भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी २०३

विहार करता है, जिसकी वार्तालाप का परिणाम १८ विद्याओं की व्याख्या है, और जो दोषों से समस्तगुण को इस प्रकार निकाल लेता है जैसे जलमिश्रित दूध से सब दूध को हंस निकाल लेता है ।

संवित् कमल — संवित् का अर्थ ज्ञान है । १२ अरों का अनाहत् चक्र जो सुषुम्ना में स्थित है, उससे यह अष्टदल पद्म पृथक है । इसका स्थान वक्षस् में है ।

अरुणाचल के विख्यात रमणमहर्षि की श्रीरमण गीता में इस कमल का स्थान दक्षिण भाग में होना बताया गया है । रमणगीता के तत्संबंधी श्लोक हम नीचे उद्धृत करते हैं ।

अहंवृत्तिः समस्तानां वृत्तीनां मूलमुच्यते ।
निर्गच्छति यतोऽहंधीर्हृदयं तत्समासतः ॥ (५, ४)
हृदस्य यदि स्थानं भवेच्चक्रमनाहतं ।
मूलाधारं समारभ्य योगस्योपक्रमः कुतः ॥ (५, ३)
अन्यदेव ततो रक्तपिण्डाद्धृदयमुच्यते
अहंहृदितिवृत्या तदात्मनो रूपमीरितम् ॥ (५, ५)
तस्य दक्षिणतो धाम हृत्पीठे नैव वामतः ।
तस्मात्प्रवहति ज्योतिः सहस्रारं सुषुम्नया ॥ (५, ६)

अर्थ:—सब वृत्तियों का मूल अहम्-वृत्ति है, और जिस स्थान पर अहम्-बुद्धि का उदय होता है, वह हृदय है । यदि हृदय

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का स्थान अनाहत् चक्र माना जाय, तो मूलाधार से आरम्भ होने वाले योग का उपक्रम कहां रहता है (अर्थात् नहीं रहता)। इसलिये हृदय उससे अन्य है, और वह रक्त पिण्ड से भी अन्य है । अयंहृद् इस वाक्य से आत्मा का स्वरूप कहा गया है। (देखें छांदोग्योपनिषद् (८, ३, ३), हृद्+अयम्=हृदयं, यहां ‘अयम्’ पद आत्मा के लिये प्रयुक्त किया गया है)। उसका स्थान दक्षिण की ओर है, वाम ओर नहीं। उस स्थान से ज्योति का प्रवाह उठ कर सुषुम्ना में जाकर सहस्रार में जाता है।

अहंसंवित् अर्थात् अहंवृत्ति का ज्ञान जिस स्थान से उदय होता हुआ अनुभव में आवे वह ही हृदय का स्थान जानना चाहिये। वह स्थान आत्मा का स्थान है, वहां पर ही मन का स्फुरण होता है और वहां पर ही परमात्मा विराजते हैं। इस स्थान पर ‘हंस:’ मन्त्र का जप किया जाता है।

हंसोपनिषद् में हंस का ध्यान इस प्रकार किया जाना कहा गया है कि

हृदयेऽष्टदले हंसात्मानं ध्यायेत् । अग्निसोमौ पक्षौ, ॐ कारः शिरो बिन्दुस्तुनेत्रं मुखो रुद्रो रुद्राणि चरणौ वाहूकालश्चाग्निश्च ... एषोऽसौ परमहंसो भानुकोटिप्रतीकाशः ।

अर्थ:— हृदय में अष्ट दल पद्म पर आत्मा स्वरूप हंस का ध्यान करना चाहिये। अग्नि और चन्द्र उसके दो पंख हैं, ॐ कार शिर, बिन्दु नेत्र, मुख रुद्र, चरण रुद्राणी, अग्नि और काल बाहू। ऐसा

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यह परम हंस कोटि सूर्य के प्रकाश से युक्त है। हंसः इस मंत्र का एक कोटि जप करने से यह कमल खिलता है। हं और सः दोनों को हंस और हंसिनी का जोडा कहते हैं। हं पुमान् है और सः शक्ति का रूप है। प्रत्येक दल के क्रम से आठों दलों पर उसके बैठने का फल इस प्रकार है। पूर्व पर पुण्य मति, आग्नेय कोण पर निद्रा आलस्य, दक्षिण पर क्रूर बुद्धि, नैर्ऋत् पर पाप बुद्धि, पश्चिम पर क्रीडा की इच्छा, वायव्य कोण पर यात्रा की इच्छा, उत्तर पर रति इच्छा और ईशान कोण पर धनेच्छा, मध्य में वैराग्य, केशर पर जाग्रत, कर्णिका में स्वप्न, सूक्ष्म में सुषुप्ति और पद्म का त्याग कर के ऊपर उडने पर तुरीया समाधि की अवस्था होती है।

