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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

त्रिप्रश्नाधिकार ३६७ धि का ∵ ज्या इ × ── = ज्या आ × ── घा कि अथवा किं × धि × ज्या इ = का × धा × ज्या आ यह नियम किसी दो पासवाले स्तरों के लिये ठीक है। इस प्रकार यह साधारण नियम निकल आता है— यदि वातावरण गोल सजातीय स्तरों का बना हुआ मान लिया जाय जिनका केन्द्र वही हो जो पृथिवी का केन्द्र है परन्तु जिनका घनत्व एक दूसरे से भिन्न होता जाता है तो जब प्रकाश की किरण एक स्तर से दूसरे स्तर में घुसती हुई आगे बढ़ती है तब किसी स्तर के वर्तनाङ्क, त्रिज्या और वर्तित कोण की ज्या के गुणनफल स्थिर होते हैं । इस नियम को नीचे के सूत्र से भी प्रकट किया जा सकता है— का × धा × ज्या आ = क × ध × ज्या न् (१) जहाँ का, धा और आ क्रमशः किसी स्तर की त्रिज्या, वर्तनांक और वर्तित कोण और क, ध, न क्रमशः पृथिवी की त्रिज्या, सबसे नीचे के स्तर के वर्तनांक और वर्तित कोण हैं । भूतल को छूने वाले स्तर में जो वर्तित कोण है वह प्रायः नतांश के समान होता है इसलिए न खगोलीय पिंड का स्पष्ट नतांश भी है । यदि इन स्तरों को बहुत पतला मान लिया जाय तो किरण का मार्ग टूटी हुई रेखा के स्थान में वक्र रेखा होगी । मान लो च छ ज वह वक्र है जिस पर किरण इन पतले पतले स्तरों में क्रमशः घुसती हुई पृथिवी तल के ज विन्दु पर पहुँचती है । इस वक्र के छ विन्दु पर छ ल झ एक स्पर्शरेखा है। किरण छ विन्दु पर जिस स्तर में घुसती है उसका वर्तनांक धा और त्रिज्या का हैं। यह स्पर्शरेखा वक्र बनानेवाली किरण से कुछ दूर तक एक हो जाती है इसलिए इस विन्दु पर जो वर्तित कोण बनता है वह छ ल भ कोण के समान होता है । मान लो यह आ के समान है, जब किरण वातावरण के सबसे ऊपरवाले स्तर में घुसती है तब इसकी दिशा वही होती है जो शून्य में उसकी यथार्थ दिशा है । जिस समय किरण पृथिवी तल के विन्दु ज पर पहुँचती है उस समय इस विन्दु पर वक्र की जो स्पर्शरेखा ज स होती है वह उस दिशा को सूचित करती है जिसमें किरण द्रष्टा की आंख में पहुँचती है । यदि ज स्थान का खस्वस्तिक ख हो तो यही ख ज स कोण तारे का स्पष्ट नतांश होता है । सबसे ऊपर वाले स्तर में वक्र की जो स्पर्शरेखा होती है तथा पृथिवी तल के बिन्दु पर वक्र की जो स्पर्शरेखा होती है उन दोनों के बीच में जो कोण होता है वही ज्योतिष सम्बन्धी वर्तन कहलाता है। इसी के जानने से किसी तारे के स्पष्ट और यथार्थ स्थान की जानकारी हो सकती है। इसी को साधारणतः वर्तन कहते हैं। यदि इसका

१६८ सूर्य-सिद्धान्त चित्र ७० परिमाण व माना जाय तो ता (व) अर्थात् व की तत्कालिक गति पासवाले किसी दो स्तरों के वर्तनों का अन्तर और ता (धा) अर्थात वर्तनांक की तात्कालिक गति उन्हीं दो स्तरों के वर्तनांकों का अन्तर हुआ । यदि आ और इ इन दोनों स्तरों के वर्तित कोण तथा धा, धि इनके वर्तनांक हों तो आ - इ = ता (व) और धि - धा = ता (धा) ∵ इ = आ - ता (व) और धि = धा + ता (धा) परन्तु का × धा × ज्या आ = कि × धि × ज्या इ यदि वातावरण के दो पतले स्तर बहुत पास हों तो उनकी त्रिज्याएँ प्रायः समान होती हैं इसलिए का = कि । ऐसी दशा में धा × ज्या आ = धि × ज्या इ = [धा + ता (धा) ] × ज्या [आ - ता (व)] = [धा + ता (धा)] × [ज्या आ × कोज्या ता (व) - कोज्या आ × ज्या ता (व)] परन्तु ता (व) बहुत छोटा और चापीय मान में है इसलिए ज्या ता (व) = ता (व) और कोज्या ता (व) = १

