भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद २४८

यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक पाठ्यान्तरण (transcription) प्रस्तुत है:

अकबर बीरबल विनोद २४८ वे कभी तुम्हारे यहाँ आते हैं वा तुम ही उनसे मिलने जाया करते हो?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवी- नाथ ! मैं निगुरी नहीं हूँ, आपकी मेहरबानी से मेरे अनेकों गुरु हैं, परन्तु उसमें भेद केवल इतना ही है कि वे सबके सब बाहर रहते हैं। इसी कारण न कभी यहाँ आते हैं न हमको उनका दर्शन ही मिलता है। थोड़े दिन से मेरे सुनने में आया है कि हमारे एक गुरु यहाँ आ रहे हैं। मुझे उनके रहने का स्थान तक ज्ञात नहीं है, फिर वे बताने ही क्यों लगे उन्हें तो किसी के दाम टके की दरकार नहीं है। वैसे निस्प्रिय गुरु देखने में नहीं आते। यही कारण है कि इस दीनके द्वार पर कभी भी नहीं आने की कृपा करते। बादशाह को ऐसे गुरु से मिलने की इच्छा हुई और वे बीरबल से बोले- “दीवान जी ! जो तुम्हारे गुरु में इतनी विशेषता है तो मैं भी एकबार उनका दर्शन करना चाहता हूँ। हो सके तो जल्दी से जल्दी मुझे उनसे मिलाने का प्रबन्ध करो। बीरबल बोला- “पृथिवीनाथ ! जब आप उनसे मिलने की इच्छा प्रकट करते हैं तो मैं तत्परता से उनकी खोज कराऊँगा और यदि वे भी आपसे मिलने की इच्छा करेंगे तो मैं अवश्य आपसे उनका साक्षात् करा दूंगा।” बादशाह ने कहा-“मुझे अविलम्ब उनसे मिलाने की चेष्टा करो।” बीरबल बादशाह को तसल्ली देकर वहाँ से बिदा हुआ। घर जाते समय रास्ते में एक वृद्ध लकड़हारे से उसकी मुला- कात हो गई। वह विचारा तमाम परेशानी उठाकर भी आज अपनी सम्पूर्ण लकड़ियों को नहीं बेंच सका था। बीरबलने

२४६ अकबर बीरबल विनोद

२४६ अकबर बीरबल विनोद

उससे बची हुई लकड़ियों का मूल्य दर्याफ्त किया; फिर पैसा देने के मिस से उसको अपने घर लिवा ले गया। लकड़ो का मूल्य देकर बीरबल ने लकड़हारे से पूछा—"क्यों जी लकड़हारे! तुम हमें कोई सभ्य पुरुष जान पड़ते हो। समय के फेर से इस समय लकड़ियां बेचकर अपनी गुजर करते हो। मेरा तुमसे एक जरूरी काम है। यदि तुम उसके करने पर उद्यत होजावो तो मैं तत्काल तुम्हें पचीस रुपये दूँ। काम हो जाने पर तुम्हारी गुजर माफिक काफी रुपये दूँगा।" लकड़हारे ने मनमें सोचा—"यदि नहीं करूँगा तो यह दीवान है जबरन बेगार में करावेगा। बेहतर है, कि इसकी राजी करूँ तिसपर रुपये भी काफी देनेको कहता है। मनमें ऐसा ठहरा कर वह बीरबल से बोला—"मैं आपकी छोटीसे छोटी आज्ञाएँ पालन करने के लिये तत्पर हूँ, आपकी सभी आज्ञाएँ मुझे स्वी- कार होंगी।" बीरबल ने कहा—"अच्छा मैं तुम्हें कुछ कपड़े देता हूँ; इन्हें धारण कर हनुमान जी के मन्दिर के पिछवाड़े वाली कोठरी में जा बैठो, हाथ में माला लेकर बराबर जपते रहो। किसी की तरफ आँख उठाकर भी न देखना। तुमसे मिलने के लिये बहुत से अमीर उमराव आवेंगे। मुमकिन है स्वयं बादशाह भी आवें, परन्तु उनसे भी कदापि न बोलना। रुपयों के ढेर दें तब भी उधर नहीं देखना। देखो सावधान, मैं यहीं पर किसी जगह छिपकर तुम्हारी सारी बातें देखता रहूँगा, यदि मेरे कहने से जरा भी खिलाफ चलोगे तो तुम्हारी गरदन मार दी जावेगी।" बूढ़े लकड़हारे ने दृढ़ता पूर्वक उसकी आज्ञाओं का पालन करना स्वीकार किया।

