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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०५ चित्र ११० वक्रा = क्रान्तिवृत्त धतता = त तारे का ध्रुवप्रोतवृत्त व वि = विषुवद्वृत्त कतति = त तारे का कदम्बप्रोतवृत्त व = वसन्त सम्पात अता = त का ध्रुवाभिमुख भोग या ध्रुव अ = अश्विनी का आदि बिन्दु तता = त का ध्रुवाभिमुख विक्षेप त = तारे का स्थान अति = त का कदम्बाभिमुख भोग अथवा भोग क = कदम्ब तति = त का कदम्बाभिमुख विक्षेप अथवा विक्षेप ध = ध्रुव

६०६ सूर्य-सिद्धान्त अर्थ भोगांश नहीं है और न इसका परिमाण अंशों या कलाओं में ही है। तारे के स्वभोग का अर्थ है तारे का अपने नक्षत्र के आदि विन्दु से अन्तर। यह अन्तर ऐसी इकाई में है जिसको न तो अंश कह सकते हैं और न कला । इसीलिए यह बतलाया गया है कि यदि इस स्वभोग को दस से गुणा किया जाय तो इसका परिमाण कलाओं में मालूम होता है। ऐसा जान पड़ता है कि प्रचलित इकाइयों से भिन्न इकाई का प्रयोग संक्षेप के लिए किया गया है। दस से गुणा करने पर जो आता है वही तारे की अपने नक्षत्र के आदि बिन्दु से कलाओं में दूरी होती है। इस दूरी को गत नक्षत्रों की भोग-कलाओं में जोड़ने से अश्विनी के आदि बिन्दु से अर्थात् राशि-चक्र के आदि विन्दु से उक्त तारे का ध्रुव कलाओं में जाना जाता है। पहले बतलाया गया है कि अश्विनी के आदि विन्दु से किसी ग्रह का क्रान्तिवृत्त पर जो अन्तर होता है वह भोगांश कहलाता है और क्रान्तिवृत्त से उस ग्रह का कदम्ब-प्रोतवृत्त पर जो अन्तर होता है वह विक्षेप कहलाता है। परन्तु यहाँ भोगांश न कहकर ध्रुवांश या ध्रुव कहा गया है। यह चित्र ११० से स्पष्ट हो जाता है। यदि त तारे से जाते हुए कदम्बप्रोतवृत्त और ध्रुवप्रोतवृत्त खींचे जायें तो ये क्रान्तिवृत्त पर दो भिन्न विन्दुओं पर मिलते हैं। क्रान्तिवृत्त के जिस विन्दु ति पर कदम्बप्रोतवृत्त मिलता है उससे अश्विनी के आदि का जो अन्तर होता है उसे तारे का भोग अथवा कदम्बाभिमुख भोग कहते हैं। जैसा कि पहले के अध्यायों में बतलाया गया है और इसी विन्दु से तारे के अन्तर तति को विक्षेप या शर कहते हैं। जिसे यहाँ कदम्बाभिमुख विक्षेप कहना अधिक उपयुक्त होगा परन्तु इस अध्याय में भोग और विक्षेप दूसरे अर्थ में प्रयोग किये गये हैं। भोग का अर्थ कदम्बाभिमुख भोग नहीं है वरन् ध्रुवाभिमुख भोग है और आगे जिस विक्षेप की चर्चा की गयी है उसका अर्थ कदम्बाभिमुख विक्षेप नहीं वरन् ध्रुवाभिमुख विक्षेप है। यह बात चित्र के नीचे जो विवरण दिया है उससे और भी स्पष्ट हो जाती है। एक ही परिभाषिक शब्द से दो भिन्न अर्थ प्रकट करने में भ्रम हो जाता है इसलिये इसको अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिये । ग्रहयुत्यधिकार में यह बतलाया गया है कि ग्रहों के भोगों और विक्षेपों में आयन दृक्कर्म और आक्षदृक्कर्म दो संस्कार करने पड़ते हैं। ग्रहों के भोग में आयन दृक्कर्म का संस्कार करने से जो आता है वही ग्रह का ध्रुवाभिमुख भोग अथवा ध्रुव होता है। इसलिए जब इस अध्याय में ग्रहों का ध्रुवाभिमुख भोग ही लिखा गया है, तब नक्षत्रों के साथ आयनदृक्कर्म की आवश्यकता न पड़ेगी, केवल आक्षदृक्कर्म की आवश्यकता पड़ेगी जैसा कि इसी अध्याय के १४वें श्लोक में बतलाया गया है। इस