विप्रश्नाधिकार ३६६ $\therefore$ घा $\times$ ज्या आ $=$ [घा $+$ ता (धा)] [ज्या आ $-$ ता (व) $\times$ कोज्या आ] $=$ घा $\times$ ज्या आ $-$ घा $\times$ ता (व) $\times$ कोज्या आ $+$ ता (धा) $\times$ ज्या आ क्योंकि चौथे पद में ता (धा) और ता (व) के गुणनफल का गुणक (coefficient) बहुत छोटा है इसलिए छोड़ दिया गया है । $\therefore \circ =$ ता (धा) $\times$ ज्या आ $-$ घा $\times$ ता (व) $\times$ कोज्या आ $\therefore \frac{ज्या आ}{घा \times कोज्या आ} = \frac{ता (व)}{ता (धा)}$ अथवा $\frac{ता (व)}{ता (धा)} = \frac{स्परे आ}{घा}$ \hfill (२) समीकरण (१) और (२) से ऐसा समीकरण जाना जा सकता है जिसमें आ न रहे । समीकरण (१) से ज्या आ $= \frac{क \times ध \times ज्या न}{क \times घा}$ त्रिकोणमिति के यह प्रकट है कि स्परेआ $= \frac{ज्या आ}{\sqrt{(१ - ज्या^२ आ)}}$ $= \frac{\frac{क \times ध \times ज्या न}{का \times घा}}{\sqrt{( १ - \frac{क^२ \times ध^२ \times ज्या^२ न}{का^२ \times घा^२} )}}$ $= \frac{क \times ध \times ज्या न}{\sqrt{(का^२ \times घा^२ - क^२ \times ध^२ \times ज्या^२ न)}}$ $\therefore \frac{ता ( व )}{ता (धा )} = \frac{१}{घा} \times \frac{क \times ध \times ज्या न}{\sqrt{(का^२ \times घा^२ - क^२ \times ध^२ \times ज्या^२ न)}}$ यही ज्योतिष सम्बन्धी वर्तन का साधारण चलन-समीकरण (differential equation) है। यदि सबसे ऊपरवाले स्तर का वर्तनांक १ और सबसे नीचेवाले स्तर का वर्तनांक ध मान लिये जाय और उपर्युक्त चलन समीकरण का इन्हीं सीमाओं के बीच चलराशिकलन (Integration) किया जाय तो ज्योतिष सम्बन्धी वर्तन का पूरा ज्ञान किया जा सकता है। परन्तु ऐसा करने में कठिनाई यह पड़ती है कि इस चलन समीकरण में का और धा दो चल राशियाँ (Variables) हैं जिनका परस्पर सम्बन्ध ज्ञात नहीं हो सकता क्योंकि हमें इस बात का ठीक-ठीक पता नहीं है कि २४

३७० सूर्य-सिद्धान्त पृथ्वी की किस ऊँचाई पर वर्तनांक क्या है। परन्तु इसके बिना जाने भी उपर्युक्त समीकरण का चलराशि कलन एक युक्ति से निकाला जा सकता है जिससे यथार्थ वर्तन का प्रायः ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है। इस युक्ति में $\frac{क}{क}$ को १ + छ मान लेना होता है जब कि छ का परिमाण अत्यन्त छोटा होता है क्योंकि का वातावरण के किसी स्तर की त्रिज्या है और क पृथ्वी की त्रिज्या है। यह भी ज्ञात है कि उस वातावरण की ऊँचाई जिसमें किरणों को झुका देने (वर्तन करने) का गुण होता है अधिक से अधिक ५० मील है। पृथ्वी की त्रिज्या अर्थात् क ४००० मील है, इसलिए $\frac{का}{क} = \frac{४०५०}{४०००} = १ + \frac{१}{८०}$। इससे स्पष्ट है कि छ = $\frac{१}{८०}$ और इसके वर्ग, घन इत्यादि इतने छोटे हैं कि छोड़ दिये जा सकते हैं। ऐसी कल्पना करने से व = $\int_{१}^{ध} \frac{ध ज्या न ता (धा)}{ध (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न + २ छ धा^२)^{\frac{१}{२}}}$ = $\int_{१}^{ध} \frac{ध ज्या न ता (धा)}{धा (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{१}{२}}} \left( १ + \frac{२ छ धा^२}{धा^२ - ध^२ ज्या^२ न} \right)^{\frac{१}{२}}$ = $\int_{१}^{ध} \frac{ध ध ज्या न ता (धा)}{धा (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{१}{२}}} - \int_{१}^{ध} \frac{छ.धा.ध ज्या न ता (धा)}{(धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{३}{२}}}$ सरल करने पर इसका रूप यह होगा— व = प स्परे न + फ स्परे$^३$ न (१) जहाँ प और फ कोई स्थिर राशियाँ हैं और न स्पष्ट नतांश है। प और फ के मान प्रत्यक्ष वेध से जाने जा सकते हैं। कैसिनी का सूत्र— कैसिनी नामक ज्योतिषी ने यह कल्पना किया कि वातावरण ऊपर से नीचे तक सजातीय है अर्थात् एक ही घनत्व का है। इस कल्पना से वर्तन का जो सूत्र ज्ञात हुआ वह ऊपर बतलाये गये सूत्र से मिलता जुलता है। इससे वर्तन का जो परिमाण जाना जाता है वह ८०° तक के नतांश के लिए सन्तोषप्रद है। यदि नतांश ८०° से अधिक हो तो वर्तन के परिमाण में स्थूलता रह जाती है।

त्रिप्रश्नाधिकार ३७१ इस कल्पना में यह मान लेना पड़ता है कि शून्य से आती हुई किरण वाता- वरण में प्रवेश करते ही एक बार झुक जाती है और फिर वही दिशा पृथ्वी तल तक बनी रहती है । मान लो स च छ एक किरण है जो च विन्दु पर झुकी हुई है । चित्र ७१ पृथ्वी की त्रिज्या = भ छ = क भ च = क (१+छ) जबकि छ बहुत छोटा है जैसा कि पहले बतलाया गया है । अ = आपात कोण = ∠ स च ल = ∠ स च सा + ∠ ल च सा = वर्तन + वर्तित कोण = व् + ∠ छ च भ = व् + वा ∠ ख छ च = स्पष्ट नतांश