हंस का जोडा जब वार्तालाप करता है, तब योगियों को १८ विद्याएं आ जाती हैं, मानो दोनों की वार्ता का विषय उनकी व्याख्या स्वरूप होती है। १८ विद्याओं के नाम ये हैं:— शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छन्द, चार वेद, दोनों मीमांसा दर्शन, न्याय, पुराण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्व विद्या और नीति शास्त्र। चारों वेदों की चार विद्याओं में और दोनों मीमांसा दर्शनों की एक विद्या में गणना करनी चाहिये।

गौडपादाचार्य रचित सुभगोदय के भाष्य में श्री भगवत्पाद ने हंसके जोडे का रूप एक दीप शिखा के सदृश बताया है। उसके दक्षिण और वाम भाग ही हंसेश्वर और हंसेश्वरी हैं। हंसेश्वर को शिखी और हंसेश्वरी को शिखिनी भी कहते हैं उनका ध्यान हृदय पद्म के मध्य में करना चाहिये।

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नारायणोपनिषद् में भी हृद्देश में दीपशिखा का ध्यान करने का उपदेश मिलता है। उसका वर्णन इस प्रकार है:—

तस्य मध्ये (हृदयस्य) वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता नीलतोयदमध्यस्थाद्विद्युल्लेखेवभास्वरा, नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा। तस्याः शिखायामध्ये परमात्मा व्यवस्थितः, सब्रह्मा, सशिवः, सहरिः, सेन्द्रः सोऽक्षरः परमःस्वराट् (ना० खण्ड १३)

**अर्थ:—**उस हृदय कमल के मध्य में अग्नि की छोटीसी शिखा है। नीलवर्ण के मेघों में चमकने वाली विद्युत् रेखा के सदृश पीले रंग की धान्य के तिनके के अग्रभाग जैसी पतली होती है। उस शिखा के मध्य में परमात्मा रहते हैं, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि, इन्द्र और अक्षर परब्रह्म है। विद्युत् प्रकाश में दिखने वाले श्याम मेघ सदृश रंग हंसेश्वर का और पीत वर्ण हंसेश्वरी का समझना चाहिये। वैष्णव सम्प्रदाय में पीतवर्णा श्रीजी और श्यामवर्ण भगवान का हृदय में ध्यान इसी आधार पर बताया जाता है। १४ श्लोकोक्त ५४ वायव्य किरणें आधी हंसेश्वर की और आधी हंसेश्वरी की हैं।

बृहदारण्यकोपनिषद् में भी इसका वर्णन मिलता है, वह इस प्रकार है:—

मनोमयोयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहि- र्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ (५, ६, १)

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अर्थः— यह मनोमय पुरुष प्रकाशमान सत्य स्वरूप है, वह अन्तर्हृदय में धान अथवा जौ के सदृश चमकता है। वह सब का ईश्वर, सबका अधिपति इस जगत में जो कुछ है सब पर शासन करता है।

छान्दोग्योपनिषद् के अष्टम अध्याय में जो दहर विद्या का वर्णन है वह भी इस संवित् कमल में ही अहं संवित् के ध्यान पूर्वक ज्योति दर्शन द्वारा ब्रह्म प्राप्ति की विद्या है।

स्वाधिष्ठान चक्र

( ३९ )

तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं
तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् ।
यदालोके लोकान् दहति महतिक्रोधकलिते
*दयार्द्राया दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥

*पाठान्तर—दयार्द्राभिर्दृग्भिः

अर्थः— हे जननि ! तेरे स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्त्व को अधिष्ठान (प्रभाव) में रखने के लिये जो संवर्ताग्नि रहता है, उसकी और उस महती समया देवी की मैं स्तुति करता हूं, जिस समय संवर्ताग्नि बडी क्रोध भरी दृष्टि से लोकों को जलाने लगता है, उस समय समया देवी की दयार्द्र दृष्टि शीतल उपचार करती है।

२०८ सौंदर्य लहरी


स्वाधिष्ठान=स्व+अधि+स्थान, कुण्डलिनी शक्ति का जागने के पश्चात् सुषुम्ना के भीतर रहने का अपना स्थान।

संवर्ताग्नि=अच्छी तरह से वर्तमान रहने वाला अग्नि। प्रलयाग्नि को संवर्ताग्नि कहते हैं। यह रुद्र का रूप है।

समया देवी=समयाचार की देवी।

कुण्डलिनी शक्ति के जागने का फल समाधि है। कुण्डलिनी महायोग का एक अंग लययोग भी है और षट् चक्र वेध द्वारा तत्वों का वेध पूर्वक प्रतिप्रसवक्रम भी एक अंग है। प्रतिप्रसवक्रम प्रसव के उलट क्रम को कहते हैं। अर्थात् योगी प्रतिप्रसवक्रम का आश्रय लेकर ही षट् चक्र वेध करता है और पंच महाभूतों पर जय प्राप्त करता है। प्रलय के समय भी संवर्ताग्नि पृथिवी को जल में, जल को तेज में, तेज को वायु में और वायु को आकाश में लीन करता हुआ, सब तत्वों को प्रकृति लीन कर देता है।

