भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

चित्रपट-तालिका
४१६


( पृष्ठ २२१ )

  • शक्ति
    • अभिधा
      • ( एक प्रकार )
        • केवललक्षणा
        • लक्षितलक्षणा
    • लक्षणा
      • ( दूसरा प्रकार )
        • जहल्लक्षणा
        • अजहल्लक्षणा
        • जहदजहल्लक्षणा ( भागत्याग-लक्षणा )

( पृष्ठ : ३२६ )

  • प्रमाणों का प्रामाण्य
    • व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्त्व
    • पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्त्व

( पृष्ठ : ३२७ )

  • लक्षण
    • स्वरूप
    • तटस्थ

( पृष्ठ : ३३४ )

  • जगत् की उत्पत्ति का क्रम
    • परमेश्वर + माया + सहायक-प्राणिकर्म
      • सर्जन-संकल्प
        • त्रिगुणात्मक अपंचीकृत भूत
          • सत्त्वगुणविशिष्ट पंचभूतों के व्यतिक्रम से
            • पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ
            • आकाशादि पञ्चों के सम्मिलित सात्त्विक अंश से
              • मन
              • बुद्धि
              • अहंकार
              • चित्त

४१४ वेदान्तपरिभाषा


( पृष्ठ : ३३८ )

रजोगुणविशिष्ट पंचभूतों के व्यतिक्रम से

कर्मेन्द्रियाँ
आकाशादि पांचों के सम्मिलित राजस् अंश से

वायुपंचक


( पृष्ठ : ३३९ )

स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति
तमोगुणविशिष्ट अपञ्चीकृत ( सूक्ष्म ) भूत

( त्रिवृत्करणकृत ) पञ्चीकृतभूत ( स्थूल )


( पृष्ठ : ३४१ )

अपञ्चीकृतभूत

लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीर
( पंचज्ञानेन्द्रिय + पंचकर्मेन्द्रिय + पंचप्राण + मन + बुद्धि )
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
पर अपर
( हिरण्यगर्भ का ) ( हम लोगों का )


तमोगुणयुक्त पञ्चीकृत भूत
┌────────────────────────┼────────────────────────┐
ऊर्ध्वसप्तलोक सप्ताधोलोक चतुर्विधस्थूलशरीर


( पृष्ठ : ३४३ )

प्रलय
┌─────────────┬─────────────┬─────────────┐
नित्य प्राकृत नैमित्तिक आत्यन्तिक

चित्रपट-तालिका
४१५


( पृष्ठ ३५६ ) प्रतिबिम्बवाद ( अनेक जीववाद )
( संक्षेपशारीरककार ) चैतन्य
$$\begin{array}{c} \text{चैतन्य} \ \begin{array}{cc} \swarrow & \searrow \ \text{अविद्यात्मकमायाप्रतिबिम्बित} & \text{उपाध्यन्तःकरणप्रतिबिम्बित} \ \text{ईश्वर} & \text{जीव} \end{array} \end{array}$$
(बिना LaTeX के सरल रूप:)

                       ( संक्षेपशारीरककार ) चैतन्य
                                    |
          ┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
अविद्यात्मकमायाप्रतिबिम्बित                           उपाध्यन्तःकरणप्रतिबिम्बित
        ईश्वर                                               जीव

( विवरणकार ) बिम्ब चैतन्य ( ईश्वर )
$$\downarrow$$
( एक जीववाद के सिद्धान्त में ) उपाध्यविद्याप्रतिबिम्बव जीव


( पृष्ठ ३६० ) जीव की तीन अवस्थाएँ

                           जीव की तीन अवस्थाएँ
                                    |
          ┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
        जाग्रत्                   स्वप्न                    सुषुप्ति

( पृष्ठ ३६१ ) अन्तःकरणवृत्ति की आवश्यकता

                              अन्तःकरणवृत्ति
                                    |
          ┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
( एकमत ) आवरणाभिभवार्थं                               सम्बन्धार्थं ( दूसरा मत )