३७२ सूर्य-सिद्धान्त वर्त्तन के नियम के अनुसार ज्या अ = ध × ज्या वा या ज्या (व + वा) = ध × ज्या वा जहाँ ध वातावरण का वर्त्तनांक है । यह स्पष्ट है कि व बहुत छोटा होता है । इसलिए ज्या (व + वा) = ज्या व × कोज्या वा + कोज्या य × ज्या वा = व × कोज्या वा + ज्या वा ∵ ज्या वा + व × कोज्या वा = ध × ज्या वा ∴ व = (ध - १) स्परे वा त्रिभुज भ छ च में, ज्या वा / ज्या न = क / क (१ + छ) = १ / १ + छ ज्या वा = ज्या न / १ + छ परन्तु स्परे वा = ज्या वा ÷ कोज्या वा = ज्या वा ÷ √(१ - ज्या² वा) = ज्या न / १ + छ ÷ √(१ - ज्या² न / (१ + छ)²) = ज्या न / √{(१ + छ)² - ज्या² न} ∴ व = (ध - १) ज्या न / √ {(१ + छ)² - ज्या² न} = (ध - १) ज्या न / √{१ + २ छ + छ² - ज्या² न} छ² बहुत छोटा है इसलिए छोड़ दिया जा सकता है। ऐसी दशा में व = (ध - १) ज्या न / √(कोज्या² न + २ छ) = (ध - १) ज्या न / √(१ + २ छ / कोज्या² न) × कोज्या न = (ध - १) स्परे न / √(१ + २छ × छे² न) *

  • Secant को छेदन रेखा कहते हैं जो Cosine अर्थात् कोटिज्या का विलोम होता है । छेदन रेखा का संक्षिप्त रूप छे माना गया है। इसी तरह Cosecant अर्थात् कोटिछेदन रेखा का संक्षिप्त रूप कोछे प्रयोग किया जाता है।

विप्रश्नाधिकार ३७३ =(घ - १) स्परे न (१ - छ × छे² न) =(घ - १) स्परे न {१ - छ (१ + स्परे² न)} =(घ - १) स्परे न {१ - छ - छ स्परे² न} =(घ - १) (१ - छ) स्परे न - छ (घ - १) स्परे³ न =प स्परे न + फ स्परे³ न (२) यह पहले ही रूप का है। यहाँ प=(घ - १) (१ - छ) और फ=-छ (घ - १) इस सूत्र का प्रयोग व्यवहार में उसी समय हो सकता है जब प और फ के मान ज्ञात हों। इनका ज्ञान प्रत्यक्ष वेध से हो सकता है जिसकी चर्चा आगे की जायगी। मान लो* यह पाया गया है कि ५०° फारनहैट के तापक्रम पर जबकि वायु का दबाव ३० इंच ऊँचे पारे के दबाव के समान है ५४° और ७४° नतांशों के वर्तन क्रमशः ८०″·०६ और २००″·४६ हैं। उपर्युक्त सूत्र के अनुसार दो समीकरण यह हुए ८०″·०६=प (स्परे ५४°)+फ (स्परे ५४°)³ २००″·४६=प (स्परे ७४°)+फ (स्परे ७४°)³ इन समीकरणों से प और फ के मान क्रमशः ५८″·२६४ और ०″·०६६८२ आते हैं। इसलिए ५० फा० और ३० इंच के दबाव पर वर्तन का साधारण सूत्र यह होता है व = ५८″·२६३ स्परे न - ०″·०६६८२ स्परे³ न (३) यह भी प्रकट है कि फ/प = १/८७३, इसलिए जब तक स्परे³ न बहुत बड़ा न हो अर्थात् यदि सूर्य, या, तारा क्षितिज के पास न हो तब तक दूसरा पद भी छोड़ देने से कोई हानि नहीं हो सकती । यदि नतांश ७०° से अधिक न हो और तापक्रम में भी बहुत अन्तर न हो तो वर्तन का मान जानने के लिए नीचे लिखे सरल पद का प्रयोग उचित होगा । क स्परे न जहाँ क के लिए ५८″·२ लेना अधिक शुद्ध होगा। इस क को वर्तन का गुणक (Coefficient of refraction) कहते हैं। वायुमंडल का वर्तनांक ०°श तापक्रम और ७६० मि०मी० दबाव पर १·०००२६४ है (देखो Ball's Spherical Astronomy page 117) और कैसिनी

  • Ball's Spherical Astronomy पृष्ठ १२७

३७४ सूर्य-सिद्धान्त के सूत्र के अनुसार ५०° फा० तापक्रम और ३० इंच दबाव पर वर्तनांक १.०००२८३ होता है । सिम्प्सन और ब्रैंडली नामक ज्योतिषियों ने भी वर्तन के सूत्र बनाये हैं परन्तु उनकी मीमांसा यहाँ आवश्यक नहीं है । यहाँ केवल ब्रैंडली का सूत्र दे देना पर्याप्त होगा— व = ५८"•३६१ स्परे (न—४•०६ व) (४) इस सूत्र से ८०° नतांश तक वर्तन का परिमाण सन्तोषजनक होता है । इस सूत्र से क्षितिज के पास वाले तारों का बेध ठीक-ठीक किया जा सकता है क्योंकि नतांश ८० अंश के निकट होने पर भी स्परे (न—४•०६ व) का परिमाण बहुत बड़ा नहीं होने पावेगा । तापक्रम तथा वायुमंडल के दबाव के घटने-बढ़ने से भी वर्तन के परिमाण में अन्तर पड़ जाता है। परन्तु इन सब की चर्चा विस्तार के भय से छोड़ दी जाती है। वेध से वातावरण के वर्तन का परिमाण जानना वर्तन के लिए जो सूत्र पहले स्थापित किया गया है उसके गुणकों के मान जानने के लिए कई रीतियाँ काम में लायी जाती हैं। इनमें से तीन रीतियों की चर्चा यहाँ की जायगी । पहली और दूसरी रीतियों से एक ही वेधशाला के वेधों से काम चल सकता है यदि इसका अक्षांश बहुत कम या अधिक न हो। तीसरी रीति में दो वेधशालाओं की आवश्यकता पड़ती है । पहली रीति—ऐसा तारा चुनना चाहिए जो दोनों याम्योत्तरोल्लंघनों के समय क्षितिज के ऊपर रहे । चित्र ७२ में त, ता ऐसे ही एक तारे के स्पष्ट स्थान स्थान हैं । दोनों समय तारे का स्पष्ट नतांश जान लेना चाहिए । मान लो तारे का स्पष्ट नतांश त स्थान पर न और ता स्थान पर ना है । सूत्र के अनुसार इसके यथार्थ नतांश हुए न + प स्परे न + फ स्परे³ न और ना + प स्परे ना + फ स्परे³ ना यदि त, ता तारे के यथार्थ स्थान मान लिए जायें तो त ध = ता ध और ख त + ख ता = २ ख ध = २ लम्बांश = २ (६०° - अ) अर्थात् दोनों यथार्थ नतांशों का योग = २ (६०° - अ), जहाँ स स्थान का अक्षांश अ है । ∴ न + प स्परे न + फ स्परे³ न + ना + प स्परे ना

