भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
६८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सोमवार-व्रतके प्रभावसे सीमन्तिनीको पुनः परम सौभाग्यकी प्राप्ति

सूतजी कहते हैं— जो नित्य, आनन्दमय, शान्त, निर्विकल्प, निरामय, अनादि, अनन्त शिव-तत्त्वको जानते हैं, वे परम पदको प्राप्त होते हैं। जो धीर पुरुष कामभोगोंसे विरक्त हो भगवान् शंकरमें हेतुरहित पराभक्ति करते हैं, उनका मोक्ष हो जाता है, वे संसारबन्धनमें नहीं पड़ते। जो मायामय संसारमें चिरकालतक सुखपूर्वक विहार करके देहावसान होनेपर मोक्ष चाहते हैं, उनके लिये यह धर्म बताया गया है कि संसारमें भगवान् शिवकी पूजा सदा ही स्वर्ग और मोक्षका हेतु है। यदि प्रदोष आदिके गुणोंसे युक्त सोमवारके दिन यह पूजा की जाय तो उसका विशेष माहात्म्य है। जो केवल सोमवारको भी भगवान् शंकरकी पूजा करते हैं, उनके लिये इहलोक और परलोकमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। सोमवारको उपवास करके पवित्र हो इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए वैदिक अथवा लौकिक मन्त्रोंसे विधिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, कन्या, सुहागिन स्त्री अथवा विधवा कोई भी क्यों न हो, भगवान् शिवकी पूजा करके मनोवांछित वर पाता है। इस विषयमें मैं एक कथा कहूँगा, जिसको सुनकर मनुष्य मोक्ष पाते हैं और उनके मनमें भगवान् शिवकी भक्ति होती है।

आर्यावर्तमें चित्रवर्मा नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। वे दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये यमराजके समान समझे जाते थे। वे धर्ममर्यादाओंके रक्षक, कुमार्गगामी पुरुषोंको दण्ड देकर राहपर लानेवाले, समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले और शरणार्थियोंकी रक्षा करनेमें समर्थ थे। भगवान् शिव और विष्णुमें उनकी बड़ी भक्ति थी। राजा चित्रवर्माने अनेक परम पराक्रमी पुत्रोंको पाकर अन्तमें एक सुन्दर मुखवाली कन्या प्राप्त की। एक दिन राजाने जातकके लक्षण जाननेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर कन्याकी जन्मकुण्डलीके अनुसार भावी फल पूछे। तब उन ब्राह्मणोंमेंसे एक बहुज्ञ विद्वान्‌ने कहा—'महाराज! यह आपकी कन्या सीमन्तिनी नामसे प्रसिद्ध होगी। यह भगवती उमाकी भाँति मांग्लयमयी, दमयन्तीकी भाँति परम सुन्दरी, सरस्वतीके समान सब कलाओंको जाननेवाली तथा लक्ष्मीकी भाँति अत्यन्त सद्गुणोंसे सुशोभित होगी। यह दस हजार वर्षोंतक अपने स्वामीके साथ आनन्द भोगेगी और आठ पुत्रोंको जन्म देकर उत्तम सुखका उपभोग करेगी।' तत्पश्चात् एक दूसरे ब्राह्मणने कहा—'यह कन्या चौदहवें वर्षमें विधवा हो जायगी।' यह वज्राघातके समान दारुण वचन सुनकर राजा दो घड़ीतक चिन्तामें डूबे रहे। तदनन्तर सब ब्राह्मणोंको विदा करके राजाने 'सब कुछ भाग्यके अनुसार ही होता है' ऐसा समझकर चिन्ता छोड़ दी। सीमन्तिनी धीरे-धीरे सयानी हुई। अपनी सखीके मुखसे भावी वैधव्यकी बात सुनकर उसे बड़ा खेद हुआ। उसने चिन्तामग्न होकर याज्ञवल्क्य मुनिकी पत्नी

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६८९

मैत्रेयीसे पूछा—‘माताजी! मैं आपके चरणोंकी शरणमें आयी हूँ। मुझे सौभाग्य बढ़ानेवाले सत्कर्मका उपदेश दीजिये।’ इस प्रकार शरणमें आयी हुई राजकन्यासे पतिव्रता मैत्रेयीने कहा—‘सुन्दरी! तू शिवसहित पार्वतीजीकी शरणमें जा और सोमवारको एकाग्रचित्त हो स्नान और उपवासपूर्वक स्वच्छ वस्त्र धारण करके शिव और पार्वतीका पूजन कर। सोमवारके दिन शिव और पार्वतीकी आराधना करती रह। इससे बड़ी भारी आपत्ति पड़नेपर भी तू उससे मुक्त हो जायगी। घोर-से-घोर एवं भयंकर महाक्लेशमें पड़कर भी शिव-पूजा न छोड़ना। उसके प्रभावसे महान् भयसे पार हो जाओगी।’ इस प्रकार सीमन्तिनीको आश्वासन देकर पतिव्रता मैत्रेयी आश्रमको चली गयीं। राजकुमारीने उनके कथनानुसार भगवान् शिवका पूजन प्रारम्भ किया।

निषध देशमें नलकी पत्नी दमयन्तीके गर्भसे इन्द्रसेन नामक पुत्र हुआ था। राजा इन्द्रसेनके पुत्र चन्द्रांगद हुए। नृपश्रेष्ठ चित्रवर्माने राजकुमार चन्द्रांगदको बुलाकर गुरुजनोंकी आज्ञासे उन्हींके साथ अपनी पुत्री सीमन्तिनीका विवाह कर दिया। उस विवाहमें बड़ा उत्सव हुआ था। विवाहके पश्चात् चन्द्रांगद कुछ कालतक ससुरालमें ही रहे। एक दिन राजकुमार यमुनाके पार जानेके लिये कुछ मित्रोंके साथ नावपर सवार हुए। भाग्यवश नाव यमुनाके भँवरमें मल्लाहोंसहित डूब गयी। यमुनाके दोनों तटोंपर बड़ा भारी हाहाकार मच गया। इस दुर्घटनाको देखनेवाले समस्त सैनिकोंके विलापसे सारा आकाशमण्डल गूँज उठा। डूबनेवालोंमेंसे कुछ तो मर गये और कुछ ग्राहोंके पेटमें चले गये तथा राजकुमार आदि कुछ लोग उस महाजलमें अदृश्य हो गये। यह समाचार सुनकर राजा चित्रवर्मा बड़े व्याकुल हुए और यमुनाके किनारे आकर मूर्छित होकर गिर पड़े। सीमन्तिनीने भी जब यह समाचार सुना तब वह अचेत होकर धरतीपर गिर पड़ी। राजा इन्द्रसेन भी अपने पुत्रके डूबनेका समाचार पाकर रानियोंसहित बहुत दुःखी हुए और सुध-बुध खोकर गिर पड़े। तदनन्तर बड़े-बूढ़ोंके समझानेपर राजा चित्रवर्मा धीरे-धीरे नगरमें आये और उन्होंने अपनी पुत्रीको धीरज बँधाया।

राजा चित्रवर्माने जलमें डूबे हुए अपने दामादका और्ध्वदैहिक कृत्य वहाँ आये हुए उनके बन्धु-बान्धवोंसे करवाया। पतिव्रता सीमन्तिनीने चितामें बैठकर पतिलोकमें जानेका विचार किया। किंतु उसके पिताने स्नेहवश रोक दिया। तब वह विधवा-जीवन व्यतीत करने लगी। मुनिपत्नी मैत्रेयीने जिस शुभ सोमवार व्रतका उपदेश दिया था, उसे सदाचारपरायणा सीमन्तिनीने विधवा होनेपर भी नहीं छोड़ा। इस प्रकार चौदहवें वर्षकी आयुमें अत्यन्त दारुण दुःख पाकर वह भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करने लगी। शिवकी आराधना करते-करते उसके तीन वर्ष व्यतीत हो गये। उधर पुत्रशोकसे उन्मत्त हुए राजा इन्द्रसेनको बलपूर्वक दबाकर उनके भाइयोंने सारा राज्य छीन लिया और उन्हें पत्नीसहित पकड़कर कारागृहमें डाल दिया।

इन्द्रसेनके पुत्र चन्द्रांगद यमुनाके जलमें डूबनेपर नीचे-नीचे गहराईमें उतरने लगे। बहुत नीचे जानेपर उन्होंने नागवधुओंको जलक्रीडामें निमग्न देखा। राजकुमारको देखकर वे भी विस्मित हुईं और उन्हें पाताललोकमें ले गयीं। वहाँ चन्द्रांगदने तक्षक नागके परम अद्भुत रमणीय नगरमें प्रवेश किया और इन्द्रभवनके समान मनोहर एक सुन्दर महल देखा, जो बड़े-बड़े रत्नोंकी प्रकाशमान किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा था। भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी तक्षक नागको सभाभवनमें विराजमान देख परम बुद्धिमान् राजकुमारने प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तक्षकके तेजसे उनके नेत्र

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चौंधिया गये। नागराजने भी मनोरम राजकुमारको देखकर उन नागिनोंसे पूछा—'यह कौन है और कहाँसे आया है?' उन्होंने उत्तर दिया—'हमने इसे यमुनाजलमें देखा है और इसके कुल तथा नामका परिचय न होनेके कारण आपके पास ले आयी हैं।' तब तक्षकने राजकुमारसे पूछा—'तुम किसके पुत्र हो, कौन हो, कौन-सा तुम्हारा देश है और यहाँपर तुम्हारा कैसे आगमन हुआ है?'

राजपुत्रने कहा—भूमण्डलमें निषध नामसे प्रसिद्ध एक देश है। उसके स्वामी राजा नल महायशस्वी हो गये हैं। वे पुण्यश्लोक माने जाते हैं। उनके पुत्र इन्द्रसेन हुए और इन्द्रसेनका पुत्र मैं हुआ। मेरा नाम 'चन्द्रांगद' है। मैं अभी नूतन विवाह करके ससुरालमें ही टिका था और यमुनाजीके जलमें विहार करता हुआ दैवकी प्रेरणासे डूब गया। ये नागपत्नियां मुझे आपके पास ले आयी हैं। जन्मान्तरके उपार्जित पुण्योंके प्रभावसे यहाँ मैंने आपके चरणारविन्दोंका दर्शन किया है। आज मैं धन्य हूँ, मेरे माता-पिता कृतार्थ हो गये; क्योंकि आपने दया करके मेरी ओर देखा और मुझसे वार्तालाप किया है।

इस प्रकार अत्यन्त मनोहर उदारतापूर्ण वचन सुनकर तक्षकने कहा—राजकुमार! तुम भय न करो, धैर्य रखो और बताओ, तुम सम्पूर्ण देवताओंमें किसकी पूजा करते हो?

