योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
७२ | योगवाशिष्ठ ।
है वैसे चित्त भी स्थिर नहीं होता, विषय की ओर सदा धावता है। इससे आप वही उपाय कहिये जिससे चित्त स्थिर हो। संसाररूपी वन में भोगरूपी सर्प रहते हैं और जीव को काटते हैं उनसे बचने का उपाय कहिये। जितनी क्रिया हैं वे राग-द्वेष के साथ मिली हुई हैं, इससे वही उपाय कहिये जिसमें रागद्वेष का प्रवेश न हो और संसारसमुद्र में पड़ के तृष्णारूपी जल का स्पर्श न हो। और ऐसा उपाय भी कहिये जिसमें रागद्वेष का स्पर्श न हो। मन में जो मनरूपी मत्ता है वह युक्ति से दूर होती है, अन्यथा दूर नहीं होती। उसकी निवृत्ति के अर्थ आप मुझसे युक्ति कहिये और आगे जिसको जिस प्रकार निवृत्ति हुई है और जिस प्रकार आपके अन्तःकरण में शीतलता हुई वह कहिये। हे मुनीश्वर ! जैसे आप जानते हैं सो कहिये और जो आपने ही वह युक्ति नहीं पाई तब मैं तो कुछ नहीं जानता। सब त्यागकर निरहंकार हो रहूँगा और जब तक वह युक्ति मुझको न प्राप्त होगी तब तक मैं भोजन जलपान और स्नानादिक क्रिया और किसी सम्पदा और आपदा का कार्य न करूँगा, निरहंकार होऊँगा। यह न मेरी देह है, न में देव हूँ, सब त्याग के बैठा रहूँगा। जैसे कागज के ऊपर मूर्ति चित्रित होती है वैसे ही हो रहूँगा। श्वास आत जाने आप ही क्षीण हो जायेंगे। जैसे तेल बिना दीपक बुझ जाता है वैसे ही अनर्थवान् देह निर्वाण हो जायगा तब महाशान्ति पाऊँगा। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! ऐसे कहकर रामजी चुप हो रहे। जैसे बड़े मेघ को देखके मोर शब्द करके चुप हो जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे अनन्यत्यागदर्श- नन्नाम षड्विंशतितमस्सर्गः ॥ २६ ॥
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले हे पुत्र ! जब इस प्रकार रघुवंशरूपी आकाश के रामचन्द्ररूपी चन्द्रमा बोले तब सब मौन हो गये और सब के रोम खड़े हो गये, मानों रोम भी खड़े होकर रामजी के वचन सुनते हैं और सभा में जितने बैठे थे वे सब निर्वासनारूपी अमृत के समुद्र में मग्न हो गये। वशिष्ठ, वामदेव, विश्वामित्र आदि जो मुनीश्वर थे और दृष्टि
वैराग्य प्रकरण । ७३
आदिक मन्त्री, राजा दशरथ और मण्डलेश्वर, चाकर, नौकर और माता कौशल्या आदिक सब मौन हो गये-अर्थात् अचल हो गये। पिंजड़े में जो तोते और बगीचे में पशु आदि थे, जो पक्षी आलय में बैठे थे वे भी सुन कर मौन हो गये। आकाश के पक्षी जो निकट थे वे भी स्थिर हो गये और आकाश में देव, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नर भी आके सुनने और फूलों की वर्षा करने तथा सब धन्य-धन्य शब्द करने लगे। उस समय फूलों की ऐसी वर्षा हुई मानो बर्फ की वर्षा होती है, और क्षीरसमुद्र के तरङ्ग उछलते आते थे मानो मोती की माला की वृष्टि होने लगी। जैसे माश्विन के पिंग उड़ते हैं इस प्रकार आधी घड़ी पर्यन्त फूलों की वर्षा हुई और बड़ी सुगन्ध फैली। फूलों पर भँवरे फिरने लगे और बड़ा बिलास उस काल में हुआ। सब "नमोनमः" शब्द करने लगे और देव बोले हे कमल नयन, रघुवंशी ! आकाश में चन्द्रमारूप तुम धन्य हो तुमने बड़े श्रेष्ठ स्थान देखे हैं और बहुत प्रकार के वचन सुने हैं। जैसे तुमने वचन कहे हैं वैसे हमने कभी नहीं सुने। यह वचन सुनके हमारा जो देवताओं का अभिमान था सो सब निवृत्त हो गया और अमृत रूपी वचन सुनकर हमारी बुद्धि पूर्ण हो गई। हे रामजी ! जैसे वचन तुमने कहे हैं ऐसे बृहस्पति भी नहीं कह सकते। तुम्हारे वचन परमानन्द के करनेवाले हैं इससे तुम धन्य हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे सिद्धसमाजवर्णनन्नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ॥ २७ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! सिद्ध ऐसे वचन कहके विचारने लगे कि रघुवंश का कुल पूजने योग्य है, जिससे रामजी ने बड़े उदार वचन मुनीश्वर के सम्मुख कहे हैं। अब जो मुनीश्वर उत्तर देंगे वह भी सुनना चाहिए। जैसे फूल के ऊपर भँवरा स्थिर होता है वैसे ही व्यास, नारद, पुलह, पुलस्त्य आदि सब साधु सभा में स्थित हुए तब वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि मुनीश्वर उठ खड़े हुए और उनकी पूजा करने लगे। पहिले राजा दशरथ ने पूजा की और फिर नाना प्रकार से सबने उनकी पूजा की और यथायोग्य आसन के ऊपर बैठे। उनमें नारदजी हाथ में बहुत
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सुन्दर बीणा लिये और श्याममूर्ति व्यासजी नाना प्रकार के रंग से रञ्जित वस्त्र पहिने हुए मानो तारागणों में महाश्यामघटा आई है विराजमान थे। ऐसे ही दुर्वासा, वामदेव, पुलह, पुलस्त्य, बृहस्पति के पिता अङ्गिरा, भृगु और में भी वहाँ था और ब्रह्मर्षि, राजर्षि, देवर्षि, देवता, मुनीश्वर सब आके उस सभा में स्थित हुए। किसी की बड़ी जटा, कोई मुकुट पहिरे, कोई रुद्राक्ष की माला और कोई मोती की माला पहिने थे, किसी के कण्ठ में रत्न की माला और हाथ में कमण्डलु और मृगछाला, किसी के महासुन्दर वस्त्र, किसी की कटि पे कौपीन और किसी की कटिपे सुवर्ण की जंजीर थी। ऐसे बड़े-बड़े तपस्वी जो वहाँ आके बैठे थे उनमें कोई राजसी और कोई सात्त्विक स्वभाव के थे और सब विद्वान वेद के पढ़नेवाले प्राप्त हुए। कोई सूर्यवत्, कोई चन्द्रमावत् कोई तारावत् कोई रत्नवत् प्रकाशमान और पुरुषार्थ पर यत्न करने वाले यथायोग्य आसन पर स्थित हुए। मोहनीमूर्ति और दीन स्वभाववाले रामजी भी हाथ जोड़ के सभा में बैठे