सृष्टिक्रम में शक्ति प्रभवाभिमुख होकर फिर विविध रचना करने लगती है, मानो वह देवी दयार्द्रदृष्टि से संवर्ताग्नि को शान्त करके लोकानुग्रह करती है। वास्तव में सृष्टि स्थिति और संहार की त्रिधा शक्ति निरंतर अणु २ में कार्य करती रहती है, परन्तु योगी क षट्चक्र वेध के समय लयक्रम प्रधान रहता है इसलिये कहा गया है कि स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्व का संयम पूर्वक प्रयोग होकर पृथिवी और जल दोनों का वेध मूलाधार में होता है और अग्नि का वेध मणिपूर में होता है। जैसा श्लोक ९ में समझाया जा चुका है। यदि यह लयक्रम तीव्र हो तो शरीर के नष्ट होने की सम्भावना

सौंदर्य लहरी २०९


हो सकती है; परन्तु ऐसा होता नहीं, शरीर ही तो दोनों मोक्ष का और भोग का साधन है। जब तक जीवन मुक्ति की दशा की प्राप्ति नहीं होती, शरीर की रक्षा करना परम कर्तव्य है। इसलिये षट्‌चक्रवेध द्वारा लयक्रम और शरीर का पुनः निर्माण एवं संगठन अथवा जीर्णोद्धार रूपी सृष्टि स्थिति क्रम भी युगपद् चलता रहता है। इसी अभिप्राय से संवर्ताग्नि की संहार क्रिया को संयम में रखने के लिये समयादेवी अपनी दयार्द्र दृष्टि से शीतल उपचार करती रहती हैं।

अनाहत् चक्र के नीचे नाभिस्थान में मणिपूर, और उसके नीचे उपस्थ के पीछे स्वाधिष्ठान, और गुदा के पास मूलाधार की स्थिति है। दोनों के बीच में योनि स्थान है, जो अग्नि की पीठ मानी जाती है। योनिस्थान का संबंध स्वाधिष्ठान से भी है, इसलिये अग्नि को स्वाधिष्ठान चक्र में रहने वाला कहा गया है। श्लोक ९ की पद रचना, इस दृष्टिकोण को सामने रख कर, समझनी चाहिये। यह कहा जा चुका है:—‘महींमूलाधारे कमपि, मणिपूरे हुतवहं स्थितं स्वाधिष्ठाने, इत्यादि भित्वा....। अर्थात् मूलाधार में पृथिवी और जल को भी, और मणिपूर में अग्नि को, जो स्वाधिष्ठान में स्थित है, वेध करके इत्यादि’। उस श्लोक में तत्वों के वेध का स्थान एवं क्रम बताया गया है, और उनकी स्थिति के लिये केवल अग्नि तत्त्व के स्थान का संकेत है, अन्य तत्वों के स्थान का नहीं, क्योंकि अन्य तत्वों के स्थान और उनके वेध के स्थान एक ही हैं। केवल स्वाधिष्ठान चक्र में जल और अग्नि दोनोंका संधि स्थान है। इसलिये वायु के पश्चात् अग्नि का वर्णन करने के लिये पहिले उसकी स्थिति के स्थान स्वाधिष्ठान का और फिर वेध के स्थान मणिपूर का अगले

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श्लोक में वर्णन किया गया है। जल तत्व का मूलाधार में बेध होकर वह मणिपूर रूपी अन्तरिक्ष में मेघों के रूप में प्रकट होता है और मेघों की सहायता से अग्नि का बेध होकर वह विद्युताग्नि में परिणत हो जाती है। जिसका सुन्दर वर्णन अगले श्लोक में है।

स्वाधिष्ठान में संवर्ताग्नि शिव स्वरूप है और समयादेवी जल की शिवात्मिका शक्ति, और मणिपूर में मेघेश्वर पर्जन्य जल की शिवात्मिका शक्ति है और सौदामिनी अग्नि की शक्त्यात्मिका शक्ति। इसलिये स्वाधिष्ठान में संवर्ताग्नि की ३१ और समयादेवी की २६, और मणिपूर में मेघेश्वर की २६ और सौदामिनी की ३१ किरणें माननी चाहिये। परन्तु स्वाधिष्ठान में जल की ५२ किरणों का स्थान है और मणिपूर में अग्नि की ६२ किरणों का, परन्तु दोनों का संक्रमण होने से विपरीतता दृष्टिगोचर होती है।

विभिन्न स्तरों पर शक्ति के विभिन्न रूप

ब्रह्माण्ड और पिण्ड में शक्ति का अनुभव आधि भौतिक, आधि दैविक और आधित्यात्मिक दृष्टि से तीन प्रकार का किया जाता है। सारा विश्व किसी शक्ति के आधार पर कार्य कर रहा है उस शक्ति का हम अनुभव, ताप, शब्द, प्रकाश, चुम्बक, और विद्युत् के रूप में सदा देखते हैं और उनकी सहायता से अनेक कार्य करते हैं। परन्तु विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ये सब रूप किसी एक ही शक्ति के परिणाम है। शक्ति का यह रूप अधि भौतिक ( physical ) कहलाता है। दूसरा रूप हम अपने शरीर में अनुभव करते हैं, जो देह, इन्द्रियों और मन बुद्धि में काम करता है। उसे हम अध्यात्म रूप कहते हैं। परन्तु अध्यात्म शक्तियां

