भारतकोश
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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ
४६योगवासिष्ठ ।

अङ्गीकार नहीं करता । जैसे दुःख का अनुभव बालक को होता है वह हमारे स्वप्ने में भी नहीं आया । यह बाल्यावस्था अवगुण का भूषण है और अवगुण से शोभित है । ऐसी नीच अवस्था को में अङ्गीकार नहीं करता । इसमें गुण कोई भी नहीं है ।

इति श्रीयोगवासिष्ठेवैराग्यप्रकरणे बाल्यावस्थावर्णनन्नामचतुर्दशस्सर्गः॥१४॥

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! दुःखरूप बाल्यावस्था के अनन्तर युवावस्था आती है सो नीचे से ऊंचे चढ़ती है । वह भी उत्तम नहीं अधिक दुःखदायक है । जब युवावस्था आती है तब कामरूपी पिशाच आ लगता है । वह कामरूपी पिशाच युवावस्थारूपी गढ़े में आ स्थित होता है, चित्त को फिराता है और इच्छा पसारता है । जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी कमल खिल आता है और पंखुरियों को पसारता है वैसे ही युवावस्थारूपी सूर्य उदय होकर चित्तरूपी कमल और इच्छारूपी पंखुरी को पसारता है । फिर जैसे किसी को अग्नि के कुंड में डाल दिया हो और वह दुःख पावे वैसे ही काम के वश हुआ दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! जो कुछ विकार हैं सो सब युवावस्था में प्राप्त होते हैं । जैसे धनवान को देखके सब निर्धन धन की आशा करते हैं वैसे ही युवावस्था देखकर सब दोष इकट्ठे होते हैं जो भोग को सुखरूप जानकर भोग की इच्छा करता है वह परम दुःख का कारण है । जैसे मद्य का घट भरा हुआ देखने मात्र सुन्दर लगता है परन्तु जब उसको पान करे तब उन्मत्त होकर दीन हो जाता है और निगड़र पाता है वैसे ही भोग देखने मात्र सुन्दर भासते हैं, परन्तु जब इनको भोगता है तब तृष्णा में उन्मत्त और पराधीन हो जाता है । हे मुनीश्वर ! यह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहङ्कार आदि सब चोर युवारूपी रात्रि को देखकर लूटने लगते हैं और आत्माज्ञानरूपी धन को ले जाते हैं । इससे जीव दीन होता है । आत्मानन्द के वियोग में ही जीव दीन हुआ है । हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःख देनेवाली युवावस्था को मैं अङ्गीकार नहीं करता । शान्ति चित्त को स्थिर करने के लिये है पर युवावस्था में चित्त विषय की ओर धावता है जैसे बाण लक्ष्य की ओर जाता है । तब उसको विषय का संयोग

वैराग्य प्रकरण । ४७

होता है और विषय की तृष्णा निवृत्त नहीं होती और तृष्णा के मारे जन्म से जन्मान्तर में दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःख-दायक युवावस्था की मुझको इच्छा नहीं है । हे मुनीश्वर ! जैसे प्रलय-काल में सब दुःख आकर स्थिर होते हैं वैसे ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहङ्कार, चपलता इत्यादिक सब दोष युवावस्था में आ स्थिर होते हैं जो सब बिजली की चमक से हैं; होके मिट जाते हैं । जैसे समुद्र तरङ्ग होकर मिट जाते हैं वैसे ही यह क्षणभङ्गुर है और वैसे ही युवावस्था होकर मिट जाती है । जैसे स्वप्न में कोई स्त्री विकार से छल जाती है वैसे ही अज्ञान से युवावस्था छल जाती है । हे मुनीश्वर ! युवावस्था जीव की परम शत्रु है । जो पुरुष इस शत्रु के शस्त्र से बचे हैं वही धन्य हैं । इसके शस्त्र काम और क्रोध हैं जो इनसे छूटा वह वज्र के प्रहार से भी न छेदा जायेगा और जो इनसे बँधा हुआ है वह पशु है । हे मुनीश्वर ! युवा-वस्था देखने में तो सुन्दर परन्तु भीतर से तृष्णा से जर्जरीभूत है । जैसे वृक्ष देखने में तो सुन्दर हो परन्तु भीतर से घुन लगा हुआ हो वैसे ही युवावस्था है जो भोगों के निमित्त यत्न करती है वे भोग आपात रमणीय हैं । कारण यह कि जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है तब तक अविचार से भला लगता है और जब वियोग होता है तब दुःख होता है । इसलिये भोग करके मूर्ख प्रसन्न और उन्मत्त होते हैं उनको शान्ति नहीं होती । भीतर सदा तृष्णा रहती है और स्त्री में चित्त की आसक्ति रहती है । जब इष्ट वनिता का वियोग होता है तब उसको स्मरण करके जलता है जैसे वन का वृक्ष अग्नि से जलता है वैसे ही युवावस्था में इष्ट के वियोग से जीव जलता है। जैसे उन्मत्त हस्ती जंजीर से बँधता तो स्थिर होता है कहीं जा नहीं सकता वैसे ही कामरूपी हस्ती को जंजीररूपी युवावस्था बन्धन करती है । युवावस्थारूपी नदी है उसमें इच्छारूपी तरंग उठते हैं वे कदाचित् शान्ति नहीं पाते । हे मुनीश्वर ! यह युवावस्था बड़ी दुष्ट है । बड़े बुद्धिमान, निर्मल और प्रसन्न पुरुष की बुद्धि को भी मलिन कर डालती है । जैसे निर्मल जल की बड़ी नदी वर्षाकाल में मलिन हो जाती है वैसे ही युवावस्था में बुद्धिमलिन हो जाती है । हे मुनी

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श्वर ! शरीररूपी वृक्ष है उसमें युवावस्थारूपी बेलि प्रकट होती है सो पुष्ट होती जाती है तब चित्तरूपी भँवरा आ बैठता है और तृष्णारूपी उसकी सुगन्ध से उन्मत्त होता है, सब विचार भूल जाता है। जैसे जब प्रबल पवन चलता है तब सूखे पत्तों को उड़ा ले जाता है वैसे ही युवावस्था वैराग्य सन्तोषादिक गुणों का अभाव करती है। दुःखरूपी कमल का युवावस्थारूपी सूर्य है, इसके उदय से सब दुःख प्रफुल्लित हो आते हैं। इससे सब दुःखों का मूल युवावस्था है। जैसे सूर्य के उदय से सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं वैसे ही चित्तरूपी कमल संसाररूपी पंखुड़ी और सत्यता-रूपी सुगन्ध से खिल आता है और तृष्णारूपी भँवरा उस पर आ बैठता और विषय की सुगन्ध लेता है। हे मुनीश्वर ! संसाररूपी रात्रि है उसमें युवावस्थारूपी तारागण प्रकाशते हैं अर्थात् शरीर युवावस्था से सुशो-भित होता है। जैसे धान के छोटे वृक्ष हरे तब तक रहते हैं जब तक उसमें फल नहीं आता। जब फल आता है तब वृक्ष सूखने लगते हैं और अन्न परिपक्व होता है वृक्ष की हरियाली नहीं रह सकती वैसे ही जब तक जवानी नहीं आती तब तक शरीर सुन्दर कोमल रहता है जब जवानी आती है तब शरीर क्रूर हो जाता है और फिर परिपक्व होकर जीर्ण और वृद्ध होता है। इससे हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःख की मूलरूप युवा-वस्था की मुझको इच्छा नहीं। जैसे समुद्र बड़े जल से तरंगों को भगा-गता और उछालता है तो भी मर्यादा नहीं त्यागता, क्योंकि ईश्वर की आज्ञा मर्यादा में रहने की है और युवावस्था तो ऐसी है कि शास्त्र और लोक की मर्यादा मेट के चलती है और उसको अपना विचार नहीं रहता। जैसे अन्धकार में पदार्थ का ज्ञान नहीं होता वैसे ही युवावस्था में शुभा-शुभ का विचार नहीं होता। जिसको विचार नहीं रहा उसको शान्ति कहाँ से हो; वह सदा व्याधि और ताप में जलता रहता है। जैसे जल के बिना मत्स्य को शान्ति नहीं होती वैसे ही विचार के बिना पुरुष सदा जलता रहता है। जब युवावस्थारूप रात्रि आती है तब काम पिशाच आके गर्जता है और यहाँ सङ्कल्प उठते हैं कि कोई कामी पुरुष आवे तो उसके साथ में यहाँ चर्चा करूँ कि हे मित्र ! वह स्त्री कैसी सुन्दर है और उसके कैसे

