योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
३७६ | योगवाशिष्ट ।
अन्धा किया है अर्थात् संसारी लोग असतरूप पदार्थों को सत् जानके यत्न करते हैं । जैसे सूर्य के प्रकाश में उलू को अन्धकार भासता है और भ्रान्ति से सूर्य उसको नहीं भासता । वैसे ही चिदानन्द आत्मा सदा अनुभव में प्रकाशता है और अविद्या से नहीं भासता । असत्यरूप अविद्या ने जगत् को अन्धा किया है, जो विकर्मों को कराती है और विचार करने में नहीं रहती, उसमें अपना आप नहीं भासता और बड़ा आश्चर्य है कि धैर्यवान् धर्मात्मा को भी अपने वश करके समर्थ होने नहीं देती । अविचार सिद्ध अविद्यारूपी स्त्री ने पुरुषों को अन्धा किया है और अनन्त दुःखों का विस्तार फैलाती है, यह उत्पत्ति और नाश सुख और दुःख को कराती है, आत्मा को भासती है, अनन्त दुःख अज्ञान से दिखाती है, बोध से ही हीन कराती है और काम, क्रोध उपजाती है और मन में वासना से यही भावना वृद्धि करती है । हे रामजी ! यह अविद्या निराकाररूप है और उसने जीव को बाँधा है । जैसे स्वप्न में कोई आपको बाँधा देखे वैसे ही अविद्या है । स्वरूप के प्रमाद का ही नाम अविद्या है और कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे अविद्यावर्णनन्नाम अशीतितमस्सर्गः ॥ ८८ ॥
इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो कुछ जगत् दीखता है वह सब यदि अविद्या से उपजा है तो वह निवृत्त किस भाँति होती है? वशिष्ठजी बोले हे रामजी ! जैसे बर्फ की पुतली सूर्य के तेज से क्षण में नष्ट हो जाती है वैसे ही आत्मा के प्रकाश से अविद्या नष्ट हो जाती है । जब तक आत्मा का दर्शन नहीं होता तब तक अविद्या मनुष्य को भ्रम दिखाती है और नाना प्रकार के दुःखों को प्राप्त कराती है, पर जब आत्मा के दर्शन की इच्छा होती है तब वही इच्छा मोह का नाश करती है । जैसे धूप से छाया क्षीण हो जाती है वैसे ही आत्मपद की इच्छा से अविद्या क्षीण हो जाती है और सर्वगत देव आत्मा के साक्षात्कार होने से नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! दृश्य पदार्थों में इच्छा उपजने का नाम अविद्या है और उस इच्छा के नाश का नाम विद्या है । उस विद्या ही
उत्पत्ति प्रकरण । ३७७
का नाम मोक्ष है। अविद्या का नाश भी संकल्पमात्र है। जितने दृश्य
पदार्थ हैं उनकी इच्छा न उपजे और केवल चिन्मात्र में चित्त की वृत्ति
स्थित हो—यही अविद्या के नाश का उपाय है । जब सब वासना निवृत्ति
हों तब आत्मतत्त्व का प्रकाश होवे । जैसे रात्रि के क्षय होने से सूर्य
प्रकाशता है वैसे ही वासना के क्षय होने से आत्मा प्रकाशता है । जैसे
सूर्य के उदय होने से नहीं विदित होता कि रात्रि कहाँ गई वैसे ही विवेक
के उपजे नहीं विदित होता कि अविद्या कहाँ गई । हे रामजी ! मनुष्य
संसार का दृढ़ वासना में बँधा है । और जैसे संध्याकाल में मूर्ख बालक
परछाहीं में वेताल कल्पकर भयवान् होता है वैसे ही मनुष्य अपनी वासना
में भय पाता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह सब दृश्य अविद्या से
हुआ है और अविद्या आत्मभाव से नष्ट होती है तो वह आत्मा कैसा है ?
वशिष्ठजी बोले, चेत्योन्मुखत्व से रहित और सर्वगत समान और अनुभव
रूप जो अशब्दरूप चेतन तत्त्व है वह आत्मा परमेश्वर है । हे रामजी !
ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त जगत् सब आत्मा है और अविद्या कुछ नहीं ।
हे रामजी ! सब देहों में नित्य चेतनघन अविनाशी पुरुष स्थित है,
उसमें मनो नाम्नी कल्पना अन्य की नाईं आभास होकर भासती है, पर
आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ नहीं । हे रामजी ! कोई न जन्मता है, न मरता
है और न कोई विकार है, केवल आत्मतत्त्व प्रकाश सत्तासमान, अवि-
नाशी, चेत्य से रहित, शुद्ध चिन्मात्रतत्त्व अपने आपमें स्थित है
अनित्य, सर्वगत, शुद्ध, चिन्मात्र, निरुपद्रव, शान्तरूप, सत्तासमान
निर्विकार अद्वैत आत्मा है । हे रामजी ! उस एक सर्वगत देव, सर्वशक्ति-
महात्मा में जब विभागकल्पना शक्ति प्रकट होती है तो उसका नाम मन
होता है। जैसे समुद्र में द्रवता से लहरें होती हैं वैसे ही शुद्ध चिन्मात्र में
जो चैत्यता होती है उसका नाम मन है वही संकल्प कल्पना में दृश्य
की नाईं भासता है और उसी संकल्पना का नाम अविद्या है ।
संकल्प ही से वह उपजी है और कल्पना से ही नष्ट हो जाती है । जैसे
वायु से अग्नि उपजती है और वायु से ही लीन होती है वैसे ही
संकल्प से अविद्यारूपी जगत् उपजता है और संकल्प ही से नष्ट हो जाता
३७= योगवाशिष्ठ ।
है । जब चित्त की वृत्ति दृश्य की ओर फुरती है तब अविद्या बढ़ती है और जब दृश्य की वृत्ति नष्ट हो और स्वरूप की ओर आवे तब अविद्या नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! जब यह संकल्प करता है कि मैं 'ब्रह्म नहीं हूँ' तब मन दृढ़ बन्धमय होता है और जब यही संकल्प दृढ़ करता है कि 'सब ब्रह्म है' तब मुक्त होता है । जब अनात्म में अहं अभिमान का संकल्प करता है तब बन्धन होता है और सर्व ब्रह्म के संकल्प से मुक्त होता है । दृश्य का संकल्प बन्ध है और असंकल्प ही मोक्ष है, आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो । जैसे बालक आकाश में सुवर्ण के कमलों की कल्पना करे कि सूर्यवत् प्रकाशित और सुगन्ध से पूर्ण हैं तो वे भावनामात्र होते हैं वैसे अविद्या भावनामात्र है । अज्ञानी जो जानता है कि मैं कृश, अतिदुःखी और वृद्ध हूँ और मेरे हाथ, पाँव और इन्द्रिय हैं, तो ऐसे व्यवहार से बन्धवान् होता है और यदि ऐसे जाने कि मैं दुःखी नहीं न मेरी देह है, न