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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योञ्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ? अनेनैव

१३६ स्पन्दकारिका स्वयं नष्ट हो जाती हैं । यही कारण है कि योगियों के शरीर १वलीपलितादि से रहित, तेजस्वी और स्वस्थ हुआ करते हैं :— ग्लानिर्विलुम्पिका देहे तस्याश्चाज्ञानतः सृतिः । तदुन्मेषविलुप्तं चेत् कुतः सा स्यादहेतुका ॥४०॥ ग्लानिः किल शरीरस्य विनाशिनी । सा च ग्लानिरज्ञानादुत्पद्यते । तदज्ञानम् उन्मेषेणात्मस्वभावेन यदि नित्योञ्झितं तदा सा कुतः, कारणरहिता भवेत् ? अनेनैव कारणेन वलीपलिताभावः शरीरदार्ढ्यं च योगिनाम् ॥४०॥ एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥४१॥ एकत्र विषये व्यापृतचित्तस्य यतो यस्मात् स्वभावात् झगित्‍यन्या चिन्तोत्पद्यते, स चिन्तायाः कारणम् उन्मेषो ज्ञातव्यः । स तु स्वयमेव योगिना लक्षणीयः, चिन्ता- द्वयान्तर्व्यापकतयानुभूयमानः ॥४१॥ अनुवाद सूत्र—मानसिक उदासीनता, शरीर में ( धातु, सामर्थ्य, उत्साह, तेज इत्यादि ) सब कुछ चौपट कर देने वाली होती है वह स्वयं अज्ञान से ही प्रसार में आती है । यदि उन्मेष के द्वारा अज्ञान का समूल उच्छेद किया जाये तो वह, कारण के न रहने पर, कहां से उत्पन्न हो सकती है ? ॥ ४० ॥ वृत्ति—ग्लानि अर्थात् मानसिक शिथिलता या उदासीनता निश्चयपूर्वक शरीर अर्थात् शरीर के धातु, बल, तेज इत्यादि का नाश करने वाली होती है । वह स्वयं केवल अज्ञान से ही उत्पन्न हो जाती है । यदि उन्मेष अर्थात् चित्-चमत्कारमय स्वरूप विकास के उपाय से उस अज्ञान का सदा के लिये उच्छेद किया जाये तो वह कहाँ से पैदा हो सकती है ? क्योंकि उसके पैदा होने का कोई कारण ही नहीं रहता है । यही कारण है कि योगियों के शरीर दृढ़ होते हैं । उनमें न कभी झुर्रियां ही पड़ पाती हैं और न कभी उनके बाल ही पक पाते हैं ॥ ४० ॥ सूत्र—किसी व्यक्ति का चित्त कभी किसी एक प्रकार की चिन्ता में डूबा हुआ होता है और तत्काल ही उसमें जिस अलक्षित आत्मबल से सहसा दूसरी चिन्ता उभर आती है उसको (आत्म-बल के आकस्मिक विकास को) उन्मेष समझना चाहिये । उस तत्त्व की, निजी अनुसन्धान के द्वारा, स्वयं टोह लगानी चाहिये ॥४१॥ वृत्ति—यदि किसी चिन्तक का चित्त किसी एक विषय के साथ सम्बन्ध रखने वाली चिन्ता में एकाग्रभाव से डूबा हुआ हो, तो उसमें जिस स्वभाव के द्वारा सहसा कोई दूसरी चिन्ता उभर आती है, उस दूसरी चिन्ता के उत्पन्न होने का कारण उन्मेष समझना चाहिये । १. बुढ़ापा या अन्य कारणों से मुख में झुर्रियां पड़ना और बालों का सफेद हो जाना ॥

उन्मेष का उदय हो जाता है ॥”

म्लानता और उसका निवारण १३७ योगी को अपने अनुसंधान से स्वयं उसकी टोह लगानी चाहिये । वह तत्त्व दोनों चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती सन्धिक्षण में (सावधान योगियों को), व्यापक रूप में अनुभव में आता रहता है ॥४१॥ विवरण प्रस्तुत सूत्रों का भाव समझने में कोई विशेष कठिनता नहीं आती है । केवल उन्मेष के सम्बन्ध में निम्नलिखित बात ध्यान में रखने के योग्य है । सूत्र ४१ में उल्लिखित 'एक-चिन्ता-प्रसक्तस्य' शब्द की व्याख्या करने में टीकाकारों का दृष्टिकोण भिन्न भिन्न रहा है । कई टीकाकारों के विचारानुसार इसका अर्थ यह है कि “१जब योगी दैनिक जीवन के सारे आवश्यक कृत्यों को तिलाञ्जलि देकर और अलग-अलग किसी एक आलम्बन विशेष को अपनी धारणा का विषय बनाकर, अनुसन्धान करते करते मानसिक एकाग्रता की चरम सीमा पर पहुँच जाता है तब उसमें स्वयं ही चित्-चमत्कारमय उन्मेष का उदय हो जाता है ॥” ऐसी व्याख्या के अनुसार उन्मेष-तत्त्व की अनुभूति का पूर्ण स्वाधिकार केवल जंगल में जाकर आसन जमाने वाले और संसार के प्रति सर्वथा निरपेक्ष व्यक्तियों के लिये ही आरक्षित बन जाता है । ऐसी परिस्थिति में आज के भौतिकयुगीन आघातप्रतिघातों में फँसे हुये व्यक्ति के लिये इसके प्रति कोई भी आकर्षण अवशिष्ट नहीं रहने पाता है । इस सम्बन्ध में यह बात अतीव विचारणीय है कि शैवदर्शन कभी भी पलायनवादी वृत्ति में विश्वास नहीं रखता है । संसार और उसके आघात-प्रतिघात दोनों के प्रति निरपेक्ष कैसे रहा जा सकता है क्योंकि दोनों शिवत्व का ही विकास हैं, अतः सत्य हैं । सत्य को नकारा कैसे जा सकता है ? उन्मेषतत्त्व की उपलब्धि संसार को अलग रखकर नहीं, प्रत्युत उसके कण कण में इसकी व्याप- कता को अनुभव करने से ही हो सकती है । हाँ उसके लिये महान् साहस और तीव्र आन्तर अनुसन्धान की आवश्यकता है । शायद भट्टकल्लट ने इसी विचार की पृष्ठभूमि पर उपरिनिर्दिष्ट शब्द की सीधी व्याख्या करके यह तथ्य समझाया है कि प्रतिक्षण मन में उदित और अस्त होने वाली असंख्य चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती संधिक्षणों में नित्योदित उन्मेषतत्त्व की व्यापकता अनुभव में आ सकती है । उसके लिये उत्सुक व्यक्ति को संसार छोड़कर जंगल में जाने की नहीं, अपितु संसार का सारा कार्यकलाप करते हुये भी आन्तर विमर्श के द्वारा उस तत्त्व के साथ नित्ययुक्त रहने की आवश्यकता है ॥४०-४१॥ यहाँ तक योगियों में अभिव्यक्त होने वाली अमित सिद्धियों का वर्णन किया गया । अब अगले सूत्र में अवरकोटि की अपरसिद्धियों का संकेतरूप में उल्लेख करके यह समझाया जा रहा है कि इस प्रकार की सिद्धियाँ असावधान योगियों को क्षोभ में डालकर वास्तविक लक्ष्य से च्युत कर देती हैं— १. द्रष्टव्य—स्प० नि०, ३. ८ की व्याख्या । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र—उन्मेष का अनुशीलन करने से, थोड़े ही समय में, बिन्दु, नाद, रूप और रस

