वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
५३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव- प्रशस्तपादभाष्यम् आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव । (अज्ञ पुरुष को) सर्वथा अज्ञात गवय का ज्ञान आप्त पुरुष से उच्चारित 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्य से ही होता है । अतः उपमान भी आप्तवचन (शब्द) के ही (अन्तर्गत) है । (फलतः उपमान भी अनुमान ही है।) न्यायकन्दली स्येति । कराकुञ्चनादि-लक्षणोऽभिनयोऽनेनाभिप्रायेण क्रियत इत्येवं यत्पुरुषस्य प्रसि- द्धोऽभिनयः, तस्य चेष्टया करविन्यासेनाह्वानादिविसर्जनादिप्रतीतिर्दृश्यते नान्यस्य, अतस्तदपि चेष्टया ज्ञानमनुमानमेव । उपमानस्यानुमानेऽन्तर्भावं कुर्वन्नाह - आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव । आप्तिः साक्षादर्थस्य प्राप्तिः, यथार्थोपलम्भः, तया वर्त्तत इत्याप्तः साक्षात्कृतधर्मा यथार्थदृष्टस्यार्थस्य चिख्या- पयिषया प्रयोक्तोपदेष्टा, तेनाप्तेन वनेचरेण विदितगवयेनाप्रसिद्धगवयस्याज्ञात- गवयस्य नागरिकस्य कीदृग्गवय इति पृच्छतो गवा गोसारूप्येण गवयस्य स्वरूप 'चेष्टा' नाम का एक स्वतन्त्र प्रमाण मानते हैं । उसी के खण्डन के लिए 'प्रसिद्धाभिनयस्य' यह वाक्य कहा गया है । 'प्रसिद्धोऽभिनयो यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष को यह सङ्केत ज्ञात है कि 'हाथ की ये आकुञ्चनादि क्रियायें इन अभिप्रायों से की जाती हैं' वही पुरुष प्रकृत में 'प्रसिद्धाभिनय' शब्द से अभीष्ट है । उसी पुरुष को 'चेष्टा' से अर्थात् हाथ के विशेष प्रकार के अभिनय या क्रिया से बुलाने या बाहर लौटने की क्रिया का बोध होता है, दूसरे को नहीं । अतः चेष्टा से उत्पन्न होनेवाला वह ज्ञान भी अनुमान ही है । 'उपमान भी अनुमान ही है, वह कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है' यह उपपादन करते हुए भाष्यकार ने 'आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनमुपमान- माप्तवचनमेव' यह वाक्य लिखा है । 'आप्त्या वर्त्तते यः स आप्तः' इस व्युत्पत्ति से ही 'आप्त' शब्द बना है । साक्षात् 'अर्थ' की प्राप्ति को ही 'आप्ति' कहते हैं, जो वस्तुतः यथार्थज्ञान रूप ही है । तदनुसार 'आप्त' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को समझना चाहिए, जिसने विषयों को उनमें विद्यमान सभी धर्मों के साथ प्रत्यक्ष के द्वारा देखा है (उनको पूर्ण रूप में यथार्थ रूप में समझा है) और उस यथार्थज्ञान से ज्ञात वस्तु के ख्यापन (लोगों को विदित) करने की इच्छा के द्वारा ही जो उपदेश करते हैं । वनों में रहनेवाले इस प्रकार के किसी 'आप्त' पुरुष से-जिन्हें गवय का ज्ञान है-जब 'अप्रसिद्ध गवय' अर्थात् गवय को न जाननेवाले नागरिक के द्वारा 'गवय किस तरह का होता है' यह प्रश्न किया जाता है, तब उस पुरुष के द्वारा 'गवा' अर्थात् गोसादृश्य के द्वारा गवय को समझाने के
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५३१
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५३१ न्यायकन्दली प्रतिपादनादुपमानं यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यमाप्तवचनमेव, वक्तृप्रामाण्यादेव तथा प्रतीतेः। आप्तवचनं चानुमानम् । तस्मादुपमानमप्यनुमानाव्यतिरिक्तमित्यभिप्रायः । ये तावत् पूर्वमीमांसका वनेचरवचनमेवोपमानमाहुः, तेषामिदमनुमानमेव । येऽपि शबरस्वामिशिष्या अनुभूतस्य गोपिण्डस्य वने गवयदर्शनात् स्मृत्यारूढायां गवि 'मदीया गौरनेन सदृशी' इति सारूप्यज्ञानमुपमानमाचक्षते, तदपि स्मरणमेव । सादृश्यं हि सामान्यवत् प्रत्येकं व्यक्तिसमाप्तं न संयोगवदुभयत्र व्यासज्य वर्तते, गोपिण्डस्यादर्शनेऽपि वने गवयव्यक्तौ गोसदृशोऽयमिति प्रतीत्युत्पादात् । यथोक्तं मीमांसागुरुभिः - सामान्यवच्च सादृश्यमेकैकत्र समाप्यते । प्रतियोगिन्यदृष्टेऽपि यस्मात् तदुपलभ्यते ॥ इति । लिए 'यथा गौस्तथा गवयः' (अर्थात् गो को जिस प्रकार देख रहे हो गवय भी उसी प्रकार का होता है) प्रयुक्त यह वाक्य 'आप्तवचन' अर्थात् शब्द प्रमाण ही है; क्योंकि यहाँ भी वचनों के प्रमाण्य से ही अर्थ की प्रतीति होती है । आप्तवचन अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अतः उपमान भी अनुमान के ही अन्तर्गत है, यही उक्त भाष्य सन्दर्भ का अभिप्राय है । प्राचीन मीमांसकों ने वनवासी के उक्त आप्तपुरुष के वचन को ही उपमान प्रमाण माना है, उनका यह उपमान प्रमाण भी अनुमान में ही अन्तर्भूत हो जाता है । शबरस्वामी (मीमांसासूत्र के भाष्यकर्ता) के अनुयायी शिष्यगण यह कहते हैं कि जिस पुरुष ने गाय के शरीर को देखा है, वन में जाने पर वही जब गवय को देखता है, तब उसे पहले देखे हुए गो का स्मरण हो आता है । तब स्मरण किये हुए उस गो में यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि 'हमारी गाय इस गवय के समान है' । यह सादृश्य ज्ञान ही उपमान प्रमाण है । इस प्रकार का उपमान प्रमाण रूप ज्ञान अनुमान के अन्तर्गत न आने पर भी स्मरण रूप हो सकता है; क्योंकि जिस प्रकार सामान्य (जाति) की अधिकरणता उसके प्रत्येक अधिकरण में अलग-अलग होती है, उसी प्रकार सादृश्य की अधिकरणता भी उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में अलग-अलग है । जिस प्रकार संयोग के अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में उसकी एक ही अधिकरणता रहती है, उस प्रकार सादृश्य की एक ही अधिकरणता उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में नहीं है; किन्तु अलग-अलग है । अतः गवय को देखने के समय गो का प्रत्यक्ष न रहने पर भी वन में गवय व्यक्ति रूप सादृश्य का ज्ञान उस समय अप्रत्यक्ष गो में भी हो सकता है । जैसा कि मीमांसा के आचार्यों ने कहा है कि-चूँकि सादृश्य की उपलब्धि उसके (एक आश्रय) प्रतियोगी के न देखने पर भी होती है, अतः सामान्य की तरह उसकी आश्रयता प्रत्येक आश्रय में अलग-अलग है ।
५३२ न्याय कन्दली संवलित प्रशस्तपाद भाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव- न्यायकन्दली प्रत्येकं परिसमाप्तत्वेऽपि सादृश्यं यद्यपि गवयग्रहणाभावाद् गवयसदृश इति गवि पूर्वं प्रतीतिर्नासीत्, तथापि । स्वाश्रयसन्निकर्षमात्रभाविनो सादृश्यप्रतीतिरुचितेव । यथा प्रतियोग्यन्तराग्रहणात् तस्मादिदं दीर्घमिदं ह्रस्वमिति प्रतीत्यभावेऽपि स्वाश्रयप्रत्यासत्तिमात्रेण परिमाणस्य स्वरूपतो ग्रहणम् । कथममन्यथा देशान्तरगतः प्रतियोगिनं गृहीत्वा अस्मात् तद्दीर्घं ह्रस्वमिति व्यवस्यति । यदि गवि पुरा सादृश्यमिन्द्रियापातमात्रेण न गृहीतम् ? सम्प्र- त्यपि गवये न गृह्यते, गवयदर्शनादेव गवये च स्मरणमित्युभयनियमो न स्याद्विशेषात् । यावतां खुरलाङ्गूलादिसामान्यानां गवि ग्रहणम्, तावतामेव गवयेऽपि ग्रहणात् स्मरणनियम इति चेत् ? भूयोऽवयवसामान्यन्येवोभयवृत्तित्वात् सादृश्यम् । तानि चेत् प्रत्येकमाश्रयग्रहणेन गृह्यन्ते, गृहीतमेव सादृश्यम् । तस्माद् यद्यपि सादृश्य अपने प्रत्येक आश्रय में स्वतन्त्र रूप से ही रहता है, फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि गवय को देखने से पहले उसका ज्ञान न रहने के कारण (गो प्रत्यक्ष के समय) गो में 'यह गवय के समान है' इस आकार की प्रतीति नहीं थी, तथापि केवल सादृश्य के आश्रयीभूत गवय में चक्षु के सन्निकर्ष से, (फलतः ज्ञानलक्षण सन्निकर्ष से सादृश्य का प्रत्यक्ष सम्भव न होने पर भी स्वसंयुक्तसमवाय सम्बन्ध से ही) सादृश्य का ग्रहण होना अनुचित नहीं है । जैसे कि दीर्घादि के आश्रयीभूत दण्डादि आश्रय जहाँ प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत रहते हैं, एवं इन दीर्घादि परिमाणों के दूसरे