भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

३२ विवेक-चूडामणि है। इस विषयमें श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य (इतिहास) और अनुमान-प्रमाण जागृत (मौजूद) हैं। माया-निरूपण अव्यक्तनाम्नी परमेशशक्ति- रनाद्यविद्या त्रिगुणात्मिका परा। कार्यानुमेया सुधियैव माया यया जगत्सर्वमिदं प्रसूयते॥११०॥ जो अव्यक्त नामवाली त्रिगुणात्मिका अनादि अविद्या परमेश्वरकी परा शक्ति है, वही माया है; जिससे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है। बुद्धिमान्, जन इसके कार्यसे ही इसका अनुमान करते हैं। सन्नाप्यसन्नाप्युभयात्मिका नो भिन्नाप्यभिन्नाप्युभयात्मिका नो। सङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका नो महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा ॥१११॥ वह न सत् है, न असत् है और न [ सदसत् ] उभयरूप है; न भिन्न है, न अभिन्न है और न [ भिन्नाभिन्न ] उभयरूप है; न अंगसहित है, न अंगरहित है और न [ सांगानंग ] उभयात्मिका ही है; किन्तु अत्यन्त अद्भुत और अनिर्वचनीयरूपा (जो कही न जा सके ऐसी) है। शुद्धाद्वयब्रह्मविबोधनाश्या सर्पभ्रमो रज्जुविवेकतो यथा। रजस्तमः सत्त्वमिति प्रसिद्धा गुणास्तदीयाः प्रथितैः स्वकार्यैः॥ ११२ ॥ रज्जुके ज्ञानसे सर्प-भ्रमके समान वह अद्वितीय शुद्ध ब्रह्मके ज्ञानसे ही नष्ट होनेवाली है। अपने-अपने प्रसिद्ध कार्योंके कारण सत्त्व, रज और तम—ये उसके तीन गुण प्रसिद्ध हैं।

तमोगुण ३३ रजोगुण विक्षेपशक्ती रजसः क्रियात्मिका यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी। रागादयोऽस्याः प्रभवन्ति नित्यं दुःखादयो ये मनसोविकाराः ॥ ११३ ॥ क्रियारूपा विक्षेपशक्ति रजोगुणकी है जिससे सनातनकालसे समस्त क्रियाएँ होती आयी हैं और जिससे रागादि और दुःखादि, जो मनके विकार हैं, सदा उत्पन्न होते हैं। कामः क्रोधो लोभदम्भाद्यसूया- हङ्कारेर्ष्यामत्सराद्यास्तु घोराः। धर्मा एते राजसाः पुम्प्रवृत्ति- र्यस्मादेषा तद्रजो बन्धहेतुः ॥ ११४ ॥ काम, क्रोध, लोभ, दम्भ, असूया (गुणोंमें दोष ढूँढ़ना), अभिमान, ईर्ष्या और मत्सर—ये घोर धर्म रजोगुणके ही हैं। अतः जिसके कारण जीव कर्मोंमें प्रवृत्त होता है वह रजोगुण ही उसके बन्धनका हेतु है। तमोगुण एषावृत्तिर्नाम तमोगुणस्य शक्तिर्यया वस्त्ववभासतेऽन्यथा। सैषा निदानं पुरुषस्य संसृते- र्विक्षेपशक्तेः प्रसरस्य हेतुः ॥ ११५ ॥ जिसके कारण वस्तु कुछ-की-कुछ प्रतीत होने लगती है वह तमोगुणकी आवरणशक्ति है। यही पुरुषके (जन्म-मरण-रूप) संसारका आदि-कारण है और यही विक्षेपशक्तिके प्रसारका भी हेतु है। प्रज्ञावानपि पण्डितोऽपि चतुरोऽप्यत्यन्तसूक्ष्मार्थदृक् व्यालीढस्तमसा न वेत्ति बहुधा सम्बोधितोऽपि स्फुटम्। भ्रान्त्यरोपितमेव साधु कलयत्यालम्बते तद्गुणान् हन्तासौ प्रबला दुरन्ततमसः शक्तिर्महत्यावृतिः ॥ ११६ ॥ 133 विवेक-चूडामणि—2 A

३४ विवेक-चूडामणि तमसे ग्रस्त हुआ पुरुष अति बुद्धिमान्, विद्वान्, चतुर और शास्त्रके अत्यन्त सूक्ष्म अर्थोंको देखनेवाला भी हो तो भी वह नाना प्रकार समझानेसे भी अच्छी तरह नहीं समझता; वह भ्रमसे आरोपित किये हुए पदार्थोंको ही सत्य समझता है और उन्हींके गुणोंका आश्रय लेता है। अहो! दुरन्त तमोगुणकी यह महती आवरण-शक्ति बड़ी ही प्रबल है। अभावना वा विपरीतभावना- सम्भावना विप्रतिपत्तिरस्याः। संसर्गयुक्तं न विमुञ्चति ध्रुवं विक्षेपशक्तिः क्षपयत्यजस्रम् ॥ ११७॥ इस आवरणशक्तिके संसर्गसे युक्त पुरुषको अभावना, विपरीतभावना, असम्भावना और विप्रतिपत्ति—ये तमोगुणकी शक्तियाँ नहीं छोड़तीं और विक्षेपशक्ति भी उसे निरन्तर डावाँडोल ही रखती है।* अज्ञानमालस्यजडत्वनिद्रा- प्रमादमूढत्वमुखास्तमोगुणाः । एतैः प्रयुक्तो न हि वेत्ति किञ्चि- न्निद्रालुवत्स्तम्भवदेव तिष्ठति ॥ ११८॥ अज्ञान, आलस्य, जडता, निद्रा, प्रमाद, मूढ़ता आदि तमके गुण हैं। इनसे युक्त हुआ पुरुष कुछ नहीं समझता; वह निद्रालु या स्तम्भके समान [जडवत्] रहता है।

