसे बीसों प्रमेह नष्ट हो जाते हैं। कड़वे तेलूके जैसा पेशाब साफ हो जाता है। शहदमें मिलाकर लगातार खानेसे मन्दाग्नि भाग जाती है। कैसा ही नेत्र-रोग हो, छे महीने तक शुद्ध गंधक खानेसे आराम हो जाता और गिद्धकी सी दृष्टि हो जाती है। गंधक शोधनेमें मिहन्त और खर्च पड़ता है, इसलिये लोग दूधमें शोधकर बेचते हैं। हमारे पास असल शोधो हुई गंधक तैयार रहती है, जो फौजन चमत्कार दिखाती है। मूल्य (१) आना तोले।
शुद्ध शिलाजीत ।
शिलाजीतके अगर सारे गुण लिखें तो एक पोथा भर जाय। आज-कल इसके इतिहास जगह-जगह देखनेमें आते हैं। जिनको शिलाजीतकी परख भी नहीं आती, वे भी इसको धड़ाधड़ बेच कर शिलाजीतका नाम बदनाम करते हैं। आज-कल शिलाजीतकी जगह लंगूरोंका गू बेचा जाता है। अगर आपको शिलाजीतकी परख, शिलाजीतमें दगाबाज़ी, शिलाजीत शुद्ध करने और उसे इस्तेमाल करनेकी तैयारी मालूम करनी हों, तो हमारा “चिकित्साचन्द्रोदय”-चौथा भाग देखिये।
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शिलाजीत बुढ़ापे और मृत्युको जीतने वाला, वमन, कम्प-वायु, बीसों प्रमेह, पथरी, शर्करा, रोगमसाना, सोझाक, कफक्षय, श्वास, बाड़ी बवासीर, पीलिया, मृगी, उन्माद, सूजन, कोढ़, ठुमि, हाथी-पाँव और गुल्म इत्यादिको नाश करता है। हमने इसे प्रमेह और मेद रोग ( मोटा होनेका रोग ) पर अनेक बार आजमाया है। इन रोगों पर रामवाण है। जिनका प्रमेह किसी तरह नहीं जाता अथवा जो मुट्पापेसे दुखी हैं, वे हमारा शुद्ध शिलाजीत सेवन करें। शिलाजीत जितना ही अच्छी तरह शोधा जायगा, उतना ही ज़ियादा गुण करेगा। शहद, पीपर, शुद्ध शिलाजीत और १००० पुटी अम्रक मिलाकर सेवन करनेसे बीसों प्रमेह शस्त्रियां आराम हो जाते हैं। शुद्ध शिलाजीत, बंगरुस्म, छोटी इलायची, और बंसलोचनकी गोलियाँ खाकर, दूध पीनेसे प्रमेह, बहुमूत्र, कमजोरी और धातुरोग निश्चय ही जाते रहते हैं। बहुत ही उत्तम असल और शुद्ध शिलाजीतका मूल्य १।) तोले।
गिलोयका सत् ।
• आजकँल असल गिलोयका सत् भी बड़ी मुश्किलसे मिलता है। गिलोयका सत् सस्ती चीज़ है, पर असल हो तो अमृत है। इस सत्त्से बवासीर, कमजोरी, अर्द्धि, कय, मीलिया, जीर्णज्वर, दाह, ज्वर, कोढ़, क्षय, मन्दाग्नि, गुल्म, प्रदर, हिचकी, कामला, प्रमेह और वायुरोग निश्चय ही आराम होते हैं, बशर्ते
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कि लगातार कुछ दिनों तक खाया जाय । त्रिफलेके चूर्ण और मिश्रोमें आधी रत्तीसे २ मासो तक गिलोयका सत्त महीने-डेढ़-महीने खानेसे प्रमेह रोग निश्चय ही आराम हो जाता है । प्रमेह ही नहीं, जितने रोग ऊपर लिखे हैं, वे सभी अनुपानोंको अदल-बदल कर गिलोयका सत्त सेवन करनेसे आराम होते हैं । हमारे यहाँ असल सत्त रहता है । ऐसा अन्यत्र नहीं मिल सकता । दाम १/४ तोले ।
मण्डूर भस्म ।
मण्डूर-भस्म अनुपान विशेषके साथ देनेसे पाण्डु, कामला, हलीमक, यकृत-शोथ, तिल्ली, पेटके रोग, गोला, बवासीर, कृमि, अफारा, शूल, खाँसी और ज्वर आदिको निश्चय ही नाश करता है । पाण्डु रोगमें तो मण्डूर खास दवा ही है । दाम १॥ २० तोले ।
शिरशूलान्तक चूर्ण ।
बहुत लिखना व्यर्थ है ; आपने आज तक सिरका दर्द नाश करनेवाली ऐसी जादूके समान चमत्कारी दवा देखी न होगी । आपके सिरमें दर्द हो, आप एक पुड़िया फाँक कर घड़ी देख लें । ठीक पन्द्रह मिनिटमें आपका दर्द-सिर काफूर हो जायगा । आप ८ मात्राको एक शीशी अवश्य पास रखिये, न जन्में किस समय सिरमें दर्द उठ खड़ा हो । इस दवामें एक और भी गुण है, वह
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यह कि, आपके बदनमें दर्द हो या हल्का सा ज्वर हो, आप एक मात्रा खाकर सो जावे', फौरेन पसीने आकर शरीर हल्का हो जावेगा । दाम ८ मात्राकी शीशी का १) और चार मात्राका ॥)
