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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ५६५

जो कुछ प्रत्यक्ष आचार प्राप्त हो, उसमें वृत्त होना और सदा आत्म-निश्चय रखना, इसी का नाम परम मौन है। सब क्रिया होती रहें, पर अपने से कुछ न देखना—जैसे नट स्वाँग भरता है और उसके अनुसार विचरता है, परन्तु निश्चय उसका आदि शरीर में ही होता है, उससे वह चलायमान नहीं होता, वैसे ही जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो, उसको यथाशास्त्र करे, परन्तु अपने निर्गुण निष्क्रियस्वरूप में चलायमान न हो, उसी अद्वैत स्वरूप में स्थित रहे।

राम ने पूछा, हे भगवन्! वह रुद्र क्या था और वह काली शक्ति क्या थी? उनके अङ्गों का बढ़ना-घटना और नृत्य करना क्या था और वस्त्र क्या थे, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिवतत्त्व ही आकार होकर भासता है और कोई आकार नहीं। वह चिन्मात्र, अमल विद्या और अविद्या के कार्य से रहित, शान्त और अवाच्यपद है। यह संज्ञा भी संकल्प में तुमसे कही है, आत्मवेत्ता आत्मपद को अवाच्यपद कहते हैं, तथापि मैं कुछ कहता हूँ। हे राम केवल आत्मतत्त्वमात्र जो चिदाकाश है, वही शिव भैरव है। उसी के चमत्कार का नाम चित्तशक्ति है। उसी का नाम काली है। उस काली, आत्मा और शिवरूप में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन और स्पन्दन में और अग्नि तथा उष्णता में कुछ भेद नहीं होता, वैसे ही चित्तकला और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन निष्पन्द होता है, तब उसका लक्षण नहीं होता, अवाचकरूप होता है, और जब स्पन्दन होता है, तब उसका लक्षण भी होता है और उसमें शब्द प्रयोग होता है वैसे ही चित्तशक्ति में उसका लक्षण होता है। उसके अनेक नाम हैं। उसी का नाम स्पन्दन और इच्छा है। उसी को चैत्योन्मुखत्व से वासना कहते हैं। उसी के स्वाद की इच्छा से जब चित्तसंवित् में वासना फुरती है, तब उसका नाम वासना करने वाला वासक कहलाता है—फिर आगे दृश्य होता है। जब त्रिपुटी हुई अर्थात् वासना, वासक और वास्य हुए, तब वासक को जीव कहते हैं—जो जीवत्व भाव लेकर स्थित होता है। तब इसको यह भावना होती है कि मैं जीव हूँ और मेरा नाश कभी

५६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

न हो, उस इच्छा में जीव कहलाता है । चित्शक्ति की जो ऐसी संज्ञा होती है, वह स्पन्दन से होती है । पर शिवतत्त्व अस्फुरण है और अचेत शक्ति में फुरने की नाईं स्थित है ।

जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं होता और हुए की नाईं भासता है, वैसे ही यह जगत् है नहीं और हुए की नाईं दिखता है, इससे उसको यह संज्ञा देते हैं । परमात्मा की क्रियाशक्ति काली प्रथम तो कारणरूप-प्रकृति है और उसी मे सब हैं—उसी मे प्रकृतिरूप है । वह विकृति अर्थात् किसी का कार्य नहीं है । महत्तत्त्व, पञ्चभूत, और अहंकार ये सात प्रकृति—विकृत हैं—अर्थात् कार्य भी हैं और कारण भी हैं । कार्य आदि देवी के हैं और कारण षोडश के हैं—पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ, पञ्चकर्म इन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और एक मन । इनके सप्तदश कार्य हैं । षोडश विकृति हैं अर्थात् कार्यरूप हैं, कारण किसी के नहीं । सत्रहवाँ पुरुष जो परमात्मा का अंश है वह अद्वैत, अचिन्त्य और चिन्मात्र है । न किसी का कारण है और न कार्य अपने आपमें स्थित है । इससे कारणकार्य में जितनी द्वैतकल्पना है, वह सब चित्तशक्ति में स्थित है । जब यह निस्पन्द होती है, तब तत्त्वरूप शिवपद में निर्वाण हो जाती है और कारण-कार्यरूपी सब भ्रम मिट जाता है, केवल आकाशवत् शेष रहता है । वह शुद्ध, अद्वैत, अचेत चिन्मात्र सदा अपने आप-भाव में स्थित है और उसकी स्पन्दनरूप क्रियाशक्ति की ये सब संज्ञा हैं । प्रथम तो सबका कारणरूप प्रकृति है, जो शोष है, अर्थात् जैसे बड़वाग्नि समुद्र को सुखाती है, वैसे ही वह जगत् को सुखाती है । वह सिद्ध है, अर्थात् साधक उसे आश्रय करके सेवते हैं । वह जयन्ती है, अर्थात् उसकी जय है । वह चण्डिका है अर्थात् उसके क्रोध से जगत् का प्रलय होता है और संसार डरता है । वह वीर्य है, अर्थात् उसका वीर्य अनन्त है । वह दुर्गा है, अर्थात् उसका रूप जानना कठिन है वह गायत्री है, अर्थात् उसके पाठ से संसार समुद्र से रक्षा होती है । वह सावित्री है, अर्थात् जगत् का पालन करती है । वह कुमारी अर्थात् कोमलस्वभाव है । वह गौरी अर्थात् गौर अङ्गवाली है । वह शिवा अर्थात्

उपशम प्रकरण । ६०५

हे महाभाग ! जो प्रपञ्च तुमको दृष्ट आता है वह जगद्भ्रम है, परमार्थ में न कोई जगत् है, न कोई मित्र है और न कोई बान्धव है जैसे मरु-स्थल में बड़ी नदी भासती है परन्तु उसमें जल का एक बूंद भी नहीं होता तैसे ही वास्तव में जगत् कुछ नहीं। बड़े बड़े लक्ष्मीवान् जो छत्र चामरों से सम्पन्न शोभते हैं वे विपर्यय होंगे क्योंकि यह लक्ष्मी तो चञ्चलस्वरूप है कोई दिनों में अभाव हो जाती है। हे भाई ! तू परमार्थ दृष्टि से विचार देख, न तू है और न जगत् है, यह दृश्य भ्रान्तिरूप है इसको हृदय से त्याग। इसी माया दृष्टि से बार बार उपजता है और विन-शता है। यह जगत् अपने संकल्प से उपजा है, इसमें सत्य पदार्थ कोई नहीं। अज्ञानरूपी मरुस्थल में जगतरूपी नदी है और उसमें शुभ-अशुभ-रूपी तरङ्ग उपजते और फिर नष्ट हो जाते हैं।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे पावनबोधवर्द्धन- न्नामैकोनविंशतितमसर्गः ॥ १९ ॥