वैराग्य प्रकरण । ४६

कटाक्ष है । वह किस प्रकार मुझको प्राप्त हो ? हे मुनीश्वर ! इस इच्छा में वह सदा जलता ही रहता है । जैसे मरुस्थल की नदी को देख मृग दौड़ता है और जल की अप्राप्ति से जलता है वैसे ही कामी पुरुष विषय की वासना में जलता है और शान्ति नहीं पाता । हे मुनीश्वर ! मनुष्य जन्म उत्तम है परन्तु जिनके अभाग्य हैं उनको विषय से आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती । जैसे किसी को चिन्तामणि प्राप्त हो और वह उसका निरादर करे उसका गुण न जानकर डाल दे वैसे ही जिस पुरुष ने मनुष्यशरीर पाकर आत्मपद नहीं पाया वह बड़ा अभागी है और मूर्खता से अपने जन्म को व्यर्थ खो डालता है वह युवावस्था में परम दुःख का क्षेत्र अपने निमित्त बोता है और मान, मोह, मद इत्यादि विकारों में पुरुषार्थ का नाश करता है । हे मुनीश्वर ! युवावस्था ऐसे बड़े विकारों को प्राप्त करती है । जैसे नदी वायु से अनेक तरङ्ग पसारती है वैसे ही युवावस्था चित्त के अनेक कामों को उठाती है । जैसे पक्षी पंख से बहुत उड़ता है और जैसे सिंह भुजा के बल से पशु को मारने दौड़ता है वैसे ही चित्त युवावस्था में विक्षेप की ओर धावता है । हे मुनीश्वर ! समुद्र का तरना कठिन है क्योंकि उसमें जल अथाह है उसका विस्तार भी बड़ा है और उसमें कच्छ मच्छ मगर भी बड़े बड़े जीव रहते हैं पर मैं उसका तरना भी सुगम मानता हूँ परन्तु युवावस्था का तरना महाकठिन है अर्थात् युवावस्था में निर्दोष रहना कठिन है । ऐसी संकटवाली युवावस्था में जो चलायमान नहीं होते सो पुरुष धन्य हैं और वन्दना करने योग्य हैं । हे मुनीश्वर ! यह युवावस्था चित्त को मलीन कर डालती है । जैसे जल की बावली के निकट राख और काँटे हों और पवन चलने से सब आ बावली में गिरें वैसे ही पवनरूपी युवावस्था दोषरूपी धूल और काँटों को चित्तरूपी बावली में डाल के मलीन कर देती है । ऐसे अवगुणों से पूर्ण युवावस्था की इच्छा मुझको नहीं है । युवावस्था मुझ पर यही कृपा कर कि तेरा दर्शन न हो । तेरा आना मैं दुःख का कारण मानता हूँ । जैसे पुत्र के मरण का संकट पिता नहीं सह सकता और सुख का निमित्त नहीं देखता वैसे ही तेरा आना मैं सुख का निमित्त नहीं देखता । इससे मुझपर

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दया कर कि अपना दर्शन न दे। हे मुनीश्वर ! युवावस्था का तरना महा कठिन है। यौवनवान् नम्रतासंयुक्त नहीं होने और शास्त्र के गुण वैराग्य विचार संतोष और शान्ति इनमें भी सम्पन्न नहीं हैं। जैसे आकाश में वन होना आश्चर्य है वैसे ही युवावस्था में वैराग्य, विचार, शान्ति और संतोष होना भी बड़ा आश्चर्य है। इससे आप मुझसे वही उपाय कहिये जिससे युवावस्था के दुःख से मुक्त होकर आत्मपद की प्राप्ति हो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे युवागारुडी वर्णनन्नामपञ्चदशस्सर्गः ॥१५॥

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! जिस कामविलास के निमित्त पुरुष स्त्री की वाञ्छा करता है वह स्त्री अस्थि, मांम, रुधिर, मूत्र, विष्ठा से पूर्ण है और इन्हीं की पुतली बनी हुई है। जैसे यन्त्री की बनी पुतली तागे के द्वारा अनेक चेष्टा करती है वैसे ही यह अस्थि, मांसादिक की पुतली में कुछ और नहीं है। जो विचार से नहीं देखता उसको रमणीय दीखती है। जैसे पर्वत के शिखर दूर से सुन्दर और गड्डु माला सहित भासते हैं और निकट से असार हैं—पत्थर ही पत्थर दीखते हैं वैसे ही स्त्री वस्त्र और भूषणों से सुन्दर भासती है। जो अंग को भिन्न भिन्न विचारकर देखो तो सार कुछ नहीं। जैसे नागिन के अंग बहुत कोमल होते हैं परन्तु उसका स्पर्श करे तो काट के मार डालती है वैसे ही जो कोई स्त्री का स्पर्श करते हैं उनको वह नाश कर डालती है। जैसे विष की बेलि देखने मात्र सुन्दर लगती है परन्तु स्पर्श करने से मार डालती है और जैसे हाथी को जंजीर से बाँधे तो जिस द्वार पे रहता है। वहीं स्थिर रहता है वैसे ही अज्ञानी का चित्तरूपी हाथी काम रूपी जंजीर से बँधा हुआ स्त्रीरूपी एक स्थान में स्थिर रहता है वहाँ से कहीं जा नहीं सकता। जब हाथी को महावत अंकुश का प्रहार करता है तब वह बन्धन को तोड़ के निकल जाता है वैसे ही इस चित्तरूपी मूर्ख हाथी को जब महावतरूपी गुरु उपदेशरूपी अंकुश का बारंबार प्रहार करता है तब निर्बन्ध होता है। हे मुनीश्वर । कामी पुरुष स्त्री की वाञ्छा अपने नाश के निमित्त करता है। जैसे कदली वन का हाथी कागद की हथिनी देखकर और छल पाके बन्धन में आता है और उससे परम दुःख पाता है वैसे ही सब दुःखों का मूल

