योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । ३१७
नित्यकर्म है उसे कीजिये। हे जगत्पति ! जैसे निष्कलङ्क दर्पण प्रतिबिम्ब अङ्गीकार करता है तैसे ही महापुरुष यथा प्राप्त कर्म को असंसक्त होकर अङ्गीकार करते हैं। जैसे ज्ञानवान् को कर्म करने में कुछ प्रयोजन नहीं तैसे ही उसको करने में और न करने में कुछ प्रयोजन नहीं; करना न करना दोनों उसको सम हैं। इस कारण दोनों में आप सुषुप्तिरूप हैं। हे भगवन् ! आप तो सदा सुषुप्तिरूप हैं और उत्थान किसी प्रकार नहीं। इससे आप सुषुप्तिरूप प्रबोध होकर अपने प्रकृत आचार कीजिये। जो इन्द्र ब्राह्मणों के पुत्रों की सृष्टि देखो तब भी विरुद्ध कुछ नहीं। जो ज्ञान दृष्टि से देखो तो एक ही अद्वैत ब्रह्म है और कुछ नहीं बना और जो चित्तदृष्टि से देखो तो संकल्परूप अनेक सृष्टि फुरती है। उसमें आस्था करनी क्या है ? जो चर्मदृष्टि से देखो तो आपको सृष्टि भासती ही नहीं। उनके साथ आपको क्या है; उनकी सृष्टि उन्हीं के चित्त में स्थित है और उनकी सृष्टि आप नाश भी न कर सकोगे क्योंकि जो इन्द्रियों से कर्म होता है वह नष्ट हो सकता है, परन्तु मन के निश्चय कोई को नष्ट नहीं कर सकता । हे भगवन् ! जो निश्चय जिसके चित्त में दृढ़ होगया है उसको वही निवृत्त करे तो निवृत्त होता है और कोई निवृत्त नहीं कर सकता । देह नष्ट होने से निश्चय नहीं नष्ट होता जो चिरकाल का निश्चय दृढ़ हो रहा है उसका स्वरूप से नाश नहीं होता । हे भगवन् ! जो मन में दृढ़ निश्चय हो रहा है वही पुरुष का रूप है; उसका निश्चय और किसी से नहीं होता । जैसे जल सींचने से पर्वत चलायमान नहीं होता तैसे ही चित्त का निश्चय और से चलायमान नहीं होता ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे ऐन्दवनिश्चयकथनन्नाम चतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ ६४ ॥
भानु बोले, हे देवेश ! इस पर एक पूर्व इतिहास है वह आप सुनिये। इन्द्रद्युम्न नाम एक राजा था और उसकी कमलनयनी अहल्या रानी थी। उसके नगर में इन्द्र नामक एक ब्राह्मण का पुत्र बहुत सुन्दर और बलवान् रहता था। एक समय उस रानी ने पूर्व की अहल्या गौतम की स्त्री और इन्द्र की कथा सुनी तब एक सहेली ने कहा, हे रानी ! जैसे पूर्व अहल्या थी तैसे ही तुम भी हो और जैसा वह इन्द्र सुन्दर था तैसे ही
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तुम्हारे नगर में भी एक इन्द्र ब्राह्मण है । हे भगवन् ! जब इस प्रकार रानी ने सुना तब उस इन्द्र में रानी का अनुराग हुआ परन्तु वह रानी को न मिले और रानी का शरीर इसी कारण दिन पर दिन सूखता जावे । निदान राजा ने सुना कि उसको गरमी का कुछ रोग है इस कारण उसकी निवृत्ति के लिये केले के पत्र और शीतल औषधि उसको दिलवाये परन्तु उसको वाञ्छित पदार्थ कोई दृष्टि न आये और खाना, पीना, शय्यादिक जो कुछ इंद्रियों के वाञ्छित पदार्थ हैं वह उसको कोई सुखरूप न भासे । वह दिन दिन पीत वर्ण होती जावे और इन्द्र के वियोग से जैसे जल बिना मछली मरुस्थल में तड़फे तैसे ही वह तड़फती रहे और कहे हा इन्द्र ! हा इन्द्र ! निदान जब उसने लोकलाज त्याग दी और इन्द्र में उसका बहुत स्नेह बढ़ गया तब विचारकर एक सखी ने कहा हे रानी ! मैं ब्राह्मण को ले आती हूँ यह सुन रानी सावधान हुई और जैसे चन्द्रमा को देखके कमलिनी खिल आती है तैसे वह खिल आई । वह सखी रानी से कह के ब्राह्मण के घर गई और उस इन्द्र को प्रबोध करके रात्रि के समय अहल्या के पास ले आई । जब वह गोप्यस्थान में इकट्ठे हुए तो परस्पर लीला करने लगे और दोनों का चित्त परस्पर स्नेह से बँध गया और बहुत प्रसन्न हुए । जैसे चकवी-चकवे और रति और कामदेव का स्नेह होता है तैसे ही उनका स्नेह हुआ और एक दूसरे बिना एक क्षण भी न रह सके । निदान सब क्रिया उनकी निवृत्त हो गई और लज्जा भी दूर हो गई । जैसे चन्द्रमा को देखके चन्द्रमुखी कमल प्रसन्न हो तैसे ही एक दूसरे को देखके वे प्रसन्न होवें । हे भगवन् ! उस रानी का भर्त्ता भी बड़ा गुणवान् था परन्तु रानी ने भर्त्ता का त्याग किया और इन्द्र से उसने स्नेह किया । जब राजा ने उनका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना तो उनको दण्ड देने लगा, परन्तु उनको कुछ खेद न हो और जब कीचड़ में डालें तब कमल की नाईं ऊपर ही रहे, कुछ कष्ट न हो । फिर जब वरफ में उनको डाला तो भी खेद्वान् न हुए । तब राजा ने कहा, हे दुर्मतियो ! तुमको दुःख क्यों नहीं होता ? उन्होंने कहा हमको दुःख कैसे हो, हम तो अपने आपको भी
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नहीं जानते ? तब अहल्या ने कहा मुझको सब इन्द्र ही भासता है; भिन्न दुःख क्या हो ? इन्द्र ने कहा मुझको सब अहल्या ही भासती है; भिन्न दुःख कहाँ हो ? तेरे दण्ड देने से हमको कुछ दुःख नहीं होता हम परस्पर हर्षवान् हैं। तब राजा ने उनको बाँधकर अग्नि में डाल दिया तो भी वह न जले और फिर हाथी के चरणोंतले डलवा दिये गये तो भी उनको कुछ कष्ट न हुआ । तब राजा ने कहा, रे पापियों ! तुमको अग्नि आदिक में दुःख क्यों नहीं होता ? तब इन्द्र ने कहा, हे राजन् ! जो कुछ जग-ज्जाल है वह मन में स्थित है। जैसा मन है तैसा पुरुषरूप है। जैसा निश्चय मन में दृढ़ होता है उसको कोई दूर नहीं कर सकता । चाहे कोई हमको दण्ड दे परन्तु हमको कुछ दुःख न होगा, क्योंकि हमारे हृदय में परस्पर प्रतिभा हो रही है। जो कोई अनिष्ट हमको हो तो दुःख भी हो; हमको अनिष्ट तो कोई नहीं तब दुःख कैसे हो ? हे राजन् ! जो कुछ मन में दृढ़ीभूत होता है वही भासता है उसका निश्चय कोई दूर नहीं कर सकता । शरीर