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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

मुमुक्षु प्रकरण । ६१

हैं जिनके विचार और संगति से संसार से चित्त उसकी ओर हो और मोक्ष की उपाय वही है जिससे और सब कल्पना को त्याग के अपने पुरुषार्थ को अङ्गीकार करे जिससे जन्ममरण का भय निवृत्त हो जावे । हे रामजी ! जिस वस्तु की जीव वाञ्छा करता है और उसके निमित्त दृढ़ पुरुषार्थ करता है तो अवश्य वह उसको पाता है । बड़े तेज और विभूति से सम्पन्न जो तुमको दृष्टि आता और सुना जाता है वह अपने पुरुषार्थ से ही हुआ है और जो महानिकृष्ट सर्प, कीट आदिक तुमको दृष्टि आते हैं उन्होंने अपने पुरुषार्थ का त्याग किया है तभी ऐसे हुए हैं । हे रामजी ! अपने पुरुषार्थ का आश्रय करो नहीं तो सर्प कीटादिक नीच योनि को प्राप्त होगे । जिस पुरुष ने अपना पुरुषार्थ त्यागा और किसी दैव का आश्रय लिया है वह महामूर्ख है, क्योंकि वह वार्ता व्यवहार में भी प्रसिद्ध है कि अपने उद्यम किये बिना किसी पदार्थ की प्राप्ति नहीं होती तो परमार्थ की प्राप्ति कैसे हो । इससे परमपद पाने के निमित्त दैव को त्यागकर सन्तजनों और सत्शास्त्रों के अनुसार यत्न करो तब जो दुःख हैं वे दूर होवेंगे । हे रामजी ! जनार्दन विष्णुजी अवतार धारण करके दैत्यों को मारते हैं और अन्य चेष्टा भी करते हैं परन्तु उनको पाप का स्पर्श नहीं होता, क्योंकि वे अपने पुरुषार्थ से ही अक्षयपद को प्राप्त हुए हैं । इससे तुम भी पुरुषार्थ का आश्रय करो और संसार से तर जावो ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे मुमुक्षुप्रकरणे पुरुषार्थोपमावर्णनन्नाम सप्तमसर्गः ॥ ७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो शब्द है कि "दैव हमारी रक्षा करेगा" सो किसी मूर्ख की कल्पना है । हमको तो दैव का आकार कोई दृष्टि नहीं आता और न कोई दैव का आकार ही जान पड़ता है और न दैव कुछ करता ही है । मूर्ख लोग दैव दैव कहते हैं, पर दैव कोई नहीं है, इसका पूर्व का कर्म ही दैव है । हे रामजी ! जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ का त्याग किया है और दैवपरायण हुआ है कि वह हमारा कल्याण करेगा वह मूर्ख है, क्योंकि अग्नि में जा पड़े और दैव निकाल ले तब जानिये कि कोई दैव भी है, पर सो तो नहीं होता । स्नान, दान, भोजन

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آदिकल त्याग करके चुप हो बैठे और आप ही दैव कर जावे सो भी किये बिना नहीं होता इसमें दैव नहीं, कोई अपना पुरुषार्थ ही कल्याण-कर्ता है । हे रामजी ! जीव का किया कुछ नहीं होता और दैव ही करने-वाला होता तो शास्त्र और गुरु का उपदेश भी न होता । इससे स्पष्ट है की सन्शास्त्र के उपदेश से अपने पुरुषार्थ द्वारा इसको वाञ्छित पदवी प्राप्त होती है इसमें और जो कोई दैव शब्द है सो व्यर्थ है । इस भ्रम को त्याग करके सन्तों और शास्त्रों के अनुसार पुरुषार्थ करे तब दुःख से मुक्त होगा । हे रामजी ! और दैव कोई नहीं है इसका पुरुषार्थ जो स्पन्द है सोई दैव है, हे रामजी ! जो कोई और दैव करनेवाला होता तो जब जीव शरीर को त्यागता है और शरीर नष्ट ही जाता है-कुछ किया नहीं होती क्योंकि चेष्टा करनेवाला त्याग जाता है तब भी शरीर से चेष्टा कराता सो तो चेष्टा कुछ नहीं होती, इसमें जाना जाता है कि दैव शब्द व्यर्थ है । हे रामजी ! पुरुषार्थ की वार्ता अज्ञानी जीव को भी प्रत्यक्ष है कि अपने पुरुषार्थ बिना कुछ नहीं होता । गोपाल भी जानता है कि में गौओं को न चराऊँ तो भूखी ही रहेंगी । इसमें वह और दैव के आश्रय नहीं बैठ रहता, आप ही चराने आता है । हे रामजी ! दैव की कल्पना भ्रम से करते हैं । हमको तो दैव कोई दृष्टि नहीं आता और हाथ, पाँव, शरीर भी दैव का कोई दृष्टि नहीं आता । अपने पुरुषार्थ से ही सिद्धता दृष्टि आती है । जो कोई आकार से रहित दैव कल्पिये तो भी नहीं बनता, क्योंकि निराकार और साकार का संयोग कैसे हो । हे रामजी ! दैव कोई नहीं केवल अपना पुरुषार्थ ही दैवरूप है । जो राजा ऋद्धि-सिद्धि संयुक्त भासता है सो भी अपने पुरुषार्थ से ही हुआ है । हे रामजी ! ये जो विश्वामित्र हैं, इन्होंने दैव शब्द दूर ही से त्याग दिया है । ये भी अपने पुरुषार्थ से ही क्षत्रिय से ब्राह्मण हुए हैं और भी जो बड़े-बड़े विभूतिमान हुए हैं सो भी अपने पुरुषार्थ से ही दृष्टि आते हैं । हे रामजी ! जो दैव पढ़े बिना पण्डित करे तो जानिये दैव ने किया, पर पढ़े बिना तो पण्डित नहीं होता । जो अज्ञानी से ज्ञानवान् होते हैं सो भी अपने पुरुषार्थ से ही होते हैं । इससे दैव कोई नहीं । मिथ्या भ्रम को त्यागकर

मुमुक्षु प्रकरण । ६३

सन्तजनों और सतशास्त्रों के अनुसार संसारसमुद्र तरने का प्रयत्न करो। तुम्हारे पुरुषार्थ बिना दैव कोई नहीं। जो और दैव होता तो बहुत बेर क्रियावाला भी अपनी क्रिया को त्याग के सो रहता कि दैव आप ही करेगा, पर ऐसे तो कोई नहीं करता। इससे अपने पुरुषार्थ बिना कुछ सिद्ध नहीं होता। जो कुछ इसका किया न होता तो पाप करने वाले नरक न जाते और पुण्य करनेवाले स्वर्ग न जाते परन्तु पाप करने-वाले नरक में जाते हैं और पुण्य करनेवाले स्वर्ग में जाते हैं; इससे जो कुछ प्राप्त होता है सो अपने पुरुषार्थ से ही होता है। हे रामजी! जो कोई ऐसा कहे कि कोई दैव करता है तो उसका शिर काटिये जो वह दैव को आश्रय जीता रहे तो जानिये कि कोई दैव है, पर सो तो जीता कोई भी नहीं। इससे दैव शब्द को मिथ्या भ्रम जानके सन्तजनों और सतशास्त्रों के अनुसार अपने पुरुषार्थ से आत्मपद में स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्टे मुमुक्षुप्रकरणे परमपुरुषार्थ- वर्णनन्नामष्टमसर्गः ॥ = ॥