वैराग्य प्रकरण । ५१

स्त्री का संग है। हे मुनीश्वर ! जैसे वन के दाह की अग्नि वन को जलाती है वैसे ही स्त्रीरूपी अग्नि उससे भी अधिक है, क्योंकि वह अग्नि तो स्पर्श करने में ही जलाती है परन्तु स्त्रीरूपी अग्नि स्मरणमात्र से जलाती है । जो सुख रमणीय दीखता है वह आपात-रमणीय है, जब स्त्रीसुख का वियोग होता है तब मुरदे की नाईं हो जाता है । हे मुनीश्वर ! यह तो अस्थि, मांस और रुधिर का पिंजरा है सो अग्नि में भस्म हो जायगा अथवा पशु पक्षी के खाने का आहार होगा और प्राण आकाश में लीन हो जावेंगे । इससे इस स्त्री की इच्छा करनी मूर्खता है । जैसे अग्नि की ज्वाला के ऊपर श्यामता होती है वैसे स्त्री के शीश के ऊपर श्याम केश हैं और जैसे अग्नि के स्पर्श करने से जलता है वैसे ही स्त्री के स्पर्श करने से पुरुष जलता है, इससे जलना दोनों में तुल्य है । हे मुनीश्वर ! युवावस्था को नष्ट करने वाली स्त्रीरूपी अग्नि है । जो स्त्री की इच्छा करते हैं वह महामूर्ख और अज्ञानी हैं । वह स्त्री इच्छा अपने नाश के निमित्त करते हैं । जैसे पतङ्ग अपने नाश के निमित्त दीपक की इच्छा करता है वैसे ही कामी पुरुष अपने नाश के निमित्त स्त्री की इच्छा करता है । हे मुनीश्वर ! स्त्रीरूपी विष की बेलि है हाथ पाँव के अग्रभाग उसके पत्र हैं, भुजा डाली हैं, स्तनरूप गुच्छे हैं और नेत्र आदिक इन्द्रियाँ फूल हैं उस पर कामी पुरुषरूपी भँवरे आ बैठते हैं । कामरूपी धीवर ने स्त्रीरूपी जाल पसारा है उस पर कामी पुरुषरूपी पक्षी आ फँसते हैं । कामरूपी धीवर उनको फँसाकर परम कष्ट देता है । ऐसे दुःख को देने वाली स्त्री की जो वाञ्छा करते हैं महामूर्ख हैं । हे मुनीश्वर ! स्त्रीरूपी सर्पिणी है जब उसका फूत्कार निकलता है तब वैराग्यरूपी कमल जल जाते हैं और जब सर्पिणी डसती है तब विष चढ़ता है । स्त्रीरूपी सर्पिणी का चिन्तन करते ही भीतर में आप ही विष चढ़ जाता है । हे मुनीश्वर ! जैसे व्याध छलकर मछली को फँसाता है वैसे ही कामी पुरुष बली के सदृश सुन्दर स्त्रीरूपी जाल देखके फँसता है और स्नेहरूपी तागे में बन्धन पाकर खिंचा चला जाता है, तब तृष्णारूपी छुरी से काम उसे मार डालता है । हे मुनीश्वर ! ऐसे दुःख के देनेवाली स्त्री की मुझको

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इच्छा नहीं। कामरूपी व्याध ने रागरूपी इन्द्रियों में जाल बिछा कामी पुरुषरूपी मृगों को आसक्त कर डाला है। स्त्री की स्नेहरूपी डोरी है। उसमें कामी पुरुषरूपी बैल बँधा है और स्त्री के मुखरूपी चन्द्रमा को देखकर कामी पुरुषरूपी कमलिनी खिल आती है। जैसे चन्द्रमुखी कमल चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न होते हैं और सूर्यमुखी नहीं होते वैसे ही कामी पुरुष भोग से प्रसन्न होते हैं और ज्ञानवान प्रसन्न नहीं होते। जैसे नेवला सर्प को बिल से निकाल के मारता है वैसे ही कामी पुरुष को स्त्री आत्मानन्द में से निकाल के मार डालती है। पुरुष जब स्त्री के निकट जाता है तब वह उसको भस्म कर डालती है। जैसे सूखे तृण और घृत को अग्नि भस्म कर डालती है वैसे ही कामी पुरुष को स्त्रीरूपी नागिनि भस्म कर डालती है। हे मुनीश्वर ! स्त्रीरूपी रात्रि का स्नेहरूपी अन्धकार है और काम, क्रोधादिक उसमें उलूक और पिशाच हैं। हे मुनीश्वर ! जो स्त्रीरूपी खड्ग के प्रहार से युवारूपी संग्राम में बचा है वह पुरुष धन्य है, उसको मेरा नमस्कार है। स्त्री का संयोग परम दुःख का कारण है, इससे मुझको इसकी इच्छा नहीं। हे मुनीश्वर ! जो रोग होता है उसी के अनुसार जो औषध करता है तो रोग निवृत्त होता है और कुपथ्य से उसका प्रकोप होकर रोग बढ़ जाता है, इससे मेरे रोग के अनुसार औषध करो। मेरा रोग सुनिये कि जरा और मृत्यु मुझको बड़ा रोग है। उसके नाश की औषध मुझको दीजिये। स्त्री आदिक सब भोग तो रोग के वृद्धिकर्त्ता हैं। जैसे अग्नि में घृत डालिये तो बढ़ जाती है वैसे ही भोग से जरा मृत्यु आदि रोग बढ़ते हैं। इससे इस रोग की निवृत्ति की औषधि करो, नहीं तो सबका त्याग कर मैं वन में जा रहूँगा। हे मुनीश्वर ! जिसके स्त्री है उसको भोग की इच्छा भी होती है और जिसके स्त्री नहीं होती उसको स्त्री की इच्छा भी नहीं। जिसने स्त्री का त्याग किया है उसने संसार का भी त्याग किया है और वही सुखी है। संसार का बीज स्त्री है इससे मुझको स्त्री की इच्छा नहीं। मुझको वही औषधि दीजिये जिससे जरा मृत्यु आदि रोग की निवृत्ति हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे दुराशावर्णनन्नामषोडशस्सर्गः ॥ १६ ॥