तब बीरबल ने उसके सारे बदन में खाक मलकर कोपीन वस्त्र पहनाया और हाथ में एक रुद्राक्ष की माला देकर मस्तक पर कृत्रिम जटा बाँध दी। फिर उसे हनुमानजी के मन्दिर में एक मृगचर्म पर बैठाकर आप बादशाह के पास पहुँचा। बादशाह का दरबार उमरावों से ठसाठस भरा हुआ था। बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा—"पृथ्वीनाथ ! मेरे गुरुजी आये हुये हैं, आपके विषय में बातें करने पर उन्होंने आपसे मिलना स्वीकार किय है। परन्तु मुझे साथ जाने की मुमानियत करते हैं। यदि इतने पर भी आपके साथ जाऊँगा तो वे मुझसे बहुत नाराज होंगे। मुमकिन है कि चिढ़कर मुझे शाप भी दे दें। बादशाह ने पूछा—"इस समय वे कहाँ ठहरे हुये हैं?" बीरबल ने उत्तर दिया—"हनुमानजी के मन्दिर के बाहर की कोठरी में।" बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर बीरबल के गुरु से मिलने गये। वहाँ पहुँचकर बड़े अदब से प्रणाम कर बाकायदे उन के सामने बैठ गये और फिर पूछा—"भगवन् ! कृपाकर आप अपना नाम तथा ठिकाना इस दास से बतलावें, मैं इस कृपा के लिये आपका चिर कृतज्ञ बना रहूँगा।" स्वामी जी तो पक्के गुरु के चेले थे। उन्होंने उनकी बातों का कुछ भी उत्तर न देकर बराबर अपना माला घुमाते ही रहे। बादशाह फिर बोले-"स्वामी जी ! मैं समस्त भारतवर्ष का अधिपति हूँ मैं आपकी सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता हूँ। यदि आपको किसी बात की चाहना हो तो मुझसे कहें। परन्तु स्वामी जी फिर भी कुछ न बोले बल्कि आँख उठाकर उनकी तरफ देखा भी नहीं। तब बादशाह ने एक लाख का तोड़ा उनके सामने

२५१ अकबर बीरबल विनोद

२५१ अकबर बीरबल विनोद रखवा दिया। उन्होंने सोचा कि शायद रुपयों के प्रलोभन में आकर स्वामीजी फेर में आ जावेंगे परन्तु वे न कुछ आशी- र्वाद दिये और न रुपयों की तरफ देखा ही। बादशाहको स्वामीजी की ऐसी निष्ठुरता सहन न हो सकी और वे झल्ला कर बोले—"अरे ऐसे अज्ञानियों से माथापच्ची करना मूर्खता है। यह तो कोई अज्ञानी है, जो मनुष्य होकर भी पशुवत व्योहार करता है।" बादशाह रुपयों की थैली उठवाकर बीरबलके घर भेजवा दिये। उनका कस्द था कि दिये दानको फिर वापस नहीं लेते थे। वे सबभाँतिसे हारकर अपने महल को चले गये। दर्बार उठने के पश्चात् फिर जब बादशाह और बीरबल का एकान्त में समागम हुआ तो बाद- शाह ने स्वामी के पास जाने से लेकर लौटने तक का सारा समाचार कह सुनाया। अन्त में बादशाह ने कहा- "अच्छा बीरबल ! यदि किसी को मूर्ख का सामना करना पड़े तो उस समय क्या करना चाहिये।" बीरबल ने तत्काल उत्तर दिया- "पृथिवी नाथ ! एकदम चुप रह जाना चाहिये।" बादशाह को उल्टी तोहमत लगी। पहले उनका विचार था- "इस प्रकार समझा कर बीरबल के गुरु का मूर्ख होना साबित करूँगा। लेकिन उनकी उस आशा पर एकदम पानी फिर गया। बीरबल ने उन्हें ही मूर्ख बना दिया। बादशाहने कहा- "सन्यासी को मैंने इतनी दौलत देकर बहुतेरा चाहा कि उससे कुछ वार्तालापकरूँ, परन्तु उसने धनका कुछ भी लालच नहीं किया बल्कि उल्टे मुझको ही मूर्ख बना चुप रह गया। आज से कस्द करता हूँ कि अब भविष्यमें जब कभी किसी महात्मा से मिलने

जाऊँगा तो उससे मुलायमियत का व्योहार करूँगा।” बाद- शाह को अपनी उच्छृंखलता पर बड़ा दुःख उत्पन्न हुआ और अपनी तरफ से बीरबलको उसके गुरुसे क्षमाप्रार्थी होनेके लिये भेजा। यह तो बीरबल की मनचाही बात थी। वह उसी क्षण हनुमान जी के मन्दिर में जा पहुँचा। सूर्यास्त का समय था और सब लोग वहाँ से चले गये थे। बीरबल लकड़हारे को अपने घर लिवा ले गया और उसकी बहुत प्रशंसा कर बोला-“सावधान ! यह बात कहीं प्रगट न करना, नहीं तो जान के लाले पड़ जायँगे। उसे एक सौ रुपये अपनी तरफ से और देकर बिदा किया। लकड़हारे ने इतना रुपया कभी नहीं देखा था। वह बीरबल के सामने उस बात को आजन्म गुप्त रखने की प्रतिज्ञा कर खुशी २ अपने घर चला गया। —❖— बादशाह का नाखून किसी देशके बादशाहका लड़ाईमें पैरका अँगूठा कट गया था। उस बादशाह के पास बहुतेरे हकीम इसी कामके लिये नियुक्त किये गये थे कि जब कोई लड़ाई में आहत होता तो हकीम लोग उसका इलाज किया करते थे। हकीमों ने बादशाह के अँगूठे पर फिर से मांस आ जाने का बहुतेरा प्रयास किया जिससे मांस तो बढ़ आया परन्तु नाखून नहीं उगा। इसलिये बादशाह हकीमों पर चिढ़कर उन्हें कैदकर लिया और विचारोंको जेलमें बन्द रहकर कैदकी यातना भुगतनी पड़ रही थी। बाद- शाह इतना करके भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने बहुतेरे हकीमों को