अवधि द्रव्यों का ज्ञान नहीं रहता है, ऐसे स्थलों में 'यह इससे दीर्घ है' या 'यह इससे छोटा है,' इत्यादि विशिष्ट प्रतीतियाँ यद्यपि नहीं होती हैं, फिर भी 'यह दीर्घ है' या 'यह ह्रस्व है' इत्यादि आकारों से स्वरूपतः केवल परिमाण का ग्रहण तो होता ही है, यदि ऐसी बात न हो तो दूसरे देश में जाकर वह उसके दूसरे अवधि रूप प्रतियोगी को जब देख लेता है, उसके बाद 'यह उस द्रव्य से बड़ा या छोटा है' इस प्रकार की जो प्रतीति होती है, वह कैसे होगी ? (प्र.) गो में यदि गोत्व की तरह गवय का सादृश्य भी रहता तो गवय को देखने से पहले भी गो में इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही गवय के सादृश्य की भी प्रतीति हो जाती, सो नहीं होती है ? (उ.) गवय के प्रत्यक्ष के समय भी तो गो में उस सादृश्य की प्रतीति नहीं होती है । अतः यह दोनों नियम नहीं किये जा सकते कि उक्त सादृश्य की प्रतीति (१) गवय-प्रत्यक्ष से ही उत्पन्न होती है और (२) गो में ही उत्पन्न होती है; क्योंकि इससे विपरीत कल्पना के लिए भी स्थिति समान है। (प्र.) खुर, पूँछ प्रभृति जितने धर्मों का पहले गो में ग्रहण हो चुका है, उतने का ही जब गवय में भी ग्रहण होता है तभी गो में गवयसादृश्य का स्मरण होता है, ऐसे नियम की कल्पना करेंगे ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३३ न्यायकन्दली गवयग्रहणे सत्यसन्निहितगोपिण्डावलम्बिनी सादृश्यप्रतीतिः सदृशदर्शनाभिव्यक्तसंस्कार- जन्या स्मृतिरेव, न प्रमाणान्तरम् । दृष्टा च निर्विकल्पकगृहीतस्यापि स्मृतिविषयता, अव्युत्पन्नैकपिण्डग्रहणे प्रथममविकल्पितस्य सामान्यस्य पिण्डान्तरग्रहणे प्रत्यभिज्ञानात् । येऽपि श्रुतातिदेशवाक्यस्य गवयदर्शने गोसादृश्यप्रतीत्या 'अस्य गवयशब्दो नामधेयम्' इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतीतिमुपमानमिच्छन्ति, तेषामपि यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यं तज्जनिता च 'लोके यः खलु गवय इति श्रूयते स गोसदृशः' इति बुद्धिरुपम एव । यदपि गोसदृशस्य गवय- शब्दवाच्यत्वज्ञानं तदप्यनुमानम्, तत्र तच्छब्दप्रयोगात् । यः खलु शब्दो यत्राभियुक्तैरविगानेन प्रयुज्यते स तस्य वाचकः । प्रयुज्यते चारण्यकेनाविगानेन गोसदृशे गवयशब्द इति । तस्मात् (उ.) गो और गवय दोनों में जो अनेक अवयवों की समानतायें हैं, वे ही दोनों में रहने के कारण सादृश्य कहलाती हैं । ये समानतायें यदि गो और गवय इन दोनों में से एकमात्र के ग्रहण से भी गृहीत होती हैं, तो फिर सादृश्य भी उसी प्रकार गृहीत हो ही गया । तस्मात् प्रमाता पुरुष से दूर में रहनेवाले गोपिण्ड में जो गवय के सादृश्य की प्रतीति होती है, वह स्मरण रूप ही है । केवल इतनी-सी बात है कि वह स्मरण उस संस्कार से उत्पन्न होता है, जिसका उद्बोधन गोसदृश गवय के दर्शन से होता है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत विषयों का भी स्मरण उपलब्ध होता है, जैसे कि अव्युत्पन्न पुरुष के द्वारा एक पिण्ड के ग्रहण के समय सविकल्पक ज्ञान के द्वारा अगृहीत सामान्य की भी उसी जाति के दूसरे पिण्ड के ग्रहण के समय प्रत्यभिज्ञा होती है । नैयायिकों का कहना है कि जो प्रमाता पहले किसी आप्त पुरुष से 'गोसदृशो गवयः' इस अतिदेश वाक्य को सुन लेता है, बाद में वही जब गवय को देखता है तो उसे यह प्रतीति होती है कि 'इसी पिण्ड का नाम गवय है' । यह प्रतीति चूँकि गवय शब्द रूप संज्ञा की गवय पिण्ड रूप संज्ञी में (वाच्यवाचकरूप) सम्बन्ध विषयक है । ('अयं गवयपदवाच्यः' इस आकार की प्रतीति को संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध की प्रतीति कहते हैं), अतः यही उपमान है; किन्तु नैयायिकों का भी यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि यह भी वस्तुतः शब्द प्रमाण ही है; क्योंकि 'लोक में यह जो 'गवय' का नाम सुनते हैं वह गोसदृश वस्तु का ही बोधक है' यह बुद्धि भी तो 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य से ही उत्पन्न होती है । एवं इससे गोसदृश पिण्ड में गवय शब्द के अभिधेय होने का जो ज्ञान होता है, वह (उपमान न होकर) शब्द ही है; क्योंकि गोसदृश पिण्ड में ही गवय शब्द का प्रयोग होता है, (अतः नैयायिक गण जिसे उपमान कहते हैं, वह भी शब्दजनित होने के कारण अनुमान ही है) एवं गोसदृश (गवय में) जो गवय शब्द की वाच्यता का ज्ञान होता है, वह भी अनुमान ही है; क्योंकि (यहाँ अनुमान का यह आकार है कि) आप्तगण एक स्वर से बिना विरोध के जिस शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं वह शब्द उस अर्थ का वाचक होता है, सभी आरण्यक आप्तजन गवय शब्द का प्रयोग उसी पिण्ड में करते हैं जो गो के समान है । तस्मात् गो-सदृश उस पिण्ड का नाम अवश्य ही 'गवय' है। एवं
५३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव- प्रशस्तपादभाष्यम् दर्शनादर्थापत्तिर्विरोध्येव, श्रवणादनुमितानुमानम् । प्रमाणों के द्वारा ज्ञात अर्थ से अर्थों की जो अवगति (दृष्टार्थापत्ति) होती है वह विरोधि (व्यतिरेकी) अनुमान ही है । वाक्य के श्रवण से जो अर्थावगति (श्रुतार्थापत्ति) होती है, वह भी अनुमितानुमान ही है । न्यायकन्दली सोऽपि गवयशब्दवाच्य एवेति सामान्येन ज्ञानमनुमानमेव । प्रत्यक्षे गवये सादृश्यज्ञानं त्रैलोक्यव्यावृत्तपिण्डबुद्धिरपि प्रत्यक्षफलम् । यच्च तद्गतयेन संज्ञासंज्ञिसम्बन्धानुसन्धानम्, तदपि सादृश्यग्रहणमभिव्यक्तपूर्वोेपजातसामान्यप्रवृत्तगोसदृशगवयशब्दवाच्यत्वज्ञानजनितसंस्का- रजन्यादेकत्रोपजातसामान्यविषयसङ्केतज्ञानसंस्कारकृततज्जातीयपिण्डान्तरविषयतच्छब्दवाच्य- त्वानुसन्धानवत् स्मरणमेव । एवं हि तदायमनुसन्धत्ते 'अस्यैव तन्मया पूर्वमेव तृतच्छब्द- वाच्यत्वमवगतम्' इत्युपमानाभावः । दृष्टः श्रुतो वार्थोऽन्यथा नोपपद्यत इत्यर्थान्तरकल्पनाऽर्थापत्तिः । श्रुतग्रहणस्य पृथग- भिधानसाफल्यमुपपादयता परेणार्थापत्तिरुभयथोपपादिता दृष्टार्थापत्तिः, श्रुतार्थापत्तिश्च । गवय में जो गोसादृश्य का ज्ञान अर्थात् 'यह गवय रूप पिण्ड संसार के और सभी पिण्डों से भिन्न (स्वतन्त्र जीव) है' इस प्रकार का ज्ञान भी (उपमान से उत्पन्न न होकर) प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ही उत्पन्न होता है । एवं 'गवय रूप यही अर्थ गवय शब्द रूप संज्ञा का संज्ञी (वाच्य) है' इस प्रकार संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध का जो अनुसन्धान होता है, वह भी स्मरण ही है (उपमान नहीं); क्योंकि 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्य के द्वारा पहले उत्पन्न ग्रहणरूप संस्कार से ही इसकी उत्पत्ति होती है । यह संस्कार उक्त सादृश्यज्ञान से ही उद्बुद्ध होता है । जैसे कि किसी एक ही घट व्यक्ति में घट पद का सङ्केत सामान्य रूप से गृहीत होने पर भी उससे उत्पन्न संस्कार के द्वारा दूसरे घट व्यक्ति में भी घट शब्द की वाच्यता का इस आकार का अनुसन्धान होता है कि 'इस व्यक्ति में जिस घटवाच्यता को मैं समझ रहा हूँ, उसको मैं पहले जान चुका हूँ । इन सभी उपपत्तियों से यह सिद्ध होता है कि उपमान नाम का कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है । शब्द या और किसी प्रमाण के द्वारा निश्चित अर्थ की उपपत्ति जिस दूसरे अर्थ की कल्पना के विना न हो सके, उस दूसरे अर्थ को ही 'अर्थापत्ति' कहते हैं । इस लक्षण में ('शब्द प्रमाण के द्वारा' इस अर्थ के बोधक) 'श्रुत' पद का स्वतन्त्र रूप से साफल्य का उपपादन करते हुए मेरे प्रतिपक्षियों (मीमांसकों) ने (१) दृष्टार्थापत्ति और (२) श्रुतार्थापत्ति इसके ये दो भेद किये हैं ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३५ न्यायकन्दली