( पृष्ठ ३७१ ) जीवपरिमाणवाद

                              जीवपरिमाणवाद
                                    |
          ┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
      अणुपरिमाण                 मध्यपरिमाण             विभुपरिमाण ( सिद्धान्त )

( पृष्ठ ३८१ ) प्रयोजन

                                 प्रयोजन
                                    |
          ┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
        मुख्य                                                गौण
          |                                                   |
    ┌─────┴─────┐                                         अन्यतरप्राप्ति
   सुख       दुःखाभाव
    |
 ┌──┴──┐
सातिशय निरतिशय

४१६ | वेदान्तपरिभाषा

( पृष्ठ : ३८२ )

                    मोक्ष
             ┌────────┴────────┐
      आनन्दात्मक ब्रह्मावाप्ति     शोकनिवृत्ति

( पृष्ठ : ३८४ )

            तत्त्वमसि ( महावाक्य )
                      │
    ( पद्मपादाचार्य ) अहं ब्रह्मास्मि ( अपरोक्षज्ञान )
                      │
                    मोक्ष

( पृष्ठ : ३९० )
( वाचस्पतिमिश्र )

                     कर्म
                      │
          पापक्षय    तत्त्वमसिका मनन-निदिध्यासन
             └────────┬────────┘
             सुसंस्कृत-अन्तःकरण ( मन )
                      │
             ब्रह्मसाक्षात्कार ( ब्रह्मज्ञान )
                      │
                    मोक्ष

( पृष्ठ : ४०५ )

                                कर्म
            ┌─────────────────────┼─────────────────────┐
          सञ्चित                क्रियमाण                प्रारब्ध
       ┌────┴────┐           ┌────┴────┐           ┌────┴────┐
     सुकृत    दुष्कृत       सुकृत    दुष्कृत       सुकृत    दुष्कृत

( पृष्ठ : ४०५ )

                                ज्ञान
             ┌────────────────────┴────────────────────┐
        प्रतिबद्धफलक                              अप्रतिबद्धफलक
             │                                         │
         प्रारब्धभोग                               अज्ञाननिवृत्ति
             │                                  ┌──────┴──────┐
       प्रारब्धकर्मनाश                    सञ्चितकर्मनाश   क्रियमाणकर्मनाश

चित्रपट-तालिका
४१७


वेदान्त का प्रयोजन

( पृष्ठ : ४०८ )

ब्रह्मज्ञान

मोक्ष (शोक-मोह-जरा-मरणात्मक अनर्थनिवृत्ति)
तथा
( निरतिशय ब्रह्मानन्द की प्राप्ति )


पुरुषार्थ पट्ट

पुरुषार्थ : १

  • धर्म
  • अर्थ
  • काम
  • मोक्ष

प्रमाण : २

  1. प्रत्यक्ष

    • (पहला प्रकार)
      • सविकल्पक
      • निर्विकल्पक
    • (दूसरा प्रकार)
      • जीवसाक्षी
      • ईश्वरसाक्षी
  2. अनुमान

    • स्वार्थ
    • परार्थ
  3. उपमान

  4. आगम

  5. अर्थापत्ति

    • दृष्टार्थापत्ति
    • श्रुतार्थापत्ति
      • अभिधानानुपपत्ति
      • अभिहितानुपपत्ति
  6. अनुपलब्धि

    • प्रागभाव
    • प्रध्वंसाभाव
    • अत्यन्ताभाव
    • अन्योन्याभाव
      • सोपाधिक
      • निरुपाधिक