मेरे बन्धन हैं, न मांस हूँ और न मेरे अस्थि हैं मैं तो देह से अन्य साक्षी हूँ, ऐसे निश्चयवान् को मुक्त कहना चाहिए । जैसे सूर्य में और मणि के प्रकाश में अन्धकार नहीं होता वैसे ही आत्मा में अविद्या नहीं । जैसे पृथ्वी पर स्थित पुरुष आकाश में नीलता कल्पता है वैसे ही अज्ञानी आत्मा में अविद्या कल्पता है-वास्तव में कुछ नहीं । फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! सुमेरु की छाया आकाश में पड़ती है अथवा तम की प्रभा है वह और कुछ है, आकाश में नीलता कैसे भासती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आकाश में नीलता नहीं है, न सुमेरु की छाया ही है और न तम है, आकाश पोलमात्र है यह शून्यता गुण है । हे रामजी ! यह ब्रह्माण्ड तेजरूप है, इसका प्रकाश ही स्वरूप है, तम का स्वभाव नहीं । तम ब्रह्माण्ड के बाह्य है, भीतर नहीं, ब्रह्माण्ड का प्रकाश स्वभाव है और दृढ़ शून्यता से आकाश में नीलता भासती है और कुछ नहीं । जिसकी मन्ददृष्टि है उसको नीलता भासती है और जिसकी दिव्य-दृष्टि है उसको नीलता नहीं भासती-पोल भासता है । जैसे मन्द दृष्टि को आकाश में नीलता भासती है, वैसे ही अज्ञानी को अविद्या सत्य भासती है। जैसे दिव्यदृष्टि वाले को नीलता नहीं भासती, वैसे ही ज्ञानवान्
उत्पत्ति प्रकरण ।
३७६
को अविद्या नहीं भासती—ब्रह्मसत्ता ही भासती है । हे रामजी ! जहाँ तक इसके नेत्रों की दृष्टि जाती है वहाँ तक आकाश भासता है और जहाँ दृष्टि कुण्ठित होती है वहाँ नीलता भासती है । हे रामजी ! जैसे जिसकी दृष्टि क्षय होती है उसको नीलता भासती है वैसे ही जिस जीव की आत्मदृष्टि क्षय होती है, उसको अविद्यारूपी सृष्टि भासने लगती है—वही दुःखरूप है । हे रामजी ! चेतन को छोड़के जो कुछ स्मरण करता है उसका नाम अविद्या है और जब चित्त अचल होता है तब अविद्या नष्ट हो जाती है—असंकल्प होने से ही अविद्या नष्ट होती है । जैसे आकाश के फूल हैं वैसे ही अविद्या है । यह भ्रमरूप जगत् मूर्खों को सत्य भासता है, वास्तव में कुछ नहीं है, मन जब फुरने से रहित हो तब जगत् भावनामात्र है। उसी भावना का नाम अविद्या है और यह मोह का कारण है । जब वही भावना उलटकर आत्मा की ओर आवे तब अविद्या का नाश हो । वारम्वार चिन्तना करने का नाम भावना है । जब भावना आत्मा की ओर वृद्धि होती है तब आत्मा की प्राप्ति होती है और अविद्या नष्ट हो जाती है । मन के संसरने का नाम अविद्या है । जब आत्मा की ओर संसरना होता है तब अविद्या नष्ट हो जाती है । हे रामजी ! जैसे राजा के आगे मन्त्री और टहलुए कार्य करते हैं, वैसे ही मन के आगे इन्द्रियाँ कार्य करती हैं । हे रामजी ! बाह्य के विषय पदार्थों की भावना छोड़के तुम भीतर आत्मा की भावना करो तब आत्मपद को प्राप्त होगे । जिन पुरुषों ने अन्तःकरण में आत्मा की भावना का यत्न किया है वे शान्ति को प्राप्त हुए हैं। हे रामजी ! जो पदार्थ आदि में नहीं होता, वह अन्त में भी नहीं रहता, इससे जो कुछ भासता है वह सब ब्रह्मसत्ता है । उससे कुछ भिन्न नहीं और जो भिन्न भासता है वह मनो-मात्र है । तुम्हारा स्वरूप निर्विकार और आदि अन्त से रहित ब्रह्मतत्त्व है । तुम क्यों शोक करते हो ? अपना पुरुषार्थ करके संसार की भोग वासना को मूल से उखाड़ो और आत्मपद का अभ्यास करो तो दृश्य भ्रम मिट जावे । हे रामजी ! इस संसार की वासना का उदय होना जरामरण और मोह देने वाला है। जब स्वरूप का प्रमाद होता है तब जीव की यह कल्पना
३८० योगवाशिष्ठ ।
उठती है और आकाशरूपी अनन्त फाँसियों से बन्धवान् होता है । तब वासना और वृद्धि हो जाती है और कहता है कि ये मेरे पुत्र हैं, यह मेरा धन है, यह मेरे बान्धव हैं, ये में हूँ; वह और है । हे रामजी ! जिस शरीर से मिलकर यह कल्पना करता है वह शरीर शून्यरूप है । जैसे वायु गोले के साथ तृण उड़ते हैं, वैसे अविद्यारूपी वासना से शरीर उड़ते हैं अहं त्वं आदिक जगत् अज्ञानी को भासता है और ज्ञानवान् को केवल सत्य ब्रह्म भासता है । जैसे रस्सी के न जानने से सर्प भासता है और रस्सी के सम्यक् ज्ञान से सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से जगत् भासता है और आत्मा के सम्यक्ज्ञान से जगद्भ्रम नष्ट हो जाता है । इससे तुम आत्मा की भावना करो । हे रामजी ! रस्सी में दो विकल्प होते हैं-एक रस्सी का और दूसरा सर्प का, वे दोनों विकल्प अज्ञानी को होते हैं ज्ञानी को नहीं होते । जो जिज्ञासु होता है उसकी वृत्ति सत्य और असत्य में डोलायमान होती है और जो ज्ञानवान् है उसको विचार से ब्रह्मतत्त्व ही भासता है । इससे तुम अज्ञानी मत होना ज्ञानवान् होना, जो कुछ जगत् की वासना है उन सबका त्याग करो तब शान्तिमान् होगे, हे रामजी ! संसार भोग की वासना भी तब होती है जब अनात्मा में आत्माभिमान होता है, तुम इसके साथ काहे को अभिमान करते हो ? यह देह तो मूक जड़ है और अस्थि-मांस की थैली है । ऐसी देह तुम क्यों होते हो ? जब तक देह में अभिमान होता है तब तक सुख और दुःख भोगता है और इच्छा करता है । जैसे काष्ठ और लाख तथा घट और आकाश का संयोग होता है वैसे ही देह और देही का संयोग होता है । जैसे नली के अन्तर आकाश होता है सो उसके नष्ट होने से आकाश नहीं नष्ट होता और जैसे घट के नष्ट होने से घटाकाश नहीं नष्ट होता वैसे ही देह के नष्ट होने से आत्मा का नाश नहीं होता । हे रामजी ! जैसे मृगतृष्णा की नदी भ्रान्ति से भासती है वैसे ही अज्ञान से सुख दुःख की कल्पना होती है । इससे तुम सुख दुःख की कल्पना को त्यागके अपने स्वभावसत्ता में स्थित हो । बड़ा आश्चर्य है कि ब्रह्मतत्त्व सत्यस्वरूप है पर मनुष्य उसे भूल गया है और जो