सर्वसोज्ञाकनाशक चूर्ण
यह चूर्ण पेशाबके समस्त रोगों पर रामवाणका काम करता है। इसको विधानपत्रानुसार सेवन करनेसे पेशाब की जेलन, पेशाबका बूँद-बूँद होना, पेशाबके साथ खून या पीप आना, धोतीमें पीला-पीला दाग लगना, पेडूका भारी रहना, बालकों-का पेशाब चूनासा जम जाना, पेशाब बन्द हो जाना, पेशाब मट-मैला गदला या तेल सा होना अथवा गर्म होना आदि समस्त पेशाब की बीमारियाँ इस चूर्णसे निस्सनन्देह नाश हो जाती हैं। जिनका सोज्ञाक पुराना पड़ गया हो—कभी-कभी पेशाब बन्द हो जाता हो—मूत्रमार्ग सकड़ हो जानेसे सलाई फिराने की जरूरत पड़ती हो, वह खराबे नहीं और लगातार इस चूर्ण को सेवन करे, निस्सनन्देह उनकी इच्छा पूरी होगी। इस चूर्ण के सेवनसे अधिक प्यासका लगना भी मिट जाता है। पेशाबके रोगियोंको यह चूर्ण दूसरा अमृत है। एक शीशी सेवन करते-करते ही लोग खुद तारीफ़के दरिया बहाने लगते हैं। दाम १ शीशीका ३।)
त्रकबरी चूर्ण ।
यह अमृत-सुमार्ग चूर्ण दिल्लीके बादशाह अकबरके लिये
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उस ज़मानेके हकीमोने बनाया था। क़लममें ताक़त नहीं, जो इस चूर्णके पूरे गुण लिख सके। यह चूर्ण खानेमें दिल-खुश और सुस्वादु है, अग्निको जगाता और भोजनको पचाता है। कौसाही अधिक खाना खा लीजिये, फिर पेट खाली-का-खाली हो जायगा। अजीर्ण (बदहज़मी) को पेटमें जाते ही भस्म कर देता है। खट्टी डकारें आना, जी मिचलाना, उल्टी होना, पेट सीरी रहना, पेट की हवा न खुलना, पेट या पेड़ूका कड़ा रहना, पेटमें गोला सा बना रहना, पाखाना साफ़ न होना आदि पेटके सारे रोगोंके नाश करनेमें रामवाण या विष्णु भगवानका सुदर्शन चक्र है। दाम छोटी शीशीका ॥) बड़ीका १) है।
कृष्णविजय तैल।
(चर्मरोगका शत्रु)
अगर आपको या आपके मित्र-पड़ोसियोंको खून-फ़िसादका रोग है, अगर बदनमें लाल रंग या काले रंग चकत्ते हो जाते हैं, अगर दाद, खाज, खुजली और फोड़े-फुन्सियोंसे शरीर खराब हो रहा है या शरीरमें घाव हैं, तो आप हमारा मशहूर "कृष्णविजय तैल" क्यों नहीं लगाते?
हमारे तीन बरसके परीक्षित "कृष्णविजय तैल"से सूखी-बोली खाज-खुजली, फोड़े-फुन्सी या गरमीकी सूजन, अपरस, सेंहुआ, सफेद दाग और भभूत आदि चमड़ेके ऊपर होनेवाले समस्त रोग जादूकी तरह आराम होते हैं। जिनका बिगड़ा खून अंग-
हो। दास एण्ड कम्पनी, २०१ हरिसन रोड, कलकत्ता। ४३
रेजी सालसे की शीशियों-पर-शीशियाँ पीनेसे न आराम हुआ हो, जिनके शरीरके घाव अँगरेजी नामी दवा "कारबोलिक आयल" या "आयडोफार्म" से न आराम हुए हों, वे एक बार इस नामी "कृष्णविजय तेल" की परीक्षा जरूर करें। यह तेल कभी निष्फल नहीं होता। गये ३० बरसमें इसने लाखों रोगियों को सड़नेसे बचाया है। जिसके नाखून गल कर गिरे गये हों, यदि वह शस्त्र भी इस अमृत-समान "कृष्णविजय तेल" को कुछ दिन बराबर लगाता जावे, तो निस्सन्देह उसके फिर नये नाखून निकल आवेंगे। यदि यह "कृष्णविजय तेल" किसी अँगरेजी दवाखानेमें होता; तो अच्छे लेबल, चमकदार शीशी और दवाखानेके अनाप-शनाप खर्चके कारण २) रुपये शीशीसे कममें न बिकता, परन्तु हमने स्वदेशी दवाका प्रचार करने और गरीब-अमीर सबको फायदा पहुँचानेकी गुरुत्वे इसकी दश तोलेकी शीशीका दाम सिर्फ़ लागत मात्र १) रखवा है।
मस्तकशूलनाशक तेल।
(सिर-दर्द नाशक अद्भुत तेल)
इस तेलको स्नान करनेसे पहिले रोज़ सिरमें लगानेसे सिरके सारे रोग नाश हो जाते हैं। इसकी तरी की तारीफ़ नहीं हो सकती। यह तेल बालोंको काले-रसीले और चिकने रखता है। आँख-नकसे मैला पानी निकाल कर मगज़ और आँखोंको ठण्डा कर देता है। पढ़ने-लिखनेमें चित्त लगाता और माथेकी