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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

और तमाम दुनियाका दान देनेवाला था, आगे मै उसकी कथा

( १२ ) सिंहासनबत्तीसी.

करताथा, बड़ा उसका दबदबा था, देवताओंका पूजनेवाला और तमाम दुनियाका दान देनेवाला था, आगे मै उसकी कथा तेरेवास्ते कहती हूं राजा ! कान देके सुनो. उपामस्वयंवर उस नगरीका राजा था, जातका ब्राह्मण पर बड़ा राजा हुआ, तब गंधर्वसेन उसका नाम हर तरफ बजने लगा और उसके घरमे चारि वर्णकी रानियां थीं-ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या, शूद्रा. उसमें जो ब्राह्मणी थी सो बहुत अच्छी सूरत और नाज़ुक थी. इसके एक बेटा हुआ सो बड़ा पंडित हुआ. ब्राह्मणीत उसका नाम रक्खा. ऐसा ऐ राजा ! कोई दुनियामें पंडित न था, जित- ने इल्म थे सो सब उसने पढेथे. यहांतक कि, मौतकाभी अहवाल कहदेता. और क्षत्रियासे तीन बेटे हुए, उन्होंने क्षत्रियोंका धर्म अक्तियार किया, एकका नाम शंख, दूसरेका नाम विक्रम, ती- सरेका नाम भर्तृहरि. एकसे एक बली था सब जगमें उनका नाम मशहूर था और उ हे कल्पवृक्ष दुनियाके लोग कहतेथे और बेश्यासे बेटा जो हुआ उनका नाम चंद्र रक्खा, वह बड़ा सुखी और रहमदिल था, शूद्रीसे जो बेटा हुआ उसका नाम धन्वंतरि रक्खा था, वैद्योमें वह बड़ा वैद्य था, छह बेटे राजाके हुए, एकसे एक अच्छे गरज़ अमरसिंहके घरानेमे सबके सब खूब हुए, और वह जो ब्राह्मणीसे हुआथा वही राजा- की दीवानी करताथा, उसमे जब कोई तक़सीर हुई तब राजाने

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खिदमत लेली. वह लड़का वहांसे निकलकर धारापुरमें आया. अय राजा ! वहां सब तुम्हारे बुजुर्ग थे. उसे उन सबोंने माना, बड़ी आव भगत की. वहाका राजा तुम्हारा बाप था. कितनी मुद्दतके बाद उसने दगा करके उस राजाको मारडाला और आप वहांका राज लेकर उज्जैन नगरीमें आया और यहां आकर मरगया. शंख जो बडा बेटा क्षत्रियाके पेटका था सो वहां आकर वहांका राजा हुआ, राज करने लगा. और औ यह अहवाल है कि, एकरोज पंडितोंने आकर राजा शंखसे कहा कि, तेरा दुश्मन दुनियामें पैदा हुआ. यह बात पंडितोंके मुंहं सुनकर वह भौचक रहगया. ब्राह्मण कहने लगे-हम सब शास्त्र देखा है, उससे यही अहवाल निकलता है, कि, जो हमने तुझसे कहा. मगर एक बात और है कि हम उसे मुंहसे निकाल नहीं सकते. तब राजाने कहा-खैर, जो तुमने यह बात कही तो वहभी कहो ! तब उन्होंने कहा-हमारे विचारमें यह आता है कि, शंखको मार राजा विक्रम यह राज करे. यह बात सुनकर राजा हंसा और कहने लगा, ये पंडित बावले हैं, उन्हें कुछ ज्ञान नहीं. इसलिये ऐसी बात कहते हैं. यह बात अनसुनी कर राजा चुप रहा. पण्डित अपने दिलमें शरमिंदा हुए कि, हमारे शास्त्रको इसने झूठा जाना और हमको दिवाना ठहराया. जब कितने एक दिन इस बातपर गुजरे तब पण्डित अपने मकान-

(१४) सिंहासनबत्तीसी.