पुण्यक बोले, हे भाई ! तेरे कई माता और कई पिता हो होकर मिट गये हैं। जैसे वायु में धूल के कणके उड़ते हैं तैसे बान्धव हैं, न कोई मित्र है, और न कोई शत्रु है सम्पूर्ण जगत् भ्रान्तिरूप है और उसमें जैसी भावना स्फुरती है, तैसे ही हो भासती है। बान्धव, मित्र, पुत्र आदिकों में जो स्नेह होता है सो मोह में कल्पित है और अपने मन से माता पितादिक संज्ञा कल्पी है। जगत् प्रपञ्च में जैसे संज्ञा कल्पता है तैसे ही हो भासती है, जहाँ बान्धव की भावना होती है वहाँ बान्धव भासता है और जहाँ और की भावना होती है वहाँ और ही हो भासता है। जो अमृत में विष की भावना होती है तो अमृत भी विष हो जाता है सो कुछ अमृत में विष नहीं भावना रूप भासता है, तैसे ही न कोई बान्धव है और न कोई शत्रु है, सर्वदाकाल विद्यमान एक सर्वगत सर्वात्मा पुरुषस्थित है उसमें अपने और और की कल्पना कोई नहीं और जो कुछ देहादि हैं वे रक्त मांसादि के समूह से रचे हैं उनमें अहंसत्ता कौन है और अहंकार, चित्त, बुद्धि और मन कौन है ? परमार्थदृष्टि से यह तो कुछ नहीं है, विचार किये से न तू है, न मैं हूँ, यह सब मिथ्या ज्ञान से भासते हैं। एक अनन्त चिदाकाश आत्मसत्ता सर्वदा है उसमें

६०६ | योगवाशिष्ठ ।

तेरी माता कौन है और पिता कौन है, यह सब मिथ्याभ्रम से भावना है वास्तव में कुछ नहीं। शरीर से देखिये तो जो कुछ शरीर है वह पञ्च-तत्त्वों से रचा जडरूप है, उनमें चैतन्य एकरूप है और अपना और पराया कौन है। इस भ्रमदृष्टि को त्याग के तत्त्व का विचार करो, मिथ्या भावना करके माता पिता के निमित्त क्यों शोकवान हुए हो ? जो सम्यकदृष्टि का आश्रय करके उस स्नेह का शोक करते हो तो और जन्मों के बान्धव और मित्रों का शोक क्यों नहीं करते ? अनेक पुष्पों और लताओं में तू मृगपुत्र हुआ था, उस जन्म के तेरे अनेक मित्र बान्धव थे उनका शोक क्यों नहीं करता ? अनेक कमलों संयुक्त तालाब में हाथी विचरते थे वहाँ तू हाथी का पुत्र था, उन हस्ति बान्धवों का शोक क्यों नहीं करता ? एक बड़े वन में वृक्ष लगे थे और तेरे साथ फल पत्र हुए थे और अनेक वृक्ष तेरे बान्धव थे उनका शोक क्यों नहीं करता ? फिर नदी तालाब में तुम मच्छ हुए थे और उनमें मत्स्ययोनि के बान्धव थे। उनका शोक क्यों नहीं करता ? दशार्णव देश में तू काक और वानर हुआ, तुषारदेश में तू गजपुत्र हुआ और फिर वनकाक हुआ, बङ्गदेश में तू हाथी हुआ, विराजदेश में तू गर्दभ हुआ, मालवदेश में सर्प और वृक्ष हुआ और बङ्गदेश में गृद्ध हुआ, मालवदेश के पर्वत में पुष्पलता हुआ और मन्दराचल पर्वत में गीदड़ हुआ, कोशलदेश में ब्राह्मण हुआ, बङ्गदेश में तीतर हुआ, तुषारदेश में घोड़ा हुआ, कीट अवस्था में हुआ, एक नीच ग्राम में बछरा हुआ और पन्द्रह महीने वहाँ रहा, एक वन में तड़ाग था वहाँ कमलपुष्प में भ्रमर हुआ और जम्बू-द्वीप में तू अनेक बार उत्पन्न हुआ है। हे भाई ! इस प्रकार वासनापूर्वक वृत्तान्त मैंने कहा है। जैसी तेरी वासना हुई है तैसे तूने जन्म पाये हैं। मैं सूक्ष्म और निर्मलबुद्धि से देखता हूँ कि ज्ञान बिना तूने अनेक जन्म पाये हैं। उन जन्मों को जानके तू किस किस बान्धव का शोक करेगा और किसका स्नेह करेगा ? जैसे वे बान्धव थे तैसे ही यह भी जान ले। मेरे भी अनेक बान्धव हुए हैं, जिन जिनमें मैंने जन्म पाया है और जो जो बीत गये हैं तैसे ही सब मेरे स्मरण में आते हैं और अब मुझको

उपशम प्रकरण । ६०७

अद्वैत ज्ञान हुआ है। हे भाई! त्रिगगदेश में मैं तीता हुआ, तड़ाग के तट पर हंस हुआ, पक्षियों में काक हुआ, बैल हुआ, बङ्गदेश में वृक्ष हुआ, इन वन पर्वत में बड़ा उष्ट्र होकर विचरा, पौण्ड्रदेश में गजा हुआ और मह्यानल पर्वत की कन्दरा में भेडिया हुआ जहाँ तू मेरा बड़ा भाई था। फिर मैं दश वर्ष मृग होकर रहा, पाँच महीने तेरा भाई होकर मृग रहा सो तेरा बड़ा भ्राता हूँ। इस प्रकार ज्ञान से रहित वासना कर्म के अनुसार कितने जन्मों में हम भ्रमते फिरे हैं। मैंने तुझसे सब कहा है और सब मुझको स्मरण है। इस प्रकार जगतजाल की स्थिति मैंने तुझसे कही है। तेरे और मेरे अनेक जन्म के माता, पिता, भाई और मित्र हुए हैं उनका शोक तू क्यों नहीं करता? यह संसार दुःख सुख रूप अप्रमाण भ्रमरूप है, इस कारण सबको त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ। यह सब प्रपञ्च भ्रान्तिरूप है, इनकी वासना त्याग जब अहंकार वासना को त्याग करोगे तब उस पद को प्राप्त होगे जहाँ ज्ञानवान प्राप्त होता है। इससे हे भाई! यह जो जीवभाव अर्थात् जन्म, मरण, ऊर्ध्व जीना और फिर गिरना व्यवहार है उसमें बुद्धिमान शोक-वान् नहीं होते, वे दुःख की निवृत्ति के अर्थ अपना स्वरूप स्मरण करते हैं जो भाव, अभाव और जरामरण बिना नित्य शुद्ध परमानन्द है। तू उसको स्मरणकर, और मूढ़ मत हो, उसको न सुख है, न दुःख है, न जन्म है, न मरण है, न माता है, न पिता है, तू एक अद्वैत-रूप आत्मा है और किसी से सम्बन्ध नहीं रखता, क्योंकि कुछ भिन्न नहीं है, हे साधो! यह जो नाना प्रकार का विषय संयुक्त यन्त्र है इसको अज्ञानरूप नटुआ ग्रहण करता है और इष्ट अनिष्ट में बन्धाय-मान होता है। जो आत्मदर्शी पुरुष हैं उनको क्रिया स्पर्श नहीं करती, वे केवल सुखरूप हैं और जो अज्ञानी हैं वे देह इन्द्रियों के गुणों में तद्रूप हो जाते हैं और इष्ट अनिष्ट से सुखदुःख के भोक्ता होते हैं। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं वे देखनेवाले साक्षीभूत होते हैं, करते हुए भी अकर्तारूप हैं और इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में राग द्वेष रहित हैं। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब आ पड़ता है परन्तु दर्पण भले बुरे रंग से रञ्जित नहीं

