सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
दूसरी पुतली २. ( ३१ )
दूसरी पुतली २. ( ३१ ) राज्यकी रखवाली करनेके वास्ते भेजा है. राजाने पूछा-भर्तृहरिको क्या हुआ ! उसने जवाब दिया भर्तृहरिको कोई यहांसे छलकर लेगया यह बात सुनकर राजा हँसा और उसे कहा-वह तो मेरा छोटा भाई है. फिर देव बोला, मैं नही जानताहूं कि तुम कौन हो और जो तुम निकम इस देशके राजा हो तो मुझसे लडो और मुझे मारकर जाओ बिना लडे मैं तुझे शहरमें पैठने न दूंगा. यह सुन राजा बिगडके बोला-तू मेरे तईं क्या डरता है ? और जो लडा चाहे तो मैं तय्यार हूं. इस तरह दोनों बातें कर तैयार हो लडने लगे और राजा उस देवको पछाड़कर छातीपर चढ़ बैठा. तब वह बोला-राजा ! तू मुझसे वर माँग, मैं तुझे दूंगा. यह बात उसकी सुनकर राजा हसकर बोला-मैने तुझे पछाड़ा है और चाहे तो तुझे मार डालूं-तू मुझे वरदान क्या देगा ? तब वह बोला-राजा ! तू मुझे छोड़दे मैं तेरे आगे इसका सब ब्यौरा कहताहूं. तेरे राज्यकी धूम सब देशमें है और सब राजा तुझसे डरतेहैं पर मैं जो बात कहूं सो तू कान देकर सुन. तेरे शहरमें एक तेली है और एक कुम्हार सो तुझको मारनेको फिक्रमं है पर तुम तीनोंमेंसे जो दोनोंको मारेगा वही अचल राज करेगा. तेली तो पातालका राज करताहै और वह कुम्हार योगी बना हुआ जंगलमें तपस्या अपने जीमें लाकर करताहै. दिल्लमें कहताहै कि, राजाको मारके तेलीको तेलके जलते कडाहमें
( ३२ ) सिंहासनबत्तीसी. डालूं, और देवीको बलि देकर मैं निश्चिंत राज्य करूं ओर तेली कहता है कि, राजा और योगीको मारके त्रिलोकीका राज्य मैं करूं और तू इस बातको न जानता था, मैंने इसवास्ते तुझे खबर- दार किया, तुम इनसे बचे रहना, ओर आगे जो मै कहताहूं सो तुम ध्यान लगाकर सुनो. योगीने आज उस तेलीको मारकर अपने बश किया है सो तेली एक सिरीसके वृक्षपर रहा है. अब वह योगी तुमको न्योता देनेको आवेगा. छल करके तुझे ले जायगा. तू न्योता लेकर वहां जाइयो. जब वह कहे कि, तू दंडवत् कर, तब तू कहियो-मैं दंडवत करना नहीं जानता. मेरैतईं एक जहान दंडवत् करता है. जो तुम गुरु हो और मैं चला तो मुझे दंडवत् करना बताओ और उसी तरहसे मैं दंडवत करूं ! जब वह शिर निहुरावे तब तू खांडा मार कि, उसका शिर जुदा हो जावे और वहां कडाह जो देवीके आगे तेलका खौलता होगा उसमें उसको और वृक्षसे तेलीको उतारके दोनोंको उसी कडाहमें डाल देना. यह मेरी बात तू गांठ बांध. इसे हर गिज कभी न भूलना. यह बात कहकर वह देव चलागया और राजा अपने महलमें आया भोर हुए सारे नगरमें खबर हुई कि, राजा विक्रमादित्य आए. दिवान मुत्तसदी और सब अह- लकार नजर लाए. तमाम शहरमें आनंद होगया. घर घर मंगलाचार होने लगे. यहां तो खुशीके नगारे बज रहेथे इतनेमें
दूसरी पुतली २. ( ३३ )
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एक योगी आया. ओर राजाकी आदेश सुनाया. एक फल उसके हाथ दिया. उसने हँसकर वह फल हाथमें लिया. योगीने कहा- राजा ! हमारे यहां यज्ञ होता है. एक दिनका तुम्हारा न्योता है. तब राजाने कहा हम आवेंगे. तुम अपने मनमें चिंता मत करो. सांझ हुए. पहुँचेंगे. योगी यह सुनतेही ठिकाना बताकर अपनी मठीको गया जब सांझ हुई राजाभी खांडा फरसी ले तयार हुआ. और किसीसे न कहा. अकेला चलागया तुर्त योगीके पास पहुँचा. और आदेश कहा. योगी बोला कि-देवीके आगे जाकर दंडवत् कर, तो देवी तुझपर