नोंमें बैठकर नजूम देखने लगे. उनमेंसे एक पंडित बोला-मेरे विचारमें यह आता है कि, राजा विक्रम कहीं नजदीक आन पहुँचा है. तब दूसरा उनमेंसे बोला-यहाँके किसी जंगलमें है. और एक उनमेंसे कहने लगा, उस जंगलमें एक तालाबभी है, वहीं अखाड़ा करके रहा है. तब एक ब्राह्मण उनमेंसे उठ खड़ा हुआ और जंगलको चला. वहां जाकर क्या देखता है कि, एक तालाब उसी राजा विक्रम तपस्या करता है मट्टीका एक महादेव बनाकर उसकी पूजा करता है और दंडवत् कर रहा है यह देखकर पंडित उलटा आया और सब पंडितोंको साथ लेकर राजाके नेारा गया और राजासे कहने लगा कि, तुम हमारे शास्त्रको झूठ मानते थे पर अब हम देखके आये हैं. फलाने जंगलमें राजा विक्रमादित्य आन पहुँचा. राजा शंख उस रोज सुनकर चुप रहा. सुबहको उठा और उस बनमें जातेही छिपकर देखने लगा कि, वह क्या करता है जहां राजा वीर विक्रमादित्य बैठा था वहांसे वह उठा पर तालावमें नहाकर फिर अपने आसनपर आकर बैठा और उसी तरहसे महादेवकी पूजा करने लगा. ओर यह : राजाभी निकलकर वहां जाकर खड़ा हुआ. जब वह विक्रम : महादेवकी पूजा कर चुका तब उसी महादेवकी पिण्डीपर उसने : पेशाब किया. जितने लोग राजाके साथ आयेथे, वे सब कहने : लगे कि, इसकी बुद्धि मारी गई है, कि पूजेहुये देवपर इसने

सिंहासनबत्तीसी. ( १५ ) थूता. तब एक पंडित उनमेंसे बोला कि, उठो महाराज! यह तुमने क्या किया ! तब वह बोला, कि हम जातिके ब्राह्मण हैं देवताको पूजें या मिट्टीको ! तब ब्राह्मणोंने कहा, राजा ! कुछ हम अच्छा नहीं देखते, क्योंकि तुम्हारी मत कुमत होगई. जब मरनेका दिन आदमीका नजदीक आताहै तो उसका मति मारी जाती है. तब राजा बोला, तुम दिवाने होगये हो और मुझेभी बावला बनाते हो, जो भगवानने लिखा है वही होवेगा उसको कोईभी मिटा नहीं सकता. तब पंडित आपसमें कहने लगे इस राजाने क्या अपना अकाज किया है ? तब राजा शंखने बिक्र- मको मारनेकी यह फिकिर की कि सात लकीर कोयलेरो जादूकी काढी और उनपर भुस फैला दिया जो जरा मालूम न हो. और उन लकीरोंका यह गुण था कि, जो उनके ऊपर पांव धरे सो बावला होजाय. और एक खीरा मँगाकर जादू किया और एक छुरी पढकर हाथमे रक्खा. उस छुरी खीरेका यह असर था कि जो उस छुरीसे खीरा काटे उसका शिर कट जाय. पंडितोने कहा-आप उ० बुलाओ. उन, लकीरोंपर पाव धरके जो आवेगा तो वह दिवाना हो जावेगा. बावला होकर यह खीरा जो अपने हाथसे लेकर काटेगा तो शिर उसका कट जायगा. जितने क्षत्रिय राजाके साथ आयेथे वे सब अपने दिलमें फिक्रमंद हुए कि, इस राजाने दगा किया है. यह क्षत्रियोंका धर्म नहीं.

( १६ ) सिंहासनबत्तीसी.

राजाने विक्रमादित्यको बुलाके कहा-हम तुम बैठकर एकजगह खीरा खावें. वह राजा योगी था, और इस इल्मको जानता था. उन लकीरोंसे बचकर सिंहासनके पास जाकर खडा रहा. खीरा और छुरा उसके हाथमेंसे लेलो. दाहिने हाथमें छुरी रक्खी और बाये हाथमे खीरा लिया. राजा शंख गाफील था फुरती करके छतसे छुरी मारी और राजाका काम तमाम किया. यह बात रत्नमं- जरीने जाहिर की और कहा कि-हे राजा ! तूं इस बातका सुन. खुदा जो रहम करे तो तिनकेसे पहाड करे और गजब करे तो पहाड़से जो तिनका किताबमें जो लिखा है, वह कभी झूठ नहीं होता. जब मांके पेटमें इन्सान आता है चार बातें साथ लाता है नफा और नुकसान दुःख और सुख. तीन लोक और चौदह भुवन फिरे लेकिन किस्मतका लिखा नहीं मिटता. भाईको मारा, दिलमें खुश हुआ उसके लोहूका माथेपर टीका लगा लिया. चलकर सिंहासनपर बैठा और चंवर ढुलवाया. उस राजाकी रानी उसके साथ सती हुई तब यह राजनीतिसे न्याय करने लगा. और जितने राजा उसके राजमें ये सब सुनकर खुश हुए. मुजरेको आये और दोनों वक्त दरबारमें हाजिर रहने लगे. इसी तरहसे राजा राज करने लगा. कितनें एक दिनोंके बाद एक दिन राजा शिकारको चला. तब कुत्ते, बाज, बहरी और जितने शिकारी जानवर थे सो सब साथ लिये. और जितने अच्छे-

