सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
तेईसवीं पुतली २३. (१५३)
तेईसवीं पुतली २३. (१५३) देखा तो बीस तपस्वी आसन मारे जिस ध्यानमे बैठे थे योंके योंही रहगये हैं और जान एकमेंभी नहीं. यह सुनकर राजा हँसा और मंत्रीसे बोला कि, तू सुन मैं उसका विचार तुझसे कहता हू कि वह जो तूने तपस्वी सांकलमें लटकता हुआ देखा वह तो मेरी देह है. मैने उस जन्ममें ऐसी कठिन तपस्या की थी कि उसका फल यह राज मुझे मिला है और जो वह बीस सिद्ध तूने देखे सो बीसों दास हैं कि, जो तूने ला दिये और उस तपस्याके तेजसे मेरे आगे कोई नहीं ठहर सकता. उसी बलसे मैंने शंखको मारा और यह पूर्वजन्मका लिखा था इसमें मेरा कुछ दोष नहीं. जबतक मैं इस पृथ्वीमें अखंड राज करूंगा तबतक तू मंत्री रहेगा. तू अपने जीमें चिंता मतकर. इसमें दोष तेरा भी कुछ नहीं. जैसा पूर्वजन्मका लिखा था सो हुआ और जैसी तब उन्होंने मेरी सेवा कीथी वैसाही अब उसके फलभोग करेंगे. तब उन्होंने मेरेसाथ जी दिया था उस लिये मै उन बीसोंको अपने निकट रक्खा है. यह अपना परिचय दिखानेके लिये तुझसे निठुराई की थी. अब तेरा मन पतियाया. और तूने हमारा मर्म बूझा. क्योंकि सब लोग कहते हैं विक्रमने अपने बड़े भाईको मारा इसमें दोष मेरा कुछ नहीं और जो कर्मका लिखा है सो हो रहता है. आजसे मैंने तुझे अपना प्रधान किया. और जिसमें राजकाज अच्छा होवे वह कीजो. यह बात किसीके आगे मत कहियो किसलिये कि, जो सुनेगा सो राजके लोभसे
योग कमावेगा. इतनी बात कहणावती पुतली कहकर बोली कि,
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( १५४ ) सिंहासनबत्तीसी. योग कमावेगा. इतनी बात कहणावती पुतली कहकर बोली कि, सुन राजा भोज ! जितना बीरविक्रमादित्यका राज था तिसका भार उसने दीवानको दे मुखत्यार करदिया, और राज पाट हवाले करदिया. जो इसके समान तू होगा तो इस सिंहासनपर बैठनेको नाम ले नहीं तो यह खयाल दिलसे दूर कर. वह साअत और वह दिनभी राजाका टल गया. दूसरे दिन सुबह आन फिर सिंहासनके पास खड़ा रहा. तब चित्रकला- चौबीसवीं पुतली- बोली सुन राजा भोज ! मैं एक दिनकी हकीकत राजा बीर विक्रमादित्यकी तेरे आगे कहती हूं, तू दिलमें अपने खूब तरह समझ. एक दिन राजा विक्रमादित्य नदीके किनारे दशहराको नहाने गया था. वहाँ जाकर देखे तो एक रंडी बनियेकी जवान खूब सूरत नदीके तीर खडी हुई बाल सुखाती है और सामने उसके साह- कारका बच्चा बैठा तिलक दे रहा है. आपसमें दोनोंकी सैन चल रहीथी. कभी तो यह स्त्री हाथ नचाय भौंहें मटकाय बाल सुखाती है और कभी शिरका अचला छातीसे सरका बदन दिखा फिर छिपाती है, कभी आरसी दिखा चूमकर छातीसे
चौबीसवीं पुतली २४. ( १६६ )
चौबीसवीं पुतली २४. ( १६६ )
लगाती है इस तरहसे अनेक रीतिसे चेष्टा कर रही है और वह भी इसी तरह इशारे कर रहा है. उन दोनोंकी हालत देख राजाने अपने जीमें विचारा कि इतना तमाशा देखा चाहिये कि, ये क्या करते है. राजाने स्नान ध्यान अपनाभी सब किया. पर उनकी ओरभी देखता रहा. इतनेमें वह स्त्री स्नान कर चद्दर ओढ घूँघट कर अपने घरकू चली और साहुकार बच्चाभी उसके पीछे चला. राजाने एक हलकारा उन दोनोंके पीछे लगाया और उस हलकारेको कह दिया कि इन दोनोंका मकान देख सबसे वाकिफ हो और हमे जल्दी खबर दे. जब वह औरत अपने घरमें गई तब उसने फिरकर देखा और शिर खोलकर दिखाया. फिर छातीपर हाथ धर अपने मंदिरमें गई और सेठके बेटेनेभी अपनी छातीपर हाथ रख लिया. यह खबर हलकारेने आ राजाको दी तब राजाभी अपनी सभामें आकर बैठा और एक पंडितसे पूँछा कि कोई स्त्रीचरित्र हमें सुनाओ कि हमारा जी सुनना चाहता है. तब पंडितने उत्तर दिया कि महाराज ! मेरा तो क्या सामर्थ्य है जो मैं स्त्रियोंका चरित्र और पुरुषका भाग कहूँ. ब्रह्माभी नहीं जानता, आदमीकी तो क्या कुदरत है ! और यह देखतेही बन आवै जबानसे कहा नहीं जाता. यह बात पंडितसे सुन राजा चुप हो रहा. और अपने जीमें कहा यह चरित देखा चाहिये. इतनेमें शाम होगई राजा उठ महालमें गया और कुछ खा तुरंत बाहर निकल आया और
(११६) सिंहासनबचीसी.