उत्पत्ति प्रकरण । ३८१
असत्य अविद्या है उसको बारम्बार स्मरण करता है ऐसी अविद्या को तुम मत प्राप्त हो । हे रामजी ! मन का मनन ही अविद्या है और अनर्थ का कारण है, इससे जीव अनेक भ्रम देखता है । मन के फुरने से अमृत से पूर्ण चन्द्रमा का बिम्ब भी नरक की अग्नि समान भासता है और बड़ी लहरों तरंगों और कमलों से संयुक्त जल भी मरुस्थल की नदी समान भासता है । जैसे स्वप्न में मन के फुरने से नाना प्रकार के सुख और दुःख का अनुभव होता है वैसे ही यह सब जगद्भ्रम चित्त की वासना से भासता है । जाग्रत और स्वप्न में यह जीव मन के फुरने से विचित्र रचना देखता है । जैसे स्वर्ग में बैठे हुए को भी स्वप्न में नरकों का अनुभव होता है वैसे ही आनन्दरूप आत्मा में प्रमाद से दुःख का अनुभव होता है । हे रामजी ! अज्ञानी मन के फुरने से शून्य अणु में भी सम्पूर्ण जगत् भ्रम दीखता है जैसे राजा लवण को सिंहासन पर बैठे चाण्डाल की अवस्था का अनुभव हुआ था । इससे संसार की वासना को तुम चित्त से त्याग दो । यह संसार वासना बन्धन का कारण है । सब भावों में बतों परन्तु राग किसी में न हो । जैसे स्फटिक मणि सब प्रतिबिम्बों को लेता है परन्तु रङ्ग किसी का नहीं लेता तैसे ही तुम सब कार्य करो परन्तु द्वेष किसी में न रखो । ऐसा पुरुष निर्बन्धन है उसको शास्त्र के उपदेश की आवश्यकता नहीं, वह तो निजरूप है । हे रामजी ! जो कुछ प्रकृत आचार तुमको प्राप्त हो तो देना, लेना, बोलना, चलना आदिक सब कार्य करो परन्तु भीतर से अभिमान कुछ न करो, निर्गभिमान होकर कार्य करो-यह ज्ञान सबसे श्रेष्ठ है ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे यथाकथितदोषपरिहारोपदेशो- नाम नवाशीतितमस्सर्गः ॥ ८९ ॥
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब महात्मा वशिष्ठजी ने कहा तब कमलनयन रामजी ने वशिष्ठजी की ओर देखा और उनका अन्तःकरण रात्रि के मूँदे हुए कमल की नाईं प्रफुल्लित हो आया । तब रामजी बोले कि बड़ा आश्चर्य है । पद्म की ताँत के साथ पर्वत बाँधा है । अविद्यमान अविद्या ने सम्पूर्ण जगत् वश किया है और अविद्यमान जगत्
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को वज्रसारवत् दृढ़ किया है । यह सब जगत् असत्यरूप है और सत्य की नाईं स्थित किया है । हे भगवन् ! इस संसार की नटनी माया में क्या रूप है, महापुण्यवान् लवण राजा ऐसी बड़ी आपदा में कैसे प्राप्त हुआ और इन्द्रजाली जिसने भ्रम दिखाया था वह कौन था कि उसको अपना अर्थ कुछ न था ? वह कहाँ गया और इस देही और देह का कैसे सम्बन्ध हुआ और शुभ अशुभ कर्मों के फल कैसे भोगता है? इतने प्रश्नों का उत्तर मेरे बोध के निमित्त दीजिए । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह देह काष्ठ और मिट्टी के समान है, जैसे स्वप्न में चित्त के फुरने से देह भासता है वैसे ही यह देह भी चित्त से कल्पित है और चित्त ही चैत्य सम्बन्ध से जीव पद को प्राप्त हुआ है । यह जीव चित्त सत्ता से शोभायमान है उस चित्त के फुरने से संसार उपजा है, वह वानर के बालक के समान चञ्चल है और अपने फुरनेरुप कर्मों से नाना प्रकार के शरीर धरता है । उसी चित्त के नाम अहङ्कार, मन और जीव हैं । वह चित्त ही अज्ञान से सुख दुःख भोगता है, शरीर नहीं भोगता । जो प्रबोधचित्त है वह शान्तरूप है । जब तक मन अप्रबोध है और अविद्यारूपी निद्रा में सोया है तब तक स्वप्नरूप अनेकसृष्टि देखता है और जब अविद्या निद्रा से जागता है तब नहीं देखता । हे रामजी ! जब तक जीव अविद्या से मलिन है तब तक संसार भ्रम देखता है और जब बोधवान् होता है तब संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है । जैसे रात्रि होने से कमल मूँद जाते हैं और सूर्य के उदय होने से खिल आते हैं वैसे ही अविद्या से जगद्भ्रम देखता है और बोध से अद्वैत रूप होता है । इससे अज्ञान ही दुःख का कारण है । अविवेक से पञ्च-कोश देह में अभिमानी होकर जैसे कर्म करता है वैसे ही भोगता है, शुभ करता है तो सुख भोगता है और अशुभ से दुःख भोगता है जैसे नटवा अपनी क्रिया से अनेक स्वाँग धारता है वैसे ही मन अपने फुरने से अनेक शरीर धारता है जो कुछ इष्ट-अनिष्ट सुख दुःख हैं वे एक मन के फुरने में हैं और शरीर में स्थित होकर मन ही करता है । जैसे रथ पर आरूढ़ होकर सारथी चेष्टा करता है और बाँबी में बैठकर सर्प चेष्टा करता है वैसे शरीर में स्थित होकर मन चेष्टा करता है । हे रामजी ! अचल
उत्पत्ति प्रकरण । ३८३
रूप शरीर को मन चञ्चल करता है। जैसे वृक्ष को वायु चञ्चल करता है वैसे जड़ शरीर को मन चञ्चल करता है। जो कुछ सुख दुःख की कलना है वह मन ही करता है और वही भोगता और वही मनुष्य है। हे रामजी ! अब लवण का वृत्तान्त सुनो। लवण राजा मन के भ्रमने से चाण्डाल हुआ। जो कुछ मन से करता है वही सफल होता है। हे रामजी ! एक काल में हरिश्चन्द्र के कुल में उपजा राजा लवण एकान्त बगीचे में बैठ के विचारने लगा कि मेरा पितामह बड़ा राजा हुआ है और मेरे बड़ों ने राजसूय यज्ञ किये हैं। मैं भी उनके कुल में उत्पन्न हुआ हूँ इससे मैं भी राजसूय यज्ञ करूँ। इस प्रकार चिन्तना करके लवण ने मानसी यज्ञ आरम्भ किया और देवता, ऋषि, सुर, मुनीश्वर, अग्नि, पवन आदिक देवताओं की मन से पूजा की और मन्त्र और सामग्री जो कुछ राजसूय यज्ञ का कर्म है सो सम्पूर्ण करके मन से दक्षिणा दी। सवावर्ष पर्यन्त उसने यह यज्ञ किया और मन ही से उसका फल भोगा। इससे हे रामजी ! मन ही से सब कर्म होता है और मन ही