इतना सुनकर रामजी ने पूछा, हे भगवन्, सर्वधर्म के वेत्ता ! आप कहते हैं कि दैव कोई नहीं परन्तु इस लोक में प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा भी दैव है और दैव का किया सब कुछ होता है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैं तुमको इसलिए कहता हूँ कि तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जावे। अपने ही किये हुए शुभ अथवा अशुभकर्म का फल अवश्यमेव भोगना होता है, उसे दैव कहो वा पुरुषार्थ कहो और दैव कोई नहीं। कर्त्ता, क्रिया, कर्म आदिक में तो दैव कोई नहीं और न कोई दैव का स्थान ही है और न रूप ही है तो और दैव क्या कहिये। हे रामजी ! मूर्खों के परचाने के निमित्त दैव शब्द कहा है। जैसे आकाश शून्य है वैसे दैव भी शून्य है। फिर रामजी बोले, हे भगवन्, सर्वधर्म के वेत्ता ! तुम कहते हो कि और दैव कोई नहीं और आकाश की नाईं शून्य है सो तुम्हारे कहने से भी दैव सिद्ध होता है। तुम कहते हो कि उसके पुरुषार्थ का नाम दैव है और जगत् में भी दैव शब्द प्रसिद्ध है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैं इस-लिए तुमको कहता हूँ कि जिसमें दैव शब्द तुम्हारे हृदय से उठ जावे।

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योगवाशिष्ठ ।

दैव नाम अपने पुरुषार्थ का है, पुरुषार्थ कर्म का नाम है और कर्म नाम वासना का है। वासना मन से होती है और मनरूपी पुरुष जिसकी वासना करता है सोई उसको प्राप्त होती है। जो गाँव के प्राप्त होने की वासना करता है सो गाँव को प्राप्त होता है और जो घाट की वासना करता सो घाट को प्राप्त होता है। इससे और दैव कोई नहीं। पूर्व का जो शुभ अथवा अशुभ दृढ़ पुरुषार्थ किया है उसका परिणाम सुख दुःख अवश्य होता है और उसी का नाम दैव है। हे रामजी! तुम विचार करके देखो कि अपना पुरुषार्थ कर्म से भिन्न नहीं है तो सुख दुःख देनेवाला और लेनेवाला कोई दैव नहीं हुआ। जीव जो पाप की वासना और शास्त्रविरुद्ध कर्म करता है सो क्यों करता है? पूर्व के दृढ़ पुरुषार्थ कर्म ही पाप करता है। जो पूर्व का पुण्यकर्म किया होता तो शुभमार्ग में विचरता। फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो पूर्व की दृढ़ वासना के अनुसार यह विचरता है तो मैं क्या करूँ? मुझको पूर्व की वासना ने दीन किया है अब मुझको क्या करना चाहिए? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो कुछ पूर्व की वासना दृढ़ हो रही है उसके अनुसार जीव विचरता है पर जो श्रेष्ठ मनुष्य है सो अपने पुरुषार्थ से पूर्व के मलिन संस्कारों को शुद्ध करता है तो उसके मल दूर हो जाते हैं। जब तुम सतशास्त्रों और ज्ञानवानों के वचनों के अनुसार दृढ़ पुरुषार्थ करोगे तब मलिन वासना दूर हो जावेगी। हे रामजी! पूर्व के मलिन और शुभ संस्कारों को कैसे जानिये सो सुनो। जो चित्त विषय और शास्त्रविरुद्ध मार्ग की ओर जावे और शुभ की ओर न जावे तो जानिये कि कोई पूर्व का कर्म मलिन है और जो सन्त-जनों और सतशास्त्रों के अनुसार चेष्टा करे और संसारमार्ग से विरक्त हो तो जानिये कि पूर्व का शुभकर्म है। इससे हे रामजी! तुमको दोनों से सिद्धता है कि पूर्व का संस्कार शुद्ध है इससे तुम्हारा चित्त-सत्संग और सतशास्त्रों के वचनों को ग्रहण करके शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होगा और जो तुम्हारा चित्त शुभमार्ग में स्थिर नहीं हो सकता तो दृढ़ पुरुषार्थ करके संसारसमुद्र से पार हो। हे रामजी तुम चैतन्य

मुमुक्षु प्रकरण । ६५

हो, जड़ तो नहीं हो, अपने पुरुषार्थ का आश्रय करो और मेरा भी यहाँ आशीर्वाद है कि तुम्हारा चित्त शीघ्र ही शुद्ध आचरण और ब्रह्म-विद्या के सिद्धान्तसार में स्थित हो । हे रामजी ! श्रेष्ठ पुरुष भी वही है जिसका पूर्व का संस्कार यद्यपि मलीन भी था, परन्तु सन्तों और सत्शास्त्रों के अनुसार दृढ़ पुरुषार्थ करके सिद्धता को प्राप्त हुआ है और मूर्ख जीव वह है जिसने अपना पुरुषार्थ त्याग दिया है जिससे संसार से मुक्त नहीं होता । पूर्व का जो कोई पापकर्म किया होता है उसकी मलिनता से पाप में धावता है और अपने पुरुषार्थ के त्यागने से अन्धा होकर विशेष धावता है जो श्रेष्ठ पुरुष है उसको यह करना चाहिए कि प्रथम तो पाँचों इन्द्रियों का वश करे, फिर शास्त्र के अनुसार उनको बर्तावे और शुभ वासना दृढ़ करे, अशुभ का त्याग करे । यद्यपि त्यागनीय दोनों वासना हैं पर प्रथम शुभ वासना को इकट्ठी करे फिर अशुभ त्याग करे । जब शुद्ध वासना करके कषाय परिपक्व होगा अर्थात् अन्तः-करण जब शुद्ध होगा तब सन्तों और सत्शास्त्रों के सिद्धान्त का विचार उत्पन्न होगा और उससे तुमको आत्मज्ञान की प्राप्ति होगी । उस ज्ञान के द्वारा आत्मसाक्षात्कार होगा फिर क्रिया और ज्ञान का भी त्याग हो जावेगा और केवल शुद्ध अद्वैतरूप अपना आप शेष भासेगा । इससे हे रामजी ! और सब कल्पना का त्याग कर सन्तजनों और सत्शास्त्रों के अनुसार पुरुषार्थ करो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे परमपुरुषार्थवर्णनन्नाम
नवमसर्गः ॥ ६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मेरे वचनों को ग्रहण करो । यह वचन बान्धव के समान हैं अर्थात् तुम्हारे परम मित्र होंगे और दुःख में तुम्हारी रक्षा करेंगे । हे रामजी ! यह जो मोक्ष उपाय तुमसे कहता हूँ उसके अनुसार तुम पुरुषार्थ करो तब तुम्हारा परम अर्थ सिद्ध होगा । यह चित्त जो संसार के भोग की ओर जाता है उस भोगरूपी खाई में चित्त को गिरने मत दो । भोग के विसर जाने के त्याग दो हैं । वह त्याग तुम्हारा परम मित्र होगा और त्याग भी ऐसा करो कि फिर उसका ग्रहण न हो ।

