वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
७२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्नवेगाभावे सति गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । तत्राद्यं गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु गुरुत्वसंस्काराभ्याम् । जो प्रदेश किसी से छुये नहीं जाते या अभिहत नहीं होते, उनमें भी क्रिया की उत्पत्ति होती है । गुरुत्व के विरोधी संयोग, प्रयत्न और वेग इन सबों के न रहने पर भी पृथिव्यादि द्रव्य केवल गुरुत्व के द्वारा जो नीचे की तरफ गिरते हैं, उस क्रिया को ही 'पतन' कहते हैं । जैसा कि मूसल और तीर प्रभृति द्रव्यों में कह आये हैं । उनमें पहली क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है और दूसरी क्रियायें गुरुत्व और वेग दोनों से उत्पन्न होती हैं । न्यायकन्दली संयुक्तसंयोगं व्याचष्टे- पादादिभिर्नुद्यमानायामिति । एकत्र पृथिव्यां पादेन नुद्यमा- नायामभिहन्यमानायां वा ये प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म दृश्यते । तत्र चलतां प्रदेशान्तराणां नुद्यमानाभिहन्यमानभूप्रदेशैः सह संयुक्तप्रदेशसंयोगः कारणम् । यत्राभिघातकं द्रव्यं भूप्रदेशमभिहत्य किञ्चिदधो नीत्वोत्पतति, तत्र प्रदेशान्तरक्रियाया- मुभयापेक्षः संयुक्तसंयोगो हेतुः । गुरुत्वस्य कर्मकारणत्वमाह-पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्न- वेगाभावे गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । गुरुत्वप्रतिबन्धकस्य हस्तसंयोगस्याभावे मुसलस्य यदधोगमनं तत् पतनं गुरुत्वाद् भवति । एवं गुरुत्वविधारकप्रयत्नाभावे शरीरस्य पतनम्, क्षिप्तस्येषोरन्तराले 'पादादिभिर्नुद्यमानायाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'संयुक्तसंयोग' की व्याख्या करते हैं । पृथिवी का एकदेश पैर के द्वारा छुये जाने पर या अभिहत होने पर (उस देश से सम्बद्ध) पृथिवी के अन्य प्रदेशों में भी-जो पैर से न छुवे गये हैं और न अभिहत ही हुए हैं-क्रिया देखी जाती है । उस क्रिया का कारण वह संयुक्तसंयोग है, जो क्रिया से युक्त भूप्रदेश के साथ पैर से छुए हुए या अभिहत हुए दूसरे भूप्रदेश का है । जहाँ अभिघात करनेवाला द्रव्य भूप्रदेश में अभिघात को उत्पन्न कर थोड़ा-सा नीचे जाकर ऊपर की ओर उठता है । वहाँ जो दूसरे भूप्रदेश में क्रिया की उत्पत्ति होती है, उसका कारण (वेग और संयोग) इन दोनों से साहाय्यप्राप्त संयुक्तसंयोग ही है । 'पृथिव्युदकयोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गुरुत्व से कर्म की उत्पत्ति कही गयी है । मूसल में हाथ का जो संयोग है, वह गुरुत्व का प्रतिबन्धक है । उसके न रहने पर ही मूसल नीचे की ओर जाता है, मूसल की वह पतन क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है । गुरुत्व एवं शरीरधारण के उपयुक्त प्रयत्न का अभाव, इन दोनों के रहने पर जो शरीर का पतन होता है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इसी प्रकार फेंके हुए तीर में वेग के
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७२९ प्रशस्तपादभाष्यम् स्रोतोभूतानामपां स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं यत् तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् । कथम् ? समन्ताद् रोधःसंयोगेनावयविद्रवत्वं प्रति- बद्धम्, अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तरावयवद्रव- त्यानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेदः धारारूपी जल का अपने आश्रयरूप स्थल से नीचे की ओर फैलना ही 'स्यन्दन' नाम की क्रिया है, जो द्रवत्व से उत्पन्न होती है । (प्र.) किस प्रकार ? (उ.) नदी के जल किनारों के सभी अवयवों के साथ पूर्ण रूप से संयुक्त रहने के कारण अवयवी (रूप जल) का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है । उस अवयवी के सभी अवयवों के द्रवत्व भी उस अवयवी में एकार्थ- समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण किनारों के उसी संयोग से प्रतिरुद्ध रहते हैं । उन अवयवों के आगे-आगे के अवयवों के द्रवत्व भी उक्त संयुक्त- संयोगों से प्रतिरुद्ध रहते हैं । जब थोड़ा-सा भी बाँध काट दिया न्यायकन्दली वेगाभावात् पतनं गुरुत्वात् । तत्राद्यं कर्म गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु गुरुत्व- संस्काराभ्याम् । तेषु मुसलादिष्वाद्यं कर्म गुरुत्वाद् भवति तेन कर्मणा संस्कारः क्रियते, तदनन्तरमुत्तरकर्माणि गुरुत्वसंस्काराभ्यां जायन्ते, द्वयोरपि प्रत्येकमन्यत्र सामर्थ्याव- धारणात् । द्रवत्वस्य कारणत्वं कथयति-स्रोतोभूतानामपां स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं यत् तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् । अपां यत्र स्थलात्रिम्नाभिसर्पणं तत् स्यन्दनं द्रवत्या- दुपजायत इत्यर्थः । कथमिति प्रश्नः । समन्तादित्युत्तरम् । न रहने पर बीच में ही जो पतन हो जाता है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इनमें पहला कर्म गुरुत्व से उत्पन्न होता है और बाद के कर्म गुरुत्व और वेगाख्य संस्कार इन दोनों से उत्पन्न होते हैं । इनमें मूसल की पहली क्रिया उसके गुरुत्व से उत्पन्न होती है । उस क्रिया से मूसल में वेग उत्पन्न होता है । इसके बाद की मूसल की क्रियायें गुरुत्व और वेग इन दोनों से ही होती है; क्योंकि इन दोनों में से प्रत्येक में क्रिया को उत्पन्न करने का सामर्थ्य अन्यत्र निश्चित हो चुका है । 'स्रोतोभूतानामपाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रवत्व से स्यन्दनरूप क्रिया की उत्पत्ति की रीति कही गयी है । किसी ऊँची जगह से जल जो नीचे की ओर फैलता है, उसे 'स्यन्दन' कहते हैं, यह स्यन्दनरूप क्रिया द्रवत्व से उत्पन्न होती है । 'कथम्' यह पद प्रश्न का बोधक है और 'समन्तात्' इत्यादि से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है ।
७३० न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धत्यादवयविद्रवत्वस्य कार्या- रम्भो नास्ति । सेतुसमीपस्थस्यावयवद्रवत्वस्योत्तरेषामवयव- द्रवत्यानां प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः । ततः क्रमशः संयुक्ताना- जाता है, उस समय सभी किनारों के साथ संयुक्त रहने के कारण अवयवी के द्रवत्व प्रतिरुद्ध रहते हैं, अतः अपना (स्यन्दन) क्रियारूप काम नहीं कर सकते । अतः कोई प्रतिबन्ध न रहने के कारण बाँध के समीप में रहनेवाले जलावयवों के द्रवत्व ही अपने कार्य करने को उन्मुख रहते हैं । उसके बाद बाँध से संयुक्त जलावयवों में ही 'अपसर्पण' (नीचे की तरफ फैलने की) क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इसके बाद पहले द्रव्य का न्यायकन्दली समन्तात् सर्वतो रोधःसंयोगे कूलसंयोगे सति अवयविनो द्रवत्वं प्रतिबद्धं स्यन्दनं वा न करोति । अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, यस्मिन्नवयवे साक्षाद् रोधःसंयोगोऽस्ति तदवयवगतद्रवत्वं तेनैव रोधःसंयोगेन प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि, रोधःसंयुक्तेनावयवेन सह संयोगादय- म्वान्तरस्य द्रवत्वं प्रतिबद्धमिति । तत्संयोगादपरस्य प्रतिबद्धमित्यनेनैव न्यायेनोत्तरोत्तर- द्रवत्वानि प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति, दीर्घतरेण सेतुना समन्तात् प्रतिबद्ध- स्यावयविनो महापरिमाणस्यैकदेशकृतेनाल्पीयसा मार्गेण निर्गमाभावात् । सेतुसमीपस्थस्य 'समन्तात्' अर्थात् सभी कूल के अवयवों में 'रोधःसंयोगेन' दोनों किनारे के साथ जल का संयोग उसके द्रवत्व को प्रतिरुद्ध कर देता है । 