१३८ स्पन्दकारिका अतो बिन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः। प्रवर्तन्तेऽचिरेणैव क्षोभकत्वेन देहिनः ॥४२॥ अतः अस्माद् उन्मेषाद् अनुशीलयमानात् 'बिन्दुः' तेजोरूपः, 'नादः' प्रणवाख्यः शब्दः, 'रूपम्' अन्धकारे दर्शनम्, रसः अमृतास्वादो मुखे, एते क्षोभकत्वेन प्रवर्तन्ते अचिरेण कालेन ॥४२॥ अनुवाद सूत्र—उन्मेष का अनुशीलन करने से, थोड़े ही समय में, बिन्दु, नाद, रूप और रस नामवाली अमित सिद्धियां अभिव्यक्त हो जाती हैं, परन्तु जिस योगी का देहाभिमान पूर्णतया गला हुआ न हो, उसको ये क्षोभ में डाल देती हैं ॥४२॥ वृत्ति—लगातार अनुशीलन किये जाने वाले उन्मेष के द्वारा, योगी में अति अल्प समय में ही, बिन्दु अर्थात् एक प्रकार का विशेष तेज, नाद अर्थात् प्रणव नामवाला अनाहत शब्द, रूप अर्थात् प्रगाढ़ अन्धकार में भी पदार्थों को देख सकने की शक्ति और रस अर्थात् मुख में अमृत का जैसा आस्वाद, इस प्रकार की सिद्धियां अभिव्यक्त हो जाती हैं परन्तु (देहाभिमान में ही अवस्थित योगियों को) ये क्षोभ में डाल देती हैं ॥४२॥ विवरण सूत्र में चार प्रकार की अपरसिद्धियों के पारिभाषिक नामों का उल्लेख किया गया है। स्पन्दशास्त्र के आचार्यों ने इनका स्वरूप वर्णन इस प्रकार किया है— १. बिन्दु—१पृथिवीतत्त्व की धारणा देनेवाले योगियों को, एकाग्र ध्यान करने की प्रखरता से भ्रूमध्य-स्थान पर एक प्रकार का विशेष और उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ तेज प्रकट हो जाता है। इसको बिन्दु कहते हैं। इस धारणा का पारिभाषिक नाम 'बिन्दुभेद' है। २. नाद—२आकाशतत्त्व की धारणा का अभ्यास करने वाले योगी एक विशिष्ट प्रकार के स्वयं उच्चरित ध्वनि को सुनते हैं। यह ध्वनि पहले, प्रखर वेग में बहने वाली नदी की घरघराहट के समान सुनाई देती है और अनन्तर धीरे-धीरे सूक्ष्म होती हुई, मकरन्द पीने से मस्त बने हुये भौंरे की गुनगुनाहट जैसी प्रतीत होती है। ३. रूप—३तेजस्-तत्त्व की धारणा का अभ्यास करने वाले योगियों को प्रगाढ़ अन्धकार में भी द्रष्टव्य वस्तु स्पष्टतर रूप में दिखाई देती है। १. 'बिन्दुः'—भ्रूमध्यादौ प्रदेशे ध्यानाभ्यासप्रकर्षप्रवर्धमानोत्तरोत्तरप्रसादस्तेजोविशेषो, यो बिन्दुभेदाभ्यासाद् धरातत्त्वध्यायिनामभिव्यज्यते। (स्प० का० वि०, ४. १२) २. 'नादो'—वेगवन्नद्योधनिर्घोषघनोपक्रमः क्रमसूक्ष्मीभावाभिव्यज्यमानमधुमत्तमधुकर- ध्वनितानुकारी स्वोच्चरितो ध्वनिविशेषो, यं व्योमतत्त्वाभ्यासिनः शृण्वन्ति। (स्प० का० वि०, ४. १२) ३. 'रूपं'—सन्तमसाद्यावरणेऽपि सति तत्तद् दृश्यवस्वाकारदर्शनं, यत् तेजस्तत्त्वन्यक्षनिक्षिप्त- मतयो निरीक्षन्ते। (तत्रैव)

लब्धि और उसका निग्रह १३९ ४. रस—जल १तत्त्व की धारणा देने वाले योगी, अपने जिह्वाग्र या उसके निकटवर्ती लंबिका (गले के अन्दर की घंटी) पर धारणा का अभ्यास करके हैं । धारणा की सिद्धि हो जाने पर उनको कोई स्वादिष्ट पदार्थ खाने के बिना ही मुख में अमृत के जैसे आस्वाद की अनुभूति होती रहती है । इसके अतिरिक्त योगियों में दिव्य २स्पर्श और गन्ध की अभिव्यक्ति भी हो जाती है परन्तु उनके विषय में पूरी जानकारी प्राप्त करते के लिए तन्त्रालोक में वर्णित भगवान् अभिनवगुप्त का दृष्टिकोण समझना आवश्यक है । प्रस्तुत सूत्र में इन दो सिद्धियों का उल्लेख नहीं किया गया है । अतः यहां पर इस विषय को छेड़ना प्रसङ्गानुकूल नहीं है । यद्यपि मालिनीविजय एवं विज्ञानभैरव जैसे रहस्यशास्त्रों में भिन्न-भिन्न धारणाओं का अभ्यास करने वाले योगियों में अभिव्यक्त होने वाली शतशः सिद्धियों के वर्णन मिलते हैं तथापि प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने केवल चार ही सिद्धियों का मात्र नाम-निर्देश किया है । शायद उसको ऐसा करने का विशेष अभिप्राय यह रहा होगा कि अवर-सिद्धियों के अतिरंजित वर्णन से कहीं शिष्यों के मन प्रलोभन में न पड़ जायें । स्पन्द-गुरुओं के विचारानुसार स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका की अनुभूति प्राप्त करना ही सारी साधनाओं का मात्र लक्ष्य होना चाहिये । इससे इतर अन्य सारी तथाकथित ३योगसिद्धियाँ मायीय उपरागों से रंजित होने के कारण अवरकोटि की और सर्वथा हेय हैं । इनका स्वरूप सर्वसाधारण मनुष्यों में पाई जाने वाली अल्पज्ञतारूप अशुद्ध विद्या से तनिक भी बढ़कर नहीं है । ये तो थोड़े समय तक ही अभ्यास करने से प्रकट हो जाती हैं परन्तु अपरिपक्व योगी कभी इनके भ्रमजाल में पड़कर घमंड में इतराता हुआ मदारी जैसा बन जाता है । लोग उनके मदारी-खेलों को बड़ी योग- सिद्धियाँ समझकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए, अपने को चेला या चेलिन मुँडवाने के लिये हमेशा उसके पीछे पड़े रहते हैं । परन्तु अनुभवी सिद्धों ने डंके की चोट कहा है कि ४मित- सिद्धियों की सौदाबाजी, योगी को स्वरूप-समाधि से बहुत दूर भटका कर अन्धगर्त में गिरा देती है । इस विषय में भगवान् आशुतोष का आदेश यह है कि मितसिद्धियां विनायक५ अर्थात् १. 'रसो'—रसवद्वस्तुविरहेऽपि अमृतास्वादो मुखे लोलाग्रलम्बिकादिधारणानिरतैर् अप्त्तव- ध्यायिभिर्य उपलभ्यते । (तत्रैव) २. 'स्पर्श'—के विषय में विशेषरूप से द्रष्टव्य तन्त्रालोक का ग्यारहवां आह्निक । ३. गर्भः अख्यातिर्महामाया तत्र तदात्मके मितसिद्धिप्रपञ्चे यश्चित्तस्य विकासः तावन्मात्रे प्रपञ्चे संतोषः, असावेव·············'किञ्चिज्ज्ञत्वरूपा अशुद्धविद्या'·············'विकल्पात्मा भ्रमः । (शिवसूत्रवि०, २.४ ४. ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः । (पा० यो० द०, ३. ३७) ५. वासनामात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।। तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया । (मा० वि०, शिवसूत्र २.१० में उदाहृत)

१४० स्पन्दकारिका दिव्य योगभूमिकाओं की अध्यक्षा दिव्यशक्तियाँ होती हैं। ये गम्भीर साधना में निरत योगियों को पथभ्रष्ट करने के लिये प्रतिक्षण उद्यत रहती हैं। भगवान् पतञ्जलि का मत भी बिल्कुल यही है। उनका कथन है कि ये दिव्यशक्तियां ऋतम्भरा प्रज्ञा से युक्त योगी की सत्त्वशुद्धि को देखकर उसको शतशः सांसारिक सुखभोगों के प्रलोभनों में फँसाने का प्रयत्न करने लगती हैं। वे उसको बार-बार प्रेरणा देती रहती हैं :— “हे आयुष्मन्, आपने अपने सद्गुणों से अमुक दिव्य भोगों का अर्जन किया है। ये सुन्दरता और सौरभ-संभार को बिखेरने वाली सुरबालायें आपके दर्शन को तरस रही हैं। आपके अंग दिव्य आभा से झलक रहे हैं। ये जरा और जीर्णता को दूर रखने वाले अमृत- रसायन आपके सामने प्रस्तुत हैं। कृपया इनको स्वीकार कीजिये। १अष्ट-सिद्धियां, नव-२ निधियां, कल्पवृक्ष, मन्दाकिनी, नंदनवन, दिव्ययान इत्यादि दिव्यरत्नों के संभार आपके कृपा कटाक्ष की प्रतीक्षा कर रहे है, इत्यादि।” साधक कहीं असावधान बनकर एक बार इन प्रलोभनों की मृगमरीचिका में भटक गया कि उसकी आत्मा का ३घात हो गया। अतः सिद्ध गुरुओं ने स्वरूप-लाभ को प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को सचेत करने के अभिप्राय से बार बार इस उपदेश को दोहराया है कि जिस महान् धैर्यशाली व्यक्ति के स्थिर मन में अपने ४ज्ञेयविषय अर्थात् स्पन्दात्मक-स्वभाव को छोड़कर किसी दूसरे कनक-कामिनी जैसे अस्थायी प्रलोभन का विचार टिकने नहीं पाता है, वह चाहे किसी भी अवस्था में ही क्यों न पड़ा हो, अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता है ॥४२॥ [ प्रथमाभास ] अगले सूत्र में स्पष्ट शब्दों में यह उद्घोषणा की जा रही है कि जो योगी स्वयं सामने आती हुई मितसिद्धियों के प्रलोभनों को ठुकरा कर केवल विश्वात्मभाव को प्राप्त करने के लिये तत्पर रहते हों, उनके लिये महान् रहस्य के अवरुद्ध कपाट स्वयं ही खुल जाते हैं:— दिदृक्षयेव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते५ ॥४३॥ १. आठ सिद्धियां—अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व । २. नव निधियां—पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, खर्व । ३. प्रसह्य चञ्चलीत्येव योगिनामपि यन्मनः । (स्व० तं०, ४.३११) ४. यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ (तत्रैव, ४.३१२) ५. लुट् लकार का प्रथम भविष्यत् काल को द्योतित करता है।