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अच्छे गुलचले ओर तीरंदाज थे, साथ लिये, जाकर एक जंग- लमें पहुंचे वहां हिरनके पीछे राजाने अपना घोड़ा डाला. तब राजा आगे बढ़गया और सबके साथ कोई भी न पहुँचा. एक बड़े जंगलमे राजा जा निकला और वहा जाकर सोच करने लगा कि, मैं कहां आया ? राहभी भूला और साथभी गवाँया इतनेमें जो निगाह की तो एक बड़ा दरख्त देखा और उस- दरख्तकी फुनगीपर चढ़गया वहांसे देखने लगा, जंगलही- जंगल नजर आताथा. मगर एक तरफ जो देखा तो एक शहर नजर आया. उसको देखकर राजाकी एक ढाढ़ससी बँधी वह नगर जो देखा तो निहायत आबाद है. कबूतर वहां उड रहे हैं चीलहे मडरा रही हैं. सूर्य्यकी झलकसे हवेलियोंके कलश चमक रहे हैं यह देख कहने लगा कि, यह नया शहर मैने देखा. कल इसे छीनलूगा. और इस नगरके राजाका दीवान जिसका नाम लूनबरन था वह कौवेके भेससे रहता था. उस तरफसे खडा हुआ आताथा. उसने यह राजा मुँहसे बात सुनी और बहुत दिलमे खपा हुवा. गुस्सेसे उसके मुँहमें बीट करदी. राजा गजवमें आया. इतनेमें लोग कुछ उसके वहां आप पहुँचे, उनके साथ होकर अपने शहरमें दाखिल होगया. और दीवानको हुक्म किया कि जहानमे जहां तक कौवे हैं वे सब पकड़ लावो. यह सुनतेही चारों तरफ बहेलिये

( १८ ) सिंहासनबत्तीसी दौड़े और कौवे पकड़ पकड़ लाये, और पींजरेमें बंद किये राजाने जाकर उन कौवोंसे कहा-अरे चांडाळा ! वह कौनसा कौवा था कि जिसने हमारे मुँहपर बीट की ? तुम सच कहोगे तो हम सबको छोड़ देंगे, नहीं कहोगे तो सबको मार डालेंगे. यह राजाकी बात सुनके सब कौवे बोले-महाराज ! हममें कोई कौवा नहीं रहा जो पकड़ा नहीं आया और वह काम हमसे नहीं हुआ. तब राजा जियादः खफा हुआ और बोला कि- तुम सबके सिवाय वह कौन कौवा है कि जिसने यह काम किया ? तब उन्होंने कहा-महाराज ! सच पूछते हो तो हम कहते हैं, बाहुबल एक राजा है, उदय अस्तग उसका राज है, और उसका दीवान लूतबरन बड़ा दानी बहुत होशियार पंडित है, वह कौवेके भेसमें रहता है. यह काम उसका हो तो हो; क्योंकि कौवेकी सूरत एक वह बच रहा है. तब राजाने कहा वह किस तरहसे हमारे पास आवै ? उसका बयान कुछ समझ- कर मुझे इलाज बताओ ? कोई तुम्हारे यहांसे वकील जाय और उसको ले आवै, तुम अपने यहांसे दो कौवोंको भेजदो और वे जाकर उसको यहां ले आवें. तब उन्हींमेंसे दो कौवे वहीं गये. उनकी लूतबरनने बहुतसी आव भगत की और पूँछा कि, तुम यहां किसलिये आयेहो ? तब वे बोले महाराज ! तुम्हारे वगर हम सब कौवे मारे जातेहैं. इसवास्ते जो तुम राजा

पहली पुतली १. ( १९ )