'अवयवद्रवत्वमप्येकार्थ- समवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्' जिस अवयव का किनारे के साथ साक्षात् संयोग है, उस अवयव में रहनेवाला द्रवत्व भी अवयव और किनारे के संयोग से ही प्रतिरुद्ध हो जाता है । 'उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि' अर्थात् किनारे से संयुक्त अवयव के साथ संयोग के कारण ही अन्य अवयवों का द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होता है । उस अन्य अवयव के संयोग से तीसरे अवयव का द्रवत्व प्रतिरुद्ध होता है । इसी रीति से अन्य अवयवों के द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होते हैं । 'यदा मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्या- रम्भो नास्ति' क्योंकि बहुत बड़े बाँध से घिरे हुए उस महत् परिमाणवाले अवयवी रूप जल का किसी एक ओर बनाये गये छोटे मार्ग से निकलना सम्भव नहीं है; किन्तु उस बाँध के समीप में जो थोड़े से जल के अवयव हैं, उनका उस छोटे से मार्ग से निकलना सम्भव है । इस प्रकार जल के कुछ अवयवों
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७३१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७३१ प्रशस्तपादभाष्यम् मेवाभिसर्पणम्। ततः पूर्वद्रव्यविनाशे सति प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैर्दीर्घं द्रव्य- मारभ्यते । तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यद्वयविनि कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यमिति । विनाश हो जाने पर संयुक्त रूप से अवस्थित जलावयवों से ही बड़े द्रव्य की उत्पत्ति होती है । इस बड़े द्रव्य में कारणगुणक्रम से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । वहाँ पर किनारों के साथ सम्बद्ध अवयवों का संयुक्त रूप से गमन होने पर जो अवयवी में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी का नाम 'स्यन्दन' है । न्यायकन्दली त्ववयवद्रवत्वस्य वृत्तिलाभो भवति, अल्पस्यावयवस्य तेन मार्गेण निर्गतिसम्भवात् । तस्य वृत्तिलाभे चोत्तरेषामवयवद्रवत्वानामापि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः स्वकार्यकर्तृत्वं स्यात् । ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । सेतुसमीपस्थोऽवयवः प्रथममभिसर्पति, तदनु तत्समीपस्थस्ततस्तत्समीपस्थ इत्यनेन क्रमेण सर्वेऽवयवा अभिसर्पन्ति । ते चाभिसर्पन्तो न परस्परविभ्रंशा अभिसर्पन्ति; किन्तु तथाभिसर्पन्ति यथा परस्परसंयुक्ता भवन्तीत्येतद्द्योतनार्थमुक्तं संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । न पुनरस्यायमर्थोऽप्रच्युत- प्राच्यसंयोगानामेवाभिसर्पणमिति, संस्थानान्तरोपलम्भात् । ततः प्राक्तनसंयोगविनाशे पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः संयुक्तीभावेनावस्थितैरवयवैर्दीर्घं द्रव्यमारभ्यते । तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते । अवयवद्रवत्वेभ्यो दीर्घतरेऽ- के द्रवत्व से कार्य करना सम्भव होने पर 'उत्तरेषामवयवद्रवत्वानापि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः' अर्थात् अपने-अपने कार्य करने में वे समर्थ होंगे । "ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम्" अर्थात् पहले बाँध के समीप का अवयव निकलता है । उसके बाद उस अवयव के साथ संयुक्त दूसरा अवयव निकलता है । उनके बाद उस दूसरे अवयव के साथ सम्बद्ध तीसरा अवयव निकलता है । इसी क्रम से जल के सभी अवयव निकल जाते हैं । जल के वे अवयव ऐसे नहीं निकलते कि एक-दूसरे से बिलकुल अलग होकर भिन्न देशों में चले जाँय; किन्तु इस प्रकार निकलते हैं कि जिससे परस्पर संयुक्त होकर ही निकलें । इसी वस्तुस्थिति को सूचित करने के लिए 'संयुक्तानामेवाभिसर्पणम्' यह वाक्य लिखा गया है । उक्त वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि पहले के अविनष्ट संयोग से युक्त अवयवों का ही निःसरण होता है; क्योंकि निःसरण के बाद दूसरे प्रकार के अवयव- संयोगों से युक्त अवयवियों की उपलब्धि होती है । 'ततः' अर्थात् पहले के संयोग के विनष्ट हो जाने पर 'पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः' अर्थात् परस्पर संयुक्त होकर अवस्थित अवयवों से "दीर्घं द्रव्यमारभ्यते, तत्र च कारण- गुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते" अर्थात् अवयवों में रहनेवाले द्रवत्वों से बड़े अवयवी
७३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् संस्कारात् कर्म इष्वादिषूक्तम् । तथा चक्रादिष्ववयवानां पार्श्वतः प्रतिनियतदिग्देशसंयोगविभागोत्पत्तौ यदवयविनः संस्काराद- तीर प्रभृति में संस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कह चुके हैं । उसी प्रकार चक्र (मिट्टी के बर्तन बनाने की चक्की) प्रभृति में उनके न्यायकन्दली वयविनि द्रव्यत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम् । तत्र तस्मिन् द्रव्यत्वे उत्पन्ने सति कारणानामवयवानां प्रबन्धेन गमने पङ्क्तीभावेनाभिन्नदेशतया गमने यदवयविनि द्रवत्वात् कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यम् । संस्कारात् कर्मेष्वादिषूक्तम्, तथा चक्रादिषु । तथाशब्दो यथाशब्दमपेक्षते, यत्तदोर्नित्यसम्बन्धात् । यथा इष्वादिषु संस्कारात् कर्म कथितम्, तथा चक्रादिष्वपि भवतीत्यर्थः । एतदेव दर्शयति-अवयवानां पार्श्वतः प्रतिनियतदिग्देशसंयोगविभा- गोत्पत्तौ यदवयविनः संस्कारादनियतदिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम् । पार्श्वतः प्रतिनियता ये दिग्देशास्तैः सहावयवानां संयोगविभागयोरुत्पत्तौ सत्यां यदवयविनः संस्कारादनियतदिग्देशैः सर्वतो दिक्कैर्विभागसंयोगनिमित्तं कर्म जायते तद् भ्रमणम् । प्रथमं चक्रावयविनि दण्डसंयोगात् कर्मोत्पद्यते । उत्तरोत्तराणि कर्माणि द्रव्य में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । "तत्र च कारणानां प्रबन्धे गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम्" वहाँ बड़े द्रव्य में द्रवत्व के उत्पन्न होने पर 'कारणों का' अर्थात् उसके अवयवों का 'प्रबन्ध से' अर्थात् पङ्क्तिबद्ध होकर एक देश में गमन होने पर द्रवत्व से अवयवी में जो कर्म उत्पन्न होता है, उसी कर्म का नाम 'स्यन्दन' है । "संस्कारात् कर्मेष्वादिषूक्तम्, तथा चक्रादिषु" । 'तथा' शब्द 'यथा' शब्द की अपेक्षा रखता है; क्योंकि 'यत्' शब्द और 'तत्' शब्द परस्पर नित्यसाकाङ्क्ष हैं । तदनुसार उक्त भाष्यग्रन्थ का यह आशय है कि जिस प्रकार तीर प्रभृति में वेगाख्य संस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कही गयी है, उसी प्रकार चक्रादि में भी (वेग से ही संस्कार की उत्पत्ति) होती है । "अवयवानां पार्श्वतः प्रतिनियतदिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम्" इस भाष्यसन्दर्भ के द्वारा इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है । (इस सन्दर्भ का अक्षरार्थ यह है कि) अवयवी के चारों ओर नियत जो दिग्देश हैं, उन देशों के साथ उनके अवयवों के संयोग और विभाग उत्पन्न होते हैं, उनके उत्पन्न होने पर अवयवी में रहनेवाले वेगाख्य संस्कार से अनियमित दिग्देशों के साथ अर्थात् सभी दिशाओं के साथ संयोग और विभाग की उत्पत्ति होती है, इस संयोग या विभाग से जिस कर्म की उत्पत्ति
