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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

वैराग्य प्रकरण । ३५

है । हे मुनीश्वर ! यह चित्त कभी-कभी बड़ा गम्भीर भी हो बैठता है । जैसे चील पक्षी आकाश में ऊँचे फिरता है पर जब पृथ्वी पर मांस देखता है तो वहाँ से पृथ्वी पर आकर मांस लेता है वैसे ही यह चित्त तब तक उदार है जब तक भोग नहीं देखता और जब विषय देखता है तब आसक्त हो विषय में गिर जाता है । यह चित्त वासनारूपी शय्या में सोया रहता है और आत्मपद की ओर नहीं जागता । मैं इस चित्त के जाल में पड़ गया हूँ । वह कैसा जाल है कि उसमें वासनारूपी सूत है, संसार की सत्यतारूपी गाँठ है और भोगरूपी चून है जिसको देखकर मैं फँसा हूँ और कभी पाताल में और कभी आकाश में वासनारूपी रस्सी से बँधा घटीयन्त्र की नाईं फिरता हूँ । इससे हे मुनीश्वर ! तुम वही उपाय कहो जिससे चित्तरूपी शत्रु को जीतूँ । अब मुझको किसी भोग की इच्छा नहीं और जगत् की लक्ष्मी मुझको विरस भासती है । जैसे चन्द्रमा बादल की इच्छा नहीं करता पर चतुरमास में आच्छादित हो जाता है वैसे ही मैं भोग की इच्छा नहीं करता और जगत् की लक्ष्मी भी नहीं चाहता पर मेरा चित्त ही मेरा परमशत्रु है । महापुरुष जब इसके जीतने का यत्न करते हैं तब परमपद पाते हैं, इससे मुझे वही उपाय कहो जिससे मन को जीतूँ जैसे पर्वत पर के वन पर्वत के आश्रय में रहते हैं वैसे ही सब दुःख इसके आश्रय से रहते हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे चित्तदौरात्म्य- वर्णनन्नामैकादशन्सर्गः ॥ ११ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे ब्राह्मण ! चेतनरूपी आकाश में तृष्णारूपी रात्रि आई है और उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोहादिक उल्लू विचरते हैं । जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय हो तब तृष्णारूपी रात्रि का अभाव हो जावे और जब रात्रि नष्ट हो तब मोहादिक उलूक भी नष्ट हों । जैसे जब सूर्य उदय होता है तब बरफ़ उष्ण हो पिघल जाती है वैसे ही सन्तोषरूपी रसको तृष्णारूपी उष्णता पिघला देती है । आत्मपद से शून्य चित्त भयानक वन है, उसमें तृष्णारूपी पिशाचिनी मोहादिक परिवार को अपने साथ लिये फिरती रहती है और प्रसन्न होती है । हे मुनीश्वर ! चित्तरूपी पर्वत है उस

३६योगवाशिष्ठ ।

के आश्रय तृष्णारूपी नदी का प्रवाह चलता है और नाना प्रकार के सङ्कल्परूपी तरङ्ग को फैलाता है। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है वैसे ही तृष्णारूपी मोर भोगरूपी मेघ को देखकर प्रसन्न होता है इससे सब दुःखों का मूल तृष्णा है। जब में किसी सन्तोषादि गुण का आश्रय करता हूँ तब तृष्णा उसको नष्ट कर देता है। जैसे सुन्दर सारङ्गी को चूहा काट डालता है। वैसे ही सन्तोषादि गुणों को तृष्णा नष्ट करती है। हे मुनीश्वर ! सबसे उत्कृष्ट पद में बिराजने का मैं यत्न करता हूँ पर तृष्णा मुझे बिराजने नहीं देती। जैसे जाल में फँसा हुआ पक्षी आकाश में उड़ने का यत्न करता है परन्तु उड़ नहीं सकता वैसे ही अनात्म से आत्मपद को प्राप्त नहीं हो सकता। स्त्री, पुरुष, पुत्र और कुटुम्ब का उसने जाल बिछाया है उसमें फँसा हूँ निकल नहीं सकता। और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ कभी ऊर्ध्व को जाता हूँ कभी अधःपात होता हूँ, घटीयन्त्र की नाईं मेरी गति है। जैसे इन्द्र का धनुष मलीन मेघ में बड़ा और बहुत रङ्गों से भरा होता है परन्तु मध्य में शून्य है वैसे ही तृष्णा मलीन अन्तःकरण में होती है सो बढ़ी हुई है और सद्गुणों से रहित है। यह ऊपर से देखने मात्र सुन्दर है परन्तु इससे कुछ कार्य नहीं सिद्ध होता। हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी मेघ है उसमें दुःखरूपी बूँदें निकलती हैं और तृष्णारूपी काली नागिन है उसका स्पर्श तो कोमल है परन्तु विष से पूर्ण है उसके डसने से मृतक हो जाता है। तृष्णारूपी बादल है सो आत्मारूपी सूर्य के आगे आवरण करता है। जब ज्ञानरूपी पवन चले तब तृष्णारूपी बादल का नाश होकर आत्मपद का साक्षात्कार हो। ज्ञानरूपी कमल को सङ्कोच करनेवाली तृष्णारूपी निशा है । उस तृष्णारूपी महाभयानक कालीरात्रि में बड़े धीरवान भी भयभीत होते हैं और नयनवालों को भी अन्धा कर डालती है। जब यह आती है तब वैराग्य और अभ्यासरूपी नेत्र को अन्धा कर डालती। अर्थात सत्य असत्य विचारने नहीं देती। हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी डाकिनी है वह सन्तोषादिक गुणों को मार डालती है। तृष्णारूपी कन्दर है उसमें मोहरूपी उन्मत्त हाथी गरजते हैं। तृष्णारूपी समुद्र है उसमें आपदारूपी नदी आकर प्रवेश करती है इससे वही उपाय

वैराग्य प्रकरण । ३७

मुझसे कहिये जिससे तृष्णारूपी दुःख से छूटूँ । हे मुनीश्वर ! अग्नि और खङ्ग के प्रहार और इन्द्र के वज्र से भी ऐसा दुःख नहीं होता जैसा दुःख तृष्णा से हो सो तृष्णा के प्रहार से घायल हुआ मैं बड़े दुःख को पाता हूँ और तृष्णारूपी दीपक जलता है उसमें सन्तोषादिक पतङ्ग जल जाते हैं । जैसे जल में मछली रहती है सो जल में कंकड़ रेत आदि को देख मांस जानकर मुख में लेती है उससे उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता वैसे ही तृष्णा भी जो कुछ पदार्थ देखती है उसके पास उड़ती है और तृप्ति किसी से नहीं होती । तृष्णारूपी एक पक्षिणी है सो इधर उधर उड़ जाती है और स्थिर कभी नहीं होती । तृष्णारूपी वानर है वह कभी किसी वृक्ष पर और कभी किसी के ऊपर जाता है स्थिर कहीं नहीं होता । जो पदार्थ नहीं प्राप्त होता उसके निमित्त यत्न करता है और भोग से तृप्त कदाचित् नहीं होता । जैसे घृत की आहुति से अग्नि तृप्त नहीं होती वैसे ही जो पदार्थ प्राप्त योग्य नहीं है उसकी ओर भी तृष्णा दौड़ती है शान्ति नहीं पाती । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी उन्मत्त नदी है वह बहे हुए पुरुष को कहाँ से कहाँ ले जाती है । कभी तो पहाड़ के बाजू में ले जाती और कभी दिशा में ले जाती है । तृष्णारूपी नदी है उसमें वासनारूपी अनेक तरंग उठते हैं कदाचित् मिटते नहीं । तृष्णारूपी नटिनी है और जगतरूपी अखाड़ा उसने लगाया है उसको शिर ऊँचा कर देखती और मूर्ख बड़े प्रसन्न होते हैं जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी कमल खिलकर ऊँचा होता है वैसे ही मूर्ख भी तृष्णा को देखकर प्रसन्न होता है । तृष्णारूपी वृद्ध स्त्री है जो पुरुष इसका त्याग करता है तो उसके पीछे लगी फिरती है कभी उसका त्याग नहीं करती । तृष्णारूपी डोर है उसके साथ जीव रूपी पशु बँधे हुए भ्रमते फिरते हैं । तृष्णा दृष्टिनी है जब शुभगुण देखती है तब उसको मार डालती है । उसके संयोग से मैं दीन होता हूँ । जैसे पपीहा मेघ को देखकर प्रसन्न होता है और बूँद ग्रहण करने लगता है और मेघ को जब पवन ले जाता है तब पपीहा दीन हो जाता है वैसे ही तृष्णा जब शुभ गुणों का नाश करती है तब मैं दीन हो जाता हूँ । हे मुनीश्वर ! जैसे सूखे तृण को पवन उड़ाकर दूर से दूर