उस हलकारैको बुलाकर कहा कि तू, इस बातका ब्यौरा कुछ समझ गया है क्या ? तब उसने जबाब दिया कि महाराज कुछ मेरे जीमें आया है पर आपके आगे मुझे कहते शंका होती है. तब राजाने कहा कि तू जो समझा है सो निडर होकर बयान कर. वह बोला महाराज ! उसने जो शिर खोलकर छाती- पर हाथ रखखा शो उसने कहा कि जिस वक्त अँधेरी रात होगी तब मैं तुझसे मिलूंगा और उसनेभी छातीपर हाथ रख जबाब दिया कि, अच्छा दासकी समझमें यह कुछ आता है राजा कहा तू तो सब समझा है यही उनका मतलब है. मैंनेभी बडी देरतक घाटपर बैठे उनका मुद्धा मालूम कियाथा. पर तू अब मेरे तईं उसके घर लेचल. हलकारेने कहा अच्छा मैं हाजिर हूं महाराज ! चलिये. तब राजा हलकारेको ले उसके मकानके पास आया और उसको बिदा किया पिछवाडे चौबारेके एक खिडकी थी उसमेंसे चिरागकी ज्योति नजर आतीथी और कभी २ जो झाँकती थी तो उसकी झलकभी मालूम होतीथी जब जब दो प्रहर रात गुजरी और खूब अंधेरी होगया तब राजाने उधरसे एक कंकरी उस खिडकीमें मारी लगतेही वह झाँकि राजाको देख यह जाना कि वही पुरुष यहां आन पहुंचा. तब उसने तमाम घरका जवाहिर और सब गहना एक डब्बेमें भरा और साथ लेकर निकल राजा के पास आई कहा कि, यह ले और मुझे लेकर चल. राजाने कहा यों तो मैं तुझे न ले जाऊंगा क्योंकि तेरा खाविंद जाती
चौबीसवीं पुतली २४. (१९७)
चौबीसवीं पुतली २४. (१९७)
है जो कभी खबर पायेगा तो राजाके दरबारमें फरियादको जायगा. तब राजा तुझे और मुझे मार डालेगा. इससे बेहतर यह है कि, पहिले तू इसे मार फिर आवो निडर हो हम तुम सुखसे भोग करें. उसने विलंब कुछ न किया सुनतेही घरमें जा कटारी मारकर फिर राजाके पास चली आई और वह जवा- हिरांका डब्बा राजाके पास दिया. और दोनों इस तरहसे नगरके बाहर गये. फिर आगे आगे राजा और पीछे वह स्त्री. जब नदीके किनारे पहुँचे तब राजां वहांही खड़ा हुआ. और अपने जीमें बिचार करने लगा कि, जिसने अपने स्वामीको मारनेमें विलंब न किया उससे दूसरेकी क्या भलाई होगी ? इस वास्ते अब इससे जुदा होइये और इसका चरित्र क्या क्या है सो देखिये कि, अब यह क्या करती है ? यह दिलमें विचार कर राजाने कहा ऐ सुंदरी ! मैं देखूं पहले इस नदीमे जल कितना है ? जो मै इस नदीकी थाह पाऊं तो इसी रास्ते तुझको भी ले चलूंगा. यह कह राजा नदीमें पैठा. और पैरकर पारका रास्ता लिया. जब उस किनारे जा पहुँचा तब पुकारकर कहा कि मैं तो पार उतर आया. पर तुझे ला नहीं सक्ता क्योंकि इसमें पानी तो अथाह है. यह कह राजाने आगेकी राहली तब उस औरतने अपने मनमें बिचारा कि, द्रव्य तो सब उसके हाथ लगा है इसके लोभसे वह मुझे छोड़
लगी और पुकारा कि, दौडो, मेरे खाविंदको चोर मारके भागे
( १९८ ) सिंहासनबत्तीसी.