यत्रार्थोऽन्यथानुपपद्यमानोऽर्थान्तरं गमयति, सा दृष्टार्थापत्तिः । यथा जीवति चैत्रे गृहे नास्तीत्यत्राभावप्रमाणे गृहे चैत्रस्याभावः प्रतीतो जीवतीति श्रुतेश्च तत्र सम्भवोऽपि प्रतीयते, जीवतो गृहावस्थानोपलम्भात् । न नैकस्य युगपदेकत्र भावाभावसम्भवः, तयोः सहावस्थानविरोधात् । तदयमभावः प्रतीयमानो जीवतीति श्रवणान्नोपपद्यते, यद्ययं बहिर्न भवतीति । अनुपपद्यमानश्च यस्मिन् सति उपपद्यते तत्कल्पयति । जीवतो गृहाभावोऽ- ऽन्यथा नोपपद्यते । यद्ययं बहिर्न भवतीति जीवतीत्यनेन सह विरोध एव तस्यानुपपत्तिः । सा चैत्रस्य बहिर्भावे प्रतीते निवर्तते । चैत्रो जीवति गृहे च नास्ति बहिःसद्भावादिति सावकाशनिरवकाशयोः प्रमाणयोर्विरोधे सति निरवकाशस्यानुपपत्तिमुखेन सावकाशस्य विषयान्तरोपपादनात् तयोर्विरोधसाधनमर्थापत्तिः । या पुनर्देशादिनियतस्य सम्बन्धिनो दर्शनात् सम्बन्धस्मरणद्वारेण सम्बन्ध्यन्तरप्रतीतिः सानुमानमित्यनयोर्भेदो ज्ञानोदय- प्रकारभेदात् । जहाँ प्रकृत अर्थ अनुपपन्न होकर दूसरे अर्थ का ज्ञापक होता है वहाँ 'दृष्टार्थापत्ति' समझनी चाहिए । जैसे 'जीवति चैत्रो गृहे नास्ति' (चैत्र जीते हैं किन्तु घर में नहीं हैं) इस स्थल में जीवित रहने के कारण चैत्र के घर में रहने की सम्भावना की भी प्रतीति होती है; क्योंकि जीवित व्यक्ति घर में भी देखे जाते हैं । एवं अनुपलब्धि रूप अभाव प्रमाण से घर में चैत्र का अभाव भी निश्चित है; किन्तु एक ही समय चैत्र का घर में रहना और न रहना दोनों सम्भव नहीं है; क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय सत्ता और असत्ता दोनों का रहना परस्पर विरोध के कारण सम्भव नहीं है । अतः अभाव प्रमाण के द्वारा चैत्र के घर में न रहने की जो प्रतीति होती है, वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि चैत्र का घर से बाहर रहना निश्चित न हो । जिसकी अनुपपत्ति होती है, वह ऐसी ही किसी वस्तु की कल्पना करता है, जिससे कि उसकी उपपत्ति हो सके । जीते हुए का घर में न रहना अन्याथानुपपन्न है, अर्थात् यदि वह बाहर नहीं रहता है तो ठीक नहीं बैठता । 'जीवति' के साथ 'गृहे नास्ति' का यह 'विरोध' ही उसकी 'अनुपपत्ति' है । यह अनुपपत्ति तब हटती है जब कि चैत्र के इस प्रकार से बाहर रहने की प्रतीति होती है कि 'चैत्र घर में नहीं रहने पर भी बाहर है; क्योंकि वह जीवित है' (इससे अर्थापत्ति का यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ कि) एक सावकाश प्रमाण के साथ दूसरे निरवकाश प्रमाण का विरोध उपस्थित होने पर निरवकाश प्रमाण की अनुपपत्ति के प्रदर्शन के द्वारा सावकाश प्रमाण को दूसरे विषय का ज्ञापक मानकर उक्त दोनों प्रमाणों में अविरोध का सम्पादन ही 'अर्थापत्ति' है । एक देश या एक काल में नियमित रूप से रहनेवाले दो सम्बन्धियों में से एक को देखने से उनके (नियम या व्याप्ति रूप) सम्बन्ध की स्मृति के द्वारा जो दूसरे सम्बन्धी की प्रतीति होती है, वही अनुमान (या अनुमिति) है । इस प्रकार चूँकि अनुमान और अर्थापत्ति इन दोनों प्रमाणों से ज्ञान की उत्पत्ति की
५३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव- न्यायकन्दली यथोक्तम्- अन्वयाधीनजन्मत्वमनुमाने व्यवस्थितम् । अर्थापत्तिरियं त्वन्या व्यतिरेकप्रवर्तिनी ॥ इति । श्रुतार्थापत्तिरपि यत्रानुपपद्यमानः शब्दः शब्दान्तरं कल्पयति, यथा 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्याद् रात्रौ भुङ्क्त इति वाक्यैकदेशकल्पना । तत्र दृष्टार्थापत्तिं तावदनुमानेऽन्तर्भावयति-दर्शनार्थार्थापत्तिर्विरोध्येवेति । दृश्यत इति दर्शनम्, दर्शनं च तदर्थश्चेति दर्शनार्थः, पञ्चभिः प्रमाणैरवगतोऽर्थः । तस्माद् दर्शनार्थादर्थान्तरस्यापत्तिरर्थान्तरस्यावगतिर्विरोध्येव, विरोध्यनुमानमेव । यस्य यथा नियमस्तस्य तथैव लिङ्गत्वम्, इह तु प्रमाणान्तरविरुद्ध एवार्थोऽर्थान्तराविनाभूत इति विरोध्येव लिङ्गम् । अयमभिप्रायः-गृहाभावो यद्यनुपपत्तिमात्रेण बहिर्भावं कल्पयति, नियमहेतोरभावाद् अर्थान्तरमपि कल्पयेत् । स्वोपपत्तये गृहाभावोऽर्थान्तरं रीतियाँ भिन्न हैं, अतः ये दोनों दो भिन्न प्रमाण हैं । (अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति की रीति दिखलायी जा चुकी है) जैसा कहा गया है कि- यह निश्चित है कि अन्वय (व्याप्ति) के द्वारा अनुमान प्रमाण अपने फल रूप ज्ञान का उत्पादन करता है, अतः व्यतिरेक (व्याप्ति) के द्वारा अपने ज्ञान को उत्पन्न करनेवाला अर्थापत्ति प्रमाण अनुमान से भिन्न है । जहाँ शब्द अनुपपन्न होकर दूसरे शब्द की कल्पना करता है, वहाँ 'श्रुतार्था- पत्ति' समझनी चाहिए । जैसे कि 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' (यह मोटा तो है, किन्तु दिन में भोजन नहीं करता है) इस वाक्य के द्वारा 'रात्रौ भुङ्क्ते' (तो फिर रात में खाता है) इस वाक्यखण्ड का कल्पक होता है । 'दर्शनार्थार्थापत्तिर्विरोध्येव' इस वाक्य के द्वारा कथित 'दृष्टार्थापत्ति' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं । इस भाष्य में प्रयुक्त 'दर्शनार्थ' शब्द की अभीष्ट व्युत्पत्ति इस प्रकार है, "दृश्यत इति दर्शनम्, दर्शनञ्च तदर्थश्च दर्शनार्थः" तदनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि (अभाव) इन पाँच प्रमाणों में से किसी के द्वारा निश्चित अर्थ ही उक्त 'दर्शनार्थ' शब्द से अभिप्रेत है । इस 'दर्शनार्थ' अर्थात् कथित पाँच प्रमाणों में से किसी के द्वारा अवगत अर्थ से जो दूसरे अर्थ की 'आपत्ति' अवगति होती है, वह 'विरोधी' ही अर्थात् विरोधी अनुमान ही है । हेतु में साध्य का जिस प्रकार का नियम रहेगा, उसी प्रकार से हेतु में साध्य की ज्ञापकता (हेतुता) भी होगी । यहाँ (अर्थापत्ति स्थल में) दूसरे प्रमाण से विरुद्ध अर्थ ही दूसरे अर्थ की व्याप्ति से युक्त है । अतः यहाँ विरोधी ही हेतु है । कहने का अभिप्राय यह है कि चैत्र का घर में न रहना (गृहाभाव) यदि केवल अपनी अनुपपत्ति से ही उसके बहिर्भाव (बाहर रहने) की कल्पना करे तो फिर वह तुल्ययुक्ति से दूसरे की भी कल्पना कर सकता है; क्योंकि ऐसे नियम का कोई कारण नहीं है कि वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करे और किसी की नहीं ।
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ५३७
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ५३७ न्यायकन्दली कल्पयति, अन्यस्मिन् कल्पिते च न तस्योपपत्तिरिति चेत् ? बहिर्भावे सति तस्यो- पपत्तिरिति केन तत् कथितम् ? वयं तु ब्रूमो बहिर्भावेऽपि सति गृहाभावस्यानुपपत्तिरेव । दृष्टमेतद् अव्यापकं द्रव्यमेकत्रास्ति तदन्यत्र नास्तीति । यथा प्राचीप्रतीच्योरेकत्रोपलभ्यमानः सविताऽन्यत्र न भवतीति, इदं दर्शनबलेनैवावधार्यते जीवतो गृहाभावो बहिर्भावे सत्युपपद्यते नान्यथेति । नन्वेवमन्वयव्याप्तिपूर्वकैव तथोपपत्त्यवगतिः ? तथा सति चार्थापत्तिरनुमानमेव, अन्वयाधीनजन्यत्वात् । यत्तु विरोधे सति प्रवर्तत इति तद् वैधर्म्यमात्रम् । तथा चात्र प्रयोगः-देवदत्तो बहिरस्ति, जीवनसम्बन्धित्वे सति गृहेऽनु- पलभ्यमानत्वात्, अहमिवेति । श्रुतार्थापत्तिमन्तर्भावयति-श्रवणादनुमितस्यानुमानमिति । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्यश्रवणाद् रात्रिभोजनकल्पना 'अनुमितस्यानुमानम्' । लिङ्गभूतेन वाक्येनानुमितात् पीनत्वात् तत्कारणस्य रात्रिभोजनस्यानुमानात् । (प्र.) चैत्र का गृह में न रहना (गृहाभाव) अपनी उपपत्ति के लिए ही दूसरे अर्थ की कल्पना करता है, यह काम चैत्र के बहिर्भाव रूप दूसरे अर्थ की कल्पना से ही सम्भव है और किसी दूसरे अर्थ की कल्पना से नहीं। अतः वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करता है, किसी और अर्थ की नहीं । (उ.) यह आपसे किसने कहा कि चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर लेने से ही चैत्र के घर में न रहने की उपपत्ति हो जाएगी ? यदि हम यह कहें कि जीवित चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर भी ली जाय, तो भी चैत्र का घर में न रहना अनुपपन्न ही रहेगा। यदि इसका यह उत्तर दें कि (प्र.) (व्यापक आकाशादि को छोड़कर) जितने भी अव्यापक (मूर्त्त) द्रव्य हैं, उनको देखते हैं कि एक समय यदि एक आश्रय में रहते हैं तो दूसरे में नहीं । जैसे कि पूर्वदिशा और पश्चिमदिशा इन दोनों में से किसी एक में जिस समय सूर्य की उपलब्धि होती है, उस समय वे दूसरी दिशा में नहीं रहते । इसी से यह समझते हैं कि जीवित चैत्र का घर में न रहना, चैत्र के बाहर रहने से ही उपपन्न हो सकता है । (उ.) यदि ऐसी बात है तो फिर चैत्र के बहिर्भाव में उसके गृह में न रहने की अन्वयव्याप्ति से ही अर्थापत्ति होती है । इससे यह सिद्ध होता है कि चूँकि अर्थापत्ति की उत्पत्ति अन्वयव्याप्ति से होती है, अतः वह अनुमान ही है । यह (अर्थापत्ति रूप अनुमान) जो विरोध के कारण अपने कार्य में प्रवृत्त होता है, इससे और अनुमानों से इसकी विचित्रता ही केवल व्यक्त होती है, (इससे इसका अनुमान न होना निश्चित नहीं होता) । प्रकृत में अनुमान का यह प्रयोग इष्ट है कि जैसे कि 'जीवन सम्बन्ध से युक्त मैं घर में न रहने पर बाहर अवश्य रहता हूँ' उसी प्रकार जीवन के सम्बन्ध से युक्त देवदत्त घर में अनुपलब्ध होने के कारण अवश्य ही बाहर है। 'श्रवणादनुमितस्यानुमानम्' इस वाक्य के द्वारा 'श्रुतार्थापत्ति' को अनुमान में अन्तर्भूत करते हैं । 'श्रवणात्' अर्थात् 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य को सुनने से जो
५३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव- न्यायकन्दली इदमत्राकूतम्-अर्थप्रतिपादकत्वं प्रमाणास्यानुपपत्तिः । 'दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्यं च स्वार्थं बोधयत्येव, का तस्यानुपपन्नता ? पीनत्वं भोजनकार्यं दिवाऽभोजने सति नोप- पद्यते, कारणाभावात् । तदनुपपत्तौ च वाक्यमप्यनुपपन्नम्, अनन्वितार्थत्वादिति चेत् ? तर्ह्यर्थानुपपत्तिर्वाक्यस्यानुपपन्नत्वमर्थोपपत्तिश्चोपपन्नत्वम्, न तस्य स्वरूपेणोपपत्त्यनुपपत्ती । दिवा न भुञ्जानस्य पीनत्वलक्षणस्यार्थो भोजनकार्यत्वाद् रात्रिभोजनरूपेणार्थेनोपपद्यते, न रात्रिभोजनवाक्येनेत्यर्थस्यानुपपत्त्या तस्य तद्वाक्यस्य चोपपत्तिहेतुरर्थ एवार्थनीयो न वाक्यम्, अनुपपादकत्वात् । उपपद्यमानश्चार्थोऽर्थेनैवावगम्यते, दिवा भोजनरहितस्य पीनत्वस्य रात्रि- भोजनकार्यत्वाव्यभिचारादिति नास्त्यर्थापत्तिः शब्दगोचरा । देवदत्त के रात्रिभोजन की कल्पना होती है वह भी 'अनुमितानुमान' ही है । अर्थात् 'पीनः' इस वाक्य रूप लिङ्ग (हेतु) से अनुमित पीनत्व (मोटाई) के द्वारा पीनत्व के कारणीभूत रात्रि-भोजन का वहाँ भी अनुमान ही होता है । गूढ़ अभिप्राय यह है कि अपने अर्थ को यथार्थ रूप से न समझा पाना ही प्रमाणों की अनुपपत्ति है । 'दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य का अर्थ है दिन में अभोजन, इस अर्थ का ज्ञापन तो वह अवश्य ही करता है, फिर उसमें किस प्रकार की अनुपपत्ति है ? (प्र.) भोजन से उत्पन्न होनेवाला पीनत्वरूप कार्य ही दिन को भोजन न करने से अनुपपन्न होता है; क्योंकि पीनत्व का कारण वही नहीं है । पीनत्व रूप अर्थ की इस अनुपपत्ति से ही 'पीनः' इत्यादि वाक्य अनुपपन्न होता है; क्योंकि (योग्यता न रहने के कारण) उसका अन्वय नहीं हो पाता है । (उ.) तो फिर यह कहिए कि अर्थ की अनुपपत्ति ही वाक्य की अनुपपत्ति है और अर्थ की उपपत्ति ही उसकी उपपत्ति है, वाक्य स्वतन्त्र रूप से उपपन्न या अनुपपन्न नहीं होता । दिन को भोजन न करनेवाले (देवदत्त) में रहनेवाली पीनता भी भोजन से ही उत्पन्न हो सकती है, अतः प्रकृत में रात्रिभोजन रूप अर्थ से ही उसकी उपपत्ति होती है, 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस रात्रिभोजन वाक्य से नहीं । चूँकि पीनत्व रूप अर्थ की अनुपपत्ति से ही रात्रि-भोजन रूप अर्थ और उसका बोधक 'रात्रौ भुङ्क्ते' यह वाक्य दोनों की ही उपपत्ति होती है, 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य से इसकी उपपत्ति नहीं होती है, अतः इनके लिए 'रात्रिभोजन' रूप अर्थ की कल्पना ही आवश्यक है, 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य की कल्पना आवश्यक नहीं है । उपपन्न होनेवाला 'अर्थ' (अपने व्याप्त) दूसरे अर्थ से ही उपपन्न होता है; (इस नियम के अनुसार) चूँकि दिन में भोजन न करनेवाले देवदत्त की पीनता की व्याप्ति रात्रि-भोजन रूप कार्य के साथ है, अतः दिन को न खानेवाले की पीनता रूप अर्थ की उपपत्ति रात्रि भोजन रूप अर्थ से ही होती है, तस्मात् कोई भी अर्थापत्ति 'शब्द' विषयक नहीं है (अर्थात् श्रुतार्थापत्ति नाम की कोई वस्तु नहीं है) ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३९ न्यायकन्दली अथ मतम्-अर्थोऽर्थेनैवोपपद्यत इति तदुपपत्तयैव तच्छब्दस्याप्युपपन्नता, किन्तु शाब्दोऽर्थः शाब्देनैवार्थेनोपपद्यते, प्रमाणान्तरावगतस्य तेन सहान्वयाभावात् । न हि पचतीत्युक्ते क्रियायाः कर्मणा विनानुपपत्तिः पच्यमानस्य कलायस्य प्रत्यक्षेणोप- शाम्यति, तस्मिन् सत्यपि किं पचतीत्याकाङ्क्षाया अनिवृत्तेः। शब्दोपनीते तु कर्मणि निर्विचिकित्सः प्रत्ययो भवति 'शाकं पचति कलायं पचति' इति । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इत्यपि वाक्यार्थानुपपत्तिरियम्, तस्मादस्यापि शाब्देनैवार्थेनोपशान्तिर्भवि- ष्यतीति प्रथममर्थापत्त्या रात्रिभोजनप्रतिपादकं वाक्यमेवार्थनीयम्, अन्यथा दिवावाक्य- पदार्थैः सह रात्रिभोजनस्यानन्वयाभावात् । वाक्यविषये चार्थापत्तिपर्यवसाने रात्रिभोजन- मर्थो नार्थापत्तिविषयतामेति, तस्य वाक्यदेवावगमात् । न चैतद्वाच्यम्, दिवा- यदि यह कहें कि (प्र.) यह तो ठीक है कि एक अर्थ की उपपत्ति उससे नियत दूसरे अर्थ से ही होती है एवं अर्थ की उपपत्ति से ही तद्बोधक शब्द की भी उपपत्ति होती है; किन्तु इतना अन्तर है कि शब्द के द्वारा उपस्थित अर्थ की अनुपपन्नता शब्द के द्वारा उपस्थित दूसरे अर्थ से ही निवृत्त की जा सकती है; क्योंकि शब्द से भिन्न अन्य प्रमाणों के द्वारा उपस्थित अर्थ का अन्वय शब्द प्रमाण के द्वारा उपस्थित अर्थ के साथ नहीं होता है । जैसे कि केवल 'पचति' पद के उच्चारण के बाद जो कर्म के बिना पाक क्रिया की अनुपपत्ति उपस्थित होती है, उसकी निवृत्ति प्रत्यक्ष के द्वारा पकते हुए मटर (कलाय) को देखकर भी नहीं होती । उसके प्रत्यक्ष के बाद भी 'किं पचति' यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । 'कलायम्' 'शाकम्' इत्यादि पदों के प्रयोग के बाद जब इन शब्दों से कलाय या शाक रूप कर्म उपस्थित हो जाता है, तभी 'कलाय पक रहा है' या 'शाक पक रहा है' इत्यादि आकार के निश्चयात्मक बोध होते हैं । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' यहाँ वाक्य के द्वारा उपस्थित अर्थ की ही अनुपपत्ति है, अतः 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य के द्वारा उपस्थित किये हुए रात्रि-भोजन रूप अर्थ से ही उसकी निवृत्ति हो सकती है (दूसरे प्रमाणों के द्वारा उपस्थित किये हुए रात्रि-भोजन रूप अर्थ से नहीं)। अतः प्रकृत में अर्थापत्ति से रात्रि-भोजन के बोधक 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य की ही कल्पना करनी होगी । ऐसा न करने पर (अर्थापत्ति के द्वारा सीधे रात्रि-भोजन रूप अर्थ की ही कल्पना करने पर) 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस (दिवा) वाक्य के द्वारा उपस्थित पदार्थों के साथ (दूसरे प्रमाण के द्वारा उपस्थित) रात्रि-भोजन रूप अर्थ का अन्वय नहीं हो सकेगा । (उ.) जब प्रकृत श्रुतार्थापत्ति की विषयता केवल वाक्य के द्वारा उपस्थित अर्थ में नियत हो जाती है, तो फिर रात्रि-भोजन रूप अर्थ अर्थापत्ति प्रमाण से ग्राह्य ही नहीं रह जाता; क्योंकि (अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस) वाक्य रूप शब्द प्रमाण से ही उसकी अवगति हो जायेगी । यह कहना भी उचित नहीं है कि (प्र.) 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' यह वाक्य और इस वाक्य के अर्थ दोनों में से किसी का भी 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य के साथ कोई नियत सम्बन्ध नहीं हैं, अतः इनमें से किसी के द्वारा