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वाह्य शक्तियों की अपेक्षा रखती हैं, जैसे दृष्टि सूर्य की, रसना जल की इत्यादि। इस संबंध को अधि दैव कहते हैं। इसलिये प्रत्येक इन्द्रिय का पृथक २ अधिदेवता है। उनके नाम ये हैं अहंकार का रुद्र, चित्त का क्षेत्रज्ञ, बुद्धि का ब्रह्मा, मन का चन्द्रमा, श्रवण का आकाश, स्पर्श का वायु, दृष्टि का सूर्य, रसनेन्द्रिय का वरुण, गन्ध का पृथिवी, वाणी का सरस्वती, हाथों का इन्द्र, पैरों का सर्वाधार विष्णु, मैथुन का प्रजापति और मल त्याग का यमराज मृत्यु। अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय में उक्त देवताओं की शक्तियां कार्य करती हैं, जो उनका ब्रह्माण्ड से संबंध जोडती हैं। प्राण का सूर्य, अपान का पृथिवी, समान का आकाश, व्यान का वायु और उदान का अग्नि अधिदेव हैं। पृथिवी की आकर्षण शक्ति (gravitation) को ही अपान शक्ति कहा जाता है, उसका संबंध विष्णु और मृत्यु दोनों से है, इसलिये उसे मर्त्य लोक भी कहते हैं। कहा है— ‘पृथिवि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।’ ऊपर उठाने वाली शक्ति उसकी प्रति पक्षी शक्ति उदान है, उसका संबंध अग्नि से है। अग्नि की ज्वालायं ऊपर उठती हैं, वायु तप्त होकर ऊपर उठता है, इसी तरह मृत्यु के पश्चात् उदान ही जीव को कर्मानुसार अन्य लोकों को ले जाता है।

जिस प्रकार वाह्य शक्तियों का एक आधार शेष नाग माना जाता है, उसी प्रकार अभ्यन्तर शक्तियों का आधार कुण्डलिनी शक्ति मानी जाती है। परन्तु सब शक्तियों का, जिनमें शेष नाग और कुण्डलिनी रूपी आधार भी सम्मिलित है, उदय और अस्त पद परमात्मा ही है। इसलिये परमात्मा की अपेक्षा से सब शक्तियों के

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रूप अनित्य हैं, परन्तु आधार आधेय की अपेक्षा से आधार को अचल कहते हैं। इसलिये कुण्डलिनी का प्रसुप्त रूप भी अचल समझना चाहिये। कुछ लोगों की धारणा है कि कुण्डलिनी जागकर सब सुषुम्ना में प्रवेश कर जाती है। परन्तु यह धारणा गलत है, वह अपने आधार स्थान पर स्थिर स्थिति में नित्य रहकर भी सुषुम्ना में शक्ति का संचार करती रहती है। और सुषुम्ना में भी स्वाधिष्ठान चक्र पर जागृत अवस्था में नित्य रहती है, जैसे के चक्र के नाम से स्पष्ट है, परन्तु इस चक्र पर उसका रूप पिण्डात्मक होता है। कहा है

पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः ।
रूपं बिन्दुरितिख्यातं रूपातीतस्तु चिन्मयः ॥

अर्थ:- कुण्डलिनी, हंस, बिन्दु, और चिति शक्ति सब एक ही शक्ति के रूप हैं। पिण्ड रूपा कुण्डलिनी, त्राण पद* स्वरूपा हंस, रूपात्मिका बिन्दु और रूपातीता चिति शक्ति है।

प्रसुप्त कुण्डलिनी का स्थान आधार चक्र के नीचे, और जाग्रत कुण्डलिनी का स्थान स्वाधिष्ठान में है। हंस रूपा हृदय चक्र में रहती है। बिन्दु के विषय में अन्यत्र लिखा जाना है, और चिति शक्ति का स्थान सहस्रार है। विशुद्ध चक्र में शक्ति का विशुद्ध स्वरूप रहता है। यद्यपि इन केन्द्रों पर जगाने के पश्चात् शक्ति सदा रहती है परन्तु उनके विकास की तारतम्यता में अन्तर होता रहता है।

सौंदर्य लहरी२१३

ग्रंथि त्रय और अध्यास
ऊपर कहा जा चुका है कि ग्रंथियां तीन हैं—ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि और रुद्रग्रंथि। ग्रंथि गांठ को कहते हैं। दो भिन्न वस्तुओं को जोडने या बांधने के लिये गांठ से काम लिया जाता है और प्रायः एक ही वस्तु में विकार आ जाने पर उलझनों की ग्रंथियां पड जाया करती हैं। जैसे केशों अथवा धागों में। अध्यात्म ग्रंथि के स्वरूप का वर्णन श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी ने इन शब्दों में किया है—

जड चेतन की ग्रंथि पड गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥

अर्थात् जड प्रकृति और चेतन आत्मा की गांठ पड गई है, यद्यपि वह झूठी है, तौ भी बडी कठिनता से खोली जा सकती है।

