BharatKosha
Back to the archive

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र)

Source: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (origin)

DevanagariHindipublished173 pages

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२३)

Page 30Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२३)

शत्रुघ्न वांई भुजा और शेष लक्ष्मणजी होंगे और ऋषिका शाप भी अन्यथा नहीं होगा ॥ ६७ ॥ जिस समय ऋषिके शापरूपी तमोराशिसे मैं रामनाम हूँगा तब तुममेरे पास आओगे इस समय नृपके विना जाओ ॥ ६८ ॥

त्यक्त्वापि च मुनिश्रेष्ठाविति स्म प्राह माधवः । एवमुक्ते तमोनाशं तत्क्षणाच्च जगाम वै ॥ ६९ ॥ आत्मार्थं संचितं तेन प्रभुणा भक्तरक्षिणा । निवारितं हरेश्चक्रं यथापूर्वमतिष्ठत ॥ ७० ॥

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठसे त्यक्त हो विस्मित हो माधव बोले और उनके यह कहते ही तत्काल अंधकारका नाश होगया ॥ ६९ ॥ और भक्तोंकी रक्षा करनेवाले प्रभुने अपने निमित्त उसको सञ्चित किया । और निवारण किया नारायणका चक्र यथापूर्व स्थित हुआ ॥ ७० ॥

मुनिश्रेष्ठौ भयान्मुक्तौ प्रणिपत्य जनार्दनम् । निर्गतौ शोकसंतप्तावूचतुस्तौ परस्परम् ॥ ७१ ॥ अद्यप्रभृति देहांतमावां कन्यापरिग्रहम् । न करिष्याव इत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तावृषी ॥ ७२ ॥

और भयसे मुक्त हुए ऋषि जनार्दनको प्रणाम कर शोकसे संतप्त हो चले और परस्पर कहने लगे ॥ ७१ ॥ आजसे लेकर जन्मपर्यंत हम कन्याको स्वीकार नहीं करेंगे दोनों ऋषियोंने इस प्रकारकी प्रतिज्ञा करी ॥ ७२ ॥

मौनध्यानपरौ शुद्धौ यथापूर्वं व्यवस्थितौ । अम्बरीषोऽपि राजासौ परिपाल्य च मेदिनीम् ॥ ७३ ॥ सभृत्यज्ञातिसंबंधो विष्णुलोकं जगाम वै । मानार्थमंबरीषस्य तथैव मुनिसिंहयोः ॥ ७४ ॥

और मौन ध्यानमें तत्पर होकर यथापूर्वक स्थित होगये और राजा अम्बरीष यथायोग्य पृथ्वीको पालनकर ॥ ७३ ॥ भृत्य ज्ञातियोंके संबन्धियोंके सहित विष्णुलोकको गये । अंबरीष और दोनों मुनियोंके सम्मानके निमित्त ॥ ७४ ॥

रामो दाशरथिर्भूत्वा तमसा लुप्तबुद्धिकः । कदाचित्कार्यवशतः स्मृतिः स्यादात्मनः प्रभोः ॥ ७५ ॥ पूर्णार्थोऽपि महाबाहुरपूर्णार्थ इव प्रभु । अनुग्रहाय भक्तानां प्रभूणामीदृशी गतिः ॥ ७६ ॥

वह दशरथके पुत्र रामचन्द्र होकर तमसे आच्छादित हुए कभी कार्यवशसे उनको अपनी स्मृति होजाती थी ॥ ७५ ॥ वह महाबाहु पूर्ण अर्थ होकर भी अपूर्ण अर्थके समान दीखते थे भक्तोंके अनुग्रहके अर्थही स्वामियोंकी ऐसी गति होती है ॥ ७६ ॥

Page 31Permalink

(२४) अद्भुतरामायण [ पंचम-

मायां कृत्वा महेशस्य प्रोत्थिता मानुषी तनुः । तस्मान्माया न कर्तव्या विद्वद्भिर्दोषदर्शिभिः ॥ ७७ ॥ एतत्ते कथितं सर्वं रामजन्म-कथाश्रयम् । अंबरीषस्य माहात्म्यं मायावित्वं च वै हरेः ॥ ७८ ॥

वह महेशकी मायाके आश्रित हो मानुषी शरीरके प्राप्त हुए इस कारण दोष जाननेवाले महात्माओंको मायाका करना उचित नहीं है ॥ ७७ ॥ यह रामजन्मकी कथाका सम्पूर्ण आशय तुमसे कहा अम्बरीषका माहात्म्य हरिका मायामें अवतार कहा ॥ ७८ ॥

यः पठेच्छृणुयाद्वापि मायावित्वं हरेर्विभोः । मायां विसृज्य पुण्यात्मा विष्णु लोकं स गच्छति ॥ ७९ ॥ दशरथसुतजन्मकारणं यः पठति शृणोत्यनुमोदते द्विजेन्द्रः । व्रजति स भगवद्गृहातिथित्वं नहि शमनस्य भयं कुतश्चिदस्य ॥ ८० ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीरामजन्मोपक्रमश्चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

जो नारायणका यह चरित्र पढता सुनता है वह पुण्यात्मा माया त्यागकर विष्णुलोकको जाता है ॥ ७९ ॥ दशरथके पुत्रका जन्मकारण जो पढता सुनता है और अनुमोदन करता है वह नारायणके घरका अतिथि होता है यमका भय उसको नहीं होता है ॥ ८० ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रायणे व० आ० अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां श्रीरामजन्मोपक्रमश्चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पंचम सर्ग

जानकीके जन्म लेनेका कारण कथन

भरद्वाज शृणुष्वाथ सीताजन्मनि कारणम् । पुरा त्रेतायुगे कश्चित्कौशिको नाम वै द्विजः ॥ १ ॥ वासुदेवपरो नित्यं नामगानरतःसदा । भोजनाशनशय्यासु सदा तद्गतमानसः । उदारचरितं विष्णोर्गायमानः पुनः पुनः ॥ २ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२५)

Page 32Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२५)

हे भरद्वाज ! अब सीताके जन्मका कारण सुनो, त्रेतायुगमें एक कौशिक नाम ब्राह्मण था ॥ १ ॥ वह सदा वासुदेवपरायण नामगानमें रत भोजन अशन शय्यामें सदा हरिमें मन लगाये रहता था और विष्णुके उदार चरित्रोंका वारंवार गान करता था ॥ २ ॥

विष्णुस्थलं समासाद्य हरेः क्षेत्रमनुत्तमम् । अगायत हरिं तत्र तालवलगुल्यान्वितम् ॥ ३ ॥ मूर्च्छनामूर्च्छायोगेन श्रुतिमंडलवेदि- तम् । भक्तियोगसमापन्नो भिक्षामश्नाति तत्र वै ॥ ४ ॥

विष्णुके स्थल नारायणके क्षेत्रको प्राप्त होकर मनोहर ताल लयादिसे नारायणके चरित्र गाता ॥ ३॥ मूर्छना मूर्छाके योगसे श्रुति मंडलसे वेदित भक्तियोगको प्राप्त हो भिक्षाका भोजन करता था ॥ ४ ॥

तत्रैनं गायमानं च दृष्ट्वा कश्चिद्द्विजस्तदा । पद्माक्ष इत विख्यात- स्तस्मै चान्नं ददौ सदा ॥ ५ ॥ सकुतुंबो महातेज अश्नन्नन्नं च तस्य वै । कौशिको तदा हृष्टो गायन्नास्ते हरिं प्रभुम् ॥ ६ ॥

कोई ब्राह्मण इस प्रकारसे इसको गाता देखकर उसको बहुतसा अन्न देता हुआ, इसका नाम पद्माक्ष था ॥ ५ ॥ वह महातेजस्वी कुटुंबसहित उसका अन्न खाता हुआ प्रसन्नतासे गान करता था ॥ ६ ॥

शृण्वन्नास्ते स पद्माक्षः काले काले च भक्तितः । कालयोगेन संप्राप्ताः शिष्या वै कौशिकस्य च ॥७॥ सप्तराजन्यवैश्यानां विप्राणां कुलसं- भवाः । ज्ञानविद्याधिका शुद्धा वासुदेवपरायणाः ॥ ८ ॥