गया अभी रात कुछ बाकी है बेहतर कि, फिर घर चलिये और स्वामीके साथ जलिये. यह दिलमे ठानकर अपने घरमे गई और खाविंदके पास जा कूक मार हाय हाय कर रोने लगी और पुकारा कि, दौडो, मेरे खाविंदको चोर मारके भागे जाते हैं और घरकी सब माया लिये जाते हैं. यह रोनेकी आवाज सुन बाहरके सब लोग दौड आये और पूछने लगे कि चोर किधर गये हैं ? उसने कहा अभी इसी रास्तेसे निकल गये. लोग तो ढूँढने लगे और यह शिर पटक पटक रो रो कहतीथी कि, मेरा सुहाग लूटकर मुझे अनाथ किये जाता है सब लोग कुटुंबके समझाने लगे कि, यह तो भगवानकी माया हे इसमें किसीका बश नहीं चलता. जब मौत आती है तब कुछ बहाना लिये आती है इसके दिन पूरे हो चुके और कौन किसीको यो मार सकता है और कोन किसीको जिला सकता है. तू अपने जीमे ढाढस बांध और इसकी गतिकर. तब यह बोली मैं भी इसके साथ सती हूंगी. क्योंकि मेरा जगत्मे इस बख्त कोई नहीं कि, मेरा सहाय करे. लोगोने बहुतेरा सम- झाया, पर उसने न माना और खाविंदको ले नदीके किनारे गई और चिता बना उसको लेकर आपही जलनेको बैठी. उस बख्त तमाम नगरके लोग देखने आये. उसी बख्त राजाभी वहां आकर खडा हुआ और उसने खातिर जमासे आग अपने
हाथसे चितामे लगाई और सम्भल बैठी जब कपडे और बाल उसके जलकर बदनमे आंच लगी तब घबराकर उठी और सब लोग देखकर हँसे. वह चितामेसे कूद नदीमे जा पडी. तब राजासे चुप न रहा गया. और कहा कि अय सुन्दरी ! यह क्या है? वह बोली सुनो राजा ! इसका मर्म जाकर अपने घरमें पूछो और मै जो अपने कर्ममें लिखा लायीथी उसीका फल पाया. पर तूने अपने घरका भेद न पाया. हम सात सखियां इस नगरमें हैं उनमेकी एक मैं हूं और छः तेरे घरमे हैं ! यह कह वह तो पानी डूबगई. राजा अपने मनमे दुःख पा महलमें आया और छिप रहा. किसीको दिखाई न दिया. एक दिन और एक रात वहां लगा रहा. दूसरी रात जब हुई तब आधी रातके समय छहो रानियां हाथोंमें कंचनके थाल मिठाई पकवानसे भरभर लेकर महलके पिछवाडीकी वाडीमें गई. उसके आगे एक बन था. उस बनमे एक मठी थी. उसमें एक योगी ध्यान लगाये बैठा था. ये छहो रानिया दंडवते कर वहीं जा बैठीं. वहा राजाभी जो उसके पीछे पीछे आया था. यह अह- वाल देखने लगा. जब सिद्ध अपने ध्यानसे निश्चित हुआ, और उनसे हँस हँस बातें करने लगा. और जिसकदर ये मिठाई पकान लेगईथी सो सब आगे रख दिया. उसने भोजन किया और पान खाकर एक योगविद्याकी एक देहकी छे देह
( १६० ) सिंहासनबत्तीसी. भयी और उन छहों रानियोंसे भोग किया. फिर वे छहों रानियों बिदा हो अपने मंदिरको चली आईं. राजा यह चरित्र देख अपने मनमें विचार करने लगा कि, इस सिद्धने क्या किया कि अपना योग भ्रष्ट किया और उनका धर्म खोया. यह विचार कर राजा सिद्धके सोहीं जाकर खड़ा रहा. सिद्ध मनमें कुछ शंका लिये बोला कि, हे नृपती ! कहांसे आये हो अपने मनका मुझसे भाव कहो. तब राजाने कहा मुझे आपके दर्शनकी इच्छा थी. इस लिये मै यहां आया हूं. तब वह योगी बोला कि राजा ! तू मुझसे जो कामना मांगे सो तेरी पूरी करूं फिर राजाने कहा कि स्वामी ! एक देहकी छः दह किस तरहसे बनें वह विद्या मै आपके पास मांगता हूं मुझे बताओ नहीं तो मैं तुझे जानसे मार डालता हूं, इसका विचार कर, जबाब दो. इतनी बात कह पुतली कहने लगी कि, सुन राजा भोज जब विक्रमने सिद्धसे ये बातें कहीं तब उसने डरके वह विद्या दी. और राजाने वहां परीक्षा करली. तिस पीछे योगीको तलवार मार उसके टुकडे टुकडे कर डाल दिया. फिर वहांसे निकल महलमे आया और जहां छहों- रानियां बैठीं थीं वहां आनकर राजाभी बैठ गया. तब राजाको देखकर छहों उठकर खिदमतमे हाजिर हुई. किसीने पंखा हि- लाया, किसीने हाथ मुंह धुलाया, किसीने पान बना खिलाया इसी तरह सब अपनी २ बीती राजासे प्रकाश करने लगी. और