और उनकी सब पूजाकर कहने लगे कि हे रामजी! तुम धन्य हो। नारद सबके सम्मुख कहने लगे कि हे रामजी! तुमने बड़े विवेक और वैराग्य के वचन कहे जो सबको प्यारे लगे और सबके कल्याण करनेवाले और परम बोध के कारण हैं। हे रामजी! तुम बड़े बुद्धिमान और उदारात्मा दृष्टि आने हो और महावाक्य का अर्थ तुमसे प्रकट होता है। ऐसे उज्ज्वलपात्र साधु और अनन्त तपस्वियों में कोई विरला होता है। जितने मनुष्य हैं वे सब पशु से दृष्टि आने हैं, क्योंकि जिसको संसार समुद्र के पार होने की इच्छा है और जो पुरुषार्थ पर यत्न करता है वही मनुष्य है। हे साधो! वृक्ष तो बहुत होते हैं, परन्तु चन्दन का वृक्ष कोई होता है वैसे ही शरीर धारी बहुत हैं परन्तु ऐसा विद्वान कोई विरला ही होता है और सब अस्थि मांस रुधिर के पुतले से मिले हुए भटकते फिरते हैं। जैसे तन्त्र की पुतली होती है वैसे ही अज्ञानी जीव हैं। हाथी तो बहुत हैं परन्तु विरले के मस्तक से मोती निकलता है वैसे ही मनुष्य तो बहुत हैं; परन्तु पुरुषार्थ पर यत्न करनेवाला कोई विरला ही होता है। जैसे वृक्ष बहुतेरे हैं परन्तु लवङ्ग का वृक्ष कोई विरला ही होता
वैराग्य प्रकरण । ७५
है वैसे ही मनुष्य बहुत हैं, परन्तु ऐसा कोई विरला ही होता है। ऐसे पात्र से थोड़ा अर्थ कहा भी बहुत हो जाता है। जैसे तेल की बूंद थोड़े ही जल में डालिये तो फैल जाती है वैसे ही थोड़े वचन तुम्हारे हिये में बहुत होते हैं। तुम्हारी बुद्धि बहुत विशेष है और दीपक सी प्रकाश-वाली और बोध का परम पात्र है। कहने मात्र से ही तुमको शीघ्र ज्ञान होवेगा और जो हमारे सामने तुमको ज्ञान न हो तो जानना कि हम सब मूर्ख बैठे हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे मुनिसमाजवर्णनन्नामा-ष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
समाप्तमिदं वैराग्यप्रकरणम् ॥
श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीयोगवाशिष्ठ
द्वितीय मुमुक्षु प्रकरण प्रारम्भ ।
वाल्मीकिजी बोले, हे साधो ! ये वचन परमानन्दरूप हैं और कल्याण के कर्त्ता हैं इनमें सुनने की प्रीति तब उपजती है जब अनेक जन्म के बड़े पुण्य इकट्ठे होते हैं। जैसे कल्पवृक्ष के फल को बड़े पुण्य से पाते हैं वैसे ही जिसके बड़े पुण्यकर्म इकट्ठे होते हैं उसकी प्रीति इन वचनों के सुनने में होती है—अन्यथा नहीं होती। ये वचन परमबोध के कारण हैं। वैराग्यप्रकरण के एक सहस्र पाँचसौ श्लोक हैं। हे भरद्वाज ! इस प्रकार जब नारदजी ने कहा तब विश्वामित्र बोले कि हे ज्ञानवानों में श्रेष्ठ, रामजी ! जितना कुछ जानने योग्य था सो तुमने जाना है इसमें अब तुम्हें जानना और नहीं रहा, पर उसमें विश्राम पाने के लिये कुछ मार्जन करना है। जैसे अशुद्ध आदर्श की मलीनता दूर करने से मुख स्पष्ट भासता है वैसे ही कुछ उपदेश की तुमको अपेक्षा है। हे रामजी ! आपकी के सदृश भगवान् व्यासजी के पुत्र शुकदेवजी हुए हैं। वह भी बड़े बुद्धिमान् थे, उन्होंने जो जानने योग्य था सो जाना था, पर विश्राम के निमित्त उनकी भी अपेक्षा थी सो विश्राम को पाकर शान्त हुए थे। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! शुकजी कैसे बुद्धिमान् और ज्ञानवान् थे और कैसी विश्राम की अपेक्षा उनकी थी और फिर कैसे उन्होंने विश्राम पाया सो कृपा करके कहो ? विश्वामित्रजी बोले हे रामजी ! अञ्जन के पर्वत के समान और सूर्य के सदृश प्रकाशवान् भगवान् व्यासजी स्वर्ण के सिंहासन पर राजा दशरथ के यहाँ बैठे थे। उनके पुत्र शुकजी सब शास्त्रों के वेत्ता थे। और सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानते थे। उन्होंने शान्ति और परमानन्दरूप आत्मा में विश्राम न पाया तब उनको विकल्प उठा कि जिसको मैंने जाना है सो न होगा। क्योंकि मुझको आनन्द नहीं भासता। यह संशय करके एक काल में व्यासजी जो सुमेरु पर्वत की कन्दरा में
मुमुक्षु प्रकरण । ७७
बैठे थे तिनके निकट आकर कहने लगे, हे भगवन् ! यह संसार सब असदात्मक कहाँ से हुआ है; इसकी निवृत्ति कैसे होगी और आगे कभी इसकी निवृत्ति हुई है सो कहो ? हे रामजी ! जब इस प्रकार शुकजी ने कहा तब विशुद्धदर्शिरोमणि वेदव्यासजी ने तत्काल उपदेश किया । शुकजी ने कहा, हे भगवन् ! जो कुछ तुम कहते हो वह तो मैं आगे से ही जानता हूँ, इससे मुझको शान्ति नहीं होती । हे रामजी ! तब सर्वज्ञ वेदव्यासजी विचार करने लगे कि इसको मेरे वचन से शान्ति प्राप्त न होगी, क्योंकि पिता पुत्र का सम्बन्ध है । ऐसा विचार करके व्यासजी कहने लगे हे पुत्र ! मैं सर्वतत्त्वज्ञ नहीं, तुम राजा जनक के निकट जाओ, वे सर्वतत्त्वज्ञ और शान्तात्मा हैं, उनसे तुम्हारा मोह निवृत्त होगा । तब शुकदेवजी वहाँ से चलकर मिथिला नगरी में आये और राजा जनक के द्वार पर स्थित हुए । द्वारपाल ने जाकर जनकजी से कहा कि व्यासजी के पुत्र शुकजी खड़े हैं । राजा ने जाना कि इनको जिज्ञासा है । इसलिए कहा कि खड़े रहने दो । इसी प्रकार फिर द्वारपाल ने जा कहा और सात दिन उन्हें खड़े ही बीत गये। तब राजा ने फिर पूछा कि शुकजी खड़े हैं कि चले गये । द्वारपाल ने कहा, खड़े हैं । राजा ने कहा, आगे ले आओ । तब वे उनको आगे ले आये । उस दरवाजे पर भी वे सात दिन खड़े रहे । फिर राजा ने पूछा कि शुकजी हैं ? द्वारपाल ने कहा कि हाँ, खड़े हैं । राजा ने कहा कि अन्तःपुर में ले आओ और नाना प्रकार के भोग भुगताओ । तब वे उन्हें अन्तःपुर में लेगये । वहाँ स्त्रियों के पास भी वे सात दिन तक खड़े रहे । फिर राजा ने द्वारपाल से पूछा कि उनकी अब कैसी दशा है और आगे कैसी दशा थी ? द्वारपाल ने कहा कि आगे वे निरादर से न शोकवान् हुए थे और न अब भोग से प्रसन्न हुए, वे तो इष्ट अनिष्ट में समान हैं । जैसे मन्द पवन से मेरु चलायमान नहीं होता वैसे ही यह बड़े भोग व निरादर से चलायमान नहीं हुए, जैसे पपीहे को मेघ के जल बिना नदी और ताल आदि के जल की इच्छा नहीं होती वैसे ही उनको भी किसी पदार्थ की इच्छा नहीं है । तब राजा ने कहा उन्हें यहाँ ले आओ । जब शुकजी आये तब राजा जनक ने उठके खड़े