सूत्र—जब योगी प्रत्येक भाव में केवल और केवल स्पन्दात्मक स्वरूप को निभालने का

प्रथमाभास १४१ दिदृक्षा द्रष्टुमिच्छा, तदवस्थास्थ इव सर्वान् भावान् यदा व्याप्यावतिष्ठते, तदा किं बहुना उक्तेन, स्वयमेव तत्त्वस्वभावम् अवभोत्स्यते ज्ञास्यति ॥४३॥ अनुवाद सूत्र—जब योगी प्रत्येक भाव में केवल और केवल स्पन्दात्मक स्वरूप को निभालने का अटल संकल्प धारण करके, उनमें स्वरूपतः व्याप्त होकर अवस्थित रहता है तब वह स्वयं ही उस तत्त्व का साक्षात्कार करने में अवश्य सफल हो जाता है। इसमें बात-बढ़ाव करना बेकार है ॥४३॥ वृत्ति—देखने की तीव्र इच्छा को ‘दिदृक्षा’ कहते हैं। दिदृक्षा की अवस्था में वर्तमान होकर, जब योगी सारे भावों में स्वरूपतः व्याप्त होकर अवस्थित रहता है तब स्वयं ही उस स्वभावभूत स्पन्द तत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर लेता है इसमें अधिक बतियाने का कोई प्रयोजन नहीं है ॥४३॥ विवरण १किसी भी भाव का साक्षात्कार करने के समय दो प्रकार के आभास कार्यनिरत होते हैं। एक वह जो कि इन्द्रिय और भाव का संयोग होने के प्राथमिक क्षण का ‘विकल्पहीन आभास’ होता है और दूसरा वह जो कि दूसरे क्षण पर उसी भाव के साथ सम्बन्धित विशेष- ताओं को स्पष्टरूप में परिलक्षित कराने वाला ‘सविकल्प-आभास’ होता है। इनमें से पहला आभास इतना स्वरूप संकुचित होता है कि इसकी बिजली की जैसी तीव्रतम कौंध में, उस भाव में सामान्यरूप में परिनिष्ठित स्वरूपसत्ता के अतिरिक्त कोई भी अन्य जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छात्मक विशेषता परिलक्षित नहीं होती है। इस आभास को शास्त्रीय शब्दों में ‘प्रथमाभास’, ‘स्वरूपाभास’, ‘निर्विकल्पाभास’ अथवा ‘स्वलक्षणाभास’ इत्यादि कहते हैं। दूसरा आभास अनेक आभासों के मिश्रण के रूप वाला और स्थूल अभिलाप के द्वारा वाच्य होता है। उदा- हरणार्थ प्रथमाभास पर ‘घट’ नामक भाव का साक्षात्कार, ‘घट’ इस शब्द के द्वारा वाच्य और गोलाई, ललाई इत्यादि अनेक विकल्पों से युक्त घट के रूप में नहीं, अपितु सामान्य- प्रकाशात्मकता के रूप में होता है। दूसरे क्षण पर अर्थात् प्रथमाभास के ठीक अनन्तरवर्ती सविकल्पाभास पर ही इन सारे आभासों की मिश्रणा से, उसका साक्षात्कार, विशिष्ट नाम- रूपात्मक ‘घट’ के रूप में होता है। ऐसी ही संवेदनात्मक आभास प्रक्रिया के द्वारा घटाभास, पटाभास, सुखाभास, दुःखाभास इत्यादि अनन्त प्रकार के विकल्परूप (इसीलिये भेदपूर्ण) आभासों के वैचित्र्य की सर्जना हो जाती है; इन्हीं को प्रमेय जगत् कहते हैं। संक्षेप में इस प्रकार कहना ठीक है कि प्रथमाभास की भूमिका पर सारे भाव सामान्य स्पन्दरूप अथवा चित्-रूप ही हैं। अतः उनकी संवेदना भी विशुद्ध अहं-रूप है। सविकल्प आभास की भूमिका पर सारे भाव एक दूसरे से स्वरूपतः, देशतः, कालतः और आकारतः भिन्न होने के कारण विकल्परूप हैं। अतः उनका संवेदन भी ‘इदं-रूप’ है। १. यहाँ पर शैव दर्शन की प्रसिद्ध आभास प्रक्रिया का संकेतमात्र दिया जा रहा है। विशेष जानकारी के लिये ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञा’ का ज्ञानाधिकार द्रष्टव्य है।

१४२ स्पन्दकारिका संसार की प्रत्येक अर्थक्रिया सविकल्प-आभास पर ही चल सकती है क्योंकि इसके लिये भावों में भिन्नता का होना आवश्यक है। प्रस्तुत प्रकरण के साथ सम्बन्धित मितसिद्धियों का प्रदर्शन भी बाह्य-अर्थक्रिया होने के कारण सविकल्पक-आभास ही है अतः यह संसारभाव ही है, शिभाव नहीं। प्रथमाभास पर यद्यपि संसार के अणु-अणु में भी स्वरूप की अभिव्यक्ति प्रति समय होती रहती है तथापि वह साधारण इन्द्रियबोध के द्वारा गम्य नहीं है। योगियों में अदृश्य प्रेरणा से अतीन्द्रियबोध अथवा प्रातिभ-ज्ञान विकसित हुआ होता है। अतः वे भावों के प्रथमा- भास पर ही स्वरूप का साक्षात्कार करने में सक्षम होते हैं। फलतः वे प्रतिसमय प्रथमाभास पर ही अवस्थित रहने के कारण स्वरूप की चतुर्दिक् व्यापकता का अनुभव करते रहते हैं। प्रथमाभास पर अवस्थित रहकर प्रत्येक भाव में व्याप्त स्वरूप का साक्षात्कार करने की तीव्र इच्छा को ही सूत्र में 'दिदृक्षा' का नाम दिया गया है। यही वह पूर्वोक्त संकल्प-शक्ति है जो साधक को स्वयं ही शाक्त-भूमिका पर पहुँचा देती है। इस सम्बन्ध में कई मित्रों को यह आपत्ति है कि यदि योगी सदा निर्विकल्प आभास पर ही अवस्थित रहते हैं तो वे संसार का आदान-प्रदान किस प्रकार कर सकते हैं ? संसार में दिखाई देनेवाले भाववैचित्र्य की अनुभूति उनमें रहती ही नहीं होगी। अतः वे संवेदनाहीन ठूंठ जैसे पड़े रहते होंगे। इस शंका का समाधान पाने के लिये यह समझना आवश्यक है कि प्रथमाभास पर अवस्थित रहने का कदापि यह अर्थ नहीं कि योगियों को व्यक्त नामरूपात्मक जगत् का भाव- वैचित्र्य दिखता ही नहीं है। वे अपने प्रातिभ-ज्ञान के द्वारा बाह्य प्रकृति के भाववैचित्र्य का इतना सूक्ष्म और गम्भीर पर्यवेक्षण कर सकते हैं जितना कि साधारण रूप में कुशाग्रबुद्धि समझा जानेवाला पुरुष भी नहीं कर सकता है। बात केवल इतनी है कि वे लोग भाववैचित्र्य के जिस जिस पक्ष का साक्षात्कार करते हैं वह उन्हें आत्मरूप का विकासमात्र ही प्रतीत होता है। फलतः वे किसी भी अवस्था में अखण्ड स्वरूपभावना से गिरकर भेदभावना के पचड़े का शिकार नहीं बन पाते हैं। प्रथमाभास पर अवस्थित रहने का यही अभिप्राय है ॥४३॥ [ अनुभूति का उपाय ] अगले सूत्र में प्रबुद्ध योगियों को प्रत्येक भाव में स्वरूप की व्यापकता की अनुभूति प्राप्त कर सकने का उपाय समझाया जा रहा है :- प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोच्य गोचरम् । एकत्रारोपयेत् सर्वं ततोऽन्येन न पीड्यते ॥४४॥ प्रबुद्धोऽसंकुचितशक्तिः सर्वकालं तिष्ठेत्, ज्ञानेनालोच्य गोचरम्-ज्ञेयं परिच्छिद्य । एवमेकत्र तत्त्वसद्भावे विद्यात्मके आरोपयेत् सर्वम् । ततोऽन्येन वक्ष्यमाणेन कलासमूहेन नपीड्यते ॥४४॥