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डालता है वैसे ही तृष्णारूपी पवन ने मुझको दूर में दूर डाल दिया है और आत्मपद से दूर पड़ा हूँ। हे मुनीश्वर ! जैसे भँवरा कमल के ऊपर और कभी नीचे बैठता है और कभी आस पास फिरता है स्थिर नहीं होता वैसे ही तृष्णारूपी भँवरा संसाररूपी कमल के नीचे ऊपर फिरता है कदाचित् नहीं ठहरता । जैसे मोती के बाँस में अनेक मोती निकलते हैं वैसे ही तृष्णारूपी बाँस में जगतरूपी अनेक मोती निकलते हैं उसमें लोभी का मन पूर्ण नहीं होता । तृष्णारूपी डब्बे में अनेक दुःखरूपी रत्न भरे हैं इससे आप वही उपाय कहिये जिससे तृष्णा निवृत्त हो । हे मुनीश्वर ! यह वैराग्य से निवृत्त होती है और किसी उपाय से नहीं निवृत्त होती । जैसे अन्धकार का प्रकाश में नाश होता है और किसी उपाय से नहीं होता वैसे ही तृष्णा का नाश और उपाय से नहीं होता । तृष्णारूपी हल गुणरूपी पृथ्वी को खोद डालता है और तृष्णारूपी बेलि गुणरूपी रस को पीती है । तृष्णारूपी धूलि है वह अन्तःकरणरूपी जल में उछल के मलीन करती है । हे मुनीश्वर ! जैसे वर्षाकाल में नदी बढ़ती है और फिर घट जाती है वैसे ही जब इष्ट भोगरूपी जल प्राप्त होता है तब हर्ष में बढ़ती है और जब वह जल घट जाता है तब सुख के क्षीण हो जाती है । हे मुनीश्वर ! इस तृष्णा ने मुझको दीन किया है । जैसे सूखे तृण को पवन उड़ा ले जाता है वैसे ही मुझको भी तृष्णा उड़ाती है । इसमें आप वही उपाय कहिये जिससे तृष्णा का नाश होकर आत्मपद की प्राप्ति हो और दुःखों का नाश होकर आनन्द हो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे तृष्णागारूडीवर्णनन्नाम द्वादशस्सर्गः ॥ १२ ॥

श्रीरामजी बोले हे मुनीश्वर ! यह अमंगलरूप शरीर जो जगत् में उत्पन्न हुआ है बड़ा अभाग्यरूप है और सदा विकारवान् मांस मज्जा से पूर्ण और अपवित्र है । इसमें कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता इसलिये इस विकाररूप शरीर की मैं इच्छा नहीं रखता । यह शरीर न अज्ञ है और न तज्ञ है-अर्थात् न जड़ है और न चैतन्य है । जैसे अग्नि के संयोग में लोहा अग्निवत् होता है सो जलाता भी है परन्तु आप नहीं जलता वैसे

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ही यह देह न जड़ है न चैतन्य है। जड़ इस कारण नहीं है कि इसमें कार्य भी होता है और चैतन्य इस कारण नहीं कि इसको आपसे कुछ ज्ञान नहीं होता। इसलिये मध्यम भाव में है, क्योंकि चैतन्य आत्मा इसमें व्याप रहा है, पर आप तो अपवित्ररूप अस्थि, मांस, रुधिर मूत्र और विष्ठा से पूर्ण और विकारवान् है। ऐसी देह दुःख का स्थान है। इष्ट के पाने से हर्षवान् और अनिष्ट के पाने से शोकवान् होता है, इससे ऐसे शरीर की मुझको इच्छा नहीं। यह अज्ञान से उपजती है। हे मुनीश्वर ! ऐसे अमङ्गलरूपी शरीर में ही अहंपन फुरता है सो दुःख का कारण है। यह संसार में स्थित होकर नाना प्रकार के शब्द करता है। जैसे कोठरी में बैठा हुआ बिलाव नाना प्रकार के शब्द करता है वैसे ही अहंकाररूपी बिलाव देह में बैठा हुआ अहं अहं करता है चुप कदाचित् नहीं रहता। हे मुनीश्वर ! जो किसी के निमित्त शब्द हो वही सुन्दर है अन्यथा सब शब्द व्यर्थ हैं। जैसे जय के निमित्त ढोल का शब्द सुन्दर होता है वैसे ही अहंकार में रहित जो पद है वही शोभनीय है और सब व्यर्थ हैं। शरीररूपी नौका भोगरूपी रेत में पड़ी है, इसलिये इसका पार होना कठिन है। जब वैराग्यरूपी जल बढ़े और प्रवाह हो और अभ्यासरूपी पतवार का बल लगे तब संसार के पाररूपी किनारे पर पहुँचे। शरीररूपी बेड़ा है जो संसाररूपी समुद्र और तृष्णारूपी जल में पड़ा है, जिसका बड़ा प्रवाह है और भोगरूपी उसमें मगर हैं सो शरीररूपी बेड़े को पार नहीं लगने देते। जब शरीररूपी बेड़े को वैराग्यरूपी वायु और अभ्यासरूपी पतवार का बल लगे तब शरीररूपी बेड़ा पार हो। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने उपाय करके ऐसे बेड़े को संसार समुद्र से पार किया है वही सुखी हुआ है और जिसने नहीं किया वह परम आपदा को प्राप्त होता है, वह उस बेड़े से उलटा डूबेगा क्योंकि उस शरीररूपी बेड़े का तृष्णारूपी छिद्र है। उससे संसार समुद्र में डूब जाना है और भोगरूपी मगर इसको खा लेता है। यही आश्चर्य है कि देह अपना आप नहीं और मनुष्य मूर्खता करके आपकी देह मानता है और तृष्णारूपी छिद्र करके दुःख पाता है। शरीररूपी वृक्ष है उसमें भुजारूपी शाखा, उँगली पत्र, जंघा स्तम्भ, मांसरूपी अन्दर

