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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

41. लोहे को गलाकर साहिब जी के ऊपर डलवाना

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(41) लोहे को गलाकर साहिब जी के ऊपर डलवाना

पाखण्डियों के पाखण्ड से लोगों को सावधान करते हुए साहिब ने कुरीतियों पर प्रहार किया। धार्मिक पाखण्डी साहिब से बहुत परेशान थे। वे सब शेख तकी को साहिब का अंत करने के लिए तरह-तरह के सुझाव देते रहते थे। सब मिलकर साहिब को अपने रास्ते से हटाने की सोच रहे थे। सबने तकी को सुझाव दिया कि क्यों न कबीर के ऊपर गर्म लोहा पिघलाकर डाला जाए। ऐसे में कबीर का जिंदा रहना संभव नहीं होगा। वे पक्का ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इस तरह की हरकतें वह पहले भी कर चुके थे। वो साहिब को जादूगर समझकर विचार करते थे कि हो सकता है कि अब की बार कबीर का जादू न चले और हम साहिब को मारने में सफल हो जाएँ। अब योजना अनुसार लोहे को पिघलाकर पानी की तरह कर दिया गया।

जब राजदरबार में साहिब प्रवचन दे रहे थे, ऐसे में तकी ने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि यह पिघला हुआ लोहा कबीर के ऊपर डाल दो। तकी के हुक्म से पिघले लोहे को सैनिकों ने भरे राजदरबार में साहिब के ऊपर डालना शुरू किया। यह क्या, लोहे का अग्नि तत्व ही समास हो गया और पिघले लोहे की साहिब पर फूलों की तरह वर्षा होने लगी। सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। उन्होंने अपनी हरकतों से साहिब के प्रति लोगों की श्रद्धा और बढ़ा दी।

पिघले लोहे का भरा कटोरा, साहिब ऊपर डाला।
पानी की तरह गिरता लोहा, बनी फूलों की माला॥

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42. साहिब जी को पत्थर पीसने वाली चक्की में खड़ा किया जाना

98 साहिब बन्दगी

(42) साहिब जी को पत्थर पीसने वाली चक्की में खड़ा किया जाना

ईर्ष्या से शेख तकी जल रहा था। वो साहिब को मार कर सदा-सदा के लिए अपने रास्ते से हटाना चाहता था। साहिब की बढ़ती हुई प्रसिद्धी को समास करने के लिए वह जितने उपाय करता था, उसका असर उल्टा ही होता था। वह तो एक प्रचारक की तरह साहिब की प्रसिद्धी को दूर-दूर तक फैला रहा था। जो भी कसनियों की बात सुनता और साहिब के कौतक को सुनता वो ही साहिब का भक्त बन जाता। इससे तकी का क्रोध और बढ़ता जाता। वो फिर कोई षडयंत्र रचता था। एक दिन उसने पत्थर पीसने वाली मशीन को देखा तो विचार किया कि क्यों न कबीर को इस मशीन में डाला जाए, जिससे कबीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ। समय पाकर एक दिन तकी साहिब को उस चक्की के पास ले गया। साहिब तो अंतर्यामी थे। वे सब जानते हुए भी उसे छूट दे रहे थे, क्योंकि वो तो प्रचारक की तरह लगा हुआ था। शेख तकी ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि कबीर को इस चक्की में डाल दो। हुक्म का पालन हुआ और साहिब ने भी कोई विरोध नहीं किया। चक्की चल रही थी। तकी ने सोचा कि आज साहिब से छुटकारा मिल जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ। साहिब का तो कुछ भी नहीं बिगड़ा। शब्द स्वरूपी होने के कारण साहिब पर कोई असर न हुआ।

पत्थर पिसती चक्की में साहिब को दिया डाल।
चलती चक्की साहिब का, कुछ न सकी बिगाड़॥

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43. साहिब जी को गहरे गड्ढे में डलवाना