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को प्रणाम किया। फिर जब दोनों बैठ गये तब राजा ने कहा कि हे मुनी-
श्वर ! तुम किस निमित्त आये हो, तुमको क्या वाञ्छा है सो कहो
उसकी प्राप्ति में कर देऊँ ? श्रीशुकजी बोले हे गुरो ! यह संसार का आडम्बर
कैसे उत्पन्न हुआ और कैसे शान्त होगा सो तुम कहो ? इतना कह
विश्वामित्रजी बोले हे रामजी ! जब इस प्रकार शुकदेवजी ने कहा तब
जनक ने यथाशास्त्र उपदेश जो कुछ व्यास ने किया था सोई कहा ।
यह सुन शुकजी ने कहा कि भगवन् ! जो कुछ तुम कहते हो सोई मेरे
पिता भी कहते थे, सोई शास्त्र भी कहता है और विचार में मैं भी ऐसा
ही जानता हूँ कि यह संसार अपने चित्त से उत्पन्न होता है और चित्त के
निवेंद होने से भ्रम की निवृत्त होती है, पर मुझको विश्राम नहीं प्राप्त होता
है ? जनकजी बोले, हे मुनीश्वर ! जो कुछ मैंने कहा और जो तुम
जानते हो इससे पृथक् उपाय न जानना और न कहना ही है । यह
संसार चित्त के संवेदन से हुआ है, जब चित्त स्फुरने से रहित होता है तब
भ्रम निवृत्त हो जाता है । आत्मतत्त्वनित्य शुद्धः परमानन्दस्वरूप केवल
चैतन्य है, जब उसका अभ्यास करोगे तब तुम विश्राम पाओगे । तुम
अधिकारी हो, क्योंकि तुम्हारा यत्न आत्मा की ओर है, दृश्य की ओर
नहीं, इससे तुम बड़े उदारात्मा हो । हे मुनीश्वर ! तुम मुझको व्यासजी
से अधिक जान मेरे पास आये हो, पर तुम मुझसे भी अधिक ही, क्योंकि
हमारी चेष्टा तो बाहर से दृष्टि आती है और तुम्हारी चेष्टा बाहर से कुछ
भी नहीं, पर भीतर से हमारी भी इच्छा नहीं है । इतना कह विश्वामित्र-
जी बोले; हे रामजी ! जब इस प्रकार राजा जनक ने कहा तब शुकजी
ने निःसङ्ग निष्प्रयत्न और निर्भय होकर सुमेरु पर्वत की कन्दरा में जाय
दशसहस्र वर्ष तक निर्विकल्प समाधि की । जैसे तेल बिना दीपक निर्वाण
हो जाता है वैसे ही वे भी निर्वाण हो गये । जैसे समुद्र में बुन्द लीन हो जाती
है और जैसे सूर्य का प्रकाश सन्ध्याकाल में सूर्य के पास लीन हो जाता
है वैसे ही कलारूप कलङ्क को त्यागकर वे ब्रह्मपद को प्राप्त हुए ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे मुनिशुकनिर्वाण-
वर्णनन्नाम प्रथमस्सर्गः ॥ १ ॥
मुमुक्षु प्रकरण । ७६
विश्वामित्रजी बोले हे राजा दशरथ ! जैसे शुकजी शुद्धबुद्धि वाले थे वैसे ही रामजी भी हैं। जैसे शान्ति के निमित्त उनको कुछ मार्जन कर्तव्य था वैसे ही रामजी को भी विश्राम के निमित्त कुछ मार्जन चाहिए, क्योंकि आवरण करनेवाले जो भोग हैं उनसे इनकी इच्छा निवृत्त हुई है और जो कुछ जानने योग्य था सो जाना है। अब हम कोई ऐसी युक्ति करेंगे जिससे इनको विश्राम होगा। जैसे शुकजी को थोड़े में मार्जन से शान्ति की प्राप्ति हुई थी वैसे ही इनको भी होगी। हे राजन् ! जैसे ज्ञानवान् को आध्यात्मिक आदि दुःख स्पर्श नहीं करते वैसे ही रामजी को भी भोग की इच्छा नहीं स्पर्श करती। भोग की इच्छा सबको दीन करती है इसी का नाम बन्धन है और भोग की वासना का क्षय करना ही मोक्ष है। ज्यों ज्यों भोग की इच्छा करता है त्यों त्यों लघु होता जाता है और ज्यों ज्यों भोग वासना क्षय होती त्यों त्यों गरिष्ठ होता है। जब तक आत्मानन्द का प्रकाश नहीं होता तब तक विषय की वासना दूर नहीं होती और जब आत्मानन्द प्राप्त होता है तब विषय-वासना कोई नहीं रहती। जैसे मरुस्थल में बेलि नहीं उत्पन्न होती वैसे ही ज्ञानवान् को विषयवासना की उत्पत्ति नहीं होती। हे साधो ! ज्ञानवान् किसी फल की इच्छा से विषय भोग का त्याग नहीं करता, स्वभाव से ही उसकी विषयवासना चली जाती है। जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार का अभाव हो जाता है वैसे ही रामजी को अब किसी भोग पदार्थ की इच्छा नहीं रही। अब तो वे विदितवेद्य हुए हैं अतः विश्राम की इच्छा रखते हैं इससे जो कहो वही करूँ जिसमें वे विश्रामवान् हों। हे राजन् ! भगवान् वशिष्ठजी की युक्ति से ये शान्त होंगे और आगे में वही रघुवंशकुल के गुरु हैं। उनके उपदेश द्वारा आगे भी रघुवंशी ज्ञानवान् हुए हैं। ये सर्वज्ञ और साक्षीरूप हैं और त्रिकालज्ञ और ज्ञान के सूर्य हैं। इनके उपदेश से रामजी आत्मपद को प्राप्त होंगे। हे वशिष्ठजी ! जब हमारा तुम्हारा विरोध हुआ था और ब्रह्माजी ने मन्दराचल पर्वत पर, जो ऋषीश्वरों और अनेक वृक्षों से पूर्ण था; संसार वासना के नाश, हमारे तुम्हारे विरोध की शान्ति और
८० योगवाशिष्ठ ।