४०योगवाशिष्ठ ।

की भोगवासना उसकी जड़ और सुख दुःख इसके फल हैं । तृष्णारूपी घुन उस शरीररूपी वृक्ष को खाता रहता है जब उसमें श्वेत फूल लगे तो नाश का समय आता है अर्थात मृत्यु के निकटवर्ती होता है । शरीर रूपी वृक्ष की भुजारूपी शाखा हैं और हाथ पाँव पत्र हैं। टखने इसके गुच्छे और दाँत फूल हैं; जंघास्तम्भ हैं और कर्मजल में बढ़ जाता है। जैसे वृक्ष में जल चिकटा निकलता है वैसे ही जल शरीर के द्वारा निकलता रहता है । इसमें तृष्णारूपी विष में पूर्ण सर्पिणी रहती है जो कामना के लिए इस वृक्ष का आश्रय लेता है तो तृष्णारूपी सर्पिणी उसको डसती है और उस विष में वह मर जाता है । हे मुनीश्वर ! ऐसे अमङ्गलरूपी शरीर वृक्ष की इच्छा मुझको नहीं है । यह परम दुःख का कारण है । जब यह पुरुष अपने परिवार अर्थात् देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और उनमें जो अहंभाव है इसका त्याग करे तब मुक्ति हो अन्यथा मुक्ति नहीं होती । हे मुनीश्वर ! जो श्रेष्ठ पुरुष हैं वे पवित्र स्थान में ही रहते हैं अपवित्र में नहीं रहते । यह अपवित्र स्थान यह देह है और इसमें रहने वाला भी अपवित्र है । आस्थारूपी इस घर में ईंटें हैं रुधिर, मूत्र और विष्ठा का गारा लगा है और मांस की कहगिल की है । अहङ्काररूपी इसमें श्वपच रहता है, तृष्णारूपी श्वपचनी उसकी स्त्री और काम, क्रोध, मोह और लोभ इसके पुत्र हैं और आँतों और विष्ठादि से भरा हुआ है ऐसे अपवित्र स्थान अमङ्गलरूपी शरीर को मैं अङ्गीकार नहीं करता । यह शरीर रहे चाहे न रहे इसके साथ अब मुझे कुछ प्रयोजन नहीं । हे मुनीश्वर ! शरीररूपी बड़ा गृह है और उसमें इन्द्रियरूपी पशु हैं । जब कोई उस गृह में बैठता है तब बड़ी आपदा को प्राप्त होता है । तात्पर्य यह कि जो इसमें अहंभाव करता है तो इन्द्रियरूपी पशु विषयरूपी सींगों को मारते हैं और तृष्णारूपी धूलि उसको मलीन करती है । हे मुनीश्वर ! ऐसे शरीर का में अङ्गीकार नहीं करता जिसमें सदा कलह रहती है और ज्ञान-रूपी सम्पदा प्रवेश नहीं होती । शरीररूपी गृह में तृष्णारूपी चण्डी स्त्री रहती है; वह इन्द्रियरूपी द्वार में देखती रहती और सदा कल्पना करती रहती है उससे शम दमादिरूप सम्पदा का प्रवेश नहीं होता ।

वैराग्य प्रकरण । ४१

उस घर में एक सुषुप्तिरूप शय्या है जब उसके ऊपर वह विश्राम करता है तब वह कुछ सुख पाता है, परन्तु तृष्णा का परिवार अर्थात् काम, क्रोधादिक विश्राम नहीं करने देते । हे मुनीश्वर ! ऐसे दुःख के मूल शरीररूपी गृह की इच्छा मैंने त्याग दी है । यह परम दुःख देनेवाला है, इसकी इच्छा मुझको नहीं । हे मुनीश्वर ! शरीररूपी वृक्ष है उसमें तृष्णा रूपी काकिनी आकर स्थित हुई है । जैसे काकिनी नीच पदार्थ के पास उड़ती है वैसे ही तृष्णा भोग आदिक मलिन पदार्थों के पास उड़ती है । तृष्णा बन्दरी की नाईं शरीररूपी वृक्ष को हिलाती है; स्थिर नहीं होने देती । जैसे उन्मत्त हाथी कीच में फँस जाता है तब निकल नहीं सकता और खेदवान् होता है वैसे ही अज्ञानरूपी मद में उन्मत्त हुआ जीव शरीररूपी कीच में फँसा है सो निकल नहीं सकता, पड़ा हुआ दुःख पाता है । ऐसा दुःख देनेवाला शरीर है उसको में अङ्गीकार नहीं करता । हे मुनीश्वर ! यह शरीर अस्थि, मांस, रुधिर से पूर्ण अपवित्र है । जैसे हाथी के कान सदा हिलते हैं, वैसे ही मृत्यु इसको हिलाती है। कुछ काल का विलम्ब है मृत्यु इसका ग्रास कर लेवेगी; इससे में इस शरीर को अङ्गीकार नहीं करता हूँ । यह शरीर कृतघ्न है । भोग भुगताता है और बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त करता है, परन्तु मृत्यु इससे सम्भाषण नहीं करना । जीव इसको अकेला छोड़कर परलोक जाता है । जीव इसके सुख निमित्त अनेक यत्न करता है, परन्तु संग में सदा नहीं रहता । ऐसे कृतघ्न शरीर को मैंने मन से त्याग दिया है । हे मुनीश्वर ! और आश्चर्य देखिये कि यह इसी के लिये भोग करता है पर उसके साथ नहीं चलता । जैसे धूल से मार्ग नहीं भासता वैसे ही यह जीव जब चलने लगता है तब शरीर से क्षोभवान् होता और वासणारूपी धूलिसंयुक्त चलता है परन्तु दीखता नहीं कि कहाँ गया । जब परलोक जाता है तब बड़ा कष्ट होता है, क्योंकि शरीर के साथ इसने स्पर्श किया है । हे मुनीश्वर ! जैसे जल की बूँद पत्र के ऊपर क्षणमात्र रहती है वैसे ही शरीर भी क्षणभंग है। ऐसे शरीर में आस्था करनी मूर्खता है और ऐसे शरीर के ऊपर उपकार करना भी दुःख के निमित्त है सुख कुछ नहीं । अनाद्यन्त इस शरीर से बड़े भोग भोगते हैं और निर्धन थोड़े