  • फ स्परे³ ना = १८०° - २ अ

त्रिप्रश्नाधिकार ३७५ यदि इस समीकरण में न और ना के मान जो वेध से जाने जाते हैं उत्थापित किये जायें तो तीन अज्ञात अंकों प, फ और अ का एकघात (linear) समीकरण आ जाता है । इसी प्रकार यदि तीन तारों के स्पष्ट नतांश वेध से जान लिये जायें तो तीन समीकरण मिल जायेंगे जिनसे प, फ और अ के मान सहज ही जाने जा सकते हैं । चित्र ७२ उ स द = स स्थान की उत्तर दक्खिन रेखा उ, द = क्षितिज के क्रमशः उत्तर दक्षिण विन्दु उ ध ख व द = यामोत्तर वृत्त ध = उत्तरी आकाशीय ध्रुव ख = स स्थान का खस्वस्तिक व = विषुवद्वृत्त और यामोत्तर वृत्त का सामान्य विन्दु त = यामोत्तरोल्लंघन के समय तारे का उच्चतम स्थान ता = यामोत्तरोल्लंघन के समय उसी तारे का नीचतम स्थान ग = सूर्य का ग्रीष्मायन विन्दु श = सूर्य का शीतायन विन्दु

३७६ सूर्य-सिद्धान्त दूसरी रीति—अयनान्त विन्दुओं के निकट जब सूर्य हो तब इसके नतांशों से भी वर्तन के स्थिर गुणक प, फ जाने जा सकते हैं । चित्र ७२ में ख ग और ख श सूर्य के यथार्थ नतांश हों तो ख ग+ख श= २ ख व=२ अ मान लो ग का स्पष्ट नतांश न और श का स्पष्ट नतांश ना है तो न+प स्परे न+फ स्परे³ न + ना+प स्परे ना+फ स्परे³ ना=२ अ [चित्र ७३] चित्र ७३ भ=पृथ्वी का केन्द्र छोटा वृत्त=पृथ्वीतल बड़ा वृत्त=यामोत्तर वृत्त ध, धा=उत्तरी और दक्षिणी आकाशीय ध्रुव ग=उत्तर गोल की एक वेधशाला उ=दक्षिण गोल की दूसरी वेधशाला ख=ग स्थान का ख-स्वस्तिक खा=उ स्थान का खस्वस्तिक व=विषुवद्वृत्त का एक विन्दु त=तारा ध भ धा=पृथ्वी का अक्ष यदि अ ज्ञात हो और फ स्परे³ न या फ स्परे³ ना बहुत छोटे होने के कारण छोड़ दिये जायें तो प का मान सहज ही जाना जा सकता है । परन्तु इस रीति में ६ महीने लग जाते हैं ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३७७ तीसरी रीति—इस रीति में उत्तर और दखिन की दो वेधशालाओं से यामोत्तर वृत्त पर स्थित उसी तारे के स्पष्ट नतांश जानकर वर्तन के गुणक स्थिर किये जाते हैं। ग वेधशाला से त तारे का दक्षिण नतांश ख त और उ वेधशाला से त तारे का उत्तर नतांश खा त हैं । ख त = ख व - व त = अ - क खा त = खा व + व त = आ + क जब कि अ, आ दोनों वेधशालाओं के अक्षांश और क तारे की क्रान्ति हैं । यदि ग और उ से त के स्पष्ट नतांश न और ना हों तो ख त = न + प स्परे न + फ स्परे³ न और खा त = ना + प स्परे ना + फ स्परे³ ना ∴ न + प स्परे न + फ स्परे³ न + ना + प स्परे ना + फ स्परे³ ना = ख त + खा त = अ + आ यदि फ स्परे³ न और फ स्परे³ ना को अत्यन्त छोटे होने के कारण छोड़ दिया जाय तो न + प स्परे न + ना + प स्परे ना = अ + आ इसमें न, ना, अ और आ के मान वेध से जानकर उत्थापित करने से प का मान जाना जा सकता है। यदि फ का मान भी जानना हो तो एक और तारे के स्पष्ट नतांश जानने की आवश्यकता पड़ेगी । उदाहरण के लिए अन्तरमदा पुञ्ज के ख तारे (β Andromeda) के नतांश ग्रीनविच और उत्तमाशा अन्तरीप (Cape of Good Hope) की वेधशालाओं से जिनके अक्षांश क्रमशः ५१° २८' ३८'' उत्तर और ३३°५६'४'' दक्षिण हैं लिये जाते हैं। पहली वेधशाला से तारे का स्पष्ट दक्षिण नतांश जब वह यामोत्तर वृत्त पर था १६°२०' ३'' और दूसरी वेधशाला से उसी तारे का स्पष्ट उत्तर नतांश ६६°१'५०'' था । इसलिए १६°२०'३'' + प स्परे १६°२०'३'' + ६६° १'५०'' + प स्परे ६६°१'५०'' = ५१°२८'३८'' + ३३°५६'४'' = ८५°२४'४२'' ∴ प (स्परे १६°२०'३'' + स्परे ६६°१'५०'') = ८५°२४'४२'' - ८५°२१'५३'' = २'४६'' या प (.२६३० + २.६०६३) = २'४६'' = १६६''