  • 'ब्रह्म नहीं है' जिससे ऐसा ज्ञान हो वह 'अभावना' कहलाती है। 'मैं शरीर हूँ' यह 'विपरीतभावना' है। किसीके होनेमें सन्देह 'असम्भावना' है और 'है या नहीं' इस तरहके संशयको 'विप्रतिपत्ति' कहते हैं। 'प्रपंचका व्यवहार' ही मायाकी 'विक्षेपशक्ति' है। 133 विवेक-चूडामणि—2 B

कारण-शरीर ३५ सत्त्वगुण सत्त्वं विशुद्धं जलवत्तथापि ताभ्यां मिलित्वा सरणाय कल्पते। यत्रात्मबिम्बः प्रतिबिम्बितः सन् प्रकाशयत्यर्क इवाखिलं जडम्॥ ११९॥ सत्त्वगुण जलके समान शुद्ध है, तथापि रज और तमसे मिलनेपर वह भी पुरुषकी प्रवृत्तिका कारण होता है; इसमें प्रतिबिम्बित होकर आत्मबिम्ब सूर्यके समान समस्त जड पदार्थोंको प्रकाशित करता है। मिश्रस्य सत्त्वस्य भवन्ति धर्मा- स्त्वमानिताद्या नियमा यमाद्याः। श्रद्धा च भक्तिश्च मुमुक्षुता च दैवी च सम्पत्तिरसन्निवृत्तिः॥ १२०॥ अमानित्व आदि, यम-नियमादि, श्रद्धा, भक्ति, मुमुक्षुता, दैवी-सम्पत्ति तथा असत्का त्याग—ये मिश्र (रज-तमसे मिले हुए) सत्त्वगुणके धर्म हैं। विशुद्धसत्त्वस्य गुणाः प्रसादः स्वात्मानुभूतिः परमा प्रशान्तिः। तृप्तिः प्रहर्षः परमात्मनिष्ठा यया सदानन्दरसं समृच्छति॥ १२१॥ प्रसन्नता, आत्मानुभव, परमशान्ति, तृप्ति, आत्यन्तिक आनन्द और परमात्मामें स्थिति—ये विशुद्ध सत्त्वगुणके धर्म हैं, जिनसे मुमुक्षु नित्यानन्दरसको प्राप्त करता है। कारण-शरीर अव्यक्तमेतत्त्रिगुणैर्निरुक्तं तत्कारणं नाम शरीरमात्मनः। सुषुप्तिरेतस्य विभक्त्यवस्था प्रलीनसर्वेन्द्रियबुद्धिवृत्तिः ॥१२२॥ 133 विवेक-चूडामणि—2 C

३६ विवेक-चूडामणि इस प्रकार तीनों गुणोंके निरूपणसे यह अव्यक्तका वर्णन हुआ। यही आत्माका कारण-शरीर है। इसकी अभिव्यक्तिकी अवस्था सुषुप्ति है, जिसमें बुद्धिकी सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं। सर्वप्रकारप्रमितिप्रशान्ति- र्बीजात्मनावस्थितिरेव बुद्धेः। सुषुप्तिरेतस्य किल प्रतीतिः किञ्चिन्न वेद्मीति जगत्प्रसिद्धेः ॥ १२३॥ जहाँ सब प्रकारकी प्रमा (ज्ञान) शान्त हो जाती है और बुद्धि बीजरूपसे ही स्थिर रहती है, वह सुषुप्ति अवस्था है इसकी प्रतीति 'मैं कुछ नहीं जानता'—ऐसी लोक-प्रसिद्ध उक्तिसे होती है। अनात्म-निरूपण देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादयः सर्वे विकारा विषयाः सुखादयः। व्योमादिभूतान्यखिलं च विश्व- मव्यक्तपर्यन्तमिदं ह्यनात्मा ॥ १२४॥ देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और अहंकार आदि सारे विकार, सुखादि सम्पूर्ण विषय, आकाशादि भूत और अव्यक्तपर्यन्त निखिल विश्व—ये सभी अनात्मा हैं। माया मायाकार्यं सर्वं महदादि देहपर्यन्तम्। असदिदमनात्मकं त्वं विद्धि मरुमरीचिकाकल्पम् ॥ १२५॥ माया और महत्तत्त्वसे लेकर देहपर्यन्त मायाके सम्पूर्ण कार्योंको तू मरुमरीचिकाके समान असत् और अनात्मक जान। आत्म-निरूपण अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि स्वरूपं परमात्मनः। यद्विज्ञाय नरो बन्धान्मुक्तः कैवल्यमश्नुते ॥ १२६॥ 133 विवेक-चूडामणि—2 D