दया करे. राजा बोला- स्वामी ! मैं तो दंडवत् करना नहीं जानता कि, किसतरह करते हैं ? इसवास्ते आप मुझे बताओ तो मैं करूं. योगी बताने लगा, ज्योंही शिर झुकाया, राजाने देवकी नसीहत याद करके एक खांडा ऐसा मारा कि, शिर धड़से जुदा होगया. और उसे मारके खतराज किया और उस वृक्षसे तेलीको भी उतार दोनोंको तेलके कटाहमें डालदिया. तब देवी बोली-धन्य है विक्रम तेरे साहसको. मैं तुझसे प्रसन्न हूं. तू मुझसे चाहे सो वर मांग और धन्य है तेरे माता पिताको, जिनके घरमें तूने अवतार लिया. देवी जब यह कह चुकी तब वे बीर आकर हाजिर हुए और राजासे कहने लगे कि, हम आगिया और कोयला दो बीर तुम्हारी सेवाके लिये आये हैं जो तुम्हारी कामना हो सो हमसे कहो हम ३
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( ३४ ) सिंहासनबत्तीसी. तुरंत पूरी करदें. सब जगह जानेकी हम सामर्थ्य रखते हैं. जल, थल, मही, आकाशमें पवनके रूप होकर जहां कहोगे वहां हम चले जावें. जैसे हनुमान तुरंत लंका पहुंचा वैसे हमभी जा सकते हैं. यह सुन खुश हो राजाने कहा--मुझे तो कुछ काम नहीं है. अगर मेरे ताईं बचन दो तो मैं देवीसे तुम्हे मांगलूूं. लेकिन ऐ वीरो ! जो तुमसे बचन देकर निर्वाह किया जाय तो बचन दो. तब उन बैतालोंने कहा कि--अच्छा. तब राजाने उनको बचनबद्ध कर मांगलिया. और कहा-जिस जगह मैं याद करूं तुम उस जगह मेरेपास पहुँचना. तब वीर बोले कि-राजा ! तुम जिस जगहमें हमें याद करोगे, वहां हम पवनरूप होकर पहुँचेंगे .वह बात उनसे कहके राजा घरको गया. ये बातें चित्ररेखा पुतलीने राजासे कहीं कि, राजा ! विक्रमें ये काम थे. इतने योग्य तू नहीं है. फिर वे वीर राजाके साथ हुए और आगे बहुतसे काम किये. जहां विक्रमके गाढ़ पड़ा तहां ये दोनों आकर हाजिर हुए. जो कोई ऐसा काम करे तो सिद्ध हो. राजा ! तू अपने जोरपर गरूर मत कर. तुझ जैसे पृथिवीमें करोडो होगये हैं. इतनी बात जब पुतलीने कही तब राजाकी बहभी साअत टलगई. तब दूसरे दिन सुबहको राजाने फिर पाट बैठनेकी तैयारी की, ओर चाहा कि, सिंहासनपर पाँव धरौं, तब सत्यभामा नाम--
तीसरी पुतली ३० ( ३५ )
तीसरी पुतली ३० ( ३५ )
तीसरी पुतली-
बोली:-यह काम नहीं जो इसपर बैठो, पहिले मुझसे एक नई कथा सुनलो. एक दिन राजाबीर विक्रमादित्य दरिया किनारेपर महलमें खिलवत करते बैठेथे, राग हो रहाथा, और हरएक रंगकी चुहल मच रहीथी कि, दिल फरेफ्ता होजावे. और एकसे एक सहेली खूबसूरत पास बैठी थीं राजाका दिल वहां बेइख्तियार लग रहाथा कि, एक पंथी त्रिया संग लिये हुए और उस त्रियाकी गोदमें एक बालक घरसे खफा होकर निकले थे. दरियाके पास आकर गुस्सेके मारे कूदपडे. मर्दके एक हाथमें रंडी और एक हाथमें वह लड़केका हाथ ये तीनों डूबने लगे. तब पुकारकर बोले कि-ऐसा धर्मात्मा कौन है, जो इन तीनों आदमियोंकी जान बचावे ? उनमेंसे वह मर्द हाथ करके पुकारा जो कोई गुस्सा मार न सके तो इसी तरह हो बेअजल मर जाता है. और गिरके बहुत पछताता है. उसकी आवाज राजा विक्रमादित्यने सुनतेही पासके लोगोंसे कहा कि- यह कौन दुःखी पुकारता है ? तब हरकारोंने खबर दी कि, महाराज ! एक मर्द और एक रंडी लड़केके समेत पानीमें डूबते हैं. उनमेंसे वह मर्द चिल्ला रहा है कोई ऐसा उपकारी हो कि, इस डूबोंको निकाले. यह हरकारा कहताही था कि, वह फिर पुकारा- हम तीन जान डूबते हैं. कोई हमें भगवानका
( ३६ ) सिंहासनबत्तीसी.