चौबीसवीं पुतली २४. ( १६१)
चौबीसवीं पुतली २४. ( १६१) ज्यों ज्यों वे प्यार करती थीं त्यों त्यों राजा मान करता था, फिर राजा बोला सुनो-सुंदरियो ! मैं तुमसे हित करता हूं और तुम मुझसे अनहित कर औरका ध्यान धरो यह तुम्हे उचित नहीं. तब वे बोलीं कि, महाराज ! हमारे तो प्राणरक्षक तुम हो, तुम्हे देखे बिना हम जीतीं नहीं तुम्हारा ध्यान हम आठो पहर करती हैं जो कभी तुम कहीं बाहर जाते हौ तो हम चकोरकी तरह तुम्हारे मुखचंद्रके देखनेको तरसती हैं. और जैसे जल बिना मीन तडके तैसे हम व्याकुल रहती हैं और क्षणभरके वियोगमें जलकमलकी तरह हम कुम्हला जाती हैं.' यह सुन राजा क्रोधकर मुस्कुराया और बोला-सच है, सुंदरियो ! हमने जाना तुम्हारा दिल मुझे नहीं छोडता जैसे एक सिद्धके छह सिद्ध होगये और फिर वह एकही सिद्ध हो गया. यह सुन रानियां एकदम चुप होकर बोलीं कि-महाराज ! ऐसी अचरजकी बात तुम कहते हो जो कभी न देखी न सुनी और किसीको इतिवारभी जिसका न आवे. क्यों कर एक देहकी छह देह होयं और इस बातको कौन मानेगा ? तब राजाने कहा कि-चलो हम तुम्हें दिखादे तब छहोंको अपने साथ ले उसी बाड़ीमें जा उस गुफाका मुँह खोल दिया. देख कर वे शरमागईं और अपने मनमें जाना कि, राजाने हमारा सब चरित्र देखा. फिर राजाने कहा कि, तुमने जाना या नहीं. यह सुनकर उन्होंने नीच गरदनें कर जवाब कुछ न दिया. ११
( १६२ ) सिंहासनबत्तीसी.
तब राजाने छहोंका शिर काट उस गुंफामें डाला और उसका मुँह बंद कर चला २ मंदिरमें आया. और आतेही नगरमें ढँढोरा फिरा दिया कि जितने ब्राह्मण और ब्राह्मणियां और ब्राह्म- णोंकी कन्या हैं वे सब यहां आनकर हाजिर होवें. यह सुनकर सब हाजिर हुई जितने रानियोंके गहने और वस्त्र थे सब ब्राह्मणियोंको पहनाये. और एक एक ब्राह्मणको एक एक गांव वृत्ति करदिया. और जितनी कन्या थीं उनको दान दहेज़ दे व्याह कर दिया. और आप राजकाज करने लगा. इतनी बात कह पुतली समझाने लगी कि, सुन राजा भोज ! तू बड़ा पंडित है पर इस आसनपर वह बैठेगा, जो विक्रमादित्यके समान होगा. तब वह साअत गुजर गई. राजाभी वहांसे उठकर अपने मकानको गया. रातको इसी सोचमें पडा रहा. दूसरे दिन सुबहको फिर सिंहासनके पास आकर चढ़नेके तयार हुआ तब जयलक्ष्मी-
पचीसवीं पुतली-
बोली-सुन, राजा भोज ! एक दिनकी बात मैं तेरे आगे कहतीहूं एक भाट निपट दरिद्री खररावहक था. सब पृथ्वीके राजाओंके पास फिर आयाथा. और एक कौ-
पचीसवीं पुतली २५. ( १६३ )