अकबर बीरबल विनोद

२५३ अकबर बीरबल विनोद


बारी २ से बुलवा कर अपने नाखून के जमने का इलाज पूछा परन्तु जब वे निरुत्तर रह जाते, तब उन्हें तुरत जेल का हवा खाने के लिये भेज देता।" बादशाह की इस निष्ठुरता का समाचार क्रमशः दूर दूर देशों में फैल गया। विचारे वैद्य हकीमों को बड़ी चिन्ता उत्पन्न हुई। कितनों ने तो इस पेशे को त्याग कर दूसरा पेशा अख्तियार कर लिया। बहुतेरों ने जंगल पहाड़ों में छिपकर अपनी आत्म रक्षा की। विचारे रोगी चिकित्सकों के अभाव में तड़प तड़पकर मरने लगे। यह घटना क्रमशः हिन्दुस्तान के वैद्यों ने भी सुनी। वे भी डरे और चाहते थे कि इस पेशे को त्यागकर आजीविका उपार्जन का कोई दूसरा मार्ग निकालें। इसी बीच यह बात फूटते २ अकबर बादशाह के कानों तक पहुँची। बादशाह को ऐसे अत्याचारों को सुनकर बड़ा कष्ट हुआ और वे अपनी सभा बुलवा कर लोगों से दीन प्रजाकी रक्षा का उपाय पूछे— बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! यदि मैं किसी प्रकार बाद- शाह तक जापहुँचूँ तो कोई न कोई युक्ति लड़ाकर सब कैदियों को मुक्त करा दूँ।" बादशाह ने इस काम को करने के लिये बीरबल को एक मास की मुहलत दी। बीरबल वैद्य का सा रूप बनाकर उस शहर में जा पहुँचा और गरीबों की मुफ्त दवा करने लगा। धीरे २ वैद्यगी का सब सामान भी संग्रह कर लिया। इसकी दवा से बहुतेरे रोगी आरोग्य हो गये। जिस कारण इसका यश नगरमें बिजली की तरह फैलने लगा। शहर के कितने रईसों ने बीरबलको परोक्ष में समझाया-“इस नगर

अकबर बीरबल विनोद २५४

अकबर बीरबल विनोद २५४ को छोड़कर बाहर चले जावो, नहीं तो बादशाह आपको भी कैदकर मरवा डालेगा। बेगुनाह जान गँवाने से क्या लाभ।" परन्तु बीरबल ने उनकी बातों पर कान नहीं किया। वह बराबर अपना काम दत्तचित्त होकर करता ही रहा। क्रमशः यह बात धीरे २ बादशाह के कानों तक पहुँची। वह तो बराबर ऐसे हकीमों की फिराक में पड़ा ही रहता था। इसलिए दूसरे ही दिन अपन' सिपाही भेजकर बीरबलको अपनी सभा में बुलवा कर बोला-"हकीम जी ! मैंने आपका बड़ा नाम सुना है, यदि आप मेरा भी कुछ भला करें तो मैं आपका बड़ा उपकार मानूँगा। मेरे अँगूठे का नख लड़ाई में कट कर गिर गया है। मैंने उसको फिर से उगाने के लिये बहुतेरे हकीम और वैद्यों की दवाएँ की, पर कोई वैद्य अकृतकार्य नहीं हुए। यदि आपकी औषधि से लाभ होगा तो मैं सदैव आपका गुणगान करूँगा। बीरबल बोला-"बेशक मैं आपका इलाज करूँगा, मुझे इस रोग की दवा मालूम है। उसके लगाने से पाँच दिनों के अन्तर्गत आपके नख फिर से उग आयेंगे। मेरे गुरु का इस दवा पर बड़ा भरोसा है। उन्होंने मुझसे बतलाया था कि यह दवा कभी व्यर्थ नहीं जा सकती। आप मेहरबानी करके मेरे बतलाने के अनुसार दवाओं का संग्रह करा दीजिये। बाद- शाह प्रसन्न होकर बोला-"हकीमजी ! मुझे अब तक बहुतेरे हकीमों से पाला पड़ चुका है; परन्तु आपसा अपनी दवा में दृढ़ता रखने वाला एक भी न मिला।" बीरबल बोला-"यदि परमात्मा सहायक रहा तो मैं आपसे निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि

२७५ अकबर बीरबल विनोद

२७५ अकबर बीरबल विनोद तीन दिन में फिर आपके नख पहले के समान उग आयेंगे। हाँ साथ ही इसके एक बात और है, मेरी दवा के नुसखे कुछ ऐसे आसान नहीं हैं, उनके एकत्रित करने में बड़ी कठिनता होगी । बादशाह बोला—“कोई कठिनता नहीं है; क्या मैं इतना बड़ा बादशाह होकर दवाओं को संग्रह न कर सकूँगा ?” वीर- बल ने कहा—“चाहे जो हो; संग्रह करना आपका काम है। मैं तो ऐसा कहता भी नहीं हूँ कि आप उसे संग्रह नहीं कर सकेंगे । परमात्मा की कृपा से सब कुछ हो सकता है। केवल आपको एक शर्त लिखनी पड़ेगी कि अगर एक मास के अन्तर्गत आप दवाओं का संग्रह न कर सकेंगे तो फिर आपका मुझपर कोई दावा नहीं रह जायगा और आपके यहाँ जितने हकीम और वैद्य कैदी हैं सबको छोड़ देना पड़ेगा। हाँ मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि जब कभी आप मेरी दवा मँगवा देंगे मैं बिला उज्र आपकी खिदमत में हाजिर होऊँगा ।” बादशाह ने अपने मन में अनुमान किया-“यह हकीम पहले पहल इस नगर में आया है इसलिये इसको मेरे खजाने का ज्ञान नहीं है। समझता है कि इतना द्रव्य बादशाह न खर्च कर सकेंगे कि जिससे दवा खरीदी जा सके। भला ऐसी वह कौनसी दवा होगी कि जिसे मैं न खरीद सकूँगा ?” वह अपने मन में खूब संकल्प विकल्प कर अपने को दृढ़ बना कर बीर- बल के कथनानुसार प्रतिज्ञा पत्र लिख दिया और फिर हकीम से दवा का नाम बतलाने की प्रेरणा की । बीरबल को भीतर २ बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने जान लिया कि अब निरपराध हकीम और वैद्यों के मुक्त होने का समय नजदीक

अकबर बीरबल विनोद २५६

अकबर बीरबल विनोद २५६

आ गया है, हरि इच्छा। प्रगट में बादशाह को यह शेर पढ़कर सुनाया— “आना नहीं मुश्किल है कुछ नाखून का। फूल गर गूलर के हों वा रोम हो भल्लूक का ॥” उसके उपरोक्त शेर को सुनकर बादशाह अपने दीवान को दोनों वस्तुओं को यथाशीघ्र मँगवाने की आज्ञा दी। दीवान अपने निमक खाये भर परिश्रम करके थक गया; परन्तु उसे सफलता न मिली। उधर एक महीने की शर्त भी पूज गई। बादशाह को लाचार होकर सब कैदी वैद्य और हकीमों को जेल से मुक्त कर देना पड़ा। बादशाह ने कैद से छूटे हकीम वैद्यों को बुलवाकर उपरोक्त दवाका गुण पूछा- “बीरबल उन्हें पहलेही से सावधान कर चुका था इसलिये वैद्यों और हकीमों ने बीरबल की दवा की बड़ी तारीफ की। बादशाह को कहीं से बीरबल का छिद्रान्वेषण करने की जगह न मिली। अतएव वह उसे एक उत्तम कोटि का हकीम समझकर उस पर रुष्ट नहीं हुआ। बिचारे हकीम कैद से छूटकर उसे बहुत दुआ दिये और सभों ने आपस में सहयोग कर अपने प्राणरक्षक को एक अच्छी रकम भेट दीं। बीरबल वहाँ से चलकर कई दिनों के पश्चात दिल्ली पहुँचा और बादशाह के सामने वहाँ का आद्योपान्त समाचार कहकर सुनाया, बादशाह ने बीरबल के बुद्धिमानी की बड़ी प्रशंसा की ओर अन्य दरबारी भी सब तरफ से वाह वाह करने लगे।

२५७ अकबर बीरबल विनोद

२५७ अकबर बीरबल विनोद

योगी का भेष

एक दिन बीरबल के स्पष्ट भाषण से बादशाह बहुत क्रुद्ध हो गये जिसकारण बीरबल गुप्त रूप से परदेश चला गया । वहाँ जाकर उसने वहाँ के लोगों पर अपना ऐसा प्रभाव जमाया कि उस नगर के लोग उसके सेवक होगये। एक तरफ सबका प्रेम और दूसरी तरफ बादशाह की नाराजगी को देख- कर बीरबल वहीं वर्षों गुप्त वास करता रहा। इधर बादशाह की बीरबल के बिना दिनोंदिन बेचैनी बढ़ने लगी। वे बीरबल की तलाश में सब तरफ अपने दूतों को भेजे, परन्तु बीरबल का किसीसे सच्चा समाचार नहीं मिला। उधर जब बीरबल को बादशाह के बेचैनी का समाचार मिला तो वह बादशाह से मिलने के लिये बहुत उत्सुक हुआ और योगी का वेष धारण कर स्वयं दिल्ली पहुँचा। नगर से बाहर एक मंदिर में आसन मार कर भजन भाव करने लगा। यह हनुमानजी का प्रसिद्ध मंदिर था, वहाँ नित्य सैकड़ों दर्शनार्थी आया करते थे। उनकी दृष्टि बराबर बीरबल पर पड़ती, परन्तु बीरबल किसी से कुछ बोलता नहीं था। वह चुपचाप आसनमार ईश्वर का गुण गान करता रहा। उसकी ईश्वर में ऐसी निष्ठा देख सबका ध्यान उस योगी के तरफ आकृष्ट हो गया और वे आते जाते बीरबल को दण्ड प्रणाम करने लगे।