बंदा पार लगावे, यह सुनकर राजा वहांसे धाया और आकर उस दरियामें कूद पडा, जाकर एक हाथमे रंडी और दूसरे हाथमें लड़केको पकडलिया, वह मर्दभी राजासे लिपटगया, तब राजा घबराया और आपभी डूबने लगा. इतनेमें ईश्वरको याद किया और कहा कि—हे नाथ! मैं धर्मके वास्ते आया था और इसमें मेरा जीवनभी जाता है, धर्म करते अधर्म होवेगा. राजा यह कहकर बहुत जोर करने लगा, और उस बखत जोर उसका कुछ काम न आया. तब उसने आगिया और कोयला दोनों बीरोंको याद किया, याद करतेही दोनों बीर आकर हाजिर हुए और चारोंको उठा किनारेपर रख दिया. तब वह विदेशी राजाके पांवोंपर गिरपड़ा और बोला कि, महाराज ! तुमने हम तीनोंको जीवदान दिया, तुम्हीं हमारे भगवान् हो; क्योंकि जीवदान इस वक्त तुमसे पाया राजा हाथ पकड़कर उन तीनोंको रंगमहलमें ले आया, और बिठाकर कहा, जो तुम्हें चाहिये सो माँगो तब वह बोला—महाराज ! हमको हुक्म करो तो हम घरको जायें, और जबतलक जियेंगे तबतलक आपको आशिष दिया करेंगे. ऐसाही कुछ तुमने हमें दिया है. तब राजाने अपनी तरफसे लाख रुपये देकर उनको घर भिजवा दिया. इतनी बात कहकर पुतली फिर बोली- राजा, इतने लायक जो तुम हो तो इस सिंहासनपर बैठो, नहीं
चौथी पुतली ४ ( ३७ )
चौथी पुतली ४ ( ३७ )
तो तमाम लोग हँसेंगे, यह अहवाल सुनतेही यहभी मुहूर्त राजाका टलगया. दूसरे दिन फिर राजा दिलमे सोच करता हुआ सिंहासन- पर बैठनेको आया. तब चंद्रकला नामवाली—
चौथी पुतली-
बोली:—सुनो राजा ! तुम मन मलीन क्यों बैठे हो ? और सुनो जो मैं कथा कहूं. एकरोज एक पंडित कहींसे फिरते फिरते राजा बीर विक्रमादित्यके पास आया. और उसने आकर बयान किया कि जो कोई एक महल मेरे कहे मुआफिक बनाके घरे, चैन उठावे. और बडा नाम पावे. तब राजाने कहा, अच्छा जाहिर करो. ब्राह्मण कहने लगा-तुला लग्न जब आवे तो उसमे मंदिर उठावे, जबतलक वह लग्न रहे तब तलक काम जारी रक्खे. और जब तुला लग्न होचुके तब उसका काम मौकूफ करे. इसी तरह तुला लग्नहीमें वह सारा मकान तैयार कर राखे तो उसका अटूट भंडार होजावे. और लक्ष्मी उसके यहांसे कभी न जाय. यह सुनकर राजा मनमें खुश हुआ. और दीवानको बुलाकर मन्दिर उठानेकी इजाजत, दी, कि—तुम अच्छी जगह ढूंढकर महल बनाओ. इतनेमें तुला लग्नभी आन पहुंचा. उस मंदिरके नींवकी देश देशमें यह हवाई हुई कि राजा बिक्रम तुला लग्न साधकर महल बनाता है. जितने कारीगर उसमें काम करतेथे वे उठकर तुला लग्न
( ३८ ) सिंहासनबत्तीसी मनातेथे. जब लय आती थी, खुश हो हो बनातेथे, कही उसमें काम सोनेका और कही रूपेका ओर कही लोहेका और कहीं काठका, नई नई तरहसे बनताथा. चुनांचे दरयाके किनारेपर वह हवेली बनाई चार दरवाजे और सात खण्ड उसमें रक्खे. और जगह जगह जवाहिर अनमोलके उसमें जड़े और दरवाजेपर दो नीलमके बडे नगीने लगाये कि, किसीकी नजर न लगे, वह जडाउ महल कितनेक बरसोंमें ऐसा तैयार हुआ कि, दुनियाँके परदेपर कीसीने दूसरा न आँखोंसे देखा और न कानोंसे सुना तब दीवानने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! आपके हुक्म मुआफिक मंदिर तैयार होगया है. आप चलकर उसे देखिये. जो कोई उस महलको देखताथा सो मोहित हो रहताथा. ऐसा सुन राजा वहांरो मकान देखनेको गया. एकबार