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३३ प्रशस्तपादभाष्यम् नियतदिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणमिति । एवमादयो गमन- विशेषाः । प्राणाख्ये तु वायौ कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाज्जाग्रत इच्छानुविधानदर्शनात्, सुप्तस्य तु जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षात् । अवयवों का अनियत दिशाओं के साथ संयोग और विभागों की जनक क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार की क्रियाओं को 'भ्रमण' कहते हैं । ये सभी (स्यन्दन, भ्रमणादि) कर्म विशेष प्रकार के गमनरूप ही हैं । जागते हुए व्यक्ति के प्राण नाम के वायु में आत्मा और वायु के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है, जिसमें (उक्त संयोग को) इच्छा या द्वेष से उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है; क्योंकि जगे हुए व्यक्ति की सभी क्रियाओं में इच्छा (या द्वेष) का अन्वय और व्यतिरेक देखा जाता है । सोये हुए व्यक्ति के प्राणवायु की क्रिया (यद्यपि आत्मा और वायु के संयोग से ही होती है, किन्तु उसे) जीवनयोनियत्न का ही साहाय्य अपेक्षित होता है (इच्छापूर्वक या द्वेष- पूर्वक प्रयत्न का नहीं) । न्यायकन्दली नोदनादभिघातात् कर्मजात् संस्काराच्च भवन्ति । एवं वेगाद् दण्डसंयुक्ते चक्रावयवे आद्यं कर्म दण्डसंयोगात्, अवयवान्तरेषु च संयुक्तसंयोगात्, दण्डसंयुक्तस्यावयवस्योत्त- रोत्तरकर्माणि संस्कारान्नोदनाच्च । अपरेषां संस्कारात्, संयुक्तसंयोगाच्च । दण्डविगमे तु चक्रे तदवयवेषु च संस्कारादेव केवलात् । उपसंहरति-एवमादयो गमनविशेषा इति । होती है, वही 'भ्रमण है । पहले चक्ररूप अवयवी में दण्ड के संयोग से क्रिया की उत्पत्ति होती है । आगे-आगे की क्रियायें कर्मजनित अभिघात या नोदन से और संस्कार से उत्पन्न होती हैं । इसी प्रकार वेग के कारण दण्ड से संयुक्त चक्र के अवयवों में पहली क्रिया की उत्पत्ति दण्ड के संयोग से होती है । अन्य अवयवों में पहली क्रिया संयुक्तसंयोग से होती है । दण्ड के साथ संयुक्त चक्र के अवयव की आगे-आगे की क्रियायें संस्कार और नोदन से होती हैं । इससे भिन्न अवयवों की पहली क्रिया संस्कार से और संयुक्तसंयोग से होती है । दण्ड के हटा लेने पर चक्र में और उसके अवयवों में जो क्रियायें होती रहती हैं, उनका कारण केवल संस्कार ही है । 'एवमादयो गमनविशेषाः' इस सन्दर्भ से गमनरूप क्रिया के प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
७३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् आकाशकालदिगात्मनां सत्यपि द्रव्यभावे निष्क्रियत्वं सामान्यादिवदमूर्त्तत्वात् । मूर्त्तिस्सर्वगतद्रव्यपरिमाणम्, तदनुविधायिनी आकाश, काल, दिशा और आत्मा ये सभी द्रव्य होने पर भी क्रिया से रहित हैं; क्योंकि ये सभी सामान्यादि पदार्थों की तरह अमूर्त्त हैं । सभी द्रव्यों के साथ असंयुक्त (कुछ ही द्रव्यों के साथ संयुक्त) द्रव्य के न्यायकन्दली प्राणाख्ये वायौ कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवतीति । कथमिदं जातमत्त आह-इच्छानुविधानदर्शनात् । रेचकपूरकादिप्रयोगेष्विच्छानुविधायिनी प्राणक्रियोपलभ्यते । नासारन्ध्रप्रविष्टे रजसि तन्निरासार्थं प्राणक्रिया द्वेषादपि भवति, अतः प्रयत्नपूर्वकेत्यवगम्यते । सुप्तस्य जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षादात्मवायुसंयोगात् । सुप्तस्य प्राण- क्रिया प्रयत्नकार्या प्राणक्रियात्वात्, जाग्रतः प्राणक्रियावत् । स चेच्छाद्वेषपूर्वको न भवति, सुप्तस्येच्छाद्वेषयोरभावात् । तस्माज्जीवनपूर्वक एव निश्चीयते, प्राणधारणस्य तत्पूर्वकत्वात् । चतुर्षु महाभूतेष्विवाकाशादिषु कस्मात् क्रियोत्पत्तिर्न चिन्तितेत्याह- आकाशकालदिगात्मनामिति । क्रियावत्त्वं मूर्त्तत्वेन व्याप्तं मूर्त्तत्वं चाकाशादिषु "प्राणाख्ये वायौ कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवतीति" प्राणवायु में उक्त प्रकार से क्रिया की उत्पत्ति कैसे होती है? इसी प्रश्न का उत्तर 'इच्छानुविधानदर्शनात्' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् रेचक, पूरक प्रभृति प्राणायाम में प्राणवायु की क्रियायें इच्छा के अनुरूप देखी जाती हैं । इसी प्रकार नाक के छिद्र में जब धूल चली जाती है, तो उसे निकालने के लिए द्वेष से भी प्राणवायु में क्रिया देखी जाती है । अतः यह समझते हैं कि प्राणवायु की क्रिया का प्रयत्न कारण है । सुप्त पुरुष के प्राणवायु की क्रिया आत्मा और वायु के संयोग से उत्पन्न होती है, जिसमें उस संयोग को जीवनयोनियल का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । इस प्रसङ्ग में यह अनुमान भी है कि जिस प्रकार जाग्रत् पुरुष के प्राणवायु की क्रिया केवल प्राण की क्रिया होने के कारण ही प्रयत्न से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु की क्रिया भी प्रयत्न से उत्पन्न होती है; क्योंकि वह भी प्राण की ही क्रिया है । सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक-प्रयत्न, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न नहीं हो सकता; क्योंकि सुषुप्त पुरुष में इच्छा और द्वेष का रहना सम्भव नहीं है। अतः सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक जीवनपूर्वक प्रयत्न ही है; क्योंकि प्राण का धारण उसी प्रयत्न से होता है । 'आकाशकालदिगात्मनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है कि जिस प्रकार पृथिवी प्रभृति चार द्रव्यों में क्रिया की उत्पत्ति का विचार किया है, उसी
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३५ प्रशस्तपादभाष्यम् च क्रिया, सा चाकाशादिषु नास्ति । तस्मान्न तेषां क्रियासम्बन्धोऽस्तीति । सविग्रहे मनसीन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं जाग्रतः कर्म आत्ममनः- संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षात्, अन्यभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषया- परिमाण को 'मूर्त्ति' कहते हैं । यह 'मूर्त्ति' जहाँ रहती है, क्रिया वहीं होती है । यह (मूर्त्ति) आकाशादि द्रव्यों में नहीं है, अतः उनमें क्रिया का सम्बन्ध भी नहीं है । शरीर के सम्बन्ध से युक्त जागते हुए व्यक्ति के मन की क्रिया आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है, जिसमें उसे इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है; क्योंकि न्यायकन्दली नास्ति, अतः क्रियावत्त्वमपि न वियत इत्यर्थः । एतदेव विवृणोति- मूर्त्तिरित्यादिना । तद् व्यक्तम् । मनसि कर्मकारणमाह-सविग्रह इति । जाग्रतः पुरुषस्य सविग्रहे मनसि सशरीरे मनसी- न्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म आत्ममनःसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवति । इच्छाद्वेष- पूर्वकः प्रयत्नो जाग्रतो मनसि क्रियाहेतुरिति । कथमेतदवगतं तत्राह- अन्यभिप्रायमिन्द्रिया- न्तरेण विषयोपलब्धिदर्शनात् । जागरावस्थायामभिप्रायमनतिक्रमेणेन्द्रियान्तरेण चक्षुरादिना विषयोपलब्धिर्दृश्यते । यदा रूपं जिघृक्षते पुरुषस्तदा रूपं पश्यति, यदा रसं जिघृक्षते तदा रसं रसयति । न चान्तःकरणसम्बन्धमन्तरेण बाह्येन्द्रियस्य विषयग्राहकत्व- प्रकार आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन चार महान् द्रव्यों में भी क्रिया की उत्पत्ति का विचार क्यों नहीं किया गया ? इस प्रश्न के उत्तरग्रन्थ का अभिप्राय है कि यह व्याप्ति है कि क्रिया मूर्त द्रव्यों में ही रहे । आकाशादि कथित चारों द्रव्य मूर्त नहीं हैं, अतः उनमें क्रिया भी नहीं है । 