आत्मा शुद्ध चेतन स्वरूप निर्विकारी है और देह इंद्रियों और मनबुद्धि का संघात प्रकृति के विकार हैं, दोनों में गठबंधन होना असंभव है, परन्तु दोनों का भिन्न-भिन्न स्तरों पर ऐसा तादात्म्य दिखता है कि उनके पृथक होने का ज्ञान अति दुर्लभ हो रहा है। जैसे देह के अभिमान से आत्मा अपने को देह के धर्मवाला समझता है। दार्शनिक परिभाषा में इस मिथ्या प्रतीति को अध्यास, विपर्यय ज्ञान अथवा ख्याति कहते हैं।

श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने अध्यास शब्द को इस प्रकार समझाया है। आत्मा अहं अथवा अस्मत् पद है, और प्रकृति युष्मत् पद है। पहिला विषयी है और दूसरा विषय दोनों प्रकाश और तमवत् विरुद्ध स्वभाव वाले हैं परन्तु दोनों एक दूसरे के भाव को

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प्राप्त हो जाते हैं, अर्थात् चिदात्मक आत्मा विषयी में युष्मत् प्रत्यय की प्रतीति गोचर विषय और उसके धर्मों का भाव और इसके विपरीत विषय और विषय के धर्मों में विषयी का और उसके धर्मों का आभास दिखने लगता है। इस इतरेतर अध्यारोपण के मिथ्या ज्ञान को अध्यास कहते हैं। यह स्मृतिरूप होता है और पूर्व दृष्ट अर्थात् पहिले देखे हुए किसी पदार्थ के अन्यत्र अवभास द्वारा उत्पन्न हुआ करता है। पूर्व मिमांसा वाले इसे अख्याति, वैशेषिक और नैयायिक इसे अन्यथा ख्याति, शून्यवादी असत् ख्याति, बौद्ध लोग आत्म-ख्याति, सांख्यवादी सद्सत् ख्याति और वेदान्तवादी उसे अनिर्वचनीय ख्याति कहते हैं। परन्तु इस सिद्धांत में सब एक मत हैं कि यह एक वस्तु का अन्यत्र मिथ्या अवभास मात्र है। उक्त मिथ्या अवभास की निवृत्ति को और आत्म तत्व के शुद्धचेतन ब्रह्म स्वरूप ज्ञान को ज्ञान कहते हैं। आत्मा में देहाध्यास अथवा देह में आत्माध्यास की निवृत्ति स्वरूप ही जडचेतन की ग्रंथि का छुड़ाना है, जिसका सुन्दर निरूपण श्रीगोस्वामीजी ने ज्ञान दीपक में किया है। अध्यात्माध्यास प्रकृति के तीन गुणों के योग से तीन स्तरों पर प्रतीत होता है, सत्वगुण के योग से उत्पन्न हुए अध्यास को विष्णुग्रंथि, रजोगुण के योग से उत्पन्न अध्यास को ब्रह्म ग्रंथि और तमोगुण के योग से उत्पन्न अध्यास को रुद्र ग्रंथि कहते हैं। इसलिये स्थूल देहाध्यास को रुद्रग्रंथि, इंद्रियजनित अध्यास को ब्रह्मग्रंथि और अन्तःकरण के योग से उत्पन्न अध्यास को विष्णुग्रंथि

सौंदर्य लहरी २१५


कहते हैं । ब्रह्मग्रंथि का स्थान मूलाधार में, विष्णुग्रंथि का स्थान हृदय में और रुद्रग्रंथि का स्थान आज्ञाचक्र में समझना चाहिये । ललितासहस्रनाम में ग्रंथित्रय के स्थानों का वर्णन इस प्रकार है:—

मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथि विभेदिनी ।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथि विभेदिनी ॥ ८९
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रंथि विभेदिनी ।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासारामिवर्षिणी ॥ ९०

भूतजय होने पर रुद्रग्रंथि का, इंद्रिय जय होने पर ब्रह्मग्रंथि का और मनोजय होने पर विष्णुग्रंथि का बेध जानना चाहिये । भूतजय होने पर मधुमतीका भूमिका का उदय होता है और इंद्रिय एवं मनोजय होने पर मधुप्रतीका भूमिका का । इनसे पूर्व कुण्डलिनी जागरणोपरान्त रजतमोमिश्रित सत्व गुण की भूमिका का नाम प्रारम्भ कल्पिका और ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होनेपर शुद्धसत्व गुण प्रधान भूमिका का नाम मधुमती भूमिका है । देखें योगदर्शन विभूतिपाद सूत्र (५१) पर व्यास भाष्य और श्लोक १८ पृष्ठ (१३०) ।