आत्म-निरूपण ३७ अब मैं तुझे परमात्माका स्वरूप बताता हूँ जिसे जानकर मनुष्य बन्धनसे छूटकर कैवल्यपद प्राप्त करता है। अस्ति कश्चित् स्वयं नित्यमहंप्रत्ययलम्बनः । अवस्थात्रयसाक्षी सन्पञ्चकोशविलक्षणः ॥ १२७ ॥ अहं-प्रत्ययका आधार कोई स्वयं नित्य पदार्थ है, जो तीनों अवस्थाओंका साक्षी होकर भी पंचकोशातीत है। यो विजानाति सकलं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । बुद्धितद्वृत्तिसद्भावमभावमहमित्ययम् ॥ १२८ ॥ जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओंमें बुद्धि और उसकी वृत्तियोंके होने और न होनेको 'अहंभाव' से स्थित हुआ जानता है। यः पश्यति स्वयं सर्वं यं न पश्यति कश्चन । यश्चेतयति बुद्ध्यादिं न तु यं चेतयत्ययम् ॥ १२९ ॥ जो स्वयं सबको देखता है किन्तु जिसको कोई नहीं देख सकता, जो बुद्धि आदिको प्रकाशित करता है किन्तु जिसे बुद्धि आदि प्रकाशित नहीं कर सकते। येन विश्वमिदं व्याप्तं यन्न व्याप्नोति किञ्चन । आभारूपमिदं सर्वं यं भान्तमनुभात्ययम् ॥ १३० ॥ जिसने सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त किया हुआ है किन्तु जिसे कोई व्याप्त नहीं कर सकता तथा जिसके भासनेपर यह आभासरूप सारा जगत् भासित हो रहा है। यस्य सन्निधिमात्रेण देहेन्द्रियमनोधियः । विषयेषु स्वकीयेषु वर्तन्ते प्रेरिता इव ॥ १३१ ॥ जिसकी सन्निधिमात्रसे देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि प्रेरित हुए-से अपने-अपने विषयोंमें बर्तते हैं। अहङ्कारादिदेहान्ता विषयाश्च सुखादयः । वेद्यन्ते घटवद्येन नित्यबोधस्वरूपिणा ॥ १३२ ॥

३८ विवेक-चूडामणि अहंकारसे लेकर देहपर्यन्त और सुख आदि समस्त विषय जिस नित्यज्ञानस्वरूपके द्वारा घटके समान जाने जाते हैं। एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्डसुखानुभूतिः । सदैकरूपः प्रतिबोधमात्रो येनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥ १३३ ॥ यही नित्य अखण्डानन्दानुभवरूप अन्तरात्मा पुराणपुरुष है, जो सदा एकरूप और बोधमात्र है तथा जिसकी प्रेरणासे वागादि इन्द्रियाँ और प्राण चलते हैं। अत्रैव सत्त्वात्मनि धीगुहाया- मव्याकृताकाश उरुप्रकाशः । आकाश उच्चै रविवत्प्रकाशते स्वतेजसा विश्वमिदं प्रकाशयन् ॥ १३४ ॥ इस सत्त्वात्मा अर्थात् बुद्धिरूप गुहामें स्थित अव्यक्ताकाशके भीतर एक परमप्रकाशमय आकाश सूर्यके समान अपने तेजसे इस सम्पूर्ण जगत्को देदीप्यमान करता हुआ बड़ी तीव्रतासे प्रकाशमान हो रहा है। ज्ञाता मनोऽहङ्कृतिविक्रियाणां देहेन्द्रियप्राणकृतक्रियाणाम् । अयोऽग्निवत्ताननुवर्तमानो न चेष्टते नो विकरोति किञ्चन ॥ १३५ ॥ वह मन और अहंकाररूप विकारोंका तथा देह, इन्द्रिय और प्राणोंकी क्रियाओंकां ज्ञाता है। तथा तपाये हुए लोहपिण्डके समान उनका अनुवर्तन करता हुआ भी न कुछ चेष्टा करता है और न विकारको ही प्राप्त होता है। न जायते नो म्रियते न वर्धते न क्षीयते नो विकरोति नित्यः।