४२योगवाशिष्ठ ।

भोग भोगते हैं; परन्तु जरा अवस्था और मृत्यु दोनों को होती है, इसमें विशे- षता कुछ नहीं। शरीर का उपकार करना और भोग भुगतना तृष्णा के कारण उलटा दुःख का कारण है जैसे कोई नागिन को घर में रखकर दूध पिलावे तो अन्त में वह उसे काटकर मारेगी वैसे ही जिस जीव ने तृष्णा- रूपी नागिनी के साथ मित्रता की है वह मरेगा, क्योंकि नाशवन्त है। इसके निमित्त भोग भुगतने का यत्न करना मूर्खता है। जैसे पवन का वेग आता और जाता है वैसे ही यह शरीर भी आना और जाता है, इसमें प्रीति करना दुःख का कारण है। जैसे कोई विरला मृग मरुस्थल की आस्था त्यागता है और सब पड़े भ्रमते हैं वैसे ही सब जीव इसकी आस्था में बँधे हुए हैं, इसका त्याग कोई विरले ही ने किया है। हे मुनीश्वर ! बिजली और दीपक का प्रकाश भी आता जाता दीखता है; परन्तु इस शरीर का आदि अन्त नहीं दीखता कि कहाँ से आता है और कहाँ जाता है। जैसे समुद्र में बुद्बुदे उपजते और मिट जाते हैं उसकी आस्था करने में कुछ लाभ नहीं वैसे ही यह शरीर इसकी आस्था करना योग्य नहीं। यह अत्यन्त नाश- रूप है स्थिर कदाचित् नहीं होता है। जैसे बिजली स्थिर नहीं होती वैसे ही शरीर भी स्थिर नहीं रहता इसलिए इसकी में आस्था नहीं करता। इसका अभिमान मैंने त्याग दिया है। जैसे कोई सूखे तृण को त्याग देता है वैसे ही मैंने अहंममता त्यागी है। हे मुनीश्वर ! ऐसे शरीर को पुष्ट करना दुःख का निमित्त है। यह शरीर किसी अर्थ नहीं आता जलाने योग्य है। जैसे लकड़ी जलाने के सिवाय और काम में नहीं आती वैसे ही यह शरीर भी जड़ और गूँगा जलाने के अर्थ है। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने काष्ठ- रूपी शरीर को ज्ञानाग्नि से जलाया है उसका परम अर्थ सिद्ध हुआ है और जिसने नहीं जलाया उसने परम दुःख पाया है। हे मुनीश्वर ! न मैं शरीर हूँ, न मेरा शरीर है; न इसका में हूँ, न मेरा यह है; अब मुझको कामना कोई नहीं, मैं निराशी पुरुष हूँ और शरीर से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं इसलिये आप वही उपाय कहिये जिससे में परमपद पाऊँ। हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने शरीर का अभिमान त्यागा है वह परमानन्दरूप है और जिसको देह का अभिमान है वह परम दुःखी है। जितने दुःख हैं

वैराग्य प्रकरण । ४३

वे शरीर के संयोग से होते हैं । मान-अपमान, जरा-मृत्यु, दम्भ-भ्रान्ति, मोह-शोक आदि सर्व विकार देह के संयोग से होते हैं जिनको देह में अभिमान है उनको धिक्कार है और सब आपदा भी उन्हीं को प्राप्त होती हैं। जैसे समुद्र में नदी प्रवेश करती है वैसे ही देहाभिमान में सर्व आपदा प्रवेश करती हैं। जिसको देह का अभिमान नहीं है वह मनुष्यों में उत्तम और वन्दना करने के योग्य है। ऐसे को मेरा भी नमस्कार है और सर्व सम्पदा भी उसी को प्राप्त होती हैं जैसे मानसरोवर में सब हंस आकर रहते हैं वैसे ही जहाँ देहाभिमान नहीं रहा वहाँ सर्व सम्पदा आ रहती हैं। हे मुनीश्वर ! जैसे अपनी छाया में बालक वेताल कल्पता है और उससे भय पाता है पर जब उसको विचार की प्राप्ति होती है तब वेताल का अभाव हो जाता है वैसे ही अज्ञान से मुझको अहङ्काररूपी पिशाच ने शरीर में दृढ़ आस्था बताई है। इसलिए आप वही उपाय कहिये जिससे अहङ्काररूपी पिशाच का नाश हो और आस्थारूपी फाँसी टूटे। हे मुनीश्वर ! प्रथम मुझको अज्ञान में अहङ्काररूपी पिशाच का संयोग था; उसके अनन्तर शरीर में आस्था उपजी जैसे बीज से प्रथम अंकुर होता है फिर अंकुर से वृक्ष होता है वैसे ही अहङ्कार से शरीर की आस्था होती है। हे मुनीश्वर ! जैसे बालक छाया में वेताल देखकर दीनता को प्राप्त होता है वैसे ही अहङ्काररूपी पिशाच ने मुझको दीन किया है। वह अहङ्काररूपी पिशाच अविचार से सिद्ध है। जैसे प्रकाश से अन्धकार नाश हो जाता है वैसे ही विचार करने से अहङ्कार नष्ट हो जाता है। हे मुनीश्वर ! जिस शरीर में आस्था रखी है वह जल के प्रवाह की नाईं है, स्थिर नहीं होता। जैसे बिजली का चमकना स्थिर नहीं और गन्धर्व नगरी की आस्था व्यर्थ है वैसे ही शरीर की आस्था करना व्यर्थ है। हे मुनीश्वर ! जो शरीर की आस्था करके अहङ्कार करते हैं और जगत के पदार्थों के निमित्त यत्न करते हैं वे महामूर्ख हैं। जैसे स्वप्न मिथ्या है वैसे ही यह जगत मिथ्या है। जो उसको सत्य जानता है वह अपने बन्धन के निमित्त यत्न करता है। जैसे बुराण अर्थात् कुम्हारी अपने बन्धन के निमित्त गुफा बनाती है और पतंग अपने नाश के निमित्त दीपक की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी को

९४योगवाशिष्ठ ।

अपने देह का अभिमान और भोग की इच्छा अपने ही नाश के निमित्त है । हे मुनीश्वर ! मैं तो इस शरीर को अङ्गीकार नहीं करता । इस शरीर का अभिमान परम दुःख देनेवाला है जिसको देह का अभिमान नहीं रहा उसको भोग की इच्छा भी न रहेगी । इससे में निराश हूँ और मुझे परमपद की इच्छा है जिसके पाने से फिर संसारसमुद्र की प्राप्ति न हो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे देहनैराश्य वर्णनन्नाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥

रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस जीव को संसारसमुद्र में जन्म पाकर प्रथम बाल अवस्था प्राप्त होती है वह भी परम दुःख का मूल है । उससे वह परम दीन हो जाता है और इतने अवगुण इसमें आ प्रवेश करते हैं अर्थात् अशक्तता, मूर्खता, इच्छा, चपलता, दीनता, दुःख, सन्ताप इतने विकार इसको प्राप्त होते हैं । यह बाल्यावस्था महाविकारवान् है । बालक पदार्थ की ओर धावता है और एक वस्तु का ग्रहणकर दूसरी को चाहता है स्थिर नहीं रहता, फिर और में लग जाता है । जैसे वानर स्थिर नहीं बैठता और जो किसी पर क्रोध करता है तो भीतर से जलता है । वह बड़ी बड़ी इच्छा करता है, पर उसकी प्राप्ति नहीं होती, सदा तृष्णा में रहता है और क्षण में भयभीत हो जाता है; शान्ति प्राप्त नहीं होती । जैसे कदली वन का हाथी जंजीर से बँधा हुआ दीन हो जाता है वैसे ही यह चैतन्य पुरुष बालक अवस्था में दीन हो जाता है । वह जो कुछ इच्छा करता है सो विचार बिना है, उसमे दुःख पाता है । यह मूढ़ रँगों अवस्था है उससे कुछ सिद्धि नहीं होती और जो किसी पदार्थ की प्राप्ति होती है तो उसमें क्षणमात्र सुखी रहता है फिर तपने लगता है । जैसे तपती पृथ्वी पर जल डालिये तो एक क्षण शीतल होती है फिर उसी प्रकार से तपती है वैसे ही यह भी तपता रहता है । जैसे रात्रि के अन्त में सूर्य उदय होता है उसमे उलकादि कष्टवान् होते हैं वैसे ही इस जीव को स्वरूप के अज्ञान से बाल्यावस्था में कष्ट होता है । हे मुनीश्वर ! जो बालक अवस्था की संगति करता है वह भी मूर्ख है, क्योंकि वह विवेकरहित अवस्था है और सदा अपवित्र है और सदा पदार्थ की ओर धावती है ।