विन्दु त्रय<br>पंचाग्नि विद्या<br>और ब्रह्मचर्यसंवर्ताग्नि प्रलयाग्नि को कहते हैं, उसे पाताल स्थित कालाग्नि भी कहते हैं । शंकर भगवत्पाद ने निम्न चक्रों में स्थित अग्नि को जो लयाभिमुख होकर सब तत्वों को अपने २ कारण में लीन करता है, संवर्ताग्नि कहा है । क्योंकि केवल तीन ही अग्नियों का यहां वर्णन है, अर्थात स्वाधिष्ठानस्थ संवर्त अग्नि, मणिपुरस्थ विद्युताग्नि
२१६सौंदर्य लहरी

और हृदय में सूर्य अग्नि। वास्तव में ५ अग्नि जानना चाहिये। इस विषय पर योग शिखोपनिषत् में पांच ही अग्नियों का ध्यान बताया गया है। वह इस प्रकार है:—

स्थूलं सूक्ष्मं परंचेति त्रिविधं ब्रह्मणो वपुः।
स्थूलं शुक्रात्मकं विन्दुः सूक्ष्मं पंचाग्निरूपकम्॥ (५,२८)
सोमात्मकः परः प्रोक्तः सदासाक्षी सदाच्युतः॥

अर्थ:— ब्रह्म का शरीर त्रिविध है — स्थूल, सूक्ष्म और पर। शुक्र (वीर्य) स्थूल रूप है, पञ्चाग्नि सूक्ष्म रूप है और सोम पर रूप है, जो अच्युत सदा साक्षी है। स्थूल विन्दु से पंचाग्नि का संबंध प्रथम ग्रंथि है, पंचाग्नि से पर विन्दु का संबंध दूसरी ग्रंथि है और पर विन्दु से आत्मा का संबंध तीसरी ग्रंथि है। आगे पंचाग्नियों का वर्णन करते हैं:—

पातालानामधो भागे कालाग्नियः प्रतिष्ठितः ॥ (५,२९)
मूलाग्निः शरीरेऽग्निर्यस्मान्नादः प्रजायते।
वडवाग्नि शर्गरस्थो स्वाधिष्ठाने प्रवर्तते ॥ (५,३०)
काष्ठपाषाणयोर्वन्हिर्हास्थिमध्ये प्रवर्तते।
काष्ठपाषाणजो वन्हिः पार्थिवो ग्रहणंगतः ॥ (५,३१)
अन्तरिक्षगतो वन्हिर्वैद्युतः स्वान्तरात्मकः।
नभःस्थः सूर्य रूपोऽग्नि र्नाभिमण्डलमाश्रितः ॥ (५,३२)
विषं वर्षति सूर्योऽसौ स्रवत्यमृतमुन्मुखः।
तालु मूले स्थितश्चन्द्रः सुधां वर्षत्यधोमुखः (५,३३)

सौंदर्य लहरी २१७

भ्रूमध्य निलयो बिन्दुः शुद्ध स्फटिक संनिभः ।
महा विष्णोश्च देवस्य तत्सूक्ष्मं रूपमुच्यते ॥ (५. ३४)
एतत्पंचाग्निरूपं यो भावयेद्बुद्धिमान् धियः ।
तेन भुक्तंच पीतंच हुतमेव न संशयः ॥ (५. ३५)

अर्थ:- पातालों के अधोभाग में जो कालाग्नि रहता है, वह शरीर में मूलाधार का अग्नि है, जिससे नाद उत्पन्न होता है । स्वाधिष्ठान में वडवाग्नि रहता है । काष्ठ पाषाण का जो अग्नि है वह अस्थियों में रहता है, उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं । अन्तरिक्ष में जाकर अर्थात् मणिपूर में वह ही स्वान्तरात्मा स्वरूप विद्युत् अग्नि है । आकाशस्थ अग्नि सूर्य है वह नाभि (सूर्य) मण्डल में आश्रित है । यह सूर्य विष की वर्षा करता रहता है परन्तु उन्मुख होकर अमृत का स्राव करता है । बिन्दु भ्रूमध्य में लीन होकर शुद्ध स्फटिक सदृश हो जाता है, जो महा विष्णु देव का सूक्ष्म रूप कहलाता है । इस प्रकार पंचाग्नि का जो बुद्धिमान ध्यान करता है, उसका खाया-पीया हुआ आहुति के तुल्य है, इसमें सन्देह नहीं ।

छान्दोग्य उपनिषद् के पांचवे अध्याय के खण्ड ३ से नवम खण्ड तक जिस पंचाग्नि विद्या का वर्णन मिलता है, उसीका यहां लय क्रम बताया गया है । छान्दोग्य कथित पंचाग्नि विद्या की गाथा इस प्रकार है । अरुणि के पुत्र श्वेतकेतु से पांचाल देश के राजा प्रवाहण जैबलि ने ५ प्रश्न किये, परन्तु वह एक का भी उत्तर न दे सका, तब उसने अपने पिता से पूछा, परन्तु वह भी नहीं जानता था । इसलिये अरुणि अपने पुत्र को साथ लेकर राजा के