नष्ट हो जाता है परन्तु मन का निश्चय नष्ट नहीं होता । हे राजन् ! जो मन में तीव्र संवेग होता है सो वर और शाप से भी दूर नहीं होता । जैसे सुमेरु पर्वत को मन्द-मन्द वायु नहीं चला सकता तैसे ही मन के निश्चय को कोई नहीं चला सकता । मेरे हृदय में इसकी मूर्ति स्थिरीभूत है और इसके हृदय में मेरी मूर्ति स्थिरी-भूत है । इसको सब जगत् में ही भासता हूँ और मुझको सब जगत् यही भासती है। जो कुछ दूसरा भासे तो दुःख भी हो । जैसे लोहे के कोट में कोई दुःख नहीं दे सकता तैसे ही मुझको कोई दुःख नहीं, मैं जहाँ जाता हूँ वहाँ सब ओर से अहल्या ही भासती है । जैसे ज्येष्ठ आषाढ़ की वर्षा में पर्वत चलायमान नहीं होता तैसे ही हमको दुःख नहीं । हे राजन् ! मन का ही नाम अहल्या और इन्द्र है और मन ही ने सब जगत् रचा है। जैसा-जैसा मन में दृढ़ निश्चय होता है तैसा ही भासता है और सुमेरु की नाईं स्थिर हो जाता है, कदापि नष्ट नहीं होता । जैसे पत्र, फल, फूल, और टहनी के काटने से वृक्ष नष्ट नहीं होता; जब बीज ही नष्ट हो तब वृक्ष नष्ट होता है तैसे ही शरीर के नष्ट होने से मन का
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निश्चय नहीं नष्ट होता । जब मन का निश्चय ही उलट पड़े तब ही दूर होता है । एक शरीर जब नष्ट होता है तब जीव और शरीर धर लेता है जैसे स्वप्न में यह शरीर रहता है और अन्य शरीर धरके चेष्टा करता है तो शरीर के ही अधीन हुआ; तैसे ही शरीर के नष्ट हुए मन का निश्चय दूर नहीं होता । जब मन नष्ट होता है तब शरीर के होते भी कुछ क्रिया सिद्ध नहीं होती । इससे सबका बीज मन ही है । जैसे पत्र, टहनी, फल और फूल का कारण जल है, तैसे ही सब पदार्थों का कारण मन है। जैसा चित्त है वैसा रूप पुरुष का है । इसमें जहाँ मेरा चित्त जाता है वहाँ सब ओर से शान्ति ही भासती है । मुझको दुःख कैसे हो ?
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे कृत्रिमइन्द्रवाक्यन्नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६५ ॥
भानु बोले, हे भगवन् ! इस प्रकार जब इन्द्र ब्राह्मण ने कहा तब कमलनयन राजा ने भरत नाम ऋषीश्वर से जो समीप बैठे थे कहा, हे सर्वधर्मों के वेत्ता भरत मुनीश्वर ! तुम देखो कि यह कैसा ढीठ पापात्मा है । जैसा इनका पाप है उसके अनुसार इनको शाप दो कि यह मर जावें । जो मारने योग्य न हो और उसको राजा मारे तो उसको पाप होता है; तैसे ही पापी के न मारने से भी पाप होता है । इससे इन पापियों को शाप दो कि यह नष्ट हो जावें । भरत मुनि ने उनका पाप विचारके कहा, अरे पापियो ! तुम मर जावो तब उस इन्द्र ब्राह्मण ने कहा, रे दुष्टो ! तुमने जो शाप दिया उससे हमारा क्या होगा ? केवल हमारा शरीर नष्ट होगा मन तो नष्ट होने का नहीं । तुम चाहे लाख यल करो उस मन से हम और शरीर धारण करेंगे—हमारे मन के नष्ट हुए बिना विपर्यय दशा न होगी । ऐसा कहकर दोनों पृथ्वी पर इस भाँति गिर पड़े जैसे मूल के काटे वृक्ष गिर पड़ता है और वासना संयोग से दोनों मृग हुए । वहाँ भी परस्पर स्नेह में रहे और फिर उस जन्म को भी त्यागकर पक्षी हुए । कुछ दिन के पश्चात् उन्होंने उस देह को भी त्याग किया और अब हमारी सृष्टि में तपकर्त्ता पुण्यवान् ब्राह्मण और ब्राह्मणी हुए हैं । इससे तुम देखो कि भरत मुनि ने शाप
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दिया तो उनके शरीर नष्ट हुए परन्तु मन का जो कुछ निश्चय था सो नष्ट न हुआ । वे जहाँ शरीर पावैं वहाँ दोनों इकट्ठे ही अकृत्रिम प्रेम-वान् रहें और किसी से आनन्दमान न हों ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे अहल्यानुरागसमाप्तिवर्णनन्नाम षट्षष्टितमसर्गः ॥ ६६ ॥
भानु बोले, हे नाथ ! आप देखें कि जैसा मन का निश्चय होता है उसके अनुसार आगे भासता है । इन्द्र के पुत्र की सृष्टिवत् मन के निश्चय को कोई दूर नहीं कर सकता । हे जगत् के पति ! मन ही जगत् का कर्त्ता और मन ही पुरुष है । मन का किया सब कुछ होता है और शरीर का किया कोई कार्य नहीं होता । जो मन में दृढ़ निश्चय होता है वह किसी औषध से दूर नहीं होता । जैसे मणि में प्रतिबिम्ब मणि के उठाये बिना नहीं दूर होता तैसे ही मन का निश्चय भी किसी ओर से दूर नहीं होता जब मन ही उल्टे तब ही दूर हो । इसी से कहा है कि अनेक सृष्टि के भ्रम चित्त में स्थित हैं । इससे हे ब्रह्माजी ! आप भी चिदाकाश में सृष्टि रचो । हे नाथ ! तीन आकाश हैं-एक भूताकाश; दूसरा चित्ताकाश और तीसरा चिदाकाश । ये तीनों अनन्त हैं; इनका अन्त कहीं नहीं । भूताकाश चित्ताकाश के आश्रय स्थित है और चित्ताकाश चिदाकाश के आश्रय है । भूताकाश और चित्ताकाश ये दोनों चिदाकाश के आश्रय प्रकाशित हैं । इससे चिदाकाश के आश्रय जितनी आपकी इच्छा हो उतनी सृष्टि आप भी रचिये । चिदाकाश अनन्तरूप है । इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों ने आपका क्या लिया है ? अपना नित्यकर्म आप भी कीजिये । ब्रह्मा बोले, हे वशिष्ठजी ! इस प्रकार जब सूर्य ने मुझसे कहा तो मैंने विचार करके कहा, हे भानु तुमने युक्त वचन कहे हैं कि एक भूताकाश है; दूसरा चित्ताकाश है और तीसरा चिदाकाश है, वे तीनों अनन्त हैं परन्तु भूता-काश और चित्ताकाश दोनों चिदाकाश के आश्रय फुरते हैं । इससे हम भी अपने नित्यकर्म करते हैं और जो कुछ मैं तुमको कहता हूँ वह तुम भी मानो । मेरी सृष्टि के तुम मनु प्रजापति हो और जैसी तुम्हारी इच्छा हो तैसे रचो । सूर्य ने मेरी आज्ञा मानके अपने दो शरीर किये-एक तो