राजाके साथ एक ब्राह्मणभी गया. महलको जब राजाने मुलाजहा किया तब ब्राह्मण देखकर और हँसकर कहने लगा-ऐ राजा ! ऐसा घर जो मैं पाऊं, तो बैठ यहां सुखसे समय विताऊं. यह बात सुनकर राजाने कुछ मनमें साच न कि- या. गंगाजल और तुलसीदल लेकर वह घर उस ब्राह्मणको संकल्प कर दिया. यह घर पाकर ब्राह्मणको ऐसा आनंद हुआ कि, जैसे चकोर रातको चन्द्र पाता है, तुर्त वह अपने कुटुंबको ले आया और वहां आकर आनंदसे रहा. और रातको खुशीसे पलंगपर सोताथा कि, पहर रात गये लक्ष्मी वहां आई और कहने लगी-
चौथी पुतली ४. ( ३९ )
चौथी पुतली ४. ( ३९ )
बेटा ! हुक्म दे तो मैं गिरू और घर बाहर संपूर्ण भरूं. खौफसे उसने कुछ जवाब न दिया तब वह दोपहर रातको फिर गई ओर कहा कि, ऐ ब्राह्मण ! अज्ञानी ! मुझे आज्ञा दे. उन्होंने चिंता करके रात गंवाई और सुबह हुए राजा वीर विक्रमादित्यके पास आया. मन मलीन और रातके अहवालमे डरा हुवा रंग जर्द चिहेरेका ओर डरसे कुम्हलाया हुआ इस शक्लसे देख राजा उसे हँसने लगा. फिर कहने लगा कि, कलकीसी खुशी हमने आज न देखी, ऐ ब्राह्मण ! यह अचंभेकी बात है. तब ब्राह्मण बोला कि-सुन स्वामी ! मेरे दुःखके तुम दाता हो, प्रजाके सुख देनेवाले और तुम शकबंधी नरेश हो. जैसे राजा कर्ण और इंद्र अपने समयमें दानी थे वैसेही इस समयमें तुम हो. आपने जो मंदिर मेरे तई दिया है उसकी हकीकत में कहताहूं. मालूम नहीं कि, इस मंदिरमें भूत है ! या पिशाच ! मेरे तई उसने सारी रात सोने नहीं दिया. आपकी कृपासे और इन लडकोंके भाग्यसे जीता बचा. इसवास्ते अब मैं यहां आया हूं. इससे भीख मांगना मुझे बेहतर है. पर उस महलमें न रहूंगा यह बात सुन राजाने प्रधानको बुलाया और ऐसा कहा कि, जो इन मकानमें लगा है, सो हिसाब करके इस ब्राह्मणको दो. राजाकी आज्ञा पाय दीवा- नने हिसाब कर तोड़े रुपयोंके लदवाकर ब्राह्मणके साथ कर दिये और वह अपने घरको गया. एक दिन साअत देख उस
( ४० ) सिंहासनबत्तीसी. हवेलीमें राजा जाकर रहा और बैठकर कुछ विचार करने लगा, इतनेमें हाथ बाँधकर लक्ष्मी आन खडी हुई और बोली कि-धन्य राजा विक्रम ! तेरे धर्मको. इतना कहकर लक्ष्मी उस वख्त तो चली गई और राजाने तो वहां आराम किया. जब पहर रात रही तब लक्ष्मी फिर आई और कहने लगी कि, राजा ! अब मैं कहां गिरूं ? राजाने कहा-जो तू पड़ा चाहती हो तो पलंग छों- डके जहां तेरी इच्छा हो तहां गिर इतनेमें खूब तरहसे सोनेका मेह तमाम नगरमें बरसा. सुबह हुबा तब राजा उठा और देख कर कहने लगा-हमारी रैयतपर बहुत सीखथी, लेकिन अब कोई दिन निश्चित हो आरामसे रहेगी इतनेमें दीवान आया. और खबर दी कि, महाराज ! तमाम नगरम कंचनकी वृष्टि हो गई है इसवास्ते अब जो हुक्म आप करोगे वैसा हम करें. तब राजाने कहा कि-तमाम नगरमें ढोल बजवादो कि जिसकी हद्दमें जितनी दौलत है सो उसे ले. और कोई किसीको मना न करे. यह राजाका हुक्म पाकर सब दौलत रय्यतने अपने २ घरमें भरी यह बात कहकर चंद्रकला पुतली बोली कि- राजा भोज ! सुन राजाविक्रमके गुण. वह ऐसा राजा था और प्रजाका हितकारी, इससे तू किस तरह उसके सिंहासनपर बैठता हे ? तेरी क्या जान है ? यह पुतलीकी बात सुनकर राजा भोज अज्ञान होगया. और वररुचि पुरोहितभी शरमिंदा हुआ.