६०८ | योगवाशिष्ट ।

होता तैसे ही ज्ञानवान् राग द्वेष में रञ्जित नहीं होता । अब इच्छा और भय कल्पना से रहित स्वच्छ आत्मसत्ता सदा प्रफुल्लितरूप है और पुत्र, कलत्र, बान्धवों के स्नेह से रहित है और उसका हृदयकमल सर्व इच्छा और अहं मम से रहित अपने स्वरूप में सन्तुष्टवान् होता है । इससे मिथ्या देहादिकों की भावना को त्यागकर अपने नित्य, शुद्ध, शान्त और परमानन्दरूप में तू भी स्थित हो । तू तो परब्रह्म और निर्मलरूप है । इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे पावनबोधोनामविशांततमस्सर्गः ॥२०॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार पुण्यक ने पावन में बोध उपदेश किया तब पावन बोधवान् हुआ । तब दोनों ज्ञान के पारगामी और निरिच्छन्न आनन्दित पुरुष होकर चिरकाल पर्यन्त विचरते रहे और फिर दोनों विदेहमुक्त निर्वाण पद को प्राप्त हुए । जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण हो जाता है तैसे ही प्रारब्ध कर्म के क्षीण हुए दोनों विदेहमुक्त हुए । हे रामजी ! इसी प्रकार तू भी जान । जैसे वे मित्र, बान्धव, धना- दिक के स्नेह से रहित होकर विचरे तैसे ही तुम भी स्नेह से रहित होकर विचरो और जैसे उन्होंने विचार किया था तैसे ही तुम भी करो । इस मिथ्यारूप संसार में किसका इच्छा करें और किसका त्याग करें, ऐसे विचारकर अनन्त इच्छा और तृष्णा का त्याग करना, यही औषध है, तृष्णारूपी इच्छा का पालना औषध नहीं, क्योंकि पालने से पूर्ण कदा- चित् नहीं होती । जो कुछ जगत् है वह चित्त से उत्पन्न हुआ है और चित्त के नष्ट हुए संसार-दुःख नष्ट हो जाना है । जैसे काष्ठ के पाने से अग्नि बढ़ता जाता है और काष्ठ से रहित शान्त हो जाता है तैसे ही चित्त की चिन्तना से जगत् विस्तार पाता है और चिन्तना से रहित शान्त हो जाता है । हे रामजी ! ध्येय वासनावान त्यागोरूप रथ पर आरूढ़ होकर रहो, करुणा, दया और उदारतासंयुक्त होकर लोगों में विचरो और इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष से रहित हो । यह ब्रह्मस्थिति मैंने तुमसे कही । निष्काम, निर्दोष और स्वच्छस्वरूप को पाकर फिर मोह को नहीं प्राप्त होता । परम आकाश ही इसका हृदयमात्र विवेक है और बुद्धि इसकी सखी है जिसके निकट विवेक और बुद्धि है वे परमव्यवहार करते भी संकट

उपशम प्रकरण । ६०६

को नहीं प्राप्त होते, इससे तुम परम विवेक और बुद्धि का संग लेकर जगत् में विचरोगे तब संकट और दुःख से मोहित न होगे । नाना प्रकार के दुःख, संकट, स्नेह आदिक विकाररूप जो समुद्र है उसके तरने के निमित्त एक अपना धैर्यरूपी बेड़ा है और कोई उपाय नहीं सो धैर्य क्या है-दृश्य जगत् मे वैराग्य और सत् शास्त्र का विचार । इन श्रेष्ठ गुणों के अभ्यास से आत्मपद की प्राप्ति होती है । वह आत्मपद त्रिलोकी के ऐश्वर्यरूपी रत्नों का भण्डार है । जो त्रिलोकी के ऐश्वर्य से भी नहीं प्राप्त होता, वह वैराग्य, विचार, अभ्यास और चित्त के स्थिर करने से होता है । जब तक मनुष्य जगत् कोष में उपजता है और मन तृष्णा-रूपी ताप से रहित नहीं होता तब तक कष्ट है और जब आत्मविवेक से मन पूर्ण होता है तब सब जगत् अमृतरूप भासता है । जैसे जूती के पहिरने से सब पृथ्वी चर्म से वेष्टितसी हो जाती है तैसे ही पूर्ण पद, इच्छा और तृष्णा के त्यागने से पाता है । जैसे शरदकाल का आकाश मेघों से रहित निर्मल होता है तैसे ही इच्छा से रहित पुरुष निर्मल होता है । जिन पुरुषों के हृदय में आशा फुरती है उनके वश हुए चित्त शून्य हो जाता है और जैसे अगस्त्य मुनि ने समुद्र को पान किया था तब समुद्र जल से रहित हो गया था तैसे ही आत्मजल से रहित समुद्रवत् चित्त शून्य हो जाता है । जिस पुरुष के चित्तरूपी वृक्ष में तृष्णारूपी चञ्चल मर्कटी रहती है उसको वह स्थिर होने नहीं देती और सदा शोभायमान होती है और जिसका चित्त तृष्णा से रहित है उस पुरुष को तीनों जगत् कमल की कली के समान हो जाते हैं योजनों के समूह गोपदवत् सुगम हो जाते हैं और महाकल्प अर्धनिमेषवत् हो जाता है । हे रामजी ! चन्द्रमा और हिमालय पर्वत भी ऐसा शीतल नहीं और केले का वृक्ष और चन्दन भी ऐसा शीतल नहीं जैसा शीतल चित्त तृष्णा से रहित होता है । पूर्णमासी का चन्द्रमा और क्षीरसमुद्र भी ऐसा सुन्दर नहीं और लक्ष्मी का मुख भी ऐसा नहीं जैसा इच्छा से रहित मन शोभायमान हो जाता है । जैसे चन्द्रमा की प्रभा को मेघ ढाँप लेता है और शुद्ध स्थानों को अपवित्र लेपन मलीन करता है तैसे ही अहंतारूपपिशाचिनी