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विक्रमादित्यके पास चलो तो हम सबोंकी जान बचे तब लूतबरन बोला-धन्य भाग जो तुम मेरे पास अपना मतलब समझकर आयेहो. जो कुछ काम मुझसे होगा उसके लिये मैं कभी ना न करूंगा. यह कहकर अपने राजाके पास आया और राजासे हुक्म लेकर उनके साथ गया. जब सब कौवोंने उस दीवानको देखा तब वे राजासे कहने लगे कि-महाराज ! आप जिसका नाम लेतेथे वह यही आता है. राजाने देखकर उसे आदर करके आधी गद्दीपर बिठाया और क्षेम कुशल पूंछी. वो आसीस देकर बोला राजा ! किसलिये तुमने मुझे याद किया ! और किसवास्ते इन सबको बंद किया ! जब लूतबरनने यह बात पूछी तब राजा विक्रम कहने लगां-मैं एकदिन शिकारको गयाथा. इत्तिफाकन जंगलमें राह भूलगया तब एक बरगदपर चढकर चारों तरफ देखने लगा इतनेमें एक कौवेने मुझपर बीट करदी. इसलिये मैंने सब कौवोंको बंद किया. जबतक इन- मेंसे कोई सच न कहेगा तबतक एक कौवा इनमेंसे न छोडूंगा. बल्कि जानसे इन सबको मारूंगा. फिर लूतबरन बोला-महाराज ! यह काम सब मेरा है. जब तुम्हें मैंने मगरूर देखा तब मेरे मनमें गुस्सा आया, और अकल मेरी उसवक्त जाती रही. यह सुनकर राजा हँसा. और बिगड़कर कहने लगा. मुझे मगरूर क्यों न हो ? राजा मैं हूं, दाता मैं हूं, सिपाही

[header] ( २० ) सिंहासनबत्तीसी. मैं हूं. और कौनसी बात मुझमें नहीं है? सो तुम कहो, तब वह बोला-वह जो नगर तुमने नजर भरके देखा है उसका में सब बयान करताहूं. राजा बाहुबल नाम वहांका कदीम राजा है. और गंधर्वसेन बाप तुम्हारा उसका दीवान था. राजाको उसकी तरफसे कुछ बेइतबारी हुई तब उसे छुड़ादिया. वह नगर अंबावतीमें आया और उस जगहका राजा हुआ. उसका बेटा तूं विक्रम है. तुझे जगमें कौन नहीं जानता? पर जबतक राजा बाहुबल तुझे राजतिलक न देगा तबतक तेरा राज अचल न होगा और वह जो यह तेरी ख़बर पावेगा तब वही तेरेपर चढ़कर दौड़ेगा और तुझे आकर एक घड़ीमें राखके बराबर करदेगा इस वास्ते तुझे जो मैं सलाह दूंगा उसे मान और किसी तरहसे उस राजाके पास जाकर राजाको मोहबत दिलाकर तिलक उससे ले, जिससे यहांका अचल राज तू करे. राजा विक्रम बड़ा अकलमंद था, इसवास्ते इस बातपर कायम रहा ऐसी बातें लतबरनसे सुनकर कुछ दिलमें न लाया और हँसकर कानदे सब सुनी. फिर लतबरनने कहा-जो तुम्हें चलना हो तो हमारे साथ चलो और पंडितोंसों अच्छी साअत दिखाकर चलनेकी तैयारी करो. दूसरे दिन सुबहके वक्त राजा लतबरन मंत्रीके साथ होकर चला और राजा बाहुबलके नगरमें जाकर पहुंचा तब उस दीवानने राजा विक्रमसों

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:

कहा-यहां बैठो और मैं अपने राजाको तुम्हारे आनेकी खबर दूं. यह बात राजासे कहकर लूनबरन अपने राजाके मंदिरमें गया उसको प्रणाम किया. और सब समाचार और अपनी हकीकतसमेत राजाका अहवाल कहने लगा-महाराज ? गंधर्व- सेनका बेटा विक्रम आपके दर्शनके लिये आया है. यह बात बाहुबल राजाने सुनकर उसको तुरंत अंदर बुलाया. तब लूनब- रन राजा विक्रमको लाया और अपने राजासे मिलाया. राजा उससे उठकर मिला और आदर करके आधे आसनपर बिठाया और क्षेम कुशल पूछी बाद उसके रहनेके लिये मकान बताया राजा उठकर उस मकानमें आया, वहा रहने लगा. जब दस पांच दिन बीतगये तब दीवानसे राजा विक्रमने कहा-हमें तुम विदा करवा दो, तो हम अपने स्थानको जावें तब मंत्री कहने लगा-हमारे राजाका यह स्वभाव है कि जो उनसे मिलनेको आताहै उसे अपना रुखसत नहीं करते, तुम रुखसत मांगो और जिस बातकी ख्वाहिश हो सो कहो, अपने जीमें कुछ शर्म न करो. तब राजा बोला-मुझे कुछ नहीं चाहिये. जो कोई जो बर चाहे सो मुझसे ले. तब दीवान बोला-राजा ! यह हमारी बात सुनो. इस राजाके घरमें एक सिंहासन है सो वह सिंहासन पहले महादेवजीने राजा इंद्रको दियाथा और इंद्र राजाने इसको दिया. उस सिंहासनमें ऐसा गुण है कि, जो उसपर बैठे