अन्य जीवों के कल्याण निमित्त जो उपदेश किया था वह तुमको स्मरण है ? अब वही उपदेश तुम रामजी को करो, क्योंकि ये भी निर्मल ज्ञान-पात्र हैं । ज्ञान, विज्ञान और निर्मलयुक्ति वही है जो शुद्धपात्र में अर्पण हो और पात्र बिना उपदेश नहीं सोहता । जिसमें शिष्यभाव और विरक्तता न हो ऐसे अपात्र मूर्ख को उपदेश करना व्यर्थ है । कदाचित विरक्त हो और शिष्यभावना नहीं तो भी उपदेश न करना चाहिये । दोनों से सम्पन्न को ही उपदेश करना चाहिये । पात्र बिना उपदेश व्यर्थ है अर्थात् अपवित्र हो जाता है । जैसे गौ का दूध महापवित्र है पर श्वान की त्वचा में डालिये तो अपवित्र हो जाता है वैसे ही अपात्र को उपदेश करना व्यर्थ है । हे मुनीश्वर ! जो शिष्य वैराग्य से सम्पन्न और उदार आत्मा है वह तुम्हारे उपदेश के योग्य है और तुम वीतराग और भय क्रोध से रहित परम शान्तरूप हो, इसलिये तुम्हारे उपदेश के पात्र रामजी हैं । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार विश्वामित्रजी ने कहा तब नारद और व्यासादिक ने साधु साधु कहा अर्थात् भला भला कहा कि ऐसे ही यथार्थ है । उस समय राजा दशरथ के पास बहुत प्रकार के साधु बैठे थे । ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठजी ने कहा कि हे मुनीश्वर ! जो कुछ तुमने आज्ञा की है वह हमने मानी । ऐसे किसी की सामर्थ्य नहीं कि सन्त की आज्ञा निवारण करे । साधो ! राजा दशरथ के जितने पुत्र हैं उन सबके हृदय में जो अज्ञानरूपी तम है वह में ज्ञानरूपी सूर्य से ऐसे निवारण करूंगा जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार दूर होता है । हे मुनीश्वर ! जो कुछ ब्रह्माजी ने उपदेश किया था वह मुझको अखण्ड स्मरण है में वही उपदेश करूंगा जिससे रामजी निःसंशय होंगे । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार वशिष्ठजी विश्वामित्र से कह रामजी से मोक्ष का उपाय कहने लगे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुनिविश्वामित्रोपदेशो नाम द्वितीयःसर्गः ॥ २ ॥
वशिष्ठजी बोले हे रामजी ! ब्रह्माजी ने मुझको जीवों के कल्याण के निमित्त उपदेश किया था वह मुझे भले प्रकार स्मरण है और वही अब में तुमसे कहता हूँ । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् !
मुमुक्षु प्रकरण । = १
कुछ प्रश्न करने का अवसर आया है । एक संशय मुझको है सो दूर करो । मोक्ष उपाय जो संहिता कहते हो सो सब सुन कहेंगे परन्तु यह जो तुमने कहा कि शुकदेवजी विदेहमुक्त हो गये तो भगवान् व्यासजी जो सर्वज्ञ थे सो विदेहमुक्त क्यों न हुए ? वशिष्ठजी बोले कि हे रामजी ! जैसे सूर्य के किरण के साथ त्रसरेणु उड़ती देख पड़ती हैं और उनकी संख्या नहीं हो सकती वैसे ही परमसूर्य के संवेदनरूपी किरण में त्रिलोकीरूप असंख्य त्रसरेणु हैं अनन्त होकर मिट जाते हैं और अनन्त होते हैं । अनन्त त्रिलोकी ब्रह्म समुद्र में हैं उनकी संख्या कुछ नहीं । श्रीरामजी ने पूछा, हे भगवन् ! पीछे जो व्यतीत हो गये हैं और आगे जो होंगे उनकी कितनी संख्या है । वर्तमान की तो मैं जानता हूँ । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अनन्त कोटि त्रिलोकी के गण उपजे और मिट गये हैं । कितने ही होते हैं और कितने ही होवेंगे । इनकी कुछ संख्या नहीं है, क्योंकि जीव असंख्य हैं और जीव जीव प्रति अपनी अपनी सृष्टि है । जब ये जीव मृतक हो जाते हैं तब उसी स्थान में अपने अन्त- वाहक संकल्परूपी पुर में इनको अपना बन्धन भासता है और उसी स्थान में परलोक भास आता है । पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश पञ्चभूत भासते हैं और नाना प्रकार की वासना के अनुसार अपनी अपनी सृष्टि भास आती है । फिर जब वहाँ से मृतक होता है तब वही फिर सृष्टि भास आती है नाम रूप संयुक्त वही जाग्रत सत्य होकर भास आती है । फिर जब वहाँ से मरता है तब इस पञ्चभूत सृष्टि का अभाव हो जाता है । और दूसरी भासती है और वहाँ के जो जीव होते हैं उनको भी इसी प्रकार अनुभव होता है । इसी प्रकार एक एक जीव की सृष्टि होती है और मिट जाती है । इनकी संख्या कुछ नहीं । तब ब्रह्मा की सृष्टि की संख्या कैसे हो ? जैसे मनुष्य घूमता है और उसको सर्व पदार्थ भ्रमते दृष्टि आते हैं; जैसे नाव में बैठे हुए नदी के वृक्ष चलते दृष्टि आते हैं; जैसे नेत्र के दोष से आकाश में मोती की माला दृष्टि आती है और जैसे स्वप्ने में सृष्टि भासती है वैसे ही जीव को भ्रम से यह लोक परलोक भासता है । वास्तव में जगत् कुछ उपजा ही नहीं, एक अद्वैत परमात्मा
८२ योगवाशिष्ठ ।
तत्त्व अपने आप में स्थित है उसमें द्वैतभ्रम अविद्या में भामता है। जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वेताल भामता है और भय पाता है वैसे ही अज्ञानी को कल्पना जगतरूप होकर भामती है। हे रामजी! व्यासजी को बत्तीस आकार से मैंने देखा है। उनमें दश एक आकार और क्रिया और निश्चयरूप हैं; दश अर्थ समान हुए हैं और बारह आकार क्रिया और चेष्टा में विलक्षण हुए हैं जैसे समुद्र में तरंगें होती हैं सो उनमें कई सम और कई विलक्षण उपजती हैं वैसे ही व्यास हुए हैं। तब जो दश हुए हैं उनमें दशवें व्यास यही हैं और आगे भी आठ बार वही होंगे और महाभारत कहेंगे। नवौं बेर बड़ा होकर विदेह मुक्त होगे। हम और वाल्मीकि, भृगु, और बृहस्पति का पिता अङ्गिरा इत्यादि भी विदेह मुक्त होवेंगे। हे रामजी! एक सम होते हैं और एक विलक्षण होते हैं। मनुष्य, देवता, तिर्यगादिक जीव कई बेर समान होते और कितनी बेर विलक्षण होते हैं। कितने जीव समान आकार आगे से कुल क्रिया सहित होते हैं। और कितने संकल्प में उड़ते फिरते। आना, जाना, जीना, मरना, स्वप्नभ्रम की भाँति दीखता है पर वास्तव में न कोई आता है, न जाता है, न जन्मता है, न मरता। यह भ्रम अज्ञान से भामता है, विचार करने में कुछ नहीं भामता। जैसे कदली का खंभ बड़ा पुष्ट दीखता है, पर यदि खोल के देखिये तो कुछ सार नहीं निकलता वैसे ही जगत-भ्रम अविचार में सिद्ध है; विचार करने से कुछ नहीं भामता। हे रामजी! जो पुरुष आत्मसत्ता में जगा है उसको द्वैतभ्रम नहीं भामता। वह आत्मदर्शी, सदा शान्त आत्मा परमानन्द स्वरूप और इच्छा से रहित है। जैसे जीवन्मुक्त को कोई चला नहीं सकता वैसे ही व्यास-देवजी को सदेहमुक्ति और विदेहमुक्ति का कुछ इच्छा नहीं, वे तो सदा अद्वैतरूप हैं। हे रामजी! जीवन्मुक्त को सर्वत्र सर्वात्मा पूर्ण भामता है। वह तो स्वरूप, सार, शान्तिरूप, अमृत में पूर्ण और निर्वाण में स्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे असंकल्पसृष्टि- प्रतिपादनन्नाम तृतीयसर्गः ॥ ३ ॥