और वह पद्माक्ष समय समय भक्तिपूर्वक उसको श्रवण करता था कुछ समयके उपरान्त वह कौशिकका शिष्य होगया ॥ ७ ॥ सात क्षत्रिय वैश्य और ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न हुए ज्ञानविद्यामें अधिक शुद्ध वासुदेवपरायण हुए ॥ ८ ।

तेषा मपि तथान्नाद्यं पद्माक्षः प्रददौ स्वयम् । शिष्यैश्च सहितो नित्यं कौशिको हृष्टमानसः ॥९॥ विष्णुस्थले हरिं तत्र आस्ते गाय- न्यथाविधि । तत्रैव मालवो नाम वैद्यो विष्णुपरायणः ॥ १० ॥

पद्माक्ष उनके निमित्त भी अन्नप्रदान करता था शिष्यों सहित कौशिक नित्य प्रसन्न रहता ॥ ९ ॥ और विष्णुके मंदिरमें नित्य नारायणका विधिपूर्वक गान करता वहाँ एक मालव नाम वैद्य विष्णु भक्तिपरायण था ॥ १० ॥

Page 33Permalink

(२६) अद्भुतरामायण [ पञ्चम-

दीपमालां हरेर्नित्यं करोति प्रीतमानसः। मालतीनाम भार्यासीत्तस्य नित्यं पतिव्रता ॥ ११ ॥ गोमयेन समालिप्य हरेः क्षेत्रं समंततः । भर्त्रा सहास्ते संप्रीता शृण्वती गानमुत्तमम् ॥ १२ ॥

सदैवकाल प्रीतमनसे नारायणके मंदिरमें दीपक बालता, उसकी नित्य पतिव्रता मालतीनाम भार्या थी ॥ ११ ॥ वह हरिक्षेत्रको सब ओर गोबरसे लीपकर भर्ताके सात गान सुनती प्रसन्न मन रहती थी ॥ १२ ॥

कुशस्थलीसमुत्पन्ना ब्राह्मणाः शंसितव्रताः । पंचाशद्वै समापन्ना हरेर्गानार्थमुत्तमाः ॥ १३ ॥ साधयंतो हि कार्याणि कौशिकस्य महात्मनः । गानविद्यार्थतत्त्वज्ञाः शृण्वंतो ह्यवसंस्तु ते ॥ १४ ॥

कुछ कुशस्थलीके उत्पन्न हुए शोभनव्रतवाले पचास ब्राह्मण नारायणका गान करने आये ॥ १३ ॥ वे महात्मा कौशिकका कार्य साधन करने वाले थे गानविद्याको वे तत्त्व ज्ञानी सुनते हुए वहां स्थित हुए ॥ १४ ॥

ख्यातमासीत्तदा तस्य गानं वै कौशिकस्य च । श्रुत्वा राजा समभ्येत्य कालिंगो वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥ कौशिकाद्यगणैः सार्धं गायस्वेह च मां पुनः । शृणुध्वं च तथा यूयं कुशस्थलजना अपि ॥ १६ ॥

इस प्रकार उस कौशिकका गान लोकमें विख्यात होगया राजसभामें कलिंगराज यह वचन सुनकर कहने लगा ॥ १५ ॥ कि, कौशिक अपने गणोंके सहित हमारा गान करे और तुम कुशस्थलीवासी सब ब्राह्मण उसको श्रवण करो ॥ १६ ॥

तच्छ्रुत्वा कौशिकः प्राह राजानं सां त्वयन्गिरा । न जिह्वाग्रे महाराज वाणी च मम सर्वदा ॥ १७ ॥ हरेरन्यमपींद्रं वा स्तौति नापि न वक्ति च । एवमुक्ते च तच्छिष्या वसिष्ठो गौतमोऽरुणः ॥ १८ ॥

तब कौशिक वाणीसे राजाको सान्त्वन करता हुआ बोला-हे महाराज ! मेरी जिह्वाके आगे वाणी स्फुरायमान नहीं होती है ॥ १७ ॥ और तो क्या नारायणको छोड इन्द्रकी स्तुतिमें भी मेरी वाणी चलायमान नहीं होती यह कहनेपर उनके शिष्य गौतम अरुण ॥ १८ ॥

सारस्वतस्तथा वैश्यश्चित्रमालस्तथा शिशुः । ऊचुस्तं पार्थिवं तत्त्वं यथा प्राह स कौशिकः ॥ १९ ॥ श्रीकराश्च तथा प्रोचुः पार्थिवं विष्णुतत्पराः । श्रोत्राणीमानि शृण्वंतिहरेरन्यं न पार्थिवम् २०

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२७)

Page 34Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२७)

सारस्वत वैश्य चित्रमाल शिशु इसी कौशिकके वचनोंको राजासे कहते हुये ॥ १९ ॥ और इसी प्रकार विष्णुभक्त श्रीकर राजासे कहने लगे हे राजन् ! हमारे कर्ण एक नारायणके गुणानुवादही सुनते हैं अन्यके नहीं ॥ २० ॥

मा ते कीर्ति वयं तस्माच्छृणुमो नैव वा स्तुतिम् । तच्छ्रुत्वा पार्थिवो रुष्टो गीयतामिति चाब्रवीत् ॥ २१ ॥ स्वभृत्यान्ब्राह्मणा ह्येते कीर्ति शृण्वंति वै यथा । न शृण्वंति कथं तस्माद्गीयमानां समंततः ॥ २२ ॥

इस कारण हम आपकी कीर्ति वा स्तुति नहीं सुन सकते हैं यह सुन राजा रुष्ट हुआ और अपने भृत्योंको गानेको कहा ॥ २१ ॥ जैसे यह ब्राह्मण अपनी कीर्ति श्रवण करे यह हमारी कीर्ति क्यों नहीं सुनते ॥ २२ ॥

एवमुक्तास्ततो भृत्या जगुः पार्थिवसत्तमम् । निरुद्धकर्णा विप्रास्ते गाने वृत्ते सुदुःखिताः ॥ २३ ॥ काष्ठशंकुभिरन्योन्यं श्रोत्राणि बिभिदुः किल । कौशिकाद्यास्तु तां ज्ञात्वा मनोवृत्तिं नृपस्य वै ॥ २४ ॥

राजाके सेवक राजाज्ञासे गान करने लगे तब उन ब्राह्मणोंने दुःखी हो अपने कान बंद कर लिये ॥ २३ ॥ इनके कान लोहकीलसे भेदन कर दूं इस प्रकार राजाकी चेष्टा जानकर कौशिकादि ब्राह्मण ॥ २४ ॥

निर्बन्धं कुरुते कस्मात्स्वगानेऽसौ नृपः स्थिरम् । इत्युक्त्वा ते सुनियता जिह्वाग्रं चिच्छिदुः स्वकम् ॥ २५ ॥ ततो राजा सुसंक्रुद्धः स्वदेशात्तान्व्यवासयत् । आदाय वित्तं सर्वेषां ततस्ते जग्मुरुत्तराम् २६

कि, यह राजा क्यों गानेमें हठ करता है अपनी जिह्वा छेदन करते हुए ॥ २५ ॥ तब राजाने क्रोध कर उनको अपने देशसे निकाल दिया और उन सबका धन ले लिया तब वे उत्तरदिशाको चले गये ॥ २६ ॥

दिशामसाद्य कालेन कालधर्मेण योजिताः । तानागतान्यमो दृष्ट्वा किंकर्तव्यमिति स्म ह ॥ २७ ॥ विस्मितस्तत्क्षणे विप्र ब्रह्मा प्राह सुराधिपान् । कौशिकादीन्द्विजानद्य वासुदेवपरायणान् ॥ २८ ॥

और समयपर कालधर्मसे योजित हुए यमने उनको आता देखकर विचार किया कि, हमको अब क्या कर्तव्य है ॥ २७ ॥ उस समय उनको विस्मित देख ब्रह्माजीने देवाधिपतियोंसे कहा जो कि कौशिकादि ब्राह्मण वासुदेवपरायण थे ॥ २८ ॥

Page 35Permalink

(२८) अद्भुतरामायण [पंचम-

गानयोगेन ये नित्यं पूजयंति जनार्दनम् । तानादाय भद्रं वो यदि देवत्वमिच्छथ ॥ २९ ॥ इत्युक्ता लोकपालास्ते कौशिकेति पुनः पुनः । मालतीति तथा केचित्पद्माक्षीति तथापरे ॥ ३० ॥