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हे रामजी ! यह मोक्ष उपाय संहिता है इसे चित्त को एकाग्र करके सुनो, इससे परमानन्द की प्राप्ति होगी । प्रथम शम और दम को धारण करो सम्पूर्ण संसार की वासना त्याग करके उदारता में तृप्त रहने का नाम शम है और बाह्य इन्द्रियों के बस करने को दम कहते हैं । जब प्रथम इनको धारण करोगे तब परमतत्त्व का विचार आप ही उत्पन्न होगा और विचार से विवेक द्वारा परमपद की प्राप्ति होगी ! जिस पद को पाकर फिर कदाचित् दुःख न होगा और अविनाशी सुख तुमको प्राप्त होगा । इसलिये इस मोक्ष उपाय संहिता के अनुसार पुरुषार्थ करोगे तब आत्मपद को प्राप्त होगे । पूर्व जो कुछ ब्रह्माजी ने हमको उपदेश दिया है सो मैं तुमसे कहता हूँ । इतना सुनकर रामजी बोले, हे मुनीश्वर । आपको जो ब्रह्माजी ने उपदेश किया था सो किस कारण किया था और कैसे आपने धारण किया था सो कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! शुद्ध चिदाकाश एक है और अनन्त, अविनाशी, परमानन्दरूप, चिदानन्द-स्वरूप ब्रह्म है उसमें संवेदन स्पन्दरूप होता है वही विष्णु होकर स्थित हुआ है । वे विष्णुजी स्पन्द और निस्पन्द में एकरस हैं कदाचित् अन्यथाभाव को नहीं प्राप्त होते । जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते हैं वैसे ही शुद्ध चिदाकाश में स्पन्द करके विष्णु उत्पन्न हुए हैं । उन विष्णुजी के स्वर्णवत नाभिकमल में ब्रह्माजी प्रकट हुए । उन ब्रह्माजी ने ऋषि और मुनीश्वरों सहित स्थावर जंगम प्रजा उत्पन्न की और उस मनोजग में जगत को उत्पन्न किया । उस जगत के कोण में जो जम्बुद्वीप भरतखण्ड है उसमें मनुष्य को दुःख से आतुर देख उनके करुणा उपजी जैसे पुत्र को देखकर पिता के करुणा उपजती है । तब उनके सुख के निमित्त तप उत्पन्न किया कि वे सुखी हों और आज्ञा की कि तप करेंगे । तब वे तप करने लगे और उस तप करने से स्वर्गादिक को प्राप्त होने लगे । पर उन सुखों को भोगकर वे फिर गिरे और दुःखी हुए ब्रह्माजी ने ऐसे देखकर सत्यवाक् रूप धर्म को प्रतिपादन किया और उनके सुख के निमित्त आज्ञा की । उस धर्म के प्रतिपादन में भी लोगों को सुख प्राप्त होने लगा और वहां भी कुछ काल सुख भोग कर फिर गिरे और दुःखी

मुमुक्षु प्रकरण । ६७

के दुःखी रहे। फिर ब्रह्माजी ने दान तीर्थादिक पुण्य क्रिया उत्पन्न करके उनको आज्ञा दी कि इनके सेवने से तुम सुखी रहोगे। जब वे जीव उनको सेवने लगे तब बड़े पुण्यलोक में प्राप्त होकर उनके सुख भोगने लगे और फिर कुछ काल अपने कर्म के अनुसार भोग भोगकर गिरे। जब उन्होंने तृष्णा की तो बहुत दुःखी भये और दुःखकर आतुर हुए। उस समय ब्रह्माजी ने देखा कि यह जीवन और मरण के दुःख से महा-दीन होते हैं इससे यह उपाय कीजिये जिससे उनका दुःख निवृत्त हो। हे रामचन्द्रजी ! ब्रह्माजी ने विचारा कि इनका दुःख आत्मज्ञान बिना निवृत्त नहीं होगा इससे आत्मज्ञान को उत्पन्न कीजिये जिससे ये सुखी होवें। इस प्रकार विचार कर वे आत्मतत्त्व का ध्यान करने लगे। उस ध्यान के करने से शुद्ध तत्त्वज्ञान की मूर्ति होकर मैं प्रकट हुआ। मैं भी ब्रह्माजी के समान हूँ जैसे उनके हाथ में कमण्डलु है वैसे मेरे हाथ में भी है, जैसे उनके कण्ठ में रुद्राक्ष की माला है वैसे मेरे कण्ठ में भी है और जैसे उनके ऊपर मृगछाला है वैसे ही मेरे ऊपर भी है। मेरा शुद्ध ज्ञानस्वरूप है और मुझको जगत् कुछ नहीं भासता और भासता है तो स्वप्न की नाईं भासता है। तब ब्रह्माजी ने विचार किया कि इसको मैंने जीवों के कल्याण के निमित्त उत्पन्न किया है, पर यह तो शुद्ध ज्ञानस्वरूप है और अज्ञानमार्ग का उपदेश तब हो जब कुछ प्रश्नोत्तर हो और तभी सत्य मिथ्या का विचार होवे। हे रामजी ! तब जीवों के कल्याण के निमित्त ब्रह्माजी ने मुझको गोद में बैठाया और शीश पर हाथ फेरा तब तो जैसे चन्द्रमा की किरण से शीतलता होती है वैसे ही मैं उससे शीतल हो गया। फिर ब्रह्माजी ने मुझको जैसे हंस को हंस कहे वैसे कहा, हे पुत्र ! जीवों के कल्याण के निमित्त तुम एक मुहूर्त पर्यन्त अज्ञान को अङ्गीकार करो। जो श्रेष्ठ पुरुष हैं सो औरों के निमित्त भी अङ्गीकार करते आये हैं। जैसे चन्द्रमा बहुत निर्मल है परन्तु श्यामता को अङ्गीकार किये है वैसे ही तुम भी एक मुहूर्त अज्ञान को अङ्गीकार करो। हे रामजी ! इस प्रकार मुझको कहकर ब्रह्माजी ने शाप दिया कि तू अज्ञानी होगा। तब मैंने ब्रह्माजी की आज्ञा मानी और शाप को