२१८ | सौंदर्य लहरी


पास गया और उससे उन प्रश्नों का उत्तर जानने की जिज्ञासा की । राजा ने कहा यह पंचाग्नि विद्या कहलाती है । वे प्रश्न इस प्रकार हैं:-क्या तुम जानते हो कि सब जीव मरकर यहां से जाते हैं, क्या तुम जानते हो कि फिर यहां लौटकर आते हैं, क्या पितृयान और देवयान दोनों मार्गों को जानते हो, क्या जानते हो कि क्यों यह लोक कभी नहीं भरता, अर्थात् इस आवागमन का चक्र कभी बन्द क्यों नहीं होता, और क्या यह भी जानते हो कि पांचवीं आहुति में जल से यह देह कैसे बनता है ? इन प्रश्नों को पूछने का राजा का अभिप्राय स्पष्ट है कि जो मनुष्य प्रभव क्रम को जानता है, वह ही आवागमन से छूटने के लिये देवयान मार्ग का द्वार खोलते समय, इसका प्रतिकार स्वरूप प्रति प्रसव क्रम भी जानने का यत्न करेगा, नहीं तो आवागमन का चक्र कभी बन्द नहीं होता ।

राजा न जो प्रभव क्रम बताया वह इस प्रकार है:—

(१) द्युलोक प्रथम अग्नि है, जिसमें सूर्य रूपी ईंधन जल रहा है, उसमें देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, और उससे सोम उत्पन्न होता है ।

(२) पर्जन्य दूसरी अग्नि है, उसमें सोम की आहुति दी जाती है और वर्षा उत्पन्न होती है ।

(३) पृथिवी तीसरी अग्नि है, उसमें वर्षा की आहुति दी जाती है और अन्न उत्पन्न होता है ।

(४) मनुष्य का देह चौथी अग्नि है, उसमें अन्न की आहुति दी जाती है और शुक्र उत्पन्न होता है ।

सौंदर्य लहरी २१९


(५) स्त्री का गर्भ पांचवीं अग्नि है, उसमें शुक्र की आहुति दी जाती है और बालक का देह उत्पन्न होता है ।

जो मनुष्य इस क्रम को उलटना चाहते हैं, उनको ब्रह्मचर्यव्रत अर्थात् ऊर्ध्व रेता रहने का व्रत धारण करके तप करना चाहिये । तब देवयान का मार्ग खुलता है ।

बहिर्मुख शुक्र संतानोत्पादक होने से सृष्टिकमाभिमुख रहता है, परन्तु ऊर्ध्व होकर अभ्यन्तर पंचाग्नियों द्वारा उत्तरोत्तर सूक्ष्म होकर भ्रूमध्य में सोमात्मक परबिन्दु के रूप में लौट जाता है । मूलाधार से शक्ति का उत्थान होना प्रथम अभ्यन्तर अग्नि है, जिसके योग से शुक्र की ऊर्ध्वगति होती है, फिर वह स्वाधिष्ठान की अग्नि से सूक्ष्म होकर सब अस्थियों में पृथिवीतत्व का वेध करता है और मांस एवं रुधिर में भी जल का वेध करके मणिपूर चक्र में विद्युत्-रूप अधिक सूक्ष्म होकर सूर्य को उन्मुख करता हुआ चन्द्र मण्डल में पहुंच कर सोम में परिणत हो जाता है । प्रसव क्रम में सोम ही शुक्र के रूप में परिणत हुआ था, प्रतिप्रसव क्रम में वह फिर अपने पूर्व रूप में आ जाता है । श्रद्धा के सकाम होने से सोम प्रसवा-भिमुख होता है और उस ही श्रद्धा के निष्काम होने पर वह अपने कारण हैरण्यगर्भ रूपी समष्टि प्राण में लीन हो जाता है । समष्टि प्राण स्वयं ब्रह्म की किरण ही हैं । कहा है

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खंवायुर्ज्योतिरापः पृथिवी

इत्यादि ! (प्र० ६, ४)

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अर्थः—उसने प्राण की सृष्टि की, प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी इत्यादि। उक्त प्रतिप्रसव क्रम षड्चक्र वेध का विषय है।

इस संबंध में यह बात भी जानने योग्य है कि विशुद्धचक्र की डाकिनी शक्ति का संबंध त्वचा से, अनाहत् की राकिनी शक्ति का रुधिर से, मणिपूर की लाकिनी शक्ति का मांस से, स्वाधिष्ठान की काकिनी शक्ति का मेदा से, मूलाधार की साकिनी शक्ति का अस्थि से, आज्ञा की हाकिनी शक्ति का मज्जा से और सहस्रार की याकिनी शक्ति का संबंध शुक्र से है। देखें ललिता सहस्रनाम श्लोक (१४९—१६१)