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पूर्व के सूर्य से उस सृष्टि का सूर्य हुआ और दूसरा शरीर स्वायम्भुवमनु का किया । और मेरी आज्ञा के अनुसार उसने सृष्टि रची । इससे मैंने तुमसे कहा है कि यह जगत् सब मन का रचा हुआ है । जो मन में दृढ़ निश्चय होता है वही सफल होता है । जैसे इन्द्र ब्राह्मण की सृष्टि हुई । हे मुनीश्वर ! देह के नष्ट हुए भी मन का निश्चय दूर नहीं होता; चित्त में फिर भी वही भास आता है । वह चित्त आत्मा का किञ्चनरूप है । जैसे उसमें स्फूर्ति होती है तैसे ही होकर भासता है । प्रथम जो शुद्ध संवितरूप में उत्थान हुआ है वह अन्तर्वाहक शरीर है और फिर जो उसमें दृढ़ अभ्यास और स्वरूप का प्रमाद हुआ तो आधिभौतिक शरीर हुए और जब आधिभौतिक का अभिमानी हुआ तब उसका नामी जीव हुआ । देहाभिमान से नाना प्रकार की वासना होती है और उनके अनुसार घटीयन्त्र की नाईं भटकता है । जब फिर आत्मा का बोध होता है तब देह से आदि लेकर दृश्य शान्त हो जाता है । हे मुनीश्वर ! यह सब दृश्य भ्रम से भासता है; वास्तव में न कोई उपजा है और न कोई जगत् है । यह सब भ्रम चित्त ने रचा है उसके अनुसार घटीयन्त्र की नाईं भटकता है । जब फिर आत्मा का बोध होता है तब देह से आदि ले सब प्रपञ्च शान्त हो जाते हैं । हे मुनीश्वर ! जो कुछ दृश्य भासता है वह मन से भासता है । वास्तव में न कोई माया है और न कोई जगत् है—यह सब भ्रम भासता है । हे वशिष्ठजी ! और द्वैत कुछ नहीं; चित्त के फुरने से ही अहं त्वं आदिक भ्रम भासते हैं । जैसे इन्द्र ब्राह्मण के पुत्र मन के निश्चय से ब्रह्मरूप हो गये तैसे ही मैं ब्रह्म हूँ । शुद्ध आत्मा में जो चैत्यता होती है वही ब्रह्मारूप होकर स्थित है और शुद्ध आत्मा में जो चैत्यता होती है वही मनरूप है । उस मन के संयोग से चेतन को जीव कहते हैं । जब इसमें जीवत्त्व होता है तब अपनी देह देखता है और फिर नाना प्रकार के जगद्भ्रम देखता है । जैसे इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों को सृष्टि भासती और जैसे भ्रम से आकाश में दूसरा चन्द्रमा और रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं । प्रत्यक्ष देखने से सत्य भासता है । और नामभाव से असत्य है और
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यह सब मन में फुरता है । मन के दो रूप हैं—एक जड़ और दूसरा चेतन । जड़रूप मन का दृश्यरूप है और चेतनरूप ब्रह्मा है । जब दृश्य की ओर फुरता है तब दृश्यरूप होता है और जब चेतनभाव की ओर स्थित होता है तब जैसे सुवर्ण के जाने से भूषणभाव नष्ट हो जाता है तैसे ही दृश्यरूप जड़ भाव नष्ट हो जाता है । जब जड़ भाव में फुरता है तब नाना प्रकार के जगत् देखता है । वास्तव में ब्रह्मादिक तृणपर्यन्त सब ही चैतन्यरूप हैं । जड़ उसको कहना चाहिये जिसमें चित्त का अभाव हो । जैसे लकड़ी में चित्त नहीं भासता और प्राणधारियों में चित्त भासता है । परन्तु स्वरूप में दोनों तुल्य हैं, क्योंकि सर्व परमात्मा द्वारा प्रकाशते हैं । हे वशिष्ठजी ! सब चेतनस्वरूप हैं, जो चेतनस्वरूप न हों तो क्यों भासैं । चेतनता से उपलब्धरूप होते है । जड़ और चेतन का विभाग अवाच्य ब्रह्म में नहीं पाया जाता; प्रमाद दोष से है वास्तव में नहीं । जैसे स्वप्न में जो दो प्रकार के जड़ और चेतन भूत भासते हैं उनका प्रमाद होता है तब उस चेतन भूत प्राणी को जड़ चेतन विभाग भासता है और स्वरूपदर्शी को सब एक स्वरूप है । हे मुनीश्वर ! ब्रह्मा में जो चेत्यता हुई वही मन हुआ उस मन में जो चेतनभाग है वही ब्रह्मा है और जड़भाग अबोध है । जब अबोधभाव होता है तब दृश्यभ्रम देखता है और जब चेतनभाव में स्थित हो जाता है तब शुद्ध रूप होता है । हे मुनीश्वर ! चेतनमात्र में अहंकार का उत्थान दृश्य है और परमार्थ में कुछ भेद नहीं । जैसे तरङ्ग जल से भिन्न नहीं तैसे ही अहं चेतनमात्र से भिन्न नहीं होता । सबकी प्रतीति ब्रह्म ही में होती है, वह परमपद है और सब दुःखों से रहित है । वही शुद्ध चित्त जीव जब चेत्यभाव को चेतता है तब जड़भाव को देखता है । जैसे स्वप्न में कोई अपना मरना देखता है तैसे ही वह चित्त जड़भाव को देखता है । आत्मा सर्वशक्तिमान् है; कर्त्ता है तो भी कुछ नहीं करता और उसके समान और कोई नहीं । हे मुनीश्वर ! यह जगत् कुछ वास्तव में उपजा नहीं, चित्त के फुरने से भासता है । जब चित्त की स्फूर्ति होती है तब जगज्जाल भासता है और जब चेतन आत्मा में स्थित होता है तब मन
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का जड़भाव नहीं रहता । जैसे पारसमणि के मिलाप से ताँबा सुवर्ण हो जाता है और फिर उसका ताँबा भाव नहीं रहता तैसे ही जब मन आत्मा में स्थित होता है तब उसकी जड़ता दृश्यभाव नहीं रहती । जैसे सुवर्ण को शोधन करने से उसका मैल जल जाता है और शुद्ध ही शेष रहता है तैसे ही चित्त जब आत्मा में स्थित होता है तब उसका जड़भाव जल जाता है और शुद्ध चेतनमात्र शेष रहता है । वास्तव में पूछो तो शुद्ध भी द्वैत में होता है; आत्मा में द्वैत नहीं इससे शुद्ध कैसे हो ? जैसे आकाश के फूल और वृक्ष वास्तव में कुछ नहीं होते तैसे ही शोधन भी वास्तव में कुछ नहीं । हे मुनीश्वर ! जब तक आत्मा का अज्ञान है तब तक नाना प्रकार का जगत् भासता है और जब आत्मा का बोध होता है तब जगत्भ्रम नष्ट हो जाता है । यह जगत्भ्रम चित्त में है; जैसा निश्चय चित्त में होता है तैसा ही हो भासता है इसी पर अहल्या और इन्द्र का दृष्टान्त कहा है । इससे जैसी भावना दृढ़ होती है तैसा हो भासता है । हे वशिष्ठजी ! जिसको यही भावना दृढ़ है कि मैं देह हूँ वह पुरुष देह के निमित्त सब चेष्टा करता है और इसी कारण बहुत काल पर्यन्त कष्ट पाता है । जैसे बालक बेताल की कल्पना से भय पाता है तैसे ही देह में अभिमान से जीव कष्ट पाता है । जिसकी भावना देह से निवृत्त होकर शुद्ध चेतनभाव में प्राप्त होती है उसको देहादिक जगत् भ्रम शान्त हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जीवक्रमोपदेशोनाम सप्तषष्टितमसर्गः ॥ ६७ ॥