जो नित्य गानयोगसे जनार्दनकी पूजा करते हैं जो देवत्वकी इच्छा करें तो उनको हमारे पास ले आओ ॥ २९ ॥ ऐसा कहनेपर हे लोकपाल, हे कौशिक, हे मालती, हे पद्माक्षी ! ऐसा बारंबार कहने लगे ॥ ३० ॥

क्रोशमानाः समभ्येत्य तानादाय विहायसा । ब्रह्मलोकं गताः शीघ्रं मुहूर्त्ताद्धेन वै सुराः ॥ ३१ ॥ कौशिकादींस्तथा दृष्ट्वा ब्रह्मा लोक-पितामहः । प्रत्यागम्य यथान्यायं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ ३२ ॥

इस प्रकार उनको सम्बोधन देकर आकाश मार्गसे एक आधे मुहूर्त्तमात्रमें ब्रह्मलोकको लेगये ॥ ३१ ॥ लोकपितामह ब्रह्माजी कौशिकादिको देखकर यथायोग्य आगत स्वागतसे उनकी पूजा करते हुए ॥ ३२ ॥

ततः कोलाहलश्चाभूदतिगौरवमुल्बणम् । ब्रह्मणा च कृतं दृष्ट्वा देवानां द्विजसत्तम ॥ ३३ ॥ हिरण्यगर्भो भगवांस्तान्निवार्य सुरोत्त-मान् । कौशिकादींस्तदादाय मुनिर्देवैः समावृतः ॥ ३४ ॥

तथा बड़ा भारी कोलाहल होने लगा, ब्रह्माजीका किया सत्कार देख कर ॥ ३३ ॥ हिरण्यगर्भ भगवान् सर्व देवताओंको निवारण कर कौशिकादिको लेकर मुनि देवताओंके साथ ॥ ३४ ॥

विष्णुलोकं ययौ शीघ्रं वासुदेव परायणः । तत्र नारायणो देवः श्वेतद्वीपनिवासिभिः ॥ ३५ ॥ ज्ञानयोगेश्वरैः सिद्धैर्विष्णुभक्तिपरा-यणैः । नारायणसमैर्दिव्यै श्चतुर्बाहुधरैः शुभैः ॥ ३६ ॥

वह वासुदेव परायण शीघ्र विष्णुलोकको चले गये । वहाँ नारायणदेव श्वेतद्वीपनिवासियोंके साथ ॥ ३५ ॥ ज्ञानयोगेश्वर सिद्ध और विष्णुभक्ति-परायण तथा नारायणके समान नित्य दिव्य चार भुजा धारण किये ॥ ३६ ॥

विष्णुचित्तसमापन्नैर्दीप्यमानैरकल्मषैः । अष्टाशीतिसहस्रैस्तु सेव्यमानो मनोजवैः ॥ ३७ ॥ अस्माभिर्नारदाद्यैश्च सनकाद्यैरक-ल्मषैः ॥ भूतैर्नानाविधैश्चैव दिव्यस्त्रीभिः समंततः ॥ ३८ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२९)

Page 36Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२९)

शंख चक्र आदि लिये दीप्तिमान् अठ्ठासी सहस्र मनोगमी महात्माओंसे सेवित ॥ ३७ ॥ हम और नारद तथा सनकादिक पापरहित और भी नाना प्रकारकी दिव्य स्त्रीजनोंसे सब ओरसे व्याप्त ॥ ३८ ॥

सेव्यमानोऽथ मध्ये वै सहस्रद्वारसंवृत्ते ॥ सहस्रयोजनायामे दिव्ये मणिमये शुभे ॥ ३९ ॥
विमाने विमले चित्रे भद्रपीठासने हरिः । लोककार्यप्रसक्तानां दत्त्वा दृष्टिं समास्थितः ॥ ४० ॥

और सेव्यमान सहस्र द्वारसे युक्त सहस्र योजनके लम्बे चौड़े दिव्य मणियोंसे जटित सुन्दर ॥ ३९ ॥ विमल चित्र विमानोंमें भद्रपीठ आसनके ऊपर लोककार्यमें लगे पुरुषोंपर दृष्टि देकर नारायण स्थित थे ॥ ४० ॥

तस्मिन्कालेऽथ भगवान्कौशिकाद्यैश्च संवृतः ॥ आगम्य प्रणिपत्याग्रे तुष्टाव गरुडध्वजम् ॥ ४१ ॥
ततोऽवलोक्य भगवान्हरिर्नारायणः प्रभुः ॥ कौशिकेत्याह संप्रीत्या तान्सर्वांश्च कथाक्रमम् ॥ ४२ ॥

उस समय भगवान् ब्रह्मा कौशिकादिसे युक्त भगवान् गरुडध्वजके समीप आकर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४१ ॥ तब भगवान् नारायण उनको देखकर उन सबसे सम्बोधन देकर सबसे यथाक्रम कहने लगे ॥ ४२ ॥

जयघोषो महानासीन्महाश्चर्यं समागते । ब्रह्माणमाह विश्वात्मा शृणु ब्रह्मन्नथोदितम् ॥ ४३ ॥
कौशिकस्य च ये विप्राः साध्यसाधनतत्पराः ॥ हिताय संप्रवृत्ता वै कुशस्थलनिवासिनः ॥ ४४ ॥

सब ओरसे जयघोष और महाआश्चर्य होने लगा और विश्वात्मा कहने लगे हे ब्राह्मण ! यह वृत्तान्त सुनो ॥ ४३ ॥ जो ब्राह्मण कौशिकके साध्य साधनमें तत्पर हैं जो कुशस्थलनिवासी उनके हितमें संवृत हुए हैं ॥ ४४ ॥

मत्कीर्तिश्रवणे युक्ता गानतत्त्वार्थकोविदाः ॥ अनन्यदेवताभक्ताः साध्या देवा भवंत्विमे ॥ ४५ ॥
मत्समीपे तथा ह्यस्य प्रवेशं देहि सर्वदा ॥ एवमुक्त्वा पुनर्देवः कौशिकं प्राह माधवः ॥ ४६ ॥

मेरी कीर्तिश्रवणमें युक्त गानतत्त्वके जाननेवाले वे अन्यदेवताभक्त साध्य देव कहलायेंगे ॥ ४५ ॥ और इनका प्रवेश सदा हमारे समीप रहेगा ऐसा कहनेपर फिर माधवने कौशिकसे कहा ॥ ४६ ॥

Page 37Permalink

(३०) अद्भुतरामायण [पञ्चम-

स्वशिष्यैस्त्वं महाप्राज्ञ दिग्बलो नाम वै सदा ॥ गणाधिपत्यमापन्नो यत्राहं तत्समास्व वै ॥४७॥ मालतीमालवं* चेति प्राह दामोदरो वचः ॥ मम लोके यथाकामं भार्यया सह मालव ॥ ४८ ॥

तुम अपने शिष्योंसहित दिग्बल नामवाले होकर गणाधिपत्यको प्राप्त हो जहां मैं स्थित हूँ वहां सदा निवास करो ॥ ४७ ॥ और फिर मालतीसहित मालवसे दामोदर कहने लगे, मालव ! तुम अपनी भार्याके सहित मेरे लोकमें ॥ ४८ ॥

दिव्यरूपधरः श्रीमाञ्छृण्वन्गानमिहानुगैः ॥ आस्व नित्यं यथाकामं यावल्लोका भवंति वै ॥ ४९ ॥ पद्माक्षमाह भगवान् धनदो भव मानद ॥ धनानामीश्वरो भूत्वा विहरस्व यथासुखम् ॥ ५० ॥

दिव्यरूप धारण किये अनुचरोंके सहित गान श्रवण करते रहो । जबतक यह लोक है तबतक यथायोग्य निवास करो ॥ ४९ ॥ पद्माक्षसे फिर विष्णु बोले, तुम धनद हो धनपति होकर यथेच्छा विहार करो ॥ ५० ॥

ब्रह्माणं च ततः प्राह कौशिकोडभूद्गणाधिपः । गणाः स्तोष्यंति तं चाशु प्राप्तो मेऽस्ति सलोकताम् ॥ ५१ ॥ एते च विप्रा नियतं मम भक्ता यशस्विनः । श्रोत्रच्छिद्रं यथाहत्य शंकुभिर्वै परस्परम् ॥ ५२ ॥