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डेका किसीसे उसने फायदा न पाया था. जब अपने घरमें आया तो देखा कि बेटी जवान व्याहनेके लायक हुई है. यह अपने जीमें चिंताही करताथा कि, उसकी भाटिन बोल उठी कि, तमाम देश तुम फिर आये पर जो कमाई कर लाये सो कहो. तब उसने जवाब दिया कि, मेरे प्रारब्धमें धन नहीं. मैं इस लिये कि. तमाम राजाओंके पास गया. और शिष्टाचार उन्होंने सब किया; पर एक दाम न हाथ आया. अब मेरे जीमें एक बात आती है. राजा बीरविक्रमादित्य बाकी रहगया है उसके पासभी जाकर माँगूं जो मेरे जीका संदेह मिटे. फिर वह भाटिन बोली-अब तुम कहीं मत जाओ और संतोषकर रहो. कर्मका लिखा फल यहीं बैठे पाओगे. फिर भाटने कहा कि, राजा वीरविक्रमादित्य सुनते है कि बड़ा दानी है, उसके पास अपनी कामनों जो ले गया है वह खाली हाथ नहीं फिरा और अपने मकसदको पहुँचा है. ये बाते कर वह राजाके पास चला और गणेशजीको मनाय राजाके सन्मुख जा खडा रहा. तब राजाने दंडवत् की और वह आशीष देकर बोला कि-हे राजा ! बहुत भूमि पै फिर आया हूं और आपका यश मुझे यहां ले आया है. आप इस मर्त्यलोकमें इंद्रका अवतार हो. आपकी बराबर दानी इस संसारमें कोई नहीं. इस समयमें आप दान देनेमें राजा हरिश्चंद्र हो और तमाम पृथ्वीमें आपकाही यश छाय रहा है. और स्वामी मैं कालिकासुत हूं. भाटवंशमें आनकर अवतार लिया है और
यहाँ पृष्ठ पर दिए गए पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
( १६४ ) सिंहासनबत्तीसी. अब तुम्हें याचने आयाहूं, मेरा मनोरथ पूर्ण करदो. मैंने संसारमें फिरकर खूब देखा कि, सिवाय तुम्हारे मेरी आशाका पुजानेवाला और और कोई नहीं. तब हँसकर राजाने कहा कि, तू अपना मतलब सब मेरे आगे प्रकाश करके कह तो मैं तेरी कामना पूरी करूं. भाटने कहा-यों मुझे अपने कर्मका भरोसा नहीं आप बचन दीजिये तो मैं खातिरजमासे कहूं. तब राजाने बचन दिया. भाट बोला-महाराज ! मुझे मुंहमांगा दान दीजिये, मेरी पुत्रीकी शादी करदो बारह बरसकी कन्या मेरे घरमें बैठी है, इस लिये मैं आपके पारा याचने आया हूं, यह सुन राजाने हँसकर मंत्रीसे कहा कि, जो यह मांगे वह इसे दो. फिर भाटने कहा-महाराज ! जो कुछ आपको देना है सो अपने सम्मुख मँगा- कर दीजिये मुझे इस संसारमें अब किसीका इतबार नही. राजाने दश लाख रुपये रोक और हीरे, लाल, मोती, सोने, रूपेके गहने था ल भरकर दिये. और वह ले आशीश दे अपने घरमें गया. जो कुछ लाया था सो सब ब्याहमें लगाया और राजाने उसके पीछे जासूद कर दिये थे कि तुम देखो कि, 'यह धनको लेजाकर क्या करता है,' ? इसकी खबर ठीक मुझे लाकर दो. जब शादी कर चुका और उसके पास एक दिनेके खानेको कुछ न रहा तब उन हलकारोंने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! उस भाटने ऐसा ब्याह बेटीका किया कि इस कलियुगमें कोई और करसकता नहीं. जो कुछ वो आपके पाससे धन दौलत लेगया
छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ )
छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ ) सो सब क्षणभरमें बेटीको दे ब्याह दिया. यह सुन राजाने और कई लाखैं रुपये उसके घर भेज दिये. और अपने चित्तमें बहुत प्रसन्न हुआ कि, धन्य भाग्य मेरा है जो मेरे राजमे ऐसे हिम्मत- वाले लोग हैं. इतनी बात कह पुतली बोली कि सुन राजा भोज ! इतना.