'मूर्तिः' इत्यादि सन्दर्भ से इसी का विवरण दिया गया है । इस भाष्य-ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट है । 'सविग्रहे' इत्यादि सन्दर्भ से मन में जो कर्म उत्पन्न होता है, उसका कारण दिख- लाया गया है । जागते हुए पुरुष के 'सविग्रहे मनसि' अर्थात् शरीर सम्बन्ध से युक्त मन में "इन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म, आत्ममनःसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षात्" अर्थात् इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न ही जागते हुए पुरुष के मन में क्रिया का कारण हैं । यह कैसे समझा ? इसी प्रश्न का उत्तर "अन्यभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषयोपलब्धिदर्श- नात्" इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् जाग्रत् अवस्था में इच्छा के अनुसार ही 'इन्द्रियान्तरेण' अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि देखी
७३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् न्तरोपलब्धिदर्शनात् । सुप्तस्य प्रबोधकाले जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षात् । अपसर्पणकर्मोपसर्पणकर्म चात्ममनःसंयोगाददृष्टापेक्षात् । कथम् ? यदा जीवनसहकारिणोधर्माधर्मयोरुपभोगात् प्रक्षयोऽन्योन्याभिभवो इच्छा के बाद ही इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि होती है । (किन्तु) सोते हुए व्यक्ति के जागने के समय (उसके मन की क्रिया यद्यपि) आत्मा और मन के संयोग से ही उत्पन्न होती है; किन्तु उसमें जीवनयोनियत्न का साहाय्य भी अपेक्षित होता है (इच्छा-द्वेष या जनित प्रयत्न का नहीं) । मन की 'उपसर्पण' और 'अपसर्पण' नाम की दोनों क्रियायें आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती हैं । जिसमें अदृष्ट का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । (प्र.) किस प्रकार ? (उ.) जिस समय भोग से जीवन के सहकारी धर्म और अधर्म का विनाश हो जाता है अथवा परस्पर एक-दूसरे से ही दोनों की कार्योत्पादन शक्ति अवरुद्ध हो जाती है, उस समय जीवन के दोनों सहायकों के अभाव के कारण उनसे उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न का भी विनाश हो जाता है । प्रयत्न के इस अभाव से ही प्राण का नाश होता है । इसके बाद अपने कार्य के उत्पादन में उन्मुख दूसरे धर्म और अधर्म से उस अपसर्पण नाम की क्रिया की उत्पत्ति होती है, जिससे (ऐहिक न्यायकन्दली मस्ति । तस्मादिच्छाद्वेषपूर्वकात् प्रयत्नान्मनसि क्रिया भूतेति गम्यते । सुप्तस्येति । सुप्तस्य पुरुषस्येन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं प्रबोधकाले मनसि क्रिया जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षादात्ममनसोः संयोगात् । अपसर्पणेति । एतदपि कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकं कथयति । विशिष्टात्म- मनःसंयोगो जीवनम्, तस्य स्वकार्यकरणे धर्माधर्मौ सहकारिणौ । यदा जाती है । पुरुष जिस समय रूप को देखना चाहता है, उस समय रूप को ही देखता है । एवं जिस समय रस का आस्वादन करना चाहता है, उस समय रस का ही आस्वादन करता है । अन्तःकरण (मन) के सम्बन्ध के बिना बाह्य इन्द्रियों में विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य नहीं है । अतः समझते हैं कि इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न से ही मन में क्रिया उत्पन्न होती है । 'सुप्तस्येति' अर्थात् सोते हुए पुरुष के मन में दूसरी इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध के लिए जागते समय जो क्रिया उत्पन्न होती है, वह आत्मा और मन के संयोग से होती है, जिसे जीवनयोनियत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा रहती है । 'अपसर्पणेति' मन में यह अपसर्पणादि क्रियायें किस प्रकार होती हैं ? यह प्रश्न कर उसका उत्तर देते हैं । आत्मा और मन का एक विशेष प्रकार
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७ प्रशस्तपादभाष्यम् वा तदा जीवनसहाययोर्वैकल्यात् तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात् प्राणनिरोधे सत्यन्याभ्यां लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यामात्म- मनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीराद् विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते । मृत) शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग के उत्पादन में उन्हें आत्मा और मन के संयोग के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । इस विभाग से ही मन में 'अपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है । उस न्यायकन्दली तयोरुपभोगात् प्रक्षयो विनाशोऽन्योन्याभिभवो वा परस्परप्रतिबन्धात् स्वकार्याकरणं वा, ततो जीवनसहाययोः धर्माधर्मयोर्वैकल्येऽभावे सति तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्याद् जीवन- पूर्वकस्य प्रयत्नस्य वैकल्यादभावात् प्राणवायोनिरोधे सति पतितेऽस्मिन् शरीरे याभ्यां धर्माधर्माभ्यां देहान्तरे फलं भोजयितव्यं तौ लब्धवृत्ती भूतौ यैहिकशरीरोपभोग्यधर्माधर्म- प्रतिबद्धत्वाद् देहान्तरोपभोग्याभ्यां धर्माधर्माभ्यां कार्यं न कृतम् । यदा त्वैहिकशरीरोपभोग्यौ धर्माधर्मौ प्रक्षीणौ तदा देहान्तरोपभोग्यधर्माधर्मयोर्वृत्तिलाभः प्रतिबन्धाभावाज्जातः । ताभ्यां लब्धवृत्तिभ्यामैहिकदेहोपभोग्यात् कर्मणोऽन्याभ्यामात्ममनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीरा- न्मनसो विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते । का संयोग ही 'जीवन' है । इस जीवन से जो कार्य उत्पन्न होंगे, धर्म और अधर्म उनके सहकारिकारण हैं । जिस समय उपभोग से उनका 'प्रक्षय' अर्थात् विनाश हो जाएगा या 'अन्योन्याभिभव' अर्थात् परस्पर एक-दूसरे के प्रतिरोध के कारण दोनों अपने काम में अक्षम हो जाते हैं, उस समय जीवन (उक्त आत्ममनःसंयोग) के सहायक धर्म और अधर्म के 'वैकल्य' से अर्थात् अभाव के कारण 'तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात्' अर्थात् जीवन से उत्पन्न होने वाले प्रयत्न के अभाव से प्राणवायु का निरोध हो जाता है । जिससे इस शरीर का पतन हो जाता है । इस शरीर के पतन के बाद जिन धर्मों और अधर्मों से दूसरे शरीर के द्वारा उपभोग करना है, उन धर्मों और अधर्मों में कार्य करने की क्षमता आ जाती है । वर्तमान शरीर के द्वारा उपभोग के कारणीभूत धर्म और अधर्म से प्रतिरुद्ध होने के कारण ही वे धर्म और अधर्म अपने उन उपभोगरूप कार्यों से विरत रहते हैं, जिनका सम्पादन दूसरे शरीर से होना है । जिस समय ऐहिक शरीर के धर्म और अधर्म नष्ट हो जाते हैं या असमर्थ हो जाते हैं, उस समय दूसरे शरीर के द्वारा उपभुक्त होनेवाले धर्म और अधर्म अपना कार्य प्रारम्भ कर देते हैं; क्योंकि उनका कोई प्रतिबन्धक नहीं रह जाता । ऐहिक शरीर से उपभोग्य इन धर्म और अधर्म से भिन्न एवं जीवनरूप आत्ममनःसंयोग के सहायक अथ च कार्यक्षम इन दूसरे धर्म और अधर्म से मन में अपसर्पण क्रिया उत्पन्न होती है, जिससे मृत शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है ।