वैराग्य प्रकरण । ५३

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर ! बालक अवस्था तो महाजड़ और अशक्त है । जब युवावस्था आती है तब बाल्यावस्था का ग्रास कर लेती है और उसके अनन्तर जब वृद्धावस्था आती है शरीर जर्जरीभूत हो जाता है और बुद्धि क्षीण हो जाती है, फिर मृत्यु पाता है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार अज्ञानी का जीना व्यर्थ है, कुछ अर्थ की सिद्धि नहीं । जैसे नदी के तट पर के वृक्ष जल के प्रवाह से जर्जरीभूत हो जाते हैं वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर जर्जरीभूत हो जाता है। जैसे पवन से पत्र उड़ जाते हैं वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर नाश पाता है । जितने कुछ रोग हैं वह सब वृद्धावस्था में आ प्राप्त होते हैं और शरीर कृश हो जाता है। उस समय स्त्री, पुत्रादिक भी सब वृद्ध का त्याग कर देते हैं । जैसे पक्के फल को वृक्ष त्याग देता है वैसे वृद्ध को कुटुम्ब त्याग देता है और जैसे बावले को देख के सब हँसके बोलते हैं कि इसकी बुद्धि जाती रही वैसे ही इसको भी देखके हँसते हैं । जैसे कमल का फूल बर्फ पड़ने से जर्जरीभूत हो जाना है वैसे ही जरा-वस्था में पुरुष जर्जरीभाव को प्राप्त होता है, शरीर कुबड़ा हो जाता है, केश श्वेत हो जाते हैं और शक्ति क्षीण हो जाती है। जैसे चिर काल के बड़े वृक्ष में घुन लगता है वैसे ही इसमें कुछ शक्ति नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! और भी सब कृत्य क्षीण हो जानी है परन्तु एक आसक्तिमात्र रहती है । जैसे बड़े वृक्ष पर उलूक आ रहते हैं वैसे ही इसमें क्रोध शक्ति आ रहती है और सब शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। हे मुनीश्वर ! जरावस्था दुःख का घर है जब जरावस्था आती है तब सब दुःख इकट्ठे होते हैं उनसे पुरुष महादीन हो जाते हैं । युवावस्था में जो काम का बल रहता है सो भी जरा में क्षीण हो जाता है, इन्द्रियों की आसक्ति घट जाती है और उनकी चपलता का अभाव हो जाता है । जैसे पिता के निर्धन होने से पुत्र दीन हो जाता है वैसे ही शरीर के निर्बल होने से इन्द्रियाँ भी निर्बल हो जाती हैं केवल एक तृष्णा बढ़ जाती है । हे मुनीश्वर ! जब जगारूपी रात्रि आती है तब खाँसी रूपी स्यार आकर शब्द करते हैं और आधिव्याधिरूपी उलूक आकर निवास करते हैं। हे मुनीश्वर ! ऐसी नीच वृद्धावस्था की मुझको इच्छा नहीं । जैसे फल से वृक्ष झुक जाता है वैसे ही बुढ़ापे में देह कुबड़ी हो जाती है ।

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युवावस्था में भी पुत्रादिक उसकी टहल करते थे पर वही सब उसको वृद्धा- वस्था में जैसे वृद्ध बैल को बैलवाला त्याग देता है वैसे ही त्याग देते हैं, देखके हँसते हैं और अपमान करते हैं। उनको यह सब कंट की नाईं भासता है। हे मुनीश्वर ! ऐसी नीच अवस्था की मुझको इच्छा नहीं! अब जो कुछ कर्तव्य हो मुझसे कहिये मैं करूँ ? इस शरीर की तीनों अवस्था में कोई सुखदायी नहीं, क्योंकि बाल्यावस्था महामूढ़ है, युवावस्था महाविकारवान है और जरावस्था महादुःख का पात्र है। बाल्यावस्था को युवावस्था ग्रास कर लेती है; युवावस्था को जरावस्था ग्रास कर लेती है और जरावस्था को मृत्यु ग्रास कर लेती है। यह अवस्था सब अल्पकाल की हैं, इनके आश्रय से मुझको क्या सुख होगा ? इससे आप मुझे वही उपाय बताइये जिससे इस दुःख से मुक्त हो जाऊँ। हे मुनीश्वर ! जब जरावस्था आती है तब मरना भी निकट आता है। जैसे सन्ध्या आने से रात्रितत्काल आ जाती है और जो सन्ध्या के आने से दिन की इच्छा करते हैं वह मूर्ख हैं वैसे ही जरा के आने से जीने की आशा रखनी महामूर्खता है। हे मुनीश्वर ! जैसे बिल्ली चिन्तन करती है कि चूहा आवे तो पकड़ लूँ वैसे ही मृत्यु भी देखती है कि जरावस्था आवे तो मैं इसका ग्रास कर लूँ। हे मुनीश्वर ! यह परम नीच अवस्था है। यह जब आती है तब शरीर को जर्जरीभूत कर देती है; कँपाने लगती है और शरीर को निर्बल और क्रूर कर देती है। जैसे कमल पर बरफ की वर्षा हो और वह जर्जरीभूत हो जाय वैसे ही यह शरीर को जर्जरीभूत कर डालती है। जैसे वन में बाघ आकर शब्द करते हैं और मृग का नाश करते हैं वैसे ही खाँसी रूपी बाघ आकर मृगरूपी बल का नाश करते हैं। हे मुनीश्वर ! जब जरा आती है तब जैसे चन्द्रमा के उदय से कमलिनी म्लैन आती है वैसे ही मृत्यु प्रसन्न होती है। यह जरावस्था बड़ी दुष्टा है; इसने बड़े बड़े योद्धाओं को भी दीन कर दिया है। यद्यपि बड़े-बड़े शूर संग्राम में शत्रुओं को जीतते हैं पर उनको भी जरा ने जीत लिया है। जो बड़े-बड़े पर्वतों को चूर्ण कर डालते हैं उनको भी जरा पिशाचिनी ने महादीन कर दिया है। इस जरारूपी राक्षसी ने सबको दीन कर दिया है। यह सबको जीतनेवाली है। हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में अग्नि लगती और उसमें

वैराग्य प्रकरण । ५५

से धूम निकलता है। वैसे ही शरीररूपी वृक्ष में में जरारूपी अग्नि लगकर तृष्णारूपी धुआँ निकलता है। जैसे डिब्बे में बड़े रत्न रहते हैं वैसे ही जरारूपी डिब्बे में दुःखरूपी अनेक रत्न रहते हैं। जरारूपी वसन्त ऋतु है; उससे शरीररूपी वृक्ष दुःखरूपी रस से होता। जैसे हाथी जंजीर से बँधा हुआ दीन हो जाता है वैसे ही जरारूपी जंजीर से बँधा पुरुष दीन हो जाता है। उसके सब अङ्ग शिथिल हो जाते हैं बल क्षीण हो जाता है, इन्द्रियाँ भी निर्बल हो जाती हैं और शरीर जर्जरी भाव को प्राप्त होता है, परन्तु तृष्णा नहीं घटती वह तो नित्य बढ़ती चली जाती है। जैसे रात्रि आती है तब सूर्यवंशी कमल सब मूँद जाते हैं और पिशाचिनी आ विचरने लगती है और प्रसन्न होती है वैसे ही जरारूपी रात्रि के आने से सब शक्ति रूप कमल मूँद जाते हैं तृष्णारूपी पिशाचिनी प्रसन्न होती है। हे मुनीश्वर ! जैसे गङ्गातट के वृक्ष गङ्गाजल के वेग में जर्जरीभूत हो जाते हैं वैसे ही जो यह आयुरूपी प्रवाह चलता है उसके वेग से शरीर जर्जरीभूत हो जाता है जैसे मांस के टुकड़े को देख आकाश में उड़ती चील नीचे आकर ले जाती है वैसे ही जराअवस्था में शरीररूपी मांस को काल ले जाता है हे मुनीश्वर ! यह तो काल का ग्रास बना हुआ है। जैसे वृक्ष को हाथी खा जाता है वैसे जरावाले शरीर को काल देख के खाता है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जरावस्थानिरूपणं नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़ा है इसमें अज्ञानी गिरा है, पर संसाररूपी गढ़ा तो अल्प है और अज्ञानी बड़ा हो गया है। संकल्प विकल्प की अधिकता से बढ़ा है । जो ज्ञानवान् पुरुष है वह संसार को मिथ्या जानता है और संसाररूपी जाल में नहीं फँसता और जो अज्ञानी पुरुष है वह संसार को सत्य जानकर उसकी आस्थारूपी जाल में फँसता है और भोगों की वाञ्छा करता है। वह ऐसा है जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब देखकर बालक पकड़ने की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी संसार को सत्य जानकर जगत के पदार्थ की वाञ्छा करता