पाँचवी पुतली ५. ( ४१ )
पाँचवी पुतली ५. ( ४१ ) वह साअत भी गुजरगई. दूसरे दिन राजा फिर सिंहासनपर बैठने चला. और मनमें चाहा कि, पांव सिंहासनपर धरै, तब लीलावती नामक— पाँचवीं पुतली- बोली-सुन राजा विक्रमके गुण, एक दिन दो पुरुष आप- समें झगडने लगे, एकने कहा-कर्म बड़ा और दूसरेंने कहा बल बड़ा. किस्मतका तरफदार बोला नशीब बड़ा है कि, अदनाको आला कर देता है और जोरका जानिबदार कहने लगा-जोर बड़ा है जोरावर होवे तो तमाम जहानको ज़ेर कर दे. इस तरह दोनों झगडते २ राजा इंद्रके पास गये और हाथ जोडकर कहने लगे-स्वामी ! आप हमारा न्याय करो जो दोनोंमें सच हो उसे फरमाइये. और झगडा निबेडिये. तब राजा इंद्र बोला--इसका न्याय हमसे न होगा. इस इन्साफको वह करेगा, जिसने योग किया होगा. इससे बेहतर यह है कि, तुम मर्त्यलोकमें राजा विक्रमादित्यके पास जाओ, इस न्यायको वह चुकावेगा उन्होंने राजा इंद्रकी आज्ञा पाय राजा विक्रमादि- त्यके पास जाकर अपना अरज किया और कहा कि-हम तीनों भुवनमें फिर आये पर किसीने हमारा न्याय नहीं चुकाया इसका धर्म अधर्म विचारके आप हमारा न्याय करो. यह बात सुन जाने कहा कि, आज तुम अपने अपने घरको जाओ. और छः
( ४२ ) सिंहासनबत्तीसी.
महीनेके बाद हमारे पास आओ. तब हम तुमको इसका जवाब देंगे. यह सुनकर वे दोनों अपने घर गये राजा अपने मनमें चिंता कर बस्तर पहन काछा चढा खांडा फरी ले बिदेश चला और अपने दिलमें यह आहद किया कि, जबतलक इसका भेद न पायेंगे, तबतलक देशमें फिर न आयेंगे तब फिरते फिरते समु- द्रके किनारे जा पहुँचा. तब वहां एक नगर उसने बहुत बड़ा निपट सुहावना खूब आबाद पाया. और उसमें तरह तरहकी हवे- लियां जिनमें करोड़ों रुपये लगे थे और उनसे सिवाय जवा हिरके कुछ नजर न आताथा. वह देखकर राजा कहने लगा कि, जिसका यह नगर है, वह राजा कैसा होगा ? शहरमें फि- रते फिरते शाम होगई और शहर अखीर न हुआ. इतनेमें क्या देखता है कि, एक दूकानमें महाजन शिर निहुड़ाये हुए बैठा है. तब राजा उसीके सामने जा खडा हुआ. तब सेठने राजासे कहा तू किस देशसे आया है? और तेरा मन मलीन क्यों हो गया है ? किसे ढूंढता है ? और क्या तेरा काम है ? यह सब अपना अर्थ मुझसे कह ? किसका बेटा है तू ? और क्या तेरा नाम है ? तब वह बोला-सेठजी ! मेरा नाम विक्रम है. मैं आज तुम्हारे पास आयाहूं मेरे दिलका मकसद यह है कि, मैं राजासे मुलाकात करूं सो आज मुलाकात न हुई कल मैं राजासे मि लूंगा और उनकी सेवा करूंगा. जो वो मुझे नौकर रक्खेंगे और
पांचवी पुतली ५. ( ४३ )
पांचवी पुतली ५. ( ४३ )
मेरा महीना कर देंगे तो मैं रहूंगा. यह बात सुनकर वह महा- जन बोला-तुम क्या रोज लोगे ? तब राजा कहने लगा. जो कोई लाख रुपये रोज देगा तो हम उसके यहां नौकर रहेंगे. तब वह बोला-भाई ! तुम क्या काम करतेहो ? जो तुम्हें लाख रुपये रोजको कोई देवे वह काम मुझे बताओ ? तब उसने कहा-जिस राजाके पास मैं रहताहू उसकी गाड़ी मुश्किलमें काम आताहूं. सेठ हँसकर बोला, लाख रुपये रोज हमसे लो और कठिनतामें हमारे सहाय हो सुबह हुए नौकर रक्खा और दूसरे दिन लाख रुपये दिये. उसने उनमेंसे आधे रुपये भगवानके नाम संकल्प कर ब्राह्मणोंको दिये, आधेके आधे कंगालोंको दिये. और जो बाकी रहे उनका खाना पकवाकर भूखोंको खिला दिया. रातहुए पर फिर जो एक फकीरने सवाल किया उसेभी खङ्ग रेहन रखकर और भोजन पेटभर करवाया और आप चने चबाकर गुजरान की कितनेएक दिन उस साहूकारके पास रहकर रुपये हररोज योंही खर्च करते रहे. गरज किस्म- तने तो यारी की तब जोर बोला-अब मेरी बारी है, कि, एकाएक सेठके दिलको कुछ उचाटी हुई और एक जहाज तैयार कर किसी देशमें जानेका उसने इरादा किया और विक्रमसे कहा-मैं किसी देश जाताहूं. वह बोला-स्वामी मैंने यह बचन दियाथा कि, गाढ़ी भीड़में तुम्हारे काम आऊंगा. अब मैं तुम्हारे
( ४४ ) सिंहासनबत्तीसी.