३७८ सूर्य-सिद्धान्त १६६ ∴ प = ————— = ५८"·२३ २.६०२३ वर्तन के कारण आकाशीय पिंडों का उदय कुछ पहले और अस्त कुछ पीछे देख पड़ता है इसलिए दिनमान बढ़ जाता है । आकाशीय पिण्डों का उदय उस समय समझा जाता है जिस समय उनका केन्द्र पूर्व क्षितिज पर आ जाता है । उस समय उनका स्पष्ट नतांश ६०° होता है । परन्तु यह सिद्ध हो चुका है कि स्पष्ट नतांश से यथार्थ नतांश वर्तन के समान अधिक होता है । यह भी बतलाया गया है कि जिस समय स्पष्ट नतांश ६०° होता है उस समय वर्तन ३५' के लगभग होता है । इसलिए उदय होने के समय आकाशीय पिंड का यथार्थ नतांश ६०°३५' के लगभग होता है । इसका अर्थ यह हुआ कि जिस समय आकाशीय पिंड का केन्द्र क्षितिज पर लगा हुआ देख पड़ता है उस समय क्षितिज से वह ३५' के लगभग नीचे रहता है । इसलिये यह प्रत्यक्ष है कि जब सूर्य का केन्द्र क्षितिज से ३५' नीचे रहता है तभी से वह उदय हुआ देख पड़ता है और अस्त होने के समय जब तक उसका केन्द्र क्षितिज से ३५' नीचे तक नहीं पहुँच जाता तब तक देख पड़ता है । इस कारण स्पष्ट दिनमान यथार्थ दिनमान से ५ मिनट या १२, १३ पल के समान अधिक होता है । इस बढ़ती का ठीक-ठीक परिमाण जानने के लिए हमें उदय होते हुए सूर्य के नतकाल की तात्कालिक गति निकालनी चाहिए । सूर्य का नतकाल जानने का सूत्र यह है [ देखो पृष्ठ २६१ समीकरण (१) ] कोज्या (नतकाल) × कोज्या अक्षांश × कोज्या क्रान्ति = कोज्या नतांश - ज्या अक्षांश × ज्या क्रान्ति यदि नतकाल, अक्षांश, क्रान्ति और स्पष्ट नतांश के लिए न त, अ, क और न क्रमानुसार मान लिये जायें और कुछ पद दाहिने से बायें अथवा बायें से दाहिने पक्ष में कर दिये जायें तो कोज्या न = ज्या अ × ज्या क + कोज्या अ × कोज्या (न त) × कोज्या क अक्षांश और क्रान्ति को स्थिर मानकर न और न त के तात्कालिक सम्बन्ध ज्ञात किये जायें तो ज्या न × ता (न) = कोज्या अ × कोज्या क × ज्या (नत) × ता (नत) परन्तु उदय या अस्त होते हुए सूर्य का नतांश ६०° होता है इसलिए ज्या न = ज्या ६०° = १; कोज्या न = ० इसलिए कोज्या (न त) = - स्परे अ × स्परे क (१) ता (न) = कोज्या अ × कोज्या क × ज्या (न त) × ता (न त)

त्रिप्रश्नाधिकार ३७६ अथवा ता (न त) = ता ( न ) / (कोज्या अ × कोज्या क × ज्या (न त)) (२) यदि नतांश की तात्कालिक गति ता (न) की जगह ३५' उत्थापित की जाय तो ९०° के स्पष्ट नतांश के वर्तन के लगभग होती है और समीकरण (२) का दाहिना पक्ष सरल किया जाय तो यह ज्ञात होगा कि वर्तन के कारण उदयकालिक नतकाल कितना बढ़ जाता है । उदाहरण १—काशी में सायन कर्क और सायन मकर संक्रान्ति के दिन स्पष्ट सूर्योदय से स्पष्ट सूर्यास्त तक के समय क्या हैं ? आजकल सायन कर्क संक्रान्ति के दिन सूर्य की उत्तर क्रान्ति २३°२७' और सायन मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य की दक्षिण क्रान्ति २३°२७' होती है । काशी का अक्षांश २५°१८' मान लिया जाता है । ∴ कर्क संक्रान्ति के दिन कोज्या (नत) = - स्परे २५°१८' × स्परे २३°२७' = - .४७२७ × .४३३७ = - .२०५० यह ऋणात्मक है । इसलिए सिद्ध होता है कि नतकाल ९०° से अधिक है । यदि नतकाल = ९०° + ना, तो कोज्या (९०° + ना) = .२०५०

  • ज्या (ना) = - .२०५० ∴ ना = ११°५०' ∴ नतकाल = ९०° + ११°५०' = १०१°५०' = ६ घंटा ४७ मिनट २० सेकंड = १६ घड़ी ५८ पल यह गणित सिद्ध नतकाल हुआ । मकर संक्रान्ति के दिन क्रान्ति दक्षिण है इसलिए समीकरण (१) का दाहिना पक्ष धनात्मक होगा और कोज्या (न त) = + .२०५० [ देखो पृष्ठ २६२ ] ∴ मकर संक्रान्ति के दिन गणित सिद्ध नतकाल = ७८°१०' = ९०° - ११°५०' = ६ घंटा - ४७ मि० २० से० = ५ घंटा १२ मि० ४० से० = १३ घड़ी २ पल