६१०योगवासिष्ठ ।

पुरुषों को मलीन करती है । चित्तरूपी वृक्ष के बड़े बड़े टाम दिशा विदिशा में फैल रहे हैं सो आशारूप है, जब विवेकरूपी कुल्हाड़े से उनको काटेंगे तब अचित् पद की प्राप्ति होगी और तभी एक स्थानरूपी चित्त रहेगा अविवेक और अधैर्य तृष्णा शाखासंयुक्त है उनकी अनेक शाखा फिर होंगी इसलिए आत्मधैर्य को धरो कि चित्त की वृद्धि न हो । उत्तम धैर्य करके जब चित्त नष्ट हो जावेगा तब अविनाशी पद प्राप्त होगा । हे रामजी ! उत्तम हृदय क्षेत्र में जब चित्त की स्थित होती है तब आशारूपी दृश्य नहीं उपजने देती केवल ब्रह्मरूप शेष रहता है । तब तुम्हारा चित्त वृत्ति से रहित अचित्तरूप होगा तब मोक्षरूप विस्तृत पद प्राप्त होगा । चित्तरूपी उलूक पक्षी की तृष्णारूपी स्त्री है । ऐसा पक्षी जहाँ विचरता है वहाँ अमङ्गल फैलाता है । जहाँ उलूक पक्षी विचरते हैं वहाँ उजाड़ होता है विवेकादि जिससे रहित हो गये हैं ऐसे चित्त की वृत्ति से तुम रहित हो रहो । ऐसे होकर विचरोगे तब अचिन्त्य पद को प्राप्त होगे । जैसी जैसी वृत्ति फुरती है वैसा ही वैसा रूप जीव हो जाता है, इस कारण चित्त उपशम के निमित्त तुम वही वृत्ति धरो जिससे आत्म-पद की प्राप्ति हो । हे महात्मा पुरुष ! जिसको संसार के पदार्थों की इच्छा और ईषणा उपशम हुई है और जो भाव अभाव से मुक्त हुआ है वह उत्तम पद पाता है और जिसका चित्त आशारूपी फाँसी से बाँधा है वह मुक्त कैसे हो ? आशासंयुक्त कदाचित् मुक्त नहीं होता और सदा बन्धायमान रहता है ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे तृष्णाचिकित्सोपदेशोनामेकविंशतितमसर्गः ॥ २१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैंने जो तुमको उपदेश किया है उसको बुद्धि में विचारो । रामजी बोले, हे भगवन् ! सर्वधर्मों के वेत्ता । तुम्हारे प्रसाद से जो कुछ जानने योग्य था वह मैंने जाना, पाने योग्य पद पाया और निर्मल पद में विश्राम किया, भ्रमरूपी मेघ से रहित शरत्काल के आकाशवत् मेरा चित्त निर्मल हुआ है, मोहरूपी अहंकार नष्ट हो गया है, अमृत से हृदय पूर्णमासी के चन्द्रवत् शीतल हुआ है और संशय-

उपशम प्रकरण। ६११

रूपी मेघ नष्ट हो गया है, परन्तु आपके वचनरूपी अमृत को पान करता मैं तृप्त नहीं होता। जिस प्रकार बलि को विज्ञानबुद्धि भेद प्राप्त हुआ है बोध की वृद्धि के निमित्त वह मुझसे ज्यों का त्यों कहिये। नम्रभूत शिष्यप्रति कहते हुए बड़े खेद नहीं मानते। वशिष्ठजी बोले, हे राघव ! बलि का जो उत्तम वृत्तान्त है वह मैं कहता हूँ, सुनो, उससे निरन्तर बोध प्राप्त होगा। हे रामजी ! इस जगत् के नीचे पाताल है। वह स्थान महाक्षीरसमुद्र की नाईं सुन्दर उज्ज्वल है और वहाँ कहीं महासुन्दर नागकन्या बिराजती हैं, कहीं विषधर सर्प, जिनके सहस्रशीश हैं बिराजते हैं, कहीं दैत्यों के पुत्र रहते और कट कट शब्द करते हैं, कहीं सुन्दर सुख के स्थान हैं, कहीं जीवों के परंपरा समूह नरकों में जलते हैं और कहीं दुर्गन्ध के स्थान हैं। सात पाताल हैं उन सबमें जीव स्थित हैं कहाँ रत्नों से खचित स्थान है, कहीं कपिलदेवजी, जिनके चरणकमलों पर देवता और दैत्य शीश धरते हैं, बिराजते हैं और कहीं सुगन्धित बाग लगे हैं। ऐसी दो भुजाओं से पाली हुई पृथ्वी में दानवों में श्रेष्ठ विरोचन का पुत्र राजा बलि रहता था जिससे सर्व देवताओं और विद्याधरों और किन्नरों को लीला करके जीता था और त्रिलोकी अपने वश की थी। सब देवताओं का राजा इन्द्र उसके चरण सेवन की वाञ्छा करता है, त्रिलोकी में जो जाति-जाति के रत्न हैं वे सब उसके विद्यमान रहते हैं और सब शरीरों की रक्षा करने और भावना के धर्मों के धरनेवाले विष्णुदेव द्वारपाल हैं। ऐरावत हाथी जिसके गण्ड-स्थल से मद झरता है उसकी वाणी सुन ऐसा भयवान् होता है जैसे मोर की वाणी सुनकर सर्प भयवान् होता है उसका ऐसा तेज था जैसे सप्तसमुद्रों का जल कुहीड़ शोष लेती है और जैसे प्रलयकाल के द्वादश सूर्यों से समुद्र सूखने लगता है। उसने ऐसे यज्ञ करे जिसके क्षीर घृत की आहुति का धुवाँ मेघ बादल होकर पर्वतों पर बिराजा। जिसकी दृढ़ दृष्टि देखकर कुलाचल पर्वत भी नम्रभूत होता था। जैसे फूलों से पूर्णलता नमती है तैसे ही लीला करके उसने भुवनों को विस्तार सहित जीता और त्रिलोकी को जीतकर दशकोटि वर्ष पर्यन्त राजा बलि

६१२ | योगवाशिष्ठ ।

राज्य करता रहा। राजा बलि ने युगों के समूह व्यतीत हुए देखे थे और अनेक देवता और दैत्य भी उपजते मिटते अनेक बार देखे थे। त्रिलोकी के अनेक भोग भी उसने भोगे थे। निदान उनसे उद्वेग पाकर सुमेरु के शिखर पर एक ऊंचे झरोखे में अकेला जा बैठा और संसार की स्थिति का चिन्तना करने लगा कि इस बड़े चक्रवर्ती राज्य से मुझको क्या प्रयोजन है ? यद्यपि त्रिलोकी का राज्य बड़ा है तो भी इसमें आश्चर्य क्या है। इसमें मैं चिरकाल भोग भोगता रहा हूँ परन्तु शान्ति न हुई। ये भोग उपजकर फिर नष्ट हो जाते हैं, इन भोगों से मुझे शान्ति सुख प्राप्त नहीं हुआ पर बारम्बार मैं वही कर्म और वही व्यवहार करता हूँ और दिन रात्रि वही क्रिया करने में लज्जा भी नहीं आती वही स्त्री आलिङ्गन करना, फिर भोजन करना, पुष्पों की शय्या पर शयन करना और क्रीड़ा करना, ये कर्म बड़ों को लज्जा के कारण हैं। वही निरस व्यवहार फिर करना जो एक बार निरस हुआ और उस काल में तृप्त करता है, फिर बारम्बार दिन दिन करते हैं। यह मैं मानता हूँ कि यह काम बुद्धिमानों को हँसने योग्य और लज्जा का कारण है। जीवों के चित्त में वृथा संकल्प विकल्प उठते हैं—जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और मिटते हैं तैसे ही यह संकल्प और इच्छा जाल जो उठते और मिटते हैं सो उन्मत्त की नाईं जीवों की चेष्टा है। यह तो हँसी करने योग्य बालकों की लीला है और मूर्खता से अनर्थ फैलाती है। इसमें जो कुछ बड़ा उदार फल हो वह मैं नहीं देखता बल्कि इसमें भोगों से भिन्न कार्य कुछ नहीं मिलता, इसलिये जो कुछ इससे रमणीय और अविनाशी हो उसको शीघ्र ही चिन्तन करूँ। ऐसे विचारकर कहने लगा कि मैंने प्रथम भगवान् विरोचन से पूछा था। मेरा पिता विरोचन आत्मतत्त्व का ज्ञाता था और सब लोकों में गया था। उससे मैंने प्रश्न किया था कि हे भगवन्, महात्मन्! जहाँ सब दुःखों और सुखों का अन्त हो जाता है और सब श्रम शान्त हो जाता है वह कौन स्थान है ? वह पद मुझसे कहिये जहाँ मन का मोह नष्ट हो जाता है, सब इच्छा से मुक्त होता है और राग द्वेष से रहित जिसमें सर्वदा विश्राम होता है फिर कुछ क्षोभ नहीं रहता।