साथ हूं; क्योंकि तुमने प्रतिपाल किया है. तब उसेभी सेठने जहाजपर चढालिया. और रवाना हुआ कितनेक दिनोंके बाद जहाज मॅझधारमें तुफानसे तबाह होने लगा. तब वहां लंगर डालकर उसी जगह चंदरोज रहा. उससे आगे टापू था सिंहावती नाम राजकन्या रहतीथी. हजार कन्या उसके साथ थीं इसमें जब वह तुफान होगया तब सेठने कहा कि, अब लंगर उठाओ और चलो. लंगर जलके बीच कहीं अटक रहाथा. मुश्किलसे उठ न सकताथा. जोर कर रहेथे, निदान निराश होकर सब परमेश्वरका स्मरण करने लगे और कहने लगे । कि-इस मझधारसे पार करनेवाला तेरे सिवाय कोई नहीं. जहां जहां जिस जिसके तईं मुश्किल पडी है, तहां तहां सहाय हुआ है दीनदयालु तेरा नाम है, इसवास्ते तुझको हम शरण है और हमपरभी दया करो इतनेमें बनियां घबरा कर विक्रमसे यह कहने लगा. अब अथाहमें पडे हुए हैं, किनारा हमें नजर नहीं आता, और एक बात तेरेही इस वखत याद आई है जब तू हमारे पास नौकर रहाथा तब तूने इकरार किया था कि, मुश्किल काम मैं आशान करूंगा. तो इससे और क्या कठिन होगा ? कालके मुँहमें अब पड गये हैं. यह सेठजीकी बात सुनकर विक्रम उठा और फरी खाडा हाथमें ले रस्ता पकड जहाजके नीचे उतर गया. जाकर बहुतसी हिकमत की पर काई हिकमत
[Header] पाँचवीं पुतली ५. ( ४५ )
[Header] पाँचवीं पुतली ५. ( ४५ )
न चली और कहने लगा कि, सेठजी ! अब पालें इसकी चढ़ावो, लोगोंने पालें चढ़ाई और उसने कूदकर लंगर काटदिया. पानी- की तेजीसे और हवाकी तुंदीसे जहाज चल निकला. और कोई रस्सा उसके हाथ न लगा उसी जगह रहगया. जो कुछ विधा- ताने कर्ममें लिखा है उसको कोई मिटा नहीं सकता. अलकिस- वह राजा वहांसे बहताहुआ चला. और जाते जाते उसे एक नगर नजर आया. वह वहां जानेलगा. उस नगरका जो दर- वाजा था उसपर ज्योंही निगाह की त्योंही देखा कि, चौखटपर लिखा हुआहै कि सिंहावतीकी राजा विक्रमादित्यसे शादी होगी. यह देख राजाको अचरज हुआ कि, यह किस पंडितने लिखा है ? जब उस दरवाजेके अंदर गया तो वहां जाकर एक महल देखा और वहां रांडियां हैं. मर्द कोई नहीं है. और एक अच्छे पलँगपर सिंहावती सोती है. और चौकीकी सहेलियां बैठी हैं यहभी जाकर पलँगपर बैठगया. और तुर्त उसको जगा दिया वह उठकर बैठगया तब राजाने हाथ पकड़लिया और दोनों सिंहा- सनपर जा बैठे. सब सखियां हाजिर हुईं और इस भेदसे वाकिफ थीं कि राजा विक्रमादित्य यहां आवेगा और इससे उसकी शादी होगी. राजाको जो देखा तो फूलोंकी माला ले आईं और गंधर्बब्याह किया. राजा जैसा दुःख पाकर पहुँचाथा वैसा हँसा. इसवख्त उसने सुखोपभोग किया. अलगरज वे दोनों आप-
यह बातें कह लीलावती पुतलीने फिर कहा कि-राजा भोज !