भोगता है। जैसा चित्त है वैसा ही पुरुष है, पूर्णचित्त से पूर्ण होता है और नष्ट चित्त से नष्ट होता है अर्थात् जिसका चित्त आत्मतत्त्व से पूर्ण है सो पूर्ण है और जो आत्मतत्त्व से नष्टचित्त है वह नष्टपुरुष है। हे रामजी ! जिसको यह निश्चय है कि मैं देह हूँ वह नीचबुद्धि है और अनेक दुःखों को प्राप्त होगा और जिसका चित्त पूर्ण विवेक में जागा है उसको सब दुःखों का अभाव हो जाता है। जैसे सूर्य के उदय होने से कमलों का सकुचना दूर हो जाता है और वे खिल आते हैं, वैसे ही विवेकरूपी सूर्य के प्रकाश से रहित पुरुष दुःखों में संकुचित रहते हैं। जो विवेकरूपी सूर्य के प्रकाश से प्रफुल्लित हुए हैं वे संसार के दुःखों से तर जाते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सुखदुःखभोक्तव्योपदेश कथनान्नाम नवतितमस्सर्गः ॥ ६० ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! राजा लवण ने राजसूय यज्ञ मन से किया और मन ही से उसका फल भोगा परन्तु ऐसा साम्बरी कौन था जिसने उसको भ्रम दिखाया। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब वह साम्बरी
३८४ योगवाशिष्ठ ।
लवण राजा की सभा में आया तब में वहाँ था । मुझसे लवण और उसके मन्त्री ने पूछा कि यह कौन है ? तब मैंने उनसे जो कुछ कहा था वह तुमसे भी कहता हूँ । हे रामजी ! जो पुरुष राजसूय यज्ञ करता है उसको द्वादश वर्ष की आपदा प्राप्त होती है उस द्वादश वर्ष में वह अनेक दुःख देखता है । राजा लवण ने जो मन से यज्ञ किया इसलिये उसकी आपदा ही मन ही से प्राप्त हुई । स्वर्ग मे इन्द्र ने अपना दूत आपदा भुगवाने के निमित्त भेजा। वह साम्बरी का रूप होकर आया और राजा को चाण्डाल की आपदा भुगताकर फिर स्वर्ग में चला गया । हे रामजी ! जो कुछ मैंने प्रत्यक्ष देखा था वह तुमसे कहा । इससे मन ही करता है और मन ही भोगता है । जैसे जैसे दृढ़ संकल्प मन में फुरता है उसके अनुसार उसको सुखदुःख का अनुभव होता है। हे रामजी ! जब तक चित्त फुरता है तब तक आपदा प्राप्त होती है । जैसे ज्यों ज्यों कीकर का वृक्ष बढ़ता है त्यों त्यों कण्टक बढ़ते जाते हैं वैसे ही मन के फुरने से आपदा बढ़ती जाती है । जब मन स्थिर होता है तब आपदा मिट जाती है । इससे हे रामजी ! इस चित्तरूपी बरफ़ को विवेकरूपी तपन से पिघलाओ तब परम सार की प्राप्ति होगी । यह चित्त ही सकल जगत् आडम्बर का कारण है, उसको तुम अविद्या जानो । जैसे वृक्ष, विटप और तरु एक ही वस्तु के नाम हैं वैसे ही अविद्या, जीव, बुद्धि अहंकार सब फुरने के नाम हैं इसको विवेक से लीन करो । हे रामजी ! जैसा संकल्प दृढ़ होता है वैसा ही देखता है । हे रामजी ! वह कौन पदार्थ है जो यत्न करने से सिद्ध न हो ? जो हठ से न फिरे तो सब सिद्ध होता है । जैसे बरफ के बासनों को जल में डालिये तो जल से एकता ही हो जाती है तैसे ही आत्मबोध से सब पदार्थों की एकता हो जाती है । रामजी ने फिर पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि सुख-दुःख सब मन ही में स्थिर हैं और मन की वृत्ति नष्ट होने से नष्ट ही जाते हैं सो चपल वृत्ति कैसे क्षय हो ! वशिष्ठजी बोले, हे रघुकुल में श्रेष्ठ और आकाश के चन्द्रमा ! मैं तुमसे मन के उप-शम की युक्ति कहता हूँ । जैसे सवार के वश घोड़ा होता है तैसे ही मन तुम्हारे वश रहेगा । हे रामजी ! सब भूत ब्रह्म ही में उपजे हैं ।
उत्पत्ति प्रकरण । ३८५
उनकी उत्पत्ति तीन प्रकार की है-एक सात्त्विकी दूसरी राजसी और तीसरी तामसी । प्रथम शुद्ध चिन्मात्र ब्रह्म में जो कल्पना उठी है उसी बाह्यमुखी फुरने का नाम मन हुआ है वही ब्रह्मारूप है, उस ब्रह्मा ने जैसा संकल्प किया तैसे ही आगे देखा, उसने यह भुवन आडम्बर और उसमें जन्म, मरण और सुख, मोह आदिक संसरना कल्पा । इसी प्रकार अपने आरम्भ संयुक्त, जैसे बर्फ का कणुका समुद्र मे उपजकर सूर्य के तेज से लीन हो जावे तैसे ही आरम्भ से निर्वाण हो गया, संकल्प के वश से फिर उपजा और फिर लीन हो गया । इसी प्रकार कई अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड ब्रह्मा से उपज उपजकर लीन हो गये हैं और कितने होंगे और कितने वर्त्तमान हैं । अब जैसे मुक्त होते हैं सो सुनो । हे रामजी ! शुद्ध ब्रह्मतत्त्व से प्रथम मनसत्ता उपजी, उसने जब आकाश को चेता तब आकाश हुआ, उसके उपरान्त पवन हुआ, फिर अग्नि और जल हुआ और उसकी दृढ़ता से पृथ्वी हुई । तब चित्तशक्ति दृढ़ संकल्प से पाँच भूतों को प्राप्त हुई और अन्तःकरण जो सूक्ष्म प्रकृति है सो पृथ्वी, तेज और वायु से मिलकर धान्य में प्राप्त हुआ । उसको जब पुरुष भोजन करते हैं तब वह परिणाम होकर वीर्य और रुधिररूप होके गर्भ में निवास करता है, जिससे मनुष्य उपजता है । पुरुष जन्ममात्र से वेद पढ़ने लगता है, फिर गुरु के निकट जाता और क्रम से उसकी बुद्धि विवेक द्वारा चमत्कारवान् हो जाती है तब उसको ग्रहण और त्याग और शुभ अशुभ में विचार उपजता है । और निर्मल अन्तःकरण सहित स्थित होता है और क्रम से सप्तभूमिका चन्द्रमा की नाईं उसके चित्त में प्रकाशती हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे सात्त्विकजन्मावतारोनाम एकनवतितमस्सर्गः ॥ ६१ ॥
रामजी बोले, हे सर्वशास्त्रों के वेत्ता, भगवन् ! ज्ञान की वे सप्तभूमिका कैसे निवास करनेवाली हैं संक्षेप में मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अज्ञान की सप्तभूमिका हैं और ज्ञान की सप्तभूमिका हैं और उनके अन्तर्गत और बहुत अवस्था हैं कि उनकी कुछ संख्या नहीं परन्तु
३८६ | योगवाशिष्ठ ।