६८ | योगवासिष्ठ ।

अंगीकार किया और मेरा जो शुद्ध आत्मतत्त्व अपना आप था सो अन्य की नाईं हो गया मेरी स्वभावसत्ता मुझको विस्मरण हो गई और मेरा मन जाग आया । तब भाव अभावरूप जगत् मुझको भासने लगा और अपने को में वशिष्ठ और ब्रह्माजी का पुत्र जानने लगा और नाना प्रकार के पदार्थ सहित जगत् जानकर उनकी ओर चञ्चल होने लगा । फिर मैंने संसारजाल को दुःखरूप जानकर ब्रह्माजी से पूछा, हे भगवन् ! यह संसार कैसे उत्पन्न हुआ ? और कैसे लीन होता है ? हे रामजी ! जब मैंने इस प्रकार पिता ब्रह्माजी से प्रश्न किया तो उन्होंने भली प्रकार मुझको उपदेश किया उससे मेरा अज्ञान नष्ट हो गया । जैसे सूर्य के उदय होने से तम निवृत्त हो जाता है और जैसे आदर्श को मार्जन करने से शुद्ध हो जाता है वैसे ही मैं भी शुद्ध हुआ । हे रामजी ! उस उपदेश से में ब्रह्माजी से भी अधिक हो गया । उस समय मुझको परमेष्ठी ब्रह्माजी ने आज्ञा की कि हे पुत्र ! जम्बूद्वीप भरतखण्ड में तुमको अष्ट प्रजापति का अधिकार है वहाँ जाकर जीवों को उपदेश करो । जिसको संसार के सुख की इच्छा हो उसको कर्ममार्ग का उपदेश करना जिससे वे स्वर्गादिक सुख भोगें और जो संसार में विरक्त हों और आत्मपद की इच्छा रखता हो उसको ज्ञान उपदेश करना । हे रामजी ! इस प्रकार मेरा उपदेश और उत्पत्ति हुई और इस प्रकार मेरा आना हुआ ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे वसिष्ठोपदेश- गमनन्नाम दशमसर्गः ॥ १० ॥

इतना सुनकर श्रीरामजी बोले, हे भगवन् ! उस ज्ञान की उत्पत्ति से अनन्त जीवों की शुद्धि कैसे हुई सो कृपाकर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो शुद्ध आत्मतत्त्व है उसको स्वाभावरूप संवेदन स्फूर्ति है; वह ब्रह्मारूप होकर स्थित हुई है। जैसे समुद्र अपनी द्रवता से तरङ्ग-रूप होता है वैसे ही ब्रह्माजी हुए हैं। उन्होंने सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करके तीनों काल उत्पन्न किये । जब कुछ काल व्यतीत हुआ तो कलियुग आया उससे जीवों की बुद्धि मलिन हो गई और पाप में विचर कर शास्त्र वेद की आज्ञा उल्लंघन करने लगे । जब इस प्रकार धर्म की मर्यादा

मुमुक्षु प्रकरण । ६६

छिप गई और पाप प्रकट हुआ तो जितनी कुछ राजधर्म की मर्यादा थी सो भी सब नष्ट हो गई और अपनी इच्छा के अनुसार जीव विचरकर कष्ट पाने लगे । उनको देखकर ब्रह्माजी के करुणा उपजी और दया करके मुझसे सनत्कुमार से और नारद से बोले कि हे पुत्रो ! तुम भूलोक में जाकर जीवों को शुद्ध उपदेश कर धर्म की मर्यादा स्थापन करो । जिस जीव को भोग की इच्छा हो उसको कर्मकाण्ड और जप, तप, स्नान, संध्या, यज्ञादिक का उपदेश करना और जो संसार से विरक्त हुए हों और मुमुक्षु हों और जिन्हें परमपद पाने की इच्छा हो उनको ब्रह्मविद्या का उपदेश करना । यह आज्ञा देकर हमको भूमिलोक में भेजा । तब हम सब ऋषीश्वर इकट्ठे होकर विचारने लगे कि जगत् की मर्यादा किस प्रकार हो और जीव शुभमार्ग में कैसे विचरें ? तब हमने यह विचार किया कि प्रथम राज्य का स्थापन करो कि उसकी आज्ञा-नुसार जीव विचरें । निदान प्रथम दण्डकर्त्ता राज्य स्थापन किया । जिन राजाओं के बड़े वीर्यवान्, तेजवान और उदार आत्मा थे उनको भी हमने अध्यात्मविद्या का उपदेश किया जिससे वे परमपद को प्राप्त हुए और परमानन्दरूप अविनाशीपद ब्रह्मविद्या के उपदेश से उनको प्राप्त हुआ तब वे सुखी हुए । इस कारण ब्रह्मविद्या का नाम राजविद्या है । तब हमने वेद, शास्त्र, श्रुति और पुराणों से धर्म की मर्यादा स्थापन कर जप, तप, यज्ञ, दान, स्नान आदिक किया प्रकट की और उपदेश किया कि जीव इसके सेवन से सुखी होगा । तब सब फल को पाकर उसको सेवने लगे, पर उनमें कोई विरले निरहङ्कार, हृदय की शुद्धता के निमित्त सेवन करते थे । हे रामजी ! जो मूर्ख थे सो कामना के निमित्त मन में फल के कर्म करते थे और घटीयन्त्र की नाईं भटककर कभी ऊर्ध्व और कभी नीचे को जाते थे । जो निष्काम कर्म करते थे उनका हृदय शुद्ध होता था और ब्रह्मविद्या के अधिकारी होते थे । उस उपदेश द्वारा आत्म-पद की प्राप्ति कर कितने तो जीवनमुक्त हुए और कई राजा विदितवेद सिद्ध हुए सो राज्य की परम्परा चलाय हमारे उपदेश द्वारा ज्ञानी हुए । राजा दशरथ भी ज्ञानवान् हुए और तुम भी इसी दशा को प्राप्त हुए हो ।

१०० योगवाशिष्ठ ।

जैसे तुम विरक्त हुए हो वैसे ही आगे भी स्वाभाविक विरक्त हुए हैं सो स्वभाव से ही तुम शुद्ध हो इसी कारण तुम श्रेष्ठ हो। जो कोई अनिष्ट दुःख प्राप्त होता है उससे विरक्तता उपजती है सो तुमको नहीं हुई, तुम्हें तो सब इन्द्रियों के विषय विद्यमान होने पर वैराग्य हुआ है, इससे तुम श्रेष्ठ हो। हे रामजी ! मसान आदिक कष्ट के स्थानों को देखके तो मनको वैराग्य उपजता है कि कुछ नहीं, मर जाना है, पर उनमें जो कोई श्रेष्ठ पुरुष होता है सो वैराग्य को दृढ़ रखता है और मूर्ख है सो फिर विषय में आसक्त होता है इससे जिनको अकारण वैराग्य उपजता है सो श्रेष्ठ हैं। हे रामजी ! जो श्रेष्ठ पुरुष हैं सो अपने वैराग्य और अभ्यास के बल से संसारबन्धन से मुक्त हो जाते हैं। जैसे हस्ती बन्धन को तोड़के अपने बल से निकल जाता है और सुखी होता है वैसे ही वैराग्य अभ्यास के बल से बन्धन से ज्ञानी मुक्त होते हैं। हे रामजी ! यह संसार बड़ा अनर्थरूप है। जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ से इस बन्धन को नहीं तोड़ा उसको तृष्णारूपी अग्नि जलाती है और जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ से शास्त्र और गुरु के प्रमाण व युक्ति से ज्ञान को सिद्ध किया है वह उस पद को प्राप्त हुआ है। जैसे वर्षाकाल में बहुत वर्षा के होने से वन को दावानल नहीं जला सकता वैसे ही ज्ञानी को आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप कष्ट नहीं दे सकते। हे रामजी ! जिन श्रेष्ठ पुरुषों ने संसार को विषम जानकर त्याग दिया है उनको संसार के पदार्थ गिरा नहीं सकते और जो मूर्ख हैं उनको गिरा देते हैं। जैसे तीक्ष्ण पवन के वेग से वृक्ष गिर जाते हैं परन्तु कल्पवृक्ष नहीं गिरता वैसे ही हे रामजी ! श्रेष्ठ पुरुष वही है जो संसार को विषम जानकर केवल आत्मतत्त्व की इच्छा करके परायण हो। उसी को ब्रह्मविद्या का अधिकार है और वही उत्तम पुरुष है। हे रामजी ! तुम भी वैसे ही उज्ज्वल पात्र हो। जैसे कोमल पृथ्वी में बीज बोते हैं वैसे ही तुमको में उपदेश करता हूँ। जिसको भोग की इच्छा है और संसार की ओर यत्न करता है सो पशुवत् है। श्रेष्ठ पुरुष वही है जिसको संसार तरने का पुरुषार्थ होता है। हे रामजी ! प्रश्न उससे कीजिये जिसमें जानिये कि