और फिर ब्रह्माजीसे कहा यह कौशिक गणपति हो दूसरे गण इसको सन्तुष्ट करें और यह मेरी सलोकताको प्राप्त होगा ॥ ५१ ॥ यह यशस्वी ब्राह्मण मेरे भक्त हैं यह परस्पर शंकुओंसे अपने कानोंके छिद्रोंको ताडनकर प्रतिज्ञा करते हुए ॥ ५२ ॥

श्रोण्यामो नैव चान्यद्वै हरेः कीर्त्ति विनेति ये । महाव्रतधरा विप्रा मम भक्तिपरायणाः ॥ ५३ ॥ एते प्राप्ताश्च देवत्वं मम सान्निध्यमेव च । मालवो भार्यया सार्द्धं मत्क्षेत्रं परिगृह्य वै ॥ ५४ ॥

नारायणके सिवाय हम दूसरेकी कीर्ति श्रवण नहीं करेंगे इस कारण ये मेरी भक्तिमें परायण महाव्रतधारी ब्राह्मण ॥ ५३ ॥ यह देवत्वको और हमारी सन्निकटताको प्राप्त हो और मालव भार्याके सहित मेरे क्षेत्रको ग्रहण कर ॥ ५४ ॥


* मालतीसहितं मालवम् ।

सर्ग हिन्दीटीकासहित (३१)

Page 38Permalink

सर्ग हिन्दीटीकासहित (३१)

मानमानादिभिर्नित्यमभ्यर्च्य सततंतं हि माम् । गानं शृणोति नियतो मत्कीर्तिचरितान्वितम् ॥ ५५ ॥ तेनासौ प्राप्तवाँल्लोकं मम ब्रह्मन् सनातनम् । पद्माक्षोऽसौ महाभागः कौशिकस्य महात्मनः । ५६

नित्य दानमानादिसे मेरा पूजन कर मेरी कीर्ति चरित्रयुक्त गान श्रवण करके स्थित रहे ॥ ५५ ॥ इसी कारण इसको हमारे सनातन ब्रह्मलोक प्राप्त हुए हैं, यह महात्मा कौशिकका पद्माक्ष नाम शिष्य ॥ ५६ ॥

धनेशत्वमवाप्तोऽसौ मम सान्निध्यमेवच । एवमुक्त्वा हरिस्तत्र समास्ते लोकपूजितः ॥५७॥ ततो हरिर्भक्तजनैः समावृतः सुखेन तस्थौ कनकासने शुभे ॥ भक्तैकगम्यो निजभक्तलोकान्स लालयन्पाणिसरोरुहेण ॥ ५८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे कौशिकादिवैकुंठगमनं नाम पंचमः सर्गः ॥५॥

धनेशत्वको प्राप्त हो हमारे निकट निवास करता रहे, यह कहकर समस्तलोकपूजित हरि ॥ ५७ ॥ भक्तजनोंके सहित सुन्दर आसनपर स्थित होकर भक्तोंकेही दर्शनयोग्य अपने हस्तकमलसे इनको लालन करते हुए ॥ ५८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीयेआदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां कौशिकादिवैकुण्ठगमनं नाम पंचमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठ सर्ग

हरिमित्रोपाख्यान तथा कौशिकादिका वैकुंठगमन वर्णन

तस्मिन्क्षणे समारब्धो मधुराक्षरपेशलैः ॥ महामहोत्सवस्तत्र कौशिकप्रीतयेऽद्भुतः ॥ १ ॥ विपंचीगुणतत्त्वज्ञैर्वाद्यविद्याविशारदैः ॥ ततस्तच्छ्रवणायलं चेटीकोटिसमावृत्ता ॥ २ ॥

उस समय कौशिककी प्रीतिके निमित्त मधुराक्षरोंसे युक्त महामहोत्सव आरंभ हुआ ॥ १ ॥ विपंचीके गुण और तत्त्वके जाननेवाले वाद्यविद्यामें चतुरोंके गान श्रवण करनेको करोडों दासी आकर प्राप्त हुईं ॥ २ ॥

गायमाना समायाता लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहः ॥ वृता सहस्त्रकोटीभिर्वेत्रपाणिभिराशुगैः ॥ ३ ॥ ब्रह्मादिसुरसंघानां धनं दृष्ट्वा समागमम् ॥ चेटीगणाधिपा रुष्टा भुशुंडीपरिघान्विताः ॥ ४ ॥

Page 39Permalink

(३२) अद्भुतरामायण षष्ठ-

उस समय विष्णुपरिग्रहा लक्ष्मी गान करती हुई अनन्त वेत्रपाणी संयुक्त दासियोंके साथ आई ॥ ३ ॥ उस समय ब्रह्मादि देवताओंका घना समागम देख भुशुण्डी हाथमें लिये चेटीगणोंके अधिपति रुष्ट हुए ॥ ४ ॥

ब्रह्मादींस्तर्जयंत्यस्तान्मुनींश्चापि समन्ततः ॥ उत्सार्य दूरं संहृष्टा विष्ठिताः पर्वतोपमाः ॥ ५ ॥ सर्वे बहिर्विनिर्याताः सार्द्धं वै ब्रह्मणा सुराः ॥ युक्तमित्येव भाषन्तः प्रभोरग्रे वयं तु के ॥ ६ ॥

वे ब्रह्मा मुनि आदिसे वहां बैठनेका निषेध करने लगे और उनको वहांसे ले जाकर दूर बैठा दिया ॥ ५ ॥ अर्थात् ब्रह्मादि देवता वहाँसे दूसरे स्थानमें प्राप्त कर दिये उन्होंने कह यह युक्त ही है प्रभुके आगे हमारा क्या सामर्थ्य है ॥ ६ ॥

तस्थुः प्रांजलयः सर्वे त्रिदशागत मन्यवः ॥ तस्मिन्क्षणे समाहूतस्तुम्बुरुर्मानपूर्वकम् ॥ ७ ॥ प्रविवेश समीपं वै देव्या देवस्य चैव हि ॥ तत्रासीनो यथायोगं नानामूर्च्छाक्षरान्वितम् ॥ ८ ॥

इस कारण क्रोधरहित सब देवता हाथ जोड़ स्थित हुए, उस समय मानपूर्वक तुम्बरु गन्धर्वको बुलाया ॥ ७ ॥ यह देवी और देवके समीपमें प्राप्त हुआ वहां उसके यथायोग्य बैठनसे अनेक मूर्छनादिसे युक्त ॥ ८ ॥

जगौ कलपदं हृष्टो विपंचीं चाप्यवादयत् ॥ विष्णुना कौशिकप्रीत्यै प्रत्युक्तो गायकोत्तमः ॥ ९ ॥ नानारत्नसमायुक्तैर्दिव्यैराभरणोत्तमैः ॥ दिव्यमाल्यैश्च वसनैः पूजितो विष्णुमंदिरात् ॥ १० ॥

मनोहर वीणाको बजाने लगा, विष्णुने कौशिककी प्रीतिके निमित्त यह उत्तम गायक निर्धारक किया ॥ ९ ॥ नाना रत्नोंसे समायुक्त दिव्य आभरणोंसे व्याप्त दिव्य माला और वस्त्रोंसे पूजित विष्णुके मंदिरसे ॥ १० ॥

निर्गतस्तुम्बुरुर्हृष्टो जगाम स यथागतम् ॥ ब्रह्माद्यास्त्रिदशाः सर्वे मुनयश्च यथागतम् ॥ ११ ॥ जग्मुर्विष्णुं प्रणम्योच्चैर्जय्येति भाषिणस्ततः ॥ नारदोऽथ मुनिर्दृष्ट्वा तुंबरोः सत्क्रियां हरेः ॥ १२ ॥

प्रसन्न हो तुम्बुरु निकला, और ब्रह्मादि सम्पूर्ण देवता तथा मुनिजन यथा गतिको ॥ ११ ॥ विष्णुको प्रणाम करके गये और जयजय भाषण करने लगे । नारदजी नारायण मंदिरमें तुम्बरुका यह सत्कार देखकर ॥ १२ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ३३ )

Page 40Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ३३ )