वे सब इन्हीं सप्त के अन्तर्गत हैं । हे रामचन्द्र ! आत्मारूपी वृक्ष है और अपना पुरुषार्थरूपी बसन्त ऋतु है, उससे दो प्रकार की बेलें उत्पन्न होती हैं—एक शुभ और दूसरी अशुभ । पुरुषार्थरूपी रस के बढ़ने में फल की प्राप्ति होती है । अब ज्ञान किसको कहते हैं सो सुनो । शुद्ध चिन्मात्र में चैत्यदृश्य फुरने से रहित होकर स्थित होने का नाम ज्ञान है और शुद्ध चिन्मात्र अद्वैत में अहं संवेदना उठती है सो स्वरूप से गिरना है, वही अज्ञान दशा है । हे रामचन्द्र ! यह मैंने तुमसे संक्षेप से ज्ञान और अज्ञान का लक्षण कहा है । शुद्ध चिन्मात्र में जिनकी निष्ठा है, सत्यस्वरूप से चलायमान नहीं होते और राग-द्वेष किसी से नहीं रखते, वे ज्ञानी हैं और ऐसे शुद्ध चिन्मात्र स्वरूप से जो गिरे हैं वे अज्ञानी हैं । और जो जगत् के पदार्थों में मग्न हैं वे अज्ञानी हैं इसमें परममोह और कोई नहीं—यही परम-मोह है । स्वरूपस्थित इसका नाम है कि एक अर्थ को छोड़ के जो संवित् और अर्थ को प्राप्त होता है । जाग्रत् को त्यागकर सुषुप्ति प्राप्त होती है और मध्य में जो निर्मल सत्ता है उसमें स्थित होना स्वरूपस्थिति कहाती है । हे रामचन्द्र ! भले प्रकार सर्वसंकल्प जिसके शान्त हुए हैं और जो शिला के अन्तरवत् शून्य है वह स्वरूपस्थिति है । अहं त्वं-आदिक फुरने से और भेदविकार और जड़ से रहित अचेत्य चिन्मात्र है सो आत्मस्वरूप कहाता है । उस तत्त्व में फिरकर जो जीवों की अवस्था हुई है वह सुनो । हे रामचन्द्र ! १ बीज जाग्रत है, २ जाग्रत, ३ महाजाग्रत, ४ जाग्रत स्वप्न, ५ स्वप्न, ६ स्वप्न जाग्रत और ७ सुषुप्ति ये सात प्रकार की मोह की अवस्था हैं । इनके अन्तर्गत और भी अनेक अवस्था हैं । पर मुख्य ये सात ही हैं अब इनके लक्षण सुनो । हे रामजी ! आदि जो शुद्ध चिन्मात्र अशब्दपद तत्त्व से चेतनता का अहं है उसका भविष्यत् नाम जीव होता है । आदि वह सर्व पदार्थों का बीजरूप है और उसी का नाम बीज जाग्रत है । उसके अनन्तर जो अहं और यह मेरा इत्यादि के प्रतीति दृढ़ हो और जन्मान्तरों में भासे उसका नाम जाग्रत है । यह है, मैं हूँ, इत्यादिक शब्दों से तन्मय होना और जन्मानन्तर में बैठे हुए जो मन फुरता है मनोराज में वह फुरना दृढ़ हो भासता जाग्रत् स्वप्न कहाता है और
उत्पत्ति प्रकरण । ३८७
दूसरा चन्द्रमा, सीपी में रूपा, मृगतृष्णा का जल इत्यादिक विपर्यय भासना भी जाग्रत् स्वप्न है। निद्रा में जब मन फुरने लगता है और उससे नाना पदार्थ भासने लगते हैं तो जब जाग उठता है तब कहता है कि मन अल्पकाल में अनेक पदार्थ देखे और निद्राकाल में जो पदार्थ देखे थे उनको असत्यरूप जाग्रत् में जानने लगता है। उस निद्राकाल में मन के फुरने का नाम स्वप्न है। स्वप्न आवे और उसमें यह दृढ़ प्रतीति हो जावे कि दीर्घकाल बीत गया उसका नाम महाजाग्रत् है और महाजाग्रत् में अपना बड़ा वपु देखा और उसमें अहं मम भाव दृढ़ हुआ और आपको सत्य जानकर जन्म-मरण आदिक देखे देह रहे अथवा न रहे, उसका नाम स्वप्न जाग्रत् है। वह स्वप्न महाजाग्रतरूप की भास होता है। इन ज्ञ: अवस्थाओं का जहाँ अभाव हो और जडरूप हो उसका नाम सुषुप्ति है। उस अवस्था में घास, पत्थर, वृक्षादिक स्थित है। हे रामजी ! यह अज्ञान की सप्तभूमिका कही, उसमें एक-एक में अवस्था भेद है। हे रामचन्द्र ! स्वप्न चिरकाल से जाग्रतरूप हो जाता है, उसके अन्तर्गत और स्वप्न जाग्रत् हैं और उसके अन्तर और है। इस प्रकार एक-एक के अन्तर अनेक हैं। यह मोह की घनता है और उससे जीव भ्रमते हैं जैसे जल नीचे से नीचे चला जाता है तैसे ही जीव मोह के अनन्तर मोह पाते हैं। हे रामजी ! यह तुमसे अज्ञान की अवस्था कही जिसमें नाना प्रकार के मोह और भ्रम विकार हैं। इनसे तुम विचारकर मुक्त हो तब तुम महात्मा पुरुष और आत्मविचार करके निर्मल बोधवान् होगे और तभी इस भ्रम से तर जावोगे।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे अज्ञानभूमिकावर्णनंनाम द्विनवतितमस्सर्गः ॥ ६२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र ! अब तुम ज्ञान की सप्तभूमिका सुनो। भूमिका चित्त की अवस्था को कहते हैं। ज्ञान की भूमिका जानने से जीव फिर मोहरूपी कीचड़ में नहीं डूबता। हे रामचन्द्र ! और मतवाले भूमिका को बहुत प्रकार से कहते हैं पर मेरा अभिमत पूछो तो यह है कि इससे सुगम और निर्मल बोध प्राप्त होता है। स्वरूप में जागने का नाम
३८८ योगवाशिष्ठ ।
ज्ञान है, उस ज्ञान की सप्तभूमिका है और मुक्त इन सप्तभूमिकाओं के परे हैं वे विदेहमुक्त हैं वे ये हैं- १ शुभेच्छा, २ विचारना, ३ तनुमानसा, ४ सत्त्वापत्ति, ५ असंसक्ति, ६ पदार्थाभावनी और ७ तुरीया । इनके सार को प्राप्त हुआ फिर शोक नहीं करता । अब इसका अर्थ सुनो । जिसको यह विचार फुर आवे कि मैं महामूढ़ हूँ, मेरी बुद्धि सत्य में नहीं है संसार की ओर लगी है और ऐसे विचार के वैराग्यपूर्ण सतशास्त्र और सन्तजनों की सङ्गति की इच्छा करे तो इसका नाम शुभेच्छा है । सतशास्त्रों को विचारना सन्तों की सङ्गति, विषयों से वैराग्य और सत्य-मार्ग का अभ्यास करना, इनके सहित सत्याचार में प्रवर्त्तना और सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानकर त्याग करना इसका नाम विचारना है । विचार और शुभेच्छा सहित तत्त्व का अभ्यास करना और इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य करना यह तीसरी भूमिका तनुमानसा है । इन तीन भूमिकाओं का अभ्यास करना, इन्द्रियों के विषय और जगत् से वैराग करना और श्रवण, मनन और निदिध्यासन से सत्य आत्मा में स्थित होने का नाम सत्त्वापत्ति है । इससे सत्य आत्मा का अभ्यास होता है । ये चार भूमिका संयम का फल जो शुद्ध विभूति है उसमें असंसक्त रहने का नाम असंसक्ति है । दृश्य का विस्मरण और भीतर से बाहर नाना प्रकार के पदार्थों के तुच्छ भासने का नाम पदार्थाभावनी है, यह छठी भूमिका है । हे रामचन्द्र ! चिरपर्यन्त छठी भूमिका के अभ्यास से भेद कलना का अभाव हो जाता है और स्वरूप में दृढ़ परिणाम होता है । छः भूमिका जहाँ एकता को प्राप्त हों उसका नाम तुरीया है । यह जीवन्मुक्त की अवस्था है । जीवन्मुक्त तुरीयापद में स्थित है । तीन भूमिका जगत् की जाग्रत् अवस्था में हैं, चौथी तत्त्वज्ञानी की है; पाँचवीं और छठी जीवन्मुक्त की अवस्था हैं और तुरीयातीतपद में विदेहमुक्त स्थित होता है । हे रामचन्द्र ! जो पुरुष महाभाग्यवान् है वह सप्तम भूमिका में स्थित होता है और वही आत्मारामी महापुरुष परमपद को प्राप्त होता है । हे रामचन्द्र ! जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं वे सुख-दुःख में मग्न नहीं होते और शान्तरूप होके अपने प्रकृत आचार को करते हैं, अथवा नहीं करते
उत्पत्ति प्रकरण । ३८६
तो भी उनको कुछ बन्धन नहीं, उनको किया का बोध कुछ नहीं रहता । जैसे सुषुप्त पुरुष के निकट जाके कोई किया करे तो उसे कुछ बोध नहीं होता तैसे ही उसको भी किया का बोध नहीं होता, वह तो सुषुप्तवत् उन्मीलितलोचन है । हे रामचन्द्र ! जैसे सुषुप्त पुरुष को रूप, इन्द्रिय और उनका अभाव हो जाता है तैसे ही सप्तभूमिका में अभाव हो जाता है । यह ज्ञान की सप्तभूमिका ज्ञानवान् का विषय है, पशु, वृक्ष, म्लेच्छ, मूर्ख और पापाचारियों के चित्त में इनका अधिकार नहीं होता । जिसका मन निर्मल है उसको इन भूमिकाओं में अधिकार है, कदाचित् पशु, म्लेच्छ आदि को भी इनका अभ्यास हो तो वह भी मुक्त हो जाता है, इसमें कुछ संशय नहीं । हे रामचन्द्र ! आत्मज्ञान से जिनके हृदय की गाँठ टूट गयी है उनको संसार मृगतृष्णा के जलवत् मिथ्या भासता है और वे मुक्तरूप हैं और जो संसार से विरक्त होकर इन भूमिकाओं में आये हैं और मोहरूपी समुद्र से नहीं तरे और पूर्ण पद को भी नहीं प्राप्त हुए और सप्तभूमिका में से किसी भूमिका में लगे हैं वे भी आत्मपद को पाकर पूर्ण आत्मा होंगे । हे रामचन्द्र ! कोई तो सप्तभूमिकाओं को प्राप्त हुए हैं, कोई पहली ही भूमिका में, कोई दूसरी और कोई तीसरी को प्राप्त हुए हैं । कोई चौथी को, कोई पाँचवीं को, कोई वन में हैं, कोई अर्द्ध भूमिका को ही प्राप्त हुए हैं । कोई गृह में हैं, कोई वन में हैं, कोई तपसी हैं और कोई अतीत हैं । इससे आदि लेकर वे पुरुष धन्य और बड़े शूरमा हैं कि जिन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रु को जीता है । जिस पुरुष ने एक भूमिका को भी जीता है सो वन्दना करने योग्य है, उसको चक्रवर्ती राजा जानना, बल्कि उसके सामने राज्य और बड़ा ऐश्वर्य विभूति भी तृणवत् है । वह परमपद को प्राप्त होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे ज्ञान भूमिकोपदेशो नाम त्रिनवतितमस्सर्गः ॥ ६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे सोने में भूषण फुरे और अपना सुवर्णभाव भूल के कहे में भूषण हूँ तैसे ही चित्तसंवेदन जिस स्वरूप से फुरा है उससे भूलकर अहंवेदना हुई उसने अहंकार रूप धरा है
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कि मैं हूँ। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! सोने में भूषण होते हैं वे मैं जानता हूँ, परन्तु आत्मा में अहंभाव कैसे होता वह कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र! अहंकार आदिकों का होना असत्यरूप आगमापायी है। इसका कुछ भिन्न रूप नहीं है, यह आत्मा का चमत्कार है-वास्तव में द्वैत कुछ नहीं। जैसे समुद्र में अधः ऊर्ध्व जल ही जल है और कुछ नहीं, तैसे ही परमतत्त्व में और विभागकल्पना कोई नहीं-शान्तरूप है। जैसे समुद्र में द्रवता से तरंग आदिक भासते हैं तैसे ही संवेदन से जगतभ्रम भासते हैं। आत्मा में नाना प्रकार का भ्रम भासता है परन्तु और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण में भूषण, जल में तरंग और वायु में स्पन्द भासते हैं तैसे ही आत्मा में जगत भासता है। फुरने से रहित शान्तरूप केवल परमपद है। हे रामजी! जैसे मृत्तिका की सेना में जो हाथी, घोड़ा, पशु होते हैं वे सब मृतिकारूप हैं कुछ भिन्न नहीं तैसे ही सब जगत आत्मरूप है, भ्रम से नानात्व भासता है, वास्तव में आत्मा ही पूर्ण आप में स्थित है जैसे आकाश में आकाश स्थित है तैसे ब्रह्म में ब्रह्म स्थित है और सत्य में सत्य स्थित है। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है तैसे ही आत्मा में जगत् है। जैसे स्वप्न में दूर पदार्थ निकट भासते हैं और निकट दूर भासते हैं सो भ्रममात्र है तैसे ही आत्मा में विपर्ययदृष्टि से जगत् भासता है। हे रामजी! असत्य जगत् भ्रम से सत्यरूप भासता है, वास्तव में असत्यरूप है जैसे दर्पण में नगर का प्रतिबिम्ब, जैसे मृगतृष्णा का जल और आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही यह जगत् आत्मा में भासता है जैसे इन्द्रजाल के योग से आकाश में नगर भासता है तैसे ही यह असत्यरूप जगत् अज्ञान से सत्य भासता है। जब तक आत्मविचार-रूपी अग्नि से अविद्यारूपी बेलि को तू न जलावेगा तब तक जगतरूपी बेलि निवृत्त न होगी, बल्कि अनेक प्रकार के सुख दुःख दिखावेगी। जब तू विचार करके मूलसहित इसको जलावेगा तब शान्तपद को प्राप्त होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे युक्त्युपदेशोनाम चतुर्णवतितमस्सर्गः ॥ ६४ ॥