मुमुक्षु प्रकरण ।

२०१

यह प्रश्न के उत्तर देने में समर्थ है और जिसको उत्तर देने की सामर्थ्य न हो उससे कदाचित् प्रश्न न करना। उत्तर देने को समर्थ हो और उसके वचन में भावना न हो तब भी प्रश्न न करे, क्योंकि दम्भ से प्रश्न करने में पाप होता है। गुरु भी उन्हीं को उपदेश करता है जो संसार से विरक्त हों और जिनको केवल आत्मपरायण होने की श्रद्धा और आस्तिकभाव हो। हे रामजी! जो गुरु और शिष्य दोनों उत्तम होते हैं तो वचन शोभते हैं। तुम उपदेश के शुद्धपात्र हो। जितने शिष्य के गुण शास्त्र में वर्णन किये हैं, सो सब तुममें पाये जाते हैं और मैं भी उपदेश करने में समर्थ हूँ, इससे कार्य शीघ्र होगा। हे रामजी! शुभ गुणों से तुम्हारी बुद्धि निर्मल हो रही है, इसलिये मेरा सिद्धान्त का सार वचन तुम्हारे हृदय में प्रवेश करेगा। जैसे उज्ज्वल वस्त्र में केसर का रङ्ग शीघ्र चढ़ जाता है वैसे ही तुम्हारे निर्मल चित्त को उपदेश का रङ्ग लगेगा। जैसे सूर्य के उदय से सूर्यमुखी कमल खिलता है वैसे ही तुम्हारी बुद्धि शुभ गुणों से खिल आई है। हे रामजी! जो कुछ शास्त्र का सिद्धान्त आत्मतत्त्व में तुमसे कहता हूँ उसमें तुम्हारी बुद्धि शीघ्र ही प्रवेश करेगी। जैसे निर्मल जल में सूर्य की कान्ति प्रवेश करती है वैसे ही तुम्हारी बुद्धि आत्मतत्त्व में शुद्धता से प्रवेश करेगी। हे रामजी! मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ के प्रार्थना करता हूँ कि जो कुछ मैं तुमको उपदेश करता हूँ उसमें ऐसी आस्तिक भावना कीजियोगा कि इन वचनों से मेरा कल्याण होगा। जो तुमको धारणा न हो तो प्रश्न मत करना। जिस शिष्य की गुरु वचन में आस्तिक भावना होती है उसका शीघ्र ही कल्याण होता है। अब जिससे तुमको आत्मपद प्राप्त हो सो में कहता हूँ। प्रथम जो अज्ञानी जीव में असत्य बुद्धि है उसका संग त्याग करो और मोक्षद्वार के चारों द्वारपालों में मित्र भावना करो। जब उनसे मित्र भाव होगा तब वह मोक्षद्वार में पहुँचा देंगे और तभी तुमको आत्म दर्शन होवेगा। उन द्वारपालों के नाम सुनो— शम, सन्तोष, विचार और सत्सङ्ग यह चारों द्वारपाल हैं। जिस पुरुष ने इनको वश में किया है उसको यह शीघ्र ही मोक्षरूपी द्वार के अन्दर

१०२योगवाशिष्ठ ।

कर देते हैं। हे रामजी ! जो चारों वश में न हों तो तीन को ही वश में करो, अथवा दो ही को वश कर लो अथवा एक वश करो। जो एक भी वश में होगा तो चारों ही वश में हो जायँगे। इन चारों का परस्पर स्नेह है। जहाँ एक आता है वहाँ चारों आते रहते हैं। जिन पुरुषों ने इनसे स्नेह किया है सो सुखी हुए हैं और जिसने इसका त्याग किया है सो दुःखी हैं। हे रामजी ! यदि प्राण का त्याग हो तो भी एक साधन को तो बल से वश करना चाहिये। एक के वश करने में चारों ही वशीभूत होंग। तुम्हारी बुद्धि में शुभ गुणों ने आके निवास किया है। जैसे सूर्य में सब प्रकाश आ जाते हैं वैसे ही सन्तों और शास्त्रों ने जो निर्मल गुण कहे हैं सो सब तुम में पाये जाते हैं। हे रामजी ! तुम मेरे वचनों के वैसे अधिकारी हुए जैसे तन्द्री के सुनने की अंदौरा ( स्पष्ट सुननेवाला ) अधिकारी होता है। चन्द्रमा के उदय से जैसे चन्द्रविकाशी कमल खिल आते हैं वैसे ही शुभ गुणों से तुम्हारी बुद्धि खिल आई है। हे रामजी ! सत्संग और सतशास्त्रों द्वारा बुद्धि को तीक्ष्ण करने से शीघ्र ही आत्मतत्त्व में प्रवेश होता है। इससे श्रेष्ठ पुरुष वही है जिसने संसार को विरस जान के त्याग दिया है और सन्तों और सतशास्त्रों के वचनों द्वारा आत्मपद पाने का यत्न करता है। वह अविनाशी पद को प्राप्त होता है। जो शुभ मार्ग त्याग करके संसार की ओर लगा है वह महामूर्ख जड़ है जैसे शीतलता से जल बर्फ हो जाता है वैसे ही अज्ञानी मूर्खता में दृढ़ आत्म मार्ग से जड़ हो जाता है। हे रामजी ! अज्ञानी के हृदयरूपी बिल में दुराशारूपी सर्प रहता है, इससे वह कदाचित् शान्ति नहीं पाता और कभी आनन्द से प्रफुल्लित नहीं होता। वह वैसे ही आशा से सदा संकुचित रहता है जैसे अग्नि में मांस सकुच जाता है। हे रामजी ! आत्मपद के साक्षात्कार में विशेष आवरण आशा ही है। जैसे सूर्य के आगे मेघ का आवरण होता है वैसे ही आत्मतत्त्व के आगे दुराशा आवरण है। जब आशारूपी आवरण दूर हो तब आत्मपद का साक्षात्कार होवे। हे रामजी ! आशा तब दूर हो जब सन्तों की संगति और सतशास्त्रों का विचार हो। हे रामजी ! संसाररूपी एक बड़ा वृक्ष है सो बाँध