बीरबल तो नगर के बहुतेरे गण्यमानों के नाम से परिचित ही था इसलिये प्रसंग चलने पर बड़ी सरलता से उनका नाम ले लेकर सम्बोधन करता, इससे लोगों पर उसके सिद्धताई

१७

अकबर बीरबल विनोद २६०

अकबर बीरबल विनोद २६० था। दूसरे वे बीरबल के रहते हिन्दू धर्म के प्रतिकूल कोई काम भी नहीं कर सकते थे जिस कारण वे भीतर भीतर बीर- बल से बहुत द्वेष रखते थे। एक दिन मुसलमानों ने गुट बाँध- कर बादशाह का बीरबल से अविश्वास कराने का प्रण किया। वे झूठा झूठा फरेब रचकर दावा दायर करने लगे, परन्तु बीरबल अपने बुद्धि और विचार के बल से उनकी किल्ली लगने नहीं देता था। ऐसा सोच समझकर न्याय करता कि मुसलमान लोग दाँतों तले अँगुली दाबकर रह जाते। बाद- शाह को मुसलमानों की ऐसी अनीति बहुत खलती थी, परन्तु फिर भी उनको छेड़ता नहीं था। एक दिन उसके मन में यह बात आई कि इन सब फसादों का एकमात्र कारण बीरबल का हिन्दू होना ही है, यदि वह किसी प्रकार समझा बुझाकर मुसलमान बना लिया जावे तो फिर उससे मुसल- मानों की बगावत मिट जावे। ऐसा निश्चय कर बादशाह ने बीरबल को मुसलमान बनाने की एक सरल युक्ति ढूँढ़ निकाली। वह जब महल में भोजन करने जाता तो बीरबल को भी भोजन करने के लिये आग्रह कर्ता, परन्तु बीरबल कोई न कोई युक्ति लड़ाकर उसे टाल देता था। इस प्रकार बादशाह को आग्रह करते और बीरबल को टालते कई महीने व्यतीत हो गये। न बीरबल उनके साथ भोजन करने जाता और न बादशाह की मंशा वर आती। एक दिन बीरबल अपने कामों में दत्तचित्त होकर लगा हुआ था इसी बीच बादशाह ने कहा- "बीरबल कल दोपहर में यहीं भोजन करना।" बीरबल ने सपर बिना विचार किये ही कामों की विशेषता के कारण

२६१ अकबर बीरबल विनोद

२६१ अकबर बीरबल विनोद हामी भर ली। वह उत्तर देने में चूक गया। बीरबल में इस बात की बड़ी विशेषता थी कि वह भरसक अपनी बातों को निभाने की कोशिश करता था। इस बात को बादशाह भी भलीभाँति जानते थे। "बीरबल ने मेरा निमन्त्रण स्वीकार कर लिया।" इस बात को सोचकर बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपने बड़े २ मुसलमान दरबारियों को इसकी बधाई भेज दी। वे मुसलमान दरबारी भी ऐसा कह २ कर फूले नहीं समाते थे कि कल बीरबल मुसलमानी मजहब स्वीकार करेगा। इससे बढ़कर उन मुसलमान दरबारियों को और कौनसी शुभ सूचना हो सकती थी। दो घण्टे की कड़ी परिश्रम के पश्चात् बीरबल अपने कामों से अवकाश पाकर वही लेट गया। उसी समय उसके साथ का एक हिन्दू कर्मचारी बोला-“दीवान जी! आज आपने बिना विचार किये ही बादशाह के सामने ऐसी कठिन प्रतिज्ञा कैसे कर ली।" अब बीरबल का होश ठिकाने आया, उसके आँखों के सामने अन्धेरा छा गया। मन ही मन विचार करने लगा-“तो क्या कल मुझे मुसलमान बनना पड़ेगा? क्या मेरी इतनी दिनोंकी सब कीर्तियोंके विलीन होनेका समय आ गया? मैं अपने जात बिरादरी के लोगों की गालियाँ और तानाजनी को कैसे सहन कर सकूँगा। बादशाह के साथ भोजन कर लेने के पश्चात् हिन्दू जनता को फिर मैं अपना कौनसा मुँह दिखलाऊँगा।" ऐसी ही ऐसी अनेकों कल्पनाएँ एक साथ ही उत्पन्न होकर बीरबल को हतबुद्धि बना दीं और उसका दिमाग ऐसा व्यथित हो गया कि फिर काम