अध्यास ३९ विलीयमानेऽपि वपुष्यमुष्मिन् न लीयते कुम्भ इवाम्बरं स्वयम् ॥ १३६ ॥ वह न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है, न घटता है और न विकारको प्राप्त होता है। वह नित्य है और इस शरीरके लीन होनेपर भी घटके टूटनेपर घटाकाशके समान लीन नहीं होता। प्रकृतिविकृतिभिन्नः शुद्धबोधस्वभावः सदसदिदमशेषं भासयन्निर्विशेषः । विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था- स्वहमहमिति साक्षात् साक्षिरूपेण बुद्धेः ॥ १३७॥ प्रकृति और उसके विकारोंसे भिन्न, शुद्ध ज्ञानस्वरूप, वह निर्विशेष परमात्मा सत्-असत् सबको प्रकाशित करता हुआ जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें अहंभावसे स्फुरित होता हुआ बुद्धिके साक्षीरूपसे साक्षात् विराजमान है। नियमितमनसामुं त्वं स्वमात्मानमात्म- न्ययमहमिति साक्षाद्विद्धि बुद्धिप्रसादात्। जनिमरणतरङ्गापारसंसारसिन्धुं प्रतर भव कृतार्थो ब्रह्मरूपेण संस्थः ॥ १३८ ॥ तू इस आत्माको संयतचित्त होकर बुद्धिके प्रसन्न होनेपर 'यह मैं हूँ'—ऐसा अपने अन्तःकरणमें साक्षात् अनुभव कर। और [ इस प्रकार ] जन्म-मरणरूपी तरंगोंवाले इस अपार संसार-सागरको पार कर तथा ब्रह्मरूपसे स्थित होकर कृतार्थ हो जा। अध्यास अत्रानात्मन्यहमिति मतिर्बन्ध एषोऽस्य पुंसः प्राप्तोऽज्ञानाज्जननमरणक्लेशसम्पातहेतुः । येनैवायं वपुरिदमसत्सत्यमित्यात्मबुद्ध्या पुष्यत्युक्षत्यवति विषयैस्तन्तुभिः कोशकृद्वत् ॥ १३९ ॥

४० विवेक-चूडामणि पुरुषका अनात्म-वस्तुओंमें 'अहम्' इस आत्म-बुद्धिका होना ही जन्म-मरणरूपी क्लेशोंकी प्राप्ति करानेवाला अज्ञानसे प्राप्त हुआ बन्धन है; जिसके कारण यह जीव इस असत् शरीरको सत्य समझकर इसमें आत्मबुद्धि हो जानेसे, तन्तुओंसे रेशमके कीड़ेके समान, इसका विषयोंद्वारा पोषण, मार्जन और रक्षण करता रहता है। अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा विवेकाभावाद्धै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा। ततोऽनर्थव्रातो निपतति समादातुरधिक- स्ततो योऽसद्ग्राहः स हि भवति बन्धः शृणु सखे ॥ १४० ॥ मूढ़ पुरुषको तमोगुणके कारण ही अन्यमें अन्य-बुद्धि होती है; विवेक न होनेसे ही रज्जुमें सर्प-बुद्धि होती है; ऐसी बुद्धिवालेको ही नाना प्रकारके अनर्थोंका समूह आ घेरता है; अतः हे मित्र! सुन, यह जो असद्ग्राह (असत्को सत्य मानना) है वही बन्धन है। अखण्डनित्याद्वयबोधशक्त्या स्फुरन्तमात्मानमनन्तवैभवम् । समावृणोत्यावृतिशक्तिरेषा तमोमयी राहुरिवार्कविम्बम् ॥ १४१ ॥ अखण्ड, नित्य और अद्वय बोध-शक्तिसे स्फुरित होते हुए अखण्डैश्वर्यसम्पन्न आत्मतत्त्वको यह तमोमयी आवरणशक्ति इस प्रकार ढँक लेती है जैसे सूर्यमण्डलको राहु। तिरोभूते स्वात्मन्यमलतरतेजोवति पुमा- ननात्मानं मोहादहमिति शरीरं कलयति । ततः कामक्रोधप्रभृतिभिरमुं बन्धनगुणैः परं विक्षेपाख्या रजस उरुशक्तिर्व्यथयति ॥ १४२ ॥ अति निर्मल तेजोमय आत्मतत्त्वके तिरोभूत (अदृश्य) होनेपर पुरुष अनात्मदेहको ही मोहसे 'मैं हूँ' ऐसा मानने लगता है। तब रजोगुणकी

आवरणशक्ति और विक्षेपशक्ति ४१ विक्षेप नामवाली अति प्रबल शक्ति काम-क्रोधादि अपने बन्धनकारी गुणोंसे इसको व्यथित करने लगती है। महामोहग्राहग्रसनगलितात्मावगमनो धियो नानावस्थाः स्वयमभिनयंस्तद्गुणतया। अपारे संसारे विषयविषपूरे जलनिधौ निमज्योन्मज्जायं भ्रमति कुमतिः कुत्सितगतिः ॥ १४३ ॥ तब यह नाना प्रकारकी नीच गतियोंवाला कुमति जीव विषयरूपी विषसे भरे हुए इस अपार संसार-समुद्रमें डूबता-उछलता महामोहरूप ग्राहके पंजेमें पड़कर आत्मज्ञानके नष्ट हो जानेसे बुद्धिके गुणोंका अभिमानी होकर उसकी नाना अवस्थाओंका अभिनय (नाट्य) करता हुआ भ्रमता रहता है। भानुप्रभासञ्जनिताभ्रपङ्क्ति- र्भानुं तिरोधाय विजृम्भते यथा। आत्मोदिताहङ्कृतिरात्मतत्त्वं तथा तिरोधाय विजृम्भते स्वयम् ॥ १४४ ॥ जिस प्रकार सूर्यके तेजसे उत्पन्न हुई मेघमाला सूर्यहीको ढँककर स्वयं फैल जाती है, उसी प्रकार आत्मासे प्रकट हुआ अहंकार आत्माको ही आच्छादित करके स्वयं स्थित हो जाता है। आवरणशक्ति और विक्षेपशक्ति कवलितदिननाथे दुर्दिने सान्द्रमेघै- र्व्यथयति हिमझञ्झावायुरुग्रो यथैतान्। अविरततमसात्मन्यावृते मूढबुद्धिं क्षपयति बहुदुःखैस्तीव्रविक्षेपशक्तिः ॥ १४५ ॥ जिस प्रकार किसी दुर्दिनमें (जिस दिन आँधी, मेघ आदिका विशेष उत्पात हो) सघन मेघोंके द्वारा सूर्यदेवके आच्छादित होनेपर अति भयंकर