शोकाविष्टेन मनसा संतप्तहृदयेक्षणः ॥ चिन्तामापेदिवांस्तत्र शोकमूर्च्छाकुलांतरः ॥ १३ ॥ ततः क्रोधेन महता ज्जवाल मुनिपुंगवः । लक्ष्मीं शशाप सहसा तद्दासीभिस्तिरस्कृतः ॥ १४ ॥

महाशोकित और हृदयमें सन्तप्त हो शोकसे मूर्च्छित हो विचार करने लगे ॥ १३ ॥ और फिर महाक्रोधसे मुनि प्रज्वलित हो उठे, और उनकी दासियोंसे तिरस्कार होनेके कारण सहसा लक्ष्मीको शाप दिया ॥ १४ ॥

यदहं राक्षसं भावं गृहीत्वा विष्णु कांतया ॥ चेटीभिर्वारितो दूरं वेत्राघातेन ताडितः ॥ १५ ॥ तस्मात्संजायतां लक्ष्मी रक्षसां गर्भसंभवा ॥ यतोऽहं बहिराक्षिप्तश्चेटीभिः सावहेलनम् ॥ १६ ॥

जो कि लक्ष्मीने मुझे राक्षसभावसे ग्रहण किया है और चेटियोंसे निवारित कर वेत्राघात कराया है ॥ १५ ॥ इस कारण यह लक्ष्मी राक्षस गर्भसे उत्पन्न होगी, जो कि, दासियोंने तिरस्कार कर मुझे बाहर निकाल दिया ॥ १६ ॥

हेलया राक्षसी च त्वां बहिः क्षेप्स्यति भूतले ॥ इत्युक्ते नारदेनाथ चकंपे भुवनत्रयम् ॥ १७ ॥ हाहाकारं ततश्चक्रुर्देवगंधर्वदानवाः ॥ नारदो विललापाथ धिग्धिङ् मामिति च ब्रुवन् ॥ १८ ॥

इसी प्रकार तिरस्कार कर राक्षसी तुमको बाहर पृथ्वीपर डालेगी नारदके ऐसा कहनेपर त्रिलोकी कम्पित होगई ॥ १७ ॥ देव गन्धर्व दानव हाहाकार करने लगे, तब क्रोध शान्त होनेपर विलाप कर नारदजी अपनेको धिक्कार देने लगे ॥ १८ ॥

नारायणसभायोगो महालक्ष्मीसमीपतः ॥ अहो तुंबुरुणा प्राप्तो धिङ्मां मूढमचेतनम् ॥ १९ ॥ योऽयं हरेः सन्निकासाद्दूतैर्निर्वासितः कथम् ॥ जीवन्यास्यामि कुत्राहं किं मे तुंबुरुणा कृतम् ॥ २० ॥

कि, नारायणके और महालक्ष्मीके समीपमें तुम्बुरुके सामने तिरस्कार हुआ मुझे धिक्कार है ॥ १९ ॥ जो कि नारायणके सन्मुख दूतोंसे निकाला गया अब मैं जीता कहाँ जाऊँ मुझे तुम्बुरुने क्या कर दिया ॥ २० ॥

रोदमानो मुहुर्विद्वान्धिङ्मामिति च चिंतयन् ॥ ततो नारायणो लक्ष्म्याः शापं श्रुत्वा सुदारुणम् ॥ २१ ॥ लक्ष्म्या सह हृषीकेश आजगाम यतो मुनिः ॥ रमां प्रसाद्यं तं विप्रं प्रत्युवाच कृतांजलिः ।२२

Page 41Permalink

(३४) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-

वह विद्वान् बारंबार रुदन करते अपनेको धिक्कारते विचारने लगे और नारायणने लक्ष्मीका दारुण शाप सुनकर ॥ २१ ॥ लक्ष्मीके सहित नारदजीके समीप आगमन किया और लक्ष्मी नारदजीको प्रसन्न कर हाथ जोड बोली । २२

यदुक्तं भवता मह्यं तत्तथा न तदन्यथा । तत्र किंचित्प्रार्थयामि मुने तत्कृपया कुरु ॥ २३ ॥ आरण्यानां मुनीनां वै स्तोकं स्तोकं च शोणितम् ॥ कलशापूरितं भक्षेद्राक्षसी या च कामतः ॥ २४ ॥

जो अपने मेरे प्रति कहा है वह अन्यथा न होगा, मैं कुछ प्रार्थना करती हूँ आप मुझ पर कृपा करो ॥ २३ ॥ वनके मुनियोंका थोडा थोडा रुधिर कलशेमें भरकर प्राप्त हो जो राक्षसी अपनी इच्छासे उसको भक्षण करे ॥ २४ ॥

तस्या गर्भे भविष्यामि तच्छोणितसमुद्भवा ॥ इत्युक्तं रमया-चिंत्या(संभावान्नौ भवेदिति ॥ २५ ॥ नारदस्तु तथेत्याह अस्याः सर्वं हि दारुणम् ॥ ततो नारायणो देवः प्रोक्तवान्नारदं मुनिम् ॥ २६ ॥

उसीके गर्भसे उस रुधिर द्वारा मैं उत्पन्न हूं। अव लक्ष्मीने इस प्रकार अपने होनेकी प्रार्थना की ॥ २५ ॥ तब नारदने कहा यह सब दारुणता तुम्हारे निमित्त होगी तब नारायणने नारदसे कहा ॥ २६ ॥

नाहं दानेन तपसा नेज्यया नापि तीर्थतः । संतुष्यामि द्विजश्रेष्ठ यथा नाम्नां प्रकीर्तनात् ॥ २७ ॥ गानेन नामगुणयोर्मम सायुज्यमाप्नुयात् ॥ निदर्शनं कौशिकोऽत्र गानान्मल्लोकमाप्तवान् ॥२८॥

मैं दान, तप, इज्या (यज्ञ) तीर्थसे ऐसा प्रसन्न नहीं होता हूं जैसा नामकीर्तनसे होता हूं ॥ २७ ॥ जो मेरे नाम गान करता है वह मेरे सायुज्य लोकको प्राप्त होता है, इसमें उदाहरणरूप कौशिक है जो गानसे मेरे लोकको प्राप्त हुआ है ॥ २८ ॥

मूर्च्छनादियुतं गानं नाम्नामपि मम प्रियम् ॥ तुंबुरुस्तत्प्रभावेण प्रियस्त्वत्तोपि मे द्विज ॥ २९ ॥ मूर्च्छनातालयोंगेन गानेन त्वं तथा भव ॥ उलूकं पश्य गत्वा त्वं यदि गाने मतिस्तव ॥ ३० ॥

मूर्च्छनादियुक्त तालसे जो मेरे नाम गाता है वह मुझे अतिप्रिय है इसीके प्रभावसे तुम्बुरु तुमसे अधिक प्यारा है ॥ २९ ॥ मूर्च्छना तालयोग और गानकर तुम भी इस प्रकारके हो यदि तुम्हारी गानमें मति है तो जाकर उलूकको देखो ॥ ३० ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३५)

Page 42Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३५)

मानसोत्तरशैले तु गानबंधुरिति स्मृतः ॥ तद्गच्छ शीघ्रं शैलेंद्रं गानवांस्त्वं भविष्यसि ॥ ३१ ॥ इत्युक्तो विस्मयाविष्टो नारदो वाग्विदां वरः ॥ मानसोत्तरशैले तु गानबंधुं जगाम वै ॥ ३२ ॥

वह मानसके उत्तर पर्वतपर गानबंधु नामसे विख्यात है उसके पास जानेसे तुम गानविद्यायुक्त हो जाओगे ॥ ३१ ॥ श्रेष्ठ बोलनेवालोंमें श्रेष्ठ नारदजी यह कहने पर मानसके उत्तर और गानबंधुके समीपमें गये ॥ ३२ ॥

गंधर्वाः किन्नरा यक्षास्तथा चाप्सरसां गणाः ॥ समासीनास्तु परितो गानबंधुश्च मध्यतः ॥ ३३॥ गानाशिक्षासमापन्नाः शिक्षिता स्तेन पक्षिणा ॥ स्निग्धकंठस्वरास्तत्र समासीना मुदान्विताः ॥ ३४ ॥