वशिष्ठजी बोले; हे रामजी ! जब इस प्रकार ब्रह्माजी ने मुझसे कहा तब मैंने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! आपने कहा है कि शाप में मन्त्रादिकों का बल होता है । वह शाप भी अचलरूप है, मिटता नहीं । मैंने ऐसा भी देखा है कि शाप से मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ भी जड़ीभूत हो जाती हैं, पर ऐसा तो नहीं है कि देह को शाप हो और मन को न हो । हे भगवन् ! मन और देह तो अनन्यरूप हैं । जैसे वायु और स्पन्द में और घृत और चिकनाई में भेद नहीं होता तैसे ही मन और जगत् में भेद
उत्पत्ति प्रकरण । ३२५
नहीं। यदि कहिये कि देह कुछ वस्तु नहीं, चैतन्य ही चित्त है और देह भी चित्त में कल्पित है-जैसे स्वप्नदेह; मृगतृष्णा का जल और दूसरा चन्द्रमा भासता है सो एक के नष्ट हुए दोनों क्यों नहीं नष्ट होते तैसे देह के शाप से चाहिये कि मन को भी शाप लग जावे तो मैंने देखा है कि शाप से भी जड़ीभूत हो गये हैं और आप कहते हैं कि देह का कर्म मन को नहीं लगता। यह कैसे जानिये ? ब्रह्मा बोले, हे मुनीश्वर ! ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जो सब कर्मों को त्यागकर पुण्यरूप पुरुषार्थ करने से सिद्ध न हो। पुरुषार्थ करने से सब कुछ होता है। ब्रह्मा से चींटी पर्यन्त जिस जिसकी भावना होती है तैसा ही रूप हो भासता है। सब जगत् के दो शरीर हैं-एक मनरूपी जो चञ्चलरूप है और दूसरा आधि-भौतिक मांसमय शरीर है उसका किया कार्य निष्फल होता है और मन से जो चेष्टा होती है वह सुफल होती है। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष को मांसमय शरीर में अहंभाव है उसको आधिव्याधि और शाप भी अवश्य लगता है और मांसमय शरीर जो गूँगे; दीन और क्षणनाश है उनके साथ जिसका संयोग है वह दीन रहता है। चित्तरूपी शरीर चञ्चल है वह किसी के वश नहीं होता अर्थात् उसका वश करना महा कठिन है। जब दृढ़ वैराग्य और अभ्यास हो तब वह वश हो-अन्यथा नहीं होता। मन महाचञ्चल है और यह जगत् मन में है। जैसा जैसा मन में निश्चय है सो दूर नहीं होता। मांसमय शरीर का किया कुछ सुफल नहीं होता और जो मन का निश्चय है सो दूर नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जिन पुरुषों ने चित्त को आत्मपद में स्थित किया है उनको अग्नि में भी डालिये तो भी दुःख कुछ नहीं होता और जल में भी उनको दुःख नहीं होता, क्योंकि उनका चित्त शरीरादिक भाव ग्रहण नहीं करता केवल आत्मा में स्थित होता है। हे मुनीश्वर ! सब भावों को त्यागकर मन का निश्चय जिसमें दृढ़ होता है वही भासता है। जहाँ मन दृढ़ीभूत होकर चलता है, उसको वही भासता है और किसी संसार के कष्ट और शाप से चलाय-मान नहीं होता। जो किसी दुःख शाप से मन विपर्ययभाव में प्राप्त हो जावे तो जानिये कि वह दृढ़ लगा न था-अभ्यास की शिथिलता थी।
३२६ योगवाशिष्ठ ।
हे मुनीश्वर ! मन की तीव्रता के हिलाने में किसी पदार्थ की शक्ति नहीं, क्योंकि सृष्टि मानसी है । इससे मन में मन को समाय चित्त को परम-पद में लगावो । जब चित्त आत्मा में दृढ़ होता है तब जगत् के पदार्थों से चलायमान नहीं होता । मारकण्डेय ऋषीश्वर को जिनका चित्त आत्मा में लगा हुआ था शूली पर भी खेद न हुआ । हे मुनीश्वर ! जिसमें मन दृढ़ होकर लगता है उसको कोई चला नहीं सकता । जैसे इन्द्र ब्राह्मण चलायमान न हुआ तैसे ही आत्मा में स्थिर हुआ मन चलाय-मान नहीं होता । हे मुनीश्वर ! जैसा जैसा मन में तीव्रभाव होता है उर्मी की सिद्धता होती है । दीर्घतपा एक ऋषि था वह किसी प्रकार अन्धे कूप में गिर पड़ा और उस कूप में मन को दृढ़कर यज्ञ करने लगा । तब यज्ञ से मन में देवता होकर इन्द्रपुरी में फल भोगने लगा और जैसे इन्द्र ब्राह्मण के पुत्र मनुष्यों के समान थे और उनके मन में जो ब्रह्मा की भावना थी उससे वे दसों ब्रह्म हुए और दसों ने अपनी अपनी सृष्टि रची और वह सृष्टि सुपने भी नहीं खण्डित होती । इससे जो कुछ दृढ़ अभ्यास होता है वह नष्ट नहीं होता । देवता और महाऋषि आदि जो धैर्यवान् हुए हैं और जिनकी एक क्षणमात्र भी वृत्ति चलायमान नहीं होती थी उनको संसार की आधि-व्याधि, ताप, शाप, मन्त्र और पापकर्म से लेकर संसार के जो क्षोभ और दुःख हैं नहीं स्पर्श करते थे। जैसे कमलफूल का प्रहार शिला नहीं फोड़ सकता तैसे ही धैर्यवान् को संसार का ताप नहीं खण्डन कर सकता । जिसको आधि-व्याधि दुःख देते हैं उसे जानिये कि वह परमार्थ-दर्शन से शून्य है । हे मुनी-श्वर ! जो पुरुष स्वरूप में सावधान हुए हैं उनको कोई दुःख स्पर्श नहीं करता और स्वप्न में भी उनको दुःख का अनुभव नहीं होता क्योंकि उनका चित्त सावधान है इससे तुम भी दृढ़ पुरुषार्थ करके मन से मन को मारो तो जगत्भ्रम नष्ट हो जावेगा । हे मुनीश्वर ! जिसको स्वरूप का प्रमाद होता है उसको क्षण में जगत्भ्रम दृढ़ हो जाता है । जैसे बालक को क्षण में वैताल भासि आता है तैसे ही प्रमाद से जगत् भासता है । हे मुनीश्वर ! मनरूपी कुलाल है और वृत्तिरूपी मृत्तिका है; उस
उत्पत्ति प्रकरण । ३२७