( ४६ ) सिंहासनबत्तीसी.
समें रहने लगे. और नौजवानीकी ऐश करने. हर एक तरहका लुत्फ उठाने लगे और सखियांभी खिदमतमें हाजिर थीं. और मानिंद चकोरके चांदसा राजाका मूँह देखतीथीं चंदमुद्दत राजाको इसी तरह गुंजरी. अपने राजकी सुध कुछ न रही. यह बातें कह लीलावती पुतलीने फिर कहा कि-राजा भोज ! जैसा राजाने बल किया वैसाही विधाताने उसको सुख दिया. किस्मतने यह तमाशा दिखाया. फिर कहने लगी कि, उन सखि- योंमेंसे एक सखीसे राजा विक्रमादित्यकी बहुतसी प्रीति हुई और वह राजाकी दया विचार वहाका भेद कहनेलगी. ऐ राजा ! तुम यहां आन फंसेहो जीते यहांसे कभी न निकलोगे. तुम्हारा नाम सुनकर और तुम्हारे राजका ध्यान करके मुझको रहम आता है, क्योंकि तुम्हारे सरीखे धर्मात्मा दयावंत, दाता, परोपकारी होकर यहां रहना इसमें तुम्हारा भला नहीं है. उधर लाखों आदमी तुझबिना दुःख पाते होंगे. उस सखीकी बात सुनकर राजाको ज्ञान हुआ और अपने राजका ध्यान आया. तब सखीसे पूछा- यहांसे जानेका भेद मुझे बताओ तब वह बोली-एक घोडी इस राजकन्याकी घुडसालमें है, सो उदयसे अस्ततलक जा सक- तीहै. यह बात सुनकर दूसरे दिन राजा रानीको अपने साथ लेकर टहलता हुआ अश्वशालामें जा निकला. घोडोंको देख कर तारीफ करने लगा. रानी बोली-जो तुझे शौक होय तो
पांचवी पुतली ( ४७ )
पांचवी पुतली ( ४७ ) इस घोडोंमेंसे किसी घोडेपर चढाकरो. भेद तो इसे वहांका मालूमही था. दूसरे दिन घोडा उसने वहांसे मँगवाया. और उसपर सवार हो बर्ता फेरने लगा. वह राजाका अहवाल देख रानीभी खुश होती थी. और राजाभी खुश होताथ.. इसी तरह कईएक दिन आर २ घोडोंपर सवार होतारहा. एक दिन उस घोडीको मँगाया और रानीके हुक्मसे उस घोडीपरभी सवार होगया. रानी तो गफलतमें रही, कि इसने कोडा किया. घोडी- मानिंद हवाके राजाको ले उडी और सखियाँ पछता रहगईं. इतनेमें राजा अवानती नगरीको आन पहुँचा. वहां नदीके किनारे एक सिद्ध बैठा देखा, तब राजा उतर दंडवत कर उसके पास जाकर बैठा. सिद्धका जब ध्यान खुला तब उसने इसे देखा, देखकर खुश हुआ और एक फूलकी माला इसे दी और कहा कि-राजा ! विजयमाला मैने तुझे दी है. इसका गुण यह है कि, जहां जायगा वहां फतह पावेगा. और यह माला पहिनेपर तू सबको देखेगा पर तुझे कोई न देखेगा. फिर एक छडी राजाको दी और उसका ब्यौराभी समझाकर कहा कि, इस लकडीका यह ख्याल है कि पहले पहर रातको इसके पास सोनेका जडाऊ गहना जो मांगोगे तो यह देगी, और दूसरे पहर रातको एक खूबसूरत नारी ऐसी देगी कि जिसे देख राजा तुम आशिक होजायगा और तीसरे पहर रातको जो इसे
राज ! आपके द्वारपर हमने बहुत दिन सेवा की पर हमारा भाग्यही
( ४८ ) सिंहासनबत्तीसी. हाथमें लोगे तो तुम सबको देखोगे और तुम्हें कोई न देखेगा. चौथे पहर रातको मानिंद कालके यह होजायगी इसके डरसे कोई दुस्मन तुम्हारे पास आ न सकेगा. यह बात सुनकर योगीने राजाको रुखसत किया. राजा जब उज्जैन नगरीके पास जाकर पहुँचा तब उधरसे एक ब्राह्मण और एक भाटको आते देखा और जब नजदीक जाकर पहुँचे तो उन्होंने आशीर्वाद देकर कहा महा- राज ! आपके द्वारपर हमने बहुत दिन सेवा की पर हमारा भाग्यही ऐसा था कि कुछ इसका फल न मिला. तब राजाने सुनतेही ब्राह्मणको छड़ी दी और भाटको