गंधर्व किन्नर यक्ष अप्सराओंके समूह उसके चारों ओर थे और गान बंधु मध्यमें स्थित था ॥ ३३ ॥ गान शिक्षासे युक्त उसने अनेक पक्षियोंको भी कर दिया था, स्निग्ध कंठवाले अनेक पक्षी वहां स्थित थे ॥ ३४ ॥

ततो नारदमालोक्य गानबंधुरुवाच ह ॥ प्रणिपत्य यथा न्याय्यं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ ३५ ॥ किमर्थं भगवन्नत्र चागतोऽसि महद्युते ॥ किं कार्यं हि महाब्रह्मन्ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३६ ॥

तब नारदजीको आता देख गानबंधु कहने लगा और नम्रतासे प्रणाम कर पूजन करता हुआ ॥ ३५ ॥ हे महाकान्तिमान ! आप किस कारणसे यहां आकर प्राप्त हुए हो, हे महाब्रह्मन् ! कहिये, आपका क्या कार्य है उसके करनेमें देर न करूं ॥ ३६ ॥

तच्छ्रुत्वा नारदो धीमान्प्रत्युवाच सपक्षिणम् ॥ उलूकेन्द्र महाप्राज्ञ शृणु सर्वं यथातथम् ॥ ३७ ॥ मम वृत्तं प्रवक्ष्यामि तच्च भूतं महाद्भुतम् ॥ वैकुण्ठनगरेब्रह्मन्नारायणसमीपगम् ॥ ३८ ॥

यह सुन बुद्धिमान् नारद पक्षिराजसे कहने लगे हे महाप्राज्ञ उलूकेन्द्र ! आप सब यथा योग्य श्रवण कीजिये ॥ ३७ ॥ मैं अपना महाद्भुत वृत्तान्त कहता हूं कि, वैकुण्ठनगरमें नारायणके समीपमें ॥ ३८ ॥

मां विनिर्धूय संदृष्टं समाहूय च तुंबुरुम् ॥ लक्ष्मीसमन्वितो विष्णु- रशृणोद्गानमुत्तमम् ॥ ३९॥ ब्रह्मादयो वयं सर्वे निरस्ताः स्थानत- श्च्युताः ॥ कौशिकाद्याः समासीना गानयोगेन वै हरिम् ॥ ४० ॥

Page 43Permalink

( ३६ ) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-

मुझे तिरस्कार कर तुम्बुरुकी स्थिती की गई है और लक्ष्मीसहित विष्णुने उसका गान श्रवण किया है ॥३९॥ ब्रह्मादि हम सब देवता स्थानसे बाहर किये गये और कौशिकादि बैठे रहे गानयोगसे नारायणके समीप रहे ॥ ४० ॥

समाराध्यैव संप्राप्ता गाणपत्यं यथासुखम् ॥ तेनाहमतिदुःखार्त्तो यत्तप्तं तु मया तपः ॥ ४१ ॥ यद्दत्तं यद्धुतं चैव यच्चापि श्रुतमेव हि ॥ यदधीतं च गानस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥ ४२ ॥

और उनकी आराधनासे उनको गाणपत्य पदकी प्राप्ति हुई है, उससे मैं बडा दुःखी हूं, जो कुछ मैंने तप किया है ॥ ४१ ॥ जो दिया, हवन किया और सुना है, जो पढा है वह गानविद्याकी सोलहवीं कलाभी नहीं है ॥ ४२ ॥

विष्णोर्माहात्म्ययुक्तस्य गानयोगस्य वै ततः ॥ पश्चात्तापं च मे दृष्ट्वा मां च नारायणोऽब्रवीत् ॥ ४३ ॥ उलूकं गच्छ देवर्षे गानबन्धुं मतिर्यदि ॥ गाने च वर्तते ब्रह्मंस्तत्र त्वं गानमाप्स्यसि ॥ ४४ ॥

जिस कारण कि विष्णुके माहात्म्यसे युक्त गानयोगकी अधिकाई देख पश्चात्ताप करते मुझसे नारायण कहने लगे ॥ ४३ ॥ हे देवर्षि ! यदि गानमें आपको इच्छा है तो उलूककेपास जाइये वह गानका आचार्य्य है वहां तू गानकी प्राप्ति करेगा ॥ ४४ ॥

इत्यहंप्रेषितस्तेन त्वत्समीपमिहागतः ॥ किं करिष्यामि शिष्योऽहं तव मां पाल्याव्यय ॥४५॥ नारदं प्राह धर्मात्मा गानबन्धुर्महायशाः ॥ शृणु नारद यद्वृत्तं पुरा मम महामते ॥ ४६ ॥

इस प्रकार मैं उनका भेजा तुम्हारे पास आया हूं हे अविनाशी ! मैं तुम्हारा किंकर हूँ, तुम मेरा पालन करो ॥ ४५ ॥ महायशस्वी गानबन्धु नारदजीसे बोले हे नारद ! जो हमारा पूर्वजन्मका वृत्तांत है वह सुनो ॥ ४६ ॥

अत्याश्चर्य्यसमायुक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥ भुवनेशइति ख्यातो राजाभूद्धार्मिकः पुरा ॥ ४७ ॥ अश्वमेधसहस्रैश्च वाजपेया युतेन च ॥ अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरिष्टवान्भूरिदक्षिणैः ॥ ४८ ॥

जो अति आश्चर्यसंयुक्त और पापका हरनेवाला है पहले एक धर्मात्मा राजा था ॥ ४७ ॥ सहस्त्र अश्वमेध और दशसहस्त्र वाजपेय और भी अनेक बडी बडी दक्षिणवाले यज्ञ ॥ ४८ ॥

सर्ग ] . हिन्दीटीकासहित (३७)

Page 44Permalink

सर्ग ] . हिन्दीटीकासहित (३७)

गवां कोटयर्बुदं चैव सुवर्णस्य तथैव च ।। वाससां रथनागानां कन्या श्वानां तथैव च ।। ४९ ।। दत्त्वा स राजा विप्रेभ्यो मेदिनीं पर्यपालयत् ।। न्यवारयत्स्वके राज्ये गानयोगेन केशवम् ।। ५० ।। गौ करोडों, अरबों सुवर्ण, वस्त्र, रथ, नाग कन्या अश्व ।। ४९ ।। राजाने ब्राह्मणोंको दिये पृथ्वीका पालन करता रहा औ गानयोगसे केशवको निवारण किया ।। ५० ।।

अन्यं वा गानयोगेन गायेद्यदि स मे भवेत् ।। वध्यः सर्वात्मना तस्माद्वेदैरीड्यः परः पुमान् ।। ५१ ।। न ब्राह्मणैश्च गातव्यं वह- द्भिर्वेदमुत्तमम् ।। गानयोगेन सर्वत्र स्त्रियो गायंतु मां सदा ।। ५२ ।। कि, जो कोई गान करेगा वह मेरे हाथसे वध्य होगा कारण कि, नारायणकी स्तुति वेदवचनोंसे होती है ।। ५१ ।। वेदधारी ब्राह्मणोंको गान नहीं करना चाहिये और गानयोगसे सर्वत्र स्त्रियें मुझको ज्ञान करें ।। ५२ ।।

सूतमागधसंघाश्च गीतं मे कारयन्तु वै ।। इत्याज्ञाप्य महातेजा राज्यं वै पर्यपालयत् ।। ५३ ।। तस्य राज्ञः पुराभ्याशे हरिमित्र इति स्मृतः ।। ब्राह्मणो विष्णुभक्तश्च सर्वद्वंद्वविवर्जितः ।। ५४ ।। सूत मागधोंके सहित स्त्रीजन मेरे निमित्त गान करें इस प्रकार कहकर वह महातेजस्वी राज्य करने लगा ।। ५३ ।। उस राजाके समीपमें एक हरिमित्र था, जो ब्राह्मण विष्णुभक्त और सब द्वन्द्वसे वर्जित था ।। ५४ ।।

नदीपुलिनमासाद्य प्रतिमाञ्च हरेः शुभाम् ।। समभ्यर्च्य यथा- शास्त्रं घृतदध्युत्तरं बहु ।। ५५ ।। मिष्टान्नं पायसं दत्त्वा हरेरावेद्य धूपकम् ।। प्रणिपत्य यथान्यायं तत्र विन्यस्तमानसः ।। ५६ ।। नदीके किनारे जाकर नारायणकी प्रतिमाको शास्त्रानुसार अर्चनकर शास्त्रपूर्वक घृत दही आदिके सहित ।। ५५ ।। मिष्टान्न और खीर धूपादि नारायणको निवेदन कर यथायोग्य प्रणाम कर उसमें मन लगाय ।। ५६ ।।