वैराग्य प्रकरण । ४५

ऐसी मूढ़ और दीन अवस्था की मुझको इच्छा नहीं, उसमें जिस पदार्थ को देखता है उसकी ओर धावता है जैसे कुत्ता क्षण-क्षण में द्वार की ओर जाता है और अपमान पाता है वैसे ही बालक अपमान पाता है। बालक को माता, पिता, बान्धव, अपने से बड़े बालक और पशु पक्षी का भी भय रहता है। हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःखरूपी अवस्था की मुझको इच्छा नहीं। जैसे स्त्री के नयन और नदी का प्रवाह चञ्चल है उससे भी मन और बालक चञ्चल हैं और सब चञ्चलता बालक के कनिष्ठ हैं। हे मुनीश्वर ! जैसे वेश्या का चित्त एक पुरुष में नहीं ठहरता वैसे ही बालक का चित्त एक पदार्थ में नहीं ठहरता और उसको यह विचार भी नहीं होता कि इस पदार्थ से मेरा नाश होगा वा कल्याण होगा। बालक ऐसी ही व्यर्थ चेष्टा करता है, सदा दीन रहता है और सुख दुःख की इच्छा से तपायमान रहता है। जैसे ज्येष्ठ-आषाढ़ में पृथ्वी तपायमान होती है वैसे ही बालक तपता रहता है शान्ति कदाचित् नहीं पाता । जब विद्या पढ़ने लगता है तब गुरु से ऐसा भयभीत होता है जैसे कोई यम को देख भय पावे और जैसे गरुड़ को देख के सर्प डरे। जब शरीर में कोई कष्ट प्राप्त होता है तब भी यह बड़े दुःख को प्राप्त होता है और उस दुःख को निवारण नहीं कर सकता और सहने की भी सामर्थ्य नहीं होती, भीतर ही जलता है और मुख से कुछ बोल नहीं सकता । जैसे वृक्ष-कुञ्ज बोल नहीं सकता और जैसे पशु-पक्षी दुःख पाते हैं, न कुछ कह सकते हैं, न दुःख का निवारण कर सकते हैं, भीतर ही भीतर जलते हैं वैसे ही बालक भी गूँगा और मूढ़ होकर दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! ऐसी बालक अवस्था की इच्छा करने वाला मूर्ख है। यह तो परम दुःख रूप अवस्था है। इसमें विवेक और विचार भी कुछ नहीं होता । बालक खाने को पाता है रुदन करता है । ऐसी अवगुणरूप अवस्था मुझको नहीं सुहानी। जैसे बिजली और जल के बुद्बुदे स्थिर नहीं रहते वैसे ही बालक भी कदाचित् स्थिर नहीं रहता । हे मुनीश्वर ! यह महामूर्ख अवस्था है । इसमें कभी कहता है कि हे पिता ! मुझको बर्फ का टुकड़ा भून दे और कभी कहता है कि मुझको चन्द्रमा उतार दे । ये सब मूर्खता के वचन हैं। इससे ऐसी मूर्खावस्था को मैं

४६योगवासिष्ठ ।

अङ्गीकार नहीं करता । जैसे दुःख का अनुभव बालक को होता है वह हमारे स्वप्ने में भी नहीं आया । यह बाल्यावस्था अवगुण का भूषण है और अवगुण से शोभित है । ऐसी नीच अवस्था को में अङ्गीकार नहीं करता । इसमें गुण कोई भी नहीं है ।

इति श्रीयोगवासिष्ठेवैराग्यप्रकरणे बाल्यावस्थावर्णनन्नामचतुर्दशस्सर्गः॥१४॥

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! दुःखरूप बाल्यावस्था के अनन्तर युवावस्था आती है सो नीचे से ऊंचे चढ़ती है । वह भी उत्तम नहीं अधिक दुःखदायक है । जब युवावस्था आती है तब कामरूपी पिशाच आ लगता है । वह कामरूपी पिशाच युवावस्थारूपी गढ़े में आ स्थित होता है, चित्त को फिराता है और इच्छा पसारता है । जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी कमल खिल आता है और पंखुरियों को पसारता है वैसे ही युवावस्थारूपी सूर्य उदय होकर चित्तरूपी कमल और इच्छारूपी पंखुरी को पसारता है । फिर जैसे किसी को अग्नि के कुंड में डाल दिया हो और वह दुःख पावे वैसे ही काम के वश हुआ दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! जो कुछ विकार हैं सो सब युवावस्था में प्राप्त होते हैं । जैसे धनवान को देखके सब निर्धन धन की आशा करते हैं वैसे ही युवावस्था देखकर सब दोष इकट्ठे होते हैं जो भोग को सुखरूप जानकर भोग की इच्छा करता है वह परम दुःख का कारण है । जैसे मद्य का घट भरा हुआ देखने मात्र सुन्दर लगता है परन्तु जब उसको पान करे तब उन्मत्त होकर दीन हो जाता है और निगड़र पाता है वैसे ही भोग देखने मात्र सुन्दर भासते हैं, परन्तु जब इनको भोगता है तब तृष्णा में उन्मत्त और पराधीन हो जाता है । हे मुनीश्वर ! यह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहङ्कार आदि सब चोर युवारूपी रात्रि को देखकर लूटने लगते हैं और आत्माज्ञानरूपी धन को ले जाते हैं । इससे जीव दीन होता है । आत्मानन्द के वियोग में ही जीव दीन हुआ है । हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःख देनेवाली युवावस्था को मैं अङ्गीकार नहीं करता । शान्ति चित्त को स्थिर करने के लिये है पर युवावस्था में चित्त विषय की ओर धावता है जैसे बाण लक्ष्य की ओर जाता है । तब उसको विषय का संयोग

वैराग्य प्रकरण । ४७

होता है और विषय की तृष्णा निवृत्त नहीं होती और तृष्णा के मारे जन्म से जन्मान्तर में दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःख-दायक युवावस्था की मुझको इच्छा नहीं है । हे मुनीश्वर ! जैसे प्रलय-काल में सब दुःख आकर स्थिर होते हैं वैसे ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहङ्कार, चपलता इत्यादिक सब दोष युवावस्था में आ स्थिर होते हैं जो सब बिजली की चमक से हैं; होके मिट जाते हैं । जैसे समुद्र तरङ्ग होकर मिट जाते हैं वैसे ही यह क्षणभङ्गुर है और वैसे ही युवावस्था होकर मिट जाती है । जैसे स्वप्न में कोई स्त्री विकार से छल जाती है वैसे ही अज्ञान से युवावस्था छल जाती है । हे मुनीश्वर ! युवावस्था जीव की परम शत्रु है । जो पुरुष इस शत्रु के शस्त्र से बचे हैं वही धन्य हैं । इसके शस्त्र काम और क्रोध हैं जो इनसे छूटा वह वज्र के प्रहार से भी न छेदा जायेगा और जो इनसे बँधा हुआ है वह पशु है । हे मुनीश्वर ! युवा-वस्था देखने में तो सुन्दर परन्तु भीतर से तृष्णा से जर्जरीभूत है । जैसे वृक्ष देखने में तो सुन्दर हो परन्तु भीतर से घुन लगा हुआ हो वैसे ही युवावस्था है जो भोगों के निमित्त यत्न करती है वे भोग आपात रमणीय हैं । कारण यह कि जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है तब तक अविचार से भला लगता है और जब वियोग होता है तब दुःख होता है । इसलिये भोग करके मूर्ख प्रसन्न और उन्मत्त होते हैं उनको शान्ति नहीं होती । भीतर सदा तृष्णा रहती है और स्त्री में चित्त की आसक्ति रहती है । जब इष्ट वनिता का वियोग होता है तब उसको स्मरण करके जलता है जैसे वन का वृक्ष अग्नि से जलता है वैसे ही युवावस्था में इष्ट के वियोग से जीव जलता है। जैसे उन्मत्त हस्ती जंजीर से बँधता तो स्थिर होता है कहीं जा नहीं सकता वैसे ही कामरूपी हस्ती को जंजीररूपी युवावस्था बन्धन करती है । युवावस्थारूपी नदी है उसमें इच्छारूपी तरंग उठते हैं वे कदाचित् शान्ति नहीं पाते । हे मुनीश्वर ! यह युवावस्था बड़ी दुष्ट है । बड़े बुद्धिमान, निर्मल और प्रसन्न पुरुष की बुद्धि को भी मलिन कर डालती है । जैसे निर्मल जल की बड़ी नदी वर्षाकाल में मलिन हो जाती है वैसे ही युवावस्था में बुद्धिमलिन हो जाती है । हे मुनी