मुमुक्षु प्रकरण । ८३
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जीवन्मुक्ति और विदेह- मुक्ति में कुछ भेद नहीं है । जैसे जल स्थिर है तो भी जल है और तरङ्ग है तो भी जल है वैसे ही जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति में कुछ भेद नहीं है । हे रामजी ! जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति का अनुभव तुमको प्रत्यक्ष नहीं भासता क्योंकि स्वमंवेद है और उनमें जो भेद भासता है सो असम्यक्- दर्शी को भासता है ज्ञानवान् को भेद नहीं भासता । हे मननकर्ताओं में श्रेष्ठ रामजी ! जैसे वायु स्पन्दरूप होती है तो भी वायु है और निस्स्पन्द होती है तो भी वायु है, निश्चय करके कुछ भेद नहीं पर और जीव को स्पन्द होती है तो भासती और निस्स्पन्द होती है तो नहीं भासती वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष को जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति में कुछ भेद नहीं, वह सदा अद्वैत निश्चयवाला और इच्छा से रहित है । जब जीव को उसका शरीर भासता है तब जीवन्मुक्ति कहते हैं और जब शरीर अदृश्य होता है तब विदेहमुक्ति कहते हैं । पर उसको दोनों तुल्य हैं । हे रामजी ! अब प्रकृत प्रसङ्ग को जो श्रवण का भूषण है सुनिये । जो कुछ सिद्ध होता है सो अपने पुरुषार्थ से सिद्ध होता है । पुरुषार्थ बिना कुछ सिद्ध नहीं होता । लोग जो कहते हैं कि दैव करेगा सो होगा यह मूर्खता है । चन्द्रमा जो हृदय को शीतल और उल्लासकर्ता भासता है इसमें यह शीतलता पुरुषार्थ से हुई है । हे रामजी ! जिस अर्थ की प्रार्थना और यत्न करे और उससे फिरे नहीं तो अवश्य पाता है । पुरुषयत्न किसका नाम है सो सुनिये । मन्तजन और सत्यशास्त्र के उपदेशरूप उपाय से उसके अनुसार चित्त का विचरना पुरुषार्थ (यत्न) है और उससे इतर जो चेष्टा है उसका नाम उन्मत्त चेष्टा है । जिस निमित्त यत्न करता है सोई पाता है । एक जीव पुरुषार्थ (प्रयत्न) करके इन्द्र की पदवी पाकर त्रिलोकी का पति हो सिंहासन पर आरूढ़ हुआ है । हे रामचन्द्र ! आत्म- तत्त्व में जो चैतन्य संवित् है सो संवेदन रूप होकर फुरती है और सोई अपने पुरुषार्थ से ब्रह्म पद को प्राप्त हुई है । इसलिए देखो जिसको कुछ सिद्धता प्राप्त हुई सो अपने पुरुषार्थ से ही हुई है । केवल चैतन्य आत्मतत्त्व है । उसमें चित्त संवेदन स्पन्दरूप है । यह चित्त संवेदन ही अपने पुरुषार्थ
=८ योगवाशिष्ठ ।
गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णुरूपी होता है और पुरुषोत्तम कहाता है और यही चित्तमंचन्दन अपने पुरुषार्थ से रुद्ररूप हो अर्द्धाङ्ग में पार्वती, मस्तक में चन्द्रमा और नीलकण्ठ परमशान्तरूप को धारण करता है इसमें जो कुछ सिद्ध होता है सो पुरुषार्थ से ही होता है । हे रामजी ! पुरुषार्थ से सुमेरु का चूर्ण किया चाहे तो वह भी कर सकता है । यदि पूर्व दिन में दुष्कृत किया हो और अगले दिन में सुकृत करे तो दुष्कृत दूर हो जाता है । जो अपने हाथ से चरणामृत भी ले नहीं सकता वह यदि पुरुषार्थ करे तो वही पृथ्वी को डगमग-डगमग करने को समर्थ होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे पुरुषार्थोपक्रमोनाम चतुर्थस्सर्गः ॥ ४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! चित्त जो कुछ वाञ्छा करता है और शास्त्र के अनुसार पुरुषार्थ नहीं करता सो सुख न पावेगा, क्योंकि उसकी उन्मत्त चेष्टा है । पौरुष भी दो प्रकार का है- एक शास्त्र के अनुसार और दूसरा शास्त्रविरुद्ध । जो शास्त्र को त्याग करके अपनी इच्छा के अनुसार विचरता है सो सिद्धता न पावेगा और जो शास्त्र के अनुसार पुरुषार्थ करेगा वह सिद्धता को प्राप्त होगा, कदाचित् दुःख न पावेगा । अनुभव से स्मरण होता है और स्मरण से अनुभव होता है, यह दोनों इसी से होते हैं । दैव तो कुछ न हुआ । हे रामजी ! और दैव कोई नहीं, उसका किया ही इसको प्राप्त होता है, परन्तु जो बलिष्ठ होता है, उसी के अनुसार विचरता है । जिसके पूर्व के संस्कार बली होते हैं उसी की जय होती है और विद्यमान पुरुषार्थ बली होता है तब उसको जीत लेता है । जैसे एक पुरुष के दो पुत्र हैं तो वह उन दोनों को लड़ाता है पर दोनों में से जो बली होता है उसी की जय होती है, परन्तु दोनों उसी के हैं वैसे ही दोनों कर्म इसके हैं जिसका पूर्व का संस्कार बली होता है उसी की जय होती है । हे रामजी ! यह जीव जो सत्संग करता है और सत्शास्त्र को भी विचारता है पर फिर भी पक्षी के समान जो संसारवृक्ष की ओर उड़ता है तो पूर्व का संस्कार बली है उससे स्थिर नहीं हो सकता । ऐसा जान कर पुरुष प्रयत्न का त्याग न करे । पूर्व के संस्कार में अन्यथा नहीं होता, परन्तु पूर्व का संस्कार बली भी हो और सत्संग करे और सत्शास्त्र का
मुमुक्षु प्रकरण । =५.