उपशम प्रकरण । ६१३

हे तात ! वह कौन पद है जिसके पाने से और कुछ पाना नहीं रहता और जिसके देखने से और कुछ देखना नहीं रहता ? यद्यपि जगत् के अत्यन्त भोग पदार्थ हैं तो भी सुखदायक नहीं भासते हैं, क्योंकि क्षोभ करते हैं और उनसे योगीश्वरों के मन भी मोहित होकर गिर पड़ते हैं। हे तात ! जो सुख सुन्दर विस्तीर्ण आनन्द है वह मुझसे कहिये । उसमें स्थित हुआ मैं सदा विश्राम पाऊँगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे विरोचनवर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

विरोचन बोले, हे पुत्र ! एक अति विस्तीर्ण विपुल देश है उसमें अनेक सहस्र त्रिलोकीयाँ भासती हैं। वहाँ समुद्र, जल, धारा, पर्वत, वन, तीर्थ, नदियाँ, तालाब, पृथ्वी, आकाश, नन्दनवन, पवन, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्यलोक, देश, देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, कमलों की शोभा, काष्ठ, तृण, चर, अचर, दिशा, ऊर्ध्व, अधः, मध्य, प्रकाश, तम, अह्र, विष्णु, इन्द्र, रुद्रादिक नहीं हैं, केवल एक ही है—जो महानता नाना प्रकार प्रकाश को धारनेवाला है, सबका कर्त्ता, सर्वव्यापक है और सर्वरूप तूष्णींभाव में स्थित है। उसने सब मन्त्रियों सहित एक मन्त्री संकल्प किया। वह मन्त्री जो न बने उसको शीघ्र ही बना लेता है और जो बने उसको न बनाने को भी समर्थ है वह आपसे कुछ नहीं माँगता और सब जानने को समर्थ है केवल राजा के अर्थ वह सब कार्यों को करता है। यद्यपि वह आप जड़ है तो भी राजा के बल से तनुता से ज्ञाता और कार्य करता है। यह सब कार्यों को करता है और उसका राजा एकता में केवल अपने आप में स्थित है। बलि ने पूछा, हे प्रभो ! आधि व्याधि दुःखों से रहित जो प्रकाशवान् है वह देश कौन है, उसकी प्राप्ति किस साधन से होती है और आगे किसने पाया है ? ऐसा मन्त्री कौन है और वह महाबली राजा कौन है जो जगन् जाल संयुक्त हमने भी नहीं जाता ? हे देव ! यह अपूर्व आख्यान तुमने कहा है जो आगे मैंने नहीं सुना था । मेरे हृदयाकाश में संशयरूपी बादल उदय हुआ है सो वचन रूपी पवन से निवृत्त करो । विरोचन बोले, हे पुत्र ! उस देश का मन्त्री

६१४ योगवाशिष्ठ ।

भगवान् और अनेक कल्प के देवता और असुरगणों से वश नहीं होता, सहस्रनेत्र जो इन्द्र है उसके वश भी नहीं होता, यम, कुबेर उसे वश कर नहीं सकते और देवता और असुरों से भी जीता नहीं जाता । मुसल, वज्र, चक्र, गदादिक खड्ग उस पर चलाये कुण्ठित हो जाते हैं—जैसे पाषाण पर चलाने से कमले कुण्ठित हो जाते हैं । वह मन्त्री अस्त्र और शस्त्र से वश नहीं होता और बड़े युद्धकर्मों से भी नहीं पाया जाता । देवता और दैत्य सबको उसने वश किया है, विष्णु पर्यन्त देवता और हिरण्यकशिपु आदिक असुर उसने डाल दिये हैं । जैसे प्रलयकाल का पवन सुमेरु के कल्पवृक्ष को गिरा देता है । प्रमाद से इस त्रिलोकी को वशकर चक्रवर्ती राजावत् वह स्थित है और सुर असुरों के समूह उससे भासते हैं । यद्यपि वह गुह्य और गुणहीन है तो भी दुर्मति, दुष्ट अहंकार और क्रोध उससे उदय होते हैं । देवता और दैत्य के समूह फिर फिर उपजता है सो इसकी क्रीड़ा है । ऐसा मन्त्रों से संयुक्त मन्त्री है । हे पुत्र ! जब उसके राजा को वश कीजिये तब उसके मन्त्री को वश करना सुगम होता है । राजा को वश किये बिना मन्त्री वश नहीं होता, कभी भीतर रहता है कभी बाहर जाता है । जिस काल में राजा की इच्छा होती है कि मन्त्री अपने को जीते तब यत्न बिना जीत लेना है । वह ऐसा बली मल्ल है जिससे तीनों जगत् उल्लास को प्राप्त हुए हैं । वह मन्त्री मानों सूर्य है जिसके उदय होने से त्रिलोकीरूपी कमलों की खानि विकाश को प्राप्त होती है और जिसके लय होने से जगतरूपी कमल लय हो जाते हैं । हे पुत्र ! यदि उसके जीतने की तुझको शक्ति है तब तो तू पराक्रमवान् है और यदि मोह से रहित एकत्रबुद्धि हो उनमें से एक को जीत सकेगा तब तू धैर्यवान् है और तेरी सुन्दर वृत्ति है क्योंकि उसके जीतने जो से नहीं जीता उस पर भी जीत पाता है और जो उसको नहीं जीता पर और और लोक सब जीते हैं तो भी जीते अजीत हो जावेंगे । इस कारण जो तू अनन्त सुख चाहता है तो जो नित्य अविनाशी है उसके जीतने के निमित्त यत्न से स्थित हो और बड़े कष्ट और चेष्टा करके भी उसको वश कर । देवता, दैत्य, यक्ष, मनुष्य

उपशम प्रकरण । ६१५

महासर्प और किन्नरों संयुक्त अति बली हैं तो भी सब ओर से यत्न करने से वश होते हैं । इससे उसको वश कर ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बलिवृत्तान्तविरोचनगाथानाम त्रयोविंशतितमसर्गः ॥ २३ ॥