अनुभात का उपाय · १४३ अनुवाद सूत्र—(योगी को) प्रत्येक अनुभवदशा में अपने संवेदन के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय-विषय का विश्लेषण करते-करते (उसमें अनुस्यूत) स्पन्दतत्त्व का निभालन करते रहना चाहिये । इस विधि से सारे प्रमेयवर्ग को एक ही तत्त्व में लय करना चाहिये । ऐसा करने से दूसरे के द्वारा पीड़ा नहीं पहुँचाई जा सकती है ॥४४॥ वृत्ति—(योगी) विशुद्ध संवेदन के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय विषय का विश्लेषण करके, १प्रतिसमय प्रबुद्ध अर्थात् स्वरूपविकास की अवस्था में अवस्थित रहे। इस प्रकार (भावना के बल से) प्रत्येक विषय को एक ही तत्त्व के सद्भाव पर अर्थात् शुद्ध-विद्यात्मक स्पन्दसत्ता पर चढ़ाये अर्थात् दोनों को अभिन्न बनाये। ऐसा करने से उसको दूसरे अर्थात् आगे कहे जानेवाले कलासमूह के द्वारा पीड़ा नहीं पहुँचाई जा सकती है ॥४४॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में 'प्रबुद्धः' और 'सर्वदा' इन दो शब्दों की पृष्ठभूमि में विशेष अभिप्राय है । उनको समझना अतीव आवश्यक है, क्योंकि तभी सूत्र का अर्थ अच्छी प्रकार हृदयङ्गम हो सकता है । 'प्रबुद्धः' शब्द से यहाँ पर ऐसे सावधान और जागरूक योगी का अभिप्राय है जिसकी दिव्यदृष्टि किसी भी ज्ञेय विषय का साक्षात्कार करने के समय, उसके वास्तविक स्वरूपभूत स्पन्दतत्त्व को पहचानने में २पटु हो । साथ ही वह ऐसा प्रमाता हो जिसको अपने स्वातन्त्र्य की असीमता का अनुभव ३हुआ हो । 'सर्वदा' शब्द से किसी भी ज्ञेयविषय की साक्षात्कारकालीन तीन कोटियों का अभि- प्राय है : किसी भी ज्ञेयविषय के साक्षात्कार को तीन कोटियां होती हैं जिनको पारिभाषिक शब्दों में आदिकोटि, मध्यकोटि और अन्तकोटि कहते हैं । इनको दूसरे शब्दों में 'बाह्य इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये जाने से पहले का तद्विषयक इच्छाकाल', 'इन्द्रियों के द्वारा बाह्य स्थूल रूप में ग्रहण काल' और ग्रहण किये जाने के उपरान्त फिर भी संवेदन में 'विश्रान्तिकाल' कहते हैं। आदिकोटि और अन्तकोटि पर प्रत्येक ज्ञेयविषय अहंविमर्शात्मक प्रमातृभाव के साथ तादात्म्यरूप में अवस्थित रहता है । मध्यकोटि अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के द्वारा स्थूलरूप में ग्रहण किये जाने के समय पर ही वह, मायाशक्ति रूप स्वातन्त्र्य के द्वारा, अहंरूपता से अलग होकर 'इदं' के द्वारा वाच्य, स्थूल पाञ्चभौतिक रूप में स्थिति प्राप्त कर लेता है। शब्द, स्पर्श आदि विषयों के इसी रूप को 'संसार-भाव' कहा जाता है क्योंकि यही रूप परिवर्तन- शील होता है । १. यहाँ पर 'प्रतिसमय' शब्द से ज्ञेयविषय की आदिकोटि, मध्यकोटि और अन्तकोटि— इन तीन अनुभवदशाओं का अभिप्राय है । २. अनिमीलितसम्यग्ज्ञानदृष्टिः जाग्रदेव । (स्प० का० वि०, ४. १४) ३. असंकुचितस्वातन्त्र्यशक्तिः । (शिवसूत्र, २. ९ की ६५वीं टिप्पणी)

१४४ स्पन्दकारिका साधारण रूप में संसारी 'पशु' ज्ञेयविषयों के १ दकोटि और अन्तकोटिवाले रूप से परिचित नहीं होते हैं, क्योंकि उनको स्वरूप-परिचय ही नहीं होता है। ऊपर से वे उनके मध्यकोटिवाले स्थूल एवं परिवर्तनशील रूप को ही उनका वास्तविक रूप समझ कर प्रमाद में पड़े रहते हैं। यही एक महती विडम्बना है। अतः सूत्रकार ने उपरिनिर्दिष्ट 'प्रबुद्धः' और 'सर्वदा' शब्दों का प्रयोग करके सम्यक् ज्ञानदृष्टि से युक्त योगियों को, साक्षात्कार की तीनों कोटियों पर ज्ञेयविषयों के वास्तविक स्वरूप को ही दृष्टि में रखने का उपदेश दिया है। इसके अतिरिक्त सूत्र में उस उपाय को भी समझाया गया है जिसको अपनाने से योगीजन प्रत्येक प्रकार की अनुभवदशा में केवल स्वरूपाभास पर ही अवस्थित रहने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। वह उपाय है—'अपने सद्दिमर्श के द्वारा प्रत्येक ज्ञेयविषय का स्वरूपविश्लेषण करके उसके वास्तविक रूप को पहचानना'। उदाहरण के तौर पर यदि 'घट' का स्वरूपविश्लेषण किया जाये, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि स्थूल आकार, ऊँचाई, गोलाई, ललाई इत्यादि इसका वास्तविक स्वरूप नहीं बन सकते हैं, क्योंकि ये सारे कल्पित, परिवर्तनशील और नश्वर हैं। फलतः इन सबों को काटकर शेष जो कुछ बचता है, वह इसका संवेदनात्मक रूप है जो कि 'चित्कला की अहंविमर्शमयी स्पन्दना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसी प्रकार, स्वरूप-विश्लेषणात्मक पद्धति का अभ्यास करनेवाले योगी को किसी समय स्वयं ही यह अनुभूति हो जाती है कि सारा विश्व वास्तव में स्वरूपस्पन्दना ही है। भगवान् २आशुतोष ने इसी सिद्धान्त को अपनी सूत्रात्मक भाषा में इस प्रकार समझाया है— "सावधान योगी, प्रत्येक अनुभवदशा में अन्यथा उपपत्तिरूप अज्ञानात्मक ज्ञान का अन्न खाते रहते हैं।" इसका भाव यह कि योगी लोग प्रत्येक भाव पर चढ़ी हुई, तथाकथित प्रमेयता की कालिमा को, स्वरूप-विश्लेषणात्मक अनुसन्धान की मसकली से घिस-घिस कर, उसके वास्तविक निर्मल स्वरूप का साक्षात्कार करके ही दम लेते हैं। फिर उनके लिये तथाकथित जन्म-मरण अथवा सांसारिक द्वन्द्वात्मकता का कोई भी बखेड़ा ३अवशिष्ट नहीं रहता है ॥४४॥ १. चिता सिद्धं यत्तु न तदचिदिति वक्तुं समुचितम् । तयासिद्धं नाचिन्नचिदपि कदाचित् क्वचिदपि ॥ चितो द्वारैः सिद्धं यदपि च समस्तं तदपि चित् । (भा० प्रथम भाग, ४१२ पृष्ठ) २. ज्ञानमन्नम् । (शिवसूत्र, २.९) ३. मृत्युञ्च कालञ्च कलाकलापं विकारजालं प्रतिपत्तिसात्म्यम् । ऐकात्म्यनानात्म्यवितर्कजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥ (अर्धशिखा शिवमन्त्र, १.६ में उदाहृत)

सूत्र—(ज्ञानी लोगों ने) शब्दराशि से उद्भूत शक्तिवर्ग की वश्यता में पड़े हुए

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४५ [ ब्राह्मी आदि शक्तियाँ ] पूर्वसूत्र में कहा गया कि जागरूक योगियों को 'दूसरा' पीड़ा नहीं पहुँचा सकता है। अतः अगले सूत्र में इसी रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि पीड़ा पहुँचानेवाला वह दूसरा कौन है और वह किस प्रकार पीड़ा पहुँचाता है ? :- शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥४५॥ शब्दराशिरकारादिक्षकारान्तः तत्समुद्भूतस्य कादिवर्गात्मकस्य ब्राह्म्यादि- शक्तिसमूहस्य; भोग्यतां गतः पुरुषो, ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवः स्वस्वभावात् प्रच्यवितः पशुरुच्यते ॥४५॥ अनुवाद सूत्र—(ज्ञानी लोगों ने) शब्दराशि से उद्भूत शक्तिवर्ग की वश्यता में पड़े हुए (स्वतन्त्र) पतिप्रमाता को ही पशुप्रमाता का नाम दिया है। (उसके वश्यता में पड़ने का कारण यह है कि) कला समूह ने उसके असीम वैभव (स्वातन्त्र्य) को पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है ॥४५॥ वृत्ति—'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को शब्दराशि कहते हैं। पुरुष (स्वतन्त्र पतिप्रमाता) उसी शब्दराशि से उद्भूत और 'कवर्ग' इत्यादि वर्गों का रूप धारण करनेवाली ब्राह्मी इत्यादि (पशु) शक्तियों के समुदाय का वशवर्ती बना है। इस अवस्था में उसको 'पशु' कहते हैं, क्योंकि इन्हीं ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों के साथ सम्बन्धित कलाओं ने अर्थात् 'ककार' इत्यादि स्थूल अक्षर समुदाय ने उसके विभव को नष्ट-भ्रष्ट किया है अर्थात् उसको स्वभाव से च्युत किया है ॥४५॥ विवरण तांत्रिक शैवदर्शन का यह एक प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पतिप्रमाता की अभिन्न एवं स्पन्दमयी विमर्शशक्ति (सर्वस्वतन्त्र संवित् शक्ति) ही भेदरूप बहिर्विमर्श की अवस्था में, वैखरी वाणी के द्वारा उच्चार्यमाण स्थूल वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होती है। यह वर्ण- समुदाय वस्तुतः शक्तिरूप होने के कारण पदों, वाक्यों, बड़े-बड़े ग्रन्थों या संसार के सारे आदान-प्रदानों की बातों का रूप धारण करके विकल्प कल्पनाओं का एक ऐसा अंडबंड जंजाल उत्पन्न कर देता है कि स्वयं स्वतन्त्र पतिप्रमाता हो उसमें उलझ-पुलझ कर अस्वतन्त्र पशुप्रमाता बन जाता है। वर्ण चूं कि शक्तिरूप ही हैं, अतः हलचल को जन्म देना उनका स्वभाव है। वे अच्छी या बुरी जैसी भी हलचल उत्पन्न करें, पशु तदनुसार कार्य करने के लिये मजबूर होता है। प्रतिक्षण बातों के बतंगड़ बनते रहते हैं, विकल्पों की श्रृंखलायें उलझती रहती हैं और संसारभाव में पड़ा हुआ पशुवर्ग अशान्ति की भट्ठी में घुसता जा रहा है। १ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र में इसी सिद्धान्त का उल्लेख सूत्रात्मक शब्दों में किया गया है कि—'कलासमूह