४८योगवासिष्ठ ।

श्वर ! शरीररूपी वृक्ष है उसमें युवावस्थारूपी बेलि प्रकट होती है सो पुष्ट होती जाती है तब चित्तरूपी भँवरा आ बैठता है और तृष्णारूपी उसकी सुगन्ध से उन्मत्त होता है, सब विचार भूल जाता है। जैसे जब प्रबल पवन चलता है तब सूखे पत्तों को उड़ा ले जाता है वैसे ही युवावस्था वैराग्य सन्तोषादिक गुणों का अभाव करती है। दुःखरूपी कमल का युवावस्थारूपी सूर्य है, इसके उदय से सब दुःख प्रफुल्लित हो आते हैं। इससे सब दुःखों का मूल युवावस्था है। जैसे सूर्य के उदय से सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं वैसे ही चित्तरूपी कमल संसाररूपी पंखुड़ी और सत्यता-रूपी सुगन्ध से खिल आता है और तृष्णारूपी भँवरा उस पर आ बैठता और विषय की सुगन्ध लेता है। हे मुनीश्वर ! संसाररूपी रात्रि है उसमें युवावस्थारूपी तारागण प्रकाशते हैं अर्थात् शरीर युवावस्था से सुशो-भित होता है। जैसे धान के छोटे वृक्ष हरे तब तक रहते हैं जब तक उसमें फल नहीं आता। जब फल आता है तब वृक्ष सूखने लगते हैं और अन्न परिपक्व होता है वृक्ष की हरियाली नहीं रह सकती वैसे ही जब तक जवानी नहीं आती तब तक शरीर सुन्दर कोमल रहता है जब जवानी आती है तब शरीर क्रूर हो जाता है और फिर परिपक्व होकर जीर्ण और वृद्ध होता है। इससे हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःख की मूलरूप युवा-वस्था की मुझको इच्छा नहीं। जैसे समुद्र बड़े जल से तरंगों को भगा-गता और उछालता है तो भी मर्यादा नहीं त्यागता, क्योंकि ईश्वर की आज्ञा मर्यादा में रहने की है और युवावस्था तो ऐसी है कि शास्त्र और लोक की मर्यादा मेट के चलती है और उसको अपना विचार नहीं रहता। जैसे अन्धकार में पदार्थ का ज्ञान नहीं होता वैसे ही युवावस्था में शुभा-शुभ का विचार नहीं होता। जिसको विचार नहीं रहा उसको शान्ति कहाँ से हो; वह सदा व्याधि और ताप में जलता रहता है। जैसे जल के बिना मत्स्य को शान्ति नहीं होती वैसे ही विचार के बिना पुरुष सदा जलता रहता है। जब युवावस्थारूप रात्रि आती है तब काम पिशाच आके गर्जता है और यहाँ सङ्कल्प उठते हैं कि कोई कामी पुरुष आवे तो उसके साथ में यहाँ चर्चा करूँ कि हे मित्र ! वह स्त्री कैसी सुन्दर है और उसके कैसे

वैराग्य प्रकरण । ४६

कटाक्ष है । वह किस प्रकार मुझको प्राप्त हो ? हे मुनीश्वर ! इस इच्छा में वह सदा जलता ही रहता है । जैसे मरुस्थल की नदी को देख मृग दौड़ता है और जल की अप्राप्ति से जलता है वैसे ही कामी पुरुष विषय की वासना में जलता है और शान्ति नहीं पाता । हे मुनीश्वर ! मनुष्य जन्म उत्तम है परन्तु जिनके अभाग्य हैं उनको विषय से आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती । जैसे किसी को चिन्तामणि प्राप्त हो और वह उसका निरादर करे उसका गुण न जानकर डाल दे वैसे ही जिस पुरुष ने मनुष्यशरीर पाकर आत्मपद नहीं पाया वह बड़ा अभागी है और मूर्खता से अपने जन्म को व्यर्थ खो डालता है वह युवावस्था में परम दुःख का क्षेत्र अपने निमित्त बोता है और मान, मोह, मद इत्यादि विकारों में पुरुषार्थ का नाश करता है । हे मुनीश्वर ! युवावस्था ऐसे बड़े विकारों को प्राप्त करती है । जैसे नदी वायु से अनेक तरङ्ग पसारती है वैसे ही युवावस्था चित्त के अनेक कामों को उठाती है । जैसे पक्षी पंख से बहुत उड़ता है और जैसे सिंह भुजा के बल से पशु को मारने दौड़ता है वैसे ही चित्त युवावस्था में विक्षेप की ओर धावता है । हे मुनीश्वर ! समुद्र का तरना कठिन है क्योंकि उसमें जल अथाह है उसका विस्तार भी बड़ा है और उसमें कच्छ मच्छ मगर भी बड़े बड़े जीव रहते हैं पर मैं उसका तरना भी सुगम मानता हूँ परन्तु युवावस्था का तरना महाकठिन है अर्थात् युवावस्था में निर्दोष रहना कठिन है । ऐसी संकटवाली युवावस्था में जो चलायमान नहीं होते सो पुरुष धन्य हैं और वन्दना करने योग्य हैं । हे मुनीश्वर ! यह युवावस्था चित्त को मलीन कर डालती है । जैसे जल की बावली के निकट राख और काँटे हों और पवन चलने से सब आ बावली में गिरें वैसे ही पवनरूपी युवावस्था दोषरूपी धूल और काँटों को चित्तरूपी बावली में डाल के मलीन कर देती है । ऐसे अवगुणों से पूर्ण युवावस्था की इच्छा मुझको नहीं है । युवावस्था मुझ पर यही कृपा कर कि तेरा दर्शन न हो । तेरा आना मैं दुःख का कारण मानता हूँ । जैसे पुत्र के मरण का संकट पिता नहीं सह सकता और सुख का निमित्त नहीं देखता वैसे ही तेरा आना मैं सुख का निमित्त नहीं देखता । इससे मुझपर

५० | योगवासिष्ठ ।

दया कर कि अपना दर्शन न दे। हे मुनीश्वर ! युवावस्था का तरना महा कठिन है। यौवनवान् नम्रतासंयुक्त नहीं होने और शास्त्र के गुण वैराग्य विचार संतोष और शान्ति इनमें भी सम्पन्न नहीं हैं। जैसे आकाश में वन होना आश्चर्य है वैसे ही युवावस्था में वैराग्य, विचार, शान्ति और संतोष होना भी बड़ा आश्चर्य है। इससे आप मुझसे वही उपाय कहिये जिससे युवावस्था के दुःख से मुक्त होकर आत्मपद की प्राप्ति हो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे युवागारुडी वर्णनन्नामपञ्चदशस्सर्गः ॥१५॥