मन में वृत्ति क्षण में अनेक आकार धरती है । जैसे मृत्तिका कुलाल द्वारा घटादिक अनेक आकार को धरती है तैसे ही निश्चय के अनुसार वृत्ति अनेक आकारों को पाती है । जैसे सूर्य में उलूकादिक अपनी भावना से अन्धकार देखते हैं, कितनों को चन्द्रमा की किरणें भी भावना से अग्निरूपा भासती हैं और कितनों को विष में अमृत की भावना होती है तो उनको विष भी अमृतरूप हो भासता है । इसी प्रकार कटु, अम्ल और लवण भी भावना के अनुसार भासते हैं । जैसे मन में निश्चय होता है तैसे ही भासता है । मनरूपी बाजीगर जैसी रचना चाहता है तैसी ही रच लेता है और मन का रचा जगत् सत्य नहीं और असत्य भी नहीं। प्रत्यक्ष देखने से सत्य है असत्य नहीं, और नष्टभाव से असत्य है सत्य नहीं, और सत्य असत्य भी मन से भासता है, वास्तव में कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे मनोमाहात्म्यवर्णनं नाम- द्विषष्टितमस्सर्गः ॥ ६८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार प्रथम ब्रह्माजी ने जो मुझसे कहा था वह मैंने अब तुमसे कहा है । प्रथम ब्रह्मा जो अहंशब्द पद में स्थित था उसमें चित्त हुआ अर्थात् अहं अस्मि चेतनता का लक्षण हुआ और उसकी जब दृढ़ता हुई तब मन हुआ, उस मन ने पञ्चतन्मात्रा की कल्पना की वह तेजाकार ब्रह्म परमेष्ठी कहाता है । हे रामजी ! वह ब्रह्माजी मनरूप हैं और मन ही ब्रह्मारूप है । उसका रूप संकल्प है जैसा संकल्प करता है तैसा ही होता है । उस ब्रह्मा ने एक अविद्याशक्ति कल्पी है अनात्मा में आत्माभिमान करने का नाम अविद्या है । फिर अविद्या की निवृत्ति विद्या कल्पी । इसी प्रकार पहाड़, तृण, जल, समुद्र, स्थावर-जङ्गम सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न किया । इस प्रकार ब्रह्मा हुआ और इस प्रकार जगत् हुआ। तुमने जो कहा कि जगत् कैसे उपजता है और कैसे मिटता है सो सुनो । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते हैं और समुद्र ही में लीन होते हैं तैसे ही सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म में उपजता है और ब्रह्मा ही में लीन होता है । हे रामजी ! शुद्ध आत्मसत्ता में जो अहं का उल्लेख हुआ है सो मन है और वही ब्रह्मा है, उसी ने नाना प्रकार का
३२८ योगवाशिष्ठ।
जो जगत् रचा है वही सर्वचित्त शक्ति फैली है और चित्त के फुरने ही से नानात्व भासता है। हे रामजी ! जो कुछ जीव हैं उन सब में आत्म-सत्ता स्थित है, परन्तु अपने स्वरूप के प्रमाद से भटकते हैं। जैसे वायु से वन के कुञ्जों में सूखे पात भटकते हैं तैसे ही कर्मरूपी वायु से जीव भटकते हैं और अधः और ऊर्ध्व में घटी यन्त्र की नाईं अनेक जन्म धरते हैं। जब काकतालीवत् सत्सङ्ग प्राप्ति हो और अपना पुरुषार्थ करे तब मुक्त हो। इसकी जब तक भास नहीं होती तब तक कर्मरूपी रस्सी से बाँधे हुए अनेक जन्म भटकते हैं और जब ज्ञान की प्राप्ति होगी तभी दृश्यभ्रम से छूटेंगे अन्यथा न छूटेंगे हे रामजी इस प्रकार ब्रह्मा से जीव उपजते और मिटते हैं। अनन्त सङ्कटों की कारण वासना ही है जो नाना प्रकार के भ्रम दिखाती है और जगतरूपी मन की जन्मरूपी वेताल बेल वासना जल से बढ़ती है जब सम्यक ज्ञान प्राप्त हो तब उसी कुठार से काटो। जब मन में वासना का क्षोभ मिटे तब शरीररूपी अंकुर मनरूपी बीज से न उपजे जैसे भुने बीज में अंकुर नहीं उपजता तैसे ही वासना से रहित मन शरीर को नहीं धारण करता ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे वासनात्यागवर्णनन्नामै-कोनसप्ततितमस्सर्गः ॥६९॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जितनी भूतजाति है वह ब्रह्मा से उपजी है। जैसे समुद्र में जो तरङ्ग और बुद्बुदे कोई बड़े, कोई छोटे और कोई मध्यभाव के होते हैं वे सब जल हैं तैसे ही यह जीव ब्रह्म से उपजे हैं और ब्रह्मरूप हैं। जैसे सूर्य की किरणों में जल भासता है अग्नि से चिनगारे उपजते हैं तैसे ही ब्रह्म से जीव उपजते हैं। जैसे कल्पवृक्ष की मञ्जरी नाना रूप धरती है तैसे ही ब्रह्म से जीव हुए हैं। जैसे चन्द्रमा से किरणों का विस्तार होता है और वृक्ष से पत्र, फल और फूल आदिक होते हैं तैसे ही ब्रह्म से जीव होते हैं। जैसे सुवर्ण से अनेक भूषण होते हैं तैसे ही ब्रह्म से जगत् होते हैं। जैसे झरनों से जल के कण उपजते हैं तैसे ही परमात्मा से भूत उपजते हैं। जैसे आकाश एक ही है पर उससे घट-मठ की उपाधि से घटाकाश और मठाकाश कहाता है तैसे ही संवेदन के फुरने से जीव
उत्पत्ति प्रकरण । ३२०
कल्पना होती है। जैसे जल ही द्रवता से तरङ्ग और आवृत्तरूप हो भासता है तैसे ही ब्रह्म ही संवेदन से जगतरूप हो भासता है। द्रष्टा, दर्शन और दृश्य सब ब्रह्म से ही उपजे हैं। जैसे सूर्य के तेज से मृगतृष्णा की नदी भासती है तैसे संवेदन से ब्रह्म में द्रष्टा, दर्शन दृश्य-त्रिपुटी भासती है, पर वास्तव में द्रष्टा, दर्शन और दृश्य कोई कल्पना नहीं। जैसे चन्द्रमा और शीतलता में और सूर्य और प्रकाश में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते हैं और समुद्र ही में लीन होते हैं तैसे ही जीव ब्रह्म से ही उपजते हैं और ब्रह्म ही में लीन होते हैं। कोई सहस्र जन्मों के अनन्तर प्राप्त होते हैं और कोई थोड़े ही जन्मों में प्राप्त होते हैं। हे रामजी ! इस प्रकार जगत् परमात्मा से हुआ है और उस ही की इच्छानुसार सब व्यवहार करते हैं। वही व्यवहार की नाईं ही भासते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सर्वब्रह्मप्रतिपादनन्नाम सप्ततितमसर्गः ॥ ७० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! कर्त्ता और कर्म अभिन्नरूप हैं और इकट्ठे ही ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं जैसे फूल और सुगन्ध वृक्ष से इकट्ठे ही उत्पन्न होते हैं तैसे ही कर्त्ता और कर्म इकट्ठे उत्पन्न हुए हैं। जीव जब सब संकल्प कल्पना को त्यागता है तब निर्मल ब्रह्म होता है। जैसे आकाश में नीलता भासती है तैसे ही आत्मा में जगत् कल्पना फुरती है, पर आत्मा अद्वैत सदा अपने आपमें स्थित है। यह भी अज्ञानी के बोध के लिये कहता हूँ कि जीव ब्रह्म से उपजे हैं। इस प्रकार सात्त्विक, राजस और तामस गुणों के भेद स्थित हैं, जो ज्ञानवान् हैं उनके प्रति यह कहना भी नहीं बनता कि ब्रह्म से सब उपजे हैं; तो भी दूसरा कुछ नहीं पर दूसरे को अङ्गीकार करके उपदेश करता हूँ। वास्तव में ब्रह्मसत्ता में कोई कल्पना नहीं; वह तो सदा अपने स्वभाव में स्थित है। जो ज्ञानवान् हैं उनको सदा ऐसे ही प्रत्यक्ष भासता है और अज्ञानी दूर दूर चला जाता है—उसको सुमेरु और मन्दराचल की नाईं आत्मा और जीव का अन्तर भासता है जैसे वसन्त ऋतु में नाना प्रकार से नूतन अंकुर उपजते हैं और उसके अभाव से नष्ट होते हैं तैसे ही चित्त के फुरने से जीव राशि उपजते हैं।
३३० योगवाशिष्ठ ।
और चित्त के अफुर हुए नष्ट होते हैं । मन और कर्म में कुछ भेद नहीं; मन और कर्म इकट्ठे ही उत्पन्न होते हैं जैसे वृक्ष से फल और सुगन्ध इकट्ठे उपजते हैं तैसे ही आत्मा से मन और कर्म इकट्ठे ही उपजते हैं और फिर आत्मा में लीन होते हैं । हे रामजी ! दैत्य, नाग, मनुष्य, देवता आदिक जो कुछ जीव तुमको भासते हैं वे आत्मा से उपजे हैं और फिर आत्मा ही में लीन होते हैं । इनका उत्पत्ति कारण अज्ञान है; आत्मा के अज्ञान से भटकते हैं और जब आत्मज्ञान उपजता है तब संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है । रामजी बोले, हे भगवन् ! जो पदार्थ शास्त्रप्रमाण से सिद्ध है वही सत्य है और शास्त्रप्रमाण वही है जिसमें राग-द्वेष से रहित निर्णय है और अमानित्व अदम्भित्व आदिक गुण प्रतिपादन किये हैं । उस सृष्टि से जो उपदेश किया है सो ही प्रमाण है और उसके अनुसार जो जीव विचरते हैं सो उत्तम गति को प्राप्त होते हैं और जो शास्त्रप्रमाण से विपरीत वर्तते हैं वह अशुभगति में प्राप्त होते हैं । लोक में भी प्रसिद्ध है कि कर्मों के अनुसार जीव उपजते हैं-जैसा जैसा बीज होता है तैसा ही तैसा उससे अंकुर उप-जता है; तैसे ही जैसा कर्म होता है तैसी गति को जीव प्राप्त होता है । कर्त्ता से कर्म होता है इस कारण यह परस्पर अभिन्न है इनका इकट्ठा होना क्योंकर हो ? कहाँ से कर्म होते हैं और कर्म से गति प्राप्त होती है । पर आप कहते हैं कि मन और कर्म ब्रह्म से इकट्ठे ही उत्पन्न हुए हैं इससे तो शास्त्र और लोगों के वचन अप्रमाण होते हैं । हे देवताओं में श्रेष्ठ ! इस संशय के दूर करने को तुमही योग्य हो । जैसे सत्य हो तैसे ही कहिये वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह प्रश्न तुमने अच्छा किया है इसका उत्तर मैं तुमको देता हूँ जिसके सुनने से तुमको ज्ञान होगा । हे रामजी ! शुद्ध सं वित्मात्र आत्मतत्त्व में जो संवेदन फुरा है सो ही कर्म का बीज मन हुआ और सो ही सबका कर्मरूप है इसलिये उसी बीज से सब फल होते हैं-कर्म और मन में कुछ भेद नहीं । जैसे सुगन्ध और कमल में कुछ भेद नहीं तैसे ही मन और कर्म में कुछ भेद नहीं । मन में संकल्प होता है उससे कर्म अंकुर ज्ञानवान् कहते हैं । हे रामजी ! पूर्व देह मन ही है और उस मनरूपी शरीर से कर्म होते हैं । वह फल पर्यन्त सिद्ध होता
उत्पत्ति प्रकरण । ३३१
है । मन में जो स्फूर्ति होती है वही क्रिया है और वही कर्म है । उस मन से क्रिया कर्म अवश्य सिद्ध होता है अन्यथा नहीं होता । ऐसा पर्वत और आकाशलोक कोई नहीं जिसको प्राप्त होकर कर्मों से छूटे; जो कुछ मन के सङ्कल्प से किया है वह अवश्यमेव सिद्ध होता है । पूर्व जो पुरुषार्थ प्रयत्न कुछ किया है वह निष्फल नहीं होता, अवश्यमेव उसकी प्राप्ति होती है । हे रामजी ! ब्रह्म में जो चैत्यता हुई है वही मन है और कर्मरूप है और सब लोकों का बीज है कुछ भिन्न नहीं । हे रामजी ! जब कोई देश से देशान्तर जाने लगता है तब जाने का संकल्प ही उसे ले जाता है, वह चलना कर्म है इससे स्फूर्तिरुप कर्म हुआ और स्फूर्तिरुप मन का भी है इससे मन और कर्म में कुछ भेद नहीं । अक्षोभ समुद्ररूपी ब्रह्म है इसमें द्रवतारूपी चैत्यता है । वह चैत्यता जीवरूप है और उसही का नाम मन है । मन कर्मरूप है इसलिए जैसे मन फुरता है और जो कुछ मन से कार्य करता है वही सिद्ध होता है, शरीर से चेष्टा नहीं सिद्ध होती । इस कारण कहा है कि मन और कर्म में कुछ भेद नहीं पर भिन्न-भिन्न जो भासता है सो मिथ्या कल्पना है । मिथ्या कल्पना मूर्ख करते हैं बुद्धिमान् नहीं करते जैसे समुद्र और तरङ्गों में भेद मूर्ख मानते हैं, बुद्धिमान् को भेद कुछ नहीं भासता । प्रथम परमात्मा से मन और कर्म इकट्ठे ही उपजे हैं । जैसे समुद्र में द्रवता से तरङ्ग उपजते हैं तैसे ही चित्त फुरने से आत्मा से कर्म उपजते हैं । जैसे तरङ्ग समुद्र में लीन होते हैं तैसे ही मन और कर्म परमात्मा में लीन होते हैं । जैसे जो पदार्थ दर्पण के निकट होता है उसी का प्रतिबिम्ब भासता है तैसे ही जो कुछ मन का कर्म होता है सो आत्मारूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित भासता है । जैसे वरफ का रूप शीतल है—शीतलता बिना वरफ नहीं होती तैसे ही चित्त कर्म है—कर्मों बिना चित्त नहीं होता । जब चित्त से स्पन्दता मिट जाती है तब चित्त भी नष्ट हो जाता है । चित्त के नष्ट हुए कर्म भी नष्ट हो जाते हैं और कर्म के नाश हुए मन का नाश होता है जो पुरुष मन से मुक्त हुआ है वही मुक्त है और जो मन से मुक्त नहीं हुआ वही बन्धन में है । एक के नाश हुए दोनों का नाश होता है जैसे अग्नि के नाश