१४६ स्पन्दकारिका सूत्र में इसी सिद्धान्त का उल्लेख सूत्रात्मक शब्दों में किया गया है कि—'कलासमूह ने स्वतन्त्र की स्वतन्त्रता को मटियामेट कर रखा है।' शास्त्रीय शब्दों में 'क' से लेकर 'ह' तक के सारे सस्वर व्यञ्जनसमुदाय को कलासमूह कहते हैं । फलतः कलासमूह ही वह 'दूसरा' है जो असावधान पशुप्रमाता को पग-पग पर शतशः बाधाओं में डाल देता है । इस सम्बन्ध में, स्थूल शब्दराशि के रूप में, विमर्शशक्ति की बहिर्मुखीन प्रसारप्रक्रिया की अतीव गम्भीर और दुरूह सैद्धान्तिक विवेचना आगम-शास्त्रों में प्रस्तुत की गई है। उसका विस्तृत एवं सर्वाङ्गीण वर्णन करना यहाँ पर संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से प्रस्तुत विषय के दुरूह और अरुचिकर बन जाने की आशंका है। अतः पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित पंक्तियों में कई प्रमुख बातों का आंशिक रूप में उल्लेख किया जा रहा है । 'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को 'शब्दराशि' कहते हैं । इसका शास्त्रीय नाम१ 'मातृका' है । वास्तव में मातृकाशक्ति, सारी भेदपूर्ण वाचक और वाच्यरूप स्थूल शब्दराशि को अपने गर्भ में, अभेदरूप में अर्थात् केवल स्पन्दनामय २विमर्श रूप में, धारण करनेवाली पराशक्ति ही है। इसका रूप पूर्ण३ अहन्तारूप स्वातन्त्र्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । स्वतन्त्र चेतनारूप होने के कारण यह स्वयं 'अ' से 'क्ष' तक के ४स्थूल एवं सूक्ष्म वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होकर, अनन्त प्रकार के वाचकों और वाच्यों के विश्व को अव- भासित कर लेती है । फलतः यह सारे विश्व की माता तो है, परन्तु ऐसी माता है जिसका परिचय सिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त और किसी को नहीं है । न जानी ५हुई माता को ही 'मातृका' कहते हैं । दूसरी ओर कई आचार्यों ने इस शब्द को मातृकावाचक के स्थान पर परिवारवाचक मानकर, इसकी दूसरी प्रकार की व्याख्या भी प्रस्तुत की है— 'अ' से 'क्ष' तक की स्थूल शब्दराशि सर्वस्वतन्त्र चित्शक्ति का ही बहिर्मुखीन प्रसार है। भेद-पदवी पर उतरते ही यह शब्दराशि आठ वर्गों में बँट जाती है और शक्ति स्वयं भी १. मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में शब्दराशि का 'न' से लेकर 'फ' तक का दूसरा क्रम भी प्रस्तुत किया गया है। इसको 'मालिनी' कहते हैं। भट्टकल्लट को शायद वर्णमाला का यह क्रम मान्य नहीं रहा होगा, क्योंकि उसने अपनी वृत्ति में मातृका-क्रम (अ से क्ष तक) का ही उल्लेख किया है। २. सा हि भगवती अशेषवाच्यवाचकात्मकजगदभेदचमत्कारात्मकशब्दराशिविमर्शपरमार्था.... ........॥ (स्व० तं०, ११.१९९) ३. स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा । (स्प० नि०, ३.१३) ४. 'स्थूल' से व्यक्त ध्वनिरूप और 'सूक्ष्म' से अव्यक्त ध्वनिरूप अर्थात् क्रमशः मुख से बोले जानेवाले और मन में चिन्त्यमान वर्णों का अभिप्राय है। वैखरीरूप और मध्यमारूप होने के कारण दोनों व्यक्त पदवी पर ही अवस्थित हैं । ५. अज्ञाता माता मातृका विश्वजननी । (शिवसूत्रविमर्शिनी, १.४)

प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४७ ब्राह्मी इत्यादि आठ प्रकार के विकल्परूप शक्ति-परिवार का रूप धारण करके, प्रत्येक वर्ग की एक एक अधिष्ठात्री देवी के रूप में अवस्थित रहती है। इन शक्तियों का प्रधान काम यह है कि ये अपने वास्तविक चित्-रूप को चारों ओर से घेरकर उसको आड़ में रखती हैं। परिवार वही होता है जो अपने जन्मदाता को चारों ओर से घेरकर बैठता हो। १ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों का परिवार भी पशुभूमिका पर अपनी ही जन्मदात्री चित्-शक्ति को घेरकर इस प्रकार बैठा रहता है कि सर्वसाधारण जीवों को उसका (चित्-शक्ति का) आभास भी नहीं मिलता है। फलतः आठ शक्तियों के परिवार को 'मातृका' कहते हैं। मातृका शक्ति के उपर्निर्दिष्ट बहिर्मुखीन प्रसार की प्रक्रिया का लेखा-जोखा भगवान् शङ्कर ने स्वयं प्रस्तुत किया है। प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की आत्मभूत और आधारभूत सत्ता है। इस सत्ता का स्वरूप केवल महामन्त्ररूप 'अहं-विमर्श' ही है। 'अ' २अर्थात् अनुत्तर-तत्त्व और 'ह' अर्थात् अनाहत-शक्तितत्त्व की संपुट-दशा अर्थात् प्रत्याहार-दशा ही 'अहंता' है। उसके गर्भ में सारी शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से, भेदरहित अहंवरूप में ही अवस्थित है। पारिभाषिक शब्दों में इसी को 'परा वाणी' कहते हैं। स्थूल वाच्यवाचकमय विश्व का अवभासन करने की ओर उन्मुख होने की दशा में यह अहंवरूपा विमर्शशक्ति 'इच्छाशक्ति' का रूप धारण कर लेती है। अनन्तर ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति— इन दो रूपों में अङ्कुरित हो जाती है। इन दो रूपों में अङ्कुरित होते ही वह मायापदवी पर उतरकर स्वयं उत्पादित अनन्त उपाधियों के रंगों से, अपने को ही रंगकर, न जाने कितने अतर्क्य रूपों में प्रसूत होती है। इसी बहिर्मुखीन प्रसार प्रक्रिया में वह मातृका का रूप धारण करके दो ३प्रकार, नव प्रकार और पचास प्रकार के भेदों में विभक्त हो जाती है। इन भेदों का लेखा-जोखा इस प्रकार है। दो प्रकार के भेद ४बीज और योनि—'अ' से 'अः' तक के सारे स्वरसमुदाय को 'बीज' और 'क' से 'क्ष' तक के सारे व्यंजन-समुदाय को 'योनि' कहते हैं। ५बीज से शिवभाग और १. एतदेव च ब्राह्म्यादिमातृणां मातृत्वं यत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवारवाच्येव न जननीवाचकः। (ई० प्र० भा०, २.१.१) २. अत एव प्रत्याहारयुक्त्या अनुत्तरानाहताभ्यामेव शिवशक्तिभ्यां गर्भीकृतम्, एतदात्मकमेव विश्वम्, इति महामन्त्रवीर्यात्मनोऽहंविमर्शस्य तत्त्वम् । (शिवसूत्रवि०, २.७) ३. तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते । द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ॥ (मा० वि०, ३. ९-१०) ४. बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा बीजं स्वरा मताः । कादिभिश्च स्मृता योनिः........................... ॥ (मा० वि० ३. १०-११) ५. यद् बीजं तत्र शिवः शक्तियोंनिरित्यभिधीयते ॥ (तत्रैव, ३. १२)