उत्पत्ति प्रकरण । ३६१
वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र ! जैसे सुवर्ण में भूषण मिथ्यारूप हैं तैसे ही आत्मा में 'अहं' 'त्वं' आदिक अविद्यारूप हैं । लवण की कथा जो तुमने सुनी है उसे अब फिर सुनो। लवण राजा दूसरे दिन विचार करने लगा कि यह मुझको भ्रम सा भासा है परन्तु सत्यरूप होकर देखा है। देश, नगर, मनुष्यादिक पदार्थ मुझको प्रत्यक्ष दृष्टि आए हैं इससे अब तो वहाँ जाकर देखूँ कि कैसी बात है। ऐसे विचार से दिग्विजय का मन करके मन्त्री और सेना को साथ लेकर दक्षिण दिशा की ओर चला। देशों को लाँघता लाँघता विन्ध्याचल पर्वत में पहुँचा और पूर्व और दक्षिण के समुद्र के मध्य में मार्ग में भ्रमता भ्रमता किरात देश में जा पहुँचा जो वृत्तांत और देश ग्राम आदिक भ्रम में देखे थे सो प्रत्यक्ष देखे और अति विस्मित हो विचार करने लगा कि हे देव ! यह क्या है? जो कुछ मैंने भ्रम से देखा था वह अब भी मुझको प्रत्यक्ष भासता है। यह बड़ा आश्चर्य है। ऐसे विचार के आगे गया तो क्या देखा कि अग्नि से वृक्ष जले हैं और अकाल पड़ा है। अपने सम्बन्धियों की चेष्टा के स्थान देखे और उनकी कथा सुनी। इस प्रकार देखते-देखते आगे गया तो क्या देखा कि चाण्डाल शरीर की सासु बैठी रुदन करती है कि हे देव ! मेरा पुत्र कहाँ गया । हे पुत्र ! तुम कहाँ गये, जिनका चन्द्रमा की नाईं मुख था ? मेरी मृगनयनी कन्या जीर्ण देह हो गई है—और पौत्र, पौत्रियाँ दुर्भिक्षता से सब जाते रहे। उनके यह खाने के पदार्थ हैं और ये चेष्टा के स्थान हैं। जो रतिका की माला कण्ठ में डाले जीवों के मांस खाते और रुधिर पान करते थे वह कहाँ गये ? इसी प्रकार पुत्र, पुत्री, भर्त्ता, दामाद आदि का नाम लेकर वह रुदन करती थी और लोग जो आ बैठते थे वह भी रुदन करते थे। तब राजा उनका रोना बन्द कराके वृत्तान्त पूछने लगा कि तू किस निमित्त रुदन करती है ? किससे तेरा वियोग हुआ है ?
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चाण्डालीशोचनवर्णनन्नाम पञ्चनवतितमस्सर्गः ॥ ९५ ॥
३६२ | योगवाशिष्ठ ।
चाण्डाली बोली, हे राजन् ! एक समय वर्षा न होने से अकाल पड़ा और सब जीवों को बड़ा दुःख हुआ। उस समय मेरे पुत्र, पौत्र, पौत्रियाँ, जामाता, भर्त्ता आदिक बांधव यहाँ से निकल गये और कहीं कष्ट पाके मर गये। उनके वियोग से मैं दुःखी होकर रुदन करती हूँ और उनके बिना मैं शून्य हो गई हूँ। जैसे बिछुरी हुई हथिनी अकुलाती है तैसे ही मैं अकुलाती हूँ। हे रामचन्द्र ! जब इस प्रकार चाण्डाली ने कहा तब राजा अति विस्मित हुआ और मन्त्री के मुख की ओर ऐसे देखने लगा जैसे कागज पर पुतली होती है। निदान राजा विचारे और आश्चर्यवान् हो, उस चाण्डाली से बारम्बार पूछे और वह फिर कहे और राजा आश्चर्य-वान् होवे। तब राजा उसको यथायोग्य धन देकर चिरपर्यन्त वहाँ रहा और फिर अपने राजमन्दिर में आया जब प्रातःकाल हुआ तब सभा में आकर मुझसे पूछने लगा हे मुनीश्वर ! यह स्वप्ना मुझको प्रत्यक्ष कैसे हुआ ? इसको देखकर मैं आश्चर्यवान् हुआ हूँ। तब मैंने प्रश्नानुसार उसको युक्ति से उत्तर दिया और उसके चित्त का संशय ऐसे दूर कर दिया जैसे मेघ को वायु दूर करे, वही तुमसे कहता हूँ। हे रामजी ! अविद्या ऐसी है कि असत्य को शीघ्र ही सत्य और सत्य को असत्य कर दिखाती है और बड़ा भ्रम दिखानेवाली है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! स्वप्ना कैसे सत्य हुआ, यह मेरे चित्त में बड़ा संशय स्थित हुआ है उसको दूर कीजिये। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इसमें क्या आश्चर्य है ? अविद्या से सब कुछ बनता है। स्वप्न में तुम प्रत्यक्ष देखते हो कि घट से पट और पट से घट हो जाता है। स्वप्न और मृत्यु में मूर्च्छा के अनन्तर बुद्धि विपर्यय हो जाती है। जिनका चित्त वासना से वेष्टित है उनको जैसा संवेदन फुरता है तैसे ही भासता है। हे रामजी ! जिनका चित्त स्वरूप से गिरा है उनको अविद्या अनेक भ्रम दिखाती है। जैसे मद्यपान और विष पीनेवाला भ्रम को प्राप्त होता है वैसे ही अविद्या से जीव भ्रम को प्राप्त होता है। एक और राजा था उसकी भी वही व्यवस्था हुई थी जो लवण राजा के चित्त में फुर आई थी। जैसे उसकी चेष्टा हुई थी तैसे ही इसको भी फुर आई तब उसने जाना कि मैंने यह क्रिया की है। जैसे अभोक्ता पुरुष आपको स्वप्न में
उत्पत्ति प्रकरण । <span style="float:right">३६३</span>
भोक्ता देखता है कि मैं राजा हुआ हूँ, में तृण हूँ, अथवा भूखा सोया हूँ, और यह क्रिया मैंने करी है तैसे ही लवण को फुर आया था सो प्रतिभा (भान) है सभा में बैठे चाण्डाल की चेष्टा लवण को फुर आई अथवा विन्ध्याचल पर्वत के चाण्डालों की प्रतिभा लवण को फुरी सो लवण को वह भ्रम दृढ़ हो गया । एक ही सदृश भ्रम अनेकों को फुर आता है और स्वप्न भी सदृश होता है जैसे एक ही रस्सी में अनेकों को सर्प भासता है इसी प्रकार अनेक जीवों को एक भ्रम अनेकरूप ही भासता है। हे रामजी ! जितने पदार्थ भासते हैं उनकी सत्ता में संवेदन हुआ है । जैसे उनमें संकल्प दृढ़ होता है तैसे ही होकर भासता है । जो पदार्थ सत्यरूप हो भासता है वह सत्य होता है और जो असत्यरूप हो भासता है वह असत्य हो जाता है । सब ही पदार्थ संवेदनरूप हैं और तीनों काल भी संवेदन में उपजे हैं । इनका बीज संवेदन है । सब पदार्थ अविद्यारूप हैं और जैसे रेत में तेल है तैसे ही आत्मा में अविद्या है । आत्मा से अविद्या का सम्बन्ध कदाचित् नहीं क्योंकि सम्बन्ध समरूप का होता है । जैसे काष्ठ और लाख का सम्बन्ध होता है सो आकार सहित है और जो आकार