५४०) न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव- न्यायकन्दली वाक्यस्य तदर्थस्य वा रात्रिवाक्येन सह प्रत्यासत्त्यभावान्न ताभ्यां तदुपस्थापनमिति, अर्थ- प्रत्यासत्तिद्वारेण वाक्यस्यापि प्रत्यासन्नत्वात् । न चार्थार्थापत्तावनुमानवत् प्रत्यासत्तिरपेक्षते, तस्या अनुपपत्तिमात्रेणैव प्रवृत्तेः । तदुक्तम्- न चार्थेनार्थ एवार्थं द्वितीयो गम्यते पुनः । सविकल्पकविज्ञानग्राह्यात्यावृत्तिरोहितः ॥ शब्दान्तराण्युबुद्ध्याऽसामर्थ्यमेवावगच्छति । तेनैषां प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचराः । वाक्यमेव तु वाक्यार्थं गत्वाऽथ गमयिष्यति' ॥ इति । 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य की उपस्थिति नहीं हो सकती । (उ.) चूँकि 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य के अर्थ के साथ 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य के अर्थ का नियत सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध के द्वारा ही 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य के साथ भी 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य का नियत सम्बन्ध अवश्य है । (दूसरी बात है कि) अर्थापत्ति को अपने प्रमेय में प्रवृत्त होने के लिए अनुमान की तरह नियत सम्बन्ध की अपेक्षा भी नहीं होती है, उसका काम अर्थानुपपत्ति से ही चल जाता है । जैसा कहा गया है कि - (१) 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य से भोजन न करने वाले देवदत्त की पीनता का शाब्दबोध रूप सविकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है (इस सविकल्पक ज्ञान में विषयीभूत दिन में न खानेवाले देवदत्त की मोटाई रूप प्रथम) अर्थ के द्वारा (रात्रि-भोजन रूप) द्वितीय अर्थ ज्ञात नहीं होता है; क्योंकि वह (रात्रि-भोजन रूप द्वितीय अर्थ) 'वृत्तिरोहित' नहीं है, अर्थात् किसी शब्द से (अभिधादि)' 'वृत्ति' के द्वारा उपस्थित नहीं है । (२) अतः 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य को सुनने के बाद 'रात्रि-भोजन' रूप दूसरे अर्थ को समझानेवाले 'रात्रौ भुङ्क्ते' इत्यादि किसी दूसरे शब्द को न सुनकर (समझनेवाला पुरुष) इतना ही समझता है कि 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य में रात्रि-भोजन रूप अर्थ को समझाने का सामर्थ्य नहीं है । (३) अतः (श्रुतार्थापत्ति स्थल में) अर्थापत्ति के द्वारा पहले 'रात्रौ भुङ्क्ते' इत्यादि वाक्यों का ही बोध होता है । इसके बाद अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञात 'रात्रौ भुङ्क्ते' यह वाक्य ही रात्रि-भोजन रूप अर्थविषयक बोध को उत्पन्न करेगा ।
- उपक्रम और उपसंहार की दृष्टि से इन श्लोकों का यथाश्रुत पाठ ठीक नहीं जँचता । इन श्लोकों का निम्नलिखित स्वरूप का होना उचित जान पड़ता है, तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । न चार्थे नार्थ एवार्थं द्वितीयो गम्यते पुनः । स विकल्पकविज्ञानग्राह्योनावृत्तिरोहितः ।। शब्दान्तराणेयबुद्ध्वाऽसामर्थ्यमेवावगच्छति । तेनैषा प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचरा ।। वाक्यमेव तु वाक्यार्थ गत्वाऽद् गमयिष्यति ।।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४१ न्यायकन्दली अत्रोच्यते-पदानि वाक्यार्थप्रतिपादनाय प्रयुज्यन्ते । तानि प्रत्येकं पदार्थसंस्पर्शा- त्मकं वाक्यार्थं प्रतिपादयितुमशक्नुवन्त्यपर्यवसितव्यापारत्वाद् एकार्थकारिणी पदान्तराण्य- पेक्षन्ते । यत्र पुनरमीभिर्वाक्यार्थः प्रतिपादितः, तत्रैषां शब्दान्तरापेक्षा नास्त्येव, स्वव्या- पारस्य कृतत्वात् । यस्तेरूपपादितोऽर्थः स नोपपद्यत इति चेत् । नोपपादि, न ह्यर्थस्याविरोधोपपादनमपि शब्दस्य व्यापारः, किन्तु प्रतिपादनम् । तच्चानेनासन्नि- हितेऽपि रात्रिवाक्ये कृतमेव । प्रतीयते हि दिवाऽभोजनवाक्यात् पीनस्याभोजनम्, निःसन्दिग्धाऽभ्रान्ता चात्रेयं प्रतीतिः, अन्यथाऽर्थापत्तेरपि प्रवृत्त्यभावात् । निश्चितस्यैव हि पीनस्य दिवाऽभोजनप्रमाणसिद्धस्यानुपपत्तिर्न युक्तेति तदुपपादनमर्थ्यते, सन्दिग्धे विपरीतत्वेन चावधारिते तस्मिन् कस्योपपत्तयेऽर्थान्तरकल्पना स्यात् ? न चार्थयोः पर- इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि वाक्य के अर्थ को समझाने के लिए ही पदों का प्रयोग किया जाता है । वाक्य में प्रयुक्त होनेवाले पदों के अर्थ ही परस्पर उपयुक्त सम्बन्ध से युक्त होकर 'वाक्यार्थ' कहलाते हैं । इस विशिष्ट वाक्यार्थ को कोई एक पद नहीं समझा सकता; क्योंकि पदों में केवल अपने-अपने ही अर्थ को समझाने का सामर्थ्य होता है । अतः एक पद अपने अर्थ के साथ और अर्थों के सम्बन्ध के लिए दूसरे पदों की अपेक्षा रखता है । जहाँ जितने ही पदों से वाक्यार्थविषयक बोध का सम्पादन हो जाता है, वहाँ उनसे भिन्न पदों की अपेक्षा नहीं होती है । इन पदों के द्वारा उपस्थित अर्थ में यदि अनुपपन्नता या विरोध है तो इसको छुड़ाने का दायित्व पदों पर नहीं है; क्योंकि अपने-अपने अर्थों का प्रतिपादन करना ही पदों का काम है, उनके विरोध को मिटाना नहीं । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' यह वाक्य 'रात्रौ भुङ्क्ते' इस वाक्य का सान्निध्य न पाने पर भी दिन को भोजन न करनेवाले में पीनत्व रूप अपने अर्थ का बोध रूप काम तो कर ही दिया है; क्योंकि 'दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य से दिन में भोजन न करनेवाले में पीनत्व की अभ्रान्त एवं निःसन्दिग्ध प्रतीति हो जाती है । यदि 'दिवा' वाक्य से दिन को भोजन न करनेवाले में पीनत्व की अभ्रान्त और निःशङ्क प्रतीति न हो तो फिर आगे उससे अर्थापत्ति की प्रवृत्ति भी क्योंकर होगी ? दिन में न खाने पर भी देवदत्त में निश्चित पीनत्व की उपपत्ति ठीक नहीं बैठती है, उसकी उपपत्ति के लिए ही उसको प्रमाण सिद्ध रूप में समझाना आवश्यक होता है । दिन को न खाने पर भी देवदत्त में जो पीनता है, वह यदि इस स्थिति में सन्दिग्ध या विपरीत ही हो तो फिर उसकी उपपत्ति ही अपेक्षित नहीं है । अतः किसकी उपपत्ति के लिए रात्रि-भोजन रूप दूसरे अर्थ की कल्पना आवश्यक होगी ? किन्हीं दो अर्थों में परस्पर विरोध है, केवल इसीलिए 'उनकी प्रतीति ही नहीं होती' यह कहना