अकबर बीरबल विनोद २६२

अकबर बीरबल विनोद २६२ करने का उसे साहस न हुआ । घर पहुँच कर भी उसका मन 'चल ही रहा । इस चिन्ता के गहरे आघात से उसे शामको क्षुधा भी न लगी और न रात्रि में खूँखार निद्रा ही आई । एकदम अचेतन अवस्था में ही तमाम रात व्यतीत हो गई। मारे लज्जा के अपने घर वालों से भी कुछ कहते नहीं बना । दूसरे दिन सबेरा होते ही बादशाह बीरबल के जेवनार की तय्यारी कराने लगे । भिन्न २ प्रकार के जेवनार तय्यार कराये गये । इस खुशहाली में नगर के बहुतेरे अमीर उमराव मुसलमान आमंत्रित किये गये । जब जेवनार का समय हो गया और अन्य मेजमान लोग एकत्रित हुए तो बादशाह ने अपने एक कर्मचारी द्वारा बीरबल को बुलवा भेजा । खाद्य पदार्थ भलीभाँति सजाकर सोने और चाँदी के बासनों में परसे गये और सब अमीर उमराव यथास्थान बैठ गये । उधर जब बादशाह का दूत बीरबल के पास पहुँचा तो उसका मुख मलीन हो गया। वह अपने दरबारी कपड़े पहन कर उस दूतके साथ हो लिया। रास्ते में वह बराबर अगल बगल के मार्ग की भूमि का संशोधन करता हुआ चलता था। दैवात् उसके मन में एक युक्ति अचानक समा गई। वह एक सुनार को सूअर की कूँची से आभूषणों को साफ करते हुए देखा। वह तुरत सुनार के पास जा पहुँचा और आग्रह करके उससे सूअर के बाल की कूँची मँगनी माँग ली । महल में पहुँच कर बीरबल ने देखा कि सब लोग यथास्थान बैठकर केवल उसकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। बादशाह बड़े प्रसन्न दिखलाई पड़ते थे । आज उन्होंने

२६३ \hfill अकबर बीरबल विनोद

२६३ \hfill अकबर बीरबल विनोद \rule{\textwidth}{0.4pt}

बीरबल का और दिनों से अधिक सत्कार किया। बड़े २ अमीर मुसलमानों ने भी उठ २ कर बीरबल का स्वागत किया। मारे खुशी के बादशाह ने बीरबल को अपनी बगल में बैठने का प्रबंध किया। जब यह सब हो चुका तो बीरबल विनम्रता पूर्वक बोला-“पृथिवीनाथ ! मैं तो भोजन करने आया ही हूँ; परन्तु आपसे थोड़ी आग्रह है। यदि मुझे अपने साम्प्रदायिक नियम के अनुसार भोजन करने को अनुमति दी जावे तो अति उत्तम हो।” बादशाह ने कहा-“अच्छी बात है, तुम अपने सम्प्रदाय के नियमानुसार ही भोजन करो।” बीरबल बोला-“तो इन सब थालियों पर थोड़ा २ पानी छिड़कना पड़ेगा। यदि मैं ऐसा करूँ और कोई नाराज हो तब क्या करना होगा। आप पहले ही से इसपर विचार कर लीजिये। बादशाह बोले-“तुम अपने सम्प्रदाय की रस्म पूरी करके भोजन करो। इसमें हम सबों को कोई आपत्ति न होगी।” फिर बादशाह ने अपने अन्य मुसलमान मेजमानों की तरफ दृष्टि फेर कर देखा, सबों ने अपनी गर्दन हिलाकर बादशाह का फर्मान स्वीकार किया। तब बीरबल सबको वाक्यबद्ध करके मस्त हो गया और उसकी साम्प्रदायिक प्रथा शुरू हुई। एक कटोरोमें पानी भरकर उसी सूअर के बाल की कूँची को उसमें डुबा २ कर खाद्य पदार्थ से सुसज्जित थालियों पर छिड़कने लगा। सब थालियों पर छींटे डाल चुकने के पश्चात् बीरबल ने बादशाह की थालीपर भी थोड़ा सा पानी छिड़क दिया। एक अमीर जो बाद- शाहके पास बैठा हुआ बीरबलका सारा चरित्र देख रहा था बोला “ओफ ! यह, तो बड़ा कठिन हुआ, यह कूची तो बाल की है।”

अकबर बीरबल विनोद २६४

अकबर बीरबल विनोद २६४ सब मेजमान भड़क गये और वे अपने आगे की थाली जस की तस यथास्थान छोड़ कर आप अलग जा खड़े हुए। सब लोग बीरबल को झिड़कियाँ देने लगे। यहाँ तक कि क्रोध के अधिक भड़कने पर बीरबल को धक्के दिलवाकर वहाँ से बाहर निकलवा दिये। पर इससे अधिक करने की किसी में ताब नहीं थी। बादशाह तो पहले ही से बचन हार चुके थे इसलिये वह भी कुछ न बोले बल्कि अपने मन को भीतर ही भीतर मसोस कर रह गये। बीरबल के आनन्द की सीमा न रही, उसने शास्त्रों में पढ़ा था कि मनुष्य अपना प्राण देकर भी धर्म बचावे। बाहर बैठे हुए हिन्दू दरबारी देवता पित्तर मना रहे थे। बीरबल को इतना शीघ्र लौटकर बाहर आते हुए देखकर उनको कुछ धैर्य हुआ। बीरबल गुप्तरूप से महल की सारी व्यवस्था सुनाकर अपने घर चला गया और स्नान ध्यानसे निश्चिन्त हो भोजन किया। बादशाह भड़के हुए मुसलमानों को समझा बुझा कर शान्त किये और परसे पकवानों को तुरत फेंकवा दिया। जब फिर दूसरा बनकर तय्यार हुआ तो अपने मेजमानों को खिला- कर आप भी खाना खाये। बस उसी दिन से बादशाह को शिक्षा मिल गई और फिर बीरबल को कभी भोजन का निमंत्रण नहीं दिये। एक कृपिण पुरुष दिल्ली नगर में एक महा कंजूस धनवान रहता था।