७३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् ततः शरीराद् बहिरपगतं ताभ्यामेव धर्माधर्माभ्यां समुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बध्यते, तत्संक्रान्तं च स्वर्गं नरकं वा गत्वा आशयानुरूपेण शरीरेण सम्बद्ध्यते, तत्संयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति । शरीर से निकला हुआ मन उन्हीं धर्मों और अधर्मों से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । उस शरीर के साथ सम्बद्ध होकर ही मन स्वर्ग या नरक को जाता है और वहाँ जाकर स्वर्ग या नरक के भोगजनक धर्म और अधर्म के अनुरूप दूसरे शरीर के साथ सम्बद्ध न्यायकन्दली अपसर्पणकर्मोत्पत्तावात्ममनः संयोगोऽसमवायिकारणम्, मनः समवायिकारणम्, लब्ध- वृत्ती धर्माधर्मौ निमित्तकारणम् । ततस्तदनन्तरं तन्मनो मृतशरीराद् बहिर्निर्गतं ताभ्यामेव लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यां सकाशादुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बद्ध्यत । तत्संक्रान्तं तदातिवाहिकशरीरसंक्रान्तं मनः स्वर्गं नरकं वा गच्छति । तत्र गत्वा आशयानुरूपेण कर्मानुरूपेण शरीरेण सम्बद्ध्यते । स्वर्गे नरके वा यदुपजातं शरीरं तत्र तावन्मनःसम्बन्धेन भवितव्यम्, अन्यथा तस्मिन् देशे भोगासम्भवात् । न चात्मवद्गत्यैव मनसो देहान्तरसम्बन्धोऽस्ति, अव्यापकत्वात् । गमनं च तस्येतावद् दूरं केवलस्य न सम्भवति, महाप्रलयानन्तरावस्थाव्यतिरेकेणाशरीरस्य मनसः कर्माभावात् । तस्मान्मृत- शरीरप्रत्यासन्नमदृष्टवशादुपजातक्रियैरणुभिर्ह्यणुकादिप्रक्रमेणारब्धमतिसूक्ष्ममनुपलब्धियोग्यं आत्मा और मन का संयोग मन की इस अपसर्पण क्रिया का असमवायिकारण है एवं मन समवायिकारण है तथा कार्यक्षम धर्म और अधर्म उसके निमित्तकारण हैं । 'ततः' अर्थात् इसके बाद मृत शरीर से निकला हुआ वही मन अपने कार्य के उत्पादन में पूर्णक्षम उन्हीं धर्म और अधर्म से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । 'तत्संक्रान्तम्' अर्थात् आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध मन स्वर्ग या नरक में चला जाता है । वहाँ जाकर आशय के अनुरूप अर्थात् अपने कर्मों के अनुसार फल-भोग के अनुरूप शरीर के साथ सम्बद्ध हो जाता है । शरीर की उत्पत्ति स्वर्ग में हो या नरक में, उसमें मन का सम्बन्ध रहना आवश्यक है, उसके बिना स्वर्गादि देशों में भी भोग नहीं हो सकता । जिस प्रकार विभु होने के कारण आत्मा स्वर्गादि देशों में न जाकर भी उन देशों में उत्पन्न शरीरों के साथ सम्बद्ध हो जाता है, उसी प्रकार से मन के बिना वहाँ गये, उन दूसरे शरीरों के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; क्योंकि मन विभु नहीं है । इतनी दूर (शरीर से असम्बद्ध) केवल मन का जाना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि महाप्रलय को
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९ प्रशस्तपादभाष्यम् योगिनां च बहिरुद्वेचितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च, तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं कर्मादृष्टकारितम्। एवमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण- होता है । इस शरीर के साथ मन के संयोग को उत्पन्न करनेवाली मन की क्रिया का नाम 'अपसर्पण' क्रिया है । एवं बाहर (विषय ग्रहण के लिए) निकला हुआ योगियों का मन जो उनके अभिप्रेत देश में ही जाता है और वहीं से लौट आता है, मन की वह क्रिया अदृष्ट से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार सृष्टि के आदि में शरीर के साथ मन का संयोग जिस क्रिया से होता है, उसका कारण न्यायकन्दली शरीरं परिकल्प्यते । तच्च मृतशरीरमतिक्रम्य मनसः स्वर्गनरकादिदेशातिवाहनधर्म- कत्यादातिवाहिकमित्युच्यते । मरणजन्मनोरन्तराले मनसः कर्म शरीरोपगृहीतस्यैवोपपद्यते, महाप्रलयानन्तरावस्थाभाविनमनःकर्मव्यतिरिक्तत्वे सति मनःकर्मत्वाद् दृश्यमानशरीरवृत्ति- मनःकर्मवत् । आगमश्चात्र संवादको दृश्यत इति । तत्संयोगार्थं च कर्मोपसर्पणमिति । तेन स्वर्गे नरके वा प्रत्यग्रजातेन शरीरेण मनःसंयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति । छोड़कर और किसी भी समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः स्थूल मृत शरीर के ही समीप में एक अतिसूक्ष्म, उपलब्धि के सर्वथा अयोग्य, आतिवाहिक शरीर की कल्पना करते हैं, जिसकी उत्पत्ति सक्रिय परमाणुओं के द्वारा द्व्यणुकादि क्रम से होती है । उन परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति अदृष्ट से होती है । उस सूक्ष्म शरीर का 'आतिवाहिक शरीर' यह अन्वर्थ नाम इसलिए है कि मन को इस मृतशरीर से छुड़ाकर स्वर्गादि देशों तक 'अतिवहन' कर ले जाता है । इस वस्तुस्थिति के उपयुक्त यह अनुमान है कि शरीर से सम्बद्ध मन में ही वर्त्तमान में क्रिया देखी जाती है (महाप्रलयरूप एक ही ऐसा समय है, जिस समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया रहती है), अतः अनुमान करते हैं कि मृत्यु के बाद और पुनः जन्म लेने से पहले इस बीच मन में जो क्रिया उत्पन्न होती है, उस समय भी मन का किसी शरीर के साथ सम्बन्ध अवश्य रहता है; क्योंकि मन की यह क्रिया भी महाप्रलयकालिक क्रिया से भिन्न मन की ही क्रिया है । इस सिद्धान्त को शास्त्ररूप शब्दप्रमाण का समर्थन भी प्राप्त है । "तत्संयोगार्थञ्च कर्मोपसर्पणमिति" सद्यः उत्पन्न उस स्वर्गीय या नारकीय शरीर के साथ सम्बन्ध के लिए ही मन में 'उपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है ।