१०४ योगवाशिष्ठ ।

उपशम करके आत्मपद को प्राप्त होगे । हे रामजी ! जिन्होंने सत्सङ्ग और सतशास्त्रों द्वारा आत्मपद पाया है सो सुखी हुए हैं, फिर उनको दुःख नहीं लगा, क्योंकि दुःख देहाभिमान से होता है सो देह का अभि- मान तो तुमने त्याग ही दिया है । जिसने देह का अभिमान त्याग दिया है और देह को आत्मा से फिर ग्रहण नहीं करता सो सुखी रहता है । हे रामजी ! जिसने आत्मिक बल (विचार) द्वारा आत्मपद प्राप्त किया है वह अकृत्रिम आनन्द से सदा पूर्ण है और सब जगत् उसको आनन्दरूप भासता है । जो असम्यग्दर्शी हैं उनको जगत् अनर्थरूप भासता है । हे रामजी ! यह संसाररूप सर्प अज्ञानियों के हृदय में दृढ़ हो गया है वह योगरूपी गारुड़ी मन्त्र करके नष्ट हो जाता है, अन्यथा नहीं नष्ट होता । सर्प के विष से एक जन्म में मरता है और संसरणरूपी विष से अनेक जन्म पाकर मरता चला जाता है—कदाचित् शान्तिमान् नहीं होता । हे रामजी ! जिस पुरुष ने सत्संग और सतशास्त्र के वचन द्वारा आत्मपद को पाया है वह आनन्दित हुआ है उसको भीतर बाहर सब जगत् आनन्दरूप भासता है और सब क्रिया करने में उसे आनन्द विलास है । जिसने सत्सङ्ग और सतशास्त्रों का विचार त्यागा है और संसार के सम्मुख है उसको अनर्थरूप संसार दुःख देता है । कोई सर्प के दंश से दुःखी होते हैं कोई शस्त्र से घायल होते हैं, कितने अग्नि में पड़े की नाईं जलते हैं, कितने रस्सी के साथ बँधे होते हैं और कितने अन्धकूप में गिर के कष्ट पाते हैं । हे रामजी ! जिन पुरुषों ने सत्सङ्ग और सतशास्त्रों द्वारा आत्मपद को नहीं पाया उनको नरकरूप अग्नि में जलना, चक्की में पीसा जाना, पाषाण की वर्षा से चूर्ण होना, कोल्हू में पेरा जाना और शस्त्र से काटा जाना इत्यादि जो बड़े बड़े कष्ट हैं प्राप्त होते हैं । हे रामजी ! ऐसा दुःख कोई नहीं जो इस जीव को प्राप्त नहीं होता; आत्मा के प्रमाद से सब दुःख होते हैं जिन पदार्थों को यह रमणीय जानता है सो चक्र की नाईं चञ्चल हैं, कभी स्थिर नहीं रहते । सन्मार्ग को त्यागकर जो इनकी इच्छा करते हैं सो महादुःख को प्राप्त होते हैं और उनका दुःख इसलिए नष्ट नहीं होता कि वह ज्ञान के निमित्त

मुमुक्षु प्रकरण । १०५

पुरुषार्थ नहीं करते । जो पुरुष संसार को निरस जानकर पुरुषार्थ की ओर दृढ़ हुआ है उसको आत्मपद की प्राप्ति होती है । हे रामजी ! जिस पुरुष को आत्मपद की प्राप्ति हुई है उसको फिर दुःख नहीं होता । अज्ञानी को संसार दुःखरूप है और ज्ञानी को सब जगत आनन्दरूप है-उसको कुछ भ्रम नहीं रहता । हे रामजी ! ज्ञानवान् में नाना प्रकार की चेष्टा भी दृष्टि आती हैं तो भी वह सदा शान्त और आनन्दरूप है । संसार का दुःख उसको स्पर्श नहीं कर सकता, क्योंकि उसने ज्ञानरूपी कवच पहिना है । हे रामजी ! ज्ञानवान् को भी दुःख होता है बड़े बड़े महर्षि और राजर्षि बहुत ज्ञानवान् हुए हैं । वे भी दुःख को प्राप्त होते रहे हैं परन्तु वे दुःख से आतुर नहीं होते थे वे सदा आनन्द-रूप हैं । जैसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि नाना प्रकार की चेष्टा करते जीवों को दृष्टि आते हैं पर अन्तर से वे सदा शान्तरूप हैं, उनको कर्त्ता का कुछ अभिमान नहीं । हे रामजी ! अज्ञानरूपी मेघ में उत्पन्न मोहरूपी कुहड़ों का वृक्ष ज्ञानरूपी शरत्काल में नष्ट हो जाता है । इससे समता को प्राप्त होता है और सदा आनन्द में पूर्ण रहता है । वह जो कुछ क्रिया करता है सो उसका विलासरूप है, सब जगत आनन्दरूप है । शरीररूपी रथ और इन्द्रियरूपी अश्व हैं । मनरूपी रास से उन अश्वों को खींचते हैं । बुद्धिरूपी रथ भी वही है जिस रथ में वह पुरुष बैठा है और इन्द्रियरूपी अश्व उसको खोटे मार्ग में डालते हैं । ज्ञानवान् के इन्द्रियरूपी अश्व ऐसे हैं कि जहाँ जाते हैं वहाँ आनन्दरूप हैं किसी ठौर में खेद नहीं पाते, सब क्रिया में उनको विलास है और सर्वदा आनन्द से तृप्त रहते हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे तत्त्वमाहात्म्यं नाम द्वादशस्सर्गः ॥ १२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इसी दृष्टि का आश्रय करो कि तुम्हारा हृदय पुष्ट हो, फिर संसार के इष्ट अनिष्ट में चलायमान न होगा । जिस पुरुष को इस प्रकार आत्मपद की प्राप्ति हुई है सो आनन्दित हुआ है । वह न शोक करता है न याचना करता है और हेयोपादेय से भी रहित परम शान्तिरूप, अमृत में पूर्ण हो रहा है । वह पुरुष नाना प्रकार की