२७ वे० प०

४१८ | वेदान्तपरिभाषा

कार्यविनाश : ३

  • बाध
  • निवृत्ति

अविद्या : ४

  • तूलाविद्या
  • मूलाविद्या

सत्ता : ५

  • पारमार्थिक
  • व्यावहारिक
  • प्रातिभासिक

अन्तःकरण : ६

  • मन
  • बुद्धि
  • अहंकार
  • चित्त

प्रवृत्ति : ७

  • संवादि
  • विसंवादि

पदनिष्ठशक्ति : ८

  • अभिधा
  • लक्षणा
    • ( एक प्रकार )
      • केवललक्षणा
      • लक्षितलक्षणा
    • ( दूसरा प्रकार )
      • जहल्लक्षणा
      • अजहल्लक्षणा
      • जहदजहल्लक्षणा

एकवाक्यता : ९

  • पदैकवाक्यता
  • वाक्यैकवाक्यता

चित्रपट-तालिका
४१९


वाक्यजन्यज्ञान में सहायक : १०

  • आकांक्षा
  • योग्यता
  • आसत्ति
  • तात्पर्यं

लक्षण : ११

  • स्वरूपलक्षण
  • तटस्थलक्षण

प्रलय : १२

  • नित्य
  • प्राकृत
  • नैमित्तिक
  • आत्यन्तिक

जीव की अवस्थाएँ : १३

  • जाग्रत्
  • स्वप्न
  • सुषुप्ति

प्रयोजन : १४

  • गौण
  • मुख्य

सुख : १५

  • सातिशय
  • निरतिशय

कर्म : १६

  • सुकृत
  • दुष्कृत

(सुकृत और दुष्कृत के भेद)

  • प्रारब्ध
  • संचित
  • क्रियमाण

४२० | वेदान्तपरिभाषा


ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन : १७

                     ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन : १७
                                   │
         ┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
       श्रवण                     मनन                     निदिध्यासन
         └─────────────────────────┬─────────────────────────┘
                                 साधन
         ┌───────┬─────────┬───────┴────────┬──────────┬────────┐
        शम      दम      उपरति            तितिक्षा    समाधान    श्रद्धा

अन्तःकरणवृत्ति का उपयोग : १८

                    अन्तःकरणवृत्ति का उपयोग : १८
                                   │
         ┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
    आवरणभङ्गार्थं               सम्बन्धार्थं               चिदुपरागार्थं

वेदान्त-सम्मत-सृष्टि-क्रम

माया से उपहित परमेश्वर

शब्द-गुणक-आकाशतन्मात्र

शब्द स्पर्श. गु. वायुतन्मात्र

श. स्प. रूप. गु. अग्नितन्मात्र

श. स्प. रू. रस. गु. जलतन्मात्र

श. स्प. रू. रं. गन्ध. गु. पृथ्वीतन्मात्र


                              तन्मात्र
                                 │
         ┌───────────────────────┴───────────────────────┐
   व्यष्टिरूपतन्मात्र                              समष्टिरूपतन्मात्र
         │                                               │
 ┌───────┼───────┐                               ┌───────┴───────┐
सात्त्विक अंश  राजस अंश  तामस अंश                   सात्त्विक अंश        राजस अंश
 │       │                                       │               │
ज्ञानेन्द्रियाँ   कर्मेन्द्रियाँ                                अन्तःकरण            वायु
 │       │                                       │               │
 ├─श्रोत्र    ├─वाक्                                  ├─मन            ├─प्राण
 ├─त्वक्     ├─पाणि                                  ├─बुद्धि         ├─अपान
 ├─चक्षु     ├─पाद                                   ├─अहंकार        ├─व्यान
 ├─जिह्वा    ├─पायु                                  └─चित्त         ├─उदान
 └─नासिका    └─उपस्थ                                                 └─समान

चित्रपट-तालिका ४२१


पञ्चीकृतभूत (स्थूल भूत)

  • पञ्चीकृतभूत (स्थूल भूत)
    • आकाश
    • वायु
    • अग्नि
    • जल
    • पृथ्‍वी