३८० सूर्य-सिद्धान्त यदि वर्तन न होता तो यही सूर्योदय से मध्यान्ह तक का समय होता । परन्तु वर्तन का परिमाण ३५' के लगभग होता है इसलिए समीकरण (२) में ता (न) की जगह ३५' उत्थापन करने से, कर्क संक्रान्ति के दिन ३५' ता (नत) = ---------------------------------------------------- कोज्या २५°१८' कोज्या २३°२७' ज्या १०१°५०' ३५' = ---------------------------- .९०४१ × .९१७५ × .९७८७ ३५' = ---------- .८११८४ = ४३'.१२ = ४३.१२ आसु = ७ पल या २ मिनट ५२ सेकंड मकर संक्रान्ति के दिन भी वर्तन के कारण इतनी ही वृद्धि होगी क्योंकि ज्या ७८°१०' = ज्या १०१°५०' और कोज्या २३°२७' के मान में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा चाहे २३°२७' उत्तर क्रान्ति हो या दक्षिण क्रान्ति हो क्योंकि कोज्या २३°२७' = कोज्या (- २३°२७') इसलिए काशी में कर्क संक्रान्ति के दिन उदयकालिक स्पष्ट या वेधसिद्ध नतकाल = १६ घड़ी ५८ पल + ७ पल = १७ घड़ी ५ पल और स्पष्ट या वधसिद्ध दिनमान = ३४ घड़ी १० पल इसी प्रकार काशी में मकर संक्रान्ति के दिन उदयकालिक स्पष्ट या वेधसिद्ध नतकाल = १३ घड़ी २ पल + ७ पल = १३ घड़ी ९ पल और स्पष्ट या वेधसिद्ध दिनमान = २६ घड़ी १८ पल उदाहरण २—सायन मेष और सायन तुला संक्रान्तियों के दिन काशी में स्पष्ट दिनमान क्या होगा ? सायन मेष या सायन तुला संक्रान्तियों के दिन यदि सूर्य के उदयकाल में क्रान्ति शून्य हो तो गणित के नतकाल ठीक ६०° या घंटा अथवा १५ घड़ी होगा । वर्तन के कारण जो वृद्धि होगी उसका परिमाण यों निकलेगा । ३५' ता (नत) = -------------------------------------------- कोज्या २५°१८' कोज्या ०° ज्या ६०°

त्रिप्रश्नाधिकार ३८१ = ३५' / कोज्या २५° १८' = ३५' / .६०४१ = ३८'.७ = ३८.७ असु = ६ पल के लगभग ∵ सायन मेष या तुला संक्रान्तियों के दिन वेधसिद्ध उदयकालिक नतकाल = १५ घड़ी ६ पल ∵ इन दिनों में वेधसिद्ध या स्पष्ट दिनमान = ३० घड़ी १२ पल इस प्रकार सिद्ध है कि सायन मेष और सायन तुला संक्रान्ति के दिन वर्त्तन के कारण दिनमान रात्रिमान से १२ पल अधिक होता है। यह प्रसिद्ध बात है कि इन दिनों में दिनमान और रात्रिमान सब स्थानों में समान होते हैं। इसलिए यदि कोई सूर्य के उदय से अस्त तक के समय को वेध से नापकर विलोम रीति से सायन मेष और तुला संक्रान्ति का दिन जानना चाहे तो वह निश्चय करेगा कि सायन मेष संक्रान्ति यथार्थ संक्रान्ति काल से ३ दिन पहले और सायन तुला संक्रान्ति यथार्थ संक्रान्ति से ३ दिन पीछे पड़ेगी । मकरन्द सारिणी के पृष्ठ १३ में काशी के लिए महत्तम दिनमान का परिमाण ३४ घड़ी ५ पल और लघुतम दिनमान का २५ घड़ी ५५ पल दिया हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सारिणी में कर्क संक्रान्ति के दिन उदयकालिक नतकाल का परिमाण १७ घड़ी २.५ पल निश्चय किया गया था । अब यह देखना कि मकरन्द- कार ने गणित से अथवा वेध से यह दिनमान निश्चय किया था । सूर्य-सिद्धान्त ने सूर्य की महत्तम क्रान्ति २४° माना है । इसलिए अनुमान होता है कि मकरन्दकार ने गणित से चरकाल जानने के लिए इसी क्रान्ति का उपयोग किया होगा । यह पता नहीं कि काशी का अक्षांश उन्होंने क्या माना था । आजकल यह २५° १८' के लगभग निश्चय हुआ है । इसलिए यह मान लेने में कोई हानि नहीं जान पड़ती कि मकरन्दकार ने काशी का अक्षांश २५° माना होगा । यदि २५° अक्षांश माना गया हो तो सायन कर्क संक्रान्ति के दिन काशी में सूर्य की चरज्या = स्परे २४° × स्परे २५° = .४४५२ × .४६६३ = .२०७६ ∴ चरांश = ११°५६' = ७१६ चरासु = १२० पल = २ घड़ी