प्रकार यह प्रगट है कि तारों का ध्रुवांश लिखने में यही सुभीता है कि इसमें आयनदृक्कर्म नहीं करना पड़ता । तारों के स्वभोग और विक्षेप-- अष्टार्णवाः शून्यकृताः पञ्चषष्टिर्नगेषवः । अष्टार्या गोऽब्धयोऽष्टागा षड्मा मनवस्तथा ॥२॥ कृतेषवो युगरसाः शून्यबाणा वियद्रसा । खवेदास्सागरनगा अष्टागाः सागरर्तवः ॥३॥ नवोऽथ रसा वेदा वैश्वमाप्याधभोगगम् । आप्यस्यान्तेऽभिजित्तारा वैश्वान्ते श्रवणस्थितः ॥४॥ त्रिचतुः पादयोः सन्धौ श्रविष्ठा श्रवणस्य तु । स्वभोगतो वियन्नागाः षट्कृतिर्यमलाश्विनः ॥५॥ रन्ध्राद्रयः क्रमादेषां विक्षेपाः स्वादपक्रमात् । विङ्मासविषयास्सौम्ये याम्ये पञ्च दिशो भवाः ॥६॥ सौम्ये रसाः खं याम्येऽगाः सौम्ये खार्का स्त्रयोदश । दक्षिणे रुद्रयमलाः सप्तत्रिंशत्तथोत्तरे ॥७॥ याम्येऽध्यर्धं त्रककृता नव सार्धशरेषवः । उत्तरस्यां तथा षष्टिः त्रिंशत्षट्त्रिंशदेव हि ॥८॥ दक्षिणेऽतोर्धभागास्तु चतुर्विंशतिरुत्तरे । भागाः षड्विंशतिः खञ्च दस्त्रादीनां यथाक्रमम् ॥६॥ अनुवाद—अश्विनी से लेकर पूर्वाषाढ़ तक के योग-तारों के स्वभोग क्रम से ४८, ४०, ६५, ५७, ५८, ४, ७८, ७६, १४, ५४, ६४, ५०, ६०, ४०, ७४, ७८, ६४, १४, ६, ४ हैं; उत्तराषाढ़ का योगतारा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के आधे पर, अभिजित के योग तारे का भोग पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के अंत में, श्रवण का योग-तारा उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अन्त में, धनिष्ठा का योग-तारा श्रवण नक्षत्र के तीसरे और चौथे चरणों की सन्धि में अर्थात् तीसरे चरण के अंत में हैं। शतभिषक् पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्र पद, और रेवती के योग तारों के स्वभोग क्रम के ८०, ३६, २२ और ७६ हैं। क्रान्तिवृत्त से इन अश्विन्यादि योग-तारों के विक्षेप क्रम से १२, १२, ५, उत्तर की ओर; ५, १०, ६ दक्षिण की ओर; ६, ० उत्तर की ओर; ७ दख्खिन की ओर; ०, १२, १३ उत्तर की ओर; ११, २ दक्षिण की ओर; ३७ उत्तर की ओर; १ १/२, ३, ४, ६, ५ १/२, ५ दक्षिण की ओर; ६०, ३०, ३६, उत्तर की ओर; १/२ दक्षिण की ओर; २४, २६, और ० अंश उत्तर की ओर हैं।

६०८ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान भाष्य—प्रत्येक तारे के स्वभोग को पहले श्लोक के अनुसार १० से गुणा करने पर तारे की स्वभोग-कला आ जायगी। इसको गत नक्षत्रों की भाग- कक्षाओं में जोड़ देने से उस तारे का ध्रुव ज्ञात होगा। जैसे अश्विनी तारे का स्वभोग ४८ है, इसको १० से गुणा किया तो इसका स्वभोग ४८० कला हुआ। अश्विनी तारा अश्विनी नामक पहले ही नक्षत्र में है इसलिए गत नक्षत्र शून्य हुआ इसलिए ४८० कला अथवा ८ अंश अश्विनी तारे का ध्रुव हुआ। इसी प्रकार रोहिणी तारे का स्वभोग कलाओं में ५७० हुआ। रोहिणी के पहले तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृत्तिका गत हैं इसलिए इनका भोग ३ x ८०० कला हुआ क्योंकि एक नक्षत्र ८०० कलाओं के समान होता है (देखो स्पष्टाधिकार श्लोक ६४)। इसलिए रोहिणी तारे का ध्रुव = ५७० + ३ + ८०० कला = ५७० x २४०० कला = २६७० कला = ४६ अंश ३० कला। इसी प्रकार प्रत्येक तारे का ध्रुवांश जाना जा सकता है। उत्तराषाढ़, अभिजित, श्रवण और धनिष्ठा तारों के स्वभोगों में विशेषता है, इसलिए इनके ध्रुवांश नीचे लिखे अनुसार बतलाये जाते हैं :— उत्तराषाढ़ का तारा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के आधे पर अर्थात् पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के ४०० कला पर है। पूर्वाषाढ़ के पहले अश्विनी से मूल तक १६ नक्षत्र होते हैं जिनके भोग १६ x ८०० कला = १५२०० कला के समान है। इसलिए उत्तराषाढ़ का ध्रुव ४०० + १५२०० कला = १५६०० कला = २६० अंश हुआ। अभिजित तारा पूर्वाषाढ़ के अंत में बतलाया गया है, इसलिए इसका ध्रुव २६० अंश + ४०० कला अर्थात् २६६ अंश ४० कला हुआ। श्रवण तारे का ध्रुव उत्तराषाढ़ नक्षत्र के अंत में है। एक नक्षत्र = १३ अंश २० कला। पूर्वाषाढ़ नक्षत्र का अंत २६६ अंश ४० कला पर होता है, इसलिए उत्तराषाढ़ के अंत में श्रवण तारे का ध्रुव २८० अंश हुआ। धनिष्ठा तारा श्रवण नक्षत्र के तीसरे चरण के अंत में हैं। नक्षत्र के तीन चरण ६०० कला। अथवा १० अंश के समान होते हैं। इसलिए धनिष्ठा का ध्रुव २८० + १० = २६० अंश हुआ। विक्षेप तो अंशों में दिया ही हुआ है, इसलिए इस पर अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि ऊपर दिये हुए तारों के ध्रुव सब सिद्धान्त ग्रन्थों में समान नहीं हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं—(१) वेधों की