१. लोक

  • ऊर्ध्वलोक

    1. भूमि
    2. आकाश (अन्तरिक्ष)
    3. स्वर्ग
    4. महः
    5. जन
    6. तप
    7. सत्य
  • अधोलोक

    1. अतल
    2. वितल
    3. सुतल
    4. तलातल
    5. रसातल
    6. महातल
    7. पाताल

२. स्थूलशरीर

  • जरायुज
  • अण्डज
  • स्वेदज
  • उद्भिज

वेदान्तपरिभाषागत-उद्धरण-संकेत-सूची

( वे० परि० )

उद्धरणआकर ग्रन्थपृ० सं०
अंशिनः स्वांश०चित्सुखी ८१७२
अक्षमा भवतः केयं०सुरेश्वरवार्तिक३११
अजामेकां०श्वेताश्वतर ४।५६०
अत्रायं पुरुषःबृहदारण्यक ४।३।८३७२
अथ रथान् रथयोगान्” ४।३।१०१२२
अधिष्ठानावशेषो हि नाशःसुरेश्वरवार्तिक सूतसंहिता-म.वे.सं.२-४ P 270.३०४
अनन्यलभ्यो हि शब्दार्थःश्लो. वा.२१६
अन्तःकरणं···आपादयतीतिविवरण३६६
अन्तःकरणवृत्तौविवरण२४
अपि संराधने०ब्र० सू० ३।२।२४३८६
अभयं वै जनकप्राप्तोऽसि०बृहदारण्यक ४।२।४३८४
अस्ति भाति०दृग्-दृश्यविवेक ६३३३
अस्य महतो भूतस्य०बृहदारण्यक २।४।१०२४६
आत्मा वा अरे०” २।४।४३६१
आनन्दो ब्रह्मेति०तैत्तिरीय ३।६३८१
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” ३।६३२७
आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वं०पद्मपादाचार्य पंचपादिका३२८
इदं सर्वं यदयमात्मा०बृहदारण्यक २।४।६; ४।२।७३३२
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था०कठोपनिषद् १।३।१०३२
इन्द्रो मायाभिःबृहदारण्यक २।५।१९८६
इषे त्वा०शुक्लयजुर्वेद १।१२०४
उपासनादि०वाचस्पतिमिश्र-भामती
एकधा बहुधाब्र. वि. १।२३५६
एतस्यैवानन्दस्य०बृहदारण्यक ४।३।२३८१
एष नैमित्तिक०पुराण३४८
कषाये कर्मभिःस्मृति३६०
कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा०बृहदारण्यक १।५।३२७
कार्योपाधिरयं जीवः०शुकरहस्योपनिषत् ३।१२३५५
क्षारः सर्वाणि०भगवद्गीता १५।१६३७३
क्षीयन्ते चास्य०मुण्डक २।२।८१२३
चतुर्युगसहस्राणित्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषत् ३।४३४८
जगत्प्रतिष्ठाविष्णुपुराण३५१
तत्सत्यं स आत्माछान्दोग्य ६।८।७८३