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! जिस कामविलास के निमित्त पुरुष स्त्री की वाञ्छा करता है वह स्त्री अस्थि, मांम, रुधिर, मूत्र, विष्ठा से पूर्ण है और इन्हीं की पुतली बनी हुई है। जैसे यन्त्री की बनी पुतली तागे के द्वारा अनेक चेष्टा करती है वैसे ही यह अस्थि, मांसादिक की पुतली में कुछ और नहीं है। जो विचार से नहीं देखता उसको रमणीय दीखती है। जैसे पर्वत के शिखर दूर से सुन्दर और गड्डु माला सहित भासते हैं और निकट से असार हैं—पत्थर ही पत्थर दीखते हैं वैसे ही स्त्री वस्त्र और भूषणों से सुन्दर भासती है। जो अंग को भिन्न भिन्न विचारकर देखो तो सार कुछ नहीं। जैसे नागिन के अंग बहुत कोमल होते हैं परन्तु उसका स्पर्श करे तो काट के मार डालती है वैसे ही जो कोई स्त्री का स्पर्श करते हैं उनको वह नाश कर डालती है। जैसे विष की बेलि देखने मात्र सुन्दर लगती है परन्तु स्पर्श करने से मार डालती है और जैसे हाथी को जंजीर से बाँधे तो जिस द्वार पे रहता है। वहीं स्थिर रहता है वैसे ही अज्ञानी का चित्तरूपी हाथी काम रूपी जंजीर से बँधा हुआ स्त्रीरूपी एक स्थान में स्थिर रहता है वहाँ से कहीं जा नहीं सकता। जब हाथी को महावत अंकुश का प्रहार करता है तब वह बन्धन को तोड़ के निकल जाता है वैसे ही इस चित्तरूपी मूर्ख हाथी को जब महावतरूपी गुरु उपदेशरूपी अंकुश का बारंबार प्रहार करता है तब निर्बन्ध होता है। हे मुनीश्वर । कामी पुरुष स्त्री की वाञ्छा अपने नाश के निमित्त करता है। जैसे कदली वन का हाथी कागद की हथिनी देखकर और छल पाके बन्धन में आता है और उससे परम दुःख पाता है वैसे ही सब दुःखों का मूल

वैराग्य प्रकरण । ५१

स्त्री का संग है। हे मुनीश्वर ! जैसे वन के दाह की अग्नि वन को जलाती है वैसे ही स्त्रीरूपी अग्नि उससे भी अधिक है, क्योंकि वह अग्नि तो स्पर्श करने में ही जलाती है परन्तु स्त्रीरूपी अग्नि स्मरणमात्र से जलाती है । जो सुख रमणीय दीखता है वह आपात-रमणीय है, जब स्त्रीसुख का वियोग होता है तब मुरदे की नाईं हो जाता है । हे मुनीश्वर ! यह तो अस्थि, मांस और रुधिर का पिंजरा है सो अग्नि में भस्म हो जायगा अथवा पशु पक्षी के खाने का आहार होगा और प्राण आकाश में लीन हो जावेंगे । इससे इस स्त्री की इच्छा करनी मूर्खता है । जैसे अग्नि की ज्वाला के ऊपर श्यामता होती है वैसे स्त्री के शीश के ऊपर श्याम केश हैं और जैसे अग्नि के स्पर्श करने से जलता है वैसे ही स्त्री के स्पर्श करने से पुरुष जलता है, इससे जलना दोनों में तुल्य है । हे मुनीश्वर ! युवावस्था को नष्ट करने वाली स्त्रीरूपी अग्नि है । जो स्त्री की इच्छा करते हैं वह महामूर्ख और अज्ञानी हैं । वह स्त्री इच्छा अपने नाश के निमित्त करते हैं । जैसे पतङ्ग अपने नाश के निमित्त दीपक की इच्छा करता है वैसे ही कामी पुरुष अपने नाश के निमित्त स्त्री की इच्छा करता है । हे मुनीश्वर ! स्त्रीरूपी विष की बेलि है हाथ पाँव के अग्रभाग उसके पत्र हैं, भुजा डाली हैं, स्तनरूप गुच्छे हैं और नेत्र आदिक इन्द्रियाँ फूल हैं उस पर कामी पुरुषरूपी भँवरे आ बैठते हैं । कामरूपी धीवर ने स्त्रीरूपी जाल पसारा है उस पर कामी पुरुषरूपी पक्षी आ फँसते हैं । कामरूपी धीवर उनको फँसाकर परम कष्ट देता है । ऐसे दुःख को देने वाली स्त्री की जो वाञ्छा करते हैं महामूर्ख हैं । हे मुनीश्वर ! स्त्रीरूपी सर्पिणी है जब उसका फूत्कार निकलता है तब वैराग्यरूपी कमल जल जाते हैं और जब सर्पिणी डसती है तब विष चढ़ता है । स्त्रीरूपी सर्पिणी का चिन्तन करते ही भीतर में आप ही विष चढ़ जाता है । हे मुनीश्वर ! जैसे व्याध छलकर मछली को फँसाता है वैसे ही कामी पुरुष बली के सदृश सुन्दर स्त्रीरूपी जाल देखके फँसता है और स्नेहरूपी तागे में बन्धन पाकर खिंचा चला जाता है, तब तृष्णारूपी छुरी से काम उसे मार डालता है । हे मुनीश्वर ! ऐसे दुःख के देनेवाली स्त्री की मुझको

५२ | योगवाशिष्ठ ।

इच्छा नहीं। कामरूपी व्याध ने रागरूपी इन्द्रियों में जाल बिछा कामी पुरुषरूपी मृगों को आसक्त कर डाला है। स्त्री की स्नेहरूपी डोरी है। उसमें कामी पुरुषरूपी बैल बँधा है और स्त्री के मुखरूपी चन्द्रमा को देखकर कामी पुरुषरूपी कमलिनी खिल आती है। जैसे चन्द्रमुखी कमल चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न होते हैं और सूर्यमुखी नहीं होते वैसे ही कामी पुरुष भोग से प्रसन्न होते हैं और ज्ञानवान प्रसन्न नहीं होते। जैसे नेवला सर्प को बिल से निकाल के मारता है वैसे ही कामी पुरुष को स्त्री आत्मानन्द में से निकाल के मार डालती है। पुरुष जब स्त्री के निकट जाता है तब वह उसको भस्म कर डालती है। जैसे सूखे तृण और घृत को अग्नि भस्म कर डालती है वैसे ही कामी पुरुष को स्त्रीरूपी नागिनि भस्म कर डालती है। हे मुनीश्वर ! स्त्रीरूपी रात्रि का स्नेहरूपी अन्धकार है और काम, क्रोधादिक उसमें उलूक और पिशाच हैं। हे मुनीश्वर ! जो स्त्रीरूपी खड्ग के प्रहार से युवारूपी संग्राम में बचा है वह पुरुष धन्य है, उसको मेरा नमस्कार है। स्त्री का संयोग परम दुःख का कारण है, इससे मुझको इसकी इच्छा नहीं। हे मुनीश्वर ! जो रोग होता है उसी के अनुसार जो औषध करता है तो रोग निवृत्त होता है और कुपथ्य से उसका प्रकोप होकर रोग बढ़ जाता है, इससे मेरे रोग के अनुसार औषध करो। मेरा रोग सुनिये कि जरा और मृत्यु मुझको बड़ा रोग है। उसके नाश की औषध मुझको दीजिये। स्त्री आदिक सब भोग तो रोग के वृद्धिकर्त्ता हैं। जैसे अग्नि में घृत डालिये तो बढ़ जाती है वैसे ही भोग से जरा मृत्यु आदि रोग बढ़ते हैं। इससे इस रोग की निवृत्ति की औषधि करो, नहीं तो सबका त्याग कर मैं वन में जा रहूँगा। हे मुनीश्वर ! जिसके स्त्री है उसको भोग की इच्छा भी होती है और जिसके स्त्री नहीं होती उसको स्त्री की इच्छा भी नहीं। जिसने स्त्री का त्याग किया है उसने संसार का भी त्याग किया है और वही सुखी है। संसार का बीज स्त्री है इससे मुझको स्त्री की इच्छा नहीं। मुझको वही औषधि दीजिये जिससे जरा मृत्यु आदि रोग की निवृत्ति हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे दुराशावर्णनन्नामषोडशस्सर्गः ॥ १६ ॥