धन देकरभी राजाने उसका खर्च सुन और दौलत भेज दी ऐसा दानी तू हो तो इस सिंहासनपर बैठ और नहीं तो मनके लड्डू खानेसे कुछ हाँसिल नहीं है. यह सुनकर राज अपने महलमें आया. फिर सुबह हुआ तो स्नान पूजा कर वहीं आन पहुंचा इतनेमें विद्यावती नाम— छब्बीसवीं पुतली— कहने लगी कि, सुन राजा भोज ! मैं तेरे आगे ज्ञानकी बात कहती हूं और तू मन देकर कान रख जब आदमी जन्मता है तो कुछ नहीं संग लाता और मरता है तो कुछ नहीं लेजाता. इस जीवितका फल यही है कि, संसारमें आकर कुछ करनी करे, और जैसी करनी करेगा वैसाही फल पावेगा. और संसारमें जीवन थोडा है इससे ऐसा यश करो कि, जानेपरभी जगमें नाम ठहरा रहे. दोनों लोकोंमें सुख पावे. यह मनुष्यजन्म बारंबार नहीं पाता देह पाता है. और लक्ष्मी दान कर कुछ सोच मत कर. यही अपने
बैकुंठ पाया. ये बाते पुतलीकी सुन राजा भोज बोला कि, राजा
( १६६ ) सिंहासनबत्तीसी. जीमें सदा रख कि, दान हमेशा किया कीजिये यह भयरूप जो संसारसागर है इसके तरनेको सिवाय दान, उपकार और हरि- भजनके चौथा उपाय नहीं. मैंने तुझे कहा कि, साथ कोई कुछ ले नहीं जाता. मैं तेरे आगे सब कहतीहूं कि, राजा हरिश्चंद्र, राजा कर्ण, राजा बीरविक्रमादित्य क्या ले गये ! और जिन्होंने दान उपकार हरिभजन किया उनका जगमे नाम रहा और अंतसमय बैकुंठ पाया. ये बाते पुतलीकी सुन राजा भोज बोला कि, राजा विक्रमादित्यने क्या किया है ! वह कह. तब विद्यामती पुतली बो- ली कि, एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य राजसभामें बैठा था तब एक दासीने आकर अरज किया कि, महाराज ! उठिये पूजाका समय जाता है. यह सुनकर राजाने विचार कि, इसने सच कहा मेरी उमर चली जाती है और मुझसे ज्ञान, धर्म, पूजा बन नहीं आई इससे उत्तम यही है कि, इस राजकाजकी माया भुलाय आप योग कमाइये जो कि और जन्ममें काम आवे. यह राजाने अपने जीमें विचार और राजपाट, धन जन मिथ्या समझकर तपश्या करनेको एक बनको चला ओर यह विचार करता जाताथा कि, इस संसारमें जीना सबेरेकी ओसकी समान है और जिसके भरोसेमें मैंने अपना काम अकारण गवाँया. यह विचार करता हुआ पूर्वजन्ममें दान, व्रत, तपश्या बहुत कर आता है तो यह नर- हुआ राजा एक महाबनमें जा पहुँचा वहां जाकर देखे तो
छब्बीसवीं पुतली २६. (१६७)
छब्बीसवीं पुतली २६. (१६७) एक मंडली तपस्वियोंकी बैठी हुई है. धुनी एक एकके आगे जागे रही है, आसन मारमार अपने अपने ध्यानमें लीन हो रहे हैं. कोई ऊर्ध्वबाहु, कोई कपाली आसन मार, कोई पचाग्नि, इस रीतिसे अनेक अनेक प्रकारकी साधना कर रहे हैं और कोई कोई उनमें बैठ शरीरसे मास काट काट होम कर रहा है. इस तरहसे उनकी तपस्या देख राजाभी तपस्या करने लगा. आपभी तपश्या कर- ताथा और कईएक दिनमें तपस्वियोंने अपना शरीर होमने लगा- कर दिया. उनकी देखादेखी राजाभी अपना शरीर सब होम कई महीनोमें राजाने एक दिन शिरभी अपना काट होम कर- दिया. वहां जो एक शिवका मंदिर था उसमेंसे एक शिवगण निकला और निकलकर सब तपस्वियोंकी धुनीमेंसे राख समेट कर जुदी जुदी ढेरी की और फिर जा शिवको खबर दी कि, महाराज ! आपने कहाथा सो मैंने किया तब शिवने आज्ञा दी कि, यह अमृत तू लेजा और उनके ऊपर छिड़क आ. यह आज्ञा पाय अमृत ला ज्यों ज्यों छिड़कताथा त्यों त्यों उनमें एक २ आदमी शिव शिव रामराम कहकर खडा रहताथा. सब पर तो उसने छिडक दिया पर राजाकी धुनी भूल गया और सब तपस्वी मिलकर शिवकी स्तुति करने लगे कि, महाराज ! आपका भक्त राजाभी है आप अनाथके नाथ हो जिसने आपका स्मरण किया तिसको तभी तुमने फल दिया और जहां जहां सेवकोंक
( १६८ ) सिंहासनबत्तीसी.