बलि ने पूछा, हे भगवन् ! किस उपाय से वह जीता जाता है और ऐसा महावीर्यवान् मन्त्री कौन है और राजा कौन है ? यह वृत्तान्त सब मुझको शीघ्र ही कहिये कि उपाय करूँ । विरोचन बोले, हे पुत्र ! स्थित हुआ भी त्यागने योग्य है । ऐसा मन्त्री जिस उपाय से जीतीये सो भली प्रकार कहता हूँ सुन । उस युक्ति के ग्रहण करने से शीघ्र ही वश होता है, युक्ति बिना नाश नहीं होता । जैसे बालक को युक्ति से वश करते हैं तैसे ही जो पुरुष युक्ति से उस मन्त्री को वश करता है उसको राजा का दर्शन होता है और उससे परमपद पाता है । जब राजा का दर्शन होता है तब मन्त्री वश हो जाता है और उस मन्त्री के वश करने से फिर राजा का दर्शन होता है जब तक राजा को न देखा तब तक मन्त्री वश नहीं होता और जब तक मन्त्री को वश नहीं किया तब तक राजा का दर्शन नहीं होता । राजा के देखे बिना मन्त्री का जीतना कठिन है और मन्त्री के जीते बिना राजा को देखना कठिन है । इस कारण दोनों का इकट्ठा अभ्यास कर । राजा का दर्शन और मन्त्री का जीतना अपने पुरुष प्रयत्न और शनैःशनैः अभ्यास से होता है और दोनों के सम्पादन से मनुष्य शुभता को प्राप्त होता है । जब तू अभ्यास करेगा तब उस देश को प्राप्त होगा, यह अभ्यास का फल है । हे दैत्यराज ! जब उसको पावेगा तब रञ्चक भी शोक तुमको न रहेगा और सब यत्नों से शान्त होकर नित्य प्रफुल्लित और प्रसन्न रहेगा । जो साधुजन हैं वे सब संशयों से रहित उस देश में स्थित होते हैं । हे पुत्र ! सुन, वह देश अब मैं तुझसे प्रकट करके कहता हूँ । देश नाम मोक्ष का है जहाँ सब दुःख नष्ट हो जाते हैं और राजा उस देश का आत्म भगवान् है जो सब पदों से अतीत है । उस महाराज ने मन्त्री मन को किया है सो मन परिणाम को पाकर सर्व ओर से विश्वरूप हुआ है । जैसे मृत्तिका का पिण्ड घट-

६१६योगवाशिष्ठ ।

भाव को प्राप्त होता है और जैसे धूम्र बादल को धरता है तैसे ही मन ने विश्वरूप धरा है । उस मन को जीतने से सब विश्व जीत जाता है । मन का जीतना कठिन परन्तु युक्ति से वश होता है । बलि ने पूछा हे भगवन् ! उस मन के वश करने की युक्ति मुझसे कहिये । विरोचन बोले, हे पुत्र ! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के रस की सर्वदा सब ओर से आस्था त्यागना अर्थात् नाशवन्त और भ्रमरूप जानना, यही मन के जीतने की परम युक्ति है । मनरूपी हाथी विषयरूपी मद से मस्त है वह इस युक्ति से शीघ्र ही दमन हो जाता है । यह युक्ति कठिन है और अति दुःख से प्राप्त होती है परन्तु अभ्यास से सुलभ ही प्राप्त हो जाती है । ब्रह्म के अभ्यास किये से और विरक्तता से यह युक्ति सब ओर से प्रकट होती है-जैसे रसवान् पृथ्वी में लता उपजती है तैसे ही जो जो शठ जीव हैं इसकी वाञ्छा करते हैं परन्तु अभ्यास बिना उन्हें नहीं प्राप्त होती और अभ्यासवान् को प्रकट होती है । इससे तुम भी अभ्यास सहित युक्ति का आश्रय करो । जब तक विषयों से विरक्तता नहीं उपजती तब तक संसाररूपी वन के दुःखों में भ्रमना है, पर विषयों से विरक्तता अभ्यास बिना किसी को नहीं प्राप्त होती । जैसे अभ्यास बिना नहीं पहुँचता तैसे ही जब आत्मा ध्येय को पुरुष निरन्तर धरता है तब अभ्यासवान् की वृत्ति विषयों में अमंत होती है । जैसे जल के अभ्यास से बेलि को सींचते हैं तब लता वृद्धि होती है, ऐसे ही पुरुषार्थ से सब कार्यों की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं होती । यह निश्चय किया है कि जो क्रिया आपही करिये उसका फल अवश्य प्राप्त होता है । वही पुरुषार्थ कहाता है । जो अवश्य होना है उसकी जो नीति है वह दूर नहीं होती उसे ही दैवशब्द कहिये वा नीति कहिये पर अपने ही पुरुषार्थ का फल पाता है-जैसे मरुस्थल में भ्रम से जल भासता है और सम्यक्‌ज्ञान से भ्रम निवृत्त हो जाता है । इस दैव और नीति को अपने पुरुषार्थ से जीतो । जैसा पुरुषार्थ में सङ्कल्प दृढ़ करता है वैसा ही भासता है । जैसे आकाश को नीलता ग्रहण करती है पर वह नीलता कुछ है नहीं, तैसे ही सुख दुःख देनेवाला और कोई नहीं, जैसा सङ्कल्प करता

उपशम प्रकरण । ६१७

है वैसा ही सो मानता है और जैसी नीति होती है तैसा ही संकल्प करता है उसी नीति से मिलकर कदाचित् कर्म करता है तो उससे इस जगत्-कोश में जीव शरीर धारकर फिरता है--जैसे आकाश में पवन फिरता है पर वह कदाचित् नीति सहित और कदाचित् नीति से रहित फिरता है; तैसे ही दोनों नीतियाँ मन में होती हैं। आकाशरूपा मन में नीति अनीतिरूपा वायु फिरता है इस कारण, जब तक मन है तब तक नीति है और देव है ! मन से रहित न नीति है, न देव है, मन के अस्त हुए जो है वही रहता है, तैसे ही पुरुषार्थ करके जैसा सङ्कल्प इस लोक में दृढ़ होता है सो कदाचित् अन्यथा नहीं होता । हे पुत्र ! अपने पुरुषार्थ बिना यहाँ कुछ सिद्ध नहीं होता. इससे परम पुरुषार्थ करके विषय से विरक्त हो । जब तक विरक्तता नहीं उपजती तब तक परम सुख के देने-वाली मोक्षपदवी और (संसारभय का नाशकर्त्ता) ज्ञान नहीं प्राप्त होता । जब तक विषयों में प्रीति है तब तक सांसारिक दशा डोलायमान करती है, दुःखदायक होती है और सर्प की नाईं विष फैलाती है, अभ्यास किये बिना निवृत्त नहीं होती। फिर बलि ने पूछा कि हे सब असुरों के ईश्वर ! चित्त में भोगों से विरक्तता कैसे स्थिति होती है, जो जीवों की दीर्घ जीने का कारण है ? विरोचन बोले, हे पुत्र ! जैसे शरत्काल की महालता में फूल से फल परिपक्व होता है तैसे ही आत्मावलोकन करने वाले पुरुष को भोगों में विरक्तता प्रकट होती है। आत्मा के देखने से विषयों की प्रीति निवृत्त हो जाती है और हृदय में शान्ति प्राप्त होती है । जैसे कमलों में शोभा होती है तैसे ही श्रीलक्ष्मी स्थित होती है । इससे सूक्ष्मबुद्धि विचारवेत्ता जैसे आत्मदेव को देखकर विषयों की प्रीति त्यागते हैं ऐसे तुम भी त्यागो । प्रथम दिन के दो भाग देह के कार्य करो एक भाग शास्त्रों का श्रवण विचार करो और एक भाग गुरु की सेवा करो । जब कुछ विचार संयुक्त मन हो तब दो भाग वैराग्य संयुक्त शास्त्रों को विचारे और दो भाग ध्यान और गुरु के पूजन में रहो । इस क्रम से जीव ज्ञानकथा के योग्य होता है और क्रम से निर्मल भाव को ग्रहण करना है तब शनैः शनैः उत्तम