१४८ स्पन्दकारिका योनि से शक्तिभाग का अभिप्राय है। व्याकरण में वर्णित संस्थानता के नियम से दोनों एक दूसरे में अन्तर्निहित हैं। नव¹ प्रकार के भेद १. अवर्ग 'अ' से 'अः' तक (अमा) २. कवर्ग 'क' से 'ङ' तक (कामा) ३. चवर्ग 'च' से 'ञ' तक (चार्वङ्गी) ४. टवर्ग 'ट' से 'ण' तक (टङ्कधारिणी) ५. तवर्ग 'त' से 'न' तक (तारा) ६. पवर्ग 'प' से 'म' तक (पार्वती) ७. यवर्ग 'य' से 'व' तक (यक्षिणी) ८. शवर्ग 'श' से 'ह' तक (शारिका) ९. क्षवर्ग 'क्ष' (अनुत्तर एवं अनाहत के संघट्ट को अभिव्यक्त करनेवाला कूटबीज) वर्गभेद के विषय में यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वास्तव में वर्णसमाम्नाय के १ से ८ तक के ही वर्ग मुख्य हैं। 'क्ष' को मात्र औपचारिकता से ही एक पृथक् वर्ग में रखा गया है, क्योंकि इसका अन्तर्भाव 'क' और 'स' के रूप में पहले ही आठ वर्गों में हो जाता है। इन दो वर्णों का संयुक्त-रूप होने के कारण यह स्वयं कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं है। इसको अलग वर्गरूप में रखने का कारण केवल इतना है कि यह अनुत्तर वाचक 'ककार' और विसर्गवाचक 'सकार' का संयुक्तरूप एक ²कूटबीज है जो कि इस बात को अभिव्यक्त करता है कि मातृका का प्रत्येक वर्ण, शिवभाग और शक्तिभाग का संघट्टरूप है। यही कारण है कि इसको शब्दराशि के अन्त में रखा गया है। पचास प्रकार के भेद—शब्दराशि के ³प्रत्येक अक्षर को अलग-अलग शक्तिरूप मानकर सोलह स्वरों और चौंतीस व्यंजनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की गई है। वर्णसमाम्नाय के आठ वर्ग वास्तव में भेदभूमिका पर अवतीर्ण विमर्शशक्ति के ही आठ⁴ रूप हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—'माहेशी, ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री, याम्या, चामुण्डा और योगेशी'। इन आठ शक्तियों को पारिभाषिक शब्दों में 'पीठेश्वरियाँ' कहते हैं। इनकी क्रिया द्विमुखी है। साधारण पशुओं के लिए ये प्रतिक्षण अधिकाधिक विकल्प-परम्पराओं को जन्म १. नवधा वर्गभेदतः ॥ (तत्रैव) २. तदियत्पर्यन्तं यन्मातृकायास्तत्त्वं तदेव ककार-सकारप्रत्याहारेण, अनुत्तरविसर्गसंघट्टसारेण कूटबीजेन प्रदर्शितमन्ते। (शिवसूत्रवि०, २.७) ३. प्रतिवर्णविभेदेन शतार्धकिरणोज्ज्वला। रणोज्ज्वला। (मा० वि०, ३. ११) ४. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम्। (मा० वि०, ३. १२)

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४९ देती रहती हैं। ये अतीव भयानक हैं और ब्रह्मरंध्र में वर्तमान चित्-शक्ति को आड़ में रखकर, अनन्त प्रकार के स्थूल, अर्थात् वाणी के द्वारा अभिलापात्मक और सूक्ष्म, अर्थात् मानसिक संकल्प-विकल्पात्मक वाचकों और वाच्यों के इशारों पर, अज्ञानी जीवों को न जाने कितने और कैसे नाच नचती¹ रहती हैं। दूसरी ओर जिन भाग्यशाली पुरुषों में ईश्वरीय अनुग्रह से सद्विवेक का उदय हुआ हो उनको ये इसी शब्दराशि में अन्तर्निहित शाक्तबल की अनुभूति करवा कर शिवभाव पर पहुँचाने में पथप्रदर्शन भी करती हैं। आखिरकार वाणी ही मनुष्य को मार भी लेती है और तार भी लेती है। मातृका-शक्ति के ये उपर्युक्त आठ भेद केवल विषय को सुगम बनाने के लिये प्रधानरूप में स्वीकारे गये हैं। वस्तुस्थिति तो यह है कि संसार में प्रतिक्षण वाच्यवाचकात्मक विकल्प-परम्पराओं की जितनी भी अगणित श्रृंखलाओं की अनन्त कड़ियाँ प्रसर में आती हैं, वे तो शक्ति के ही अनन्त रूप हैं। अतः उनको यथावत् रूप में गिना नहीं जा सकता है। यह अनन्त प्रकार का शक्तिवर्ग भिन्न-भिन्न प्रकृतिवाले प्रमाताओं को भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाओं का विषय बना लेता है। साधारणतया तीन गुणों के आधार पर प्रकृति तीन प्रकार की हैं अतः शास्त्रकारों ने तदनुकूल ²कार्यभेद के अनुसार इस शक्तिवर्ग के भी तीन रूप स्वीकार किये हैं। इनका विवरण इस प्रकार है :— १. ³घोरतरा (अपरा)—प्रधानतया तामसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तिवर्ग का रूप महान् भयानक है। यह उनको प्रतिसमय केवल कनक-कामिनी अथवा दूसरे प्रकार के सांसारिक विषयोपभोग की वारुणी पिला-पिला कर अचेत बना देता है और निरन्तर अधोगति की निचली सीढ़ी की ओर लुढ़काता रहता है। २. ⁴घोरा (परापरा)—प्रधानतया राजसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तियों का रूप घोर अर्थात् भयानक ही है परन्तु घोरतर रूप जैसा भयंकर नहीं है। अभिप्राय यह कि इस स्तर पर अवस्थित व्यक्ति पर, यदि ईश्वरीय अनुग्रह हो तो वह अपना उद्धार भी कर सकता है। घोरा शक्तियाँ पशुओं के मन में मिश्रित (शुभ एवं अशुभ) कर्मफलों के प्रति आसक्ति उत्पन्न करती हैं और साधारणतया उनके लिये मुक्ति का द्वार बन्द ही रखती हैं। १. करन्ध्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः। पीठेश्वर्यो महाघोरा नर्तयन्ति मुहुर्मुहुः ॥ (तिमिरोद्घाट, शिवसूत्र, १.१४ में उदाहृत) २. अनन्तस्यापि भेदस्य शिवशक्तेर्महात्मनः। कार्यभेदान्महादेवि ! त्रैविध्यं समुदाहृतम् ॥ (मा० वि०, ३.३०) ३. विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् । रुद्राणून् या समालिङ्ग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥ (मा० वि०, ३.३१) ४. मिश्रकर्मफलासक्तिं पूर्ववज्जनयन्ति याः । मुक्तिमार्गनिरोधिन्यास्ताः स्युर्घोराः परापराः ॥ (तत्रैव, ३.३२)

१५० स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri ३. १अघोरा (परा)—अनुभूतिशील एवं सात्त्विक प्रकृतिवाले योगियों के लिये शक्तिवर्ग का रूप अघोर अर्थात् अतीव सौम्य एवं कल्याणकारी है। जिस प्रकार यह राजसिक या तामसिक प्रकृतिवाले व्यक्तियों को तदनुकूल कर्मफलों की ओर प्रेरित करती हैं उसी प्रकार योगियों को शिवभाव पर पहुँचा देती हैं। अब सूत्र में उल्लिखित 'कलासमूह' के विषय में भी दो शब्द कह देना आवश्यक है। अन्तर्विमर्श की अवस्था में अ, इ, उ, ऋ, लृ—ये पाँच मूल-स्वर क्रमशः चित्, निर्वृत्ति, इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन पाँच माहेश्वर शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। २बहिर्विमर्श की अवस्था में इन्हीं पाँच मूल स्वरों की अवतारणा क्रमशः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग के रूप में होती है। इन्हीं ककार आदि अक्षरों को पारिभाषिक शब्दों में 'कलासमूह' कहते हैं क्योंकि ये कलातत्त्व, विद्यातत्त्व इत्यादि मायीय प्रपञ्च का प्रतिनिधित्व करते हैं। शास्त्रों में कलासमूह की परिगणना स्वरवर्ग को अलग छोड़कर 'क' वर्ण से आरम्भ करने का अभिप्राय यह है कि जब स्वर और व्यंजन पारस्परिक संमिश्रण की अवस्था में पड़ जाते हैं तभी विकल्प परम्पराओं का क्षोभ उत्पन्न हो जाता है, अन्यथा केवल स्वर या केवल व्यंजन अलग अलग किसी क्षोभ को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। इन दोनों के पारस्परिक संमिश्रण को शास्त्रीय शब्दों में बीजयोनि-संक्षोभ कहते हैं। इस सारे प्रसङ्ग का निष्कर्ष यही निकलता है कि प्रत्येक शब्द केवल एक जड़ ध्वनि- मात्र ही नहीं, अपितु स्पन्दमयी चेतना शक्ति है। प्रत्येक जीव तबतक इस शक्ति का दास है जबतक उसे अपने भोक्तृभाव की अनुभूति प्राप्त न हो ।।४५।। [ शक्ति का अवरोह और आवरणात्मक स्वभाव और क्रियाशक्ति के दो रूप ] अगले तीन सूत्रों में इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है कि स्वतन्त्र आत्मा में पूर्वोक्त स्वशक्ति-अज्ञान 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में प्रकट हो जाता है। 'प्रत्ययोद्भव' ही त्रिविध मल है। इसी से शिव, शिवभाव से अवतीर्ण होकर, जड़ भाव की अन्तिम कोटि पृथिवीतत्त्व तक पहुँच जाता है— परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः । तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥४६॥ परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः, तस्य यः प्रत्ययोद्भवो विषयदर्शने स्मरणोदयो यतः, तेन पुरुषोऽस्वतन्त्रताम् असर्वगत्वं च प्राप्नोति, स च प्रत्ययः तन्मात्र- गोचरो रूपाद्यभिलाषात्मकः ॥४६॥ १. पूर्ववज्जन्तुजातस्य शिवधामफलप्रदाः । पराः प्रकथितास्तज्जैरघोराः शिवशक्तयः ।। (तत्रैव, ३.३३) २. बहिर्विमर्शेन तु कादिमान्तं पञ्चपञ्चकं अ, इ, उ, ऋ, लृ शक्तिभ्यः पुरुषतत्त्वं समस्तं प्रपञ्चयति । (शिवसूत्रवि०, ३.७)