संकट हुआ है तहां तहां उसका सहाय किया है. यह स्तुति करके उन तपस्वियोंने कहा कि, महाराज ! एक नृपतिभी हमारे साथ तपस्या करता था, मालूम नहीं कि, उसको उठानेकी आपकी आज्ञा हुई कि नहीं यह सुन महादेवने उस गणके तरफ देखा. देख- तेही उसने अमृत ले जाकर जो धुनी बाकी रहीथी उसपर छिड़- का राजाभी हरिहर कहता उठ खडा हुआ और हाथ जोड स्तुति करने लगा कि, महाराज ! संसारके सब जीवोंकी आप सहाय करते हैं और पालते हैं आप बिना इस संसारसागरसे कौन पार उतारे ? जिसने जगमें आपको नहीं पहुँचाना उसने अपना जन्म निष्फल खोया. फिर जितने तपस्वी वहां थे उनको शिवजीने मुंह मांगा वर दिया. और सबको बिदा किया. सबके पीछे जब राजा अकेला रहगया तो उसे कहा कि, हे राजा वीरविक्रमादित्य ! अब जो तेरी इच्छामें आवे सोही वह मुझसे मांग मैं तुझे दूंगा. यह सुन राजाने कहा-महाराज ! आपकी दयासे सब कुछ है पर एक यह मांगता हूँ कि-संसारके जन्ममरणसे मेरा निबेडा करो. जैसे और भक्तोंका निबेडा किया तैसे मुझ परमपापी आधीन दीनही- नको तारो. यह राजाकी विनती सुन दयाकर शिवजीने हँसकर कहा कि, तेरे समान कर्मी इस कलियुगमें कोई नहीं है. ओर तू ज्ञानी, भोगी, दानी, साहसी, तपस्वी है, कलिके राजाओंका उद्धार कर-
छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )
छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )
नेवाला है और मैं तुझसे कहताहूं कि, तू जाकर अपना राज कर, तेरा काल निकट आवेगा तब तू मेरेपास आइयो, मैंने तुझे बचन दिया है कि, अंतसमयमें मैं तुझे मोक्षपद दूंगा. इससे तू अब जाकर मर्त्यलोकमें आनंदसे राज कर. फिर राजा करुणा करके बोला कि, महाराज ! संसारमें तुम्हारे प्रपंच कुछ जाने नहीं जाते या तो मुझे इस समय तारो नहीं तो मैं अपना जी देताहूं. तब हँसकर शंकरजीने कहा कि, जो तू जी देगा तो मृत्युबिना यम तुझे हाथसे भी न छुएगा. और फिर आयुर्बलके दिन भरने पड़ेंगे इसवास्ते तू जा उठ मेरा वचन जीमें रख इतना कह शिवजी तो कैलासको गये, और राजाके हाथमे कमलका फूल दे यह कह गये कि जब यह कमल मुर्झायगा तब तू जानियो कि अब छ महीनेमें मैं मरूंगा. फूल ले राजा अपने नगरको आया और अपने मनका विचार किसीके न कहा. कितनेएक बरस पीछे वह कमलका फूल मुर्झा गया. तब राजाने समझा कि, मैं अबसे छ महीनेमें मरूंगा. जितनी कुछ धन और दौलत थी सो सब ब्राह्म- णोंको संकल्प करदी. स्त्री और पुत्रके खानेको कुछ धन दिया बाकी सब पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान करदी. इस तरह राजा ज्ञान पुण्यकर सदेह कैलासको चला गया. इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! विक्रमा दित्यने इतना काम किया और जीवन मरण दोनों चीन्हा. इससे मैं तुझसे कहती हूं कि, जीनेका
( १७० ) सिंहासनबत्तीसी.