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०६ भिन्नता (२) अश्विनी के आदि विन्दु की स्थिति के निश्चय करने में भिन्नता (३) योग तारों के निश्चय में भिन्नता और (४) सम्पात विन्दु की गति । पहला कारण तो स्पष्ट है क्योंकि वेध यन्त्रों की स्थूलता के कारण वेध के फलों में भिन्नता स्वाभाविक है। दूसरा कारण भी विशेष महत्व का है। इससे यह जान पड़ता है कि अश्विनी के आदि विन्दु के निश्चय में पुराने आचार्यों में भी मतभेद था जैसा कि आजकल है। परन्तु इस मतभिन्नता से आजकल संक्रान्तियों और मलमासों के निश्चय करने में बड़ी कठिनाई उपस्थित हो रही है जिससे अखिल भारतीय तिथियों और पर्वों की स्थिरता ही नहीं हो सकती । इस बात पर सब प्रान्तों के ज्योतिषाचार्यों में एकता हो जाय तो बड़ा भारी काम हो जायगा और इसके उद्योग में जो सज्जन तन मन धन लगावेंगे वे बड़े पुण्य के भागी होंगे । महाराष्ट्र और गुजरात प्रान्तों में इसके सम्बन्ध में बहुत दिनों से उद्योग हो रहा है परन्तु अभी तक कुछ निश्चय नहीं हुआ । इसी प्रकार सम्पात विन्दु की गति के कारण तारों के ध्रुवों और विक्षेपों में अन्तर पड़ता जाता है यद्यपि इनके कदम्बाभिमुख भोगों और शरों में स्थिरता रहती है। अब १०-१२ श्लोकों में बतलाये गये तारों के ध्रुवक और विक्षेप देकर कई सारणियों में यह बतलाने का उद्योग किया जायगा कि तारों के ध्रुवांशों के सम्बन्ध में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के क्या मत हैं। अशीतिभागं र्यस्यायामगस्त्यो मिथुनान्तगः । विंशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याधो व्यवस्थितः ॥१०॥ विक्षिप्तो दक्षिणे भागैः खार्णवैस्त्वावपक्रमात् । हुतभुग्ब्रह्म हृदयौ वृषद्वाविंशभागगौ ॥११॥ अष्टाभिः त्रिंशता चैव विक्षिप्तावुत्तरेण तौ । गोलं बद्ध्वोपरिक्षेत्रं विक्षेपध्रुवकान् स्फुटान् ॥१२॥ अनुवाद-(१०) अगस्त्य तारे का ध्रुव मिथुन राशि के अन्त में अर्थात् ६० अंश और दक्षिण विक्षेप ८० अंश है। मृगव्याध अथवा लुब्धक तारे का ध्रुव मिथुन के २० अंश पर अर्थात् ८० अंश है। (११) इसका विक्षेप क्रान्तिवृत्त से दक्षिण ४० अंश पर है। अग्नि और ब्रह्महृदय दोनों तारों के ध्रुव वृषराशि के २२ अंश पर अर्थात् ५२ अंश हैं। (१२) इनके विक्षेप क्रम से ८ अंश और ३० अंश क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर हैं। गोलयंत्र के द्वारा इन स्फुटविक्षेपों और ध्रुवकों की परीक्षा करना चाहिए । विज्ञान-भाष्य-१२ वें श्लोक का उत्तरार्ध बड़े महत्व का है। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे आचार्यों को लकोर का फकीर होना इष्ट नहीं था इसीलिए

६१० सूर्य-सिद्धान्त नक्षत्रों के योग ताराओं तथा कुछ अन्य ताराओं के ध्रुवाभिमुख भोग ( ध्रुव ) ( देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५२ )

नक्षत्र की क्रम संख्याताराओं के नामप्रचलित सूर्य-सिद्धान्तब्रह्मगुप्त सिद्धान्तलल्ल तंत्रदामोदरीय भट तुल्यसुन्दर सिद्धान्तग्रहलाघवशंकर बालकृष्ण दीक्षितअन्य तारों के अंग्रेजी नाम
अंशकलाअंशकलाअंशकलाअंशकलाअंशकलाअंशकलाअंशकला
अश्विनी३०४३
भरणी२०२०२०२११५२०२१२१५१
कृत्तिका३७३०३७२८३६३७४५३८३८३६
रोहिणी४६३०४६२८४६४६५०४६४७३७
मृगशिरा६२६२६२६२६३६२६१२६
आर्द्रा६७६७७०६६६७६६७५४३
पुनर्वसु६२६२६२६२४५६२६४६१२१

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१९ ८ पुष्य १०६ ० १०६ ० १०५ ० १०६ ० १०६ १०६ १०५ ४३ ९ आश्लेषा १०६ ० १०८ ० ११४ ० १०७ १५ १०८ १०७ १०८ ३८ १० मघा १२६ ० १२६ ० १२८ ० १२६ ० १२६ १२६ १२६ ५६ ११ पूर्वा फाल्गुनी १४४ ० १४७ ० १३६ २० १४८ १४८ १४४ ३१ १२ उत्तरा फाल्गुनी १५५ ० १५५ ० १५४ ० १५५ ३० १५५ १५५ १५४ १ १३ हस्त १७० ० १७० ० १७३ ० १७० ० १७० १६५ ६ १४ चित्रा १८० ० १८३ ० १८४ ० १८३ ० १८३ १८३ १८० ० १५ स्वाती १६६ ० १६६ ० १६७ ० ११८ ३० १६६ १६८ १६३ २८ १६ विशाखा २१३ ० २१२ ५ २१२ ० २१२ १५ २१२ २१२ २०२ ११ १७ अनुराधा २२४ ० २२४ ५ २२२ ० २२४ १५ २२४ २११ ८ १८ ज्येष्ठा २२६ ० २२६ ५ २२८ ० २२६ ३० २२६ २३० २२२ ५६ १९ मूल २४१ ० २४१ ० २४१ ० २४२ ० २४० २४० ४५