100 साहिब बन्दगी

(43) साहिब जी को गहरे गड्ढे में डलवाना

बार-बार कसनी लेकर हारा हुआ धर्म गुरु साहिब को मारने का नित्य नया ढंग अपनाता रहता जिससे साहिब की सत्य भक्ति का संदेश लोगों तक और ज्यादा जाता। जैसे ही शेख तकी की योजनाएँ असफल होतीं, उसके क्रोध की आग और बढ़ जाती। शेख तकी और उसके साथियों ने विचार किया कि कबीर को ज़मीन में गहरा गड्ढा खोदकर गाड़ देते हैं। शेख तकी ने मजदूरों को बुलाकर एक स्थान पर गहरा गड्ढा खोदने का आदेश दिया। मजदूरों ने जल्दी ही एक गहरा गड्ढा खोद डाला। अब शेख तकी साहिब के पास गया और उन्हें साथ लेकर उस गड्ढे के पास लाया। तकी ने साहिब को उस गड्ढे में बैठने के लिए कहा। चुपचाप साहिब शांत भाव से उस गड्ढे में बैठ गये। शेख तकी ने मजदूरों को आदेश दिया कि फौरन इस गड्ढे को मिट्टी से भर दो। हुक्म का पालन करते हुए मजदूरों ने बहुत जल्दी उस गड्ढे को मिट्टी से भर दिया। जब गड्ढा पूरी तरह से भर गया तो साहिब बाहर खड़े-खड़े मुस्करा रहे थे। यह देख शेख तकी और उसके साथियों का लज्जा से सिर झुक गया और वे चले गए।

मारन हेतु सब ने मिल के, गहरा खड्डा खुदवाया।
खड्डे में साहिब बैठन को, तकी हुक्म सुनाया॥
झट से गड्डा धर्म गुरु ने, मिट्टी से भरवाया।
बाहर खड़े मुसकाते साहिब, देख पाखण्डिआँ मुख छुपाया॥

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44. साहिब जी को क्रूश पर खड़ा किया जाना

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(44) साहिब जी को क्रूश पर खड़ा किया जाना

बार-बार साहिब की इतनी कसनियाँ लेने के बाद भी मूर्ख पाखण्डियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि साहिब तो इंसान ही नहीं हैं। उनका शरीर तो मात्र देखने के लिए है असल में वो तो शब्द सरुपी हैं। वे अभी भी साहिब को जादूगर समझकर मिटाने का प्रयास कर रहे थे। सबने मिलकर विचार किया कि कबीर को क्रूश पर खड़ा करके कीलें ठुकवाकर मार देते हैं। जब यह षडयंत्र शेख तकी को मालम हुआ तो वो बड़ा खुश हुआ। उसने इस योजना को मान लिया। शेख तकी साहिब के पास गया और उन्हें अपने साथ क्रूश वाले स्थान पर ले आया। वहाँ पहुँचकर तकी ने साहिब से कहा कि आप इस क्रूश पर खड़े हो जाओ। बेखौफ साहिब भी मानो इसी इंतज़ार में थे, क्योंकि वे तो लोगों को यही बताना चाह रहे थे कि देख लो, ये धार्मिक पाखण्डी असल में कितने क्रूर हैं, कितने धोखेबाज हैं। हुक्म पा कर जब साहिब उस क्रूश पर खड़े हो गये तो तकी ने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि काँटों की टोपी कबीर के सिर पर रख कर हाथों और पाँव में कीलें ठोक दो। शेख तकी के हुक्म का पालन हुआ। इस बार भी शेख तकी की योजना विफल हो गई। यह योजना भी साहिब का कुछ न बिगाड़ सकी। उसकी ईर्ष्या अग्नि ज्वाला की तरह बढ़ रही थी।

साहिब मारन को रल पाखण्डी, एक नया परपंच रचाया।
क्रूश पर खड़ा कर साहिब को, काटों का टोप पहिनाया॥
साहिब का तो कुछ न बिगड़ा, पाखिण्डयों का मुख मुरझाया॥

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45. चक्र से साहिब जी पर प्रहार किया जाना

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#(45) चक्र से साहिब जी पर प्रहार किया जाना