राजकुमारने कहा—जो सम्पूर्ण देवोंमें महादेव कहे जाते हैं, उन्हीं विश्वात्मा उमापति भगवान् शिवकी मैं पूजा करता हूँ। जो विधाताके भी विधाता, कारणके भी कारण और तेजोंमें सर्वोत्कृष्ट तेज हैं, वे भगवान् शिव मेरी परम गति हैं। जो अत्यन्त निकट होकर भी पापसे दूषित चित्तवाले पुरुषोंके लिये बहुत दूर हैं तथा जिनके तेजकी कोई सीमा नहीं है, जो अग्नि, भूमि, वायु, जल और आकाशमें भी स्थित हैं, वे विश्वात्मा भगवान् सदाशिव हम सबके लिये परम पूजनीय हैं। जो सम्पूर्ण भूतोंके साक्षी, सबकी आत्मामें स्थित रहनेवाले परमेश्वर तथा निरंजन हैं, सम्पूर्ण संसार जिनकी इच्छाके अधीन है, मैं उन भगवान् शिवकी पूजा करता हूँ। ज्ञानी पुरुष जिन्हें एक, आदि और पुराणपुरुष कहते हैं, गुणोंके भेदसे जिनमें भिन्नताकी प्रतीति होती है, जिन्हें कोई तो क्षेत्रज्ञ, कोई तुरीय और कोई कूटस्थ कहते हैं, वे भगवान् शिव मेरे परम आश्रय हैं। जो चैतन्यमय अचिन्त्य तत्त्व हैं, जिनके तेजका कहीं अन्त नहीं है, श्रुतिके नेति-नेति वचनोंसे तद्भिन्न समस्त वस्तुओंका बाध करके जिनके स्वरूपका निश्चय किया जाता है तथा आत्मज्ञानी पुरुषोंके भी मन और वाणीकी वृत्तियाँ जिनका स्पर्श नहीं कर पातीं, वे ही ये भगवान् शिव मेरे परम पूज्य हैं। जिनका प्रसाद पाकर साधुपुरुष अत्यन्त उज्ज्वल इन्द्रपदकी भी अभिलाषा नहीं रखते तथा कर्मोंकी अर्गला (आगल) और कालचक्रको लाँघकर निर्भय होकर विचरते हैं, वे भगवान् शिव मेरी गति हैं। जिनकी स्मृति चाण्डालकी योनिमें जन्म पानेवाले मनुष्योंके भी समस्त पापरूपी रोगोंका नाश करती है तथा जिनका सम्पूर्ण रूप श्रुतियोंके लिये भी ढूँढ़ने योग्य है, उन्हीं भगवान् शिवके उद्देश्यसे मैं सदैव पूजा करता हूँ। देवनदी गंगा जिनके मस्तकपर स्थान पाकर सुशोभित होती हैं, भगवती जगदम्बिका जिनके अर्धांगमें निवास करती हैं, अहा हा! तक्षक और वासुकि दोनों नागराज जिनके कानोंके कुण्डल हैं, वे चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिव मेरे परम आश्रय हैं। जिनके चरणकमल वेदोंके शीर्षस्थानीय उपनिषदोंमें गौरवान्वित होते हैं, वेदान्तकी श्रुति भी जिनके चरणारविन्दोंका गुणगान करती है, जिनका दिव्य स्वरूप सदा योगियोंके हृदयमें प्रकाशित होता है तथा जिनकी सगुण मूर्ति सम्पूर्ण तत्त्वोंका प्रकाश करनेवाली है, गुणमयी सृष्टिपर विजय पानेवाले वे भगवान् शंकर मेरे द्वारा पूजित होते हैं।

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६११

राजकुमारकी यह बात सुनकर तक्षकका चित्त प्रसन्न हो गया। उनके हृदयमें महादेवजीके प्रति नूतन भक्तिभावका उदय हो आया और वे उनसे इस प्रकार बोले— 'राजेन्द्रनन्दन ! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; क्योंकि तुम बालक होकर भी सर्वोत्कृष्ट परात्पर शिवतत्त्वको जानते हो। देखो, यह रत्नमय लोक है। ये मनोहर नेत्रोंवाली युवतियाँ हैं। ये मनोवांछित कामना पूर्ण करनेवाले कल्पवृक्ष हैं तथा ये अमृतरूपी जलसे भरी हुई बावलियाँ हैं। यहाँ मृत्युका दारुण भय नहीं है। बुढ़ापा और रोगसे यहाँ किसीको पीड़ा नहीं होती। तुम इच्छानुसार यहीं विहरो और यथायोग्य सुखभोगोंका उपभोग करो।' नागराजके ऐसा कहनेपर राजकुमार हाथ जोड़कर बोले— 'नागराज ! मैंने समयपर विवाह किया है। मेरी पत्नी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली और शिवपूजा-परायणा है और मैं अपने माता-पिताका इकलौता पुत्र हूँ। वे सब लोग इस समय मुझे मरा हुआ मानकर महान् शोकसे घिर गये होंगे। अतः मुझे किसी प्रकार भी यहाँ अधिक समयतक नहीं ठहरना चाहिये। आप कृपा करके मुझे उसी मनुष्यलोकमें पुनः पहुँचा दें।'

नागराज तक्षकने कहा—राजकुमार! तुम जब-जब मेरी याद करोगे, तब-तब तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा। ऐसा कहकर उन्होंने राजकुमारको एक सुन्दर अश्व भेंट किया, जो इच्छाके अनुसार चलनेवाला था। अनेक प्रकारके द्वीपों, समुद्रों और लोकोंमें उसकी अप्रतिहत गति थी। इसके सिवा उन्हें रत्नमय आभूषण, दिव्य वस्त्र एवं दिव्य अलंकार भेंट किये। उनकी सहायताके लिये सारी व्यवस्था करनेके पश्चात् तक्षकने 'जाओ' कहकर प्रेमपूर्वक उन्हें विदा किया। चंद्रांगद उस घोड़ेपर सवार हो निकले और थोड़ी ही देरमें यमुनाके जलसे बाहर आकर उस दिव्य अश्वपर चढ़े हुए ही नदीके रमणीय तटपर घूमने लगे। इसी समय पतिव्रता सीमन्तिनी अपनी सखियोंसे घिरी हुई वहाँ स्नान करनेके लिये आयी। उसने यमुनाके तटपर मनुष्यरूपधारी नागकुमारके साथ भ्रमण करते हुए राजकुमार चंद्रांगदको देखा। दिव्य अश्वपर आरूढ़ हुए अपूर्व आकारवाले उन राजकुमारको देखकर वह उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये खड़ी हो गयी। उसे देखकर चंद्रांगदने भी मन-ही-मन विचार किया—जान पड़ता है इसे मैंने पहले कभी देखा है। तत्पश्चात् वे घोड़ेसे उतरकर नदीके किनारे आ बैठे और उस सुन्दरीको बुलाकर समीप बैठाकर पूछा— 'तुम कौन हो, किसकी स्त्री और किसकी कन्या हो?' सीमन्तिनी लज्जावश स्वयं कुछ बोल न सकी। तब उसकी सखीने सब बातें बतायीं— 'इसका नाम सीमन्तिनी है। यह निषधराज इन्द्रसेनकी पुत्रवधू, युवराज चंद्रांगदकी रानी तथा महाराज चित्रवर्माकी पुत्री है। दुर्भाग्यवश इसके पति इस महाजलमें डूब गये। इससे वैधव्यका दुःख प्राप्त करके यह बाला शोकसे सूखती जा रही है। अत्यन्त प्रबल शोकमें ही इसने तीन वर्ष व्यतीत किये हैं। आज सोमवार है, इसलिये यहाँ यमुनाजीमें स्नान करनेके लिये आयी है। इसके श्वशुरका राज्य भी शत्रुओंने छीन लिया है। बलपूर्वक उसपर अधिकार जमा लिया है और वे महाराज अपनी पत्नीके साथ उनकी कैदमें पड़े हैं। यह सब होनेपर भी यह निर्मल अन्तःकरणवाली सदाचारपरायणा राजकुमारी प्रति सोमवारको अत्यन्त भक्तिभावके साथ पार्वतीसहित महादेवजीकी पूजा करती है।'

उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीमन्तिनीने अपनी सखीके मुखसे सब बातें कहलवाकर स्वयं भी राजकुमारसे पूछा— आप कौन हैं? आपके पार्श्ववर्ती ये दोनों पुरुष कौन हैं? आपने मेरे वृत्तान्तको एक स्नेहीकी भाँति क्यों पूछा है? महाबाहो! मुझे ऐसा जान पड़ता है कि पहले

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कभी मैंने आपको देखा है। आप मुझे स्वजनकी भाँति प्रतीत होते हैं।

इतना कहकर राजकुमारी सीमन्तिनी नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहाती हुई बहुत देरतक फूट-फूटकर रोती रही और मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। अपनी प्रियतमाके शोकका कारण सुनकर चन्द्रांगद भी शोकसे व्याकुल हो दो घड़ीतक चुपचाप बैठे रहे। तदनन्तर सीमन्तिनी उठकर राजकुमारकी ओर बारंबार निहारने लगी। उसने पहले देखे हुए अंगचिह्नों, स्वर आदि लक्षणों, अवस्थाके प्रमाण तथा रूप-रंग आदिकी परीक्षा करके यह निश्चय किया कि 'अवश्य यही मेरे पति हैं; क्योंकि मेरा हृदय प्रेमसे अधीर होकर इन्हींमें अनुरक्त हुआ है। परंतु क्या मुझ अभागिनीको अपने मरे हुए पतिका दर्शन हो सकता है? यह स्वप्न है या भ्रम अथवा मुनिपत्नी मैत्रेयीने जो मुझे यह कहा था कि तुम भारी-से-भारी विपत्तिमें पड़नेपर भी इस व्रतका पालन करती रहना, उसीका तो यह फल नहीं है। एक श्रेष्ठ ब्राह्मणने मेरा दस हजार वर्षोंका सौभाग्य बतलाया था। उन ब्राह्मण देवताका यह वचन अवश्य सत्य होगा। यह ईश्वरके बिना कौन जान सकता है? इधर प्रतिदिन मुझे मंगलसूचक शुभ शकुन दिखायी देते हैं। पार्वती देवीके प्राणनाथ भगवान् शिवके प्रसन्न होनेपर देहधारियोंके लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ हो सकती है।' इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विचार करके उसका सन्देह दूर हो गया। तब लज्जासे उसने अपना मुख नीचेकी ओर कर लिया। उस समय राजकुमारने कहा—'भद्रे! मैं तुम्हारे पतिके शोकसन्तप्त माता-पितासे यह समाचार बतलानेके लिये जा रहा हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे पति तुमसे शीघ्र ही मिलेंगे।'

यों कहकर राजकुमार घोड़ेपर सवार हुए और अपने दोनों सहायकोंके साथ शीघ्र ही अपने राज्यमें जा पहुँचे। वहाँ नगरोद्यानके समीप स्थित होकर उन्होंने नागराजके पुत्रको राजसिंहासनपर अधिकार जमाये बैठे हुए बन्धुओंके समीप भेजा। नागकुमारने शीघ्र जाकर उन सबसे कहा—'तुम सब लोग महाराज इन्द्रसेनको अविलम्ब कारागृहसे मुक्त करो और सिंहासन छोड़कर हट जाओ। महाराजके पुत्र चन्द्रांगद पाताललोकसे लौटकर यहाँ आये हैं। तुम आनाकानी न करो, नहीं तो चन्द्रांगदके बाण तुम्हारे प्राण हर लेंगे। वे यमुनाजीके जलमें डूबकर नागराज तक्षकके घर जा पहुँचे थे। वहाँसे उनकी सहायता पाकर पुनः इस लोकमें लौटे हैं।'

नागकुमारकी कही हुई ये सारी बातें सुनकर शत्रुओंने भी 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और महाराज इन्द्रसेनको उनके खोये हुए पुत्रके पुनः लौट आनेका समाचार बताकर उनका सिंहासन उन्हें लौटा दिया। महाराजको प्रसन्न करके भी वे लोग भयभीत बने रहे।

मेरा पुत्र आ रहा है, यह बात सुनकर राजा प्रेमके आँसू बहाते हुए आनन्दमें डूब गये। यही दशा महारानीकी भी थी। तदनन्तर सब नागरिक, वृद्ध मन्त्री और पुरोहित आगे जाकर चन्द्रांगदसे मिले और उन्हें हृदयसे लगाकर महाराजके समीप ले आये। अपने भवनमें प्रवेश करके अश्रुवर्षा करते हुए राजकुमारने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। चरणोंमें पड़े हुए पुत्रको उठाकर राजाने अश्रुसिक्त हृदयसे लगा लिया। फिर क्रमशः सब माताओंको प्रणाम करके उनका आशीर्वाद ले राजकुमार पुरवासियोंसे मिले और उन्होंने सबको यथायोग्य सम्मान दिया। पुनः सबके साथ राजसभामें बैठकर अपना सब वृत्तान्त पितासे निवेदन किया और नागराज तक्षकसे मित्रता होनेकी भी बात बतलायी। राजकुमारका चरित्र देख और सुनकर राजा इन्द्रसेन हर्षसे विह्वल हो गये। उन्होंने अपने मनमें यही माना कि मेरी पुत्रवधूने भगवान् महेश्वरकी आराधना करके इस अनुपम सौभाग्यका