( १२ ) सिंहासनबत्तीसी. सो सात द्वीप और नौ खंड पृथ्वीका अजीत होकर राज करे और बहुतसा जबाहिर उसमें जटा है. और उस सिंहासनमें बत्तीस पुतलियांभी बनी हैं. अमृत देकर उनको सांचेमें ढाला है. तुम रुखसत होते हुए वह सिंहासन राजाजी मांगो कि उसपर बैठकर आनंदसे राज करेंगे. यह रातको दीवाननें सलाह दी. और सुबहको राजाके दरबारमें दीवानने जाके खबर दी कि, महाराज ! विक्रम रुखसत होताहै और आपके पास आनेको बाहर खडा है. यह सुनकर राजा फिर फौरन दरवाजेपर आया ओर विक्रमने देखकर अपना माथा नवाया राजानें विक्रमसे कहा जो तुम्हारे जीमें आवे सो मांगो मैं खुश होकर तुमको वही दूंगा तब विक्रम बोला-महाराज ! जो आपने मुझपर दया की है, तो वह सिंहासन मुझे बकशो, जो इंद्रने आपको दिया है. यह बात सुनकर राजा बोला-अच्छा, सिंहासन तो हमने तुम्हें दिया, पर, यह काम मंत्रीका है, इसे तुम नहीं जानतेथे. यह कहकर सिंहासन मँगाया और पान तिलक देकर उस सिंहासनपर बिठाया और कहा कि-तुम अजीत हुए. अब किसी बातकी चिंता मनमे न करना, गंधर्वसेन मेरा बडा दोस्त था और तू उसके खान- दानमें बडा नामवर हुवा. इस तरहसे राजा विक्रमको आसीस देकर रुखसत किया. राजा वहांसे अपने घरमें आया.

पहली पुतली १. ( २३ )

पहली पुतली १. ( २३ )

और अपने जीमें बहुतसा खुश हुआ, और जितने उस राजाके दुश्मन थे उनके जीमें रंज हुआ राजाके देशके लोगोंने बहुत खुशीकी और सब द्वीपद्वीपके राजा खिदमतके वास्ते आये, और जो राजा गरूर था उसका वहां जाकर राज छीन लेलीया, और अपना राज करता, गरज उदयसे अस्ततक खूब उसने अपना राज किया, सब रैय्यत आनंदसो उस राजमें बसती थी, और जो क्षत्रिय थे सो सब उनको डरते थे और जो कोई देश विदेश जाता था सो वहां विक्रमका धर्म सुनता था, और सब मुल्क आबाद देखता था, कहीं दुःखी उसे नजर न आता था, डाड और बांध उसके राजभरमे किसीने कानसे न सुना, बल्कि घर घर आवाज वेद और पुराणकी आती थी, और जितने लोग थे वे सब स्नान ध्यान करके तीनो वख्त अपने भगवानकी यादमें रहते थे, अपने घरमें सब राजा किसी सभा करके खुश रहते थे, राजा राजप्रजा सुखी, इसके एक दिन राजा विक्रमादित्यने सभा की ओर सब पंडितोंको बुलाया, और पंडितोंसे राजाने पूँछा कि--मेरे जीमें है कि अब मै संवत बांधूं, सो तुमसो पूँछताहूँ कि, मै इसबातके लायक हूँ कि नहीं हूं ? सो तुम शास्त्र देखकर मुझसे विचारके कहो, सब पंडितोंने विचार करके राजासे कहा--महाराज ! अब जो तुम्हारा प्रताप है सो तीनो भुवनोमें छाय रहाहै, इस वास्ते जो

( २४ ) सिंहासनबत्तीसी.