५४२ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् गुणेऽनुमानेऽभावप्रमाणान्तर्भाव- प्रशस्तपादभाष्यम् सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव । अभावोऽप्यनुमानमेव, यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम्, 'सम्भव' प्रमाण से भी व्याप्ति के द्वारा ही अर्थ का बोध होता है, अतः वह भी अनुमान ही है । अभाव प्रमाण भी अनुमान के ही अन्तर्गत है; क्योंकि जिस प्रकार न्यायकन्दली स्परविरोध इति तयोः प्रतीतिरप्रतीतिर्भवति । तस्मादर्थप्रतीतौ यवोपन्नः शब्दो न शब्दान्तरमपेक्षते, कर्तव्यतान्तराभावात् । अर्थ एव तु तेनाभिहितोऽर्थान्तरेण विनानुपपद्यमानः प्रतीत्यनुसारेण स्योपपत्तये मृगयतीत्यव्याहतं शब्दश्रवणादनुमितानुमान- मिति । शतं सहस्रे सम्भवतीति सम्भवाख्यात् प्रमाणान्तरात् सहस्रेण शतज्ञानमिति केचित् । तन्निरासार्थमाह-सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव । सहस्रं शतेनाविनाभूतम्, तत्पूर्व- कत्वात् । तेन सहस्राच्छतज्ञानमनुमानमेव । प्रमेयाभावप्रतीतौ भावग्राहकप्रत्यक्षादिपञ्चप्रमाणानुवृत्तिरभावाख्यं प्रमाणान्तरं कैश्चिदिष्टम् । तद् व्युदस्यति-अभावोऽप्यनुमानमेव । कथमित्यत ठीक नहीं है । अतः 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इत्यादि शब्द यदि दिन में न खानेवाले में 'पीनत्वादि' रूप अपने अर्थ को अभ्रान्त और निःशङ्क रूप से समझा देते हैं, तो फिर वे अपना कर्त्तव्य कर ही लेते हैं; क्योंकि उन शब्दों का उन अर्थों को समझाना छोड़कर दूसरा कोई कर्त्तव्य नहीं है । अपने इस कार्य के सम्पादन के लिए उन्हें 'रात्रौ भुङ्क्ते' इत्यादि किसी दूसरे शब्द की अपेक्षा नहीं है । तस्मात् दिन में न खानेवाले की पीनता रूप अर्थ ही रात्रि-भोजन रूप दूसरे अर्थ के बिना अनुपपन्न होकर अपनी उपपत्ति के लिए उस दूसरे अर्थ की खोज करता है, अतः 'दिवा न भुङ्क्ते' इस शब्द के श्रवण के बाद जो रात्रि-भोजन रूप अर्थ का बोध होता है, वह 'अनुमितानुमान' ही है । इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है । 'हजार में सौ के रहने की सम्भावना है' इस प्रकार के सम्भव नाम के स्वतन्त्र प्रमाण से ही कोई सम्प्रदाय सहस्र संख्या से सौ संख्या का ज्ञान मानते हैं । उनका खण्डन करने के लिए ही 'सम्भवोऽप्यविनाभावादनुमानमेव' यह वाक्य लिखा गया है । अभिप्राय यह है कि सहस्र में सौ की व्याप्ति रूप सम्बन्ध है । इस व्याप्ति रूप सम्बन्ध के द्वारा ही उक्त ज्ञान होता है, अतः सहस्र संख्या से जो शत संख्या का ज्ञान होता है, वह भी अनुमान ही है । किसी सम्प्रदाय के लोग किसी वस्तु के अभाव की प्रतीति के लिए एक 'अभाव' नाम का और प्रमाण मानते हैं । एवं इस अभाव को भाव पदार्थों के ग्राहक प्रत्यक्षादि पाँच
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४३ प्रशस्तपादभाष्यम् एवमनुत्पन्नं कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम् । उत्पन्न कार्य अपने कारण की सत्ता का ज्ञापक हेतु है, उसी प्रकार अनुत्पन्न कार्य भी अपने कारण की असत्ता का ज्ञापक हेतु ही हैं । न्यायकन्दली आह-यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम्, एवमनुत्पन्नं कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम् । योऽप्यभावं प्रमाणमिच्छति, तस्यापि न ज्ञानानुत्पादमात्रात् प्रमेयाभावज्ञानम्, स्वरूप- विप्रकृष्टस्यापि वस्तुनोऽभावप्रतीतिप्रसङ्गात् । किन्तु ज्ञानकारणेषु सत्सु ज्ञानयोग्यस्य वस्तुनो ज्ञानानुत्पादोऽभावावगमनिमित्तम्। न चायोग्यानुपलम्भाद् योग्यानुपलम्भस्य कश्चित् स्वरूपतो विशेषः, अभावस्य निरतिशयत्वात्। तेन नायं स्वशक्त्यैवेन्द्रियवद् बोधकः, किन्तु योग्यानुपलम्भो ज्ञेयाभावं न व्यभिचरति। अयोग्यानुपलम्भस्तु व्यभिचरति, सत्यपि ज्ञेये तस्य प्रमाणों की अनुत्पत्ति रूप कहते हैं, उनके इस मत का खण्डन ही 'अभावोऽप्यनुमानमेव' इत्यादि भाष्यसन्दर्भ के द्वारा किया गया है । किस युक्ति से यह अभाव नाम का प्रमाण मानते हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर 'यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गमवमनुत्पन्नं कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम्' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । जो सम्प्रदाय उक्त अभाव को स्वतन्त्र प्रमाण मानने को इच्छुक हैं, उन्हें भी ज्ञान की केवल अनुत्पत्ति से ही किसी वस्तु के अभाव का ज्ञान नहीं होता, यदि ऐसी बात हो तो उन वस्तुओं के अभावों की भी प्रतीति की आपत्ति होगी, जिन वस्तुओं में प्रत्यक्ष की योग्यता नहीं है । अतः (उन्हें भी) यही कहना पड़ेगा कि ज्ञान के (सामान्य) कारणों के रहने पर ज्ञात होने योग्य वस्तुओं के ज्ञान की अनुत्पत्ति ही उन वस्तुओं के अभाव का ज्ञापक 'अभाव' नाम का प्रमाण है । (उपलब्धि के) योग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि और (उपलब्धि के) अयोग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि इन दोनों के स्वरूपों में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिससे कि दोनों अनुपलब्धियों में भेद माना जाय; क्योंकि केवल अभाव रूप दोनों अनुपलब्धियों में कोई विशेष धर्म नहीं है । अतः अभाव (या प्रमाणों की कथित अनुत्पत्ति) उस प्रकार केवल अपनी ही शक्ति से अपने ज्ञेय अभाव के ज्ञान को उत्पन्न नहीं कर सकते, जिस प्रकार इन्द्रियाँ केवल अपनी शक्ति से ही प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न करती हैं । कथित अभाव प्रमाण से वस्तुओं के अभाव की प्रतीति की यह रीति है कि जिस वस्तु की जहाँ उपलब्धि हो सकती है, वहाँ यदि उसकी उपलब्धि नहीं होती है,
५४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावप्रमाणान्तर्भाव- न्यायकन्दली सम्भवात्, एतावता विशेषेण योग्यानुपलम्भः प्रतिपादको नापरः । एवं सत्यभावो लिङ्गमेव स्यादविनाभावग्रहणसापेक्षत्वात् । तदनपेक्षत्वे त्वविशेषेण तस्याभावस्याभाव- बोधकत्वमिति दुर्निवारणप्रसङ्गः । अपि चेन्द्रियसन्निकर्षादुपलभ्यमाने भूतलेऽभावज्ञानमपि भवति 'अघटं भूतलं' इति, तत्र भूतलस्येवाभावस्यापि प्रत्यक्षता किं नेष्यते ? भावांशेनैवेन्द्रियस्य सम्बन्धः, योग्यत्वादिति चेत् ? नेदमनुपपादितं सिध्यति । कार्यगम्या हि योग्यता, यथेन्द्रियान्वय व्यतिरेकानुविधायि कार्यं भावे दृश्यते, तद्वदभावेऽपीति भाववदभावोऽपि इन्द्रियग्रहण- योग्य एव । कार्यदर्शनादेव चास्येन्द्रियसम्बन्धोऽपि कश्चित् कल्पयिष्यते । तो समझते हैं कि वहाँ वह वस्तु नहीं है, इस प्रकार योग्यानुपलब्धि के साथ योग्य वस्तु के अभाव की व्याप्ति है, प्रत्यक्ष के अयोग्य वस्तुओं के अभाव के साथ उस वस्तु की अनुपलब्धि की व्याप्ति नहीं है, (अर्थात् व्यभिचार है); क्योंकि (अयोग्य पिशाचादि) ज्ञेयों के रहने पर भी उनकी उपलब्धि नहीं होती है; (अर्थात् अनुपलब्धि रहती है), इससे यह निष्कर्ष निकला कि योग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि ही उसके अभाव का ज्ञापक है, अयोग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि नहीं । अतः उक्त अभाव प्रमाण भी उक्त प्रमेयाभाव का ज्ञापक हेतु ही है; क्योंकि व्याप्ति के द्वारा ही उसका ज्ञापन कर सकता है, अन्यथा नहीं । यदि उसमें व्याप्ति की अपेक्षा न मानें तो सभी अभावों से सभी अभावों की प्रतीति की आपत्ति होगी, जिसका वारण करना सम्भव न होगा । दूसरी बात यह है कि इन्द्रिय के द्वारा भूतल के उपलब्ध होने पर ही 'अघटं भूतलं' इत्यादि आकारों से अभाव की प्रतीति भी होती है । यदि ऐसी बात है तो फिर भूतल की तरह उसमें विशेषण रूप से भासित होनेवाले घट के अभाव का इन्द्रिय के द्वारा प्रत्यक्ष ही क्यों नहीं मान लेते ? (प्र.) भाव पदार्थ ही इन्द्रियों से प्रकाशित होने की क्षमता रखते हैं, अतः (कल्पना करते हैं कि) भाव पदार्थों के साथ ही इन्द्रियों का (प्रत्यक्षोपयुक्त) सम्बन्ध हो सकता है । (उ.) ('भाव पदार्थों में इन्द्रियों के प्रत्यक्षोपयुक्त सम्बन्ध की योग्यता है' यह सिद्धान्त) युक्ति के द्वारा उपपादन किये बिना नहीं माना जा सकता । कार्य से ही कारण में कार्योत्पादन की योग्यता