७४०) न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् मुपकारापकारसमर्थं च भवति तदप्यदृष्टकारितम्, यथा सर्गादावणुकर्म, अग्नि वाय्वोरूर्ध्वतिर्यग्गमने महाभूतानां प्रक्षोभणम् । अभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रतिगमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं चेति । ॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये कर्मपदार्थः समाप्तः ॥ भी अदृष्ट ही है । इसी प्रकार जीवों के उपकार या अपकार करनेवाली महाभूतों की जिन क्रियाओं के कारणों का बोध प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं होता है, वे सभी क्रियायें अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं । जैसे कि सृष्टि के आदि में परमाणुओं की क्रियायें एवं अग्नि और वायु की ऊर्ध्वतिर्यग्गतिरूप क्रियायें, भूगोलकों की चलन क्रियायें एवं अभिमन्त्रित मणि जो चोर की ओर जाती है, या सामान्य लोह चुम्बक की ओर जो जाता है, ये सभी क्रियायें भी अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं । ॥ प्रशस्तपादभाष्य में कर्मपदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ ॥ न्यायकन्दली योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य बहिर्निःसारितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च । तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं मनःकर्मा- दृष्टकारितम् । न केवलमेतावत् सर्वमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानु- मानाभ्यामनुपलभ्यमानकारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्, यथा सर्गादावणुकर्म, अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने, महाभूतानां भूगोलकादीनां 'योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य' अर्थात् योगी लोग जब अपने मन को पुनः अपने शरीर में लौट आने के लिए अभिप्रेत देश में जाने के लिए भेजते हैं, (उस समय) उनके मन की क्रियायें अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं । मन की केवल वे ही क्रियायें नहीं, "अन्यदपि महाभूतेषु यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण- मुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्" (अर्थात् पृथिव्यादि महाभूतों की ही) अन्य उन क्रियाओं की उत्पत्ति भी अदृष्ट से ही माननी पड़ेगी, जिनके कारणों की उपलब्धि प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा नहीं होती है एवं जिनसे जिस किसी का कुछ उपकार या अपकार होता है । "यथा सर्गादावणुकर्म, अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने" जैसे सृष्टि के प्रथम क्षण की परमाणु की क्रिया एवं अग्नि की ऊपर की ओर जलने की क्रिया अथवा वायु की टेढ़े-मेढ़े चलने की क्रिया (अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं) । 'महाभूतानाम्' अर्थात् भूगोल प्रभृति का 'प्रक्षोभण' अर्थात् चलन, चोरों की परीक्षा के समय 'अभि- षिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्' अर्थात् उपयुक्त मन्त्र से अभिषिक्त
अथ सामान्यपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यं द्विविधम्-परमपरं च। स्वविषयसर्वगत- 'पर' और 'अपर' भेद से सामान्य दो प्रकार का है । वह अपने विषयों (आश्रयों) में रहता है । वह अभिन्न स्वभाव का है । एक, दो या बहुत सी वस्तुओं में एक आकार की बुद्धि का कारण है अपने एक न्यायकन्दली च प्रक्षोभणं चलनम्, परीक्षाकालेऽभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं च सर्वमेतददृष्टकारितमिति । हिताहितफलोपायप्राप्तित्यागनिबन्धनम् । कर्मेति परमं तत्त्वं यत्नतः क्रियतां हृदि ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां कर्मपदार्थः समाप्तः ॥ मणियों का चोर की ओर जाना एवं "अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणम्" अर्थात् साधारण लौह का चुम्बक की ओर जाना, ये भी सभी क्रियायें अदृष्ट से होती हैं । सुख और उसके उपाय की प्राप्ति एवं दुःख और उसके उपाय का परिहार, ये दोनों ही क्रिया से होते हैं, अतः इस क्रियातत्त्व को यल से हृदय में धारण करना चाहिए । ॥ भट्ट श्री श्रीधर की रची हुई पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का कर्मनिरूपण समाप्त हुआ ॥ न्यायकन्दली जयन्ति जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहति-हेतवः । विश्वस्य परमात्मानो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ सामान्यं व्याचष्टे-द्विविधं सामान्यं परमपरं चेति । कृतव्याख्यान- मेतदुद्देशावसरे । सर्वसर्वगतं सामान्यमिति केचित् । तन्निषेधार्थमाह- स्वविषयसर्वगतमिति । यत् सामान्यं यत्र पिण्डे प्रतीयते स तस्य स्वो विषयः , जगत् की उत्पत्ति के हेतु ब्रह्मा एवं स्थिति के हेतु विष्णु और संहार के हेतु महेश्वर, विश्व के परमात्मस्वरूप इन तीनों की जय हो । 'द्विविधं सामान्यं परमपरञ्च' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सामान्य का निरूपण- करते हैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या पदार्थोद्देश प्रकरण में (पृ. २९ पं. ११) कर चुके हैं । किसी सम्प्रदाय का मत है कि 'सभी सामान्य सभी वस्तुओं में रहते हैं' इस मत के खण्डन के लिए ही 'स्वविषयसर्वगतम्' यह वाक्य लिखा गया है । जिस सामान्य की
७४२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् मभिन्नात्मकमनेकवृत्ति एकाद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारि स्वरूपाभेदे- नाधारेषु प्रबन्धेन वर्तमानमनुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । कथम् ? प्रतिपिण्डं सामान्यापेक्षं प्रबन्धेन ज्ञानोत्पत्तावभ्यासप्रत्यय- ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में बराबर (बिना विराम के) रहता हुआ 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का, अर्थात् अपने आश्रयरूप विभिन्न व्यक्तियों में एक न्यायकन्दली तत्र सर्वस्मिन् गतं समवेतम्, सर्वत्र तत्प्रत्ययात् । सर्वसर्वगतत्वाभावे त्वनुपलब्धिरेव प्रमाणम् । अभिन्नात्मकम्, अभिन्नस्वभावम् । येन स्वभावेनैकत्र पिण्डे वर्तते सामान्यं तेनैव स्वभावेन पिण्डान्तरेऽपि वर्तते, तत्प्रत्ययाविशेषादित्यर्थः । अनेकेषु पिण्डेषु वृत्तिर्यस्य तदनेकवृत्ति । अभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तत इति च प्रतीतिसामर्थ्यात् समर्थनीयम् । न हि प्रमाणावगतेऽर्थे काचिदनुपपत्तिर्नाम । द्वित्वादिकमप्यभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तते, तस्मात् सामान्यस्य विशेषो न लभ्यते तत्राह-एकद्विबहुष्विति । सामान्यमेकस्मिन् पिण्डे द्वयोः पिण्डयोर्बहुषु वा पिण्डेष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययं करोति । एकस्य पिण्डस्य द्वयोर्बहूनां वोपलम्भे सति गौरिति प्रत्ययस्य भावात्, द्वित्वादिकं त्वेवं न प्रतीति जिस आश्रय में हो, वही उसका 'स्वविषय' है । वह सभी विषयों में 'गत' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहता है; क्योंकि उन सभी विषयों में उस (सामान्य) की प्रतीति होती है । 'सामान्यं सर्वसर्वगत' (अर्थात् सभी सामान्य सभी सामान्य के विषयों में) क्यों नहीं हैं ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि सर्वत्र सभी सामान्यों की प्रतीति नहीं होती है । 'अभिन्नात्मकम्' शब्द का अर्थ है 'अभिन्नस्वभाव', अर्थात् जिस स्वरूप से वह अपने एक आश्रय में रहता है, उसी स्वरूप से वह अपने और आश्रयों में भी रहता है; क्योंकि एक आश्रय में सामान्य की प्रतीति में एवं दूसरे आश्रयों में उसी सामान्य की प्रतीति में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता । 'अनेकवृत्ति' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है 'अनेकेषु वृत्तिर्यस्य' अर्थात् अनेक आश्रयों में जो रहे, वही 'अनेकवृत्ति' है । सामान्य 'अभिन्नस्वभाव' का है और 'अनेक आश्रयों में रहता है' इन दोनों बातों का समर्थन तदनुकूल प्रामाणिक प्रतीतियों से करना चाहिए; क्योंकि प्रमाण के द्वारा निर्णीत अर्थ में किसी प्रकार की अनुपपत्ति की शङ्का नहीं की जा सकती । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति गुण) भी अनेकवृत्ति हैं और अभिन्न स्वभाव के भी हैं, अतः द्वित्वादि में सामान्य लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण उन दोनों विशेषणों से नहीं हो सकता, अतः 'एकद्विबहुषु' इत्यादि वाक्य लिखा गया है । अर्थात् (द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है कि) 'सामान्य' अपने एक आश्रय में, दो आश्रयों में अथवा बहुत से आश्रयों में प्रतीत होता है । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार एक ही गोपिण्ड में 'अयं गौः' इस प्रकार से 'सामान्य' की प्रतीति होती है,