४२ विवेक-चूडामणि और ठंडी-ठंडी आँधी सबको खिन्न कर देती है, उसी प्रकार बुद्धिके निरन्तर तमोगुणसे आवृत होनेपर मूढ़ पुरुषको विक्षेपशक्ति नाना प्रकारके दुःखोंसे सन्तप्त करती है। एताभ्यामेव शक्तिभ्यां बन्धः पुंसः समागतः । याभ्यां विमोहितो देहं मत्वात्मानं भ्रमत्ययम् ॥ १४६ ॥ इन दोनों (आवरण और विक्षेप) शक्तियोंसे ही पुरुषको बन्धनकी प्राप्ति हुई है और इन्हींसे मोहित होकर यह देहको आत्मा मानकर संसार- चक्रमें भ्रमता रहता है। बन्ध-निरूपण बीजं संसृतिभूमिजस्य तु तमो देहात्मधीरङ्कुरो रागः पल्लवमम्बु कर्म तु वपुः स्कन्धोऽसवः शाखिकाः । अग्राणीन्द्रियसंहतिश्च विषयाः पुष्पाणि दुःखं फलं नानाकर्मसमुद्भवं बहुविधं भोक्तात्र जीवः खगः ॥ १४७ ॥ संसाररूपी वृक्षका बीज अज्ञान है, देहात्मबुद्धि उसका अंकुर है, राग पत्ते हैं, कर्म जल है, शरीर स्तम्भ (तना) है, प्राण शाखाएँ हैं, इन्द्रियाँ उपशाखाएँ (गुद्दे) हैं, विषय पुष्प हैं और नाना प्रकारके कर्मोंसे उत्पन्न हुआ दुःख फल है तथा जीवरूपी पक्षी ही इनका भोक्ता है। अज्ञानमूलोऽयमनात्मबन्धो नैसर्गिकोऽनादिरनन्त ईरितः । जन्माप्ययव्याधिजरादिदुःख- प्रवाहपातं जनयत्यमुष्य ॥ १४८ ॥ यह अज्ञानजनित अनात्म-बन्धन स्वाभाविक तथा अनादि और अनन्त कहा गया है। यही जीवके जन्म, मरण, व्याधि और जरा (वृद्धावस्था) आदि दुःखोंका प्रवाह उत्पन्न कर देता है।

आत्मानात्म-विवेक ४३ आत्मानात्म-विवेक नास्त्रैर्न शस्त्रैरनिलेन वह्निना छेत्तुं न शक्यो न च कर्मकोटिभिः। विवेकविज्ञानमहासिना विना धातुः प्रसादेन सितेन मञ्जुना ॥ १४९ ॥ यह बन्धन विधाताकी विशुद्ध कृपासे प्राप्त हुए विवेक-विज्ञान-रूप शुभ्र और मंजुल महाखड्गके बिना और किसी अस्त्र, शस्त्र, वायु, अग्नि अथवा करोड़ों कर्मकलापोंसे भी नहीं काटा जा सकता। श्रुतिप्रमाणैकमतेः स्वधर्म- निष्ठा तयैवात्मविशुद्धिरस्य। विशुद्धबुद्धेः परमात्मवेदनं तेनैव संसारसमूलनाशः ॥ १५० ॥ जिसका श्रुतिप्रामाण्यमें दृढ़ निश्चय होता है, उसीकी स्वधर्ममें निष्ठा होती है और उसीसे उसकी चित्तशुद्धि हो जाती है; जिसका चित्त शुद्ध होता है उसीको परमात्माका ज्ञान होता है और इस ज्ञानसे ही संसाररूपी वृक्षका समूल नाश होता है। कोशैरन्नमयाद्यैः पञ्चभिरात्मा न संवृतो भाति। निजशक्तिसमुत्पन्नैः शैवालपटलैरिवाम्बु वापीस्थम् ॥ १५१ ॥ अन्नमय आदि पाँच कोशोंसे आवृत हुआ आत्मा, अपनी ही शक्तिसे उत्पन्न हुए शिवाल-पटलसे ढँके हुए वापीके जलकी भाँति नहीं भासता। तच्छैवालापनये सम्यक् सलिलं प्रतीयते शुद्धम्। तृष्णासन्तापहरं सद्यः सौख्यप्रदं परं पुंसः ॥ १५२ ॥ पञ्चानामपि कोशानामपवादे विभात्ययं शुद्धः। नित्यानन्दैकरसः प्रत्यग्रूपः परः स्वयंज्योतिः ॥ १५३ ॥ जिस प्रकार उस शिवालके पूर्णतया दूर हो जानेपर मनुष्योंके तृषारूपी तापको दूर करनेवाला तथा उन्हें तत्काल ही परम सुख-प्रदान करनेवाला जल