कुछ तुम्हें करना है सो कीजिये. दुश्मन तुम्हारा कोई नहीं राजाने यह सुनकर पंडितोंसे कहा कि—अब तुम बताओ कि, किस बुद्धीसे संवत् बांधू ? जो कुछ शास्त्रकी रीतिमे मुनासिब हो तिस तरहसे हमें कहो ? तब पंडितोंने कहा—पहले तो तुम अजीतमाल पहनो, फिर उसके बाद देश देशके ब्राह्मण और जमीनदार, राजा और अपने सब कुटुंबके लोग बुलावो. सवालाख कन्यादान सवालाख ब्राह्मणोंको करो. और जितने ब्राह्मण तुम्हारे मुल्कके हैं उनकी वृत्ति करदो. एक बरसका खजाना जमीदारोंको माफ करो और जो भूखा, कंगाल इस बरसमें आवे उसको वृत्तिका हुक्म करो. इसी तौरसे राजाने सब काम किया. और सिवा इसके जो जो दान पुण्य किया उनका बयान किससे हो ? एक बरसतक राजा अपने घरमें बैठे पुराण सुनता रहा और इस तरहसे संवत् बांधा, कि तमाम दुनियाके लोक धन्य धन्य करतेथे. यह सब अहवाल राजाको रत्नमंजरीने सुनाया और राजा विक्रमादि- त्यका यश गाया. और कहा—राजा भोज ! जो तुम इतने हो तो इस सिंहासनपर बैठो. सुनके राजाने कहा सच है जो कुछ तूने कहा यह बात मुझेभी पसंद आई. इतना कहकर राजा अपनी सभामें जाकर बैठा. और दीवान मुसदियोंको बुलाया कि, तुम सब तैयारी संवत् बांधनेकी करो. इस दिनकी वह

दूसरी पुतली २. ( २७ )

दूसरी पुतली २. ( २७ ) साअत यों टलगई दूसरे दिन फिर राजाने सिंहासनपर बैठनेकी तय्यारी फरमाई और दीवानको बुलाकर कहा कि-तुम सब तुरतही इसकी तैयारी करो. देर नहीं लगाना. यह बात सुनकर वररुचि पुरोहित बोला-राजा ! अभी क्यों घबराते हो? इस सिंहासनकी एक एक पुतली तुमसे बात करेगी. उन सबकी बातें सुनकर पीछे जो कुछ आपको करना होगा सो कीजिये. यह पुरोहितका बचन सुनकर राजाने उस सिंहासनके पास जाकर उसपर पांव बढ़ाकर रक्खा इतनेमें चित्ररेखा नामक- दूसरी पुतली २ बोली कि, राजा ! तेरे योग्य यह आसन नहीं, और ऐसी अनीति कोई करता नहीं जो तू करनेपर तैय्यार हुआ है. इस सिंहासनपर बैठ वह, जो विक्रमादित्यसा राजा हो. तब राजा बोला-विक्रममे क्या क्या गुण थे? सो मुझसे कहो. तब वह बोली-एक दिन राजा विक्रम कैलासको गया, और वहां एक यतीसे मुलाकात हुई तब उसने राजाको योगकी रीति सब बताई. राजाने अपने मनमें इरादा किया कि, अब योग कमावें. ऐसा बिचार कर योग करनेको तैयार हुआ और राजतिलक भर्तृ-

( २६ ) सिंहासनबत्तीसी. रिको दिया और राज पाटपर उसे बिठा आप राजकाज सब धन दौलत छोड कंथा पहन भस्म लगा संन्यासी बनकर जंग- लको निकल गया और उत्तरखंडमें जाकर योग साधने लगा. उस शहरके जंगलमे एक ब्राह्मण तपस्या करताथा. धुवा पीके रहता था और भूख प्यासके दुःख सहताथा. ब्राह्मणकी तपस्या देखके देवता खुश हुए. और उसको बर देने लगे और उसने न लिया तब आकाशवाणी हुई कि, हम अमृत भेजते हैं सो तू ले. एक देवता आदमीकी सूरतमें आकार उसे फल दे यह कहगया कि, जो इसको तू खावेगा, तो चिरंजीव होगा. फल लेकर वह तुरंत चला खुशी खुशीसे अपने घरको आया. और ब्राह्म णीके हाथमें वह फल दिया, और, कहा कि, आज देवताओने अमृतफल देकर कहा जो इसे खावेगा सो अमर हो जावेगा. यह बात सुनकर ब्राह्मणी व्याकुल हो रोने लगी. फिर बोली- यह अब दुःख आया. पाप हम किस तरहसे काटेंगे ? और हमेशह भीख क्यों कर माँगें ? खाल मास सब हाडमे मिल जायगा ऐसे जीनेसे मरजाना बेहतर है. मर जानेवालेको इतना दुःख नहीं होता, इस फलको वह खावेगा जो हमेशा उठावेगा इससे योग्य, यह है कि, तुम इस फलको ले जाकर राजाको दो; और उनसे कुछ धन लो. यह सुनकर ब्राह्मण अपने जीमें समझा, यह सच है, इस संसारमें इतना जंजाल कौन है इसी तरह आपसमें बाते सलाहकी करके ब्राह्मण वहांसे उठ

दूसरी पुतली २. ( २७ )

दूसरी पुतली २. ( २७ )