५६योगवाशिष्ठ ।

है कि यह मुझे प्राप्त हो और यह न हो । यह सब सुख नाशात्मक है अभिप्राय यह कि आते हैं और जाते हैं स्थिर नहीं रहते; इनको काल ग्रास करता है । जैसे पक्के अनार को चूहा खा जाता है वैसे ही सब पदार्थों को काल खाता है । हे मुनीश्वर ! यह सब पदार्थ कालग्रसित हैं । जैसे नेवला सर्प को भक्षण कर जाता है वैसे ही बड़े बड़े बली सुमेरु ऐसे गम्भीर पुरुषों को काल ने ग्रसित किया है । जगतरूपी एक गूलर का फल है; उसमें मज्जा ब्रह्मादिक हैं और उसका वन ब्रह्म-रूप है । उस ब्रह्मरूप वन में जितने वन हैं सो सब इसका आहार है । यह काल सबको भक्षण कर जाता है । हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है; जो कुछ देखने में आता है सो सब इसने ग्रास कर लिया है । हमारे जो बड़े ब्रह्मादिक हैं उनका भी काल ग्रास कर जाता है तो और का क्या कहना है जैसे सिंह मृग का ग्रास कर लेता है । काल किसी से जाना नहीं जाता । क्षण; घरी, प्रहर, दिन, मास और वर्षादिक से जानिये सोई काल है और काल की मूर्ति प्रकट नहीं है । यह किसी को स्थिर नहीं होने देता । एक बेलि, काल ने पसारी है उसकी त्वचा रात्रि है और फूल दिन है और जीवरूपी भौंरे उस पर आ बैठते हैं । हे मुनी-श्वर ! जगतरूपी गूलर का फल है उसमें जीवरूपी बहुत मच्छर रहते हैं । जैसे तोता अनार का भक्षण करता है वैसे ही काल उस फल का भक्षण करता है । जगतरूपी वृक्ष है; जीवरूपी उसके पत्र हैं और कालरूपी हस्ती उसका भक्षण कर जाता है । शुभ अशुभरुपी भैसे को कालरूपी सिंह छेद छेद के खाता है । हे मुनीश्वर ! यह काल महाक्रूर है; किसी पर दया नहीं करता; सबको खा जाता है । जैसे मृग सब कमलों को खा जाता है उसमे कोई नहीं बचता वैसे ही काल भी सबको खाता है परन्तु एक कमल बचा है उस कमल के शान्ति और मैत्री अंकुर हैं और चेतनामात्र प्रकाश है, इस कारण वह बचा है । कालरूपी मृग इस तक नहीं पहुँच सकता बल्कि इसमें प्राप्त हुआ काल भी लीन हो जाता है । जो कुछ प्रपंच है सो सब काल के मुख में है । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, कुबेर आदि सब मूर्ति काल की धरी हुई हैं । यह उनको भी अन्तर्द्धान कर देता है । हे मुनी-

वैराग्य प्रकरण । १७

सब उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय सब काल में होते हैं। अनेक बेर इसने महाकल्प का भी ग्रास किया है और अनेक बेर करेगा। काल को भोजन करने में तृप्ति कदाचित् नहीं होती और कदाचित् होनेवाली भी नहीं। जैसे अग्नि घृत की आहुति में तृप्त नहीं होता। वैसे ही जगत और सब ब्रह्मांड का भोजन करके भी काल तृप्त नहीं होता। इसका ऐसा स्वभाव है कि इन्द्र को दरिद्री कर देता है और दरिद्री को इन्द्र कर देता है, सुमेरु को राई बनाता है और राई को सुमेरु करता है। सबसे बड़े ऐश्वर्यवान को नीच कर डालता है और सबसे नीच को ऊँच कर डालता है। बूँद को समुद्र कर डालता है और समुद्र को बूँद करता है। ऐसी शक्ति काल में है। यह जीवरूपी मच्छरों को शुभाशुभ कर्मरूपी छुरे से छेदता रहता है। कालरूप का चक्र जीवरूपी हँडिया की शुभ-अशुभ कर्मरूपी रस्सी से बाँधकर फिराता है और जीवरूपी वृक्ष को रात्रि और दिनरूपी कुल्हाड़े से छेदता है। हे मुनीश्वर ! जितना कुछ जगत् विलास भासता है काल सबको ग्रास कर लेगा। जीवरूपी रत्न का काल डब्बा है सो सबको अपने उदर में डालता जाता है। काल यों खेल करता है कि चन्द्र सूर्यरूपी गेंद को कभी ऊर्ध्व को उछालता है और कभी नीचे डालता है। जो महापुरुष है वह उत्पत्ति और प्रलय के पदार्थों में से किसी के साथ स्नेह नहीं करता और उसका काल भी नाश नहीं कर सकता। जैसे मुण्ड की माला महादेवजी गले में धारे हैं वैसे ही यह भी जीवों की माला गले में डालता है। हे मुनीश्वर ! जो बड़े बलिष्ठ हैं उनको भी काल ग्रहण कर लेता है। जैसे समुद्र बड़ा है उसको बड़वानल पान कर लेता है और जैसे पवन भोजपत्र को उड़ाता है वैसे ही काल का भी बल है, किसी की सामर्थ्य नहीं जो इसके आगे स्थित रहे। हे मुनीश्वर ! शान्तिगुण प्रधान देवता, रजोगुण प्रधान बड़े राजा और तमोगुण प्रधान दैत्य और राक्षस हैं उनमें किसी की सामर्थ्य नहीं जो इसके आगे स्थिर रहे। जैसे तौली में अन्न और जल भरकर अग्नि पर चढ़ा देने से अन्न उछलता है और वह अन्न के दाने कड़छी से कभी ऊपर और कभी नीचे फिर जाते हैं वैसे ही जीवरूपी अन्न के दाने जगतरूपी तौली में

५८योगवाशिष्ठ ।

पड़े हुए रागद्वेषरूपी अग्नि पर चढ़े हैं और कर्मरूपी करछी से कभी ऊपर जाते हैं और कभी नीचे आते हैं। हे मुनीश्वर ! यह काल किसी को स्थिर नहीं होने देता यह महा कठोर है, दया किसी पर नहीं करता। इसका भय मुझको रहता है इससे वही उपाय मुझसे कहिये जिससे मैं काल से निर्भय हो जाऊँ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्यप्रकरणे कालनिरूपणन्नामाष्टादशसर्गः ॥१८॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ट है। जैसे राजा के पुत्र शिकार खेलने जाते हैं तो वन में बड़े बड़े पशु-पक्षी उनसे दुःख पाते हैं वैसे ही यह संसाररूपी वन है उसमें प्राणिमात्र पशु-पक्षी हैं। जब कालरूपी राजपुत्र उसमें शिकार खेलने आता है तब सब जीव भय पाते हैं और जर्जरीभूत होते हैं और वह उनको मारता है। हे मुनीश्वर ! यह काल महाभैरव है सबका ग्रास कर लेता है प्रलय में सबका प्रलय कर डालता है और इसकी जो चण्डिका शक्ति है उसका बड़ा उदर है। वह कालिका सबका ग्रास करके पीछे नृत्य करती है। जैसे वन के मृग को सिंह और सिंहनी भोजन करके नृत्य करते हैं वैसे ही जगतरूपी वन में जीवरूपी मृग को भोजन करके काल और कालिका नृत्य करते हैं। फिर इन्हीं से जगत् का प्रादुर्भाव होता है। नाना प्रकार के पदार्थों को रचते हैं और पृथ्वी, बगीचे, बावली आदि सब पदार्थ इन्हीं से उत्पन्न होते हैं। जीवों की उत्पत्ति भी इनसे होती है और एक समय में उनका नाश भी कर देती है। सुन्दर समुद्र रचके फिर उनमें अग्नि लगा देती है और सुन्दर कमल को बनाके फिर उसके ऊपर वरफ की वर्षा करती है। जहाँ बड़े-बड़े स्थान बसते हैं उनको उजाड़ डालती है और फिर उजाड़ में बस्ती करती है और नाश भी करती है; किसी को स्थिर नहीं रहने देती। जैसे बाग में वानर आकर वृक्ष को ठहरने नहीं देता वैसे ही कालरूपी वानर किसी पदार्थ को स्थिर रहने नहीं देता। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार से सब पदार्थ काल से जर्जरीभूत होते हैं। उनका आश्रय में किस रीति से करूँ ? मुझको तो यह सब नाशरूप भासते हैं, इससे अब मुझको किसी जगत् के पदार्थ की इच्छा नहीं।