४४ विवेक-चूडामणि स्पष्ट प्रतीत होने लगता है उसी प्रकार पाँचों कोशोंका अपवाद करनेपर यह शुद्ध, नित्यानन्दैकरसस्वरूप, अन्तर्यामी, स्वयंप्रकाश परमात्मा भासने लगता है। आत्मानात्मविवेकः कर्तव्यो बन्धमुक्तये विदुषा। तेनैवानन्दी भवति स्वं विज्ञाय सच्चिदानन्दम् ॥ १५४॥ बन्धनकी निवृत्तिके लिये विद्वान्को आत्मा और अनात्माका विवेक करना चाहिये। उसीसे अपने-आपको सच्चिदानन्दरूप जानकर वह आनन्दित हो जाता है। मुञ्जादिषीकामिव दृश्यवर्गात् प्रत्यंचमात्मानमसङ्गमक्रियम् । विविच्य तत्र प्रविलाप्य सर्वं तदात्मना तिष्ठति यः स मुक्तः ॥ १५५ ॥ जो पुरुष अपने असंग और अक्रिय प्रत्यगात्माको मूँजमेंसे सींकके समान दृश्यवर्गसे पृथक् करके तथा सबका उसीमें लय करके आत्मभावमें ही स्थित रहता है, वही मुक्त है। अन्नमय कोश देहोऽयमन्नभवनोऽन्नमयस्तु कोश- श्चान्नेन जीवति विनश्यति तद्विहीनः । त्वक्चर्ममांसरुधिरास्थिपुरीषराशि- र्नायं स्वयं भवितुमर्हति नित्यशुद्धः ॥ १५६ ॥ अन्नसे उत्पन्न हुआ यह देह ही अन्नमय कोश है, जो अन्नसे ही जीता है और उसके बिना नष्ट हो जाता है। यह त्वचा, चर्म, मांस, रुधिर, अस्थि और मल आदिका समूह स्वयं नित्यशुद्ध आत्मा नहीं हो सकता। पूर्वं जनेरपि मृतेरपि नायमस्ति जातःक्षणं क्षणगुणोऽनियतस्वभावः । नैको जडश्च घटवत्परिदृश्यमानः स्वात्मा कथं भवति भावविकारवेत्ता ॥ १५७ ॥

अन्नमय कोश ४५ यह जन्मसे पूर्व और मृत्युके पश्चात् भी नहीं रहता, क्षणमें जन्म लेता है, क्षणिक गुणवाला है और अस्थिरस्वभाव है; तथा अनेक तत्त्वोंका संघात, जड और घटके समान दृश्य है, फिर यह भाव-विकारोंका जाननेवाला अपना आत्मा कैसे हो सकता है? पाणिपादादिमान्देहो नात्मा व्यंगेऽपि जीवनात्। तत्तच्छक्तेरनाशाच्च न नियम्यो नियामकः ॥ १५८ ॥ यह हाथ-पैरोंवाला शरीर आत्मा नहीं हो सकता, क्योंकि उसके अंग-भंग होनेपर भी अपनी शक्तिका नाश न होनेके कारण पुरुष जीवित रहता है। इसके सिवा जो शरीर स्वयं शासित है, वह शासक आत्मा कभी नहीं हो सकता। देहतद्धर्मतत्कर्मतदवस्थादिसाक्षिणः । स्वत एव स्वतः सिद्धं तद्वैलक्षण्यमात्मनः ॥ १५९ ॥ देह, उसके धर्म, उसके कर्म तथा उसकी अवस्थाओंके साक्षी आत्माकी उससे पृथक्ता स्वयं ही स्वतःसिद्ध है। कुल्यराशिर्मांसलिप्तो मलपूर्णोऽतिकश्मलः। कथं भवेदयं वेत्ता स्वयमेतद्विलक्षणः ॥ १६० ॥ हड्डियोंका समूह, मांससे लिथड़ा हुआ और मलसे भरा हुआ यह अति कुत्सित देह, अपनेसे भिन्न अपना जाननेवाला स्वयं ही कैसे हो सकता है? त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशा- वहंमतिं मूढजनः करोति। विलक्षणं वेत्ति विचारशीलो निजस्वरूपं परमार्थभूतम् ॥ १६१ ॥ त्वचा, मांस, मेद, अस्थि और मलकी राशिरूप इस देहमें मूढजन ही अहंबुद्धि करते हैं। विचारशील तो अपने पारमार्थिक स्वरूपको इससे पृथक् ही जानते हैं।