समय पाकर सहयोगी पाखण्डियों ने सलाह दी कि क्यों न कबीर पर ऐसे चक्र का प्रहार करें, जैसा श्री कृष्ण के पास था। उसने बताया कि कृष्ण जी के चक्र से कोई भी बचकर नहीं जा सकता था। वो चक्र किसी भी विरोधी को मारकर फिर वापिस उनके पास आ जाता था। तकी को यह बात बहुत अच्छी लगी। उसे फिर उम्मीद की एक किरण नज़र आने लगी। उसने ऐसा ही चक्र बनवाया और चक्र चलाने में कुशल चालक को भी बुलवाया। चालक को तकी ने कह दिया कि जब मैं इशारा करूँ, तब ही यह चक्र कबीर पर चलाना है। शेख तकी ने समझा दिया कि कबीर की गर्दन को इस चक्र से अलग करना है। चक्र चालक ने कहा कि आप चिंता न करें, जैसा आप कहे वैसा ही होगा। शेख तकी ने कहा यदि तुम ऐसा कर सके तो तुम्हें बहुत सारा ईनाम मिलेगा। समय आने पर तकी ने चालक को ईशारा किया। ईशारा पाते ही चालक ने चक्र को कबीर पर छोड़ा। सभा में सबने देखा कि चक्र साहिब का चक्कर काटकर वापिस मुड़ा और चलाने वाले का सिर अलग कर दिया। यह देख सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। तब बाद में साहिब ने उस चालक को जीवित कर दिया। वो साहिब के चरणों पर गिरकर क्षमा माँगने लगा। दयालु साहिब तो शेख तकी को भी क्षमा किये जा रहे थे, फिर चक्र चालक का कसूर ही कितना था। साहिब जी ने पीर शेख तकी और चालक दोनों को क्षमा कर दिया।

चक्र चलाने में माहिर, चालक एक ले आया।
भरी सभा में साहिब ऊपर, चालक चक्र चलाया॥
चारों ओर चक्र घूमा, रत्ती छू न पाया।
चालक का ही सिर कट गया, जब चक्र वापस आया॥

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46. साहिब जी पर बाना चालक पहलवान द्वारा प्रहार करवाना

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(46) साहिब जी पर बाना चालक पहलवान द्वारा प्रहार करवाना

रोज-रोज साहिब की बढ़ती हुई ख्याति से परेशान होकर एक दिन विरोधियों ने शेख तकी को सलाह दी कि कबीर के ऊपर बाना चालक पहलवान द्वारा प्रहार करवाकर मरवाया जाए। मुसलमानों में ऐसे पट्टा खेलने वाले पहलवान होते हैं। ये पट्टा खेलते हुए बड़े खेल दिखाते हैं। कहा जाता है कि यदि किसी को पट्टा या बाना लग जाए तो वो वहीं मर जाता है। इसी कारण इस खेल को देखने वाले थोड़ा दूर रहकर देखते हैं। शेख तकी ने बाना चलाने वाले पहलवान को बुलवाकर अच्छी तरह से समझाया कि यह खेल दिखाते हुए मेरे इशारे का इंतज़ार करना। जब मैं इशारा करूँ, तुम कबीर पर अपने बाने का प्रहार करना। धर्म गुरु ने उसे बहुत सारे ईनाम का लालच भी दिया। बाना चालक बड़ा खुश हुआ और भरी सभा में पहुँच गया। भरी सभा में जब साहिब सत्य भक्ति का संदेश दे रहे थे तो बाना चालक ने वहाँ अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया। बाना चालक का बाना तो साहिब के शरीर को छू भी नहीं पा रहा था।

भारी लालच दे पाखण्डियां, चालक को सब समझाया। पा ईशारा पहलवां, बाना साहिब पर बरसाया॥ बाना साहिब को छू न पाए, बड़ा जोर लगाया॥

अंत में पहलवान लगातार साहिब पर प्रहार करने लगा। लोग देख रहे थे कि बाने ने चालक के सिर पर ही प्रहार कर दिया, जिससे पहलवान के सिर के टुकड़े-टुकड़े हो गये। यह दृश्य देख सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। साहिब ने एक बार फिर अपनी दयालुता का परिचय देते हुए बाना चालक को पुनः जीवित कर दिया। यह देखकर शेख तकी और उसके पाखण्डी साथी बहुत लज्जित हुए।

बाने उलटा चालक का सिर, टुकड़-टुकड़ कर डाला। दयालू साहिब ने चालक को, पुनः जीवन दे डाला॥

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47. धनुष बाण से साहिब जी को मरवाया जाना

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(47) धनुष बाण से साहिब जी को मरवाया जाना