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६९३

अर्जन किया है। निषधराजने यह मंगलमयी वार्ता दूतोंके द्वारा महाराज चित्रवर्माको भी कहला दी। यह अमृतमयी वार्ता सुनकर महाराज चित्रवर्मा आनन्दसे विह्वल हो गये और बड़े वेगसे उठकर उन्होंने सन्देशवाहकोंको उपहारमें बहुत धन दिया। फिर अपनी पुत्रीको बुलाकर उन्होंने उससे वैधव्यके चिह्नोंका परित्याग करवाया और उसे नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित किया। तत्पश्चात् समूचे राष्ट्रके गाँव और नगर आदिमें बड़ा भारी उत्सव हुआ और सब लोगोंने राजकुमारी सीमन्तिनीके सदाचारकी बड़ी प्रशंसा की। चित्रवर्माने इन्द्रसेनके पुत्र चन्द्रांगदको बुलाकर सीमन्तिनीको उनके साथ विदा कर दिया। चन्द्रांगदने तक्षकके घरसे लाये हुए रत्न आदि आभूषणोंके द्वारा, जो मानवमात्रके लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं, अपनी पत्नीको अलंकृत किया। तपे हुए सुवर्णके समान सुशोभित चालीस कोसतक जानेवाली सुगन्धसे युक्त दिव्य अंगरागसे सीमन्तिनीकी बड़ी शोभा हो रही थी। कमलके केसरके समान रंगवाले कल्पवृक्षके पुष्पोंसे बनी हुई और कभी न कुम्हलानेवाली माला भी सती सीमन्तिनीकी शोभा बढ़ा रही थी। इस प्रकार शुभ मुहूर्तमें अपनी पत्नीको साथ लेकर श्वशुरकी आज्ञासे चन्द्रांगद पुनः अपनी नगरीमें आये। महाराज इन्द्रसेनने अपने पुत्रको राजसिंहासनपर बिठाकर तपस्याद्वारा भगवान् शिवकी आराधना करके योगी पुरुषोंको उपलब्ध होनेवाली उत्तम गति प्राप्त की। राजा चन्द्रांगदने अपनी धर्मपत्नी सीमन्तिनीके साथ दस हजार वर्षोंतक नाना प्रकारके विषयोंका उपभोग किया। उन्होंने आठ पुत्रों और एक कन्याको जन्म दिया। सीमन्तिनी प्रतिदिन भगवान् महेश्वरकी पूजा करती हुई अपने स्वामीके साथ सुखपूर्वक रहने लगी। उसने सोमवारव्रतके प्रभावसे अपना खोया हुआ सौभाग्य प्राप्त कर लिया।

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त्यागी हुई रानी और राजकुमारकी वैश्य एवं शिवयोगीद्वारा रक्षा तथा शिवयोगीका राजपुत्रको धर्मका उपदेश करना

सूतजी कहते हैं—एक समय दशार्णदेशके राजा वज्रबाहुकी पत्नी सुमति अपने नवजात शिशुके साथ असाध्य रोगकी शिकार हो गयी थी; इसलिये दुष्टबुद्धि राजाने उसे वनमें त्याग दिया। वहाँ अनेक प्रकारके कष्ट भोगती हुई वह यत्नपूर्वक आगे बढ़ने लगी। बहुत दूर जानेपर उसने वैश्योंका एक नगर देखा, जिसमें बहुत-से स्त्री-पुरुष निवास करते थे। उस नगरका रक्षक एक बहुत बड़ा महाजन वैश्य था, जो पद्माकरके नामसे प्रसिद्ध था। वह दूसरे कुबेरके समान धनवान् था। उस वैश्यराजके घरमें सेवा-टहलका कार्य करनेवाली कोई दासी उधर ही आ रही थी। वह दूरसे ही राजपत्नीको देखकर उनके समीप आयी। उसने रानीको देखते ही उसका सारा हाल जान लिया। वह पुत्रसहित अत्यन्त कष्ट भोग रही थी। दासीने अपने स्वामीको उस स्त्रीका दर्शन कराया। वैश्यराजने रोगी पुत्रके साथ स्वयं भी रोगसे पीड़ित हुई राजपत्नीको एकान्तमें बुलाकर उसका सब वृत्तान्त पूछा और सब बात जान लेनेपर अपने घरके पास ही एकान्त गृहमें उसे ठहराया। अन्न, वस्त्र, जल और शय्या आदिका प्रबन्ध करके वैश्यने माताके समान उसका आदर किया। उस घरमें सुरक्षित होकर निवास करती हुई राजपत्नीके व्रण और यक्ष्मा आदि रोगोंकी शान्ति नहीं हुई। कुछ ही दिनोंमें रानीका पुत्र घावसे पीड़ित होकर वैद्योंकी चिकित्साशक्तिसे परे जा पहुँचा और मृत्युको प्राप्त हो गया। पुत्रके मरनेपर रानी महान्

६९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


शोकसे ग्रस्त हो मूर्च्छित हो गयी और टूटी हुई लताके समान धरतीपर गिर पड़ी। फिर सचेत होनेपर वैश्योंकी स्त्रियोंने उसे बहुत समझाया तथापि वह अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगी—‘हा पुत्र! बन्धु-बान्धवोंसे त्यागी हुई अपनी इस दीन एवं अनाथ माताको छोड़कर तुम कहाँ चले गये।’ जब वह इस प्रकार विलाप कर रही थी, उसी समय ऋषभ नामसे प्रसिद्ध शिवयोगी वहाँ आ पहुँचे। वैश्यराजने अर्घ्य देकर उनका सत्कार किया। तत्पश्चात् वे शोकग्रस्त राजपत्नीके समीप जाकर इस प्रकार बोले—‘बेटी! तुम इतनी क्यों रो रही हो? संसारमें किसका जन्म हुआ और कौन मृत्युको प्राप्त हुआ। ये शरीर आदि जलके फेनके समान क्षणभंगुर हैं। कभी इनकी प्रतीतिका भ्रम होता है, कभी ये शान्त हो जाते हैं और कभी पुनः इनकी स्थिति होती है। अतः फेनके समान इस शरीरकी मृत्यु होनेपर विद्वान् पुरुष शोक नहीं करते। सत्त्व आदि तीनों गुण मायासे उत्पन्न होते हैं। उन्हीं तीनों गुणोंसे शरीरकी उत्पत्ति हुई है। अतः सबके शरीर त्रिगुणमय ही हैं। सत्त्वगुणकी अधिकता होनेसे जीव देवयोनिको प्राप्त होता है, रजोगुणसे मानवयोनिमें जन्म लेता है और तमोगुणकी अधिकतासे अपनी वासनाके अनुसार वह पशु-पक्षी आदि योनिमें उत्पन्न होता है। वर्तमान संसारमें जीव अपने कर्मोंके बन्धनसे बँधकर बार-बार ऐसी सुख-दुःखमयी अवस्थाको प्राप्त होता है, जिसका अनुमान करना अत्यन्त कठिन है। जिनकी आयु एक कल्पतककी मानी गयी है, ऐसे देवताओंकी स्थितिमें भी उलट-फेर होता रहता है। फिर जो अनेक प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हैं, ऐसे मानव-देहधारी प्राणियोंकी तो बात ही क्या है? कोई कालको ही इस शरीरकी उत्पत्तिमें कारण बताते हैं, कोई कर्मको और कोई गुणोंको हेतु मानते हैं। वस्तुतः काल, कर्म और गुण तीनोंसे ही शरीरका आधान हुआ है। यह पांचभौतिक शरीर उत्पन्न हो या मरे, इसे देखकर विद्वान् पुरुष हर्ष और शोक नहीं करते। जीव अव्यक्तसे उत्पन्न होता और अव्यक्तमें ही लीन होता है, केवल मध्यकालमें जलके बुलबुलेकी भाँति व्यक्त-सा प्रतीत होता है। जीव जब गर्भमें आता है, उसी समय उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। वह दैववश जन्म लेकर जीवित रहता है अथवा जन्म लेते ही सहसा उसकी मृत्यु हो जाती है। कितने ही जीव गर्भमें ही नष्ट हो जाते हैं, कुछ जन्म लेनेपर तत्काल मर जाते हैं, कुछ जवान होनेपर मृत्युको प्राप्त होते हैं, और कुछ बुढ़ापेमें परलोकगामी होते हैं। पहलेका कर्म जैसा होता है, वैसा ही शरीर जीवको प्राप्त होता है तथा वह कर्मोंके अनुसार ही सुख-दुःख भोगता है। विधाताके द्वारा ललाटमें लिखी हुई आयु, सुख, दुःख, विद्या और धनको लिये हुए जीव जन्म लेता है। कर्मोंका उल्लंघन करना असम्भव है। कालका भी अतिक्रमण करना किसीके लिये सम्भव नहीं है। जगत्के समस्त पदार्थ अनित्य हैं। इसलिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। स्वप्नके पदार्थोंमें नियमपूर्वक स्थिरता कहाँ है? इन्द्रजालमें सच्चाई कहाँ है? शरद्-ऋतुके बादलोंमें चिरस्थायिता कहाँ है और प्राणियोंके शरीरमें नित्यता कहाँ है?* अबतक तुम्हारे सौ कोटि अयुत (दस हजार) जन्म व्यतीत हो चुके हैं। अब तुम्हीं बताओ, तुम किसकी-किसकी पुत्री हो, किसकी-किसकी माता हो और किसकी-किसकी पत्नी हो? यह शरीर पाँच भूतोंका बना हुआ है। यह त्वचा, रक्त और मांससे बँधा हुआ है। मेदा, मज्जा और हड्डियोंका समूह है तथा मल-मूत्र और


* क्व स्वप्ने नियतं स्थैर्यमिन्द्रजाले क्व सत्यता। क्व नित्यता शरन्मेघे क्व शाश्वत्त्वं कलेवरे॥ (स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १०।६४)

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६९५

कफका भाजन है। मोहमें पड़ी हुई नारी! यह जो तुम्हारे पास दूसरा शरीर (तुम्हारे पुत्रका शव) पड़ा हुआ है, इस अपने पुत्रको भी अपने शरीरसे निकला हुआ मल समझकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। कोई पण्डित भी अपनी तपस्या, विद्या, बुद्धि, मन्त्र, ओषधि तथा रसायनसे मृत्युका उल्लंघन नहीं कर सकता*। सुमुखि! आज एक जीवकी मृत्यु होती है तो कल दूसरेकी। अतः इस अनित्य शरीरके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। मृत्यु सदा समीप ही रहती है। फिर बताओ, देहधारियोंको क्या सुख है? अतः यदि तुम जन्म, बुढ़ापा और मृत्युको जीतना चाहती हो तो मृत्युको जीतनेवाले सबके ईश्वर भगवान् उमापतिकी शरणमें जाओ। तभीतकत मृत्युका घोर भय है तथा जन्म और जरावस्थाका भय है, जबतक कि जीव भगवान् शिवके चरणारविन्दोंकी शरणमें नहीं जाता। अत्यन्त भयंकर संसारमें नाना प्रकारके दुःखोंका अनुभव करके मनुष्यका मन जब उसकी ओरसे विरक्त हो जाता है, उस समय उसे भगवान् महेश्वरका ध्यान करना चाहिये। जो मनसे भगवान् शिवके ध्यानरूपी रसामृतका पान करता है, उस पुरुषको फिर संसारकी विषयरूपी मदिराको पीनेकी तृष्णा नहीं होती। जब सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटा हुआ मन वैराग्यके अधीन हो भगवान् शिवके चरणोंके चिन्तनमें मग्न हो जाता है, तब मनुष्यका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता है। भद्रे! यह मन भगवान् शिवके ध्यानका एकमात्र साधन है, उसे शोक और मोहमें न डुबाओ। शिवजीका भजन करो।'

इस प्रकार शिवयोगीने अनुनयपूर्वक जब रानीको समझाया तब उसने उन्हींको गुरु मानकर उनके चरणकमलोंमें प्रणाम करके कहा—

भगवन्! जिसका एकमात्र पुत्र मर गया हो, जिसे प्रिय बन्धुओंने त्याग दिया हो तथा जो महान् रोगसे अत्यन्त पीड़ित रहती हो, ऐसी मुझ अभागिनीके लिये मृत्युके सिवा दूसरी कौन गति है? इसलिये मैं इस शिशुके साथ ही प्राण त्याग देना चाहती हूँ। मृत्युके समय जो आपका दर्शन हो गया, मैं इतनेसे ही कृतार्थ हूँ।