३८२ सूर्य-सिद्धान्त ∵ उदयकालिक नतकाल = १५ + २ = १७ घड़ी ∵ कर्क संक्रान्ति के दिन काशी में महत्तम दिनमान = ३४ घड़ी इससे प्रकट होता है कि काशी का अक्षांश २५° से कुछ अधिक माना गया होगा क्योंकि तभी चरकाल २ घड़ी २.५ पल हो सकता है । इससे यह भी अनुमान होता है कि ब्रह्मगुप्त के समय से लेकर गणेश दैवज्ञ के समय तक सभी आचार्य सूर्य की परमक्रान्ति २४° इसीलिए मानते आये कि महत्तम दिनमान उनके वेध से उतना ही आता रहा जितना २४° की चरम क्रान्ति मानने से आता है क्योंकि उनको यह नहीं ज्ञात था कि वातावरण के कारण स्पष्ट दिनमान यथार्थ दिनमान से १४, १५ पल के लगभग बढ़ जाता है । वर्तन का विचार करने से महत्तम दिनमान आजकल ३४ घड़ी १० पल होता है । यह ३४ घड़ी ५ पल से केवल ५ पल अधिक है । इतनी अशुद्धि उदय और अस्तकाल के वेध के लिए अधिक नहीं कही जा सकती । वर्तन के कारण सूर्य के आकार में भेद-उदय अस्त होते हुए सूर्य का आकार बड़ा और कुछ अंडाकार देख पड़ता है। इसका कारण यही है कि क्षितिज के पास वर्तन की वृद्धि बहुत तीव्र होती है। सूर्य का विम्ब ३२ कला के लगभग होता है। इसलिए जिस समय सूर्य के विम्ब का सबसे नीचे वाला विन्दु क्षितिज में लगा रहता है उसका स्पष्ट नतांश ६०° रहता है और विम्ब के सबसे ऊपर वाले विन्दु का नतांश ३२ कला के लगभग कम रहता है। इस भिन्नता के कारण नीचेवाला विन्दु अधिक उठा हुआ रहता है और ऊपर वाला विन्दु उससे कम । इससे विम्ब का ऊर्ध्वव्यास कोई ५ कला कम देख पड़ने से सूर्य अंडाकार देख पड़ता है । वर्तन की और अधिक मीमांसा करने से विस्तार बहुत बढ़ जायगा । यदि यह जानना हो कि सूर्य का ऊपरी विम्ब क्षितिज पर कब आता है तो पृष्ठ ३७६ के समीकरण (२) में ता (न) की जगह ३५' + सूर्य के अर्द्धव्यास अथवा ३५' + १६' उत्थापन करने से जितना आवे उसे गणित सिद्ध नतकाल में जोड़ देना चाहिए । चन्द्रमा का उदयकाल जानने के लिए एक संस्कार और करना पड़ता है जिसे लम्बन संस्कार कहते हैं। इसलिए आगे लम्बन (parallax) की व्याख्या की जायगी । लंबन * स्पष्टाधिकार में बतलाई गयी नयी रीतियों से भी सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के जो स्थान ज्ञात होते हैं वह भूकेन्द्र से ठीक वैसे ही देखे जा सकते हैं । परन्तु भूतल के *इस खंड के लिखने में Loomis की Practical Astronomy से बहुत सहायता ली गई है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३८३ किसी स्थान से देखने पर उन स्थानों में कुछ अन्तर देख पड़ता है । यदि भूतल के किसी दो स्थानों से दो द्रष्टा चन्द्रमा को एक ही क्षण में देखें तो वह एक ही दिशा में नहीं देख पड़ता । इसलिए यह जानना आवश्यक है कि किस स्थान से देखने पर आकाशीय पिण्ड यथार्थ स्थान से कितने अंतर पर देख पड़ता है । भूकेन्द्र और भूतल के किसी स्थान से देखने पर आकाशीय पिण्ड की दिशाओं में जो अन्तर देख पड़ता है उसे लंबन कहते हैं । चित्र ७४ चित्र ७४ में भ पृथ्वी का केन्द्र या भूकेन्द्र है, द भूतल का एक स्थान जहाँ द्रष्टा चंद्रमा च को देख रहा है । भ द ख ऊर्ध्व रेखा है जो द स्थान के खस्वस्तिक ख तक जाती है । द स्थान से द्रष्टा को चन्द्रमा द च ज दिशा में देख पड़ेगा और भूकेन्द्र भ से चन्द्रमा भ च छ दिशा में देख पड़ेगा । इन दिशाओं में जो अंतर है वह कोण भ च द के समान है । यही द स्थान से चन्द्रमा का लंबन है । द से चन्द्रमा का नतांश कोण ख द च के समान है जिसे चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश कहते हैं । भ से चन्द्रमा का नतांश कोण ख भ च के समान है जिसे चन्द्रमा का यथार्थ नतांश कहा जाता है । चित्र से यह सिद्ध है कि चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश चन्द्रमा का यथार्थ नतांश + लम्बन । यह स्पष्ट है कि लम्बन के कारण चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश यथार्थ नतांश से अधिक हो जाता है इसलिए चन्द्रमा का उन्नतांश उतना ही कम हो जाता है । इस