राजाके पास चलागया. जब राजाके द्वारपर पहुँचा तब द्वार- पालसे कहा कि, राजाको खबर दो कि ब्राह्मण आपके लिए एक फल लाया है. दरवानने राजासे जाकर अर्ज की, कि महाराज ! एक ब्राह्मण फल आपके वास्ते लाया है और दरवाजेपर हाजिर हैं. जो कुछ हुक्म हो राजाने उसीवखत हुक्म किया कि उसे अभी लाओ. तब हरकारेने वहीं हाजिर किया. ब्राह्म- णने राजाको आकर आसीस दी कि, धर्मलाभ हो और यह फल राजाके हाथ दिया. राजाने उसको हाथमें लेकर पूँछा इसका सब वृत्तांत कहो ? तब ब्राह्मण कहने लगा-स्वामी ! मैने जो तपस्या की थी सो देखकर देवताओने उसका बर अमर- फल मुझको दिया. अब मै अमर होकर क्या करूँगा ? इस वास्ते इस फलको तुम खाओ और अमर हो; क्योंकि तुमसे लाखो जी जीते हैं. यह सुनकर राजा हँसा. और उसे लाख रुपये दिये और गांव वृत्ति करके बिदा कर दिया. फिर अपने जीमें विचार करने लगा कि, मैं तो पुरुष हूँ कमजोर न हूँगा. इसवास्ते यह फल रानीको दिया चाहिये, कारण वह मेरे प्राणका आधार है. वह जीती रहेगी तो मैं सुखभोग करूँगा. यह दिलमें ठानकर राजा महलमें दाखिल हुआ. फल रानीको दिखाया. रानी हँसकर पूँछने लगी. महाराज ! यह क्या चीज है ? जिसे बडे यत्नसे लिये हुये तुम यहा आये हो ? इसका ब्योरा कहो ? तब राजाने कहा-सुन सुंदरी ! तू जो इस फलको खायगी तो

( २८ ) सिंहासनबत्तीसी. सदा यौवनवती रहेगी. दिनादिन रूप बढ़ेगा और अमर होगी. यह अहवाल रानीने सुनकर फल राजाके हाथसे लेलिया. और कहा-महाराज ! मैं इसे खाऊंगी. राजा फल देकर बाहर गया. और रानीका जो एक मित्र कोतवाल था, रानीने उसे बुलाकर इसके हाथमें वह फल दिया और उसे कहा-यह हमें राजाने देकर कहा है, जो इसे खावेगा सो अमर होगा. इसवास्ते तुम मेरे दोस्त प्यारे हो, इसे खाओ और अमर हो; तो मुझे बडी खुशी हो. यह सुनतेही कोतवालने खुश होकर फल हाथमें लेलि- या और अपने मकानको गया एक कसबी उसकी आश्ना थी उसे वह फल देकर कहा यह अमरफल मैं तेरे वास्ते लायाहूं. तू इसे खा. यह सुनकर उसने हाथसे लेलिया, और उसे बिदा किया. फिर इसने अपने जीमें बिचारा कि, एक तो मैं कसबी हूँ, और अमर हूंगी तो कितना पाप मैं कमाऊंगी. इससे बेहतर है कि, यह फल राजाको जाकर दीजिये. जो राजा जियेगा तो मुझे याद करेगा. और पुण्य होवेगा, पाप सभी कटेंगे. यह मनमें सोचकर राजाके दरबारमें गई और वह फल राजाके हाथमें दिया. राजा फलको देखकर बेसुध हुआ, और अपने जीमें कहने लगा कि यह फल तो मैंने रानीको दियाथा. जीमें यह विचार अचंभा होरहा, और हँसकर उसे पूछने लगा कि, यह फल तुझे किसने दियाथा ? वह वे सब बातें जानतीथी, पर राजासे फकत यह

दूसरी पुतली ( २९ )

दूसरी पुतली ( २९ )

कहा कि, मुझे कोतवालने दिया है. यह सुनकर उसने समझ लिया कि, रानीने बुरा काम किया उसे कुछ रुपये देकर बिदा किया और आप भौंचक रहगया. फिर समझकर कहने लगा-मैने तो मन अपना रानीको दिया और उसने अपना दिल कोतवालको. मनका भेदी कोई न मिला ऐसे जीनेको और मेरी बुद्धिको धिक्कार है, जो मैं फिर राज करूँ ! फिर उस रानीके ताई और लअनत उस कोतवालको और उस वेश्याको और कामदेवको धिक्कार है, जो यह मति संसारकी करता है कि, जिससे संसार अहमद हो जाता है. बाद उस फलको लिये हुये महलमें गया और अपने चित्तमें कहने लगा-यह तन, मन, धन, जी सब चंचल है. और यह संसार जानहार है. इसमें कोई कायम न होगा. जबहीं पैदा हुआ तबहीं कालने खाया और जब मरता है तो कुछ साथ नहीं लेजाता. और मेरा मेरा करके जन्म गँवाता है, सुखके सब साथी है. और दुःख कोई नहीं बांटता. यह संसार जो है सो समुद्र है और माया उसका जल है. ममता मछली है. ऐसा बधिक कोई न मिला कि जो इसको मारके खाय. यह विचार करता हुवा रानीके पास गया. और उसे पूछा तूने वह फल क्या किया ? तब वह बोली-महाराज ! मैंने खाया. सुनकर राजाने वही फल रानीको दिखाया तब वह देखकर जड हो गई. तब राजा उस फलको लेकर बाहर आया और धोकर