लगातार साहिब को मारने में विफल हो रहे शेख तकी को दुखी देख उसके साथी मौलवी ने उसे एक तरकीब बताई कि क्यों न कबीर को धनुष बाण से मरवाया जाए। उसने शेख तकी को समझाया कि पहले समय में बाण चलाने वाला छिपकर भी बाण चलाता था और जिस पर चलाया जाता था, उसे मालम ही नहीं होता था। छिपकर बाण चलाने से कबीर कोई जादू भी नहीं कर सकेगा और उसका अंत हो जायेगा। शेख तकी को तरकीब बड़ी प्यारी लगी। उसने धनुष बाण चलाने में कुशल व्यक्ति को लाने की आज्ञा दी। जब उसके सैनिक ऐसे व्यक्ति को ले आए तो शेख तकी ने उसे उसका काम बता दिया। तकी ने साथ ही उसे कह दिया कि यदि तुम अपने काम में सफल हो गये तो मूँह मांगा ईनाम दिया जायेगा। बाण-चालक ने बात स्वीकार कर ली। शेख तकी ने कह दिया कि तुम मेरे इशारे का इंतज़ार करना। साहिब भरे दरबार में सत्य भक्ति का गुणगान करते हुये भक्तजनों को निहाल कर रहे थे तो तकी का इशारा पाकर धनुषधारी ने छिपकर साहिब पर तीर चलाने शुरू कर दिये। वो बाण तो चलाता था, पर उसके बाण साहिब के चरणों को स्पर्श करके फिर उसके तरकश में वापिस लौट आते थे। धनुषधारी ने बड़े बाण चलाए, पर जब साहिब का कुछ न बिगाड़ सका तो यह कौतक देखकर धनुषधारी उल्टे पाँव भाग खड़ा हुआ। शेख तकी की निराशा का कोई अंत न रहा। वह घबरा कर इधर-उधर देखने लगा और साहिब की जय-जयकार होने लगी।

छिपकर बाण चलाओ साहिब पर, वो जादू न कर पाये। लगे दरबार में धनुषधारी ने, कई बाण चलाये॥ तीर चरणों का पा स्पर्श, मुड़ तरकश में आये। घबराकर चालक हुआ व्याकुल, भागा जान बचाये॥

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48. साहिब जी को योद्धा द्वारा लट्ठों से मरवाया जाना

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(48) साहिब जी को योद्धा द्वारा लट्ठों से मरवाया जाना

बार–बार लज्जित हो रहे धर्म गुरु शेख तकी को मौलवियों, मुल्लाओं और पंडितों ने सलाह दी कि कबीर को किसी योद्धा द्वारा लट्ठों से मरवा देते हैं। हो सकता है कि वो कबीर का अंत कर दे। बौखलाया हुआ तकी यह भी आजमाने को तैयार हो गया। उसने सैनिकों को एक ताकतवर योद्धा को खोज लाने का हुक्म दिया। सैनिक योद्धा की खोज में चल पड़े और एक ताकतवर योद्धा को खोज लाए, जो लट्ठ चलाने में बड़ा ही माहिर था। तकी ने योद्धा से कहा कि तुम अपने लट्ठ से कबीर को मार दोगे तो तुम्हें मुँह माँगा ईनाम दिया जायेगा। योद्धा ने स्वीकार कर लिया। तकी ने कहा मेरे इशारे का इन्तजार करना।

आम तौर पर तकी तब आदेश देता जब साहिब श्रद्धालुओं के बीच बैठे होते थे, उन्हें प्रवचन दे रहे होते थे। ऐसा वो इसलिए करता ताकि साहिब को सबके सामने मार सके। जब साहिब सत्संग कर रहे थे तब शेख तकी का इशारा पाते ही योद्धा ने साहिब पर अंधाधुंध प्रहार करने शुरू कर दिये पर साहिब पर उन लट्ठों का कोई भी असर न हुआ। लट्ठ तो फूलों की तरह साहिब पर लग रहे थे। योद्धा भी साहिब पर अपने लट्ठों का कोई असर न देख बड़ा दुखी हुआ। आख़िर जब लट्ठ उल्टा उसके ऊपर बरसा और उसे खून निकलने लगा तो वह हार मानकर निराश होकर वहाँ से भाग गया। तकी को इस बात से अथाह लज्जित होकर जाना पढ़ा।

लट्ठधारी ताकतवर योद्धा, तकी पास ले आये।
सत्संग करते साहिब पर, पहिलवान लट्ठ चलाये॥
लट्ठ साहिब को छू न पाये, पलट योद्धा सिर लागा।
खून से लथ-पथ हुआ पहलवान, हार मान कर भागा॥

बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 111

49. साहिब जी को कोड़ों से मरवाया जाना

112 साहिब बन्दगी

#(49) साहिब जी को कोड़ों से मरवाया जाना

शेख तकी साहिब को जल्दी से जल्दी मिटाना चाहता था। उसकी कोई भी तरकीब कामयाब नहीं हो रही थी। वो सोचता था कबीर कोई जादूगर है। उसने पंडित ओर मुल्ला की सलाह पर साहिब को कोड़ों से मरवाने का फैसला कर लिया। बौखलाया हुआ शेख तकी साहिब को रास्ते से हटाने के लिए हर किसी की बात मान लेता था। इसलिए उसने कोड़ों वाली बात भी मान ली और अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि किसी ऐसे आदमी को खोजकर लाओ जो कोड़े चलाने में कुशल हो। जब ऐसा व्यक्ति खोजकर लाया गया तो शेख तकी ने उसे समझा दिया कि उसे क्या करना है। जब साहिब भक्तजनों को प्रवचन सुना रहे थे, तब शेख तकी के इशारे पर उसने साहिब पर कोड़ों की वर्षा कर दी। पर कोड़ों से साहिब की शब्द स्वरूपी देही पर कोई असर नहीं हो रहा था और न ही कोई निशान पढ़ रहा था। साहिब तो भक्तजनों को सत्य भक्ति का उपदेश देने में मगन थे। कोड़ों का असर न होते हुये देख कोड़े चलाने वाला बड़ा परेशान हो गया और आखिरकार थक कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। यह देख भक्तजन साहिब की जय-जयकार करने लगे। शेख तकी और उनके सभी साथी लज्जित होकर वहाँ खड़े होकर साहिब की ओर देखते रह गए।

हुआ फैसला साहिब को, कोड़ों से मार मुकाने का। धर्म गुरु ने हुकम दिया, सत्संग में कोड़े लगाने का॥ वर्षा की तरह कोड़े बरसे, कोड़े वाला गया थक हार। सब का सिर नीवा हुआ, साहिब की सुन जय-जयकार॥

बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 113

50. साहिब जी को तेल के कोल्हू में डलवाना

114 साहिब बन्दगी

(50) साहिब जी को तेल के कोल्हू में डलवाना

शेख तकी द्वारा बार-बार साहिब की कसनी लेने से बादशाह बहुत दुःखी था क्योंकि बादशाह सिकंदर साहिब को स्वयं खुदा मानता था। बादशाह की साहिब के प्रति श्रद्धा को देख, धर्म गुरु शेख तकी ईर्ष्या में इतना जल रहा था कि उसे साहिब को मारने के सिवाय और कुछ सूझता ही नहीं था। इसलिए वो आए दिन अपने साथियों से मिलकर साहिब को मारने के नये-नये ढंग सोचता रहता। एक दिन वो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहा था तो रास्ते में तेल का कोल्हू चलते देखा। सबका ध्यान उस ओर गया। बस ! फिर क्या था, सबने विचार रखा कि कबीर को मारने के लिए यह तरीका भी अपनाकर देख लेते हैं। हो सकता है कि इस युक्ति से कबीर का अंत हो जाए। शेख तकी को भी यह सलाह ठीक लगी। वो एक दिन साहिब को घूमने के बहाने ले गया। अर्न्तयामी साहिब तो सब जानते थे। शेख तकी ने उस तेल के कोल्हू के पास पहुँचकर साहिब से कहा कि आप इस ओखली में खड़े हो जाओ। साहिब भी आदेश के ही इंतज़ार में थे। वो तो मुस्कराते हुये उसमें खड़े हो गये। तभी शेख तकी ने कोल्हू चलाने वाले को कोल्हू चलाने का हुक्म दिया। हुक्म सुनते ही कोल्हू वाले ने कोल्हू चला दिया। कोल्हू चलता रहा, साहिब खड़े मुस्कराते रहे। कोहलू साहिब का कुछ न बिगाड़ पाया। यह देख तकी और उसके साथी बड़े हैरान हुये और अपनी हार से बेइज्जत होकर वहाँ से चल दिये।

कोल्हू में साहिब को पीड़ो, सबने मिल विचार बनाया। ओखली में खड़े होने का, साहिब को हुक्म सुनाया॥ झट से सब ने किया ईशारा, कोल्हू वाले कोल्हू चलाया। चलता कोल्हू साहिब ऊपर, कुछ बिगाड़ न पाया॥

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