अगायत हरिं तत्र तालवीणालयान्वितम् ।। अतीव स्नेहसंयुक्त- स्तद्गीतेनान्तरात्मना ।। ५७ ।। ततो राज्ञः समादेशा.दूटास्तस्य समागताः ।। तदर्चनादि सकलं निर्धूय च समन्ततः ।। ५८ ।।

Page 45Permalink

Digitized by Sarayu Foundation Trust, Delhi and eGangotri. Funding by IKS

( ३८ ) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-

ताल वीणा लयके सहित नारायणका गुण गाता था, और अपने मनमें महान् स्नेह करता था ॥ ५७ ॥ तब राजाकी आज्ञासे योद्धा वहां आये उन्होंने वह पूजादिकी सामग्री सब नष्ट कर दी ॥ ५८ ॥

ब्राह्मणं च गृहीत्वा ते राज्ञे सम्यङ्‍न्यवेदयन् ॥ ततो राजा द्विजश्रेष्ठं परिभर्त्स्र्य सुदुर्मनाः ॥ ५९ ॥ राज्यान्निर्वासयामास हृत्वा सर्वधनादिकम् ॥ प्रतिमां च हरेश्चैव नापश्यत्स यदृच्छया ॥ ६० ॥

और ब्राह्मणको पकड़कर राजाके पास ले गये, तब राजाने दुःखी हो उस ब्राह्मणको बहुत झिडका ॥ ५९ ॥ और सब धनादि लेकर उसे राज्यसे निकाल दिया और कभी उसने अपनी इच्छासे नारायणकी मूर्तिका दर्शन न किया । ६० ।

ततः कालेन महता कालधर्ममुपेयिवान् ॥ लोकान्तरमनुप्राप्य उलूकं देहमाश्रितः ॥ ६१ ॥ सर्वत्र गच्छमानोपि भक्ष्यं किंचिन्न चाप्तवान् ॥ क्षुधार्तश्च सदा खिन्नो यममाह सुदुःखितः ६२ ॥

फिर कुछ समयके उपरान्त वह कालधर्मको प्राप्त हुआ लोकान्तरको प्राप्त होकर उलूक हो गया ॥ ६१ ॥ सर्वत्र जानेपरभी उसको कहीं कुछ भक्ष्य प्राप्त न हुआ और क्षुधासे खिन्न हो यमराजसे उसने कहा ॥ ६२ ॥

क्षुत्पीडा वर्तते देव दुर्गतस्य सदा मम ॥ मया पापं कृतं किंवा किं करिष्यामि वै यम ॥ ६३ ॥ ततस्तं धर्मराट् प्राह धर्माधर्मप्रदर्शकः ॥ त्वया हि सुमहत्पापं कृतमज्ञानतो नृप ॥ ६४ ॥

हे देव ! मुझे बडी क्षुधा है और सदा मेरी दुर्गति है हे यम ! मैंने क्या पाप किये हैं और अब मैं क्या करूं ॥ ६३ ॥ तब धर्माधर्मके दिखानेवाले यमराज उससे बोले, हे राजन् ! अज्ञानसे तुमने बडे पाप किये हैं ॥ ६४ ॥

हरिमित्रं प्रति तदा वासुदेवपरायणम् ॥ हरिमित्रे कृतं पापं वासुदेवार्चनादिषु ॥ ६५ ॥ तेन पापेन संप्राप्तः क्षुद्बोधस्त्वां सदा नृप ॥ दानयज्ञादिकं सर्वं प्रनष्टं ते नराधिप ॥ ६६ ॥

हरिमित्र वासुदेवपरायण हरिमित्रमें आपने पापाचरण किया है ॥ ६५ ॥ हे राजन् उस पापसे आपको सदा क्षुधाकी प्राप्ति हुई है हे राजन् ! इसी कारण तुम्हारे दानयज्ञादि सब नष्ट होगये हैं ॥ ६६ ॥

गीतनाट्यलयोपेतं गायमानं सदा हरिम् ॥ हरिमित्रं समाहूय हृतवानसि तद्धनम् ॥ ६७ ॥ उपहारदिकं सर्वं वासुदेवस्य सन्निधौ ॥ तव भृत्याः समाहृत्य पापं चक्रुस्तवाज्ञया ॥ ६८ ॥

In Public Domain, Chambal Archives, Etawah

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३९)

Page 46Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३९)

हरेः कीर्तिं विना चान्यद्ब्राह्मणेन नृपोत्तम ।। न गेययोगे मंतव्यं तस्मात्पापं त्वया कृतम् ।। ६९ ।। नष्टं ते स्वर्गलोकाद्यंगच्छ पर्वतको टरम् ।। ।। पूर्वोत्सृष्टं स्वदेहं ते खाद नित्यं निकृत्य वै ।। ७० ।।

गीत नाटच लयसे युक्त गायन करते हुए हरिमित्रका तुमने संपूर्ण धन हरण कर लिया ।। ६७ ।। जो कुछ उपहारादि था वह सब वासुदेवके समीपसे भृत्योंनें लेकर फेंक दिया ।। ६८ ।। हे राजन् ! हरिकी कीर्तिके बिना ब्राह्मणको गानयोग न करना चाहिये, यह पाप तुमने किया है ।। ६९ ।। तुम्हारे स्वर्ग-लोकादि इसी कर्मसे नष्ट होगये, तुम पर्वतकी कोटरमें जाकर अपनी देहकोही नोच नोचके प्रतिदिन भक्षण करो. ।। ७० ।।

तस्मिन्क्षीणे त्विमं देहं खाद नित्यं क्षुधान्वितः ।। महानिरय- यसंस्थस्त्वं यावन्मन्वंतरं भवेत् ।। ७१ ।। मन्वंतरे ततोऽतीते भूम्यां त्वं श्वा भविष्यसि ।। ततः कालेन कियता मानुष्यमनुलप्स्यसे ।। ७२ ।।

क्षुधासे व्याकुल होकर तू नित्य इसी देहको भक्षण कर, इस प्रकार एक मन्वन्तर-तक महानरकमें निवास कर ।। ७१ ।। मन्वंतर बीतनेसे भूमिमें तू कुत्ता होगा, फिर बहुत कालके उपरान्त मनुष्यशरीरको प्राप्त होगा ।। ७२ ।।

एमुक्त्वा यमो विद्वांस्तत्रैवान्तरधीयत ।। सोऽहं नारद भूपालः पुरेदानीमुलूकताम् ।। ७३ ।। लब्धवान्कर्मदोषेण हरिमित्रकृतेन वै ।। ततो मानसशैलेऽहं कोटरे ह्यवसं मुने ।। ७४ ।।

यह कह यमराज वहीं अन्तर्धान होगये हे नारद ! सो वह राजा मैं उलूकताको प्राप्त हुआ हूं ।। ७३ ।। हरिमित्रके साथ क्षुद्रता करनेसे यह दोष मुझको प्राप्त हुआ है हे मुने ! तब मैं इस मानसकी कोटरामें निवास करने लगा ।। ७४ ।।

पूर्वो मृतकदेहो मे भक्षणाय ह्युपस्थितः ।। क्षुधान्वितोऽतंदेहं खादितुं ह्युपचक्रमे ।।७५।। तत्क्षणं दैवयोगेन हरिमित्रो महायशाः ।। विमानेनार्कवर्णेन स्तूयमानोऽप्सरोगणैः ७६ ।।

और पूर्व मृतक शरीर मेरे भक्षणके निमित उपस्थित हुआ, मैं क्षुधायुक्त हो उस देहके खानेकी इच्छा करने लगा उसी क्षण दैवयोगसे महायशस्वी हरिमित्र सूर्यके समान प्रकाशमान विमानपर स्थिर अप्सराओंसे स्तुतिको प्राप्त हो ।। ७५ ।। ७६ ।।

Page 47Permalink

(४०) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-

विष्णुदूतैः परिवृतः पथा तेनागतो नृप ।। विष्णुभक्तो महातेजाः पथि मां दृष्टवान्प्रभु ।।७७।। भुवनेशशरीरंतद्ददर्शोलूक सन्निधौ ।। पृष्टोऽहं तेन दयया शवसन्निधिसंस्थितः ।। ७८ ।।