( ३० ) सिंहासनबत्तीसी.

खाया. तिस पीछे सोच उसको हुआ. निदान बनके जानेका सामान किया. गज, पाट, धन, दौलत और रानीकी मोहब्बत तजकर चला, न किसीसे पूछा न किसीको साथ लिया. ऐसा निर्मोही होकर निकला कि, किसीका ध्यान न किया. देश देश और नगर नगरमें चर्चा हुई कि राजा भर्तृहरि राज तजकर योगी हुआ. और वह बात उड़ती उड़ती राजा इंद्रके अखाड़ेमें पहुँची कि, राजा तो देश छोड़के चला गया, और उसके देशमें बड़ा हुल्लड़ हुआ, तब यह बात सुनकर सब देवताओंने मिल कर विचार किया कि, एक देवको रखवालीके वास्ते राजा भर्तृहरिके देशमें भेजदो, कि कोई बिदअत रैयतपर न करे. ऐसा ठहराय देवको बुलाकर वहां भेजदिया, और कहा वहांकी निगाहबानी कर. वहां तो वह रखवाली करता था, और यहां राजा विक्रमका योग पूरा हुआ, वह अपने मनमें मनसूबा करता था कि, मैं छोटे भाईको राज देकर आयाहूं इस वास्ते अब चल कर देखूं कि वह किसतरह राज करता है? यह अपने दिलमें कहके चला और रातको नगरके पास आन पहुँचा. देवने उसे आते देखा तब वह पुकारा-तू कौन है? जो इस वक्त शहरमें जाता है। या तो अपना नाम बता, नहीं तो मैं तुझे मार डालताहूं. तब उसने कहा-मैं राजा विक्रम हूं तू कौन है? जो मुझे रोकता है? तब देव बोला-मेरे तईं देवताओंने भर्तृहरिके

दूसरी पुतली २. ( ३१ )

दूसरी पुतली २. ( ३१ ) राज्यकी रखवाली करनेके वास्ते भेजा है. राजाने पूछा-भर्तृहरिको क्या हुआ ! उसने जवाब दिया भर्तृहरिको कोई यहांसे छलकर लेगया यह बात सुनकर राजा हँसा और उसे कहा-वह तो मेरा छोटा भाई है. फिर देव बोला, मैं नही जानताहूं कि तुम कौन हो और जो तुम निकम इस देशके राजा हो तो मुझसे लडो और मुझे मारकर जाओ बिना लडे मैं तुझे शहरमें पैठने न दूंगा. यह सुन राजा बिगडके बोला-तू मेरे तईं क्या डरता है ? और जो लडा चाहे तो मैं तय्यार हूं. इस तरह दोनों बातें कर तैयार हो लडने लगे और राजा उस देवको पछाड़कर छातीपर चढ़ बैठा. तब वह बोला-राजा ! तू मुझसे वर माँग, मैं तुझे दूंगा. यह बात उसकी सुनकर राजा हसकर बोला-मैने तुझे पछाड़ा है और चाहे तो तुझे मार डालूं-तू मुझे वरदान क्या देगा ? तब वह बोला-राजा ! तू मुझे छोड़दे मैं तेरे आगे इसका सब ब्यौरा कहताहूं. तेरे राज्यकी धूम सब देशमें है और सब राजा तुझसे डरतेहैं पर मैं जो बात कहूं सो तू कान देकर सुन. तेरे शहरमें एक तेली है और एक कुम्हार सो तुझको मारनेको फिक्रमं है पर तुम तीनोंमेंसे जो दोनोंको मारेगा वही अचल राज करेगा. तेली तो पातालका राज करताहै और वह कुम्हार योगी बना हुआ जंगलमें तपस्या अपने जीमें लाकर करताहै. दिल्लमें कहताहै कि, राजाको मारके तेलीको तेलके जलते कडाहमें