४६ विवेक-चूडामणि देहोऽहमित्येव जडस्य बुद्धि- र्देहे च जीवे विदुषस्त्वहंधीः। विवेकविज्ञानवतो महात्मनो ब्रह्माहमित्येव मतिः सदात्मनि॥ १६२ ॥ जड पुरुषोंकी 'मैं देह हूँ'-ऐसी देहमें अहंबुद्धि होती है, विद्वान् (शास्त्रज्ञ)-की जीवमें और विवेक-विज्ञानयुक्त महात्माकी 'मैं ब्रह्म हूँ'- ऐसी सत्य आत्मामें ही अहंबुद्धि होती है। अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशौ । सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे कुरुष्व शान्तिं परमां भजस्व॥ १६३॥ अरे मूर्ख! इस त्वचा, मांस, मेद, अस्थि और मलादिके समूहमें आत्मबुद्धि छोड़ और सर्वात्मा निर्विकल्प ब्रह्ममें ही आत्मभाव करके परम शान्तिका भोग कर। देहेन्द्रियादावसति भ्रमोदितां विद्वानहन्तां न जहाति यावत्। तावन्न तस्यास्ति विमुक्तिवार्ता- प्यस्त्वेष वेदान्तनयान्तदर्शी ॥ १६४ ॥ जबतक विद्वान् असत् देह और इन्द्रिय आदिमें भ्रमसे उत्पन्न हुई अहंताको नहीं त्यागता, तबतक वह वेदान्त-सिद्धान्तोंका पारदर्शी क्यों न हो, उसके मोक्षकी कोई बात ही नहीं है। छायाशरीरे प्रतिबिम्बगात्रे यत्स्वप्नदेहे हृदि कल्पितांगे। यथात्मबुद्धिस्तव नास्ति काचि- ज्जीवच्छरीरे च तथैव मास्तु ॥ १६५ ॥ छाया, प्रतिबिम्ब, स्वप्न और मनमें कल्पित किये हुए शरीरोंमें जिस

अन्नमय कोश ४७ प्रकार तेरी कभी आत्मबुद्धि नहीं होती, उसी प्रकार जीवित शरीरमें भी कभी न होनी चाहिये। देहात्मधीरेव नृणामसिद्धां जन्मादिदुःखप्रभवस्य बीजम्। यतस्ततस्त्वं जहि तां प्रयत्ना- त्यक्ते तु चित्ते न पुनर्भवाशा ॥ १६६ ॥ क्योंकि देहात्म-बुद्धि ही असद्बुद्धि मनुष्योंके जन्मादि दुःखोंकी उत्पत्तिकी कारण है, अतः उसे तू प्रयत्नपूर्वक छोड़ दे, उस बुद्धिके छूट जानेपर फिर पुनर्जन्मकी कोई आशंका न रहेगी।

प्राणमय कोश कर्मेंन्द्रियैः पंचभिरञ्चितोऽयं प्राणो भवेत्प्राणमयस्तु कोशः। येनात्मवानन्नमयोऽन्नपूर्णः प्रवर्ततेऽसौ सकलक्रियासु ॥ १६७॥ पाँच कर्मेन्द्रियोंसे युक्त यह प्राण ही प्राणमय कोश कहलाता है, जिससे युक्त यह अन्नमय कोश अन्नसे तृप्त होकर समस्त कर्मोंमें प्रवृत्त होता है। नैवात्मापि प्राणमयो वायुविकारो गन्तागन्ता वायुवदन्तर्बहिरेषः। यस्मात्किञ्चित्क्वापि न वेत्तीष्टमनिष्टं स्वं वान्यं वा किञ्चन नित्यं परतन्त्रः ॥ १६८ ॥ प्राणमय कोश भी आत्मा नहीं है, क्योंकि यह वायुका विकार है, वायुके समान ही बाहर-भीतर जाने-आनेवाला है और नित्य परतन्त्र है। यह कभी अपना इष्ट-अनिष्ट, अपना-पराया भी कुछ नहीं जानता। मनोमय कोश ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमयः स्यात् कोशो ममाहमिति वस्तुविकल्पहेतुः। संज्ञादिभेदकलनाकलितो बलीयां- स्तत्पूर्वकोशमभिपूर्य विजृम्भते यः ॥ १६९ ॥ ज्ञानेन्द्रियाँ और मन ही 'मैं, मेरा' आदि विकल्पोंका हेतु मनोमय कोश है, जो नामादि भेद-कलनाओंसे जाना जाता है और बड़ा बलवान् है, तथा पूर्व-कोशोंको व्याप्त करके स्थित है।

मनोमय कोश ४९ पञ्चेन्द्रियैः पञ्चभिरेव होतृभिः प्रचीयमानो विषयाज्यधारया। जाज्वल्यमानो बहुवासनेन्धनै- र्मनोमयाग्निर्दहति प्रपंचम्॥ १७०॥ पंचेन्द्रियरूप पाँच होताओंद्वारा विषयरूपी घृतकी आहुतियोंसे बढ़ाया हुआ तथा नाना प्रकारकी वासनारूप ईंधनसे प्रज्वलित हुआ यह मनोमय अग्नि(यज्ञ) सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचको दग्ध कर देता है। [ अर्थात् जिस समय इन्द्रियाँ वासनारूपी ईंधनको जलाकर प्रकट किये मनोमय अग्निमें विषयोंको हवन कर देती हैं उस समय यह सम्पूर्ण प्रपंच लीन हो जाता है। ] न ह्यस्त्यविद्या मनसोऽतिरिक्ता मनो ह्यविद्या भवबन्धहेतुः। तस्मिन्विनष्टे सकलं विनष्टं विजृम्भितेऽस्मिन्सकलं विजृम्भते॥ १७१॥ मनसे अतिरिक्त अविद्या और कुछ नहीं है, मन ही भवबन्धनकी हेतुभूता अविद्या है। उसके नष्ट होनेपर सब नष्ट हो जाता है और उसीके जागृत होनेपर सब कुछ प्रतीत होने लगता है। स्वप्नेऽर्थशून्ये सृजति स्वशक्त्या भोक्त्रादि विश्वं मन एव सर्वम्। तथैव जाग्रत्यपि नो विशेष- स्तत्सर्वमेतन्मनसो विजृम्भणम्॥ १७२॥ जिसमें कोई पदार्थ नहीं होता उस स्वप्नमें मन ही अपनी शक्तिसे सम्पूर्ण भोक्ता-भोग्यादि प्रपंच रचता है, उसी प्रकार जागृतिमें भी और कोई विशेषता नहीं है, अतः यह सब मनका विलासमात्र ही है। सुषुप्तिकाले मनसि प्रलीने नैवास्ति किञ्चित्सकलप्रसिद्धेः। अतो मनःकल्पित एव पुंसः संसार एतस्य न वस्तुतोऽस्ति॥ १७३॥