६१ = योगवाशिष्ठ ।

पद की भावना होती है । इस प्रकार शास्त्रों के अर्थ विचार में चित्तरूपी बालक को पर्चावौ । जब परमात्मा में ज्ञान प्राप्त होता है तब कर्म फाँसी से छूट जाता है । जैसे चन्द्रमा के उदय हुए चन्द्रकान्तिमणि द्रवीभूत होता है तैसे ही वह शीतल हो विराजता है । बुद्धि के विचार से सर्वदा सम और आत्मदृष्टि देखनी और तृष्णा का बन्धन त्यागना यह परस्पर कारण है । परमात्मा के देखने से तृष्णा दूर हो जाती है और तृष्णा के त्याग से आत्मा का दर्शन होता है । जैसे नौका को केवट ले जाता है और नौका केवट को ले जाती है तैसे ही परमात्मा का दर्शन होता है और भोगों का त्याग होता है । परब्रह्म में जो अत्यन्त विश्रान्ति नित्य उदय होती है सो मोक्षरूप आनन्द उदय होता है उसका अभाव कदाचित् नहीं होता । जीवों को आनन्द आत्मविश्रान्ति के सिवा न तपों से प्राप्त होता है न दानों से प्राप्त होता है और न तीर्थों में प्राप्त होता है। जब आत्मस्वभाव का दर्शन होता है तब भोगों से विरक्तता उपजती है, पर आत्मस्वभाव का दर्शन अपने प्रयत्न बिना और किसी युक्ति से नहीं प्राप्त होता है । हे पुत्र ! भोगों के त्याग करने और परमार्थ दर्शन के यत्न करने से ब्रह्मपद में विश्रान्त और परमानन्द मोक्ष को प्राप्त होता है । ब्रह्मा से आदि काष्ठपर्यन्त को इस जगत में ऐसा आनन्द कोई नहीं जैसा परमात्मा में स्थित हुए मे है । इससे तुम पुरुष प्रयत्न का आश्रय करो और दैव को दूर से त्यागो । इस मार्ग के रोकनेवाले भोग हैं, उनकी निन्दा बुद्धिमान करते हैं । जब भोगों की निन्दा दृढ़ होती है तब विचार उपजता है—जैसे वर्षाकाल गये से शरत्काल की सब दशा निर्मल हो जाती है तैसे ही भोगों की निन्दा से विचार और विचार से भोगों की निन्दा परस्पर होती है जैसे समुद्र की अग्नि से धूम्र उदय होता है और बादलरूप हो वर्षाकर फिर समुद्र को पूर्ण करता है और जैसे मित्र आप से परस्पर कार्य सिद्ध कर देते हैं । इसमें प्रथम तो दैव का अनादर करो और पुरुष प्रयत्न करके दाँतों में दाँतों को पीसकर भोगों की प्रीति त्यागो और फिर पुरुषार्थ से प्रथम अविरोध उपजाओ और उसको भगवान् के अर्पण करो और भोगों में असंग होकर उनकी निन्दा करो तब विचार

उपशम प्रकरण ।

६१६

उपजेगा । फिर शास्त्रज्ञान को संग्रह करो तब परमपद की प्राप्ति होगी । हे दैत्यराज ! समय पाकर जब तू विषयों से विरक्त चित्त होगा तब विचार के वश से परमपद पावेगा । अपने आपमें जो पावनपद है उसमें तब भली प्रकार अत्यन्त विश्राम पावेगा और फिर कल्पना दुःख में न गिरेगा । देशाचार के कर्म से अल्पधन उपजाना फिर उसे साधु के सङ्ग में लगाना । उनके सङ्ग में वैराग्य और विचार संयुक्त हुए तुझको आत्मलाभ होगा ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपाख्याने चित्तचिकित्सोपदेशो नाम चतुर्विंशतितमसर्गः ॥ २४ ॥

बलि ने विचार किया कि इस प्रकार मुझसे पूर्व पिता ने कहा था । अब में स्मृति दृष्टि से प्रसन्न हुआ हूँ और भोगों से विरक्तता उपजी है कि इसलिये शान्त और सम, निर्मल, अमृतरूपी, शीतल सुख में स्थित होऊँ । धन एकत्र होता है और नाश हो जाता है फिर आशा उपजती है और फिर धन से पूर्ण होता है, फिर स्त्रियों की वाञ्छा उपजती है और फिर उन्हें अङ्गीकार करता है। अब मैं विभूति की स्थिति से खेदवान् हुआ हूँ । अहो, आश्चर्य है कि इस रमणीय पृथ्वी से अब मैं सम शीललचित्त होता हूँ और दुःख सुख से रहित सर्व शान्ति को प्राप्त होता हूँ। जैसे चन्द्रमा के मण्डल में स्थित हुआ सम शीतल होता है तैसे भीतर से में हर्षवान् और शीतल होता हूँ । दुःखरूपी विभूति ऐश्वर्य से रहित हो अब में अक्षोभ हूँगा । यह सब मनरूपी बालक की दिन-दिन प्रति कला है । प्रथम में स्त्री से चिपटता था फिर मोह से मेरी प्रीति बढ़ गई थी, जो कुछ दृष्टि से देखने योग्य था वह मैंने देखा है, जो कुछ भोगने योग्य था वह चिरकालपर्यन्त अखण्ड भोगा है और सर्वभूतजातों को वश कर रहा हूँ पर उनसे क्या शोभनीय हुआ । फिर फिर उनमें वही चेष्टा मे और और देखे, इससे चित्त अपूर्व पदार्थ को नहीं देखता फिर फिर जगत् के वही पदार्थ हैं । इसमें अपनी बुद्धि से इनका निश्चय त्यागकर पूर्ण समुद्रवत् अपने आपसे आपमें स्वच्छ, स्वस्थ और स्थित हूँ । पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग में, जो स्त्री और रत्न, पन्नगादिक सार हैं वे भी तुच्छ हैं, समय पाकर उन्हें काल ग्रस लेता

६२० | योगवासिष्ठ ।

है । इतने काल पर्यन्त मैं बालक था और तुच्छ पदार्थ मन के रचे हुए हैं उनमें आसक्त होकर देहियों के साथ द्वेष करता था । उन दुःखों के त्यागने में क्या अनर्थ होगा ? बड़ा कष्ट है कि मैंने निरकाल अनर्थ में अर्थबुद्धि की थी, अज्ञानरूपी मद से मतवाला था और चञ्चल तृष्णा से इस जगत् में क्या नहीं किया । जो कार्य पीछे ताप बढ़ाते हैं वही मैंने किये हैं पर अब पूर्व तुच्छ चिन्ता से मुझको क्या है । वर्तमान चिकित्सा पुरुषार्थ से सफल होगी । जैसे समुद्र मथने से अमृत प्रकट भया है तैसे ही अपरिमित आत्मा की भावना से अब सब ओर से सुख होगा । मैं कौन हूँ, और आत्मा के दर्शन की युक्ति गुरु से पूछूँगा । इसलिये अब मैं अज्ञान के नाशनिमित्त शुक्र भगवान् का चिन्तन करूँ, वह जो प्रसन्न होकर उपदेश करेंगे उससे अनन्त वैभव अपने आपमें आपसे स्थित होगा और निष्काम पुरुषों का उपदेश मेरे हृदय में फैलेगा ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बलिचिन्तासिद्धान्तोपदेशं नाम पञ्चविंशःसर्गः ॥ २५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार चिन्तन करके बलि ने नेत्रों को मूँदा और शुक्रजी जिनका आकाश में मन्दिर है और जो सर्वत्र पूर्ण चिन्मात्र तत्त्व के ध्यान में स्थित हैं आवाहनरूप ध्यान किया, और शुक्रजी ने जाना कि हमारे शिष्य बलि ने हमारा ध्यान किया है । तब चिदात्मस्वरूप भार्गव अपनी देह वहाँ ले आये जहाँ गृह के भगोख में बलि बैठा था और बलि उज्ज्वल प्रभाववाले गुरु को देखकर उठा और जैसे सूर्यमुखी कमल सूर्य को देखकर प्रफुल्लित होते हैं तैसे ही उसका चित्त प्रफुल्लित हो गया । तब उसने रत्न अर्घ्य पुष्पों से चरण वन्दना की और रत्नों में अर्घ दिया और बड़े सिंहासन पर बैठाकर कहा, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से मेरे हृदय में जो प्रतिभा उठती है वह स्थिर होकर मुझको प्रश्न में लगाती है अब में उन भोगों से जो मोह के देनेवाले हैं विरक्त हुआ हूँ और तत्त्वज्ञान की इच्छा करता हूँ जिसमें महामोह निवृत्त हो । इस ब्रह्माण्ड में स्थिर वस्तु कौन है और इसका कितना प्रमाण है ? इदं क्या है और अहं क्या है ? मैं कौन हूँ, तुम