इति श्रीयो० वै० कालविलास वर्णनन्नामैकोनविंशतितमसर्गः ॥१९॥

वैराग्य प्रकरण । ५६

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! इस काल का महापराक्रम है। इसके तेज के सम्मुख कोई नहीं रह सकता। यह क्षण में ऊँच को नीच और नीच को ऊँच कर डालता है। उसका निवारण कोई नहीं कर सकता। सब उसी के भय से काँपते हैं। यह महाभैरव है सब विश्व का ग्रास कर लेता है। इसकी चण्डिकारूप शक्ति है, वह अति बलवान् है और नदीरूप है, उसका उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। महाकालरूप काली है, उसका बड़ा भयानक आकार है। कालरूप जो रुद्र है उससे अभिन्नरूपी कालिका है वह सबका पान करके पीछे भैरव और भैरवी नृत्य करते हैं। उस काल और कालिका का बड़ा आकार है। उसका आकाश शीश, पाताल में चरण हैं और दशों दिशा भुजा है। सब समुद्र उसके हाथ में कङ्गण हैं; सम्पूर्ण पृथ्वीरूप उसके हाथ में पात्र है; और उस पर जो जीव हैं वह भोजन के योग्य हैं। हिमालय और सुमेरु पर्वत दोनों कानों में कुण्डल हैं; चन्द्रमा और सूर्य उसके दोनों लोचन हैं और सब तारागण उसके मस्तक में बिन्दु हैं। काल के हाथ में त्रिशूल और मूसल आदि शस्त्र हैं और कालिका के हाथ में ताँतरूपी फाँसी है, उससे जीवों को मारती है। ऐसी कालिकादेवी सब जीवों का ग्रास करके महाभैरव के आगे नृत्य करती है, अट्टाट्ट शब्द करती है और जीवों को भोजन करके उनकी मुण्ड-माला गले में धारण करती है। भैरव के सम्मुख रहने की किसी में शक्ति नहीं, जहाँ उजाड़ है वहाँ क्षण में बस्ती कर डालता है और जहाँ बस्ती है वहाँ क्षण में उजाड़ करता है। इसी से उसका नाम देव कहते हैं। वह बड़े-बड़े पदार्थों को उत्पन्न और नष्ट करता है, स्थिर किसी को नहीं रहने देता, इससे इसका नाम कृतान्त है और नित्यरूप भी यही है, क्योंकि इसका परिणाम अनित्य है इसी से इसका नाम कर्म है। जब अभावरूपी धनुष हाथ में धरता है तो उसमें रागद्वेषरूपी बाण चलाता है और उस बाण से जर्जरीभूत करके नाश करता है। जैसे बालक मृत्तिका की सेना बनाता है और उठाकर नष्ट भी कर देता है वैसे ही काल को उपजाने और नष्ट करने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता । हे मुनीश्वर ! कालरूपी धीवर है और उसने क्रियारूपी जाल पसारा है।

६०योगवाशिष्ठ ।

उसमें जीवरूपी पक्षी फँसते हैं सो फँसे हुए शान्ति नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! यह तो सब नाशरूप पदार्थ हैं इनमें आश्रय किसका करूँ कि जिसमें सुख हो। यह तो स्थावर जङ्गम जगत सब काल के मुख में है यह सब नाश-रूप मुझको दृष्टि आता है, इससे जो निर्भय पद हो सो मुझको कहिए।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालजुगुप्सावर्ण-न्नामविंशतितमस्सर्गः ॥ २० ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जितने पदार्थ भासते हैं वह सब नाश-रूप हैं तो मैं किसकी इच्छा करूँ और किसका आश्रय करूँ ? इनकी इच्छा करना मूर्खता है। जितनी चेष्टा अज्ञानी करता है वह सब दुःख के निमित्त है और जीने में अर्थ की सिद्धि कुछ नहीं है, क्योंकि बालक अवस्था में मूढ़ता रहती है, कुछ विचार नहीं रहता। जब युवावस्था आती है तब मूर्खता से विषय को सेवता है और मान मोहादि विकारों से मोहा जाता है, उसमें कुछ विचार नहीं होता और स्थिर भी नहीं रहता, दीन का दीन रह के विषय की तृष्णा करता है, शान्ति नहीं पाता। हे मुनीश्वर ! आयुष्य महाचंचल है और मृत्यु तो निकट है, उसमें अन्यथा भाव नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जितने भोग हैं वे रोग हैं, जिसको सम्पदा जानते हैं वह आपदा है, जिसको सत्य कहते हैं वह असत्यरूप है, जिन स्त्री, पुत्रादिकों को मित्र जानते हैं वह सब बन्धन के कर्त्ता हैं और इन्द्रियाँ महाशत्रुरूप हैं। वह सब मृगतृष्णा के जलवत् है, यह देह विकाररूप है, मन महाचंचल और सदा अशान्तरूप है और अहङ्कार महानीच है, इसने ही दीनता को प्राप्त किया है। इससे जितने पदार्थ इसको सुखदायक भासते हैं वह सब दुःख के देनेवाले हैं इससे कदाचित् शान्ति नहीं होती। इसी कारण मुझको इनकी इच्छा नहीं। यद्यपि यह देखनेमात्र सुन्दर भासते हैं पर इनमें सुख कुछ नहीं और स्थिर न रहेंगे। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरंग भासते हैं, पर वह सब बड़वाग्नि से नाश होते हैं वैसे ही यह पदार्थ भी नष्ट हो जाते हैं। मैं अपनी आयु में कैसे आस्था करूँ। हे मुनीश्वर ! बड़े समुद्र, सुमेरु, राक्षस, दैत्य, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, पृथ्वी, अग्नि, पवन, यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र, ध्रुव, चन्द्रमा और बड़े ईश्वर जगत के कर्त्ता, ब्रह्मा