पृथिवी के गर्भ रूपी पातालों में जो अग्नि है, वह अग्नि का एक रूप है, दूसरा रूप भूतल पर काष्ठपाषाणादि में है, जल में रहने वाला तीसरा रूप है, विद्युत् अग्नि का चौथा रूप है और सूर्य में अग्नि का पांचवा रूप है। उष्णता, प्रकाश और प्राणशक्ति तीनों का सूर्य के ताप में युगपद समावेश रहता है। चन्द्रमा सूर्य के ताप को स्वयं पी लेता है और शीतल प्रकाश एवं सोम के रूप में प्राणशक्ति को अपनी चंद्रिका के साथ पृथिवी पर भेजा करता है। प्राण ही जीवन शक्ति है, जिसको चेतन शक्ति भी कहते हैं। प्राणमय कोष की प्राण अपानादि ५ वृत्तियां चेतन शक्ति की स्थूल क्रियायें हैं। चिति स्वरूप प्राण ही उपरोक्त श्रुति में ब्रह्म से उत्पन्न होने वाला सोम कहा गया है। अग्नि के उपरोक्त पांचों रूप अधिभौतिक स्तर पर बताये गये हैं, वे परस्पर में संबंधित हैं और एक अग्नि के ही रूपान्तर हैं और उन

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का चन्द्रमा से भी संबंध है। अब आध्यात्म रूप समझाते हैं। जैसे पृथिवी के गर्भ में सात पाताल माने जाते हैं, वैसे ही देह के अधो-भाग में चरणों का तलभाग, ऊपर का भाग, गुल्फ, जंघा, जानु, ऊरु और नितंब सात पाताल समझे जाते हैं इनमें फैली हुई नाड़ियां मणिपूर चक्र से निकलती हैं, इनके द्वारा जो अग्नि इन अंगों को तप्त रखता है वह पातालाग्नि है। उसका स्थान मूलाधार तक है। वह ही अग्नि ऊपर के भाग में हड्डियों में व्याप्त है उसे पार्थिव अग्नि कहा गया है। आस्थि, मज्जा और शुक्र में भी यह ही पार्थिव अग्नि कार्य करता है। शुक्र में भी दो शक्तियां कार्य करती हैं, मज्जा से बनने के कारण उसमें एक प्रजनन शक्ति वाला भाग है, दूसरा प्राण शक्ति वाला भाग। प्रजनन के लिये प्राण शक्ति आवश्यक नहीं होती, इसलिये प्रश्नो पनिषद् में कहा है कि रात्रि में रतिक्रिया के रमण करने वालों की प्राण शक्ति का ह्रास नही होता, और वह ब्रह्मचारी के ही तुल्य हैं, परन्तु दिन में रमण करने वालों के प्राण भी नष्ट होते हैं, इसलिये दिन को रतिक्रिया का निषेध है।

प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्यासंयुज्यन्ते,
ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्यासंयुज्यन्ते ।

(प्र० १, १३)

प्रजनन द्रव्य में सातों धातुओं का बीज है, वह भाग ऊर्ध्व होकर अन्नमय कोष को पुष्ट करेगा, और दूसरा प्राण वाला भाग प्राणमय को पुष्ट करेगा । और इस स्तर पर दोनों का पृथकरण होने से अन्नमय कोष से प्राणमय कोष का पृथकरण

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होगा। शुक्र में दोनों कोषों की बीजरूप से ग्रंथि रहती है, उसके टूटने से दोनों कोषों की गांठ खुल जायगी। इसलिये कामवासना की वृद्धि से यह ग्रंथि दृढ होती है और ब्रह्मचर्य अर्थात् उर्द्धवरेता होने से यह ग्रंथि शिथिल होती है। प्रजनन शक्ति वाले द्रव्य से प्राण शक्ति का पृथक्करण होने पर वह विद्युत्ताग्नि, सूर्याग्नि-क्रम से सोम में परिणत हो जायगी। प्राण का सोम से पृथक्कर दूसरी ग्रंथि का और सोम का आत्मत्व में लयकरण तीसरी ग्रंथि का बेध है।

दूसरा प्रजनन शक्तियुक्त द्रव्य जो रुधिर के और अण्डकोषों के रस के योग से बनता है वह भी प्राण शक्तियुक्त होता है, परन्तु वहां दोनों का वीर्य में एकीकरण रहता है। स्वाधिष्ठान में जल और अग्नि का संधि स्थान है, इसलिये जलस्थ अग्नि को बडवाग्नि नाम दिया गया है। समुद्र में रहने वाले अग्नि को वडवानल कहते हैं। मणिपूर में सौदामिनी स्वरूपा विद्युत् अग्नि है, जिसको अन्न को पचाने वाला वैश्वानर अग्नि भी कहते हैं, उसको समान वायु भी कहते हैं और उसे ही स्वान्तरात्मा कहा गया है।

जब कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है, तब उसे मूलाग्नि का प्रज्वलन समझना चाहिये। जिसकी क्रिया नीचे पैरों में और ऊपर हड्डियों में होती है, और साथ ही जल में भी। अर्थात् मांस, रुधिर मेदा, स्नायु, अस्थि, मज्जा, शुक्र सातों धातुएं संतप्त हो जाती हैं। इनके क्षुब्ध अथवा मथन होने से शुक्र (वीर्य) की आहुति मूलाधार में पडती है। वह बहिर्मुख होकर जब स्त्री के गर्भाशय में पोषण पाता है तो एक नये शरीर की रचना करता है, परन्तु जब अन्तर्मुखी होकर उसकी मूलाग्नि में आहुति दी जाती है