निर्धारित होती है । जिस प्रकार भाव पदार्थों के प्रत्यक्ष रूप कार्य के साथ इन्द्रियों का अन्वय और व्यतिरेक दोनों देखे जाते हैं, उसी प्रकार अभाव की उपलब्धि के साथ भी वे दोनों देखे जाते हैं, अतः भाव पदार्थों की तरह अभाव पदार्थों में भी इन्द्रियों से गृहीत होने की योग्यता है । इस प्रकार इन्द्रियों से अभाव के प्रत्यक्ष की उपपत्ति हो जाने पर अभाव पदार्थों के साथ भी इन्द्रियों के किसी उपयुक्त सम्बन्ध की कल्पना कर ली जाएगी ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५४५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५४५ न्यायकन्दली अथ मतम्-निरधिकरणो न कस्यचिदभावः प्रतीयते, देशादिनियमेन प्रवृत्ति- निवृत्तिदर्शनात् । यदधिकरणश्चायं प्रतीयते तस्य प्रतीताविन्द्रियव्यापारो नाभावग्रहणे, इन्द्रियव्यापारोपरमेऽप्यभावप्रतीतिदर्शनात् । तथा हि-कश्चित् स्वरूपेण देवकुलादिकं प्रतीत्य स्थानान्तरगतो देवकुले देवदत्तोऽस्ति नास्तीति केनचित् पृष्टस्तदानीमेव ज्ञातजिज्ञासो नास्तीति प्रतीत्याऽभावं व्यवहरति नास्तीति । न च पूर्वमेव देवकुलग्रहणसमये देवदत्ता- भावो निर्विकल्पेन गृहीतः, सम्प्रति स्मर्यमाण इति वाच्यम्, युक्तं घटादीनामिन्द्रियसन्नि- कर्षात्रिर्विकल्पेन ग्रहणम्, तेषां स्वरूपस्य परानपेक्षत्वात् । अभावस्य तु प्रतिषेध्यस्वभावस्य स्वरूपमेव यस्यायं (एव) प्रतिषेधः स्यात् तदधीनम्। अतस्तत्प्रतिषेधतामन्तरेण तदभावस्य स्वरूपान्तराभावात् । तत्रास्य प्रतियोगिस्वरूपनिरूपणमन्तरेण निरूपणम- इस प्रसङ्ग में अभाव को प्रमाण माननेवालों का कहना है कि नियमतः किसी विशेष देश में ही अभाव के प्रसङ्ग में प्रवृत्ति होती है, इससे यह सिद्ध होता है कि किसी अधिकरण में ही अभाव की प्रतीति होती है, अधिकरण को छोड़कर केवल अभाव की प्रतीति नहीं होती है । तदनुसार जिस अधिकरण में अभाव की प्रतीति होती है, उस अधिकरण की प्रतीति में ही इन्द्रिय का व्यापार अपेक्षित होगा । (प्र.) उस अधिकरण में भी अभाव की प्रतीति के लिए इन्द्रिय का व्यापार अपेक्षित नहीं है; क्योंकि इन्द्रियों के व्यापार के हट जाने पर भी अभाव की प्रतीति होती है । जैसे किसी पुरुष को किसी देवालय को देखने के बाद किसी दूसरे स्थान में जाने पर कोई पूछता है कि 'वहाँ देवदत्त है या नहीं, ? उसी समय उस पुरुष की जिज्ञासा को समझकर 'देवालय में देवदत्त नहीं है' इस प्रतीति के द्वारा वह पुरुष 'नास्ति' का व्यवहार (अर्थात् 'देवकुले देवदत्तो नास्ति' इस वाक्य का व्यवहार) करता है । (प्र.) देवालय के देखने के समय ही उसे वहाँ देवदत्त के अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान हो गया था । अभी वह उसी निर्विकल्पक ज्ञानजनित स्मृति के द्वारा देवदत्त के अभाव का व्यवहार करता है । (उ.) ऐसा कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान सम्भव ही नहीं है । घटादि पदार्थों का निर्विकल्पक ज्ञान इसलिए सम्भव होता है कि उनके ज्ञान के लिए प्रतियोगी प्रभृति किसी दूसरे पदार्थों को जानने की अपेक्षा नहीं होती है; किन्तु अभाव तो किसी भाव पदार्थ का प्रतिषेध रूप है, अतः उसको जानने के लिए उस भाव पदार्थ को भी जानना आवश्यक है, जिसका कि वह प्रतिषेध है; क्योंकि भाव के प्रतिषेध को छोड़कर अभाव का कोई दूसरा स्वरूप ही नहीं है । तस्मात् प्रतिषेध्य (प्रतियोगि) ज्ञान के बिना अभाव का ज्ञान सम्भव ही नहीं है । (अर्थात् अभाव का ज्ञान प्रतियोगी रूप विशेषण से युक्त होकर ही होगा, अतः अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान असम्भव है) । भाव और अभाव में यही अन्तर है कि भाव का अपने भावत्व रूप से ही
५४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव- न्यायकन्दली शक्यम् । अयमेव हि भावाभावयोर्विशेषो यदेकस्य विधिरूपतया ग्रहणम्, अपरस्य त्वन्यप्रतिषेधमुखेन । यदाह न्यायवार्त्तिककारः- "स्वतन्त्रपरतन्त्रोपलब्ध्यनुपलब्धिकारण- भावाच्च विशेषः, सत्तु खलु प्रमाणस्यालम्बनं स्वतन्त्रम्, असत्तु परतन्त्रमन्यप्रतिषेध- मुखेनेति" । यदि त्वभावस्यापि स्वातन्त्र्येण ग्रहणं तदा भावादविशेषः स्यात् । अतो नास्त्यभावस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणम् । यदपि विकल्पितं किं देवदत्तसङ्कीर्णस्य देवकुलस्य पूर्वं प्रतीति- रासीत् ? तद्विविक्तस्य वा ? सङ्कीर्णग्रहणे तावत् केवलस्य न स्मरणम् । विविक्तग्रहणे वाभावोऽगृहीत एव पश्चात् स्मर्यत इति प्राप्तम् । तदप्यसारम्, देवदत्तभावाभावयोरग्रहणेऽपि देवकुलस्य स्वरूपेण ग्रहणात् । तस्मान्न पूर्वमभाव- ग्रहणम्, तदभावान्न स्मृतिः, न च तदानीं प्रमाणान्तरमुपलभ्यते, तस्माद् व्यवहितेऽपि ग्रहण होता है; किन्तु अभाव का भाव के प्रतिषेध रूप से ग्रहण होता है । जैसा कि न्यायवार्त्तिककार उद्योतकर ने कहा है कि "भाव और अभाव में यही अन्तर है कि एक (भाव) स्वतन्त्र है और दूसरा (अभाव) परतन्त्र । एवं एक की सत्ता का उसकी अपनी उपलब्धि ही नियामक है और दूसरे की सत्ता के प्रतियोगी की अनुपलब्धि नियामक है । 'सत्' अर्थात् भाव पदार्थ प्रमाण के द्वारा स्वतन्त्र ही गृहीत होता है; किन्तु 'असत्' अर्थात् अभाव प्रतियोगी के प्रतिषेध रूप से, फलतः प्रतियोगी परतन्त्र होकर प्रमाण के द्वारा ज्ञात होता है" । यदि अभाव की भी स्वतन्त्र उपलब्धि ही हो तो भाव और अभाव दोनों में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा, फलतः दोनों अभिन्न हो जायेंगे । अतः निर्विकल्पक ज्ञान के अभाव का गृहीत होना सम्भव नहीं है । इस प्रसङ्ग में किसी ने जो यह विकल्प उपस्थित किया था कि पहले देवदत्त और देवालय (देवकुल) दोनों की साथ-साथ प्रतीति थी ? या देवदत्त से असम्पृक्त केवल देवकुल की ही प्रतीति थी ? यदि साथ-साथ प्रतीति मानें तो फिर केवल देवकुल का स्मरण नहीं होगा । (उस स्मृति में देवदत्त भी अवश्य ही भासित होगा, एवं देवदत्त के भासित होने पर उसके अभाव की प्रतीति असम्भव होगी) । यदि दूसरा पक्ष मानें तो (यह अनिष्टापत्ति होगी कि) पूर्व में अज्ञात ही देवकुल का स्मरण होता है । (उ.) इस विकल्प में भी कुछ सार नहीं है; क्योंकि देवदत्त या उनका अभाव, इन दोनों में से किसी का ग्रहण न होने पर भी देवकुल अपने देवकुलत्व स्वरूप के साथ ही वहाँ ज्ञात होता है । देवदत्त के अभाव का उस पुरुष को पहले सविकल्पक या निर्विकल्पक कोई भी ज्ञान नहीं था । अतः देवदत्त के अभाव की स्मृति भी उस पुरुष को नहीं हो सकती । उस समय देवदत्त के अभाव का ज्ञापक कोई दूसरा प्रमाण भी नहीं उपलब्ध होता है, अतः यही कहना पड़ेगा कि उस पुरुष को देवदत्त की सन्निधि