६१२ सूर्य-सिद्धान्त

नक्षत्र की क्रम | ताराओं | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त | लल्लतंत्र | दामोदरीय भट तुल्य | सुन्दर सिद्धान्त | प्रह्लादघव | शंकर बालकृष्ण दीक्षित | अन्य तारों के अंग्रेजी नाम संख्या | के नाम | अंश कला | अंश कला | अंश कला | अंक वर्ग | अंश काल | अंश कला | अंश कला |

२० | पूर्वाषाढा | २५४ ० | २५४ ० | २५४ ० | २५५ ३२ | २५४ | २५५ | २५३ २३ | २१ | उत्तराषाढा | २७० ० | २६० ० | २६७ २० | २६० ० | २६० | २६१ | २६३ ५ | | अभिजित | २६६ ४० | २६५ ० | २६७ ० | २५६ ४५ | | २५८ | २५६ १० | २२ | श्रवण | २८० ० | २७८ ० | २८३ १० | २७५ १५ | २७८ | २७५ | २७२ ५८ | २३ | धनिष्ठा | २९० ० | २९० ० | २९६ २० | ३०७ ३० | २९० | २८६ | २८४ ४७ | २४ | शततारका | ३२० ० | ३२० ० | ३१३ २० | ३२० ० | ३२० | ३२० | ३१९ ४३ | २५ | पूर्वाभाद्रपद | ३२६ ० | ३२६ ० | ३२७ ० | ३२५ ० | ३२६ | ३२५ | ३२२ ३ | २६ | उत्तर भाद्रपद | ३३७ ० | ३३७ ० | ३३५ २० | ३३७ ० | ३३७ | ३३७ | ३४० ३५ |

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१३ २७ रेवती ३५६ ५० ० ० ३५६ ० ० ० ० ० ३५६ ५७ १ २० अगस्त्य ६० ० ८७ ० ८७ ० ८७ ८० Canopus व्याध ८० ० ८६ ० ८६ ० ८६ ८१ Sirius अग्नि ५२ ० ५२ ५३ β Tauri ब्रह्मा ५२ ० ५२ ५६ α aurigae (capella) β aurigae प्रजापति ५७ ० ५७ ६१ θvirginis* अपांवत्स १८० ० १८३ δvirginis* आपस १८० ० Popular Hindu Astronomy Part I pp. 240-241

६१४ | सूर्य-सिद्धान्त

नक्षत्रों के योग ताराओं तथा कुछ अन्य ताराओं के ध्रुवाभिमुख शर या विक्षेप (देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५३)

नक्षत्रों की क्रम-संख्याताराओं के नामप्रचलित सूर्य-सिद्धान्त (अंश | कला)ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त (अंश | कला)लल्लतंत्र (अंश | कला)दामोदरीय भटतुल्य (अंश | कला)सुन्दर सिद्धान्त (अंश | कला)ग्रहलाघव (अंश | कला)शंकर बालकृष्ण दीक्षित (अंश | कला)शर की दिशा
अश्विनी१०१०१०१०१०१०उत्तर
भरणी१२१२१२१२ १५१२१२१० ५७उत्तर
कृत्तिका४ ३१४ ८उत्तर
रोहिणी४ ३३४ ३०५ ३२दक्षिण
मृगशिरा१०१०१०१०१०१०१३ २४दक्षिण
आर्द्रा११११११११११६ ४६दक्षिण
पुनर्वसु६ ४६उत्तर

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१५ ८ पुष्य ० ० ० ० ० ० ० ५ उत्तर ९ आश्लेषा ७ ७ ७ ७ ७ ७ ११ २४ दक्षिण १० मघा ० ० ० ० ० ० ० २६ उत्तर ११ पू०फाल्गुनी १२ १२ १२ १३ १ ४५ १२ १० ३१ उत्तर १२ उ०फाल्गुनी १३ १३ १३ १२ ४५ १३ १३ २४ उत्तर १३ हस्त ११ ११ ८ ११ ११ ११ १३ १७ दक्षिण १४ चित्रा २ १ ४५ २ १ ४५ १ ४५ २ २ १२ दक्षिण १५ स्वाती ३७ ३७ ३७ ३७ १५ ३७ ३२ ५६ उत्तर १६ विशाखा १ ३० १ २३ १ ३० १ १५ १ ० २२ दक्षिण १७ अनुराधा ३ ० १ ४४ ३ १ ४५ २ २ १ दक्षिण १८ ज्येष्ठा ४ ३ ३० ४ ३ ३० ३ ४ ३७ दक्षिण १९ मूल ८ ८ ३० ८ ३० ८ ३० ८ १३ ४८ दक्षिण

