भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ३६७ धि का ∵ ज्या इ × ── = ज्या आ × ── घा कि अथवा किं × धि × ज्या इ = का × धा × ज्या आ यह नियम किसी दो पासवाले स्तरों के लिये ठीक है। इस प्रकार यह साधारण नियम निकल आता है— यदि वातावरण गोल सजातीय स्तरों का बना हुआ मान लिया जाय जिनका केन्द्र वही हो जो पृथिवी का केन्द्र है परन्तु जिनका घनत्व एक दूसरे से भिन्न होता जाता है तो जब प्रकाश की किरण एक स्तर से दूसरे स्तर में घुसती हुई आगे बढ़ती है तब किसी स्तर के वर्तनाङ्क, त्रिज्या और वर्तित कोण की ज्या के गुणनफल स्थिर होते हैं । इस नियम को नीचे के सूत्र से भी प्रकट किया जा सकता है— का × धा × ज्या आ = क × ध × ज्या न् (१) जहाँ का, धा और आ क्रमशः किसी स्तर की त्रिज्या, वर्तनांक और वर्तित कोण और क, ध, न क्रमशः पृथिवी की त्रिज्या, सबसे नीचे के स्तर के वर्तनांक और वर्तित कोण हैं । भूतल को छूने वाले स्तर में जो वर्तित कोण है वह प्रायः नतांश के समान होता है इसलिए न खगोलीय पिंड का स्पष्ट नतांश भी है । यदि इन स्तरों को बहुत पतला मान लिया जाय तो किरण का मार्ग टूटी हुई रेखा के स्थान में वक्र रेखा होगी । मान लो च छ ज वह वक्र है जिस पर किरण इन पतले पतले स्तरों में क्रमशः घुसती हुई पृथिवी तल के ज विन्दु पर पहुँचती है । इस वक्र के छ विन्दु पर छ ल झ एक स्पर्शरेखा है। किरण छ विन्दु पर जिस स्तर में घुसती है उसका वर्तनांक धा और त्रिज्या का हैं। यह स्पर्शरेखा वक्र बनानेवाली किरण से कुछ दूर तक एक हो जाती है इसलिए इस विन्दु पर जो वर्तित कोण बनता है वह छ ल भ कोण के समान होता है । मान लो यह आ के समान है, जब किरण वातावरण के सबसे ऊपरवाले स्तर में घुसती है तब इसकी दिशा वही होती है जो शून्य में उसकी यथार्थ दिशा है । जिस समय किरण पृथिवी तल के विन्दु ज पर पहुँचती है उस समय इस विन्दु पर वक्र की जो स्पर्शरेखा ज स होती है वह उस दिशा को सूचित करती है जिसमें किरण द्रष्टा की आंख में पहुँचती है । यदि ज स्थान का खस्वस्तिक ख हो तो यही ख ज स कोण तारे का स्पष्ट नतांश होता है । सबसे ऊपर वाले स्तर में वक्र की जो स्पर्शरेखा होती है तथा पृथिवी तल के बिन्दु पर वक्र की जो स्पर्शरेखा होती है उन दोनों के बीच में जो कोण होता है वही ज्योतिष सम्बन्धी वर्तन कहलाता है। इसी के जानने से किसी तारे के स्पष्ट और यथार्थ स्थान की जानकारी हो सकती है। इसी को साधारणतः वर्तन कहते हैं। यदि इसका