से रहित है उसका सम्बन्ध कैसे हो ? जैसे प्रकाश और तम का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही चेतन से चेतन का सम्बन्ध होता है और विजातीय का सम्बन्ध नहीं, इससे अविद्यारूप देह की आत्मा से सम्बन्ध नहीं। जो जड़ से आत्मा का सम्बन्ध हो तो आत्मा जड़ हो, पर आत्मा तो सदा चेतनरूप है और सर्वदा अनुभव से प्रकाशता है, उसको जड़ कैसे कहिये ? जैसे स्वाद को जिह्वा ग्रहण करती है और अङ्ग नहीं करते तैसे ही चेतन से चेतन की, जड़ से जड़ की, जल से जल की, माटी से माटी की, अग्नि से अग्नि की, प्रकाश से प्रकाश की, तम से तम की, इसी प्रकार सब पदार्थों की सजातीय पदार्थों से एकता होती है, विजातीय से नहीं होती । इससे सब चैतन्याकाश है और पाषाणादिक दृश्यवर्ग कोई नहीं भ्रम से इनके भूषण भासते हैं । जैसे सुवर्ण बुद्धि को त्यागकर नाना प्रकार के भूषण भासते हैं तैसे ही जब अहंवेदना आत्मा में फुरती है तब अनेकरूप होकर विश्व भासता है जैसे सुवर्ण
३६४ योगवाशिष्ठ ।
की ओर देखिये तब सब भूषण स्वर्णरूप भासते हैं तैसे ही जब ब्रह्मसत्ता की ओर देखिये तब सब जगत् ब्रह्मरूप ही भासता है । जैसे मृत्तिका की सेना बालकों को अनेकरूप भासती है और बुद्धिमान् को एक मृत्तिका रूप है तैसे ही अज्ञानी को यह जगतरूप नानारूप भासता है, ज्ञानवान् को एक ब्रह्मसत्ता ही भासती है । वह कौन ब्रह्म है जिसमें द्रष्टा, दर्शन, दृश्य फुरे हैं ? इनके मध्य ओर इनसे रहित जो सत्ता है वह ब्रह्मसत्ता है । हे रामचन्द्र ! जो सत्ता चैतन्यरूप और शिला के कोशवत् निर्विकल्प तन्मय रूप है उसमें जब स्थित हो और समाधि में रहो अथवा उत्थान हो तब तुमको सब वही रूप भासेगा । हे रामचन्द्र ! जो पुरुष निर्मल सत्ता में स्थित भया है वह शरीर के इष्ट में हर्षवान् नहीं होता और अनिष्ट में शोकवान् नहीं होता, वह निर्मल रूप होकर स्थित होता है । जैसे भविष्यत् नगर में जो अनेक चिन्तायुक्त जीव बसते हैं वह सब उसके चित्त में स्थित होते हैं । जैसे पुरुष को देशान्तर जाते अनेक पदार्थ मार्ग में इष्ट अनिष्टरूप भासते हैं परन्तु जहाँ जाना है उसकी ओर वृत्ति रहती है, मार्ग के पदार्थों में उसको राग-द्वेष नहीं होता, तैसे ही तुम हो जाओ । जैसे पत्थर से जल और जल से अग्नि नहीं निकलती, तैसे ही आत्मा में चित्त नहीं, अविचार भ्रम से चित्त जानता है, विचार से नहीं पाता । जैसे भ्रम से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही आत्मा में चित्त भासता है, वास्तव में कुछ नहीं । वह सत्ता नित्य, शुद्ध, परमानन्दरूप अपने आपमें स्थित है और अनुभवरूप है, उसके विस्मरण करने से दुःख प्राप्त होता है जैसे अमृतरूपी चन्द्रमा में अग्नि प्राप्त होती है । इससे हे रामचन्द्र ! तुम सावधान हो । यह जो फुरना उठता है इसी का नाम चित्त है और चित्त कोई नहीं । इस चित्त को दूर से त्याग करो जो तुम हो वही स्थित हो । हे रामचन्द्र ! असतरूप चित्त ही संसार है, जो उसको असत्य जानके त्याग नहीं करता वह आकाश के वन में विचरता है, उसको धिक्कार है। जिसका मनन भाव नष्ट हुआ है वह महापुरुष संसार से पार होकर परमपद निश्चितरूप में प्राप्त हुआ है । इति श्रीयो० उत्पत्ति० चित्ताभावप्रतिपादनन्नामपञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६६॥
उत्पत्ति प्रकरण ।
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वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मनुष्य जिस प्रकार भूमिका को प्राप्त होता है उसका क्रम सुनो । प्रथम जन्म से पुरुष को कुछ बोध होता है और फिर क्रम से बड़ा होकर सन्तों की संगति करता है । सदा सदृश-रूप जो संसार का प्रवाह है उसके तरने को सत् शास्त्र और सन्तजनों की संगति बिना समर्थ नहीं होता । जब सन्तों का सङ्ग और सत्शास्त्रों का विचार करने लगता है तब उसको ग्रहण और त्याग की बुद्धि उपजती है कि यह कर्त्तव्य है और यह त्यागने योग्य है । इसका नाम शुभेच्छा है । जब यह इच्छा हुई तब शास्त्र द्वारा यह विचार उपजता है कि यह शुभ है और यह अशुभ है शुभ का ग्रहण करना और अशुभ का त्याग करना और यथाशास्त्र विचारना इसका नाम विचार है । जब सम्यक् विचार दृढ होता है तब मिथ्यारूप संसार की वासना त्यागता है और सत्य में स्थित होता है—इसका नाम तनुमानसा है । जब संसार की वासना क्षीण होती है और सत्य का दृढ़ अभ्यास होता है तब उस वैराग्य और अभ्यास से सम्यक् ज्ञान उपजता और आत्मा का साक्षात्कार होता है—उसका नाम सत्त्वापत्ति है । मन से वासना नष्ट होके सिद्धि आदिक पदार्थ प्राप्त होते हैं, इनकी प्राप्ति में भी संसक्त नहीं होता, स्वरूप में सदा सावधान रहता है । सिद्धि आदिक पदार्थ प्रारब्ध मे प्राप्त होते हैं उनको स्वप्नरूप जान कर्मों के फल में बन्धवान् नहीं होता—इसका नाम असंसक्त है इसके अनन्तर जब मन की तनुता हो गई है और स्वरूप की ओर चित्त का परिणाम हुआ तब दृढ़ परिणाम से व्यवहार का भी अभाव हो जाता है जो पल पल में कर्म प्रारब्धवेग से करता है, बल्कि उसके चित्त में फुरना भी नहीं फुरता और वह मन क्षीणभाव में प्राप्त होता है । वह कर्त्ता हुआ भी कुछ नहीं करता और देखता है पर नहीं देखता अर्द्धसुषुप्तिवत् होता है, उसे कर्त्तव्य की भावना नहीं फुरती और मन भी नहीं फुरता—इसका नाम पदार्था भावनी योग भूमिका है । इसमें चित्त लीन हो जाता है । इस अवस्था में जब स्वाभाविक चित्त का कुछ काल इस अभ्यास में व्यतीत होता है और भीतर से सब पदार्थों का अभाव दृढ़ हो जाता है तब तुरीयारूप होता है और जीवन्मुक्त कहलाता है ।