६१६ सूर्य-सिद्धान्त | नक्षत्रों की क्रम-संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त (अंश | कला) | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त (अंश | कला) | लल्ल तंत्र (अंश | कला) | दामोदरदेव भटतुल्य (अंश | कला) | सुन्दर सिद्धान्त (अंश | कला) | ग्रहलाघव (अंश | कला) | शंकर बालकृष्ण दीक्षित (अंश | कला) | शर की दिशा | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | २० | पूर्वाषाढ़ | ५ | ३० | ५ | २० | ५ | २० | ५ | ३० | | | ५ | | २ | ७ | दक्षिण | | २१ | उत्तराषाढ़ | ५ | | ५ | | ५ | | ५ | | | | ५ | | १ | २८.७ | दक्षिण | | | अभिजित् | ६० | | ६२ | | ६३ | | ६२ | | ६२ | | ६२ | | ६१ | ५५ | उत्तर | | २२ | श्रवण | ३० | | ३० | | ३० | | २६ | ३० | ३० | | ३० | | २६ | ४६ | उत्तर | | २३ | धनिष्ठा | ३६ | | ३६ | | ३६ | | २५ | ३० | ३६ | | ३६ | | ३४ | १५ | उत्तर | | २४ | शततारका | ० | ३० | ० | १८ | ० | २० | ० | १५ | ० | २० | ० | | ० | २५ | दक्षिण | | २५ | पू. भाद्रपद | २४ | | २४ | | २४ | | २३ | ४५ | | | २४ | | २१ | ६ | उत्तर | | २६ | उ. भाद्रपद | २६ | | २६ | | २६ | | २६ | | | | २७ | | १३ | ४५ | उत्तर |

नक्षत्रग्रहणाधिकार ६१७ २७ रेवती ० ० ० ० ७७ ० ० १४ } दक्षिण ३ १८ } अगस्त्य ८० ७७ ८० ७७ ७६ दक्षिण व्याध ४० ४० ४० ४० ४० दक्षिण अग्नि ८ ८ ८ उत्तर ब्रह्मा ३० ३० ३० उत्तर प्रजापति ३८ ३८ ३८ उत्तर अपांवत्स ४५ ३ उत्तर आप उत्तर

६१८ सूर्य-सिद्धान्त वह स्थान-स्थान पर कहते गये हैं कि यंत्रों के द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों का वेध करके जो ध्रुवक यथार्थ आवें उनको मानना चाहिए। यहाँ उन्होंने केवल गोलयंत्र की चर्चा की है। त्रिप्रश्नाधिकार के ११ वें श्लोक में बतलाया गया है कि शंकु की छाया से सूर्य का जो भोगांश आता है उससे गणित से निकाले हुए भोगांश का जो अंतर होता है वही स्पष्ट अयनांश है। इन बातों से स्पष्ट होता है कि हमारे आचार्यों को यह इष्ट था कि ज्योतिष सम्बन्धी गणित का मिलान आकाश के प्रत्यक्ष वेध से करके उचित संशोधन भी करते रहना चाहिए। यहाँ गोलयंत्र की विशेष चर्चा नहीं की जायगी क्योंकि यह विषय ज्योति- षोपनिषद्ध्याय नामक १३ वें अध्याय में जहां और यंत्रों की चर्चा है स्वयम् आवेगा इसलिए वहीं चित्र देकर यह अच्छी तरह समझाया जायगा। साथ ही साथ यह भी बतलाया जायगा कि इस समय कुछ नवीन यंत्रों जैसे दूरदर्शक यंत्र इत्यादि से बहुत ही सूक्ष्मतापूर्वक कैसे काम लिया जा सकता है और प्रत्येक ज्योतिष विद्यालय के साथ नवीन ढंग के एक-एक वेधालय की कितनी आवश्यकता होती है। पिछली सारणियों में यह बताया गया है कि भिन्न-भिन्न आचार्यों के मत से उपर्युक्त तारों के ध्रुवक और विक्षेप क्या हैं। ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त के ध्रुवक और विक्षेप भास्कराचार्य की सिद्धान्तशिरोमणि के ध्रुवक और विक्षेप से मिलते हैं। लल्लतंत्र, दामोदरीयभट तुल्य, और सुन्दरी-सिद्धान्त के ध्रुवक और विक्षेप स्वर्गीय शंकर बालकृष्ण दीक्षित के भारतीय ज्योतिष शास्त्र से लिये गये हैं। दीक्षित जी ने चित्रा तारे का ध्रुवक १८० अंश मानकर सन् १८८७ ई० के नाटिकल अलमैनेक में दिये हुए तारों के विषुवांशों और क्रान्तियों से जो ध्रुवक और विक्षेप स्थिर किये थे वे भी इस सारिणी में दिये जायेंगे। दीक्षित जी ने रेवती तारे के दो ध्रुवक और दो विक्षेप दिये हैं । इसका कारण यह है कि इनके मत से रेवती का योग तारा जीटा पिसियम या म्यू पिसियम हो सकता है। इसीलिए पहला ध्रुवक या विक्षेप जीटा पिसियम का है और दूसरा म्यू पिसियम का। ग्रह का रोहिणी-शकट-भेद कब होता है— वृषे सप्तदशे भागे यस्य याम्योऽशकद्वयात् । विक्षेपोऽभ्यधिको हन्याद् रोहिण्याश्शकटं तु सः ॥१३॥ अनुवाद—(१३) वृषराशि के १७ वें अंश पर स्थित जिस ग्रह का दक्षिण विक्षेप २ अंश से अधिक होता है वह ग्रह रोहिणी नक्षत्र के शकट को भेद करता है ।