३३२ योगवाशिष्ठ ।
हुए उष्णता भी नष्ट होती है और जब उष्णता नष्ट होती है तब अग्नि भी नष्ट होता है तैसे ही मन के नष्ट हुए कर्म भी नष्ट होते हैं और कर्म का नाश होने से मन भी नष्ट होता है । एक के अभाव से दोनों का अभाव होता है । कर्मरूपी चित्त है और चित्तरूपी कर्म है इससे परस्पर अभेदरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे कर्मपौरुषयोरैक्य प्रतिपादन न्नामैकसप्ततितमसर्गः ॥ ७१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मन भावनामात्र है । भावना फुरने का नाम है और फुरना क्रियारूप है । उस फुरना क्रिया से सर्वफल की प्राप्ति होती है । रामजी बोले, हे ब्राह्मण ! इस मन का रूप जो जड़-अजड़ है वह विस्तारपूर्वक कहिए । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मतत्त्व अनन्त-रूप और सर्वशक्तिमान् है । जब उनमें संकल्पशक्ति फुरती है तब उसको मन कहते हैं, जड़ अजड़ के मध्य में जो दोलायमान होता है उस मिश्रित-रूप का नाम मन है । हे रामजी ! भावरूप जो पदार्थ उनके मध्य में जो सत्य असत्य का निश्चय करता है उसका नाम मन है । उसमें जो यह निश्चय देह में मिलकर फुरता है कि मैं चिदानन्दरूप नहीं, कृपण हूँ सो मन का रूप है । कल्पना से रहित मन नहीं होता जैसे गुणों बिना गुणी नहीं रहता तैसे ही कर्म कल्पना बिना मन नहीं रहता । जैसे उष्णता की सत्ता अग्नि से भिन्न नहीं होती तैसे ही कर्मों की सत्ता मन से भिन्न नहीं होती और मन और आत्मा में कुछ भेद नहीं । हे रामजी ! मनरूपी बीज से संकल्परूपी नाना प्रकार के फूल होते हैं; उसमें नाना प्रकार के शरीरों से संपूर्ण जगत् देखता है और जैसी जैसी मन में वासना होती है उसके अनुसार फल की प्राप्ति होती है । इससे मन का फुरना ही कर्मों का बीज है और उससे जो भिन्न क्रिया होती है सो उस वृक्ष की शाखा और नाना प्रकार के विचित्र फल हैं । हे रामजी ! जिस ओर मनका निश्चय होता है उसी ओर कर्म इन्द्रियाँ भी प्रवर्तित होती हैं और जो कर्म है वही मनका फुरना है और मन ही स्फूर्तिरूप है । इसी कारण कहा है कि मन ही कर्मरूप है उस मन की इतनी संज्ञा कही हैं मन, बुद्धि, अहङ्कार, कर्म, कल्पना, स्मृति, वासना, अविद्या, प्रकृति, माया इत्यादिक । कल्पना ही संसार के कारण है, चित्तको
उत्पत्ति प्रकरण । ३३३
जब चेत्य का संयोग होता है तब संसारभ्रम होता है और ये जितनी संज्ञा तुमसे कही हैं सो चित्त के फुरने से काकतालीयवत् अकस्मात् फुरी हैं। रामजी बोले, हे भगवन् ! अद्वैत तत्त्व परमसंविद् आकाश में इतनी कल्पना कैसे हुई और उनमें अर्थरूप दृढ़ता कैसे हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! शुद्ध संवित्मात्र सत्ता फुरने की नाईं जो स्थित हुई उसका नाम मन है। जब वह वृत्ति निश्चयरूप हुई तो भाव अभाव पदार्थों को निश्चय करने लगी कि यह पदार्थ ऐसा है; यह पदार्थ ऐसा है—उस वृत्ति का नाम बुद्धि है। जब अनात्मा में आत्मभाव परिच्छिन्नरूप मिथ्या अभिमान दृढ़ हुआ तब उसका रूप अहंकार हुआ। वही मिथ्या अहंवृत्ति संसारबन्धन का कारण है, किसी पदार्थ को भावना करती है और किसी को त्याग करती है और बालक की नाईं विचार से रहित ग्रहण है उसका नाम चित्त है। वृत्ति का धर्म फुरना है उस फुरने में फल को आरोप करके उसकी ओर भावना और कर्त्तव्य का अभिमान फुरना कर्म है। पूर्व जो कार्य किये हैं उनको त्याग उनका संस्कार चित्त में धरकर स्मरण करने का नाम स्मृति है अथवा पूर्व जिसका अनुभव नहीं हुआ और हृदय में फुरे कि पूर्व मैंने यह किया था इसका नाम भी स्मृति है। जिस पदार्थ का अनुभव हो और जिसका संस्कार हृदय में दृढ़ होवे उसके अनुसार जो चित्त फुरे उसका नाम वासना है। हे रामजी ! आत्मतत्त्व अद्वैत है, उसमें अविद्यमान द्वैत विद्यमान हो भासता है इससे उसका नाम अविद्या है और अपने स्वरूप को भुलाकर अपने नाश के निमित्त स्पन्द चेष्टा करने और शुद्ध आत्मा में विकल्प उठाने का नाम मूल अविद्या है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—इन पाँचों इन्द्रियों को दिखानेवाला परमात्मा है और अद्वैततत्त्व आत्मा में जिस दृढ़ जाल को रचा है उस स्पन्दकलना का नाम प्रकृति है और जो असत्य को सत्य और सत्य को असत्य की नाईं दिखाती है वह माया कहाती है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का अनुभव करना कर्म है और जिससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध होते हैं वह कर्त्ता कार्य, कारण कहाता है। शुद्ध, चेतन सत्य को कलना की नाईं प्राप्त होता है, उस फुरण वृत्ति को विपर्यय कहते हैं।
३३४ | योगवासिष्ठ ।
उससे जब संकल्प जाल उठता है तब उसको जीव कहते हैं, मन भी इसी का नाम है, चित्त भी इसी का नाम है और बन्ध भी इसी का नाम है। हे रामजी ! परमार्थ शुद्ध चित्त ही चेत्य के संयोग से और स्वरूप से वरफ की नाईं स्थित हुआ है। रामजी बोले, हे भगवन् ! यह मन जड़ है किंवा चेतन है, एक स्पष्ट मुझसे कहिये कि मेरे हृदय में स्थित हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मन जड़ नहीं और चेतन भी नहीं, जड़ चेतन की गाँठ के अन्धाभाव का नाम मन है और संकल्प विकल्प में कल्पित रूप मन है। उस मन से यह जगत् उत्पन्न हुआ है और जड़ और चेतन दोनों भावों में डोलायमान है अर्थात् कभी जड़भाव की ओर आता है और कभी चेतनभाव की ओर आता है। शुद्ध चेतनमात्र में जो फुरना हुआ उसी का नाम मन है और मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, जीवादिक अनेक संज्ञा उसी मन की हैं। जैसे एक नट अनेक स्वांगों में अनेक संज्ञा