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३ प्रशस्तपादभाष्यम् जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति । तत्र सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा परस्परविशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्बलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धानीलं आकार की बुद्धि का कारण है । (प्र.) यह किस प्रकार समझते हैं (कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) । (उ. ) प्रथमतः अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान जब बार-बार होता है (जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं), तब उससे (दृढ़तर) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान-समूहों का स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के विषयीभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म है, वही 'सामान्य' है । इन (पर और अपर सामान्यों) में सत्ता नाम का सामान्य केवल न्यायकन्दली भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुलक्ष्यात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्य- मिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति-स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डा- न्तरेऽपि । तस्माद्भेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्वपिण्डपरित्यागेन वर्तमानं सदनुवृत्ति- प्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह-प्रतिपिण्डमिति । पिण्डं पिण्डं उसी प्रकार दो गोपिण्डों में भी 'इमौ गावौ' या बहुत से गोपिण्डों में भी 'इमे गावः' इत्यादि आकार से 'सामान्य' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति गुणों) में ऐसी बात नहीं है (उनकी प्रतीति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती है, तद्घटक किसी एक आश्रय में नहीं) । द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है । (सामान्य के लक्षणवाक्य का सार या मर्म यह है कि) जो स्वयं एक होकर भी अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहे एवं (अपने आश्रयीभूत) एक व्यक्ति में, दो व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही 'सामान्य' है । यही बात 'एतदेव' इत्यादि से कही गयी है । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में 'प्रबन्ध से' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहले-पहले के अपने आश्रयरूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए ही जो 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का अर्थात् अनेक वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति का कारण हो, वही 'सामान्य' है । 'कथम्' इत्यादि से प्रतिवादी का प्रश्न सूचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? 'प्रतिपिण्डम्' इत्यादि से
७४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् नीलमिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तथा परस्परविशिष्टेषु द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्तादिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा 'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस रीति से होती है कि जिस प्रकार नील चर्म, नील वस्त्र और नील कम्बलों में परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्ग के सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में 'यह नील है' इस एक आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परस्पर विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में 'यह सत् है' इस एक न्यायकन्दली प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकवृत्तित्वमवगम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्ष- विरोधादपास्यन्ते । यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानीं विविच्य कथयति-तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह-यथा परस्परविशिष्टे- इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । 'पिण्डं पिण्डं यथा स्यात्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत 'प्रतिपिण्ड' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस रीति से सामान्य का ज्ञान होता है,उसी रीति से जब सामान्य की 'अभ्यासप्रतीति' अर्थात् बार-बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत 'ज्ञानप्रबन्ध' का अर्थात् ज्ञानसमूह का 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा (विभिन्न व्यक्तियों में) जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही 'सामान्य' है । इससे निष्कर्ष क्या निकला ? (यही कि) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य अनेक वस्तुओं में रहता है । अतएव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं । पहले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है । 'तत्र परं सत्ता' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार- पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें 'सत्ता' पर सामान्य (ही) है । अर्थात् केवल 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है,