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१६ विज्ञान भाष्य—रोहिणी नक्षत्र में ५ तारे हैं जिनकी आकृत गाड़ी की तरह अथवा अंग्रेजी के वी (V) अक्षर की तरह है । इन पांच तारों में सबसे उत्तर वाले तारे का दक्षिण विक्षेप २ अंश ३५ कला के लगभग है । इस तारे को आजकल एपसिलान टारि कहते हैं। और रोहिणी के योग तारे का दक्षिण शर ५ अंश ३२ कला है । जिस ग्रह का दक्षिण शर या विक्षेप इन दो सीमाओं के बीच में होता है वह रोहिणी के शकट के भीतर हो जाता है । इसी को रोहिणी के शकट का भेदन कहते हैं । यह प्रकट है कि ग्रह का विक्षेप उसके पात पर आश्रित रहता है । चन्द्रमा का पात १८ वर्षों में एक फेरा करता है। इस एक फेरे में चन्द्रमा केवल ५,६ वर्ष शकट का भेद करता है । यदि चन्द्रमा का दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक हो और ५ अंश ३२ कला से कम और उस समय यह रोहिणी नक्षत्र में हो तो यह अवश्य रोहिणी के शकट में होकर चलेगा इसलिए चन्द्रमा का रोहिणी-शकट-भेद होगा । अब यह देखना है कि जिस समय चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में होता है उस समय इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक कम होता है । मध्यमाधिकार के पृष्ठ ७५ में बतलाया गया है कि चन्द्रमा का परमविक्षेप ५ अंश ८ कला ४२ विकला है । इसका अर्थ यह है कि जब चन्द्रमा राहु से ६० अंश आगे रहता है तब इसका उत्तर शर ५ अंश ८ कला और ४२ विकला होता है और जब यह केतु से ६० अंश आगे रहता है तब इसका दक्षिण शर इतना ही होता है । परन्तु जब यह राहु या केतु पर रहता हैतब इसका शर शून्य होता है । इसलिए स्पष्टा- धिकार के श्लोक २८, चित्र २५ के आधार पर यह सहज ही जाना जा सकता है कि चन्द्रमा का शर २ अंश ३५ कला से अधिक कब होता है । इस चित्र में यदि व स चन्द्रमा की कक्षा, व प क्रान्तिवृत्त, व राहु का स्थान, स चन्द्रमा का स्थान, स ए चन्द्रशर और स व प चन्द्रमा का परम विक्षेप मान लिया जाय तो व स और प का सम्बन्ध सहज ही जाना जा सकता है। यहां यदि स प को २ अंश ३५ कला मान लिया जाय तो ज्या (वस) = ज्या ( स प ) / ज्या (सवप) = ज्या २°३५′ / ज्या ५° ८′ = .०४५१ / .०८६८ = .५०२२ ∴ व स = ३० अंश ६ कला अर्थात् जब चन्द्रमा अपने पात से एक राशि आगे रहता है तब इसका शर २ अंश ३५ कला से अधिक होता है । परन्तु रोहिणी क्रान्तिवृत्त के दक्षिण है और इसका ध्रुवाभिमुख भोगांश सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ४६ अंश ३० कला और शंकर बालकृष्ण दीक्षित के अनुसार ४७ अंश ३७ कला है तथा कदम्बाभिमुख भोगांश

६२० सूर्य-सिद्धान्त सूर्य-सिद्धान्त की गणना से ४८ अंश ६ कला और शंकर बालकृष्ण दीक्षित की गणना से ४५ अंश ५७ कला है। इसलिए यदि रोहिणी के योग तारा का कदम्बाभिमुख भोगांश ४६ अंश मान लिया जाय तो जिस समय चन्द्रमा का भोगांश इतना ही होगा उस समय ही रोहिणी-शकट-भेद हो सकता है यदि इसका दक्षिण शर भी २ अंश ३५ कला से अधिक हो। ऐसी दशा में चन्द्रमा को केतु से कम से कम १ राशि आगे रहना चाहिए अर्थात् जब केतु का भोगांश कम से कम १६ अंश हो तभी रोहिणी-शकट-भेद हो सकता है। ऊपर की गणना से यह सिद्ध हुआ कि जब केतु से चन्द्रमा १ राशि आगे रहता है तब इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला होता है। इसके बाद इसका दक्षिण शर बढ़ते-बढ़ते ५ अंश ८ कला हो जाता है। उस समय यह केतु से ३ राशि आगे हो जाता है। फिर इसका दक्षिण शर घटने लगता है और जब यह केतु से ५ राशि आगे अथवा राहु से १ राशि पीछे रहता है तब तक इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से कम नहीं होता । इसी सीमा के भीतर चन्द्रमा रोहिणी के शकट का भेद करता है। परन्तु ऊपर सिद्ध हुआ है कि जब केतु का भोगांश १६ अंश होता है अर्थात् जब केतु मेष राशि के १६ अंश पर होता है तब यदि चन्द्रमा का दक्षिण विक्षेप २ अंश ३५ कला हो तो रोहिणी-शकट-भेद होगा। इसके बाद केतु अपनी वक्री गति से जब पीछे हटता जायगा तब भी चन्द्रमा रोहिणी के शकट को भेद करेगा क्योंकि उस समय रोहिणी नक्षत्र में इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक होता जायगा। इस प्रकार जब तक केतु मेष के १६ अंश से ४ राशि पीछे नहीं चला जाता तब तक रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा का दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से कम नहीं होगा । इसका अर्थ यह हुआ कि जब केतु मेष राशि के १६ अंश पर आवेगा तब चन्द्रमा के रोहिणी-शक भेद का आरम्भ होगा और जब तक यह धनु के १६ अंश पर नहीं आवेगा तबतक चन्द्रमा के प्रति फेरे में रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा का रोहिणी-शकट- भेद होगा। परन्तु राहु केतु से ६ राशि आगे रहता है। इसलिये यह भी कहा जा सकता है कि जब तक राहु मिथुन के १६ अंश से तुला के १६ अंश तक की सीमा में रहता है तब तक चन्द्रमा का रोहिणी-शकट-भेद होता है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के रोहिणी शकट-भेद की भी गणना की जा सकती है। परन्तु मध्यमाधिकार पृष्ठ ७५ में दी हुई सारिणी से यह प्रकट होता है कि शुक्र और बुध के सिवा किसी ग्रह का परम शर २ अंश ३५ कला से अधिक नहीं है इसलिए बुध और शुक्र का ही रोहिणी शकट-भेद संभव है। शनि का परम शर २ अंश २६ कला ३६ विकला है इसलिए शनि का रोहिणी-शकट-भेद भी असंभव जान