पाता है—जिसका स्वांग धरता है उसी नाम से कहाता है तैसे ही संकल्प से मन अनेक संज्ञा पाता है। जैसे पुरुष विचित्र कर्मों से अनेक संज्ञा पाता है—पाठ से पाठक; और रसोई से रसोइयाँ कहाता है तैसे ही मन अनेक संकल्पों से अनेक संज्ञा पाता है। हे रामजी ! ये जो मैंने तुमसे चित्त की अनेक संज्ञा कही हैं उनके अन्य अन्य बहुत प्रकार वादियों ने नाम रक्खे हैं, जैसा जैसा मन है वैसा ही वैसा स्वभाव लेकर मन, बुद्धि और इन्द्रियों को मानते हैं। कोई मन को जड़ मानते हैं; कोई मन से भिन्न मानते हैं और कोई अहंकार को भिन्न मानते हैं वे सब मिथ्या कल्पना हैं। नैयायिक कहते हैं कि सृष्टि तत्त्वों के सूक्ष्म परमाणुओं से उपजती है जब प्रलय होता है तब स्थूलतत्त्व प्रलय हो जाते हैं और उनके सूक्ष्म परमाणु रहते हैं और फिर उत्पत्तिकाल में वही सूक्ष्म परमाणु दूने तिगुने आदिक होकर स्थूल होते हैं; उन्हीं पाँचों तत्त्वों से सृष्टि होती है। सांख्यमतवाले कहते हैं कि प्रकृति और माया के परिणाम से सृष्टि होती है और चार्वाक पृथ्वी, जल, तेज, वायु, चारों तत्त्वों के इकट्ठे होने से सृष्टि उपजती मानते हैं और चारों तत्त्वों के शरीर को पुरुष मानते हैं और कहते हैं कि जब तत्त्व अपने आपसे बिछुड़ जाते हैं
उत्पत्ति प्रकरण । ३३५
तब प्रलय होती है। आर्हत और ही प्रकार मानते हैं और बौद्ध और वैशेषिक आदि और प्रकार से मानते हैं। पञ्चरात्रिक और प्रकार ही मानते हैं, परन्तु सबही का सिद्धान्त एकही ब्रह्म आत्मतत्त्व है। जैसे एकही स्थान के अनेक मार्ग हों तो उन अनेक मार्गों से उसी स्थान को पहुँचता है तैसे ही अनेक मतों का अधिष्ठान आत्मसत्ता है और सबका सिद्धान्त एकही है, उसमें कोई वाद प्रवेश नहीं करता। हे रामजी ! जितने मतवाले हैं वे अपने-अपने मत को मानते हैं और दूसरे का अपमान करते हैं। जैसे मार्ग के चलनेवाले अपने-अपने मार्ग की उपमा करते हैं—दूसरे की नहीं करते तैसे ही मन के भिन्न रूप से अनेक प्रकार जगत् को कहते हैं। एक मन की अनेक संज्ञाएँ हुई हैं। जैसे एक पुरुष को अनेक प्रकार से कहते हैं, स्नान करने से स्नानकर्त्ता, दान करने से दानकर्त्ता, तप करने से तपस्वी इत्यादि क्रिया करके अनेक संज्ञाएँ होती हैं अनेक शक्ति मन की कही हैं। मन ही का नाम जीव, वासना और कर्म है। हे रामजी ! चित्त ही के फुरने से सम्पूर्ण जगत् हुआ है और मन ही के फुरने से भासता है। जब वह पुरुष चेत्य के फुरने से रहित होता है तब देखता है तो भी कुछ नहीं देखता। यह प्रसिद्ध जानिये कि जिस पुरुष को इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इष्ट अनिष्ट में हर्ष शोक देता है उसका नाम जीव है। मन ही से सब सिद्ध होता है और सब अर्थों का कारण मन ही है। जो पुरुष चेत्य से छूटता है वह मुक्तरूप है और जिसको चेत्य का संयोग है वह बन्धन में बँधा है। हे रामजी ! पुरुष मन को केवल जड़ मानते हैं उनको अत्यन्त जड़ जनों और जो पुरुष मन को केवल चेतन मानते हैं वे भी जड़ हैं। यह मन केवल जड़ नहीं और न केवल चेतन ही है जो मन का एक ही रूप हो तो सुख दुःख आदिक विचित्रता न हों और जगत् की लीनता भी नहीं। जो केवल चैतन्य ही रूप हो तो जगत् का कारण नहीं हो सकता और जो केवल जड़रूप हो तो भी जगत् का कारण नहीं, क्योंकि केवल जड़ पाषाणरूप होता। जैसे पाषाण से कुछ क्रिया उत्पन्न नहीं होती तैसे ही केवल जड़ मन जगत् कारण नहीं
३३६ योगवाशिष्ठ ।
होना। उन केवल चैतन्य भी नहीं, केवल चैतन्य तो आत्मा है जिसमें कर्त्तृत्व आदि कल्पना नहीं होती इससे मन केवल चैतन्य भी नहीं और केवल जड़ भी नहीं चैतन्य और जड़ का मध्यभाव ही जगत् का कारण है। हे रामजी ! जैसे प्रकाश सब पदार्थों के प्रकाश का कारण है तैसे ही मन सब अर्थों का कारण है। जब तक चित्त है तब तक चेत्य भामता है और जब चित्त अचित्त होता है तब सर्व भूतजात लीन हो जाते हैं। जैसे एक ही जल रस से अनेकरूप हो भामता है तैसे ही एक ही मन अनेक पदार्थरूप होकर भामता है और अनेक संज्ञा इसकी शास्त्रों के मतवालों ने कल्पी हैं। सबका कारण मन ही है और परम देव परमात्मा की सर्व शक्तियों में से एक शक्ति है। उसी परमात्मा से यह फुरी है और जड़भाव फुरकर फिर उसही में लीन होती है। जैसे मकड़ी अपने मुख से जाला निकालकर फैलाती है और फिर आपही में लीन कर लेती है तैसे ही परमात्मा से यह जड़भाव उपजा है। हे रामजी ! नित्य शुद्ध और बोधरूप ब्रह्म है; वह जब प्रकृतभाव को प्राप्त होता है तब अविद्या के वश से नाना प्रकार के जगत् को धारता है और उसही के सर्व पर्याय हैं। जीव, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार इत्यादिक संज्ञा मलीन चित्त की होती हैं। ये संज्ञाएँ भिन्न-भिन्न मतवादियों ने कल्पी हैं पर हमको संज्ञा से क्या प्रयोजन है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मनःसंज्ञाविचारोनाम द्विसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७२ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह सब जगत् आडम्बर मन ही ने रचा है और सब मनरूप है और मन ही कर्मरूप है—यह आपके कहने से मैंने निश्चय किया है, परन्तु इसका अनुभव कैसे हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह मन भावनामात्र है। जैसे प्रचण्ड सूर्य की धूप मरुस्थल में जल हो भासती है तैसे ही आत्मा का आभासरूप मन होता है। उस मन से जो कुछ जगत् भासता है वह सब मनरूप है; कहीं मनुष्य, कहीं देवता, कहीं दैत्य, कहीं पक्षी, कहीं गन्धर्व, कहीं नागपुर आदिक जो कुछ रूप भासते हैं वे सबही मन से विस्तार को प्राप्त हुए हैं, पर वे