माला दी. और उसका सब भेद कह दिया. तब आशीर्वाद देकर वे दोनों कहने लगे, महा- राज ! इस समयमें तुम राजा कर्ण हो. तुम्हारे बराबर दानी आज पृथ्वीमें दूसरा और नहीं. यह कहा और दोनों बिदा होकर गये. राजाभी अपने स्थानको गया. तब दीवान प्रधान सब आनकर हाजिर हुए. जहरकी तमाम रंयत खुश हुई और वे दोनों झगड़लूनी यह खबर सुन तूर्त आकर राजाके सामने खड़े रहे और कहा—महाराज ! आपने जो छ महीनेका करार कियाथा सो बीत गया अब हमारा न्याय करदीजिये. यह सुन कर राजा बोला कि-बिना बल कर्म कुछ कामका नहीं और बिना कर्म बल काम नहीं आता, इससे वे दोनों बराबर हैं इसको सुन संतोषकर बाद दोनों अपने अपण घरको गये. ऐ
छठी पुतली ६. ( ४९
छठी पुतली ६. ( ४९ राजा भोज ! यह अहवाल मैंने तुझसे इस लिये कहा है कि, तू समझकरके यह खयाल अपने जीसे उठावेगा. इसवास्ते कि, जो ये लियाक़त रक्खे वह सिंहासनपर बैठे. वहभी जोग राजाका बीत- गया. फिर उसके दूसरे दिन भोर होतेही सिंहासनपर बैठनेको तैयार हुवा कि, इतनेमें कामकंदला— छठी पुतली— हँसी और कहने लगी, कि-जिस आसनपर राजा विक्रमने पाँव धरा है तू उसपर बैठनेके लायक कहाँ है? ऐ पापी ! तू अपने होशको गुम न कर और पांव खाली रक्खे; क्योंकि तुझे देख मेरा मन मलीन होजाताहै. इस सिंहासनपर वही बैठे जो विक्रमसा राजा हो. तब राजा बोला-तू अपने मुँहसे कह कि, विक्रम राजाने क्या क्या कर्म किये है ? वह बोली-तू सूचित होकर बैठ. मैं नृपतिकी कथा कह- तीहूं. एकदिन नृपती अपनी सभामें बैठाथा. वहां एक ब्राह्मणने आकर एक अचरजकी बात कही कि, उत्तर दिशामें एक बड़ा बन है और उस वनमें एक पर्वत और उसके आगे एक तालाव है, और उस तालाबमें एक खंभ स्फटिकका है. जब सूर्य निक- लताहै तब उस सरोवरमेंसे वह खंभभी निकलता है और ज्यों ४
( ५० ) सिंहासनबत्तीसी. ज्यों सूरज चढताहै त्यो त्यों खम्भभी बढताहै. जब ठीक दो पहर होतीहै तब वह खंभ सूर्यके रथके बराबर जाकर पहुँचता है. तब उस जगह रथभी खडा रहता है. वहां सूर्य जब कुछ भोजन कर लेतेहैं तब रथ फेर आगे ले चलतेहैं. और खंभभी घटता जाताहै. निदान सामके वख्त पानीमें लोप हो जाता है. इसको देवता या देव कोई नहीं जानता. यह बात ब्राह्मणके मुँहसे सुनकर राजाने अपने मनमें रक्खी, जाहीर न की और उसके तंई कई रुपये दे बिदा किया और अगिया कोयला बेता- लोंको याद किया वे दोनों वीर वहा आकर हाजिर हुए. और उन्होने कहा कि, हमें जो इस वख्त आपने याद किया है सो आज्ञा कीजिये. कहिये स्वर्गको जावें ? कहिये पातालका ? या कहिये समुद्रपार ? इन तीनों लोकोंमें जहां आपकी मर्जी हो तहां लेचलें. तब हँसकर राजाने कहा-एक कौतुक देखने हम जाया चाहते हैं सो वह उत्तरखंडमें है तहा तुम लेचलो. यह सुनकर वीर कांधेपर चढा, राजाको लेउडे और उस जगह तुर्त जा पहुँचे. तब राजाने वह तालाब देखा कि, चारों घाट उसके पक्के हैं. हंस बगुले उसमें फिरतेहैं. और मुरगावियां चकोर पनडुब्बियां कलोल करतीहैं. कमलके फूलोपर भौरे गूँज रहे हैं. मोर बोल रहे हैं. कोयल कूक रही है, और तरह तरहके पछी हुलराने हैं. फूलोंकी सुगंधोंके साथ पौन चली आती है. और मेवेदार दर- ख्तकी डालियां तो लचके खाती हैं. राजा यह सामा देखकर मनमें