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२१ पड़ता है। परन्तु वराह मिहिर१ तथा ग्रहलाघवकार२ ने लिखा है कि शनि अथवा मङ्गलक रोहिणी-शकट-भेद होने से बड़ा अनिष्ट होता है। युतिकाल का साधन— ग्रहवद् द्यु निशेमानां कुर्याद् दृक्कर्म पूर्ववत् । ग्रहमेलनविज्ञेयं ग्रहभुक्त्या दिनादिकम् ॥१४॥ एष्यो हीने ग्रहे योगो ध्रुवकादधिके गतः । विपर्ययाद्वक्रगतैः ग्रहैः ज्ञेयः समागमः ॥१५॥ अनुवाद—(१४) पहले जिस तरह युतिकालिक ग्रहों का दिनमान और रात्रिमान जानने को कहा गया है उसी तरह नक्षत्रों का भी दिनमान और रात्रिमान साधन करके उनका आक्षदृक्कर्म संस्कार करना चाहिये । इसके पश्चात् जैसे ग्रहों का परस्पर युतिकाल और युतिस्थान जाना जाता है उसी तरह केवल ग्रह की गति से ग्रह और नक्षत्र का युतिकाल और युतिस्थान जान लेना चाहिये । (१५) यदि ग्रह का आयन-आक्ष-दृक्कर्म-संस्कृत भोग नक्षत्र के आक्षदृक्कर्म-संस्कृत ध्रुवक से कम हो तो समझना चाहिये कि नक्षत्र और ग्रह का योग होने वाला है और यदि अधिक हो तो समझना चाहिये कि योग हो चुका है । परन्तु यदि ग्रह वक्री हो तो इसका उलटा समझना चाहिये । विज्ञान भाष्य—इन दोनों श्लोकों में जो नियम बतलाये गये हैं उनकी व्याख्या ग्रहयुत्यधिकार में आ चुकी है । यहां ग्रह का तो आयन और आक्ष दोनों दृकर्म करने को कहा गया है परन्तु नक्षत्र का केवल आक्षदृक्कर्म करने को कहा गया है । इसका कारण स्पष्ट है । क्योंकि ग्रह का जो भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार आता है वह कदम्बाभिमुख होता है इसलिए उसमें आयन-दृक्कर्म का संस्कार करने से वह ध्रुवाभिमुख होता है । अब यदि इसमें आक्षदृक्कर्मका संस्कार किया जाय तो इसका भोगांश समप्रोतवृत्त में आता है । परन्तु नक्षत्रों के जो ध्रुवक १. रोहिणी शकटमर्कनंदनी यदि भिनत्ति रुधिरोथवा शशी । किं वदामि यदि नष्टसागरे जगदशेषमुपयाति संक्षये ॥३५॥ —बृहत्संहिता ३४ अध्याय २. कभशकटमसौ भिनत्त्यसृक् शनिरुडुयो यदि चेज्जनक्षयः ॥७॥ भौमकर्योः शकटभिदा युगान्तरे स्यात् सेदानीं न हि भवतीदृशि स्वपाते ॥८॥ —ग्रहलाघव, नक्षत्रच्छायाधिकार

६२२ सूर्य-सिद्धान्त दिये गये हैं वे ध्रुवाभिमुख हैं इसलिए इनमें केवल आक्षदृक्कर्म का संस्कार करने की आवश्यकता पड़ती है । इस प्रकार ग्रह और नक्षत्र के भोगों में किसी इष्टकाल में जो अंतर होता है उसको ग्रह की दैनिक गति से भाग देने पर यह जाना जाता है कि कितने समय में ग्रह का नक्षत्र से योग होगा या होने वाला है । और सब बातें ग्रहयुत्यधिकार में बतलाये गये नियम के अनुसार ही समझनी चाहिए । यहाँ सुगमता यह है कि नक्षत्र स्थिर होते हैं इसलिए केवल एक ग्रह के सम्बन्ध की गणना करनी पड़ती है । नक्षत्रों के योगतारों के पहचानने की रीति— फल्गुन्योः भाद्रपदयोः तथैवाऽऽषाढयोर्द्वयोः । विशाखाश्विनिसौम्यानां योगतारा तथोत्तरा ॥१६॥ पश्चिमोत्तरतारा या द्वितीया पश्चिमे स्थिता । हस्तस्य योगताराऽसौ श्रविष्ठायाश्च पश्चिमा ॥१७॥ ज्येष्ठाश्रवणमैत्राणां बार्हस्पत्यस्य मध्यमा । भरण्याग्नेयपित्र्याणां रेवत्याश्चापि दक्षिणा ॥१८॥ रोहिण्यादित्यमूलानां प्राची सार्पस्य चैव हि । यथाप्रधानं शेषाणां स्थूलास्स्युर्ध्रुवतारकाः ॥१९॥ पूर्वस्यां ब्रह्महृदयादंशकैः पञ्चभिः स्थितः । प्रजापतिर्वृषान्तेऽसौ सौम्ये अष्टात्रिंशदंशकैः ॥२०॥ अपांवत्सस्तु चित्राया उत्तरेऽशंश्च पञ्चभिः । बृहत्किञ्चिदतो भागैरापष्षड्भिस्तथोत्तरे ॥२१॥ इत्यष्टमोध्याय : अनुवाद—(१६) पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, विशाखा, अश्विनी और मृगशिरा नक्षत्रों में से प्रत्येक नक्षत्र का उत्तरवाला तारा उस नक्षत्र का योग तारा है । (१६) हस्तनक्षत्र के पश्चिमोत्तर दिशा में जो दो तारे हैं । उनमें दूसरा पच्छिमवाला तारा इस नक्षत्र का योगतारा है और धनिष्ठा नक्षत्र के दो उत्तरवाले तारों में भी पच्छिमवाला तारा योग तारा है । (१८) ज्येष्ठा, श्रवण, अनुराधा और पुष्य नक्षत्रों के बीचवाले तारे प्रत्येक के योग तारे हैं । भरणी, कृत्तिका, मघा और रेवती नक्षत्र के दक्षिणवाला तारा प्रत्येक नक्षत्र का योग तारा है । (१६) रोहिणी, पुनर्वसु, मूल और आश्लेषा नक्षत्र का पूर्ववाला तारा प्रत्येक का योग तारा है । २८ नक्षत्रों में से अब जितने शेष हैं, उनमें