रानीकी यह बात सुनकर दयानिधान शिवयोगी मरे हुए बालकके पास आये और शिवमन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्म लेकर उसके मुँहमें डाल दिया। विभूतिके पड़ते ही वह मरा हुआ बालक प्राणयुक्त हो गया। प्राण लौट आनेपर बालकने आँखें खोल दीं। उसकी इन्द्रियोंमें पूर्ववत् शक्ति आ गयी और वह दूध पीनेकी इच्छासे रोने लगा। तब नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाती हुई रानीने झपटकर बालकको गोदमें उठा लिया और उसे छातीसे चिपकाकर वह अपूर्व आनन्दमें डूब गयी। तत्पश्चात् शिवयोगीने माता और बालकके विषैले घावोंसे युक्त शरीरमें भस्मका स्पर्श कराया। इससे उन दोनोंके शरीर दिव्य हो गये। उन्होंने देवताओंके समान कान्तिमान् स्वरूप धारण कर लिया। तत्पश्चात् ऋषभने रानीसे कहा—'बेटी! तुम दीर्घकालतक जीवित रहो। जबतक इस संसारमें जीवित रहोगी, तबतक वृद्धावस्था तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी। साध्वी! तुम्हारा यह पुत्र लोकमें भद्रायु नामसे विख्यात होगा और अपना राज्य प्राप्त कर लेगा। तबतक तुम इन्हीं वैश्यराजके घरमें निवास करो, जबतक कि तुम्हारा पुत्र पूर्ण विद्वान् न हो जाय।'

इस प्रकार ऋषभ योगीने भस्मकी शक्तिसे मरे हुए राजकुमारको जीवित करके अपने अभीष्ट स्थानको प्रस्थान किया। भद्रायु उन्हीं वैश्यराजके घरमें क्रमशः बढ़ने लगा। वैश्यके भी 'सुनय' नामक एक पुत्र था, जो राजकुमारका


* तपसा विद्यया बुद्ध्या मन्त्रौषधिरसायनैः। अतियाति परं मृत्युं न कश्चिदपि पण्डितः॥ (स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १०। ७०)

६१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


सखा हुआ। राजकुमार और वैश्यकुमार दोनों परस्पर बड़ा स्नेह रखते थे। वैश्यराजने विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा राजकुमार और अपने पुत्रका भी संस्कार विस्तारपूर्वक करवाया। समयपर उपनयन-संस्कार हो जानेके पश्चात् दोनों बालकोंने गुरुसेवामें तत्पर हो विनयपूर्वक सम्पूर्ण विद्याओंका संग्रह किया। तदनन्तर जब राजकुमारका सोलहवाँ वर्ष लगा, तब वे ही ऋषभ योगी पुनः वैश्यराजके घर आये। रानी और राजकुमारने बड़े हर्षके साथ उनको बार-बार प्रणाम करके उनकी यथायोग्य पूजा की। उन दोनोंसे पूजित होनेपर योगीश्वर शिवयोगीने कहा—'बेटा! तुम कुशलसे तो हो न? तुम्हारी माताको भी कोई कष्ट तो नहीं है? क्या तुमने सब विद्याओंका अध्ययन कर लिया? गुरुजनोंकी सेवामें सदा संलग्न रहते हो न? वत्स! क्या मुझ प्राणदाता गुरुका कभी स्मरण करते हो?'

योगीश्वर ऋषभके ऐसा कहते समय विनयशीला रानीने अपने पुत्रको उनके चरणोंमें डाल दिया और कहा—गुरुदेव! यह आपका ही पुत्र है। आप ही इसके प्राणदाता पिता हैं। आप दया करके अपने इस शिष्यको अनुगृहीत करें और इसे सत्पुरुषोंके उत्तम मार्ग—शुभ कर्मका उपदेश दें। रानीके द्वारा इस प्रकार प्रसन्न कराये जानेपर परम बुद्धिमान् शिवयोगीने राजकुमारको सन्मार्गका उपदेश दिया।

ऋषभ बोले—वेद, स्मृति और पुराणोंमें जिसका उपदेश किया गया है, वही सनातन धर्म है। सब लोगोंको चाहिये कि अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार सदा शास्त्रोक्त धर्मका सेवन करें। वत्स! तुम सदा सत्पुरुषोंके मार्गपर चलो। उत्तम आचारका ही पालन करो। देवताओंकी आज्ञाका कभी उल्लंघन न करो, देवताओंकी अवहेलना भी न करो। गौ, देवता, गुरु और ब्राह्मणके प्रति सदा भक्तिभाव रखो। अतिथिके रूपमें चाण्डाल भी अपने घर आ जाय, तो सदा उसका सत्कार करो। अपने प्राणोंपर संकट आ जाय तो भी सत्यका परित्याग न करो। महाबाहो! पराये धनकी, परायी स्त्रीकी, देवता तथा ब्राह्मणकी वस्तुओंकी और अत्यन्त दुर्लभ पदार्थोंकी भी तृष्णा त्याग दो। महामते! सदा उत्तम कथा, उत्तम आचार, उत्तम व्रत, सत्पुरुषोंके आगमन तथा धर्म आदिके संग्रहकी ही अभिलाषा करो। स्नान, जप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण, गोपूजा, देवपूजा और अतिथिपूजामें कभी आलस्यको समीप न आने दो। क्रोध, द्वेष, भय, शठता, चुगली, अनुचित आग्रह, कुटिलता, दम्भ और उद्वेगका यत्नपूर्वक त्याग करो। अकारण वैर, व्यर्थकी बकवाद और दूसरोंकी निन्दा छोड़ दो। मृगया, द्यूतक्रीडा, मद्यपान, स्त्री और स्त्रीलम्पट पुरुष—इन सबके संगका परित्याग करो। अधिक भोजन, अधिक परिश्रम, अधिक बातचीत और अधिक खेल-कूद तथा क्रीडा-विलासको सदाके लिये छोड़ दो। अधिक विद्या, अधिक श्रद्धा, अधिक पुण्य, अधिक स्मरण, अधिक उत्साह, अधिक प्रसिद्धि और अधिक धैर्य जैसे भी प्राप्त

* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६९७

हो, उसके लिये सदा चेष्टा करो। अपनी ही पत्नीके प्रति सकाम बनो। अपने शत्रुओंपर ही क्रोध करो। पुण्यराशिके संग्रहके लिये ही लोभ करो। पापाचारियोंके प्रति ही असूया (दोषदृष्टि) करो। पाखण्डियोंके प्रति द्वेष तथा साधुपुरुषोंके प्रति राग रखो। बुरी सलाहको समझानेमें और ग्रहण करनेमें मूर्ख बने रहो। चुगुलोंकी बातें अनसुनी करनेके लिये बहरे हो जाओ। धूर्त, अत्यन्त क्रोधी, शठ, क्रूर, छली, चंचल, दुष्ट, पतित, नास्तिक और कुटिल मनुष्यको दूरसे ही त्याग दो। अपनी प्रशंसा न करो। दूसरोंकी चेष्टाओं और इशारोंको समझो। धन और कुटुम्बमें अधिक आसक्ति न रखो। पतिव्रता पत्नी, माता, श्वशुर, साधु पुरुष और गुरुके वचनोंमें सदा विश्वास करो। अपनी रक्षामें तत्पर होकर सदा सावधान रहो। उत्तम व्रतका पालन करो। अपने सेवकोंपर भी कभी पूर्ण विश्वास न करो। महामते! जो तुम्हारा विश्वासपात्र रहा हो ऐसा कोई पुरुष यदि चोरीमें भी पकड़ा जाय, तो उसे प्राणदण्ड न दो। पापरहित मनुष्योंपर सन्देह न करो। सत्यसे विचलित न होओ। अनाथ, दीन, वृद्ध, स्त्री, बालक और निरपराध मनुष्यकी धनसे, बुद्धिसे, शक्तिसे, बलसे तथा अपने प्राणोंद्वारा भी रक्षा करो। वध करने योग्य शत्रु भी यदि शरणमें आ जाय तो उसे न मारो। माता-पिता और गुरुके कोपसे बचो। धनका व्यय, पुत्रों तथा ब्राह्मणोंका अपराध सहन करो। जिस प्रकार ब्राह्मण प्रसन्न हों, वैसा उनका हित करो। क्योंकि श्रेष्ठ द्विज संकटमें पड़े हुए राजाका उस संकटसे उद्धार करते हैं। आयु, यश, बल, सुख, धन, पुण्य और प्रजाजनोंकी उन्नति—यह सब जिस सत्कर्मसे सम्भव हो, उसका सदा सेवन करना चाहिये। देश, काल, शक्ति, कर्तव्य, अकर्तव्यका भलीभाँति विचार करके सदा यत्नपूर्वक कर्म करो। स्वयं किसीको बाधा न पहुँचाओ। दूसरोंकी बाधाका निवारण करो। उत्तम नीति और शक्तिसे चोरों तथा दुष्टोंका दमन करो। स्नान, जप, होम, देवपूजा तथा श्राद्धकर्ममें उतावली न करो। नींद लेने और भोजनमें शीघ्रता करो। उदारतायुक्त, शठतासे रहित, सत्य, मनुष्योंके मनको प्रिय लगनेवाली तथा थोड़ेसे अक्षर और अधिक अर्थवाली बात बोलो। कहीं भी भय न करो। शत्रुओं और विपत्तियोंमें पड़कर भी निडर बने रहो। ब्राह्मणकुल, गुरुकी आज्ञा तथा पापाचरणसे डरो। कुटुम्बीजनों, भाई-बन्धुओं, ब्राह्मणों, पत्नियों, पुत्रों तथा भोजनकी पंक्तियोंमें समतापूर्ण बर्ताव करो। सत्पुरुषोंके हितकारक उपदेशों, पुण्य कथाओं, विद्या-गोष्ठियों तथा धर्मचर्चाओंसे कभी मुँह न मोड़ो। जलके निकट, सर्वत्र विख्यात, ब्राह्मणोंके निवाससे युक्त, परम पवित्र तथा कल्याणमय प्रशस्त स्थानमें सदा निवास करो। जहाँ कुलटाएँ और वेश्याएँ रहती हों, जहाँ कामलम्पट पुरुषोंका निवास हो, ऐसे नीच जनसेवित दूषित स्थानमें तुम कभी निवास न करो। त्रिभुवनके स्वामी एकमात्र भगवान् शिवकी शरण लेकर भी तुम सभी देवताओंकी यथासमय उपासना करते रहो और उनके दिनों (तत्सम्बन्धी तिथियों)-का भी समादर करो। वत्स! तुम सदा पवित्र, सदा दक्ष, सदा शान्त, सदा स्थिर, सदा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—इन छहों शत्रुओंको जीतनेवाले तथा सदा एकान्तवासी बनो। वेदवेत्ता ब्राह्मण, नियमोंसे प्रकाशित होनेवाले शान्त संन्यासी, पुण्य वृक्ष, पुण्य नदी, पुण्य तीर्थ, महासरोवर, धेनु, वृषभ, पतिव्रता स्त्री तथा अपने घरके देवताओंको उनके पास जाते ही सहसा नमस्कार करो।

ब्राह्म मुहूर्तमें उठकर भलीभाँति आचमन करके तुम पहले अपने गुरुजीको प्रणाम करो। तत्पश्चात् उमापति भगवान् शिवका ध्यान करके लक्ष्मीपति नारायण, ब्रह्मा, गणेश, स्कन्द, कात्यायनी देवी, महालक्ष्मी, सरस्वती, इन्द्र आदि लोकपाल तथा पुण्यश्लोक (पवित्र यशवाले) महर्षियोंका चिन्तन