वैराग्य प्रकरण । ६१

विष्णु, रुद्र और काल जो सबका भक्षण करता है, काल की स्त्री, सब का आधार आकाश और जितना जगत् है यह सब नष्ट हो जावेंगे तो हमारी कौन गिनती है। हम किसकी आस्था करें और किसका आश्रय करें ? यह सब जगत् भ्रममात्र है; अज्ञानियों की इसमें आस्था होती है और हमारी नहीं; क्योंकि जगत् भ्रम से उत्पन्न हुआ है। मैं इतना जानता हूँ कि संसार में जीव को इतना दुःखी अहङ्कार ने किया है। हे मुनीश्वर ! यह जीव अपने परमशत्रु अहङ्कार से भटकता फिरता है। जैसे रस्सी से बँधे हुए पतङ्ग कभी ऊर्ध्व और कभी नीचे जाते हैं, स्थिर कभी नहीं रहते वैसे ही जीव अहङ्कार से कभी ऊर्ध्व और कभी अधो जाता है; स्थिर कभी नहीं होता। जैसे अश्व जुते हुए रथ के ऊपर बैठकर सूर्य आकाश मार्ग में फिरता है वैसे ही जीव भ्रमता है, स्थिर कदाचित् नहीं होता। हे मुनीश्वर ! यह जीव परमार्थ सत्य स्वरूप से भूला हुआ भटकता है; अज्ञान से संसार में आस्था करता है और भोग को सुखरूप जानकर उसमें तृष्णा करता है। पर जिसको सुखरूप जानता है वह रोग समान है और विष से पूर्ण सर्प जीव का नाश करनेवाला है; जिसको सत्य जानता है वह सब असत्य है सब काल के मुख में ग्रसे हुए हैं। हे मुनीश्वर ! विचार के बिना जीव अपना नाश आप ही करता है, क्योंकि उसका कल्याण करनेवाला बोध है। जब सत्य विचार बोध के शरण जाय तो कल्याण हो। जितने पदार्थ हैं वह स्थिर नहीं रहते। इनको सत्य जानना दुःख के निमित्त है। हे मुनीश्वर ! जब तृष्णा आती है तब आनन्द और धैर्य का नष्ट कर देती है। जैसे वायु मेघ का नाश कर डालता है वैसे ही तृष्णा ज्ञान का नाश कर डालती है। इससे मुझे वही उपाय कहिये जिससे जगत् का भ्रम मिट जावे और अविनाशी पद की प्राप्ति हो। इस भ्रमरूप जगत् की आस्था मैं नहीं देखता। इससे जैसी इच्छा हो वैसा करो, परन्तु जो सुख दुःख इसको होने हैं वह अवश्य होंगे कभी न मिटेंगे। चाहे पहाड़ की कन्दरा में बैठो, चाहे कोट में परन्तु जो होने को है वह अवश्य होगा। इस निमित्त यत्न करना मूर्खता है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे वैराग्य प्रकरणे कालविलास वर्णन-
न्नामैकविंशतितमस्सर्गः ॥ २१ ॥

६२ । योगवाशिष्ट ।

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! यह जो नाना प्रकार के सुन्दर पदार्थ भासते हैं वह सब नाशरूप हैं, उनकी आस्था मूर्ख करते हैं । यह तो मन की कल्पना मे रचे हुए हैं, उनमें से में किसकी आस्था करूँ ? हे मुनीश्वर अज्ञानी जीव का जीना व्यर्थ है, क्योंकि जीने से उनका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जब कुमार अवस्था होती है तब बुद्धि मूढ़ होती है, उसमें कुछ विचार नहीं होता । जब युवावस्था आती है तब काम क्रोधादिक विकार उत्पन्न होते हैं ये सदा ढाँपे रहते हैं । जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है और आकाशमार्ग को देख भी नहीं सकता वैसे ही काम क्रोधादिक में ढँका हुआ जीव विचार मार्ग को नहीं देख सकता । जब वृद्धावस्था आती है तब शरीर जर्जरीभूत और महादीन हो जाता है और जीव शरीर को त्याग देता है । जैसे कमल के ऊपर बरफ पड़ती है तब उसको भँवरा त्याग देता है वैसे ही शरीररूपी कमल को जरा का स्पर्श होता है तब जीव-रूपी भँवरा त्याग देता है । हे मुनीश्वर ! यह शरीर तब तक सुन्दर है जब तक वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होती । जैसे चन्द्रमा का प्रकाश जब तक राहु दैत्य ने आवरण नहीं किया तब तक रहता है; जब राहु दैत्य आवरण करता है तब तक प्रकाश नहीं रहता, वैसे ही जरावस्था के आने से युवावस्था की सुन्दरता जाती रहती है । हे मुनीश्वर ! जरा के आने से शरीर कृश हो जाता है, जैसे वर्षाकाल में नदी बढ़ जाती है वैसे ही जरावस्था में तृष्णा बढ़ जाती है और जिस पदार्थ की तृष्णा करता है वह पदार्थ भी दुःखरूप है, इसलिये तृष्णा करके आप ही दुःख पाता है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी समुद्र में चित्तरूपी बेड़ा पड़ा है और रागद्वेष-रूपी मच्छों से कभी ऊर्ध्व को जाता है और कभी नीचे आता है, स्थिर कदाचित् नहीं रहता । हे मुनीश्वर ! कामरूपी वृक्ष में तृष्णारूपी लता और विषयरूपी फूल हैं; जब जीवरूपी भँवरा उसके ऊपर बैठता है तब विषयरूपी बेलि मे मृतक हो जाता है । हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी एक बड़ी नदी है उसमें राग द्वेषादिक बड़े-बड़े मच्छ रहते हैं । उसी नदी में पड़े हुए जीव दुःख पाते हैं । जिस संसार की इच्छा करता है वह नाशरूप है । हे मुनीश्वर ! तरंगों के समूह के गणरूपी समुद्र को तरजानेवाले को भी

वैराग्य प्रकरण । ६३

मैं शूर नहीं मानता, परन्तु जो इन्द्रियरूपी समुद्र में मनोवृत्तिरूपी तरङ्ग उठते हैं उस समुद्र के तरजानेवाले को मैं शूर मानता हूँ। ऐसी क्रिया अज्ञानी जीव आरम्भ करते हैं कि जिसके परिणाम में दुःख हो। जिसके परिणाम में सुख है उसका आरम्भ वे नहीं करते और काम के अर्थ की धारणा करते हैं। ऐसे आरम्भ से शरीर की शान्ति के पीछे भी सुख की प्राप्ति नहीं होती। वे कामना करके सदा जलते रहते हैं। जो अनात्मपदार्थ की तृष्णा करते हैं उनको शान्ति कैसे प्राप्त हो? हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी नदी में बड़ा प्रवाह है; उसके किनारे पर वैराग्य और सन्तोष दो वृक्ष खड़े हैं, सो तृष्णा नदी के प्रवाह में दोनों का नाश होता है। हे मुनीश्वर! तृष्णा बड़ी चंचल है, किसी को स्थिर नहीं होने देती। मोहरूपी एक वृक्ष है उसके चारों ओर स्त्रीरूपी बेलि है सो विषसे पूर्ण है। उस पर चित्तरूपी भँवरा आ बैठता है तब स्पर्शमात्र से नाश होता है। जैसे मोर का पुच्छ हिलता है वैसे ही अज्ञानी का चित्त चंचल रहता है, इसलिए वह मनुष्य पशु के समान है। जैसे पशु दिन को जंगल में जा आहार करते और चलते फिरते हैं और रात्रि को घर में आय खूँटे में बाँधे जाते हैं वैसे ही मूर्ख मनुष्य भी दिन को घर छोड़के व्यवहार में फिरते हैं और रात्रि को आ अपने घर में स्थिर होते हैं। पर इससे परमार्थ की कुछ सिद्धि नहीं होती, वे अपना जीवन वृथा गँवाते हैं। बाल्यावस्था में तो शून्य रहता है और युवावस्था में काम में उन्मत्त होता है। उस काम में चित्तरूपी उन्मत्तहस्ती स्त्रीरूपी कन्दरा में जा स्थिर होता है, पर वह भी क्षणभंगुर है। फिर वृद्धावस्था आती है उसमें शरीर कृश हो जाता है। जैसे बर्फ में कमल जर्जरीभाव को प्राप्त होता है वैसे ही जरा से शरीर जर्जरीभाव को प्राप्त होता है और सब अङ्ग जीर्ण हो जाते हैं; पर एक तृष्णा बढ़ जाती है। हे मुनीश्वर! यह जीव मनुष्यरूपी पर्वत पर आ आकाश के फलरूपी जगत के पदार्थों की इच्छा करता है सो नीचे गिर राग-द्वेषरूपी कण्टक के वृक्ष में जा पड़ेगा। हे मुनीश्वर! जितने जगत के पदार्थ हैं वह सब आकाश के फूल की नाई नाशवान हैं। इनमें आस्था करनी मूर्खता है। यह तो शब्दमात्र है।