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२३ अर्थात् आर्द्रा, चित्रा, स्वाती, अभिजित और शतभिषक् नक्षत्रों में प्रत्येक नक्षत्रों का सबसे बड़ा तारा उस नक्षत्र का योग तारा है। (२०) ब्रह्महृदय तारे से ५ अंश पूर्व की ओर प्रजापति नामक तारा वृष के अंत में है। इसका उत्तर विक्षेपांश ३८ है। (२१) चित्रा तारे से ५ अंश उत्तर की ओर अपांवत्स तारा है जिससे ६ अंश उत्तर कुछ बड़ा आप नामक तारा है। विज्ञान भाष्य-१६-१८ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि प्रत्येक नक्षत्र में कौन तारा मुख्य माना गया है जिसके ध्रुवक और शर पहले बतलाये गये हैं। ऐसे मुख्य तारे को योगतारा कहा गया है। आजकल इन योगताराओं के सम्बन्ध में विद्वानों में कुछ मतभेद है। आगे एक सारणी दी जायगी जिससे पता चलेगा कि आजकल कौन विद्वान् किस तारे को योगतारा मानता है। नक्षत्र के लिए कभी-कभी उनके देवताओं के नामों का प्रयोग किया गया है इसलिए सुविधा के लिए यह भी बतलाया जायगा कि किस नक्षत्र का स्वामी कौन देवता है तथा प्रत्येक नक्षत्र में कितने तारे हैं। तारों की संख्याओं में प्राचीन आचार्यों में भी मतभेद है जैसा कि सारणी से पता चलेगा। ब्रह्महृदय का ध्रुवक १ राशि २२ अंश बतलाया गया है। इससे ५ अंश पूर्व प्रजापति तारा है। इसलिए प्रजापति का ध्रुवक १ राशि २७ अंश है। श्लोक में बतलाया गया है कि प्रजापति वृषराशि के अंत में है परन्तु इसका अर्थ यही लेना चाहिये कि यह वृषराशि के अंत के पास है। चित्रा तारे का दक्षिण शर २ है और अपांवत्स तारा चित्रा से ५ अंश उत्तर है इसलिए अपांवत्स का उत्तर शर ३ अंश हुआ। आप तारा अपांवत्स से ६ अंश उत्तर है इसलिए इसका उत्तर शर ६ अंश हुआ। तारों और नक्षत्रों की पहचान के लिए ४ आकाश-चित्र दिये जायेंगे जिनसे यह सहज ही जाना जा सकता है कि कौन नक्षत्र किस समय आकाश में कहां देख पड़ता है। इन सारणियों में तारों के अङ्गरेजी नाम विलक्षण ढंग से दिये हुए हैं इस- लिये यह बतला देना आवश्यक है कि ये नाम किस प्रकार रखे गये हैं। अङ्गरेजी में तारा-पुञ्जों के जो नाम प्रचलित हैं वह अधिकतर लैटिन और यूनानी ( Greek ) भाषा से लिए गये हैं। प्रत्येक तारापुंज के नाम के पहले कोई यूनानी अक्षर जोड़ कर रखा गया है। इन अक्षरों का क्रम अधिकतर इस प्रकार रखा गया है कि उस पुंज में जो तारा सबसे चमकीला और बड़ा है उसका नाम पहले अक्षर 'अल्फा' से प्रकट किया गया है। उसके बाद जो तारा उससे छोटा है उसका नाम दूसरे अक्षर ‘बीटा’ से प्रकट किया गया है, इत्यादि। कुछ प्रधान तारों के नाम इस तरह तो

६२४ सूर्य-सिद्धान्त नक्षत्र के देवता (मुहूर्त चिंतामणि तथा भारतीय

क्रम संख्यानक्षत्रों के नामनक्षत्र के स्वामी या देवतातैत्तिरीय संहितानक्षत्र कल्पवृद्धगार्गीय संहितानारद संहिताबराह मिहिरखंडखाद्यक
अश्विनीअश्विनी कुमार
भरणीयम
कृत्तिकाअग्नि
रोहिणीब्रह्मा
मृगशिराचन्द्रमा
आर्द्रारुद्र१या२
पुनर्वसुअदिति
पुष्यबृहस्पति
आश्लेषासर्प
१०मघापितर
११पूर्वा फाल्गुनीभग
१२उत्तरा फाल्गुनीअर्यमा
१३हस्तसूर्य
१४चित्राविश्वकर्मा
१५स्वातीपवन