२६५ | अकबर बीरबल विनोद

२६५ | अकबर बीरबल विनोद एक दिन एक कवि अपनी कविता बनाकर उसके पास ले गया। कवि का अभिप्राय था-"उस धनाढ्य को प्रसन्न करा उससे कुछ धन उपार्जन करना।" परन्तु उसकी सूरत देखते ही सूमड़े का मन पल्टा खा गया। उसने अपने मन में कहा-"यह कवि मुझे अपनी कविता सुनाकर मुझसे धन ठगने आया है, परन्तु इसने मुझे पहचानने में बड़ी भूल की है। अच्छी बात है जिस तरह यह कविता से मुझे प्रसन्न करना चाहता है उसी भाँति मैं भी अपनी मीठी २ बातों से इसे प्रसन्न कर कोरा लौटाऊँगा।" ऐसी युक्ति सोचकर वह धनाढ्य बोला-"कविवर! आपकी कविता तो बड़ी ही उत्कृष्ट है। इसका शब्दालंकार और अनुप्रास का जमक बड़ा ही उत्तम है। मैं अपनी जबान से अधिक क्या कहूँ इसकी जहाँतक विशेषता दिखलाई जाय सब थोड़ी है। कृपाकर आप दूसरे दिन फिर मुझसे मिलियेगा, मैं आपको प्रसन्न कर दूँगा।" उसके ऐसे प्रशंसनीय वाक्यों को सुनकर कवि फूला न समाया और तत्क्षण वहाँ से बिदा हुआ। दूसरे दिन ठीक उसी समय कवि धनाढ्य के पास गया। बात छिपाने के लिये धनाढ्य उसे देखकर अपनी गरदन टेढ़ी कर ली, वह घंटों उससे पुरस्कार पाने की प्रतीक्षा में बैठा रहा अन्त में कोई अर्थ न निकलते देख सेठ के आगे जा खड़ा हुआ। सेठ ने पूछा-"तुम कहाँ के रहने वाले हो और मेरे यहाँ क्यों आये हो?" सेठने इस रुखाई से बात किया मानों उसकी उस कवि से कभी का परिचय ही नहीं था। विचारा कवि बहुत चकराया और मन ही मन देवता पित्तर मनाकर

अकबर बीरबल विनोद २६८

अकबर बीरबल विनोद २६८ आयोजन नहीं किया गया था। और लोग तो अपने घरसे भोजन करके आये ही थे, विचारा कंजूस ही भूखा तड़प रहा था। बहुत देरतक इस आसा में था कि अब भोजनकी बारी आती है। शायद भोजन की तय्यारी में कुछ कमी पड़ गई हो, जिससे इतना विलम्ब हो रहा है। जो कुछ था सो थाही। धीरे २ दिन ढलने लगा, फिर भी किसी ने कंजूसकी सुधि न ली। तब वह बोला- "क्यों भाई, अब भोजन में कितनी देर है, शीघ्रता करो।" कविका मित्र बोला-"कैसी शीघ्रता श्रीमानजी?" सूमड़े ने कहा- "क्या आपने मुझे आज के लिये निमंत्रण नहीं दिया था क्या?" तबतक बीरबल बोल उठा- "सो तो आपने ठीक कहा है, परन्तु यह बात केवल आपको प्रसन्न करने के लिये कही गई थी नहीं तो भला इतनी देर क्योंकर होती। हम लोग तो कभी के भोजन कर चुके हैं।" ऐसी कोरी चापलूसी से सूमड़े का मुख लाल हो गया और वह अपनी बड़ी बड़ी आँखें चढ़ाकर बोला- "तुम लोग बड़े उच्छृङ्खल जान पड़ते हो जो किसी को निमंत्रण देकर बुलाना और फिर उसकी हँसी करना?" इसी प्रकार की अनेक बातें कह कहकर वह कंजूस कमर कसकर लड़ने पर आमादा हो गया।" बीरबल ने देखा कि अब बात बहुत आगे बढ़ जायगी इस लिये बीच बिचाव के अभिप्राय से बोला- "आप तो एक उच्च कोटि के रईस हैं, फिर आपको यह विचार पहले ही आना चाहिये था। क्या आपने इस कवि को ठट्टे बाजी में नहीं टाला था, क्या आपके उस मनोरंजन से इसको कष्ट नहीं हुआ था?"