सूत्र—(निर्विकल्प स्वरूप में) १विकल्प ज्ञानों का उदित होना ही, उसका परामृतरस

शक्ति और क्रियाशक्ति १५१ स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः । यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥४७॥ स्वरूपस्य स्वभावस्याच्छादने चास्य पुरुषस्य शक्तयो ब्राह्म्याद्याः पूर्वमुक्ता याः, ताः सततम् उद्युक्ताः । यतः शब्दरहितस्य प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव कस्यचि- दुद्भवः ॥४७॥ सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका ॥४८॥ सा चेयं क्रियास्वभावा भगवतः पशुवर्तिनी शक्तिः । यदुक्तम्— 'न सा जीवकला काचित् सन्तानद्वयवर्तिनी । व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते ॥' इति । सैव च बन्धकारणम् अज्ञाता, ज्ञाता सा च पुनः परापरसिद्धिप्रदा भवति पुंसाम् ॥४८॥ अनुवाद सूत्र—(निर्विकल्प स्वरूप में) १विकल्प ज्ञानों का उदित होना ही, उसका परामृतरस (शिवशक्ति सामरस्य) की पदवी से लुढ़क जाना है। इसी से वह अस्वतन्त्र बन जाता है। इसके (विकल्प ज्ञान के) विषय पांच २तन्मात्र हैं ॥४६॥ वृत्ति—वह (स्वतन्त्र पतिप्रमाता) परा मृत रस की पदवी से लुढ़क जाता है क्योंकि उसमें प्रत्ययोद्भव अर्थात् ग्राह्य विषयों की उपलब्धि होने पर तद्विषयक ३स्मरण का उदय हो जाता है। उससे वह पुरुष परतन्त्रता और असर्वव्यापकता की अवस्था पर पहुँच जाता है। प्रत्ययोद्भव के विषय तन्मात्र हैं। रूप इत्यादि के प्रति अभिलाषा का उत्पन्न होना, उस विषयता का स्वरूप है ॥४६॥ सूत्र—यह निश्चित है कि पूर्वोक्त शक्तियाँ (ब्राह्मी इत्यादि शक्तियाँ) इसके स्वरूप पर आवरण डालने के लिये प्रतिसमय उद्यत रहती हैं। इसका कारण यह कि (स्थूल और सूक्ष्म) शब्दों की अनुस्यूतता के बिना 'प्रत्ययोद्भव' संभव नहीं है ॥४७॥ वृत्ति—पहले जिन ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों का उल्लेख किया गया है वे इस पुरुष के स्वरूप अर्थात् स्वभाव को ढापने के लिये प्रतिसमय उद्यत रहती हैं। इसका कारण यह कि शब्द १. सूत्र में उल्लिखित 'प्रत्ययोद्भव' एक पारिभाषिक शब्द है। स्वशक्ति विरोध के फल- स्वरूपविकल्पहीन स्वरूप में ज्ञेय विषयों से सम्बन्धित विकल्प ज्ञानों का उदय हो जाने को 'प्रत्ययोद्भव' कहते हैं। २. यहाँ पर 'तन्मात्र' शब्द से सारी प्राधानिक सृष्टि का अभिप्राय है। ३. यहाँ पर 'स्मरण' से स्मरण, संशय, भ्रम, अध्यवसाय, अनुमान इत्यादि विकल्प ज्ञानों की परम्परा का अभिप्राय है।

सूत्र—यह (मातृका) वास्तव में शिव की वह क्रियाशक्ति ही है जो कि (बहिर्विमर्श की

१५२ स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri की सहकारिता के बिना किसी भी 'प्रत्यय' अर्थात् विकल्प ज्ञान का उत्पन्न होना संभव ही नहीं है ॥४७॥ सूत्र—यह (मातृका) वास्तव में शिव की वह क्रियाशक्ति ही है जो कि (बहिर्विमर्श की अवस्था में) पशुवर्तिनी (पशु में विद्यमान स्थूल क्रिया) बन जाने के कारण बन्धन में डाल देने- वाली है, परन्तु (इसके प्रतिकूल) अपने मार्ग पर (शिवमार्ग पर) अवस्थित होती हुई, वास्त- विक रूप में ज्ञात होनेपर, सिद्धियाँ प्रदान करती है ॥४८॥ वृत्ति—यह (मातृका) वास्तव में भगवान् की क्रियात्मक स्वभाववाली शक्ति ही है जो पशुवर्तिनी बन गई है। जैसा कहा गया है— 'दो १सन्तानों के रूप में चलने वाली ऐसी कोई भी 'जीवकला' नहीं है जिसमें 'शिव- कला' अधिष्ठात्री बनकर व्याप्त न हो ॥' अतः वही (ईश्वरीय क्रियाशक्ति ही) अज्ञात होने की दशा में बन्धन का कारण है। परन्तु वास्तविक रूप में ज्ञात होने की दशा में मनुष्यों को पररूप और अपररूप सिद्धियाँ प्रदान कर देती है ॥४८॥ विवरण प्रस्तुत तीन सूत्रों में विमर्शरूपा स्पन्दशक्ति के बहिर्मुखीन प्रसार की क्रीडा का सूत्रात्मक रूप में वर्णन किया गया है। यह शाक्त-प्रसार तीन रूपों में प्रसृत होकर स्वतन्त्र को अस्वतन्त्र बना देता है। वे तीन रूप इस प्रकार हैं— १. प्रत्ययोद्भव, २. स्वरूप आवरण, ३. पशुवर्तिनी स्थूलक्रिया के रूप का ग्रहण। इन तीन रूपों को शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः पूर्वोक्त आणवमल, मायीयमल और कार्म- मल कहते हैं। शाक्त-प्रसर की क्रीडा बराबर चैतन्य की अनुत्तर कोटि 'शिवभाव' से लेकर जड़भाव की निम्नतमकोटि 'पृथिवीतत्त्व' तक चलती रहती है। शिव से लेकर पृथिवी तक छत्तीस तत्त्व हैं। इनमें सारा जड़चेतनात्मक विश्व अन्तर्भूत है। अतः प्रस्तुत सूत्रों में से पहले सूत्र के शब्दों से छत्तीस तत्त्वों का अभिप्राय भी निकलता है। इन सारी बातों को स्पष्टरूप में समझने के लिये प्रत्येक सूत्र पर अलग-अलग प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है। सूत्र ४६— इस सूत्र में यह समझाया गया है कि बाह्य प्रसार की ओर उन्मुख होते ही शक्ति 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में विकसित हो जाती है। विकल्पपरम्परा ही 'प्रत्ययोद्भव' का रूप होता है। इसका अभिप्राय यह कि शिव की निजी अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति ज्यों ही मायाशक्ति का १. जीवकला दो संतानों के रूप में चलती है—१. ज्ञानसन्तान और २. क्रियासंतान। ज्ञानसंतान में मनस्, बुद्धि और अहंकार ये तीन अन्तःकरण और क्रियासंतान में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ और प्राणशक्ति अन्तर्भूत हैं। फलतः 'ज्ञानसंतान' तीन प्रकार का और 'क्रियासंतान' ग्यारह प्रकार का है। (द्रष्टव्य तन्त्रालोक, ४.१८)

शक्ति और क्रियाशक्ति १५३ रूप धारण कर लेती है त्यों ही उसमें (शिव में) अपनी पूर्णता और स्वतन्त्रता के विषय में शङ्का उत्पन्न हो जाती है। अपनी स्वतन्त्रता को अन्यथा रूप में समझना ही सबसे पहला 'प्रत्ययोद्भव' है। स्वतन्त्रता की डाँवाडोल परिस्थिति दो रूपों में स्फुरित होती है—(१) स्वतन्त्र ज्ञातृता की हानि, (२) स्वतन्त्रकर्तृता का अबोध। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि स्वरूप से भिन्न ग्राह्यविषयों की उपलब्धि होते ही स्वतन्त्र आत्मा को अपने अनात्मविश्वास और अनात्मभूत शरीरादि पर आत्मविश्वास हो जाता है। यही तो सबसे बड़ा 'प्रत्ययोद्भव' है और यही मौलिक स्वातन्त्र्यहानि है। यही 'आणवमल' कहा जाता है। प्रत्ययोद्भव के द्वारा स्वातन्त्र्य के संदेह में पड़ने के साथ ही आत्मा की सर्वतोमुखी अवरोहण-प्रक्रिया का उद्भव हो जाता है। चेतन ही जड़ बन जाता है; परा वाणी ही स्थूल वैखरी-वाणी का रूप धारण कर लेती है। स्वतन्त्रज्ञातृता और कर्तृता ही संकुचित ज्ञान और क्रिया बन जाते हैं, इत्यादि। फलतः छत्तीस तत्त्वों का बहिर्मुखीन अवभासन सम्पन्न हो जाता है। इस सारी प्रक्रिया को सूत्रकार ने 'परामृतरसापाय' की संज्ञा दी है। अभी ऊपर कहा गया है कि प्रस्तुत सूत्र के शब्दों में, छत्तीस तत्त्वों का अर्थ भी व्यंग्यरूप में अन्तर्निहित है। संक्षेप में वह इस प्रकार है :— परामृत—१. अनुत्तर, अविनाशी, सर्वस्वतन्त्र, प्रकाशरूप शिव। रस—२. शिव की अभिन्न अहंविमर्शमयी स्पन्दशक्ति। (इन दो तत्त्वों में द्वित्व औपचारिक है। वास्तव में यह एक ही शिवशक्ति-सामरस्य की अवस्था है। इसी को प्रकाश की प्रधानता से शिव और विमर्श की प्रधानता से शक्ति कहा गया है)। परामृत—३. सदाशिव-तत्त्व। ४. ईश्वर-तत्त्व। ५. शुद्धविद्या-तत्त्व। (ये तीन तत्त्व भी 'परामृत' शब्द से ही वाच्य हैं क्योंकि यहाँ तक भी अभेद प्रथा उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का उल्लास नहीं हुआ होता है। हाँ इन तत्त्वों में पूर्वोक्त उन्मेष- निमेषात्मक उतार-चढ़ाव से ही पारस्परिक भेद माना जाता है)। प्रत्ययोद्भव—६. माया-तत्त्व। ९. राग-तत्त्व। ७. कला-तत्त्व। १०. नियति-तत्त्व। ८. विद्या-तत्त्व। ११. काल-तत्त्व। (ये छः तत्त्व भेदप्रथा को उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का प्रसार-रूप हैं। शास्त्रीय शब्दों में इनको 'षट्-कञ्चुक' भी कहा जाता है)। अस्वतन्त्र—१२. पुरुष-तत्त्व। (षट्-कञ्चुक में फँसा हुआ जीव अथवा शास्त्रीय शब्दों में 'पशु') अब आगे प्रत्ययोद्भव के विषयभूत तन्मात्रप्रपञ्च अर्थात् जड़ ग्राह्यवर्ग का उल्लेख एक ही शब्द के द्वारा किया गया है :—