भी दृढ़ अभ्यास हो तो पूर्व संस्कार को पुरुष प्रयत्न से जीत लेता है। जैसे पूर्व के संस्कार से दुष्कृत किया है और आगे सुकृत करे तो पिछले का अभाव हो जाता है सो पुरुष प्रयत्न से ही होता है। पुरुषार्थ क्या है और उससे क्या सिद्ध होता है सो श्रवण करिये। ज्ञानवान् जो मन्न हैं और सतशास्त्र जो ब्रह्मविद्या है उनके अनुसार प्रयत्न करने का नाम पुरुषार्थ है और पुरुषार्थ से पाने योग्य आत्मा है जिससे संसारसमुद्र से पार होता है। हे रामजी ! जो कुछ सिद्ध होता है सो अपने पुरुषार्थ से ही सिद्ध होता है—दूसरा कोई देव नहीं। जो शास्त्र के अनुसार पुरुषार्थ को त्याग-कर कहता है कि जो कुछ करेगा सो देव करेगा वह मनुष्य नहीं गर्दभ है उसका संग करना दुःख का कारण है। मनुष्य को प्रथम तो यह करना चाहिये कि अपने वर्णाश्रम के शुभ आचारों को ग्रहण करे और अशुभ का त्याग करे। फिर मंतों का संग और सतशास्त्रों का विचारना और उनको विचारकर अपने गुण दोष की भी विचार करना चाहिये कि दिन और रात्रि में क्या शुभ और अशुभ किया है। आगे फिर गुण और दोषों का भी साक्षीभूत होकर जो मन्तोष, धैर्य, विराग, विचार और अभ्यास आदि गुण हैं उनको बढ़ाये और जो दोष हों उनका त्याग करे। जब ऐसे पुरुषार्थ को अङ्गीकार करेगा तब परमानन्दरूप आत्म-तत्त्व को पावेगा। इससे हे रामजी ! जैसे बन का मृग घास, तृण और पत्तों को रमीला जानके खाता है वैसे ही स्त्री, पुत्र, बान्धव, धनादि में मग्न होना चाहिये। इनसे विरक्त होना और दाँतों से दाँतों को कच-कर संसारसमुद्र के पार होने का यत्न करना चाहिये। जैसे केसरी सिंह बल करके पिंजरे में से निकल जाता है वैसे ही निकल जाने का नाम पुरुषार्थ है। हे रामजी ! जिसको कुछ सिद्धता की प्राप्ति हुई है उसे पुरुष-ार्थ से ही हुई है, पुरुषार्थ बिना नहीं होती। जैसे प्रकाश बिना किसी पदार्थ का ज्ञान नहीं होता। जिस पुरुष ने अपना पुरुषार्थ त्याग दिया है और दैव के आश्रय हो यह समझता है कि हमारा दैव कल्याण करेगा वह कभी सिद्ध नहीं होगा जैसे पत्थर से तेल निकाला चाहे तो नहीं निक्लना वैसे ही उसका कल्याण दैव से न होगा। इसलिये हे रामजी !
= ८ = | योगवाशिष्ठ ।
तुम दैव का आश्रय त्याग कर अपने पुरुषार्थ का आश्रय करो । जिसने अपना पुरुषार्थ त्यागा है उसकी सुन्दर कान्ति और लक्ष्मी त्याग जाती है । जैसे वसन्त ऋतु की मञ्जरी वसन्तऋतु के जाने से विरम हो जाती है वैसे ही उसकी कान्ति लघु हो जाती है । जिस पुरुष ने ऐसा निश्चय किया है कि हमारा पालने वाला देव है वह पुरुष ऐसा है जैसे कोई अपनी भुजा को सर्प जान भय खाके दौड़ता है और भय पाता है । पुरुषार्थ यह है कि सन्त का संग और सतशास्त्रों का विचार करके उनके अनुसार विचरे । जो उनको त्याग के अपनी इच्छा के अनुसार विचरते हैं सो सुख और सिद्धता न पावेंगे और जो शास्त्र के अनुसार विचरते हैं वह इस लोक और परलोक में सुख और सिद्धता पावेंगे । इससे संसाररूपी जाल में न गिरना चाहिये । पुरुषार्थ वही है कि सन्तजनों का संग करना और बोधरूपी कलम और विचाररूपी स्याही से सत्शास्त्रों के अर्थ हृदयरूपी पत्र पर लिखना । जब एवं पुरुषार्थ करके लिखोगे तब संसाररूपी जाल में न गिरोगे । हे रामजी ! जैसे यह पहले नियत हुआ है कि जो पट है सो पट है; जो घट है सो घट ही है; जो घट है सो पट नहीं और जो पट है सो घट नहीं वैसे ही यह भी नियत हुआ है कि अपने पुरुषार्थ बिना परमपद की प्राप्ति नहीं होती । हे रामजी ! जो संतों की संगति करता है और सतशास्त्र भी विचारता है पर उनके अर्थ में पुरुषार्थ नहीं करता उसको सिद्धता नहीं प्राप्त होती । जैसे कोई अमृत के निकट बैठा हो तो पान किये बिना अमर नहीं होता वैसे ही अभ्यास किये बिना अमर नहीं होता और सिद्धता भी प्राप्त नहीं होती । हे रामजी ! अज्ञानी जीव अपना जन्म व्यर्थ खोते हैं । जब बालक होते हैं तब मूढ़ अवस्था में लीन रहते हैं युवावस्था में विकार को सेवते हैं और जग में जर्जरभूत होते हैं । इसी प्रकार जीवन व्यर्थ बीतत है और जो अपना पुरुषार्थ त्याग करके दैव का आश्रय लेते हैं सो अपने हन्ता होते हैं वह सुख न पावेंगे । हे रामजी ! जो पुरुष व्यवहार और परमार्थ में आलसी होके और परमार्थ को त्यागके मूढ़ हो रहे हैं सो दीन होकर पशुओं के सदृश दुःख को प्राप्त हुए हैं । यह मैंने विचार करके देखा है इससे तुम पुरुषार्थ का
मुमुक्षु प्रकरण ।
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आश्रय करो और सत्संग और सत्शास्त्ररूपी आदर्श के द्वारा अपने गुण और दोष को देख के दोष का त्याग करो और शास्त्रों के सिद्धान्तों पर अभ्यास करो। जब दृढ़ अभ्यास करोगे तब शीघ्र ही आनन्दवान् होगे। इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा तब सायंकाल का समय हुआ तो सब सभा स्नान के निमित्त उठ खड़ी हुई और परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने घर को गये और सूर्य की किरणों के निकलते ही सब आ फिर स्थिर भये।