५० विवेक-चूड़ामणि सुषुप्ति-कालमें मनके लीन हो जानेपर कुछ भी नहीं रहता-यह बात सबको विदित ही है। अतः इस पुरुष (जीव)-का यह संसार-मनकी कल्पनामात्र ही है, वस्तुतः नहीं। वायुनानीयते मेघः पुनस्तेनैव नीयते। मनसा कल्प्यते बन्धो मोक्षस्तेनैव कल्प्यते ॥ १७४ ॥ मेघ वायुके द्वारा आता है और फिर उसीके द्वारा चला जाता है, इसी प्रकार मनसे ही बन्धनकी कल्पना होती है और उसीसे मोक्षकी। देहादिसर्वविषये परिकल्प्य रागं बध्नाति तेन पुरुषं पशुवद्गुणेन । वैरस्यमत्र विषवत्सु विधाय पश्चा- देनं विमोचयति तन्मन एव बन्धात् ॥ १७५ ॥ यह मन ही देह आदि सब विषयोंमें रागकी कल्पना करके उसके द्वारा रस्सीसे पशुकी भाँति पुरुषको बाँधता है और फिर इन विषवत् विषयोंमें विरसता उत्पन्न करके इसको बन्धनसे मुक्त कर देता है। तस्मान्मनः कारणमस्य जन्तो- र्बन्धस्य मोक्षस्य च वा विधाने। बन्धस्य हेतुर्मलिनं रजोगुणै- र्मोक्षस्य शुद्धं विरजस्तमस्कम् ॥ १७६ ॥ इसलिये इस जीवके बन्धन और मोक्षके विधानमें मन ही कारण है, रजोगुणसे मलिन हुआ यह बन्धनका हेतु होता है तथा रज-तमसे रहित शुद्ध सात्त्विक होनेपर मोक्षका कारण होता है। विवेकवैराग्यगुणातिरेका- च्छुद्धत्वमासाद्य मनो विमुक्त्यै। भवत्यतो बुद्धिमतो मुमुक्षो- स्ताभ्यां दृढाभ्यां भवितव्यमग्रे ॥ १७७ ॥

मनोमय कोश ५१ विवेक-वैराग्यादि गुणोंके उत्कर्षसे शुद्धताको प्राप्त हुआ मन मुक्तिका हेतु होता है, अतः पहले बुद्धिमान् मुमुक्षुके वे (ज्ञान-वैराग्य) दोनों ही दृढ़ होने चाहिये। मनो नाम महाव्याघ्रो विषयारण्यभूमिषु। चरत्यत्र न गच्छन्तु साधवो ये मुमुक्षवः ॥ १७८ ॥ मन नामका भयंकर व्याघ्र विषयरूप वनमें घूमता फिरता है। जो साधु मुमुक्षु हैं, वे वहाँ न जायें। मनः प्रसूते विषयानशेषान् स्थूलात्मना सूक्ष्मतया च भोक्तुः। शरीरवर्णाश्रमजातिभेदान् गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥ १७९ ॥ मन ही सम्पूर्ण स्थूल-सूक्ष्म विषयोंको, शरीर, वर्ण, आश्रम, जाति आदि भेदोंको तथा गुण, क्रिया, हेतु और फलादिको भोक्ताके लिये नित्य उत्पन्न करता रहता है। असङ्गचिद्रूपममुं विमोह्य देहेन्द्रियप्राणगुणैर्निबध्य । अहम्ममेति भ्रमयत्यजस्रं मनः स्वकृत्येषु फलोपभुक्तिषु ॥ १८० ॥ इस असंग चिद्रूप आत्माको मोहित करके तथा इसे देह, इन्द्रिय, प्राणादि गुणोंसे बाँधकर, यह मन ही इसको 'मैं-मेरा' भावसे अपने कर्म और उनके फलोपभोगमें निरन्तर भटकाता है। अध्यासदोषात्पुरुषस्य संसृति- रध्यासबन्धस्त्वमुनैव कल्पितः। रजस्तमोदोषवतोऽविवेकिनो जन्मादिदुःखस्य निदानमेतत् ॥ १८१ ॥ अध्यास-दोषसे ही पुरुषको जन्म-मरणरूप संसार होता है और यह