२६६ अकबर बीरबल विनोद

२६६ अकबर बीरबल विनोद सूमड़े ने कहा-“ठीक ठीक बतलावो वह कौन सा कवि है और आप कौन हैं?” बीरबल बोला-“मैं बीरबल हूँ, अब भलाई की बात यह है कि इसी समय इस कवि को राजी करो; नहीं तो कानूनन तुम्हें दण्ड दिया जायगा।” बिचारा सूमड़ा बीरबल के नाम से डर गया और तुरत अपने कहे के अनुसार रुपये देकर कवि को प्रसन्न कर दिया।” किसी ने ठीक कहा है। “सीधे अँगुली घी नहीं निकलता।” लकीर छोटी होगई एक दिन बादशाह ने बीरबल को झुकाने के विचार से एक भूल भुलैया की चाल निकाली। वह एक लकीर जमीन पर खींचकर बीरबल से बोले-“बीरबल ! इस लकीर को बिना काटे छाँटे छोटी कर दो। बीरबल तो पूरा गुरु घण्टाल था ही, उस लकीर को न घटाया और न बढ़ाया, बल्कि उसके पास ही अपनी उँगली से एक दूसरी लकीर उससे भी बड़ी खींचकर बोला-“लीजिये पृथिवीनाथ ! अब आपकी लकीर इससे भी छोटी हो गई।” बादशाह बीरबल की बुद्धि से हार मान गया। ब्राह्मणी पर मांसखोरी का अभियोग । दिल्ली नगर में एक नौयोबना और स्वरूपवती ब्राह्मणी रहती थी। यह अपने पति परायणता के कारण सारे नगर में विख्यात हो रही थी। एक पठान नीचता वश गुप्तरूप से

अकबर वीरबल विनोद २७०

अकबर वीरबल विनोद २७० इसके पीछे पड़ा हुआ था। इसको अपने वश में लाने के लिये उस नीचने बहुतेरा प्रयास किया, परन्तु फिर भी उसे सफ- लता न मिली। ब्राह्मणी के तेज के आगे उसका उद्योग गिरता ही गया। तब उसने दण्ड देकर उसको काबू में लाने की युक्ति निकाली। एक दिन जब कि वह सुन्दरी अपने वस्त्रों को पछारने के लिये नदी तट पर गई थी। यह भी मौका देखकर वहाँ जा पहुँचा। वहाँ और किसी को न देखकर गुप्तरूप से उसके तटपर पड़े वस्त्रों में थोड़ा सा मांस बाँध एक चौकीदार को घूस देकर झूठा मामला खड़ा किया। और वह चौकीदार को सिखला पढ़ाकर भेजा कि वह उस सुशीला पर एक पठान के यहाँ से मांस खरीदने का अभियोग लगाकर उसे गिरफ्तार करलें। जब वह स्त्री अपने कपड़े पछाड़कर बाकी सूखे कपड़ों को उठाया तो उसमें मांस के टुकड़े बँधे हुए देखकर आश्चर्यचकित हो गई। तत्क्षण उस चौकीदार ने उसे जाकर गिरफ्ता कर लिया और बोला- "तू मांस भक्षण करती है इसकारण तुझे बादशाह के पास चलना पड़ेगा।" वह एक तरफ तो तुम्हारी धर्मरक्षा का इतना प्रबन्ध करते हैं दूसरी तरफ तूँ गुप्तरिति से मांस भक्षण करती है और फिर धोखा देकर अपने जात बिरादरी के लोगों को ठगती फिरती है। सिपाही को ऐसा अपवाद लगाते देखकर विचारी अबला किंकर्तव्य विमूढ़सी होकर चुप रह गई। इसी बीच वह दुष्ट पठान जो छिपकर सब देख रहा था चौकीदार के पास उस स्त्रीका पक्षपाती बनकर आया और उस से उसको

२७१ अकबर बीरबल विनोद

२७१ अकबर बीरबल विनोद छोड़ देने का अनुनय विनय करने लगा। वह बोला-"चौकी- दार साहब ! आप इस स्त्री को छोड़ दीजिये, इसने यह मांस मुझसे खरीदा था। यदि वादशाह को यह बात मालूम हो जायगी तो वह इसके बदले मुझे दंड देंगे। आप जानते ही हैं कि मैं एक कुटुम्बी आदमी हूँ। मेरे कैद हो जाने से मेरे बाल बच्चे भूखों मरने लग जायेंगे। इसलिये आप मेरी दीनता की तरफ ध्यान देकर इस मामले को यहीं पर दबा दीजिये। वर्ना बादशाह मुझे इस मामले में अपराधी पाकर मुझे फाँसी दिला देंगे।" चौकीदार उसकी एक बात भी न सुनी, वह तो पहले ही से सिखला पढ़ाकर ठीक किया गया था। दोनों को पकड़ कर बादशाह के पास ले गया और बोला-"पृथिवीनाथ! आज यह स्त्री इस पठान से मांस खरीद कर घरवालों से छिपा नदी के किनारे बैठकर भक्षण कर रही थी। इसका दोनों चरित्र मैंने अपनी आँखों देखा है। इसलिये हुजूर के पास पकड़ लाया हूँ कि इसको उचित दंड दिया जाय।" बादशाह को चौकीदार की बातें सुनकर बड़ा रंज हुआ और उसके नाते गोते के लोगों को बुलवाकर उस स्त्री की चाल चलन के संबन्ध में पूछताछ की। परन्तु उनकी जबानी उस स्त्री का ऐसा दूषित होना सिद्ध न हुआ। दर्बार का समय था। धीरे २ दर्बारी लोग भी आने लगे थे। इस बात को सुनकर सभी लोग चकित होगये। किसी को उस स्त्री का ऐसा दूषित स्वभाव होना संभव नहीं जान पड़ता था। परन्तु कोई उसकी शुद्धता का भी कोई निश्चित प्रमाण देनेको प्रस्तुत न था।