उद्धरण-संकेत-सूची

४२३

उद्धरणआकर ग्रन्थपृ० सं०
तत्त्वमसिछां. उ. ६।८।१३२६
तद्यथेह कर्मचितो लोकः,, ८।१।६
तदात्मानम्बृहदारण्यक १।४।१०३८४
तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयछान्दोग्य ६।२।१६४
तन्मनोऽकुरुतबृहदारण्यक १।२।१३३०
तन्मनोऽसृजत२७
तमेतं वेदानुवचनेनबृहदारण्यक ४।४।२२३६०
तमेव विदित्वाश्वेताश्वतर ३।८३८४
तरति शोकमात्मवित्छान्दोग्य- ७।१।३३८२
तरत्यविद्यां वितताम्पराशरस्मृति६१
तस्य तावदेव,, ६।१४।२
तस्य पुत्रा दायमुपयन्तिभगवद्गीता, ब्रह्मानन्दभिर्याख्यान अ. प. १८ श्लोक १०
तासां त्रिवृतंछान्दोग्य ६।३।३३३६
ते ध्यानयोगानुगताश्वेताश्वतर १।३३६५
दध्ना जुहोतिमी. न्या.३६४
दशमस्त्वमसि४८
दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतमी. न्या.३६४
द्वाविमौ पुरुषौभगवद्गीता १५।१६३७३
द्वा सुपर्णाऋग्वेद २।३।१७३७३
द्विपरार्द्धेपुराण३४८
देहात्मप्रत्ययोवार्तिक-सुरेश्वराचार्य१७
न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति
न स पुनरावर्त्ततेछान्दोग्य ८।१५।१
नाभुक्तं क्षीयते कर्मस्मृति
निर्विशेषं परं ब्रह्मकल्पतरु३६६
पञ्चप्राणमनो बुद्धिमै. उ.३४०
प्रज्ञानघनःमां. उ. ५३७२
प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा०कौ. उ. ३।२३८५
बर्हिर्देवसदनं दामिमै. सं. १।१।४३६४
बहु स्यां प्रजायेयतैतरीय २।६३३२
बुद्धेर्गुणेनश्वेताश्वतर ५।८
ब्रह्मणा सह ते३४६
ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतिमु. ३।२।६३८२
व्रीहिभिर्यजेतआप. श्रौ. ६।३१।१३३६४
मनः षष्ठानीन्द्रियाणिगीता३२
मनसैवानुद्रष्टव्यःबृहदारण्यक ४।४।१६३८८

४२४ वेदान्तपरिभाषा

उद्धरणआकर ग्रन्थपृ० सं०
मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तंशारीरकोपनिषद् २७४
मायां तु प्रकृतिं विद्यात्श्वेताश्वतर ४।१०६१
यः सर्वज्ञःमुं. उ. १।१।६३२६
यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति३३
यतो वा इमानितै. उ. ३।१३३१
यत्र त्वस्य सर्वम्बृहदारण्यक ४।४।१२१७
यत्र हि द्वैतमिव” ४।२।१२१७
यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा३२६
यदा सुप्तःकौ. उ. ३।२३४५
यावदधिकारमवस्थितिब्रह्मसूत्र ३।२।३२
रमणीयचरणाछान्दोग्य३४४
विज्ञानमानन्दं ब्रह्मबृहदारण्यक ३।१८३८१
विश्वजिता यजेततां. म. ब्रा. १६।४।२२७१
वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्३२
वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादःब्रह्मसूत्र २।४।२३३३६
शक्तितात्पर्यं ⋯ अङ्गीक्रियतेविवरण३६७
शास्त्रदृष्ट्याब्रह्मसूत्र १।१।३१३८५
संसर्गासङ्गिचित्सुखी८४
स प्रजापतिरात्मनोसं. २।१।२२०२
सच्च त्यच्चाभवत्तै. उ. २।६३३२
सता सोम्यछान्दोग्य ६।८।१३४५
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मतै. उ. २।१।१३२७
सदेव सौम्येदमग्रछान्दोग्य ६।२।१८३
समिधो यजतितै. सं. २।६।१२४३
सर्वं एकीभवन्ति३४६
सर्वेषामेवचित्सुखी ७१७०
स वै शरीरी प्रथमः३४२
सा वैश्वदेव्यामिक्षामै. सं. १.१०।११६५
सूर्याय जुष्टं निर्वपामि२०४
सोऽकामयततै. २।६३३०
सोऽरोदीत्तै. सं. २।२।२२४०
स्वर्गकामो 'ज्योतिष्टोमेन यजेत'आ. श्रौ. १०।२।१२४४
स्वार्थबोधे समासानाम्तं. वा. पृ० ३६६२४३
हन्ताहमिमास्तिस्रोछान्दोग्य ६।३।२३४२
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेयजुर्वेद १३।४३४३