६९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो। उसके बाद उदयकालमें सदा भगवान् सूर्यको प्रणाम करो। गन्ध, पुष्प, ताम्बूल, शाक और पके फल आदि भक्ष्य-भोज्य प्रिय एवं नूतन पदार्थ पहले भगवान् शिवको अर्पण करके फिर प्रसादरूपसे उसका उपभोग करो। जो कुछ दान, सत्कर्म, जप, स्नान, होम, चिन्तन तथा तप तुम्हारे द्वारा किया जाय, वह सब भगवान् शिवको समर्पित कर दो। खाते, पाठ करते, सोते, घूमते, देखते, सुनते, बोलते और ग्रहण करते समय सदा भगवान् शिवका ही चिन्तन करो। प्रतिदिन मन्त्रराज पंचाक्षरका जप और ध्यान करते हुए सदा भगवान् सदाशिवके चरणोंमें अपने मनको रमाते रहो। वत्स! यह संक्षेपसे तुम्हारे लिये धर्मका उपदेश किया गया है।

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शिवयोगीसे शिव-कवचका उपदेश और दिव्य खड्ग एवं शंख पाकर भद्रायुका शत्रुओंको जीतना तथा निषधराजकी पुत्रीसे उसका विवाह

ऋषभ शिवयोगी कहते हैं—हे भद्रायु! पवित्र स्थानमें यथायोग्य आसन बिछाकर बैठे। इन्द्रियोंको अपने वशमें करके प्राणायामपूर्वक अविनाशी भगवान् शिवका चिन्तन करे। परमानन्दमय भगवान् महेश्वर हृदय-कमलके भीतरकी कर्णिकामें विराजमान हैं। उन्होंने अपने तेजसे आकाशमण्डलको व्याप्त कर रखा है। वे इन्द्रियातीत, सूक्ष्म, अनन्त एवं सबके आदि कारण हैं। इस प्रकार ध्यानके द्वारा समस्त कर्मबन्धनका नाश करके चिरकालतक चिदानन्दमय भगवान् सदाशिवमें अपने चित्तको लगाये रहे। फिर षडक्षरन्यासके द्वारा अपने मनको एकाग्र करके मनुष्य (निम्नलिखित) शिवकवचके द्वारा अपनी रक्षा करे।

‘सर्वदेवमय महादेवजी गहरे संसार-कूपमें गिरे हुए मुझ असहायकी रक्षा करें। उनका दिव्य नाम मेरे समस्त हृदयस्थित पापोंका नाश करे। सम्पूर्ण विश्व जिनकी मूर्ति है, जो ज्योतिर्मय आनन्दघनस्वरूप चिदात्मा हैं, वे भगवान् शिव मेरी सर्वत्र रक्षा करें। जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, महान् शक्तिसे सम्पन्न हैं, वे ‘ईश्वर’ महादेवजी सम्पूर्ण भयोंसे मेरी रक्षा करें। जिन्होंने पृथ्वीके रूपमें इस विश्वको धारण कर रखा है, वे अष्टमूर्ति ‘गिरीश’ पृथ्वीसे मेरी रक्षा करें। जो जलके रूपमें जीवोंको जीवन-दान दे रहे हैं, वे जलसे मेरी रक्षा करें। जो विशद लीलाविहारी ‘शिव’ कल्पके अन्तमें समस्त भुवनोंको विदग्ध करके आनन्दसे नृत्य करते हैं, वे कालरुद्र भगवान् दावानलसे, आँधी-तूफानोंसे और समस्त तापोंसे मेरी रक्षा करें। प्रदीप्त विद्युत् एवं स्वर्णके सदृश जिनकी कान्ति है, विद्या, वर, अभय (मुद्रा) और कुठार जिनके करकमलोंमें सुशोभित हैं, जो चतुर्मुख और त्रिलोचन हैं, वे ‘सत्पुरुष’ भगवान् पूर्व दिशामें निरन्तर मेरी रक्षा करें। जो कुठार, वेद, अंकुश, पाश, शूल, कपाल, नगाड़ा और रुद्राक्षकी मालाको धारण किये हुए हैं, जो चतुर्मुख हैं, वे नीलरुचि, त्रिनेत्र ‘अघोर’ भगवान् दक्षिण दिशामें मेरी रक्षा करें। कुन्द, चन्द्रमा, शंख और स्फटिकके समान जिनकी उज्ज्वल कान्ति है, वेद, रुद्राक्षमाला, वर और अभय (मुद्रा)-से जो सुशोभित हैं, वे महाप्रभावशाली चतुरानन, त्रिलोचन ‘सद्योधिजात’ भगवान् पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें। जिनके हाथोंमें वर, अभय (मुद्रा), रुद्राक्षमाला और टाँकी विराजमान है, कमल-किंजल्कके सदृश जिनका वर्ण है, वे चतुर्मुख त्रिनेत्र ‘वामदेव’

* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६९९

भगवान् उत्तर दिशामें मेरी रक्षा करें। जिनके करकमलोंमें वेद, अभय, वर, अंकुश, टाँकी, पाश, कपाल, नगाड़ा, रुद्राक्षमाला और शूल सुशोभित हैं, जो सितद्युति हैं, वे परम प्रकाशरूप पंचमुख 'ईशान' भगवान् मेरी ऊपरसे रक्षा करें। भगवान् 'चन्द्रमौलि' मेरे सिरकी, 'भालनेत्र' मेरे भालकी, 'भगनेत्रहारी' मेरे नेत्रोंकी, 'विश्वनाथ' मेरी नासिकाकी, 'श्रुतिगीतकीर्ति' कानोंकी, 'पंचमुख' मुखकी, 'वेदजिह्वा' जीभकी, 'गिरीश' गलेकी, 'नीलकण्ठ' दोनों हाथोंकी, 'धर्मबाहु' कन्धोंकी, 'दक्षयज्ञ-विध्वंसी' वक्षःस्थलकी, 'गिरीन्द्रधन्वा' पेटकी, 'कामदेवके नाशक' मध्यदेशकी, 'गणेशजीके पिता' नाभिकी, 'धूर्जटि' कटिकी, 'कुबेरमित्र' दोनों पिण्डलियोंकी, 'जगदीश्वर' दोनों घुटनोंकी, 'पुंगवकेतु' दोनों जाँघोंकी और 'सुरवन्द्यचरण' मेरे पैरोंकी सदैव रक्षा करें। 'महेश्वर' दिनके पहले प्रहरमें मेरी रक्षा करें। 'वामदेव' मध्यके प्रहरमें, 'त्र्यम्बक' तीसरे प्रहरमें और 'वृषभध्वज' दिनके अन्तवाले प्रहरमें मेरी रक्षा करें। 'शशिशेखर' रात्रिके आरम्भमें, 'गंगाधर' अर्धरात्रिमें, 'गौरीपति' रात्रिके अन्तमें और 'मृत्युंजय' सर्वकालमें मेरी रक्षा करें। 'शंकर' अन्तःस्थित अवस्थामें मेरी रक्षा करें। 'स्थाणु' बहिःस्थित रक्षा करें। 'पशुपति' बीचमें रक्षा करें और 'सदाशिव' सब ओर मेरी रक्षा करें। 'भुवनैकनाथ' खड़े होनेके समय, 'प्रमथनाथ' चलते समय, 'वेदान्तवेद्य' बैठे रहते समय और 'अविनाशी शिव' सोते समय मेरी रक्षा करें। 'नीलकण्ठ' रास्तेमें मेरी रक्षा करें। 'त्रिपुरारी' शैलादि दुर्गोंमें और उदारशक्ति 'मृगव्याध' वनवासादि महान् प्रवासोंमें मेरी रक्षा करें। जिनका प्रबल क्रोध कल्पोंका अन्त करनेमें अत्यन्त पटु है, जिनके प्रचण्ड अट्टहास्यसे ब्रह्माण्ड काँप उठता है, वे 'वीरभद्रजी' समुद्रके सदृश भयानक शत्रुसेनाके दुर्निवार महान् भयसे मेरी रक्षा करें। भगवान् 'मृड' मुझपर आततायीरूपसे आक्रमण करनेवालोंकी हजारों, दस हजारों, लाखों और करोड़ों पैदलों, घोड़ों, हाथियों और रथोंसे युक्त अति भीषण सैकड़ों अक्षौहिणी सेनाओंका अपनी घोर कुठार-धारसे छेदन करें। भगवान् 'त्रिपुरान्तक'का प्रलयाग्निके समान ज्वालाओंसे युक्त जलता हुआ त्रिशूल मेरे दस्युदलका विनाश कर दे और उनका पिनाक धनुष शार्दूल, सिंह, रीछ और भेड़िया आदि हिंस्र जन्तुओंको सन्त्रस्त करे। वे जगदीश्वर मेरे बुरे स्वप्न, बुरे शकुन, बुरी गति, मनकी दुष्ट भावना, दुर्भिक्ष, दुर्व्यसन, दुःसह अपयश, उत्पात, सन्ताप, विषभय, दुष्ट ग्रहोंके दुःख तथा समस्त रोगोंका नाश करें।'

“'सम्पूर्ण तत्त्व जिनके स्वरूप हैं, जो सम्पूर्ण तत्त्वोंमें विचरण करनेवाले, समस्त लोकोंके एकमात्र कर्ता और सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र भरण-पोषण करनेवाले हैं, जो अखिल विश्वके एक ही संहारकारी, सब लोकोंके एकमात्र गुरु, समस्त संसारके एक ही साक्षी, सम्पूर्ण वेदोंके गूढ़ तत्त्व, सबको वर देनेवाले, समस्त पापों और पीड़ाओंका नाश करनेवाले, सारे संसारको अभय देनेवाले, सब लोगोंके एकमात्र कल्याणकारी, चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले, अपने सनातन प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले, निर्गुण, उपमारहित, निराकार, निराभास, निरामय, निष्प्रपंच, निष्कलंक, निर्द्वन्द्व, निःसंग, निर्मल, गतिशून्य, नित्यरूप, नित्यवैभवसे सम्पन्न, अनुपम ऐश्वर्यसे सुशोभित, आधारशून्य, नित्य, शुद्ध-बुद्ध, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दघन, अद्वितीय तथा परम शान्त, प्रकाशमय, तेजस्वरूप हैं, उन भगवान् सदाशिवको नमस्कार है। हे महारुद्र ! महारौद्र, भद्रावतार, दुःखदावाग्नि-विदारण, महाभैरव, कालभैरव कल्पान्तभैरव, कपालमालाधारी ! हे खट्वांग, खड्ग, ढाल, पाश, अंकुश, डमरू, शूल, धनुष, बाण, गदा, शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर, मुशल, मुद्गर, पट्टिश, परशु, परिघ, भुशुण्डि, शतघ्नी और चक्र आदि आयुधोंके द्वारा भयंकर हजार हाथोंवाली !