६९योगवाशिष्ठ ।

इनसे अर्थ कुछ सिद्ध नहीं होता । जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको विषय-भोग की इच्छा नहीं रहती, क्योंकि आत्मा के प्रकाश से वे इनको मिथ्या जानते हैं। हे मुनीश्वर ! ऐसे ज्ञानवान् दुर्विज्ञेय पुरुष हमको तो स्वप्न में भी नहीं भासते । ऐसे विरक्तात्मा दुर्लभ हैं कि जिनका भोग की इच्छा नहीं और सर्वदा ब्रह्म की स्थिति में भासते हैं। ऐसे पुरुषों को संसार की कुछ इच्छा नहीं रहती, क्योंकि यह पदार्थ नाशरूप है । हे मुनीश्वर ! जैसे पर्वत को जिस ओर देखिये पत्थरों से, पृथ्वी मृत्तिका से, वृक्ष काष्ठ से और समुद्र जल से पूर्ण दृष्टि आते हैं वैसे ही शरीर अस्थि-मांस से पूर्ण भासता है । ये सब पदार्थ पञ्चतत्त्व से पूर्ण और नाशरूप हैं ऐसा जानकर ज्ञानी किसी की इच्छा नहीं करता । हे मुनीश्वर ! यह जगत् सब नाशरूप है, देखते ही देखते नष्ट हो जाता है, मैं उसमें किस का आश्रय करके सुख पाऊँ ? जब युगों की सहस्र चौकड़ी व्यतीत होती हैं तब ब्रह्मा का दिन होता है । उस दिन के क्षय होने से जगत् का प्रलय होता है और ब्रह्मा भी काल पाकर नष्ट हो जाता है । ब्रह्मा भी जितने हो गये हैं उनकी संख्या नहीं हो सकती असंख्य ब्रह्मा नष्ट हो गये हैं तो हम सरीखों की क्या वार्ता है। हम किसी भोग की वासना नहीं करते, क्योंकि सब चलरूप हैं, स्थिर रहने के नहीं, सब नाशरूप हैं, इसलिये इनकी आस्था मूर्ख करते हैं, इनके साथ हमको कुछ प्रयोजन नहीं । जैसे मरुस्थल को देख मृग जलपान करने को दौड़ता और शान्ति नहीं पाता, वैसे ही मूर्ख जीव जगत् के पदार्थों को सत्य मानकर तृष्णा करता है, परन्तु शान्ति नहीं पाता, क्योंकि सब असाररूप हैं । स्त्री, पुत्र और कलत्र जब तक शरीर नष्ट नहीं होता तभी तक भासते हैं, जब शरीर नष्ट हो जायगा तो जाना न जावेगा कि कहाँ गये और कहाँ से आये थे । जैसे तेल और बत्ती से दीपक बड़ा प्रकाशवान दृष्टि आता है, जब बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया वैसे ही वर्त्तरूप बान्धव हैं और उसमें स्नेहरूपी तेल है उसमें जो शरीर भासता है सो प्रकाश है । जब शरीररूपी दीपक का प्रकाश बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया । हे मुनीश्वर ! बन्धु का मिलाप ऐसा है जैसे कोई तीर्थ यात्रा

वैराग्य प्रकरण । ६५

को सङ्ग चला जाता हो सो सब एक क्षण वृक्ष की छाया के नीचे बैठते हैं फिर न्यारे न्यारे हो जाते हैं । जैसे उस यात्रा में स्नेह करना मूर्खता है वैसे ही इनमें भी स्नेह करना मूर्खता है । हे मुनीश्वर ! अहं ममता की रस्सी के साथ बाँधे हुए घटीयन्त्र की नाईं सब जीव भ्रमते फिरते हैं, उनको शान्ति कदाचित् नहीं होती । यह देखने मात्र तो चेतन दृष्टि आता है, परन्तु पशु और बन्दर इन से श्रेष्ठ हैं जिनकी सम्मति देह और इन्द्रियों के साथ बँधी हुई है और आगमापायी है उनकी आत्मपद की प्राप्ति कठिन है । जैसे पवन से वृक्ष के पात टूट के उड़ जाते हैं फिर उनको वृक्ष के साथ लगना कठिन है वैसे ही जो देहादिक से बाँधे हुए हैं उनको आत्म-पद का पाना कठिन है । हे मुनीश्वर ! जब आत्मपद से विमुख होता है तब जगत् को सत्य देखता है और जब आत्मपद की ओर आता है तब संसार इसको बड़ा विरस लगता है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जो स्थिर रहे जो कुछ पदार्थ हैं सो नाश को प्राप्त होते हैं । इससे मैं किसकी आस्था करूँ और किसका आश्रय करूँ सब तो नाशवन्त भासते हैं ? वह पदार्थ मुझसे कहिये जिसका नाश न हो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणेसर्वपदार्थाभाववर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जितना स्थावर जङ्गम जगत् दीखता है वह सब नाशरूप है, कुछ भी स्थिर न रहेगा । जो खाई थी वह जल में पूर्ण हो गई है और जो बड़े जल से भरे हुए समुद्र दीखते थे वे खाई-रूप हो गये; जो सुन्दर बड़े बगीचे थे वे आकाश की नाईं शून्य हो गये और जो शून्य स्थान थे वे सुन्दर वृक्ष होकर वन में दृष्टि आते हैं । जहाँ वस्ती थी वहाँ उजाड़ हो गई और जहाँ उजाड़ थी वहाँ वस्ती हो गई । जहाँ गड्ढे थे वहाँ पर्वत हो गये और जहाँ बड़े पर्वत थे वहाँ समान पृथ्वी हो गई । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार पदार्थ देखते देखते विपर्यय हो जाते हैं, स्थिर नहीं रहते तो फिर में किसका आश्रय करूँ और किसके पाने का यत्न करूँ ? ये पदार्थ तो सब नाशरूप हैं । जो बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न और बड़े कर्तव्य करते और बड़े वीर्यवान् तेजवान् हुए हैं वे भी स्मरणमात्र