३८४ सूर्य-सिद्धान्त कारण चन्द्रमा यथार्थ स्थान से कुछ लटका हुआ देख पड़ता है। इसीलिए इस परिवर्तन का नाम लम्बन पड़ा। इस लम्बन का प्रभाव चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों के भोगांश, शर, विषुवांश, क्रान्ति, इत्यादि पर भी पड़ता है जिसकी व्याख्या आगे की जायगी। मान लो कि त्र = भ द, पृथ्वी की त्रिज्या; क = भ च, भूकेन्द्र से चन्द्रमा की दूरी; न = ∠ ख भ च, चन्द्रमा का यथार्थ नतांश; ना = ∠ ख द च, चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश; जा = ∠ भ च द, चन्द्रमा का नतांश सम्बन्धी लम्बन; त्रिभुज द भ च में भ द भ च ————————— = ————————— ज्या भ च द ज्या भ द च परन्तु ∠ भ द च और ∠ ख द च का योग १८०° होता है इसलिए ज्या भ द च = ज्या ख द च । इनकी जगह ऊपर लिखे संकेत के अक्षर उत्थापित करने से सिद्ध होता है की त्र क —————— = —————— ज्या ला ज्या ना त्र अथवा ज्या ला = — × ज्या ना क इसका अर्थ यह हुआ कि नतांश सम्बन्धी लम्बन की ज्या पृथ्वी की त्रिज्या = ——————————— × स्पष्ट नतांश की ज्या चन्द्रमा की दूरी इससे यह सिद्ध होता है कि किसी दिये हुए स्थान के लिए यदि चन्द्रमा या किसी ग्रह की दूरी दी हुई हो तो इसका लम्बन इसके स्पष्ट नतांश की ज्या के अनुसार घटता बढ़ता है, अर्थात् यदि इसका स्पष्ट नतांश कम हो तो लम्बन कम होगा और अधिक हो तो लम्बन अधिक होगा। यदि स्पष्ट नतांश ९०° हो अर्थात् चन्द्रमा या ग्रह उदय या अस्त हो रहा हो तो इसकी ज्या का मान १ होगा जो महत्तम है। ऐसी दशा में नतांश सम्बन्धी लम्बन भी महत्तम अर्थात् सबसे अधिक होगा। महत्तम लम्बन को परम लम्बन या क्षितिज लम्बन कहते हैं क्योंकि इतना बड़ा लम्बन उसी समय होता है जब आकाशीय पिंड उदय या अस्त हो रहा हो और क्षितिज पर हो । यह भी स्पष्ट है कि जब पिंड ठीक खस्वस्तिक पर रहता है तब उसका नतांश शून्य होने

त्रिप्रश्नाधिकार ३८५

से स्पष्ट नतांश की ज्या भी शून्य होगी और लम्बन का मान शून्य हो जायगा । अर्थात् जब आकाशीय पिंड ठीक सिर के ऊपर खस्वस्तिक पर रहता है तब उसमें नतांश सम्बन्धी लम्बन नहीं होता । यदि क्षितिज लम्बन को ल से प्रकट किया जाय तो ज्या ल = त्र / क यदि पहले समीकरण में त्र / क की जगह ज्या ल रखा जाय तो ज्या ला = ज्या ल × ज्या ना (१) इसका अर्थ यह हुआ कि क्षितिज लम्बन की ज्या को स्पष्ट नतांश की ज्या से गुणा कर दिया जाय तो नतांश सम्बन्धी लम्बन की ज्या आ जायगी । इस सूत्र से लम्बन का ज्ञान तभी हो सकता है जब पिंड का स्पष्ट नतांश ज्ञात हो । यदि यथार्थ नतांश दिया हुआ हो तो दूसरे प्रकार के सूत्र से काम चलेगा जिसका रूप इस प्रकार सिद्ध होता है— चित्र ७४ से स्पष्ट है कि ना = न + ला इसलिए सूत्र (१) से ज्या ला = ज्या ल × ज्या (न + ला) = ज्या ल (ज्या न कोज्या ला + कोज्या न ज्या ला) = ज्या ल ज्या न कोज्या ला + ज्या ल कोज्या न ज्या ला दोनों पक्षों को कोज्या ला से भाग देने पर स्परे ला = ज्या ल ज्या न + ज्या ल कोज्या न स्परे ला स्परे ला को एक पक्ष में करने पर स्परेला = (ज्या ल ज्या न) / (१ — ज्या ल कोज्या न) इस सूत्र से लम्बन का मान उस समय जाना जा सकता है जब यथार्थ नतांश दिया हुआ हो । परन्तु इस रीति से लम्बन जानने में सुविधा नहीं होती क्योंकि इसमें गुणा भाग बहुत करना पड़ता है । इसलिए इसको सरल करने के लिए दूसरा रूप सिद्ध करना चाहिए । यदि दाहिने पक्ष के अंश को हर से भाग दे दिया जाय तो स्परे ला = ज्या ल ज्या न + ज्या² ल ज्या न कोज्या न + ज्या³ ल ज्या न कोज्या² न + ज्या⁴ ल ज्या न कोज्या³ न... इत्यादि

२५

३८६ सूर्य-सिद्धान्त इस श्रेणी के आगे के पद इतने छोटे होते जाते हैं कि केवल पहले तीन पद ले लेने में कोई हानि नहीं हो सकती, यदि ल का मान १° से अधिक न हो । स्परेला की जगह ऐसे पद भी रखे जा सकते हैं जिनमें केवल ला हो क्योंकि* ला = स्परेला - १/३ स्परे³ ला जो धनु को उसकी स्पर्शरेखा में प्रकट करने का प्रायः शुद्ध सूत्र है यदि धनु का परिमाण बहुत छोटा हो । इस सूत्र के दूसरे पद के लिए यदि केवल ज्या³ल ज्या³न / ३ ले लिया जाय तो कोई हानि नहीं हो सकती । ऐसी दशा में ला = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या न कोज्या न + ज्या³ ल ज्या न कोज्या²न - ज्या³ल ज्या³न / ३ + …… = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या न कोज्या न

  • ज्या³ल ( ज्या न कोज्या²न - ज्या³न / ३ ) + …… परन्तु ज्या न कोज्या न = ज्या २ न / २ और ज्या न कोज्या²न - ज्या³न / ३ = (३ ज्या न कोज्या²न - ज्या³न) / ३ = (३ ज्या न - ३ ज्या³न - ज्या³न) / ३ = (३ ज्या न - ४ ज्या³न) / ३ = ज्या ३ न / ३ ** इसलिए ला = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या२ न / २ + ज्या³ल ज्या३ न / ३ + ……

  • देखो सुधाकर द्विवेदी का चलन कलन पृष्ठ ४० ** देखो Hall and Knight की त्रिकोणमिति पृष्ठ १०५ (१८९० की छपी)