वैराग्य प्रकरण । ५३

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! बालक अवस्था तो महाजड़ और अशक्त है । जब युवावस्था आती है तब बाल्यावस्था का ग्रास कर लेती है और उसके अनन्तर जब वृद्धावस्था आती है शरीर जर्जरीभूत हो जाता है और बुद्धि क्षीण हो जाती है, फिर मृत्यु पाता है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार अज्ञानी का जीना व्यर्थ है, कुछ अर्थ की सिद्धि नहीं । जैसे नदी के तट पर के वृक्ष जल के प्रवाह से जर्जरीभूत हो जाते हैं वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर जर्जरीभूत हो जाता है। जैसे पवन से पत्र उड़ जाते हैं वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर नाश पाता है । जितने कुछ रोग हैं वह सब वृद्धावस्था में आ प्राप्त होते हैं और शरीर कृश हो जाता है। उस समय स्त्री, पुत्रादिक भी सब वृद्ध का त्याग कर देते हैं । जैसे पक्के फल को वृक्ष त्याग देता है वैसे वृद्ध को कुटुम्ब त्याग देता है और जैसे बावले को देख के सब हँसके बोलते हैं कि इसकी बुद्धि जाती रही वैसे ही इसको भी देखके हँसते हैं । जैसे कमल का फूल बर्फ पड़ने से जर्जरीभूत हो जाना है वैसे ही जरा-वस्था में पुरुष जर्जरीभाव को प्राप्त होता है, शरीर कुबड़ा हो जाता है, केश श्वेत हो जाते हैं और शक्ति क्षीण हो जाती है। जैसे चिर काल के बड़े वृक्ष में घुन लगता है वैसे ही इसमें कुछ शक्ति नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! और भी सब कृत्य क्षीण हो जानी है परन्तु एक आसक्तिमात्र रहती है । जैसे बड़े वृक्ष पर उलूक आ रहते हैं वैसे ही इसमें क्रोध शक्ति आ रहती है और सब शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। हे मुनीश्वर ! जरावस्था दुःख का घर है जब जरावस्था आती है तब सब दुःख इकट्ठे होते हैं उनसे पुरुष महादीन हो जाते हैं । युवावस्था में जो काम का बल रहता है सो भी जरा में क्षीण हो जाता है, इन्द्रियों की आसक्ति घट जाती है और उनकी चपलता का अभाव हो जाता है । जैसे पिता के निर्धन होने से पुत्र दीन हो जाता है वैसे ही शरीर के निर्बल होने से इन्द्रियाँ भी निर्बल हो जाती हैं केवल एक तृष्णा बढ़ जाती है । हे मुनीश्वर ! जब जगारूपी रात्रि आती है तब खाँसी रूपी स्यार आकर शब्द करते हैं और आधिव्याधिरूपी उलूक आकर निवास करते हैं। हे मुनीश्वर ! ऐसी नीच वृद्धावस्था की मुझको इच्छा नहीं । जैसे फल से वृक्ष झुक जाता है वैसे ही बुढ़ापे में देह कुबड़ी हो जाती है ।

५४ | योगवाशिष्ट ।

युवावस्था में भी पुत्रादिक उसकी टहल करते थे पर वही सब उसको वृद्धा- वस्था में जैसे वृद्ध बैल को बैलवाला त्याग देता है वैसे ही त्याग देते हैं, देखके हँसते हैं और अपमान करते हैं। उनको यह सब कंट की नाईं भासता है। हे मुनीश्वर ! ऐसी नीच अवस्था की मुझको इच्छा नहीं! अब जो कुछ कर्तव्य हो मुझसे कहिये मैं करूँ ? इस शरीर की तीनों अवस्था में कोई सुखदायी नहीं, क्योंकि बाल्यावस्था महामूढ़ है, युवावस्था महाविकारवान है और जरावस्था महादुःख का पात्र है। बाल्यावस्था को युवावस्था ग्रास कर लेती है; युवावस्था को जरावस्था ग्रास कर लेती है और जरावस्था को मृत्यु ग्रास कर लेती है। यह अवस्था सब अल्पकाल की हैं, इनके आश्रय से मुझको क्या सुख होगा ? इससे आप मुझे वही उपाय बताइये जिससे इस दुःख से मुक्त हो जाऊँ। हे मुनीश्वर ! जब जरावस्था आती है तब मरना भी निकट आता है। जैसे सन्ध्या आने से रात्रितत्काल आ जाती है और जो सन्ध्या के आने से दिन की इच्छा करते हैं वह मूर्ख हैं वैसे ही जरा के आने से जीने की आशा रखनी महामूर्खता है। हे मुनीश्वर ! जैसे बिल्ली चिन्तन करती है कि चूहा आवे तो पकड़ लूँ वैसे ही मृत्यु भी देखती है कि जरावस्था आवे तो मैं इसका ग्रास कर लूँ। हे मुनीश्वर ! यह परम नीच अवस्था है। यह जब आती है तब शरीर को जर्जरीभूत कर देती है; कँपाने लगती है और शरीर को निर्बल और क्रूर कर देती है। जैसे कमल पर बरफ की वर्षा हो और वह जर्जरीभूत हो जाय वैसे ही यह शरीर को जर्जरीभूत कर डालती है। जैसे वन में बाघ आकर शब्द करते हैं और मृग का नाश करते हैं वैसे ही खाँसी रूपी बाघ आकर मृगरूपी बल का नाश करते हैं। हे मुनीश्वर ! जब जरा आती है तब जैसे चन्द्रमा के उदय से कमलिनी म्लैन आती है वैसे ही मृत्यु प्रसन्न होती है। यह जरावस्था बड़ी दुष्टा है; इसने बड़े बड़े योद्धाओं को भी दीन कर दिया है। यद्यपि बड़े-बड़े शूर संग्राम में शत्रुओं को जीतते हैं पर उनको भी जरा ने जीत लिया है। जो बड़े-बड़े पर्वतों को चूर्ण कर डालते हैं उनको भी जरा पिशाचिनी ने महादीन कर दिया है। इस जरारूपी राक्षसी ने सबको दीन कर दिया है। यह सबको जीतनेवाली है। हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में अग्नि लगती और उसमें