उपशम प्रकरण । ६२१

कौन हो और यह लोक क्या है ? इन प्रश्नों का उत्तर कृपा करके कहिये । शुक्र बोले, हे दैत्यराज ! बहुत कहने में क्या है, मैं आकाश में जाना चाहता हूँ उसमें सबका सार संक्षेप से में तुमसे कहता हूँ सो सुनो । जो चेतन तत्त्व विस्तृतरूप है वही चिन्मात्र है और चेतन ही व्यापक है । तू भी चेतनस्वरूप है, मैं भी चेतन हूँ और यह लोक भी चेतनरूप है । यही सबका सार है । इस निश्चय को हृदय में दृढ़कर धारोगे तब निर्मल निश्चयात्मकबुद्धि में अपने को आपसे देखोगे और उसमें विश्रान्तिमान् होगे । हे राजन् ! यदि तुम कल्याणमूर्ति हो तो इतने कहने में सब सिद्धान्त को प्राप्त होगे और सबका सार जो चिदात्मा है उसको पाओगे और यदि कल्याणमूर्ति नहीं हो तो फिर कहना भी निरर्थक होता है । चेतन को जो चेत्यकला का सम्बन्ध है वही बन्धन है । इससे जो मुक्त है वही मुक्त है । आत्मतत्त्व चेतन रूप चेत्यकल्पना से रहित है । यह सब सिद्धान्तों का संग्रह है । हे राजन् ! इस निश्चय को धारो और निर्मलबुद्धि से अपने आपसे आपको देखो, यही आत्म-पद की प्राप्ति है । सप्तऋषियों से देवताओं का कोई कार्य है उस निमित्त में अब आकाश जाता हूँ । जब तक यह देह है तब तक मुक्तबुद्धि को यथाप्राप्त कार्य त्यागने योग्य नहीं । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे कहकर शुक्र बड़े वेग से आकाश में चले और जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर लीन हो जावे तैसे ही शुक्रजी अन्तर्धान हो गये ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे बल्युपदेशो नाम षट्त्रिंशत्सर्गः ॥ ३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! देवता और दैत्यों के पूजने योग्य शुक्र के गये से बलवानों में श्रेष्ठ मन में विचारने लगा कि भगवान् शुक्रजी यह क्या कह गये कि त्रिलोकी चिन्मात्ररूप है, मैं भी चेतन हूँ, दिशा भी चेतनरूप है, परमार्थ में आदि जो सत्यस्वरूप है वह भी चेतन है उसमें भिन्न नहीं, यह जो सूर्य है उसमें चेतन होने से ही सूर्यत्वभाव भासता है और यह जो भूमि है उसको चेतन न चेते तो इसमें भूमित्व भाव नहीं । वह जो दशों दिशा हैं यदि इनको चेतन न चेते तो दिशा में दिशान्वभाव न रहे, पर्वत में पर्वतता भी चेतन बिना नहीं ।

६२२ योगवाशिष्ठ।

इस जगत् में जगत्भाव आकाश में आकाशता, शरीर में लक्षण भी चेतन बिना न पाइयेगा, इन्द्रियाँ भी चेतन हैं, मन भी चेतन है, भीतर बाहर सब चेतन है और चिदात्मा ही अहं त्वं भावरूप होकर स्थित है। चेतन में हूँ, सब इन्द्रियों संयुक्त विषयों का स्पर्श में करता हूँ और कदा- चित् कुछ नहीं किया। काष्ठ लोष्टतुल्य शरीर में मेरा क्या है? में तो सम्पूर्ण जगत् में आत्मा चेतन हूँ, आकाश में भी एक में आत्मा हूँ। सूर्य और भूत, पिञ्जर, देवता, दैत्य और स्थावरजङ्गम सबका चेतन आत्मा एक अद्वैत चेतन है और द्वैतकल्पना नहीं। सब, यदि इस लोक में द्वैत का असम्भव है तो शत्रु कौन है और मित्र किसको कहिये? जिस शरीर का नाम बलि है उसका शिर काटा तो आत्मा का क्या काटा? सब लोगों में आत्मा पूर्ण है पर जब चित्त दुःख चेतता है तब दुखी होता है चेतने बिना दुःख नहीं पाता। इस कारण जो दुःख- दायक भाव-अभाव पदार्थ भासते हैं वे सर्व आत्मरूप हैं चेतन तत्त्व से भिन्न कुछ नहीं। सब ओर से आत्मा पूर्ण है, आत्मा से भिन्न जगत् का कुछ व्यवहार नहीं। न कोई दुःख है, न कोई रोग है, न मन है, न मन की वृत्ति है, एक शुद्ध चेतनमात्र आत्मतत्त्व है और विकल्प कल्पना कोई नहीं। सब ओर से चेतन स्वरूप, व्यापक, नित्य, आनन्द, अद्वैत सबसे अतीत और अंशाशाभाव से रहित चेतनसत्ता व्यापक है। चेतन आदिक नाम से भी में रहित हूँ, वे चेतन आदिक नाम भी व्यवहार के निमित्त कल्पे हैं। चेतन जो आत्मा की स्फुरणशक्ति है वही विस्तार में जगद्रूप होकर भासती है, द्रष्टा, दर्शन मुक्त केवल अद्वैत- रूप है और प्रकाश प्रकाशभाव से रहित निगभास द्रष्ट परमेश्वर रूप हूँ। न में कर्त्ता हूँ और न भोक्ता हूँ, में केवल द्रष्टा निगमयरूप कल्पना कलङ्क से रहित हूँ। इनसे परे हूँ और यह स्वरूप भी में हूँ। यह मेरे में आभासमात्र है और में उदित नित्य और आभास में भी रहित एक प्रकाशरूप हूँ। स्वरूप होने से मेरा चित्त दृश्य के राग से रहित मुक्तरूप है। प्रत्यक्ष चेतन जो मेरा स्वरूप है उसको नमस्कार है। चित्त दृश्य से रहित हूँ और युक्ति अयुक्ति सबका प्रकाशस्वरूप में हूँ, मुझको नम-