विष्णुके दूतोंसे युक्त उस मार्गसे जाता था; उस महातेजस्वी विष्णु भक्तने मार्गमें राजाको देखा ।। ७७ ।। जब उलूकके निकट भुवनेशका शरीर देखा तब शवके निकट खडे होकर उसने दयासे पूछा ।। ७८ ।।

भुवनेशस्य नृपतेर्देहोऽयं दृश्यते खग ।। उलूक त्वं च किमिदं खादितुं चोद्यतो भवान् ।। ७९ ।। तच्छ्रुत्वा हरिमित्राय प्रणम्य विनयान्वितः ।। कृतांजलिपुटो भूत्वा बहुमानपुरः सरम् ।। ८० ।।

हे पक्षी ! यह तो राजा भुवनेशका शरीर दीखता है और उलूक तू उसको कैसे भक्षण करता है ।। ७९ ।। यह वचन सुन वह हरिमित्रको प्रणामकर विनयसे सहित हाथ जोड बहुत मानसे ।। ८० ।।

तत्सर्वं पूर्ववृत्तांतं नारदास्मै न्ववेदयम् ।। पुरापराधं त्वयि यत्तस्य पाकोऽयमागतः ८१ ।। यावन्मन्वन्तरं विप्रखादिष्यामि शवं त्विमम् ।। ततः श्वाहं भविष्यामि भविष्यामि ततो नरः ।।८२।।

पहला सब वृत्तांत उससे वर्णन करता हुआ बोला पहले जो तुम्हारा अपराध किया था उसका यह फल हमको प्राप्त हुआ है ।। ८१ ।। हे विप्र ! एक मन्वन्तर- तक इस शवको मुझे खाना पडेगा फिर कुत्ता होकर पीछे मनुष्यकी योनि मिलेगी ।। ८२ ।।

एतदाकर्ण्य करुणो हरिमित्रामहायशाः ।। कृपया मां समाचष्ट शृणुलूक महीपते ।। ८३ ।। मयि त्वयापराधं यत्तत्सर्वं क्षान्तवान- हम् ।। शवो ह्यदर्शनं यातु न च श्वा त्वं भविष्यसि ।। ८४ ।।

महायशस्वी दयालू हरिमित्र यह वचन श्रवणकर कृपापूर्वक मुझे बोले, हे महाबुद्धिमान् उलूक ! तू सुन ।। ८३ ।। जो कुछ तैंने मेरा अपराध किया है वह मैंने सब क्षमा करदिया, यह शव अन्तर्धान होजाय और तुझको कुत्तेकी योनि नहीं मिलेगी ।। ८४ ।।

त्वामद्य गानयोगश्च प्राप्नोतु मत्प्रसादतः ।। स्तुहि विष्णुं च गानेन जिह्वा स्पष्टा च जायताम् ।। ८५ ।। सुरविद्याधराणां च गंधर्वाप्सरसां तथा । गानाचार्यो भवेथास्त्वं भक्ष्यभोज्यसमन्वितः ८६

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४१)

Page 48Permalink

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४१)

मेरे प्रसादसे तुझको गानयोगकी प्राप्ति होगी और विष्णुके गानयोग तेरी जिह्वा स्तुतिके योग्य स्पष्ट होजायगी ॥ ८५ ॥ देवता विद्याधर गन्धर्व अप्सराओंका तू गान विद्याका आचार्य होगा और अनेक प्रकारके भक्ष्य भोज्य आकर प्राप्त होंगे ॥ ८६ ॥

ततः कतिपयाहोभिः सर्वं भद्रं भविष्यति ॥ हरिमित्रवचस्तच्च विष्णुदूतोपबृंहितम् ॥ ८७ ॥ सर्वं निरयसंज्ञंमेक्षणादेव व्यनाशयत् ॥ प्रकृत्या विष्णुभक्तानामीदृशो करुणा द्विज ॥ ८८ ॥

फिर कुछ दिनोंमें सम्पूर्ण मंगल हो जायगा, जब हरिमित्रने विष्णु दूतोंके समक्ष यह वचन कहे ॥८७॥ तो क्षणमात्रमें सब नरककी सामग्री नष्ट होगई, हे नारद ! विष्णुभक्तोंकी स्वभावसेही यह प्रकृति होती है ॥ ८८ ॥

कृतापराधलोकानामपि दुखं व्यपोहति ॥ अमृतस्यन्दि वचनमुक्त्वा स प्रययौ हरिम् ॥ ८९ ॥ सर्वं ते कथितं येन गानाचार्योहमृत्तमः ॥ प्राप्स्यामि हरिमेतेन हरिमित्रप्रसादतः ॥ ९० ॥

नारदैतदनुवर्णितं मयापूर्वजन्मचरितं महाद्भुतम् ॥ यः श्रृणोति हरिमेत्य चेतसा स प्रयाति भवनं गदाभृतः ॥ ९१ ॥

इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

कि, अपराधी जनोंके भी दुःख दूर करते हैं इस प्रकार वह अमृतके भरे वचनोंको कहकर हरिके लोकको गया ॥ ८९ ॥वह सब आपसे कहा जिस कारण मैं गानाचार्यपदको प्राप्त हुआ हूं, हरिमित्रके प्रसादसे मैं नारायणको प्राप्त हूं गा ॥ ९० ॥ हे नारद ! यह आपसे पूर्वजन्मका महा अद्भुत चरित्र वर्णन किया, जो चित्त लगाकर इसे सुनते हैं वह नारायणके लोकको प्राप्त होते हैं ॥ ९१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये भाषाटीकायां अद्भुतोत्तर काण्डे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

Page 49Permalink

(४२) अद्भुतरामायण [सप्तम-

सप्तम सर्ग

नारदजीको गानविद्याका प्राप्त होना

गानबंधुः पुनः प्राह नारदं मुनिसत्तमम् ।। एते किन्नरसंघा वै विद्याध्राप्सरसां गणाः ।। १ ।। गानाचार्यमुलूकं मां गानशिक्षार्थमागताः ।। तपसा नैव शक्त्या वा गान विद्या तपोधन ।। २ ।।

फिर गानबन्धु नारदजीसे कहने लगा; यह किन्नर विद्याधर अप्सराओंके समूह ।। १ ।। गानाचार्य मेरे पास शिक्षाके निमित्त आते हैं हे तपोधन ! गानविद्या तपसे नहीं आती है ।। २ ।।

तस्माच्छ्रमणे युक्तश्च मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि ।। एवमुक्तो मुनिस्तस्मै प्रणिपत्य जगौ यथा ।। ३ ।। तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य च ।। उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ।। ४ ।।

इससे श्रम कर् तुम हमसे गान विद्या सीखो, तब मुनिराज प्रणाम कर जैसे गान करने लगे ।। ३ ।। हे मुनिश्रेष्ठ ! वह सुनो ! वासुदेवको नमस्कार कर नारदजी उलूकके वचन मान ।। ४ ।।

शिक्षाक्रमेण संयुक्तस्तत्र गानमशिक्षत ।। गानबंधुस्तमाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ।। ५ ।। स्त्रीसंगमे तथा गीतेक्षुतेऽन्वाख्यानसंगमे । व्यवहारे च धान्यानामर्थानां च तथैव च ।। ६ ।।

शिक्षाक्रमसे संयुक्त गान सीखने लगे तब गानबन्धुने कहा नारदजी ! अब लाज त्याग देनी चाहिये ।। ५ ।। स्त्रीसंगम, गीत, छीक अन्वाख्यान, धान्यका व्यवहार, धनके व्यवहारमें ।। ६ ।।

आयेव्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु वै भवेत् ।। न कुण्ठितेन गूढेन नित्यं प्रावरणादिभिः ।। ७ ।। हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि ।। निर्यातजिह्वायोगेन न गेयं च कथंचन ।। ८ ।।

आय और व्ययमें कभी लज्जा नहीं करनी चाहिये, कुण्ठित गूढ अत्यन्त ढके स्थानमें ।। ७ ।। तथा हाथ फैलाकर सकोडकर बहुत मुख फैलाकर जिह्वा मीचकर कभी गाना न चाहिये ।। ८ ।।