इति श्री योगवाशिष्ठे मुमुक्षु प्रकरणे पुरुषार्थवर्णनन्नाम-पञ्चमसर्गः ॥ ५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इसका जो पूर्व का किया पुरुषार्थ है उसी का नाम दैव है और दैव कोई नहीं। जब यह सत्संग और सत्-शास्त्र का विचार पुरुषार्थ से करे तब पूर्व के संस्कार को जीत लेता है। जिस इष्ट पुरुष के पाने का यह शास्त्र द्वारा यत्न करेगा उसको अवश्यमेव अपने पुरुषार्थ से पावेगा अन्यथा कुछ नहीं होता, न हुआ है और न होगा। पूर्व जो कोई पाप किया होता है उसका जब फल दुःख पाता है तो मूर्ख कहता है कि हा दैव, हा दैव, हा कष्ट, हा कष्ट। हे रामजी! इसका जो पूर्व का पुरुषार्थ है उसी का नाम दैव है और दैव कोई नहीं। जो कोई दैव कल्पते हैं सो मूर्ख हैं। जो पूर्व जन्म में सुकृत कर आया है वही सुकृत सुख होके दिखाई देता है और जिसका पूर्व का सुकृत बली होता है उसी की जय होती है। जो पूर्व का दुष्कृत बली होता है और शुभ का पुरुषार्थ करता है और सत्संग और सत्शास्त्र को भी विचारता सुनता और करता है तो पूर्व के संस्कार को जीत लेता है। जैसे पहिले दिन पाप किया हो और दूसरे दिन बड़ा पुण्य करे तो पूर्व का पाप निवृत्त हो जाता है वैसे ही जब यहाँ दृढ़ पुरुषार्थ करे तो पूर्व के संस्कार को जीत लेता है। इससे जो कुछ सिद्ध होता है सो पुरुषार्थ से ही सिद्ध होता है। एकत्रभाव में प्रयत्न करने का नाम पुरुषार्थ है जो एकत्रभाव से यत्न करेगा उसको अवश्यमेव प्राप्त होगा और जो पुरुष और दैव को जानके अपना पुरुषार्थ त्याग बैठेगा सो दुःख पाकर शान्तिमान् कभी न
८८ योगवाशिष्ठ ।
होगा । हे रामजी ! मिथ्या दैव के अर्थ को त्याग के तुम अपने पुरुषार्थ को अङ्गीकार करो । सन्तजनों और सत्शास्त्रों के वचनों और युक्तिसहित यत्न और अभ्यास करके आत्मपद को प्राप्त होने का नाम पुरुषार्थ है । जैसे प्रकाश से पदार्थ का ज्ञान होता है वैसे ही पुरुषार्थ से आत्मपद की प्राप्ति होती है जो पूर्व कर्मानुसार बड़ा पापी होता है सो यहाँ दृढ़ पुरुषार्थ करने से उसको जीत लेता है । जैसे बड़े मेघ को पवन नाश करता है और जैसे वर्षा दिन के पके अन्न को वरफ नाश कर देती है वैसे ही पुरुष का पूर्व संस्कार प्रयत्न नष्ट होता है । हे रामजी ! श्रेष्ठ पुरुष वही है जिसने सत्संग और सत्शास्त्र द्वारा बुद्धि को तीक्ष्ण करके संसार समुद्र से तरने का पुरुषार्थ किया है । जिसने सत्संग और सत्शास्त्र द्वारा बुद्धि तीक्ष्ण नहीं की और पुरुषार्थ को त्याग बैठा है वह पुरुष नीच से नीच गति को पावेगा । जो श्रेष्ठ पुरुष हैं वे अपने पुरुषार्थ से परमानन्द पद को पावेंगे, जिसके पाने से फिर दुःखी न होंगे । जो देखने में दीन होता है वह भी सत्संगति और सत्शास्त्र के अनुसार पुरुषार्थ करता है सो उत्तम पदवी को प्राप्त होता दीखता है । हे रामजी ! जिस पुरुष ने प्रयत्न किया है उसको सब सम्पदा आ प्राप्त होती है और परमानन्द से पूर्ण रहता है । जैसे समुद्र रत्न से पूर्ण है वैसे ही वह भी परमानन्द से पूर्ण होता है । इससे जो श्रेष्ठ पुरुष हैं वे अपने पुरुषार्थ द्वारा संसार के बन्धन से निकल जाते हैं जैसे केसरी सिंह अपने बल से पिंजरे में से निकल जाता है । हे रामजी ! यह पुरुष और कुछ न करे तो यह तो अवश्य करे कि अपने वर्णाश्रम के अनुसार विचरे और साथ ही पुरुषार्थ करे । जब सन्त और सत्शास्त्र के आश्रय होके उनके अनुसार पुरुषार्थ करेगा तब सब बन्धनों से मुक्त होगा । जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ का त्याग किया है और किसी और दैव को मानके कहता है कि वह मेरा कल्याण करेगा सो जन्ममरण को प्राप्त होकर शान्तिमान कभी न होगा । हे रामजी ! इस जीव को संसाररूपी विसूचिका रोग लगा है । उसको दूर करने का उपाय मैं कहता हूँ । सन्तों और सत्शास्त्रों के अर्थ में दृढ़ भावना करके जो कुछ सुना है उसका बारबार अभ्यास करके और
मुमुक्षु प्रकरण । ८६
सब कल्पना त्याग के एकान्त होकर उसका चिन्तन करे तब परमपद की प्राप्ति होगी और द्वैत भ्रम निवृत्त होकर अद्वैतरूप भासेगा । इसी का नाम पुरुषार्थ है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे परमपुरुषार्थ वर्णन- न्नाम षष्ठस्सर्गः ॥ ६ ॥
वशिष्टजी बोले, हे रामजी ! पुरुषार्थ बिना इसको आध्यात्मिक आदि ताप आ प्राप्त होते हैं उससे शान्ति नहीं पाता । तुम भी रोगी न होना, अपने पुरुषार्थ द्वारा जन्ममरण के बन्धन से मुक्त होना, कोई दैव मुक्ति नहीं करेगा । अपने पुरुषार्थ ही द्वारा संसार बन्धन से मुक्त होता है । जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ का त्याग किया है और किसी और दैव को मान-कर उसके आश्रित हुआ है उसके धर्म, अर्थ और काम सभी नष्ट हो जाते हैं और नीच से नीच गति को प्राप्त होता है । हे रामजी ! शुद्ध चैतन्य जो इसका अपना आप वास्तवरूप है उसके आश्रय जो आदि चित्त संवेदन स्फूर्ति है सो अहं ममत्व संवेदन होके फुरने लगती है । इन्द्रियाँ भी अहंता से स्फूर्ति हैं जब यह फुरना सन्तों और शास्त्रों के अनुसार हो तब पुरुष परम शुद्धता को प्राप्त होता है और जो शास्त्र के अनुसार न हो तो वासना के अनुसार भाव अभावरूप भ्रमजाल में पड़ा घटीयन्त्र की नांई भटककर शान्तिमान् कभी नहीं होता । हे रामजी ! जिस किसी को सिद्धता प्राप्त हुई है अपने पुरुषार्थ से ही हुई है । बिना पुरुषार्थ सिद्धता को प्राप्त न होगा । जब किसी पदार्थ को ग्रहण करना होता है तो भुजा पसारे से ही ग्रहण करना होता है और जो किसी देश को जाना चाहे तो चलने से ही पहुँचता है अन्यथा नहीं । इससे पुरुषार्थ बिना कुछ सिद्ध नहीं होता । जो कहता है कि जो दैव करेगा सो होगा वह मूर्ख है । हे रामजी ! दैव कोई नहीं है । इस पुरुषार्थ का ही नाम दैव है । यह दैव शब्द मूर्खों का प्रचार किया हुआ है कि जब किसी कष्ट से दुःख पाते हैं तो कहते हैं कि दैव का किया है । पर कोई दैव नहीं है । हे रामचन्द्रजी, जो अपना पुरुषार्थ त्याग के दैव के आश्रय हो रहेगा वह की सिद्धता को न प्राप्त होगा, क्योंकि अपने पुरुषार्थ बिना सिद्धता किसी को प्राप्त नहीं होती । जब बृहस्पति ने दृढ़ पुरुषार्थ किया तब सर्व देवताओं के