कुछ भरोसा नहीं और मरण साथ लग रहा है. दुःख सुखभी मनुष्यके साथ हैं और पापपुण्यभी रहते हैं. नि- र्गुण और सगुण ज्ञानभी घटमें रहता है पर एक ब्रह्मही अलग है. इस वास्ते मैं तुझसे कहतीहूं-ऐ भूपाल ! संसारमे जिसकी कीर्ति रह जाती है सोही अमर है. जो मैंने तुझे कहा कि, मन वचन कर्म कर तू सच जान. वह दिन तो यों गुजर गया, राजा नाउ- म्मेद होकर अपने मकानको फिर गया. सुबह होतेही हाथ, मुंह धो, स्नान पूजा कर फिर वहीं आन मौजूद हुआ और जितने राजाके सभामें लोग थे वे भी सब हाजिर हुए राजाने अपने लोगों कहा कि-पुतलिया तो बाते झूठ झूठ बना मेरे आगे कहती है अब मैं इनकी बाते न सुनूंगा और इस सिंहासनपर बैठूंगा. यह अपने लोगोंसे बाते करता था कि-जगज्ज्योति नामावाली -- सताईसवीं पुतली- बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य अपनी सभामें बैठा था कि, उसमें प्रसंग निकला. उसमे- कोई बोल उठा कि, आज राजा इंद्रके बराबर कोई राजा नहीं है, क्योंकि वह देवलोकका राज करता है ! यह बात राजाने सुन किसीसे कुछ न कहा और बैतालोंको बुलाकर कहा कि, मुझे इंद्रपुरीको ले चलो. बैताल तुरंत के उडे और एकदममें के
सत्ताईसवीं पुतली २७. ( १७१ )
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जाकर इंद्रकी सभामे पहुंचा दिया. राजाने जातेही वहां इंद्रको दंड- वत् की और हाथ जोड़ खड़ाहुआ. तब इंद्रने बैठनेको आज्ञा दी वह हुकुम पाकर बैठगया तब इंद्रने कहा तुम कहांसे आये हो । और तुम्हारा नाम क्या है ? देश तुम्हारा कौनसा है ! किस अर्थको यहां आये हो ! सो तुम कहो. तब राजा बोला कि-स्वामी ! अंबा- वती नगरीका मैं राजा हूं. मेरा नाम विक्रम है, और आपके पद पंकजके दर्शनके अर्थ आया हूं. तब प्रसन्न हो इंद्र बोला कि- हमनेभी तुम्हारा नाम सुनाथा. और मिलनेकी इच्छा थी सो तु- मने आके यहा उलटी रीत की अब जो कुछ तुम्हारा मनोरथ हो सो हमसे कहो और जो कुछ तुम्हें चाहिये सो मांगो हम तुम्हें देंगे. राजाने कहा-स्वामी ! आपकी कृपा और धर्मसे सब कुछ है और जो कुछ न हो तो मैं आपसे मागूं. आपका दिया हुआ सब कुछ तेरेपास है. राजाकी ये बातें सुनकर इंद्रने प्रसन्न हो अपना मुकुट और एक विमान दे यह आशीष दिया कि, जो तेरे सिंहासनको बुरी दृष्टिसे देखेगा वह तुर्त अंधा होगा. राजा वहांसे बिदा हो फिर अपने नगरमे आया और बधाई बजने लगी. इतनी बात पुतलीसे सुनकर राजा भोज सिंहासनपर हाथ धरकर एक अपने पावको ऊपर रख खडा होकर कहने लगा कि आसन मार गद्दीपर जा बैठूं. इतनेमें आँखोंसे अंधा होगया और दिवानी दिवानी बातें करने लगा. चाहता था कि हाथ उसपरसे उठावें पर जुदा न होता था. यह हालत देख
लज्जित हुआ. तब पुतली बोली कि, ऐ मुर्ख ! तूने हमारी
( १७२ ) सिंहासनबत्तीसी. पुतलियां खिल २ हँसने लगीं. और सब सभा भौंचक होगई. और जीमें सब लोग कहने लगे कि, राजाने क्या यह अपन किया कि, बिना बात सुन सिंहासनपर पांव धर दिया. यह अपनी दशा देख राजा भोज बहुत पछताकर लज्जित हुआ. तब पुतली बोली कि, ऐ मुर्ख ! तूने हमारी बात न सुनकर यह फल पाया. अब तू ऐसा ही रह. यह सुन राजा निराश होकर बोला-इसका उपाय बताओ. पुतली बोली-राजा विक्रमका नाम ले तब तू इस दुःखसे छूटेगा. जब विक्रमका यश राजा भोजने बखान किया तब हाथ छूट गया और आँखसेभी सूझने लगा. फिर नीचे उतर खड़ा हुआ. देखकर सब लोग भयमान होंगये और राजाभी अपने चित्तमें डरा. सभाके सब लोग बोले कि, राजा विक्रमके समान होना इस कलियुगमे बड़ा कठिन है. फिर पुतली बोली कि, राजा ! इसीवास्ते मैंने कहा था और तू मेरी बात झूठ मत मान, तू मूर्ख है. कुछभी तुझे ज्ञान नहीं. जो तू विद्या पढ़ा है इससे कुछ होता नहीं. ज्ञान हे सो औरही चीज है अपने बराबर राजा बीरविक्रमादित्यको मत समझ. वह देवता- ओंके समान था. और उसके बराबर ज्ञान ध्यान तेरा नहीं. अ- पने जीमें इस सिंहासनकी आश छोड़. वह सिंहासन तुझे नहीं साजेगा और संसारमें बहुत बातें हैं वे कर, जिसमें तेरा राज