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४७ न्यायकदली प्रतियोगिनि स्मृत्यारूढेऽभावग्रहणाय प्रत्यक्षादिप्रमाणपञ्चकव्यावृत्तिरेव प्रमाणम् । एकत्र चाभावस्याभावपरिच्छेद्यत्वे सिद्धेऽन्यत्रापि तेनैव सेत्स्यतीति सिद्धमभावस्य प्रमाणान्तरत्वम् । अत्रोच्यते—देशान्तरं गतः केनचित् पृष्टो देवकुले देवदत्तस्येदानीन्तना- नुपलम्भेनेदानीन्तनाभावं प्रत्येति 'इदानीं नास्ति' इति ? किं वा प्राक्तनानुपलम्भेन प्राक्तनाभावं देवकुलग्रहणसमये नासीदिति ? इदानीन्तनानुपलब्धिस्तावद् योग्यानु- पलब्धिर्न भवति, देशव्यवधानात् । सम्प्रत्यभावो देवदत्तस्य सन्दिग्धः, आगमन- स्यापि सम्भवात् । प्राक्तनाभावपरिच्छेदयोग्या तु प्राक्तनानुपलब्धिर्नेदानी- मनुवर्तते, अवस्थान्तरप्राप्तेः । न चाविद्यमाना प्रतीतिकारणं भवितुमर्हति । न रहने पर भी प्रश्न-कर्त्ता के पूछने पर देवदत्त की स्मृति हो जाती है । स्मृति के द्वारा उपस्थित देवदत्त के अनुभावक प्रत्यक्षादि पाँचों प्रमाणों में से कोई भी वहाँ उपस्थित नहीं है, अतः देवदत्त के ग्राहक प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों का न रहना या व्यावृत्ति रूप अभाव प्रमाण से ही वहाँ देवदत्त के अभाव का बोध होता है । इस प्रकार एक स्थान में उक्त अभाव प्रमाण को अभाव का ज्ञापक मान लेने पर अन्य सभी स्थानों में अभाव की ज्ञापकता उसमें सिद्ध हो जाती है । इस प्रसङ्ग में (अभाव को स्वतन्त्र प्रमाण न माननेवाले) हम लोगों का कहना है कि दूसरे देश में जाने पर किसी पुरुष को किसी अन्य पुरुष के द्वारा पूछे जाने पर देवकुल में इस (पूछने के) समय की जो देवदत्त की अनुपलब्धि है, उस अनुपलब्धि के द्वारा (१) देवदत्त का एतत्कार्लिक जो अभाव है, उसे पूछनेवाले को इस प्रकार समझाया जाता है कि 'अभी देवकुल में देवदत्त नहीं है' (२) अथवा जिस समय वह पुरुष देवकुल में था, उस समय की जो देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि थी, उस अनुपलब्धि के द्वारा देवदत्त के तात्कालिक अभाव को ही इस प्रकार समझाते हैं कि 'उस समय देवकुल में देवदत्त नहीं थे ।' इनमें इस समय की जो देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि है, वह प्रत्यक्ष योग्य वस्तु की उपलब्धि ही नहीं है; क्योंकि इस समय बोद्धा पुरुष के देश और देवकुल इन दोनों में बहुत बड़ा व्यवधान है (अतः देवदत्त उस देश में रहनेवाले पुरुष के द्वारा ज्ञात होने योग्य नहीं हैं), अतः यह योग्यानुपलब्धि न होने के कारण देवदत्त के अभाव का ग्राहक नहीं हो सकती । 'इस समय देवकुल में देवदत्त नहीं हैं' यह भी सन्दिग्ध ही है; क्योंकि बीच में वह आ भी सकते हैं । पूर्वकाल में रहनेवाली अनुपलब्धि-जो पूर्वकालिक अभाव को ही समझा सकती है-उसका अभी रहना सम्भव नहीं है, क्योंकि स्थिति बदल गई है । अविद्यमान अनुपलब्धि अभावोप- लब्धि का कारण नहीं हो सकती ।
५४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव- न्यायकन्दली नापि स्मृत्यारूढा व्याप्रियते, पूर्वमसंविदितत्वात् । न ह्यनुपलब्धिः प्रमाणान्तरसंवेद्या, अभावरूपत्वात् । अनुपलब्ध्यन्तरापेक्षायां चानवस्था स्यात् । तस्मादियमगृहीतैवेन्द्रि- यवदर्थपरिच्छिदिकेति राद्धान्तः, तथा सति कुतस्तस्याः स्मरणम् ? अनुभवाभावात् । अथ मतम्-देवकुले देवदत्तानुपलम्भो देवदत्तोपलम्भेन विनिवर्त्यते, न च देशान्तरगतस्य तदुपलम्भो जातः, तस्मादस्त्येव तदनुपलम्भः। यदि त्ववस्थान्तरमापन्नः, न चावस्थाभेदे वस्तुभेद इति । अस्तु तर्हि तावदिहैवम् । यत्र तु पूर्वं प्रतियोगिस्मरणाभावाद् वस्त्वभावो न गृहीतः, पश्चात् कालान्तरे वस्तुग्रहणादिहेदानीं नासीदिति प्राक्तनाभावज्ञानम्, तत्र कः प्रती- यह कहना भी सम्भव नहीं है कि (प्र.) स्मृति के द्वारा उपस्थापित अनुपलब्धि से ही वहाँ अभाव का बोध होगा, (उ.) क्योंकि अनुपलब्धि का पहले अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति सम्भव नहीं है । अनुपलब्धि चूँकि अभाव रूप है, अतः प्रत्यक्षादि पाँचों (भावबोधक) प्रमाणों में से किसी से भी उसका बोध सम्भव नहीं है । दूसरी अनुपलब्धि से यदि प्रकृत प्रमाणभूत अनुपलब्धि का अनुभव मानें, तो फिर कारणीभूत उस अनुपलब्धि के अनुभव के लिए तीसरी अनुपलब्धि की आवश्यकता होगी, जो अन्त में अनवस्था में परिणत होगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि जिस प्रकार इन्द्रिय से प्रत्यक्ष के उत्पादन में उसके ज्ञात होने की आवश्यकता नहीं होती है, उसी प्रकार अनुपलब्धि रूप प्रमाण भी स्वयं बिना ज्ञात हुए ही केवल अपनी सत्ता के द्वारा ही अपने अभाव रूप अर्थ के निश्चय का उत्पादन करता है । तस्मात् पूर्व में अनुपलब्धि का अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति किस प्रकार हो सकती है ? यदि यह कहिए कि (प्र.) देवकुल में देवदत्त की जो अनुपलब्धि है वह केवल देवदत्त की उपलब्धि से ही हट सकती है । देवकुल से आनेवाला पुरुष जब दूसरे देश में चला आता है, उस समय उसे देवदत्त की उपलब्धि तो हो नहीं पाती । अतः (जिस समय वह दूसरे के पूछने पर देवकुल में देवदत्त के अभाव का प्रतिपादन करता है) उस समय देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि बनी हुई है । मान लिया कि उस समय की अनुपलब्धि से इस समय की अनुपलब्धि दूसरी अवस्था में है; किन्तु कोई भी वस्तु केवल अवस्था के बदल जाने से दूसरी वस्तु नहीं हो जाती । (उ.) यह मान भी लिया जाय कि उक्त रीति से देवकुल में देवदत्त के कथित अभाव के प्रतिपादन की इस प्रकार उपपत्ति की जा सकती है, तथापि जहाँ प्रतियोगी का स्मरण न रहने के कारण किसी एक अधिकरण में पहले उस प्रतियोगी का अभाव ज्ञात न हो सका, फिर कुछ काल बीत जाने पर उसी अधिकरण में उस प्रतियोगी रूप वस्तु का ग्रहण हुआ । ऐसे अधिकरण में उस समय उसी वस्तु के पूर्वकालिक अभाव का
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५४९ न्यायकदली कारः ? निवृत्तो हि तदस्त्यनुपलम्भस्तस्योपलम्भेन । न चानुपलम्भः पूर्वमासीदिति सम्प्रत्य- विद्यमानोऽपि प्रतीतिहेतुः, प्रनष्टेन्द्रियस्यापि विषयग्रहणप्रसङ्गात् । अद्यतनेन तूपलम्भेनाद्य- तनानुपलम्भस्तस्य निवर्तितः, प्राक्तनानुपलम्भस्त्वस्त्येव । तेन प्राक्कालीनाभावपरिच्छेदोयोग्येन प्राक्तनाभावः परिच्छिद्यत इति चेत् ? अहो पाण्डित्यम् ? अहो नैपुण्यम् ? अनुपलब्ध उपलम्भप्रागभावः, स च वस्तूत्पत्यवधिरेक एव न प्राक्तनाद्यतनकालभेदेन भिद्यते, तत्रायतनानुपलम्भो निवृत्तः, प्राक्तनो न निवृत्त इति कः कुशाग्रीयबुद्धेरन्य इममति- सूक्ष्मविवेकमवगाहते । तस्मादभावोऽभावेनैव परिच्छिद्यत इति न बुद्ध्यामहे । कथं तर्हि स्वरूपमात्रं गृहीत्वा स्थानान्तरगतस्य स्मर्यमाणे प्रति- योगिन्यभावप्रतीतिः ? अनुमानात्, यो हि यस्मिन् स्मर्यमाणे स्मृतियोग्यः इस प्रकार का ज्ञान होता है कि 'उस अधिकरण में उस समय यह वस्तु नहीं थी' वहाँ (अनुपलब्धि को प्रमाण माननेवाले) आप क्या प्रतीकार करेंगे ? अर्थात् यहाँ अभाव का ग्रहण किससे होगा ? क्योंकि यहाँ वर्त्तमान काल के प्रतियोगी की उपलब्धि से प्रतियोगी की भूतकालिक अनुपलब्धि नष्ट हो चुकी है । (प्र.) उस अधिकरण में उस वस्तु की अनुपलब्धि तो पहले से ही थी; किन्तु उसका ज्ञान भर नहीं था । वही (भूतकालिक) अनुपलब्धि वर्त्तमान काल में उपलब्धि के द्वारा नष्ट हो जाने पर भी उस अधिकरण में उस वस्तु के अभाव का ग्राहक होगी । (उ.) यह समाधान भी ठीक नहीं है; क्योंकि कार्य के अव्यवहित पूर्वक्षण में न रहने पर भी यदि भूतकाल में कभी रहने से ही कोई किसी का उत्पादन कर सके, तो फिर जिसे कभी इन्द्रिय थी और अभी वह नष्ट हो गयी है, ऐसे व्यक्ति को भी रूपादि का प्रत्यक्ष होना चाहिए । (प्र.) आज की किसी वस्तु की उपलब्धि से आज की ही उस वस्तु की अनुपलब्धि विनष्ट होगी, उससे पूर्व की अनुपलब्धि नहीं, अतः पूर्वकाल की उस विषय की अनुपलब्धि तो इस (उपलब्धि के) समय भी है ही, इस अनुपलब्धि का तो विनाश नहीं हुआ है । पूर्वकालिक इसी अनुपलब्धि के द्वारा पूर्वकालिक उस वस्तु के अभाव का निश्चय होगा । (उ.) इस पाण्डित्य और निपुणता का क्या कहना ? ( यह आप नहीं समझते कि) अनुपलब्धि शब्द का अर्थ है उपलब्धि का प्रागभाव । वह अनादि काल से अपने प्रतियोगी की उत्पत्ति के समय तक बराबर रहने वाली एक ही वस्तु है । वह वर्तमानकाल और भूतकाल के भेद से भिन्न नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में पूर्वकालिक अनुपलब्धि का नाश नहीं हुआ है और एतत्कार्लिक अनुपलब्धि का नाश हो गया है, इस भेद को किसी कुशाग्रबुद्धि महापुरुष को छोड़कर और कौन समझ सकता है? तस्मात् हम लोग इस बात को नहीं समझ पाते कि (अनुपलब्धि रूप) अभाव से ही अभाव का ग्रहण होता है ।