१०६ योगवासिष्ठ।

चेष्टा करता दृष्टि आता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं करता। जहाँ उसके मन की वृत्ति जाती है वहाँ आत्मसत्ता भासती है जैसे पूर्ण-मासी का चन्द्रमा अमृत से पूर्ण रहता है वैसे ही ज्ञानवान् परमानन्द से पूर्ण रहता है। हे रामजी ! यह जो मैंने तुमसे अमृतरूपी वृत्ति कही है इसको तब जानोगे जब तुमको ब्रह्म का साक्षात्कार होगा। जैसे चन्द्रमा के मण्डल में ताप नहीं होता वैसे ही आत्मज्ञान की प्राप्ति होने से सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। अज्ञानी को कभी शान्ति नहीं होती वह जो कुछ किया करता है उसमें दुःख पाता है। जैसे कीकर के वृक्ष में कण्टकों की ही उत्पत्ति होती है वैसे ही अज्ञानी को दुःखों की ही उत्पत्ति होती है। हे रामजी ! इस जीव को मूर्खता और अज्ञानता से बड़े दुःख प्राप्त होते हैं जिनके समान और दुःख नहीं। यदि आत्मतत्त्व की जिज्ञासा में हाथ में ठीकरा ले चाण्डाल के घर से भिक्षा ग्रहण करे वह भी श्रेष्ठ है पर मूर्खता से जीना व्यर्थ है। उस मूर्खता के दूर करने को में मोक्ष उपाय कहता हूँ। यह मोक्ष उपाय परमबोध का कारण है। इसके लिये कुछ संस्कृत बुद्धि भी होनी चाहिए जिसमें पद पदार्थ का बोध हो और मोक्ष उपाय शास्त्र को विचारे तो उसकी मूर्खता नष्ट होकर आत्मपद की प्राप्ति होगी। नाना प्रकार के दृष्टान्तों सहित जैसे आत्मबोध का कारण यह शास्त्र है वैसा कोई शास्त्र त्रिलोकी में नहीं। इसे जब विचारोगे तब परमानन्द को पाओगे। यह शास्त्र अज्ञानतिमिर के नाश करने को ज्ञानरूपी शलाका है। जैसे अन्धकार को सूर्य नष्ट करता है वैसे ही अज्ञान को इस शास्त्र का विचार नष्ट करता है। हे रामजी ! जिस प्रकार इस जीव को कल्याण है सो सुनिये। जब ज्ञानवान् गुरु महाशास्त्रों का उपदेश करे और शिष्य अपने अनुभव से ज्ञान पावे अर्थात् गुरु अपना अनुभव और शास्त्र जब ये तीनों इकट्ठे मिलें तब कल्याण होता है। जब तक अकृत्रिम आनन्द न मिले तब तक दृढ़ अभ्यास करे। उस अकृत्रिम आनन्द को प्राप्त करानेवाला मैं गुरु हूँ। जीवमात्र का मैं परम मित्र हूँ। हमारी संगति जीव को आनन्द प्राप्त करानेवाली है। इसलिए जो कुछ मैं चाहता हूँ सो तुम करो। संसार के क्षणमात्र के भोगों को त्याग करो।

# मुमुक्षु प्रकरण ।

१०८ योगवाशिष्ठ ।

जैसे हाथ में दीपक हो और अन्धा होकर कूप में गिरे सो मूर्खता है वैसे ही संसार भ्रम के निवारणवाले गुरु और शास्त्र विद्यमान् है जो उनकी शरण न आवै वह मूर्ख है। हे रामजी ! जिस पुरुष ने सन्त की संगति और सत्शास्त्र के विचार द्वारा आत्मपद को पाया है सो पुरुष केवल कैवल्यभाव को प्राप्त हुआ है अर्थात शुद्ध चैतन्य को प्राप्त हुआ है और संसार भ्रम उसका निवृत्त हो गया है। हे रामजी ! यह संसार मन के संसरने से उपजा है। जीव का कल्याण बान्धव, धन, प्रजा, तीर्थ देव द्वारा और ऐश्वर्य्य से नहीं होता, केवल एक मन के जीतने से कल्याण होता है। हे रामजी ! जिसको ज्ञान परमपद रसायन कहते हैं, जिसके पाने में जीव का नाश न हो और जिसमें सर्वसुख की पूर्णता हो इसका साधन समता और सन्तोष है। इनसे ज्ञान उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान-रूपी एक वृक्ष है सो उसका फूल शान्ति है और स्थिति फल है, जिस पुरुष को यह ज्ञान प्राप्त हुआ है शान्तिमान् होकर निर्लेप रहता है। उसको संसार का भावाभावरूप स्पर्श नहीं होता जैसे आकाश में सूर्य उदय होने से जगत् की क्रिया होती है और जब वह अदृश्य होता है तब जगत् की क्रिया भी लीन हो जाती है; और जैसे उस क्रिया के होने और न होने में आकाश ज्यों का त्यों है वैसे ही ज्ञानवान् सदा निर्लेप है उस आत्मज्ञान की उत्पत्ति का उपाय यह मेरा श्रेष्ठ शास्त्र है। हे रामजी ! जो पुरुष इस मोक्षोपाय शास्त्र को श्रद्धासंयुक्त पढ़े अथवा सुने तो उसी दिन से वह मोक्ष का मार्गी हो। मोक्ष के चार द्वारपाल हैं सो में तुमसे कहता हूँ। जब इनमें से एक भी अपने वश हो तब मोक्षद्वार में शीघ्र ही प्रवेश होगा। उन चारों के नाम सुनिये। हे रामजी ! शम जीव के परम विश्राम का कारण है। यह संसार जो दीखता है सो मरुस्थल की नदीवत है इसको देखकर मूर्ख अज्ञानी सुखरूप जल जानकर मृग के समान दौड़ता है। शान्ति को नहीं प्राप्त होता। जब शमरूपी मेघ की वर्षा हो तब सुखी हो। हे रामजी ! शम ही परमानन्द परमपद और शिवपद है। जिस पुरुष ने शम पाया है सो संसारसमुद्र से पार हुआ है। उसके शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। हे रामजी ! जैसे चन्द्र उदय होता

मुमुक्षु प्रकरण । १०६

है तब अमृत की कला फूटती है और शीतलता होती है वैसे ही जिसके हृदय में शमरूपी चन्द्रमा उदय होता है उसके सब ताप मिट जाते हैं और परम शान्तिमान होता है । हे रामजी ! शम देवता के अमृत समान कोई अमृत नहीं, शम से परम शोभा की प्राप्ति होती है । जैसे पूर्णमासी के चन्द्रमा की कान्ति परम उज्ज्वल होती है वैसे ही शम को पाके जीव की उज्ज्वल कान्ति होती है । जैसे विष्णु के दो हृदय हैं-एक तो अपने शरीर में और दूसरा सन्तों में है वैसे ही जीव के भी दो हृदय होते हैं एक अपने शरीर में और दूसरा शम में । जैसा आनन्द शमवान् को होता है वैसा अमृत पीने से भी नहीं होता । हे रामजी ! कोई कोई प्राण मे प्रिय अन्तर्धान होकर फिर प्राप्त हो तो जैसा आनन्द होता है उस आनन्द से भी अधिक आनन्द शमवान् को होता है । उसके दर्शन से जैसा आनन्द होता है ऐसा आनन्द राजा, मन्त्री और सुन्दर स्त्री को भी नहीं । हे रामजी ! जिस पुरुष को शम की प्राप्ति हुई है वह वन्दना करने और पूजने योग्य है । जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसको उद्वेग नहीं होता और अन्य लोगों से उद्वेग नहीं पाता । उसकी क्रिया और वचन अमृत की नाईं मीठे और चन्द्रमा की किरण के समान शीतल और सबको हृदयाराम है । हे रामजी ! जैसे बालक माता को पाके आनन्दित होता है वैसे ही जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसके संग से जीव अधिक आनन्दवान् होता है । जैसे किसी का बान्धव मुवा हुआ फिर आवे और उसको आनन्द प्राप्त हो उससे भी अधिक आनन्द शमसम्पन्न पुरुष को होता है । हे रामजी ! ऐसा आनन्द चक्रवर्ती और त्रिलोकी का राज्य पाने से भी नहीं होता । जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसके शत्रु भी मित्र हो जाते हैं; उसको सर्प और सिंह का भय नहीं रहता बल्कि किसी का भी भय नहीं रहता, वह सदा निर्भय शान्तरूप रहता है । हे रामजी ! जो कोई कष्ट प्राप्त हो और काल की अग्नि भी आ लगे तो भी वह चलायमान नहीं होता-सदा शान्तरूप रहता है । जैसे शीतल चाँदनी चन्द्रमा में स्थिर है वैसे ही जो कुछ शुभ गुण और संपदा है सब शमवान् के हृदय में आ स्थित