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४३ प्रशस्तपादभाष्यम् जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति । तत्र सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा परस्परविशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्बलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धानीलं आकार की बुद्धि का कारण है । (प्र.) यह किस प्रकार समझते हैं (कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) । (उ. ) प्रथमतः अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान जब बार-बार होता है (जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं), तब उससे (दृढ़तर) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान-समूहों का स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के विषयीभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म है, वही 'सामान्य' है । इन (पर और अपर सामान्यों) में सत्ता नाम का सामान्य केवल न्यायकन्दली भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्य- मिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति-स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डा- न्तरेऽपि । तस्मादभेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्वपिण्डापरित्यागेन वर्तमानं सदनुवृत्ति- प्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह-प्रतिपिण्डमिति । पिण्डं पिण्डं उसी प्रकार दो गोपिण्डों में भी 'इमौ गावौ' या बहुत से गोपिण्डों में भी 'इमे गावः' इत्यादि आकार से 'सामान्य' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति गुणों) में ऐसी बात नहीं है (उनकी प्रतीति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती है, तद्घटक किसी एक आश्रय में नहीं) । द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है । (सामान्य के लक्षणवाक्य का सार या मर्म यह है कि) जो स्वयं एक होकर भी अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहे एवं (अपने आश्रयीभूत) एक व्यक्ति में, दो व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही 'सामान्य' है । यही बात 'एतदेव' इत्यादि से कही गयी है । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में 'प्रबन्ध से' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहले-पहले के अपने आश्रयरूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए ही जो 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का अर्थात् अनेक वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति का कारण हो, वही 'सामान्य' है । 'कथम्' इत्यादि से प्रतिवादी का प्रश्न सूचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? 'प्रतिपिण्डम्' इत्यादि से
७४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् नीलमिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तथा परस्परविशिष्टेषु द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा 'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस रीति से होती है कि जिस प्रकार नील चर्म, नील वस्त्र और नील कम्बलों में परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्ग के सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में 'यह नील है' इस एक आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परस्पर विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में 'यह सत् है' इस एक न्यायकन्दली प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकवृत्तित्वमवगम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्ष- विरोधादपास्यन्ते । यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानीं विविच्य कथयति-तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह-यथा परस्परविशिष्टे- इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । 'पिण्डं पिण्डं यथा स्यात्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत 'प्रतिपिण्ड' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस रीति से सामान्य का ज्ञान होता है,उसी रीति से जब सामान्य की 'अभ्यासप्रतीति' अर्थात् बार-बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत 'ज्ञानप्रबन्ध' का अर्थात् ज्ञानसमूह का 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा (विभिन्न व्यक्तियों में) जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही 'सामान्य' है । इससे निष्कर्ष क्या निकला ? (यही कि) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य अनेक वस्तुओं में रहता है । अतएव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं । पहले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है । 'तत्र परं सत्ता' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार- पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें 'सत्ता' पर सामान्य (ही) है । अर्थात् केवल 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है,
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५ प्रशस्तपादभाष्यम् चार्थान्तराद् भवितुमर्हतीति यत् तदर्थान्तरं सा सत्तेति सिद्धा। सत्तानुसम्बन्धात् सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तस्मात् सा सामान्यमेव । आकार की प्रतीति होती है। यह प्रतीति द्रव्य, गुण और कर्म इनसे भिन्न किसी वस्तु से ही होनी चाहिए। वही वस्तु है 'सत्ता'। इस सत्ता जाति के सम्बन्ध से 'यह सत् है यह सत् है' इत्यादि आकारों के अनुवृत्तिप्रत्यय ही हो सकते हैं (कोई भी व्यावृत्तिप्रत्यय नहीं), अतः सत्ता सामान्य ही है, विशेष नहीं । न्यायकन्दली ष्यिति। तद् व्यक्तम् । द्रव्यादिषु सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः व्यतिरिक्तप्रत्ययनिबन्धना, भिन्नेषु प्रत्ययानुवृत्तित्वात्, चर्मवस्त्रादिषु नीलप्रत्ययानुवृत्तिवत् । यस्मात् सत्ता त्रिषु द्रव्यादिषु प्रत्ययानुवृत्तिं करोति न व्यावृत्तिम्, तस्मात् सामान्यमेव, न विशेष इत्युपसंहारार्थः । अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति । द्रव्यत्वं द्रव्येष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । गुणत्वं गुणेष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिप्रत्ययहेतुत्वाद् विशेषः । तथा फिर भी जो कोई उसे प्रत्यक्षवेद्य नहीं मानते, उनके सन्तोष के लिए 'परस्पर- विशिष्टेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान भी उपस्थित करते हैं। इस अनुमान प्रयोग का अर्थ स्पष्ट है । जिस प्रकार नीलवस्त्र के नीलधर्म प्रभृति में एक नीलवर्ण के ही कारण 'यह नील' है, इस एक आकार की प्रतीतियाँ 'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप होती हैं, उसी प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में 'यह सत् है' इस एक आकार की प्रतीति भी होती है, इन तीनों से भिन्न किसी वस्तु का ज्ञान उक्त प्रतीतियों का कारण है; क्योंकि उक्त सदाकारक प्रतीतियाँ भी अनुवृत्तिप्रत्यय हैं । (जिसका ज्ञान उक्त अनुवृत्तिप्रत्ययों का कारण है वही 'सत्ता' है) प्रकृत उपसंहार ग्रन्थ का यह अभिप्राय है कि यतः सत्ता द्रव्यादि तीनों पदार्थों में 'यह सत् है' इस आकार के अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, किसी भी व्यावृत्ति (प्रत्यय) का नहीं, अतः 'सत्ता' सामान्य ही है, विशेष नहीं । द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अनुवृत्तिप्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय दोनों की ही कारण हैं, अतः वे 'सामान्य' और 'विशेष' दोनों ही हैं । जैसे कि द्रव्यत्व जाति सभी द्रव्यों में 'यह द्रव्य है' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण है, अतः 'सामान्य' है । उसी प्रकार द्रव्य में ही 'यह गुण और कर्म से भिन्न है' (क्योंकि इसमें द्रव्यत्व है) इस व्यावृत्तिप्रत्यय का भी कारण है, अतः 'विशेष' भी है । एवं गुणत्व जाति सभी गुणों में 'यह गुण है' इस प्रकार की