७०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


हे मुखदंष्ट्राकराल, विकटअट्टहास्य-विस्फारित-ब्रह्माण्डमण्डल, नागेन्द्रकुण्डल, नागेन्द्रवलय, नागेन्द्रचर्मधर, मृत्युंजय, त्र्यम्बक, त्रिपुरान्तक, विरूपाक्ष विश्वेश्वर, विश्वरूप, वृषवाहन, विधुभूषण और विश्वतोमुख ! आपकी जय हो, जय हो। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। मेरे महामृत्यु-भयको जला दीजिये, जला दीजिये। अपमृत्युका नाश कीजिये, नाश कीजिये। (बाहरी और भीतरी) रोग-भयको जड़से मिटा दीजिये, जड़से मिटा दीजिये। सर्पविष-भयको शान्त कीजिये, शान्त कीजिये। चोर-भयको मार डालिये, मार डालिये। मेरे (काम-क्रोध-लोभादि भीतरी तथा इन्द्रियोंके और शरीरके द्वारा होनेवाले पाप-कर्मरूपी बाहरी) शत्रुओंको उच्चाटन कीजिये, उच्चाटन कीजिये। शूलके द्वारा विदारण कीजिये, विदारण कीजिये। कुठारके द्वारा काट डालिये, काट डालिये। खड्गके द्वारा छेद डालिये, छेद डालिये। खट्वांगके द्वारा नाश कीजिये, नाश कीजिये। मुशलके द्वारा पीस डालिये, पीस डालिये और बाणोंके द्वारा बींध डालिये, बींध डालिये। आप मेरी हिंसा करनेवाले राक्षसोंको भय दिखाइये, भय दिखाइये। भूतोंका विदारण कीजिये, विदारण कीजिये। कूष्माण्ड, बेताल, मारियों और ब्रह्मराक्षसोंको सन्त्रस्त कीजिये, सन्त्रस्त कीजिये। मुझको अभय कीजिये, अभय कीजिये। मुझ डरे हुएको आश्वासन दीजिये, आश्वासन दीजिये। नरक-भयसे मेरा उद्धार कीजिये, उद्धार कीजिये। मुझे जीवन-दान दीजिये, जीवन-दान दीजिये। क्षुधा-तृष्णासे मुझको आप्यायित कीजिये, आप्यायित कीजिये। आपकी जय हो, जय हो। मुझ दुःखातुरको आनन्दित कीजिये, आनन्दित कीजिये। शिवकवचसे मुझे आच्छादित कीजिये, आच्छादित कीजिये। त्र्यम्बक! सदाशिव! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।''

इस प्रकार मैंने तुम्हें वरदायक शिव-कवचका उपदेश किया है। यह सब बाधाओंको शान्त करनेवाला तथा समस्त प्राणियोंके लिये गोपनीय वस्तु है। जो मनुष्य इस उत्तम शिव-कवचको सदा धारण करता है, उसे भगवान् शंकरकी कृपासे कहीं भी भय नहीं प्राप्त होता। जिसकी आयु क्षीण हो गयी है, जो मरणासन्न है अथवा महान् रोगसे मृतप्राय हो रहा है, वह भी इस कवचको धारण करनेसे तत्काल सुखी होता है और दीर्घ आयु पाता है। वत्स! मेरे दिये हुए इस उत्तम शिव-कवचको तुम श्रद्धापूर्वक धारण करो, इससे तुम शीघ्र ही कल्याणके भागी होओगे।

ऐसा कहकर ऋषभ योगीने उस राजकुमारको बड़ी भारी आवाज करनेवाला एक शंख तथा शत्रुओंका नाश करनेवाला एक खड्ग दिया। फिर भस्मको अभिमन्त्रित करके राजकुमारके सब अंगोंमें लगाया और उसे बारह हजार हाथियोंका बल प्रदान किया। तदनन्तर योगीने कहा—'इस तलवारकी धार बड़ी पैनी है। तुम जिसको एक बार इसे दिखा दोगे, उस शत्रुको तत्काल मृत्यु हो जायगी; तथा तुम्हारे जो शत्रु इस शंखकी ध्वनि सुनेंगे, वे मूर्च्छित होकर गिर जायँगे, अचेत होकर हथियार डाल देंगे। ये खड्ग और शंख दोनों ही दिव्य हैं। इनके प्रभावसे और भगवान् शिवके कवचकी महिमासे बारह हजार हाथियोंके समान महान् बलसे तथा भस्मधारणजनित शक्तिसे तुम शत्रु-सेनापर अवश्य विजय प्राप्त करोगे। पिताके सिंहासनको पाकर इस पृथ्वीकी रक्षा करोगे।' इस प्रकार मातासहित भद्रायुको भलीभाँति उपदेश करके उन दोनोंसे पूजित हो योगीबाबा इच्छानुसार चले गये।

इधर मगध देशके राजाने राजा वज्रबाहुको युद्धमें हराकर उनकी राजधानीको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया, उनकी स्त्रियों और गोधन आदिको हर लिया और वज्रबाहुको भी बलपूर्वक बाँधकर रथपर बैठाकर वे शत्रुलोग अपने नगरको ले गये। इस प्रकार राष्ट्रके विनाशका भयंकर कोलाहल

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ७०१

होनेपर बलवान् राजकुमार भद्रायुने भी यह समाचार सुना कि शत्रुओंने मेरे पिताको बाँध लिया, मेरी माताओंको भी हर लिया और दशार्णदेशका राज्य नष्ट कर दिया है। यह सुनकर राजकुमार भद्रायु सिंहकी भाँति गर्जना करने लगा। उसने शंख और खड्ग ले लिये, कवच पहना और घोड़ेपर सवार हो वह शत्रुओंको जीतनेकी इच्छासे बड़े वेगसे उस स्थानपर आया, जहाँ मागधसेना भरी हुई थी। राजकुमार शीघ्र ही शत्रुओंकी सेनामें घुस गया और धनुषको कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा करने लगा। राजपुत्रके बाणोंकी मार खाकर शत्रु भी उसपर टूट पड़े और बड़े वेगसे भयंकर बाणोंद्वारा उसे घायल करने लगे। युद्धोन्मत्त शत्रुओंके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे आहत होकर भी धीर-वीर राजकुमार रणभूमिमें विचलित नहीं हुआ। वह शिवकवचसे पूर्णतः सुरक्षित था। मागध-सैनिकोंकी अस्त्र-वर्षाका सामना करते हुए ही वीरवर भद्रायुने शत्रुसेनामें प्रवेश करके बहुत-से रथों, हाथियों और पैदल सैनिकोंको शीघ्रतापूर्वक मार गिराया। रणभूमिमें ही एक रथीको सारथिसहित मारकर राजकुमारने उस रथपर अधिकार कर लिया और अपने मित्र वैश्यकुमारको सारथि बनाकर युद्धमें विचरण प्रारम्भ किया। ऐसा जान पड़ता था, मानो मृगोंके झुंडमें कोई सिंह भ्रमण कर रहा है। तब शत्रुसेनाके सभी बलवान् सेनापति अपना धनुष उठाये क्रोधमें भरकर केवल उसीकी ओर दौड़ पड़े। यह देख राजकुमार भद्रायु उन आक्रमणकारियोंके सामने अपना भयंकर खड्ग उठाये उन्हें अपना पराक्रम दिखलानेके लिये आगे बढ़ा। चमकती हुई विकराल तलवारको देखते ही सब सेनापति सहसा उसके प्रभावसे प्रतिहत हो प्राणोंसे हाथ धो बैठे। उस रणभूमिमें जो-जो सैनिक उस चमचमाती हुई तलवारको देख लेते थे, उन सबकी तत्काल मृत्यु हो जाती थी। तदनन्तर भद्रायुने शत्रुओंकी सम्पूर्ण सेनाका नाश करनेके लिये अतिशय गर्जना करनेवाले उस महाशंखको बजाया। उस शंख-ध्वनिके सुनते ही सब शत्रु मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। अचेत होकर पृथ्वीपर पड़े हुए शस्त्रहीन सैनिकोंको मृततुल्य मानकर धर्मशास्त्रके ज्ञाता राजकुमारने उनका वध नहीं किया। अपने बँधे हुए पिताको बन्धनमुक्त करके शत्रुओंके वशमें पड़ी हुई अपनी माताओंको भी राजकुमारने छुड़ाया। इसी प्रकार मुख्य-मुख्य मन्त्रियों तथा अन्य पुरवासियोंकी स्त्रियों, बालकों और कन्याओंको गोधन आदिसहित शत्रुओंके भयसे मुक्त करके उन सबको धैर्य बँधाया। तत्पश्चात् राजकुमारने नगरके राजा, मन्त्री तथा मुख्य-मुख्य अधिकारियों और सेनापतियोंको कैद करके बलपूर्वक अपनी पुरीमें प्रवेश कराया। पहले युद्धमें जो लोग चारों दिशाओंमें भाग गये थे, वे सब विश्वस्त होकर लौट आये और राजकुमारका पराक्रम देखकर सबके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। सब लोग सोचने लगे—'अहो! यह कोई योगसिद्ध अथवा तपःसिद्ध पुरुष है, या कोई देवता है। क्योंकि इसने जो महान् कर्म किया है, वह मनुष्यकी शक्तिसे परे है। इस अनन्त शक्तिधारी वीरने नौ अक्षौहिणी सेनाको परास्त किया है।'

इसी समय भद्रायुके पिता राजा वज्रबाहु विस्मय और आह्लादमें डूबे हुए तथा नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए उसके सामने आये। राजकुमारने प्रेमसे विह्वल होकर पिताको प्रणाम किया। तब राजाने पूछा—'महामते! तुम कौन हो, देवता हो या मनुष्य? अथवा कोई गन्धर्व तो नहीं हो? तुम्हारे माता-पिता कौन हैं, तुम्हारा देश कौन-सा है और तुम्हारा नाम क्या है? तुमने हमें और हमारी स्त्रियोंको किस कारणसे शत्रुओंके बन्धनसे छुड़ाया है? तुम्हारे इस ऋणसे बन्धु-बान्धवोंसमेत मैं हजार जन्मोंमें भी मुक्त नहीं हो सकता। इन पुत्रों, इन पत्नियों तथा इस राज्य और नगरको छोड़कर मेरा चित्त तुम्हींमें प्रेमपूर्वक बँधा हुआ है।'

७०२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भद्रायु बोला—राजन् ! यह मेरा सखा वैश्यपुत्र है। इसका नाम सुनय है। मैं इसीके सुन्दर गृहमें अपनी माताके साथ निवास करता हूँ। मेरा नाम भद्रायु है। मैं अपना वृत्तान्त पीछे आपको बताऊँगा। इस समय आप स्त्रियों और मित्रजनोंके साथ नगरमें प्रवेश कीजिये और शत्रुओंका भय छोड़कर सुखसे रहिये। जबतक मैं पुनः लौटकर न आऊँ, तबतक इन शत्रुओंको न छोड़ियेगा।

ऐसा कहकर राजकुमार भद्रायु राजाकी आज्ञा ले अपने घरको आया और वहाँ उसने अपनी मातासे सब समाचार कह सुनाया। रानीने प्रसन्न होकर अपने पुत्रको हृदयसे लगा लिया और वैश्यराजने भी प्रेमसे राजकुमारका आलिंगन करके उसका विशेष सत्कार किया। इधर महाराज वज्रबाहु स्त्री, पुत्र और मन्त्रियोंके साथ अपने राजमहलमें प्रवेश करके बहुत प्रसन्न हुए। वह रात्रि व्यतीत होनेपर योगियोंमें श्रेष्ठ ऋषभ महारानी सीमन्तिनीके पति राजा चन्द्रांगदके समीप गये और भद्रायुकी उत्पत्ति तथा उसके अलौकिक पराक्रमका वर्णन करके एकान्तमें प्रेमपूर्वक बोले—‘राजन्! तुम अपनी पुत्री कीर्तिमालिनीका विवाह राजकुमार भद्रायुके साथ करो। इस प्रकार निषधराजको समझाकर योगी ऋषभ चले गये।’

तदनन्तर राजा चन्द्रांगदने वैवाहिक मंगलके लिये उपयुक्त शुभ मुहूर्तमें भद्रायुको बुलाया और अपनी कीर्तिमालिनी नामक पुत्री उसे ब्याह दी। भद्रायुके पिता राजा वज्रबाहुको भी बुलाकर निषधराजने मन्त्रियोंसहित उनकी अगवानी की और नगरमें आनेपर उनका यथावत् सत्कार किया। वज्रबाहुने देखा शत्रुओंका नाश करनेवाला भद्रायु विवाह करके मेरे चरणोंमें प्रणाम कर रहा है। तब उन्होंने बड़े प्रेम और हर्षसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया तथा निषधराजसे कहा—‘चन्द्रांगदजी ! आपका यह दामाद बड़ा बलवान् है। मैं इसके वंश और जन्मका यथार्थ परिचय सुनना चाहता हूँ।’ उनके इस प्रकार पूछनेपर निषधराजने उनसे एकान्तमें मिलकर हँसते हुए कहा—‘महाराज ! यह आपका ही पुत्र है। शैशवकालमें यह रोगसे पीड़ित था और इसकी माता भी रोगसे व्याकुल रहती थी। अतः आपने मातासहित इस बालकको वनमें त्याग दिया था। बालकके साथ वनमें घूमती हुई वह असहाय नारी दैवयोगसे एक वैश्यके घरमें जा पहुँची। वैश्यने उसकी रक्षा की। फिर आपका यह बालक रोगसे अत्यन्त पीड़ित होकर मर गया। किंतु किसी योगिराजने आकर इसे पुनः जीवित कर दिया। योगिराजका नाम ऋषभ है। शिवयोगी ऋषभके ही प्रभावसे ये माँ, बेटे देवताओंके समान दिव्य रूपको प्राप्त हुए हैं। उन्हींके दिये हुए शत्रुनाशक खड्ग और शंखके द्वारा शिव-कवचसे सुरक्षित हो भद्रायुने युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है। ये अकेले ही बारह हजार हाथियोंका बल धारण करते हैं। ये सब विद्याओंमें पारंगत हैं और अब मेरे जामाता भी हो गये हैं। अतः आप इन्हें और इनकी पतिव्रता माताको साथ लेकर अपने नगरको जाइये। इससे आप उत्तम कल्याणके भागी होंगे।’