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होती है। हे रामजी ! जो पुरुष आध्यात्मिकादि ताप से जलता है उसके हृदय में कदाचित् शम की प्राप्ति हो तो सब ताप मिट जाते हैं। जैसे तप्त पृथ्वी वर्षा से शीतल हो जाती है वैसे ही उसका हृदय शीतल हो जाता है। जिसको शम की प्राप्ति हुई है सो सब क्रिया में आनन्दरूप है-उसको कोई दुःख नहीं स्पर्श करता। जैसे वज्र और शिला को बाण नहीं वेध सकता वैसे ही जिस पुरुष ने शमरूपी कवच पहिना है उसको आध्यात्मिकादि ताप वेध नहीं सकते-वह सर्वदा शीतलरूप रहता है। हे रामजी ! तपस्वी, पण्डित, याज्ञिक और धनाढ्य पूजा में मान करने योग्य हैं, परन्तु जिसको शम की प्राप्ति हुई है सो सबसे उत्तम और सबके पूजने योग्य है। उसके मन की वृत्ति आत्मतत्त्व को ग्रहण करती है और सब क्रिया में सोहती है। जिस पुरुष को शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध क्रिया के विषयों के इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष नहीं होता उसको शान्तात्मा कहते हैं। हे रामजी ! जो संसार के रमणीय पदार्थ में बध्यमान नहीं होता और आत्मानन्द से पूर्ण है उसको शान्तिमान कहते हैं। उनको संसार के शुभ अशुभ का मलिनपना नहीं लगता वह तो सदा निर्लेप रहता है जैसे आकाश सब पदार्थों से निर्लेप है। वैसे ही शान्तिमान् सदा निर्लेप रहता है। हे रामजी ! ऐसा पुरुष इष्ट विषय की प्राप्ति में हर्षवान् नहीं होता और अनिष्ट की प्राप्ति में शोकवान नहीं होता। वह अन्तःकरण से सदा शान्त रहता है और उसको कोई दुःख स्पर्श नहीं करता; वह अपने आपमें सदा परमानन्दरूप रहता है। जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही शान्ति के पाने से सब दुःख नष्ट होकर सदा निर्विकार रहता है। हे रामजी ! वह पुरुष सब चेष्टा करते दृष्टि आता है परन्तु सदा निर्गुणरूप है, कोई क्रिया उसको स्पर्श नहीं करती। जैसे जल में कमल निर्लेप रहता है वैसे ही शान्तिमान् सदा निर्लेप रहता है। हे रामजी ! जो पुरुष बड़ी राज्य-सम्पदा और बड़ी आपदा को पाकर ज्यों का त्यों अलग रहता है उसे शान्तिमान कहिये। हे रामजी ! जो पुरुष शान्ति से रहित है उसका चित्त क्षण-क्षण राग-द्वेष से तपता है और जिसको शान्ति की

मुमुक्षु प्रकरण । १११

प्राप्ति हुई है सो भीतर बाहर शीतल और सदा एक रस है । जैसे हिमा- लय सदा शीतल रहता है वैसे ही वह सदा शीतल रहता है । उसके मुख की कान्ति बहुत सुन्दर हो जाती है । जैसे निष्कलङ्क चन्द्रमा है वैसे ही शान्तिमान् निष्कलङ्क रहता है । हे रामजी ! जिसको शान्ति प्राप्त हुई है सो परम आनन्दित हुआ है और उसी को परम लाभ प्राप्त होता है ज्ञानी इसी को परमपद कहते हैं । जिसको पुरुषार्थ करना है उसको शान्ति की प्राप्ति करनी चाहिए । हे रामजी ! जैसे मैंने कहा है उस क्रम से शान्ति का ग्रहण करो तब संसार समुद्र के पार पहुँचोगे । इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे शमनिरूपणन्नाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब विचार का निरूपण सुनिये । जब हृदय शुद्ध होता है तब विचार होता है और शास्त्रार्थ के विचार द्वारा बुद्धि तीक्ष्ण होती है । हे रामजी ! अज्ञानवन में आपदारूपी बेलि की उत्पत्ति होती है उसको विचाररूपी खड्ग से जब काटोगे तब शान्त- आत्मा होगे । मोहरूपी हस्ती जीव के हृदयकमल का खण्ड-खण्ड कर डालता है—अभिप्राय यह है कि इष्ट अनिष्ट पदार्थ में राग द्वेष से वेदा जाता है । जब विचाररूपी सिंह प्रकटे तब मोहरूपी हस्ती का नाश कर शान्तात्मा होगे । हे रामजी ! जिसको कुछ सिद्धता प्राप्त हुई है उसे विचार और पुरुषार्थ से ही हुई है । जब प्रथम राजा विचारकर पुरुषार्थ करता है तब उसी से राज्य को प्राप्त होता है । प्रथम बल, दूसरे बुद्धि, तीसरे तेज, चतुर्थ पदार्थ आगमन और पञ्चम पदार्थ की प्राप्ति इन पाँचों की प्राप्ति विचार से होती है अर्थात् इन्द्रियों का जीतना, बुद्धि आत्मव्यापिनी और तेज, पदार्थ का आगमन इनकी प्राप्ति विचार में होती है । हे रामजी ! जिस पुरुष ने विचार का आश्रय लिया है वह विचार की दृढ़ता से जिसकी वाञ्छा करता है उसको पाता है । इसमें विचार इसका परम मित्र है । विचारवान् पुरुष आपदा में नहीं फँसता । जैसे तुम्बी जल में नहीं डूबती वैसे ही वह आपदा में नहीं डूबता । हे रामजी ! वह जो कुछ करता है विचार संयुक्त करता है और विचार संयुक्त ही देता लेता है । उसकी सब क्रिया सिद्धता का कारण होती है और