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राजा इन्द्र के गुरु हुए । शुक्रजी अपने पुरुषार्थ द्वारा सब दैत्यों के गुरु हुए हैं । जो समान जीव हैं उनमें जिस पुरुष ने प्रयत्न किया है सो पुरुष उत्तम हुआ है । जिसको जितनी सिद्धता प्राप्त हुई है अपने पुरुषार्थ से ही हुई है । जिस पुरुष ने सन्तों और शास्त्रों के अनुसार पुरुषार्थ नहीं किया उसका बड़ा राज्य, प्रजा, धन और विभूति मेरे देखते ही देखते क्षीण हो गई और नरक में गया है । जिससे कुछ अर्थ सिद्ध हो उसका नाम पुरुषार्थ है और जिससे अनर्थ की प्राप्ति हो उसका नाम अपुरुषार्थ है । हे रामजी ! मनुष्य को सत्शास्त्रों और मन्तसंग से शुभ गुणों को पुष्ट करके दया, धैर्य, सन्तोष और वैराग्य का अभ्यास करना चाहिये । जैसे बड़े ताल से मेघ पुष्ट होता है और फिर वर्षा करके ताल को पुष्ट करता है वैसे ही शुभ गुणों से बुद्धि पुष्ट होती है और शुद्ध बुद्धि से शुभ गुण पुष्ट होते हैं । हे रामजी ! जो बालक अवस्था में अभ्यास किये होता है उसको सिद्धता प्राप्त होती है अर्थात् दृढ़ अभ्यास बिना सिद्धता प्राप्त नहीं होती । जो किसी देश अथवा तीर्थ को जाना चाहे तो मार्ग में निरालस होके चला जावे तभी जा पहुँचेगा । जब भोजन करेगा तभी क्षुधा निवृत्त होगी-अन्यथा न होगी । जब मुख में जिह्वा शुद्ध होगी तभी पाठ स्पष्ट होगा-गूँगे से पाठ नहीं होता । इसलिये जो कुछ कार्य सिद्ध होता है सो अपने पुरुषार्थ में ही सिद्ध होता है; चुप हो रहने में कोई कार्य सिद्ध नहीं होता । यहाँ सब गुरु बैठे हैं इनसे पूछ देखो; आगे जो तुम्हारी इच्छा है सो करो और जो मुझसे पूछो तो मैं सब शास्त्रों का सिद्धान्त कहता हूँ जिससे सिद्धता को प्राप्त होगे । हे रामजी ! सन्तों अर्थात् ज्ञानवान पुरुषों और मतशास्त्रों अर्थात् ब्रह्मविद्या के अनुसार संवेदन मन और इन्द्रियों का विचार रखना और जो इनसे विरुद्ध हों उनको न करना । इससे तुमको संसार का राग द्वेष स्पर्श न करेगा और सबमें निर्लेप रहोगे । जैसे जल में कमल निर्लेप रहता है वैसे ही तुम भी निर्लेप रहोगे । हे रामजी ! जिस पुरुष से शान्ति प्राप्ति हो उसकी भली प्रकार सेवा करनी चाहिये, क्योंकि उसका बड़ा उपकार है कि संसार समुद्र से निकाल लेता है । हे रामजी ! मन्तजन और सतशास्त्र भी वही
मुमुक्षु प्रकरण । ६१
हैं जिनके विचार और संगति से संसार से चित्त उसकी ओर हो और मोक्ष की उपाय वही है जिससे और सब कल्पना को त्याग के अपने पुरुषार्थ को अङ्गीकार करे जिससे जन्ममरण का भय निवृत्त हो जावे । हे रामजी ! जिस वस्तु की जीव वाञ्छा करता है और उसके निमित्त दृढ़ पुरुषार्थ करता है तो अवश्य वह उसको पाता है । बड़े तेज और विभूति से सम्पन्न जो तुमको दृष्टि आता और सुना जाता है वह अपने पुरुषार्थ से ही हुआ है और जो महानिकृष्ट सर्प, कीट आदिक तुमको दृष्टि आते हैं उन्होंने अपने पुरुषार्थ का त्याग किया है तभी ऐसे हुए हैं । हे रामजी ! अपने पुरुषार्थ का आश्रय करो नहीं तो सर्प कीटादिक नीच योनि को प्राप्त होगे । जिस पुरुष ने अपना पुरुषार्थ त्यागा और किसी दैव का आश्रय लिया है वह महामूर्ख है, क्योंकि वह वार्ता व्यवहार में भी प्रसिद्ध है कि अपने उद्यम किये बिना किसी पदार्थ की प्राप्ति नहीं होती तो परमार्थ की प्राप्ति कैसे हो । इससे परमपद पाने के निमित्त दैव को त्यागकर सन्तजनों और सत्शास्त्रों के अनुसार यत्न करो तब जो दुःख हैं वे दूर होवेंगे । हे रामजी ! जनार्दन विष्णुजी अवतार धारण करके दैत्यों को मारते हैं और अन्य चेष्टा भी करते हैं परन्तु उनको पाप का स्पर्श नहीं होता, क्योंकि वे अपने पुरुषार्थ से ही अक्षयपद को प्राप्त हुए हैं । इससे तुम भी पुरुषार्थ का आश्रय करो और संसार से तर जावो ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे मुमुक्षुप्रकरणे पुरुषार्थोपमावर्णनन्नाम सप्तमसर्गः ॥ ७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो शब्द है कि "दैव हमारी रक्षा करेगा" सो किसी मूर्ख की कल्पना है । हमको तो दैव का आकार कोई दृष्टि नहीं आता और न कोई दैव का आकार ही जान पड़ता है और न दैव कुछ करता ही है । मूर्ख लोग दैव दैव कहते हैं, पर दैव कोई नहीं है, इसका पूर्व का कर्म ही दैव है । हे रामजी ! जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ का त्याग किया है और दैवपरायण हुआ है कि वह हमारा कल्याण करेगा वह मूर्ख है, क्योंकि अग्नि में जा पड़े और दैव निकाल ले तब जानिये कि कोई दैव भी है, पर सो तो नहीं होता । स्नान, दान, भोजन