ये सब बातें बताकर राजा चन्द्रांगद अपने रनिवासमें ठहरी हुई राजाकी ज्येष्ठ पत्नीको वहाँ ले आये। वे वस्त्र-आभूषणोंसे विभूषित थीं। उन्होंने वज्रबाहुको रानीसे मिलाया। यह सब वृत्तान्त सुनकर और देखकर राजा वज्रबाहु बहुत लज्जित हुए और मूर्खतावश उनके द्वारा जो अनुचित कर्म हो गया था, उसकी वे स्वयं ही निन्दा करने लगे। पत्नी और पुत्रके दर्शनसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। उनके सब अंगोंमें रोमांच हो आया और उन्होंने दोनोंको हृदयसे लगा लिया। इस प्रकार निषधराजसे पूजित और प्रशंसित होकर राजा वज्रबाहुने अपनी बड़ी रानीको, राजकुमार भद्रायुको और पुत्रवधू कीर्तिमालिनीको भी साथ ले परिवारसहित अपनी राजधानीको प्रस्थान किया।

  • ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ७०३ ---|---

वहाँ जाकर भद्रायुने समस्त पुरवासियोंको आनन्दित किया। समय आनेपर उसके पिता जब स्वर्गवासी हो गये, तब युवावस्थामें अद्भुत पराक्रमी भद्रायुने ही सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन किया और ब्रह्मर्षियोंके समीप मगधराज हेमर्थसे मित्रता जोड़कर उन्हें अपने बन्धनसे मुक्त किया।


## भद्रायु तथा कीर्तिमालिनीके भक्तिभावकी परीक्षा लेकर भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना

सूतजी कहते हैं—राजसिंहासन प्राप्त कर लेनेपर वीर राजा भद्रायुने किसी समय अपनी धर्मपत्नीके साथ रमणीय वनमें प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने देखा, कुछ ही दूरपर एक ब्राह्मण पति-पत्नी चिल्लाते हुए भागे जाते हैं और कोई बाघ उनका पीछा कर रहा है। वे दोनों पति-पत्नी कह रहे थे—'महाराज! हा राजन्! हे करुणानिधे! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' यह पुकार सुनकर राजाने अपना धनुष उठाया। इतनेमें ही वह व्याघ्र आ पहुँचा। उसने ब्राह्मणीको पकड़ लिया। वह 'हा नाथ! हा नाथ! हा प्राणवल्लभ! हा शम्भो! हा जगदीश्वर!' आदि कहकर विलाप करने लगी। व्याघ्र बड़ा भयानक था। उसने ज्यों ही ब्राह्मणीको पकड़ा, त्यों ही राजा भद्रायुने अपने तीखे बाणोंसे उसके मर्ममें आघात किया। किंतु वह महाबली व्याघ्र उन बाणोंसे तनिक भी व्यथित न हो, ब्राह्मणीको बलपूर्वक खींचकर दूर निकल गया। अपनी पत्नीको व्याघ्रके पंजेमें पड़ी हुई देख ब्राह्मणको बड़ा दुःख हुआ। वह विलाप करने लगा—'हा प्रिये! हा कान्ते! हा पतिव्रते! मुझे यहाँ अकेला छोड़कर तुम परलोकमें कैसे चली गयी? तुमको छोड़कर मैं कैसे जीवित रह सकता हूँ। राजन्! तुम्हारे वे बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र कहाँ हैं, जिनकी बड़ी प्रशंसा सुनी जाती थी? वह महान् धनुष अब क्या हो गया? तुम्हारा बारह हजार हाथियोंसे भी अधिक बल कहाँ है? तुम्हारे शंख, खड्ग तथा मन्त्रास्त्रविद्यासे क्या लाभ हुआ? दूसरोंको क्षीण होनेसे बचाना क्षत्रियका परम धर्म है। धर्मज्ञ राजा अपना धन और प्राण देकर भी शरणमें आये हुए दीन-दुःखियोंकी रक्षा करते हैं। जो पीड़ितोंकी प्राणरक्षा नहीं कर सकते, ऐसे लोगोंके जीवनकी अपेक्षा तो उनकी मृत्यु ही श्रेष्ठ है।'

इस प्रकार ब्राह्मणका विलाप और उसके मुखसे अपने पराक्रमकी निन्दा सुनकर राजाने शोकसे मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—'अहो! आज भाग्यके उलट-फेरसे मेरा पराक्रम नष्ट हो गया। मेरे धर्मका भी नाश हो गया। अतः अब मेरी सम्पदा, राज्य और आयुका भी निश्चय ही नाश हो जायगा।' यों विचारकर राजा भद्रायु ब्राह्मणके चरणोंमें गिर पड़े और

७०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

उसे धीरज बँधाते हुए बोले—'ब्रह्मन्! मेरा पराक्रम नष्ट हो गया है। मुझ क्षत्रियाधमपर आप कृपा कीजिये। महामते! शोक छोड़ दीजिये। मैं आपको मनोवांछित पदार्थ दूँगा। यह राज्य, यह रानी और मेरा यह शरीर सब कुछ आपके अधीन है। बोलिये आप क्या चाहते हैं?'

ब्राह्मण बोले—राजन्! अन्धेको दर्पणसे क्या काम? जो भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करता हो, वह बहुत-से घर लेकर क्या करेगा। जो मूर्ख है, उसे पुस्तकसे क्या काम तथा जिसके पास स्त्री नहीं है, वह धन लेकर क्या करेगा? मेरी पत्नी चली गयी, मैंने कभी काम-सुखका उपभोग नहीं किया। अतः कामभोगके लिये आप अपनी इस बड़ी रानीको मुझे दे दीजिये।

राजाने कहा—ब्रह्मन्! क्या यही तुम्हारा धर्म है? क्या तुम्हें गुरुने यही उपदेश किया है? क्या तुम नहीं जानते कि परायी स्त्रीका स्पर्श स्वर्ग एवं सुयशकी हानि करनेवाला है? परस्त्रीके उपभोगसे जो पाप कमाया जाता है, उसे सैकड़ों प्रायश्चित्तोंद्वारा भी धोया नहीं जा सकता।

ब्राह्मण बोले—राजन्! मैं अपनी तपस्यासे भयंकर ब्रह्महत्या और मदिरापान-जैसे पापका भी नाश कर डालूँगा। फिर परस्त्रीसंगम किस गिनतीमें है। अतः आप अपनी इस भार्याको मुझे अवश्य दे दीजिये। अन्यथा आप निश्चय ही नरकमें पड़ेंगे।

ब्राह्मणकी इस बातपर राजाने मन-ही-मन विचार किया कि ब्राह्मणके प्राणोंकी रक्षा न करनेसे महापाप होगा। अतः इससे बचनेके लिये पत्नीको दे डालना ही श्रेष्ठ है। इस श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी पत्नी देकर मैं पापसे मुक्त हो शीघ्र ही अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा। मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके राजाने आग जलायी और ब्राह्मणको बुलाकर उसके प्रति अपनी पत्नीको दे दिया। तत्पश्चात् स्नान करके पवित्र हो देवताओंको प्रणाम करके उन्होंने अग्निकी दो बार परिक्रमा की और एकाग्रचित्त होकर भगवान् शिवका ध्यान किया। इस प्रकार राजाको अग्निमें गिरनेके लिये उद्यत देख जगत्पति भगवान् विश्वनाथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये। उनके पाँच मुँह थे। मस्तकपर चन्द्रकला आभूषणका काम दे रही थी। कुछ-कुछ पीले रंगकी जटा लटकी हुई थी। वे कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी थे। हाथोंमें त्रिशूल, खट्वांग, कुठार, ढाल, मृग, अभय, वरद और पिनाक धारण किये, बैलकी पीठपर बैठे हुए भगवान् नीलकण्ठको राजाने अपने आगे प्रत्यक्ष देखा। उनके दर्शनजनित आनन्दसे युक्त हो राजा भद्रायुने हाथ जोड़कर स्तवन किया।

राजा बोले—जिनका दूसरा कोई स्वामी नहीं है, जो अविकारी, प्रधान गुणोंसे युक्त और महान् हैं तथा स्वयं कारणरहित होकर कारणोंके भी कारण हैं, उन सच्चिदानन्दमय प्रशान्तस्वरूप देव परमशिवको मैं नमस्कार करता हूँ। आप सम्पूर्ण विश्वके साक्षी, इस जगत्के कर्ता, महान् तेजोमय तथा सबके हृदयमें अन्तर्यामी रूपसे स्थित हैं। इसीलिये विद्वान् पुरुष सदा आपकी खोज करते हैं और योगीजन अपनी चित्तवृत्तियोंको रोककर अनेक प्रकारके योग-साधनोंद्वारा आपकी आराधना करते हैं। जो लोग एकात्मताकी भावना करते हैं, उनके लिये आप एक हैं और जिनकी बुद्धिमें नानात्वकी प्रतीति होती है, उनके लिये आप ही अनेक रूपोंमें व्यक्त हुए हैं। आपका पद (स्वरूप) इन्द्रियोंसे परे, सबका साक्षी, आविर्भाव और तिरोभावकी लीलासे युक्त तथा मनकी पहुँचसे दूर है। आप मन और वाणीके लिये दुर्लभ हैं। आपमें मोहका सर्वथा अभाव है। आप परमात्मारूप हैं। मेरी वाणी केवल सत्त्वादि गुणोंमें स्थित और प्रकृतिमें विलीन होनेवाली है। अतः वह आपके दिव्य विग्रहकी स्तुति करनेमें कैसे

* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ७०५

समर्थ हो सकती है? तथापि शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले आपके चरण-कमलोंका जो लोग भक्तिपूर्वक आश्रय लेते हैं, वे आपको प्राप्त होते हैं। अतः भयंकर भवरूपी दावानलसे पीड़ित हो मैं संसारभयकी शान्तिके लिये नित्य आपका भजन करता हूँ। देवताओंके भी देवता, कल्याणनिकेतन, भगवान् महादेवको नमस्कार है। सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले त्रिमूर्तिरूप आपको नमस्कार है। विश्वके आदिरूप और संसारके प्रथम साक्षी आपको नमस्कार है। सत्तामात्र तत्त्व आपका स्वरूप है, आपको नमस्कार है। आप ज्ञानानन्दघन हैं, आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें निवास करनेवाले हैं। आपकी आत्मशक्ति सब क्षेत्रोंसे भिन्न है। आप ही अशक्त हैं और आप ही अतिशय शक्तिमान्‌के रूपमें आभासित होते हैं। आप भूमा परमेश्वरको नमस्कार है। आप नित्य, निराभास, सत्यज्ञानमय विशुद्ध अन्तरात्मा हैं, सबसे दूर और समस्त कर्मोंसे मुक्त हैं। आपको प्रणाम है। आप वेदान्तद्वारा जाननेयोग्य तथा वेदके मूलभागमें निवास करनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। आपकी चेष्टाएँ (लीलाएँ) विवेकयुक्त एवं पवित्र होती हैं। आप त्रिगुणमयी वृत्तियोंसे सर्वथा दूर हैं, आपको नमस्कार है। आपका पराक्रम कल्याणमय है, आप कल्याणमय फल देनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप अनन्त, महान्, शान्त एवं शिवरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप अघोर (सौम्य), अत्यन्त घोर और घोर पापराशिका विदारण करनेवाले हैं। संसारबन्धनके बीजोंको भून डालनेवाले सर्वश्रेष्ठ गुरु भगवान् भर्गको नमस्कार है। मोहरहित एवं निर्मल आत्मगुणोंवाले आपको नमस्कार है। जगदीश्वर! सनातन देव शंकर! विरूपाक्ष रुद्र! अविनाशी मृत्युंजय! मेरी रक्षा कीजिये। हे कल्याणमय चन्द्रशेखर! शान्तमूर्ति गौरीपते! सूर्य, चन्द्र एवं अग्निमय नेत्रोंवाले गंगाधर! अन्धकासुरका नाश करनेवाले पुण्यकीर्ति भूतनाथ! और कैलाश पर्वतपर निवास करनेवाले महादेव! आपको बारंबार नमस्कार है।

राजाके इस प्रकार स्तुति करनेपर माता पार्वतीके साथ प्रसन्न हुए करुणानिधान महेश्वरने कहा—राजन्! तुमने किसी अन्यका चिन्तन न करके जो सदा-सर्वदा मेरा पूजन किया है, तुम्हारी इस भक्तिके कारण और तुम्हारे द्वारा की हुई इस पवित्र स्तुतिको सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। तुम्हारे भक्तिभावकी परीक्षाके लिये मैं स्वयं ब्राह्मण बनकर आया था। जिसे व्याघ्रने ग्रस लिया था, वह ब्राह्मणी और कोई नहीं, ये गिरिराजनन्दिनी उमादेवी ही थीं। तुम्हारे बाण मारनेसे भी जिसके शरीरको चोट नहीं पहुँची, वह व्याघ्र मायानिर्मित था। तुम्हारे धैर्यको देखनेके लिये ही मैंने तुम्हारी पत्नीको माँगा था। इस कीर्तिमालिनीकी और तुम्हारी भक्तिसे मैं सन्तुष्ट हूँ। तुम कोई दुर्लभ वर माँगो, मैं उसे दूँगा।

राजा बोले—देव! आप साक्षात् परमेश्वर हैं। आपने सांसारिक तापसे घिरे हुए मुझ अधमको जो प्रत्यक्ष दर्शन दिया है, यही मेरे लिये महान् वर है। देव! आप वरदाताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपसे मैं दूसरा कोई वर नहीं माँगता। मेरी यही इच्छा है कि मैं, मेरी रानी, मेरे माता-पिता, पद्माकर वैश्य और उसके पुत्र सुनय—इन सबको आप अपना पार्श्ववर्ती सेवक बना लीजिये।

तत्पश्चात् रानी कीर्तिमालिनीने प्रणाम करके अपनी भक्तिसे भगवान् शंकरको प्रसन्न किया और यह उत्तम वर माँगा—‘महादेव! मेरे पिता चन्द्रांगद और माता सीमन्तिनी—इन दोनोंको भी आपके समीप निवास प्राप्त हो।' भक्तवत्सल भगवान् गौरीपतिने प्रसन्न होकर 'एवमस्तु' कहा और उन दोनों पति-पत्नीको इच्छानुसार वर देकर वे क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। इधर राजाने

७०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भगवान् शंकरका प्रसाद प्राप्त करके रानी कीर्तिमालिनीके साथ प्रिय विषयोंका उपभोग किया और दस हजार वर्षोंतक राज्य करनेके पश्चात् अपने पुत्रोंको राज्य देकर उन्होंने शिवजीके परम पदको प्राप्त किया। राजा और रानी दोनों ही भक्तिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करके भगवान् शिवके धामको प्राप्त हुए। यह परम पवित्र, पापनाशक एवं अत्यन्त गोपनीय भगवान् शिवका विचित्र गुणानुवाद जो विद्वानोंको सुनाता है अथवा स्वयं भी शुद्धचित्त होकर पढ़ता है, वह इस लोकमें भोग-ऐश्वर्यको प्राप्तकर अन्तमें भगवान् शिवको प्राप्त होता है।


भस्मकी महिमासे ब्रह्मराक्षसका उद्धार

सूतजी कहते हैं—वामदेव नामसे प्रसिद्ध एक महातपस्वी शिवयोगी हुए हैं, जो सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित, निर्गुण, शान्त, असंग, समदर्शी, आत्माराम, क्रोधको जीतनेवाले तथा गृह और गृहिणीसे हीन थे। सबके ऊपर दया करनेमें संलग्न रहनेवाले वे महात्मा एक दिन स्वेच्छानुसार घूमते-फिरते बड़े भयंकर क्रौंचारण्यमें जा पहुँचे। उस निर्जन वनमें कोई भूख-प्याससे व्याकुल अत्यन्त भयानक ब्रह्मराक्षस रहता था। वामदेवजीको देखकर उन्हें खा जानेके लिये वह राक्षस बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़ा। उसे आते देख योगीश्वर वामदेव तनिक भी विचलित नहीं हुए। उस घोर ब्रह्मराक्षसने वेगसे दौड़कर उन्हें पकड़ लिया। पर वामदेवके अंगोंका स्पर्श होते ही उसकी सारी पापराशि तत्काल नष्ट हो गयी और उसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया। जैसे चिन्तामणि (स्पर्शमणि)-का स्पर्श करके लोहा भी सुवर्ण हो जाता है, जैसे जम्बू नदीमें पड़ी हुई मिट्टी भी सोना हो जाती है, जैसे मानस-सरोवरमें आकर कौए भी हंस हो जाते हैं और जिस प्रकार एक बार भी अमृत पी लेनेपर मनुष्य अजर-अमर देवता हो जाता है, उसी प्रकार महात्मा पुरुष अपने दर्शन तथा स्पर्श आदिसे पापियोंको भी तत्काल पवित्र कर देते हैं। अतः सत्संग दुर्लभ है*। जो राक्षस पहले भूख-प्याससे विकल हो घोररूप धारण करके वनमें भटकता फिरता था, वही साधुके सम्पर्कसे पूर्णानन्दमय हो गया। उसने योगीके युगल-चरणारविन्दोंमें प्रणाम करके कहा—'महायोगिन्! मुझपर प्रसन्न होइये। करुणानिधे! प्रसन्न होइये। कहाँ सब प्राणियोंको भय देनेवाला मुझ-जैसा पापात्मा और कहाँ आप-जैसे दयालु महात्माका दर्शन !'

वामदेवजी बोले—भयानक राक्षसका रूप धारण करके इस वनमें विचरनेवाले तुम कौन हो और यहाँ किस लिये रहते हो?

राक्षसने कहा—इससे पचीसवें जन्म पूर्व मैं पवनराष्ट्रका रक्षक था। उस समय मेरा नाम दुर्जय था। मैं बड़ा पापी और स्वेच्छाचारी था। प्रतिदिन नयी-नयी स्त्रीका उपभोग करनेकी इच्छा रखता था। नित्य एक-एक स्त्रीको भोगकर छोड़ देता और उसे घरके भीतर रखकर अन्य स्त्रियोंका अपहरण करवाता था। मेरे द्वारा भोगी हुई वे स्त्रियाँ घरके भीतर बंद रहकर दिन-रात शोकमें डूबी रहती थीं। मेरे राज्यमें जितने ब्राह्मण थे, वे सब स्त्रियोंसहित भाग गये। मैं


* यथा चिन्तामणिं स्पृष्ट्वा लोहं काञ्चनतां व्रजेत्। यथा जम्बूनदीं प्राप्य मृत्तिका स्वर्णतां व्रजेत् ॥
यथा मानसमभ्येत्य वायसा यान्ति हंसताम्। यथामृतं सकृत्पीत्वा नरो देवत्वमाप्नुयात् ॥
तथैव हि महात्मानो दर्शनस्पर्शनादिभिः। सद्यः पुनन्त्यघोपेतान्सत्सङ्गो दुर्लभः कृतः ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १५। १२—१४)

* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड *७०७

सधवा, विधवा, कुमारी तथा रजस्वला सभी तरहकी स्त्रियोंका हरण करके उनके साथ कुकर्म करता था। इस प्रकार दूषित विषयभोगोंमें आसक्त, मत्त एवं मदिरापानमें रत रहनेके कारण मुझे जवानीमें ही यक्ष्मा आदि बड़े-बड़े रोगोंने घेर लिया। मन्त्रियों और सेवकोंने भी मुझे त्याग दिया। अन्तमें अपने ही कुकर्मके कारण मैं मर गया। जो मनुष्य धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है, उसकी आयु नष्ट होती है, अयश बढ़ता है, भाग्य क्षीण होता है। वह अत्यन्त दुर्गतिमें पड़ता है तथा उसके पूर्वज पितर स्वर्गसे निश्चय ही गिर जाते हैं*। मृत्युके पश्चात् यमराजके दूत मुझे यमलोक ले गये। वहाँ मैं भयंकर नरककुण्डमें डाल दिया गया। उस कुण्डके भीतर यमदूतोंसे पीड़ित होकर मुझे तीस हजार वर्षोंतक रहना पड़ा। तदनन्तर बचे हुए पापके फलसे मैं निर्जन वनमें भूख-प्याससे विकल पिशाच हुआ। पिशाचयोनिमें मैंने एक सौ दिव्य वर्ष व्यतीत किये। फिर दूसरे जन्ममें व्याघ्र, तीसरेमें अजगर, चौथेमें भेड़िया, पाँचवेंमें सूअर, छठेमें गिरगिट, सातवेंमें कुत्ता, आठवेंमें सियार, नवेंमें गवय (नीलगाय), दसवेंमें मृग, ग्यारहवें जन्ममें वानर, बारहवेंमें गीध, तेरहवेंमें नेवला, चौदहवेंमें कौआ, पंद्रहवेंमें रीछ, सोलहवेंमें वनमुर्गा, सत्रहवेंमें गदहा, अठारहवेंमें बिलाव, उन्नीसवेंमें मेढक, बीसवेंमें कछुआ, इक्कीसवेंमें मछली, बाईसवेंमें चूहा, तेईसवेंमें उल्लू, चौबीसवेंमें जंगली हाथी और पचीसवें जन्ममें मैं ब्रह्मराक्षस हुआ। इस समय आपके शरीरके स्पर्शमात्रसे मेरी पूर्वजन्मोंकी स्मृति जाग उठी है। आपके संगसे मेरे मनमें वैराग्य एवं प्रसन्नता हुई है। महामते! ऐसा प्रभाव आपको कैसे प्राप्त हुआ?

वामदेवजी बोले—यह मेरे शरीरमें लगे हुए भस्मका महान् प्रभाव है। भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन है, जो भस्मकी शक्तिको जानता हो। महादेवजीका जैसा माहात्म्य है, वैसा ही भस्मका भी है। भस्मके संसर्गसे तुम्हारी बुद्धि भी निर्मल हो गयी। अतः तुम भी श्रद्धासे पवित्र त्रिपुण्ड्र धारण करो।

महातपस्वी शिवयोगी वामदेवने इस प्रकार भस्मका माहात्म्य बतलाकर भस्मको अभिमन्त्रित करके उसे घोर ब्रह्मराक्षसको दिया। उससे ब्रह्मराक्षसने अपने ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण किया और उसके प्रभावसे वह तत्काल ब्रह्मराक्षस-शरीरका त्याग करके दिव्य स्वरूपसे सुशोभित होने लगा। उसने भक्तिपूर्वक गुरु वामदेवकी परिक्रमा की और दिव्य विमानपर बैठकर पुण्य-लोकको प्रस्थान किया। महायोगी वामदेव साक्षात् शिवकी ही भाँति पुनः संसारमें भ्रमण करने लगे।

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भस्मकी महिमा, शबरकी चिताभस्मद्वारा की हुई पूजासे शिवजीकी प्रसन्नता और उसकी जली हुई पत्नीका पुनः जीवित होना

सूतजी कहते हैं—श्रद्धा ही सम्पूर्ण धर्मोंके लिये अत्यन्त हितकर है। श्रद्धासे ही मनुष्योंको दोनों लोकोंमें सिद्धि प्राप्त होती है। श्रद्धासे भजन करनेवाले पुरुषको पत्थरकी मूर्ति भी फल देनेवाली होती है। श्रद्धा-भक्तिसे पूजा करनेपर अज्ञानी गुरु भी सिद्धिदायक हो जाता है। श्रद्धासे


* आयुर्विनश्यत्ययशो विवर्धते भाग्यं क्षयं यात्यतिदुर्गतिं व्रजेत्। स्वर्गाच्च्यवन्ते पितरः पुरातना धर्मव्यपेतस्य नरस्य निश्चितम् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १५। ३५)