सूत्र ४७—

१५४ स्पन्दकारिका तन्मात्रगोचरः—१३. प्रकृति-तत्त्व। २५. पायु-तत्त्व। १४. बुद्धि-तत्त्व। २६. उपस्थ-तत्त्व। १५. मनस्-तत्त्व। २७. शब्द-तत्त्व। १६. अहंकार-तत्त्व। २८. स्पर्श-तत्त्व। १७. श्रोत्र-तत्त्व। २९. रूप-तत्त्व। १८. त्वक्-तत्त्व। ३०. रस-तत्त्व। १९. नेत्र-तत्त्व। ३१. गन्ध-तत्त्व। २०. जिह्वा-तत्त्व। ३२. आकाश-तत्त्व। २१. घ्राण-तत्त्व। ३३. वायु-तत्त्व। २२. वाणी-तत्त्व। ३४. तेजस्-तत्त्व। २३. हस्त-तत्त्व। ३५. जल-तत्त्व। २४. पाद-तत्त्व। ३६. पृथिवी-तत्त्व। सूत्र ४७— इस सूत्र में शक्ति के 'स्वरूप-आवरणात्मक' स्वभाव का वर्णन किया गया है। पहले भी इस तथ्य को समझाने का प्रयत्न किया गया है कि स्वरूप पर प्रतिसमय किसी न किसी प्रकार का आवरण डालकर, उसको आड़ में कर देना शक्ति का अकाट्य स्वभाव है। इस सम्बन्ध में यह दृष्टि में रखना आवश्यक है कि शिवभूमिका पर शक्ति का रूप अहंविमर्शमयी स्पन्दना अथवा पूर्णस्वातन्त्र्य है अतः उस भूमिका पर स्वरूपगोपन का प्रश्न ही नहीं उठता है। परन्तु ज्यों ही शक्ति बहिर्मुख होकर मायाशक्ति का रूप धारण करती है त्यों ही इसकी स्वरूपगोपनात्मक प्रक्रिया का आरम्भ हो जाता है। यही कारण है कि मायाशक्ति को शास्त्रों में, 'स्वरूपगोपन-व्यग्रा', अर्थात् स्वरूप को तिरोहित करने में व्यस्त, की संज्ञा दी गई है। स्वरूप आवरण को ही दूसरे शब्दों में मायीय-मल कहा जाता है, क्योंकि मायीय आवरणों के द्वारा आवृत होने के कारण से ही, शिव, अपने ही अङ्गभूत वेद्य पदार्थों को, स्वरूप से भिन्न समझने के संकोच की परवशता में पड़ जाता है। इसके अतिरिक्त इसी सूत्र में उल्लिखित 'शब्दानुवेध' के विषय में यह समझना आवश्यक है कि संसार के प्रत्येक अर्थ के साथ उसके वाचकभूत शब्द का, नीर-क्षीर का जैसा संश्लेष शाश्वतरूप में वर्तमान है। शास्त्रीय शब्दों में इस प्रकार कहा जाता है कि प्रत्येक अर्थ (ज्ञेयविषय) प्रकाशरूप है और उसका वाचक शब्द उसके अणु-अणु में व्याप्त रहनेवाली विमर्शना है। शब्द ही प्रत्येक अर्थ को ज्ञान के रूप में सत्ता प्रदान कर देता है। क्योंकि संसार में किसी ऐसे अर्थ या उसके ज्ञान का सद्भाव ही नहीं है जिसके साथ शब्द अर्थात् अभिलापात्मकता न हो। फलतः शब्द और अर्थ का साहचर्य साक्षात् शिव-शक्ति का संघटन ही है।

सूत्र ४८-

शक्ति और क्रियाशक्ति १५५ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri सूत्र ४८- इस सूत्र में क्रियाशक्ति के दो रूपों का उल्लेख किया गया है-(१) शिववर्तिनी क्रिया- शक्ति और (२) पशुवर्तिनी स्थूल-क्रिया। इनमें से पशुवर्तिनी क्रिया बन्धन में डाल देनेवाली है और इसी को शास्त्रीय शब्दों में 'कार्म-मल' कहते हैं। इस कथन का आशय निम्नलिखित विचारों को ध्यान में रखने से स्पष्ट हो सकता है- शिव में जिस प्रकार ज्ञातृता है उसी प्रकार कर्तृता भी है। यह कहना ठीक होगा कि वास्तव में उसकी स्वतन्त्र इच्छा ही उसकी ज्ञातृता और कर्तृता भी है। अस्तु, शिवसम्बन्धिनी कर्तृता को 'शिववर्तिनी क्रियाशक्ति' कहते हैं। विमर्शनमयी स्पन्दना ही इसका मात्र स्वरूप है। दूसरे शब्दों में इसको पारमेश्वरी निर्माण^१ शक्ति भी कहते हैं, क्योंकि यही वह शाक्तस्पन्दना है, जो^२ मूर्तिभेद से जनित देशक्रम और क्रियाभेद से जनित कालक्रम से उपलक्षित, अनन्त प्रकार के शून्य, प्राण, पुर्यष्टक इत्यादि प्रमाताओं और उनके नील, सुख आदि ज्ञेयविषयों को स्वरूप से और एक दूसरे से भेदरूप में अवभासित करती है। इस प्रकार अनन्त वैचित्र्यों से परिपूर्ण विश्व का अवभासन ही, ईश्वर की 'निर्माणशक्ति' अथवा 'क्रियाशक्ति' है। यह ^३निर्माण भगवान् की स्वतन्त्र इच्छा से ही यथावत् रूप में निष्पन्न हो जाता है और इसमें उसको किसी भी प्रकार के उपादान-सम्भार की अपेक्षा नहीं रहती है। वह ऐसी क्रिया का स्वयं ही स्वतन्त्र कर्ता है, क्योंकि वह ऐसे निर्माण को स्वयं जानता भी है। उसका ज्ञाता के रूप में स्फुरित होना ही स्वतः ^४क्रिया भी है। शिववर्तिनी क्रियाशक्ति का कोई क्रम नहीं है क्योंकि इस अवस्था पर इसका वास्त- विक रूप-'मैं ^५स्फुरित हो जाऊँ; मैं घूर्णित हो जाऊँ', इस प्रकार के देश-कालक्रम से हीन 'अहंरूप इच्छास्पन्द' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। १. किन्तु निर्माणशक्तिः साप्येवं विदुष ईशितुः । तथा विज्ञातृविज्ञेयभेदो यदवभास्यते ॥ (ई० प्र०, २.१.८) २. स्वरूपभेदेन देशक्रमकारिणा क्रियाभेदेन च कालक्रमसंपादकेन उपलक्षितो यो विज्ञातुः शून्यादेः प्रमातुः भेदोऽन्योन्यं ज्ञेयाच्च, एवं घटादेः परस्परं ज्ञातुश्च स भगवता अवभास्यते, यत् तदवभासनं सा ईशितुरपि निर्माणशक्तिः क्रियाशक्तिः । (ई० प्र० वि०, २.१.८) ३. इच्छयैव भुवनानि भावयन् यः प्रियोपकरणग्रहोऽपि सन् । अप्रियोपकरणग्रहोऽभवत्तं स्वशक्तिसचिवं शिवं स्तुमः ।। (स्तु० कु०, १.१५) ४. यतश्च तन्निर्मितं ज्ञातृज्ञेयक्रियावैचित्र्यभेदम् असौ विद्वान् वेत्ति अविरतं तत्रैव हि तत् स्फुरति ततोऽपि तस्य सा क्रियाशक्तिः । (ई० प्र० वि०, २.१.८) ५. ईश्वरस्यापि 'ईशे, भासे, स्फुरामि, घूर्णे, प्रत्यवमृशामि', इत्येवंरूपं यदिच्छात्मकं विमर्शनम् 'अहम्' इत्येतावन्मात्रतत्त्वं, न तत्र कश्चित् क्रमः । (तत्रैव) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal