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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

अ० २६] २१ सूत्रस्थानम् ३२१

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अ० २६] २१ सूत्रस्थानम् ३२१ लाचार होकर खाना ये क्रमविरुद्ध है। सुअर आदि का मांस खाकर या गरम अथवा घी आदि खाकर ऊपर शीतल पदार्थों का सेवन करना परिहार विरोधी है। दुष्ट या बुरी (बांस आदि, या मिट्टी के तेल से) लकड़ियों से पकाये, कच्चे-पके, बहुत पके, या जले हुए चावल आदि आहार का खाना पाकविरोधी कहते हैं। खटाई का दूध के साथ संयोग करना यह संयोगविरोधी है। जो आहार मन को नहीं रुचता वह हृदयविरोधी है। जिस आहार में रस उत्पन्न नहीं हुआ वह सम्पद्विरुद्ध है। इसी प्रकार जिस आहार का रस नष्ट हो गया या बिगड़ गया है, वह भी सम्पद्विरुद्ध है। जो भोजन एकान्त में नहीं खाया जाता है वह आहारविधि अर्थात् शास्त्र के विरुद्ध है। इस प्रकार का विरोधी अन्न भी स्वस्थ पुरुष को, जिसकी अग्नि दीप्त हो, युवा पुरुष को, सात्म्य बन गया हो, या अल्पमात्रा में हो अथवा स्नेह एवं व्यायाम से बलवान् बने पुरुष को विरुद्ध भोजन विशेष हानि नहीं करते। विरोधी अन्न के सेवन से निम्न रोग उत्पन्न होते हैं। यथा—नपुंसकता, अन्धापन, वीसर्प, जलोदर, विस्फोटका, उन्माद, भगन्दर, मूर्च्छा, मद, अफारा, गलरोग, पाण्डुरोग, आमविष, किलास, कुष्ठ, संग्रहणी, शोष, रक्तपित्त, ज्वर, पीनस। इसी प्रकार संतति में पहुंचने वाले दोषों एवं मृत्यु का भी कारण विरुद्ध आहार को ही कहते हैं॥ ८३–१०३॥ एषां च खलु परेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामिमे भावाः प्रतिकारा भवन्ति। यथा—वमनं विरेचनं च, तद्विरोधिनां च द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः, तथाविधैश्च द्रव्यैः पूर्वमभिसंस्कारः शरीर- स्येति ॥ १०४ ॥ इस प्रकार के विरुद्ध अन्न पान के सेवन से अथवा अन्य विरोधरूपी कारणों से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा के ये उपाय हैं। यथा—वमन, विरेचन, उक्त रोगों के विरोधी द्रव्यों का शान्ति के लिये उपयोग करना, विरुद्ध आहार- जन्य रोगों के विरुद्धद्रव्यों का निरन्तर उपयोग करके शरीर को संस्कृत करना, अथवा रसायन ओषधियों से शरीर को शुद्ध करना ॥ १०४ ॥ भवति चात्र—विरुद्धाशनजान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् । वमनं शमनं चैव पूर्वं वा हितसेवनम् ॥ १०५ ॥ विरुद्ध आहार से उत्पन्न रोगों को विरेचन, वमन, संशमन क्रिया अथवा व्याधि के निवारणार्थ पहले ही पथ्य तथा रसायनादि का सेवन नष्ट करता है॥ १०५ ॥

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३३२ चरकसंहिता [अ० २७ तत्र श्लोकाः—मतिरासीन्महर्षीणां या या रसविनिश्चये । द्रव्याणि गुणकर्मभ्यां द्रव्यसंख्या रसाश्रयाः ॥ १०६ ॥ कारणं रससंख्या या रसानुरसलक्षणम् । परादीनां गुणानां च लक्षणानि पृथक् पृथक् ॥ १०७ ॥ पञ्चात्मकानां षट्त्वं च रसानां येन हेतुना । ऊर्ध्वानुलोमभाजश्च यद्गुणातिशयाद्रसाः ॥ १०८ ॥ षण्णां रसानां षट्त्वे च सविभक्ता विभक्तयः । उद्देशश्चापवादश्च द्रव्याणां गुणकर्मणी ॥ १०९ ॥ प्रवरावरमध्यत्वं रसानां गौरवादिषु । पाकप्रभावयोर्लिङ्गं वीर्यसंख्याविनिश्चयः ॥ ११० ॥ षण्णामास्वाद्यमानानां रसानां यत्स्वलक्षणम् । यद्यद्विरुध्यते तस्माद्येन यत्कारि चैव यत् । वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामौषधं च यत् । आत्रेयभद्रकाप्यीये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ११२ ॥ रस-निश्चय सम्बन्ध में महर्षियों की भिन्न २ मति, द्रव्यों के गुण कर्म, रस की संख्या, इन के भेद होने के कारण, रस या अनुरस का लक्षण, पर आदि गुण एवं उन के लक्षण, पंच महाभूतों से उत्पन्न रसों की संख्या, कौन कौन द्रव्य ऊर्ध्वगामी, अधोगामी क्रिया करते हैं, छः रसों के विभाग, रसके आधार- भूत द्रव्यों के सामान्य गुण, कर्म और इनके अपवाद, गौरव, लघुता, रसों में उत्कृष्ट, मध्यम, अवर भेद, विपाक, प्रभाव का लक्षण, वीर्य कितने प्रकार का, छः रसों के लक्षण, परस्पर विरुद्ध द्रव्य, इन के सेवन से उत्पन्न विकार एवं इन रोगों की औषध ये सब विषय इस 'आत्रेय-भद्रकाप्यीय' अध्याय में आत्रेय ऋषि ने कह दिये ॥ १०६-११२ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थानेऽन्नपानचतुष्के आत्रेयभद्रकाप्यीयोऽध्यायः षड्विंशतितमः समाप्तः ॥ २६ ॥

सप्तविंशोऽध्यायः । अथातोऽन्नपानविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२३

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२३ इस के आगे अन्नपानविधि नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भग- वान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२॥ इष्ट-वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शं विधिविहितमन्नपानं प्राणिनां प्राणिसंज्ञ- कानां प्राणमाचक्षते कुशलाः, प्रत्यक्षफलदर्शनात्, तदिन्धना ह्यन्तराग्नेः स्थितिः; तत् सत्त्वमूर्जयति, तच्छरीर-धातु-व्यूह-बल-वर्णोन्द्रियप्रसाद- करं यथोक्तमुपसेव्यमानं, विपरीतमहिताय संपद्यते ॥ ३ ॥ प्रिय या हितकर वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्शयुक्त विधिपूर्वक^१ सेवन किया अन्न पान, प्राणिमात्र का प्राण है; ( 'अन्नं वै प्राणाः' ) ऐसा विद्वान् मनुष्य कहते हैं । सब प्राणियों के प्राण स्थिर रखने के लिये आहार मुख्य कारण है । यह बात प्रत्यक्ष प्रमाण से भी सिद्ध है । ठीक प्रकार सेवन करने पर अन्न शरीर में स्थित जाठराग्नि का आधार है और इस अग्नि का अन्न इन्धन रूप होता है । अन्न के सेवन करने से मन की शक्ति बढ़ती है, शरीर के धातुसमूह, बल वर्ण बढ़ता है, तथा इन्द्रियां निर्मल होती हैं । विधि से विपरीत^१ सेवन करने पर अन्न, विप- रीत परिणाम उत्पन्न करता है ॥ ३ ॥ तस्माद्धिताहितावबोधनार्थमन्नपानविधिमखिलेनोपदेक्ष्यामोऽग्नि- वेश ! तत्स्वभावादुदकं क्लेदयति, लवणं विष्यन्दयति, क्षारः पाचर्यात, मधु संदधाति, सर्पिः स्नेहयति, क्षीरं जीवयति, मांसं बृंहयति, रसः प्रीणयति, सुरा जर्जराकरोति, शीधुरवधमयति, द्राक्षासवो दीपयति, फाणितमाचिनोति, दधि शोफं जनयति, पिण्याकशाकं ग्लपयति, प्रभू- तान्तर्मलो माषसूपः, दृष्टिशुक्रघ्नः क्षारः, प्रायः पित्तलमम्लमन्यत्र दाडि- मामलकात्, प्रायो मधुरं श्लेष्मलमन्यत्र मधुनः पुराणाच्च शालयवगो- धूमात्, प्रायः सर्वं तिक्तं वातलमवृष्यं चान्यत्र वेत्राग्रपटोलात्, प्रायः कटुकं वातलमवृष्यं चान्यत्र पिप्पलीविश्वभेषजात् ॥ ४ ॥ इसलिये हे अग्निवेश ! हितकारी और अहितकारी विषय का ज्ञान करनेके लिये अन्न- पान विधि को विस्तार से कहते हैं। स्वाभाविक रीति से जल (क्लिन्नता) उत्पन्न करता है । लवण विष्यन्द (नरम बनाना, जलस्राव उत्पन्न) करता है । क्षार पाचन करता है, शहद जोड़ता है, घी चिकना बनाता है । दूध जीवन देता है, मांस बृंहण पोषण देता है । रस क्षीणता को पुष्ट करता है । मद्य शरीर को जीर्ण करता है । शीधु [ सिरका ] शरीर का लेखन करता है, द्राक्षासव अग्नि को बढ़ाता है । १. सूत्रस्थान इन्द्रियोपक्रमणीय अध्याय ( ८। सू० १६) में ('नात्न- न्नमुद्धृत्यादि भोजन करने के सम्बन्ध में उचित विधान किया है।

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३२४ चरकसंहिता [ अ० २७ फाणित [ राव ] वात, पित्त, कफ इन को बढ़ाता है, दही सूजन को उत्पन्न करता है। पिण्याक (तिलकल्क) और हरे शाक प्रसन्नता का नाश करते हैं। उड़द की दाल मल को विशेष रूप से उत्पन्न करती है। क्षार नेत्र और शुक्र को नाश करते हैं। अनार और आंवले को छोड़ कर प्रायः सब अम्ल पित्तका- रक हैं। मधु और पुराने चावल, जौ और गेहूं को छोड़कर प्रायः करके मधुर रस कफकारक होता है, बेंत के अग्रिम भाग और परवल को छोड़ प्रायः करके सब तिक्त रस वायुकारक और शुक्रनाशक होते हैं। पिप्पली और सोंठ को छोड़ कर प्रायः करके सब कटु रस वायुकारक तथा शुक्रनाशक हैं ॥ ४ ॥ परमतो वर्गसंग्रहेणाहारद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ५ ॥ शूकधान्य-शमीधान्य-मांस-शाक-फलाश्रयान् । वर्गान् हरित-मद्याम्बु-गोरसेक्षु-विकारिकान् ॥ ६ ॥ दश द्वौ च परौ वर्गौ कृतान्नाहारयोगिनाम् । रसवीर्यविपाकैश्च प्रभावैश्च प्रचक्ष्महे ॥ ७ ॥ इस के आगे वर्गक्रम से आहार पदार्थों की व्याख्या करेंगे। यथा—शूक- वर्ग, शमीधान्यवर्ग, मांसवर्ग, शाकवर्ग, फलवर्ग, हरितवर्ग, मद्यवर्ग, अम्बुवर्ग, गोरसवर्ग, इक्षुविकारवर्ग, कृतान्नवर्ग और आहारयोगवर्ग । इन बारह वर्गों में सब द्रव्यों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव का वर्णन करेंगे ॥ ५-७ ॥ अथ शूकधान्यवर्गः- रक्तशालिर्महाशालिः कलमः शकुनाहृतः । तूर्णको दीर्घशूकश्च गौरः पाण्डुकलाङ्गलौ ॥ ८ ॥ सुगन्धिका लांग्वालाः शारीवाख्याः प्रमादकाः । पतङ्गास्तपनीयाश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥ ९ ॥ शीता रसे विपाके च मधुराः स्वल्पमारुताः । बद्धाल्पवर्चसः स्निग्धा बृंहणाः शुक्रमूत्रलाः ॥ १० ॥ रक्तशालिर्वरस्तेषां तृष्णाघ्नास्त्रिमलापहः । महांस्तस्यानु कलमस्तस्याप्यनु ततः परे ॥ ११ ॥ यवका हायनाः पांशुवाप्या नैषधकादयः । शालीनां शालयः कुर्वन्त्यनुकारं गुणागुणैः ॥ १२ ॥ शीसः स्निग्धोऽगुरुः स्वादुस्त्रिदोषघ्नः स्थिरात्मकः । षष्टिकः प्रवरो गौरः कृष्णगौरस्ततोऽनु च ॥ १३ ॥ वरकोद्दालकौ चीन-शारदोज्ज्वल-दर्दुराः ।

अ० २७] सूत्रस्थानम् ३२५

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अ० २७] सूत्रस्थानम् ३२५ गन्धलाः कुरुविन्दाश्च षष्टिकाल्पान्तरा गुणैः ॥ १४ ॥ मधुरश्चाम्लपाकश्च व्रीहिः पित्तकरो गुरुः । बहुमूत्रपुरीषोष्मा त्रिदोषस्त्वेव पाटलः ॥ १५ ॥ सकोरदूषः श्यामाकः कषायमधुरो लघुः । वातलः कफपित्तघ्नः शीतः संग्राहिशोषणः ॥ १६ ॥ हस्ति-श्यामाक-नीवार-तोय-पर्णी-गवेधुकाः प्रशान्तिकाम्भः श्यामाक-लोहिताणु-प्रियङ्गवः ॥ १७ ॥ मुकुन्दो झिण्टिगर्मुटी चारुका वरकास्तथा । शिबिरोत्कटतूर्णाह्वाः श्यामाकसदृशा गुणैः ॥ १८ ॥ रूक्षः शीतोऽगुरुः स्वादुर्बहुवातशकृद्यवः । स्थैर्यकृत्सकषायस्तु बल्यः श्लेष्मविकारनुत् ॥ १९ ॥ रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपित्तहा । मेदः कृमिविषघ्नश्च बल्यो वेणुयवो मतः ॥ २० ॥ सन्धानकृद्वातहरो गोधूमः स्वादुशीतलः । जीवनो बृंहणो वृष्यः स्निग्धः स्थैर्यकरो गुरुः ॥ २१ ॥ नन्दीमुखी मधूली च मधुरस्निग्धशीतले । इत्ययं शूकधान्यानां पूर्वो वर्गः समाप्यते ॥ २२ ॥ रक्तशालि, महाशालि, कलम, शकुनाहृत, तूर्णक, दीर्घशूक, गौर, पाण्डुक, लांगुल, सुगन्धिकर (हंसराज), लोहवाल, शारिवा, प्रमोढक, पतंग और तपनीय तथा अन्य उत्तम शालि (चावल) ठण्डे, रस और विपाक में मधुर, किंचित् वातकारक, स्निग्ध, पुष्टिकारक, शुक्र और मूत्रवर्द्धक हैं। मल को थोड़ा उत्पन्न करनेवाले एवं रोकने वाले हैं (मधुर विपाक होने से कब्ज करना प्रभाव से है)। इन सब चावलो में लाल चावल श्रेष्ठ हैं, ये लाल चावल तृषानाशक और त्रिदोषनाशक हैं। इन से उतर कर महान् शालि, फिर कलम और फिर उत्तरोत्तर गुण न्यून होते गये हैं। यवक, १ हायन, पांसु, वाप्य, नैषध आदि चावल (मोटे धान्य) लाल चावल आदि के विपरीत गुण करते हैं। अर्थात् लाल चावल, तृषानाशक और त्रिदोषहारक हैं और ये इन के विरुद्ध गुण वाले हैं। (३) षष्टिक (साठी ग्रीष्म ऋतु में पकने वाले) धान्य शीत, लघु, १. यहां पर दिये हुए नाम नाना देशों में प्रसिद्ध हैं। इसलिये सब का लिखना असम्भव है। 'शालि है मन्तं धान्यम्, षष्टिकादयश्च, ग्रीष्मकाः, व्रीहयः शारदाः'--इन में यही भेद है।

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३२६ चरकसंहिता [ अ० २७ मधुर, त्रिदोष नाशक, शरीर को दृढ़ करने वाले हैं। इन में श्वेत साठी श्रेष्ठ हैं, और काली जाति के धान्य इन से हीन गुण वाले हैं, ( ४ ) वरक, उद्दा- लक, चीन; शारद, उज्ज्वल, दर्दुर, गन्धक और कुरुविन्द ये षष्टिक धान्यों की जातियां हैं। ये गुणों में हीनगुण वाले होते हैं । ( ५ ) व्रीहि ( शरद् ऋतु में पकने वाले ) चावल, मधुर रस, अम्लपाकी, पित्तकारक गुरु हैं। इनमें पाटल जाति का धान्य मल-मूत्रवर्द्धक और त्रिदोषकारक है । ( ५ ) कोरदूष ( कोद्रव कुधान्य कोदों). श्यामाक ( सांवक ) ये धान्य कषाय और मधुर रस, लघु, वायुकारक, कफ-पित्तनाशक, शीतवीर्य, संग्राही और शोषक हैं। ( ६ ) हस्ति, सांवक, नीवार ( देवभात ), तोयपर्णी, गवेधुक, प्रशान्तिका; अम्भःश्यामाक, लोहिताणु, प्रियंगु ( कांग ), मुकुन्द, झिंटी, गर्मुटी, चारुक, वरक, शिविर, उत्कट, जूर्णाह ( जोनार ) ये सब धान्य गुणों में सांवक के समान हैं। ( ७ ) जौ रूक्ष, शीत, गुरु, मधुर रस, वायु और मल- कारक, शरीर को स्थिर करने वाले, कषाय रस, बल कारक और कफजन्य विकारों को नाश करने वाले हैं। वेणुयव रूक्ष, मधुर, कषाय अनुरस, कफ- पित्तनाशक, मेद, कृमि और विष के नाशक एवं बलकारक हैं। ( ८ ) गेहूँ- टूटे हुए को मिलाने वाला, वातनाशक, स्वादु रस, शीत वीर्य जीवनीय, बृंहण- कारक, वृष्य, शुक्रवर्द्धक, स्निग्ध, स्थिरताकारक गुरु है। नान्दीमुखी और मधूली ये दोनों मधुर, स्निग्ध, शीतल हैं । यह शूक-धान्यो का पहिला वर्ग समाप्त हुआ ॥ ८-२२ ॥ इति शूकधान्यवर्गः । अथ शमीधान्यवर्गः । कषायमधुरो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः । विशदः श्लेष्मपित्तघ्नो मुद्गः सूप्योत्तमो मतः ॥ २३ ॥ वृष्यः परं वातहरः स्निग्धोष्णमधुरो गुरुः । बल्यो बहुमलः पुंस्त्वं माषः शीघ्रं ददाति च ॥ २४ ॥ राजमाषः सरो रुच्यः कफ-शुक्राम्ल-पित्तकृत् । तत्स्वादुर्वातलो रूक्षः कषायो विशदो गुरुः ॥ २५ ॥ उष्णाः कषायाः पाकेऽम्लाः कफशुक्रानिलापहाः । कुलत्था ग्राहिणः कास-हिक्का-श्वासार्शसां हिताः ॥ २६ ॥ मधुरा मधुराः पाकेऽग्राहिणो रूक्षशीतलाः । मकुष्ठकाः प्रशस्यन्ते रक्त-पित्त-ज्वरादिषु ॥ २७ ॥

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२७

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२७ चणकाश्च मसूराश्च खण्डिकाः सहरेणवः । लघवः शीतमधुराः सकषाया विरूक्षणाः ॥ २८ ॥ पित्तश्लेष्मणि शस्यन्ते सूपेषुवालेपनेषु च । तेषां मसूरः संग्राही कलायो वातलः परः ॥ २९ ॥ स्निग्धोष्णमधुरस्तिक्तः कषायः कटुकस्तिलः । त्वच्यः केश्यश्च बल्यश्च वातघ्नः कफपित्तकृत् ॥ ३० ॥ गुर्व्योऽथ मधुराऽशीता बलघ्न्यो रूक्षणात्मिकाः । सस्नेहा बलिभिर्भोज्या विविधाः शिम्बिजातयः ॥ ३१ ॥ शिम्बी रूक्षा कषाया च कोष्ठवातप्रकोपिनी । न च वृष्या न चक्षुष्या विष्टभ्य च विपच्यते ॥ ३२ ॥ आढकी कफपित्तघ्नी वातला कफवातनुत् । अवलगुजः सैडगजो, निष्पावा वातपित्तलाः ॥ ३३ ॥ काकाण्डोलात्मगुप्तानां माषवत्फलमादिशेत् । द्वितीयोऽयं शमीधान्यवर्गः प्रोक्तो महर्षिणा ॥ ३४ ॥ शमीधान्य वर्ग—१. मूंग कषाय, मधुर रस, रूक्ष, शीत, विपाक में कटु, लघु, स्वच्छ, श्लेष्म पित्तनाशक और दालों में सब से उत्तम और शमीधान्यों में भी उत्तम है। २. उड़द-अत्यन्त वृष्य, वातनाशक, स्निग्ध; उष्ण, मधुर और गुरु हैं; ये बलकारक, अधिकमात्रा में मल उत्पन्न करने वाले,और पुरुषत्व को शीघ्र उत्पन्न करने वाले हैं१। राजमाष मल-भेदक, रुचिकर, कफ, वीर्य और अम्लपित्त को करने वाले, उड़द के समान मधुर, वायुकारक, रूक्ष, कषाय, स्वच्छ और गुरु हैं। कुलत्थी कषाय रस, विपाक में अम्ल, कफ शुक्र और वायुनाशक, ग्राही (संग्राही) तथा कास, श्वास, हिचकी, अर्श रोग में हितकारी है। मोठ मधुर रस, मधुर विपाक, संग्राही, रूक्ष, शीतल, रक्तपित्त तथा ज्वर में प्रशस्त हैं। चने, मसूर, खण्डिक त्रिपुट (फाफरा) और मटर लघु, शीतवीर्य, मधुर, कषाय रस, रूक्ष, कफ-पित्त में हितकारी हैं। इन का उपयोग दाल में तथा लेप में होता है। इन में मसूर सब से अधिक संग्राही और मटर १. वृष्य वस्तु तीन प्रकार की होतो है । यथा— शुक्रश्रुतिकरं किञ्चित् किञ्चिच्छुक्रविवर्धनम् । श्रुतिवृद्धिकरं किञ्चित् त्रिविधं वृष्यमुच्यते ॥ कोई वस्तु शुक्र का क्षरण करती, कोई शुक्र को बढ़ाती है और कोई दोनों करती है। उड़द में तीनों प्रकार के गुण हैं ।

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३२८ चरकसंहिता [ अ० २७ सब से अधिक वायुकारक है । तिल ( काले तिल १ ) स्निग्ध, उष्ण, मधुर रस, तीक्ष्ण, कषाय, तिक्त, त्वचा और बालों के लिये हितकारी, शक्तिदायक, वात- नाशक तथा कफ-पित्तवर्द्धक हैं । यहां पर कहे हुए शमीधान्यों के सिवाय जो दूसरे गोल जाति के धान्य हैं, वे सब गुरु, मधुर, उष्ण, बलनाशक, रूक्ष, स्निग्ध, शक्तिशाली पुरुषों के खाने लायक हैं । सामान्यतः शिम्बीधान्य रूक्ष, कषाय, कोष्ठ में वायु का प्रकोप करने वाले, अवृष्य, नेत्रों के लिये अहितकारी और पचने तक मल मूत्र का अवरोध करने वाले है । अरहर ( तुअर ) कफ- पित्तनाशक, वायुकारक है । बाबची, चक्रमर्द के बीज, कफ वायुनाशक हैं । निष्पाव ( सफेद बाल लोभिया ) पित्तकारक, वायुकारक हैं । काकाण्ड ( शूकरशिम्बी, कौंच ), उमा ( अलसी ), और कौंच इन का गुण उड़द के अनुसार है । इस प्रकार आत्रेय ऋषि ने शमीधान्य का दूसरा वर्ग कह दिया ॥ २३-३४ ॥ इति शमीधान्यवर्गः । अथ मांसवर्गः । गोखराश्वतरोष्ट्राश्व-द्वीपि-सिंहर्क्ष-वानराः । वृको व्याघ्रस्तरक्षुश्च बभ्रु-मार्जार-मूषिकाः ॥ ३५ ॥ लोपाको जम्बुकः श्येनो वान्तादश्चाष-वायसौ । शशघ्नी मधुहा भासो गृध्रोलूक-कुलिङ्गकाः ॥ ३६ ॥ धूमीका कुररश्चेति प्रसहा मृगपक्षिणः । गाय, गधा, घोड़ा, ऊंठ, खच्चर, चीता, सिंह, भालु रीछ, बानर, भेड़िया, व्याघ्र, तरक्षु ( व्याघ्रभेद ), बभ्रु ( जिस के ऊपर बहुत सा बाल होते हैं ), बिल्ली, चूहा, लोमड़ी, गीदड़, बाज, कुत्ता, चाष ( नीलकण्ठ ), कौवा, शशघ्नी ( बाज् चील ), कुरर ( भास ), मधुहा, गीध, उल्लू, कुलिंग ( बगुला की जाति ), धूमिका, कुरर ये 'प्रसह' श्रेणी के पशु पक्षी हैं ॥३५-३६॥ श्वेतः श्यामश्चित्रपृष्ठः कालकः काकुलीमृगः ॥ ३७ ॥ कूर्चीका चिल्लटो भेको गोधा शल्लकगण्डकौ । कदली नकुलः श्वाविदिति भूमिशयाः स्मृताः ॥ ३८ ॥ १. तिलों में काले तिल अच्छे हैं— “तिलेषु सर्वेष्वसितः प्रधानो मध्यः सितो, हीनतरास्ततोऽन्ये ।

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२६

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२६ काकुलीम्मृग (मालुया सर्प) की चार श्रेणियां हैं यथा—श्वेत, काली, चित- कबरी और कालक, कूर्चाका चिल्लट (चियार), मेंढक, शल्लक, गोह, गाण्डक (गोह का भेद, सर्पणी), कदली, नेवला, श्वावित् ये भूमिशय या बिलेशय अर्थात् बिल में रहनेवाले हैं ॥ ३७-३८ ॥ सृमरश्चमरः खङ्गो महिषो गवयो गजः । न्यङ्कुर्बराहश्चानूपा मृगाः सर्वे रुरुस्तथा ॥ ३६ ॥ सृमरः (सूवर) चमर (चमरिया गाय), गेंडा, भैसा, नील गाय, हाथी न्यंकु (हरिण), सुअर (छोटा) और रुरु (बारह सींगा) ये सब 'आनूप' अर्थात् जल बहुल प्रदेश के पशु हैं ॥३६॥ कूर्मः कर्कटको मत्स्यः शिशुमारस्तिमिंगिलः । शुक्ति-शङ्खोद्र-कुम्भीर-चुलुकी-मकरादयः ॥ ४० ॥ इति वारिशयाः प्रोक्ताः, वक्ष्यन्ते वारिचारिणः । कछुआ, केकड़ा, मछली, तिमिंगिल (मछली भेद), सीप शंखमें होने वाले जन्तु शिशुमार, उद्र (जल बिडाल, ऊदबिलाव) कुम्भीर (नाका), चुलुकी, और मकर ये 'वारिशय' अर्थात् जल में रहने बाले जन्तु हैं। पानी पर रहने वाले प्राणियों के नाम कहते हैं ॥ ४० ॥ हंसः क्रौञ्चो बलाका च बकः कारण्डवः प्लवः ॥ ४१ ॥ शरारिः पुष्कराह्वश्च केशरी मानतुण्डकः । मृणालकण्ठो मद्गुश्च कादम्बः काकतुण्डकः ॥ ४२ ॥ उत्क्रोशः पुण्डरीकाक्षो मेघरावोऽम्बुकुकुटी । आरा नन्दीमुखी वाटी सुमुखाः सहचारिणः ॥ ४३ ॥ रोहिणी कामकाली च सारसो रक्तशीर्षकः । चक्रवाकास्तथाऽन्ये च खगाः सन्त्यम्बुचारिणः ॥ ४४ ॥ हंस, क्रौंच, बलाका, बगुला, कारण्डव (हंसभेद बत्तख), प्लव, शरारि, पुष्कराह, केशरी, मानतुण्डक, मद्गु (जलकौवा), कादम्ब, काकतुण्ड, उत्क्रोश (कुरल), पुण्डरीकाक्ष, मेघराव (मेघनाद मोर), अम्बुकुकुटी (पानी की मुर्गी), आरा, नन्दीमुखी, वाटी, सुमुख, सहचारी, रोहिणी, कामकाली, सारस, लाल शिर बाला सारस, चक्रवाक (चकवा) और अन्य जलचर पक्षी पानीमें विचरने वाले हैं ॥४१-४४॥ पृषतः शरभो रामः श्वदंष्ट्रा मृगमातृका । शशोगण्डो कुरङ्गश्च गोकर्णः कोट्टकारकः ॥ ४५ ॥

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३३० चरकसंहिता [ अ० २७ चारुष्को हरिणैणौ च शम्बरः कालपुच्छकः । ऋष्यश्च वरपोतश्च विज्ञेया जाङ्गला मृगाः ॥ ४६ ॥ चित विरंगे हरिण, शरभ ( आठ पांव का ऊंठ के आकार का मोटे सींगों का एक हरिण, इस के पीठ में चार पाये होते हैं, काश्मीर देश में प्रसिद्ध है ), राम ( हिमालय का महामृग ) श्वदंष्ट्रा ( चार दांत का एक जाति का पशु ), मृगमातृका ( छोटा-मोटे उदर वाला पशु ), शश हरिण, कुरङ्ग ( हरिणभेद ) गोकर्ण ( गाय के से मुख का हरिण ), कोट्टकारक, चारुष्क, हरिण, एण, शम्बर ( सांभर ), कालपुच्छ, ऋष्य और वरपोत ये जंगली मृग हैं । यहां पर शश-शब्द मृगवाची है । जैसे चन्द्रमा को शशांक और मृगाङ्क कहते हैं इसमें वस्तु तो एक होनी चाहिये या तो शशका चिन्ह हो या मृग का ॥ ४५-४६ ॥ लावो वर्ती बकश्चैव वार्तीकः सकपिञ्जलः । चकोरश्चोपचक्रश्च कुकुभो रक्तवर्णकः ॥ ४७ ॥ लावाद्या विष्किरास्त्वेते वक्ष्यन्ते वर्तकादयः । वर्तको वर्तिका चैव बर्ही तित्तिरिकुक्कुटौ ॥ ४८ ॥ कङ्क-सारपदेन्द्राभ-गोनर्द-गिरिवर्तकाः क्रकरोऽवकरश्चैव वारटाश्चेति विष्किराः ॥ ४६ ॥ बटेर, वर्त्ती ( तीतर ), बक ( बगुला ), वार्तीक ( बतख ), कपिञ्जल (श्वेत तीतर), चकोर, उपचक्र (चकोर भेद), कुकुभ, रक्तवर्णक, विष्किर पक्षी हैं । वर्त्तक ( बटेर ), वर्त्तिका, बर्ही ( मोर ), तीतर, कुक्कुट, कङ्क, सारपद, इन्द्राभ, गोनर्द, गिरिवर्त्तक, क्रकर, अवकर और वारटा से सब मुर्गा जाति के 'विष्किर' पक्षी हैं ॥ ४७-४९ ॥ शतपत्रो भृङ्गराजः कोयष्टी जीवजीवकः । कैरातः कोकिलोऽत्यूहो गोपापुत्रः प्रियात्मजः ॥ ५० ॥ लट्वा लट्वषको बभ्रुर्वटहा डिण्डिमानकः । जटी दुन्दुभिवा ( पा ) कार-लोह-पृष्ठ-कुलिङ्गकाः ॥ ५१ ॥ कपोत-शुक-सारङ्गाश्चिरिटी-ककुयष्टिकाः । शारिका कलविङ्कश्च चतकोऽङ्गारचूडकः ॥ ५२ ॥ पारावतः पानविक इत्युक्ताः प्रतुदा द्विजाः । शतपत्र ( कटफोड़ा ) भृंगराज ( भांवरा ), कोयष्टि ( कोड़ा ) जीवजीवक, कैरात, कोकिल, अत्यूहा, गोपापुत्र, प्रियात्मज, लट्वा, लट्वषक, बभ्रु ( [?] पक्षी, पीले बालोंवाला पक्षी ), वटहा डिंडिमानक ( ऊटकटम्भा

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३१

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३१ दुन्दुभि, वाकार, लोहपृष्ठ, कुलिङ्ग, कबूतर, तोता, चारक, चिरिटा, ककुयष्टिक, सारिका, कलविंक, चटक, अंगारचूड़क ( बुलबुल ), पारावत, पानविक ये सब 'प्रतुद' पक्षी हैं ॥ ५०-५२ ॥ प्रसह्य भक्षयन्तीति प्रसह्यास्तेन संज्ञिताः ॥ ५३ ॥ भूशया बिलवासित्वादानूपाऽनूपसंश्रयात् । जले निवासाज्जलजा जलेचर्याज्जलेचराः ॥ ५४ ॥ स्थलजा जाङ्गलाः प्रोक्ता मृगा जाङ्गलचारिणः । विकीर्य विष्किराश्चैव प्रतुद्य प्रतुदाः स्मृताः ॥ ५५ ॥ योनिरष्टविधा त्वेषां मांसानां परिकीर्तिता । गाय, घोड़ा, बाघ आदि प्राणी भक्ष्य दृष्टि से एकदम जोर से खाने पर गिरते हैं, इसलिये इनको 'प्रसह' कहते हैं । सांप, मेंढक आदि बिल में रहते हैं, इस- लिये इनको 'विलेशय' कहते हैं। हाथी भैंसा आदि प्राणी पानी के आश्रय से रहते हैं, इसलिये इनको 'आनूप' कहते हैं । पानी में रहने से 'जलज', जल में चरने-विचरने से 'जलचर', स्थलभूमि पर चलने वाले जंगल में फिरने वाले पशुओं को 'जांगल' कहते हैं । तीतर आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को बिखेर कर खाते हैं, इसलिये 'विष्किर' और तोता आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को चोंच से तोड़कर खाते हैं इस लिये 'प्रतुद' कहलाते हैं। इस प्रकार से मांस के आठ उत्पत्तिस्थान हैं ॥ ५३-५५ ॥ प्रसह्या भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः ॥ ५६ ॥ गुरूष्ण-स्निग्ध-मधुरा बलोपचयवर्धनाः । वृष्याः परं वातहराः कफपित्ताभिवर्धिनः ॥ ५७ ॥ हिता व्यायामनित्येभ्यो नरा दीप्ताग्नयश्च ये । प्रसह्यानां विशेषेण मांसं मांसाशिनां भिषक ॥ ५८ ॥ जीर्णार्शो-ग्रहणी-दोष-शोषार्तानां प्रयोजयेत् । लावाद्यो वैष्किरो वर्गः प्रतुदा जाङ्गला मृगाः ॥ ५६ ॥ लघवः शीतमधुराः सकषाया हिता नृणाम् । पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे ॥ ६० ॥ विष्किरा वर्तकाद्यास्तु प्रसह्याल्पान्तरा गुणैः । नातिशीतं गुरु-स्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६१ ॥ शरीर-धातु-सामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् । ग्राही मधुरशीतत्त्वाद् गुरु बृंहणमाविकम् ॥ ६२ ॥ तौ ह्यजाविके मिश्रगोचरत्वादनिश्छिते ।

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३३२ चरकसंहिता [ अ० २७ सामान्येनोपदिष्टानां मांसानां स्वगुणैः पृथक् ॥ ६३ ॥ केषांचिद् गुणवैशेष्याद्विशेष उपदेक्ष्यते । दर्शन-श्रोत्र-मेधाग्नि-वयो-वर्ण-स्वरायुषाम् ॥ ६४ ॥ बर्ही हिततमो बल्यो वातघ्नो मांसशुक्रलः । गुरूष्ण-स्निग्ध-मधुराः स्वर-वर्ण-बल-प्रदाः ॥ ६५ ॥ बृंहणाः शुक्रलाश्चोक्ता हंसा मारुतनाशनाः । स्निग्धाश्चोष्णाश्च वृष्या श्च बृंहणाः स्वरबोधनाः ॥ ६६ ॥ बल्याः परं वातह्राः स्वेदनाश्चरणायुधाः । गुरूष्णमधुरो नातिधन्वानूपनिषेवणात् ॥ ६७ ॥ तित्तिरिः संजयेच्छीघ्रं त्रीन् दोषाननिलोल्बणान् । पित्तश्लेष्मविकारेषु सरक्तेषु कपिञ्जलाः ॥ ६८ ॥ मन्दवातेषु शस्यन्ते शैत्य-माधुर्य-लाघवात् । लावाः कषायमधुरा लघवोऽग्निविवर्धनाः ॥ ६६ ॥ सन्निपातप्रशमनाः कटुकाश्च विपाकतः । कषायमधुराः शीता रक्तपित्तनिबर्हणाः ॥ ७० ॥ विपाके मधुराश्चैव कपोता गृहवासिनः । तेभ्यो लघुतराः किंचित्कपोता वनवासिनः ॥ ७१ ॥ शीताः संग्राहिणश्चैव स्वल्पमूत्रकराश्च ते । शुकमांसं कषायाम्लं विपाके रूक्षशीतलम् ॥ ७२ ॥ शोष-कास-क्षय-हितं संग्राहि लघु दीपनम् । कषायो विशदो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः ॥ ७३ ॥ शशः स्वादुः प्रशस्तश्च संनिपातेऽनिलावरे । चटका मधुराः स्निग्धा बलशुक्रविवर्धनाः ॥ ७४ ॥ सन्निपातप्रशमनाः शमना मारुतस्य च । मधुरार्मधुराः पाके त्रिदोषशमनाः शिवाः ॥ ७५ ॥ लघवो बद्धविण्मूत्राः शीताश्चैणाः प्रकीर्तिताः । गोधा विपाके मधुरा कषायकटुका रसे ॥ ७६ ॥ वात-पित्त-प्रशमनी बृंहणी बलवर्धनी । शल्लको मधुराम्लश्च विपाके कटुकः स्मृतः ॥ ७७ ॥ वात-पित्त-कफघ्नश्च कास-श्वास-हरस्तथा । गुरूष्णमधुरा बल्या बृंहणा पवनापहाः ॥ ७८ ॥

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३३

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३३ मत्स्याः स्निग्धाश्च वृष्याश्च बहुदोषाः प्रकीर्तिताः । शैवलाहारभोजित्वात्स्वप्नस्य च विवर्जनात् ॥ ७९ ॥ रोहितो दीपनोयश्च लघुपाको महाबलः । स्नेहनं बृंहणं वृष्यं श्रमघ्नमनिलापहम् ॥ ८० ॥ वराहपिशितं बल्यं रोचनं स्वेदनं गुरु । बल्यो वातहरो वृष्यश्चक्षुष्यो बलवर्धनः ॥ ८१ ॥ मेधास्मृतिकरः पथ्यः शोषघ्नः कूर्म उच्यते । गव्यं केवलवातेषु पीनसे विषमज्वरे ॥ ८२ ॥ शुष्क-कास-श्रमात्यग्नि-मांस-क्षय-हितं च तत् । स्निग्धोष्णमधुरं वृष्यं माहिषं गुरु तर्पणम् ¹ ॥ ८३ ॥ दार्थं बृहत्त्वमुत्साहं स्वप्नं च जनयत्यपि । धार्तराष्ट्रचकोराणां दक्षाणां शिखिनामपि ॥ ८४ ॥ चटकानां च यानि स्युरण्डानि च हितानि च । रेतःक्षीणेपु कासेषु हृद्रोगेषु क्षतेषु च ॥ ८५ ॥ मधुराण्यविदाहीनि ² सद्यो बलकराणि च । शरीरबृंहणे नान्यद्दाद्यं ³ मांसाद्विशिष्यते । इति वर्गस्तृतीयोऽयं मांसानां परिकीर्तितः ॥ ८६ ॥ इनमें प्रसह, भूशय, आनूप, जलज और जलचर प्राणियों का मांस गुरु, स्निग्ध, मधुर, शक्ति बढ़ाने वाला, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक, कफपित्त को बढ़ाने वाला है, इनका मांस नित्य प्रति व्यायाम करने वाले, जिनकी जाठराग्नि प्रदीप्त हो, उनके लिये हितकारी है। 'प्रसह' जानवर दो प्रकार के हैं। एक मांस खाने वाले सिंह आदि, दूसरे मांस न खाने वाले गाय आदि। इनमें मांस खाने वाले 'प्रसह' पक्षी या पशुओं का मांस पुराने अर्श-रोग, ग्रहणी-रोग, क्षय, या निर्बल पुरुष के लिये उपकारी है। लावा (बटेर) आदि विष्किरवर्ग के पक्षी, प्रतुदपक्षी, जांगलदेश के पशु इनका मांस लघु, शीतल, मधुर कषाय रस, और पित्तप्रधान, मध्यम वात, कनिष्ठ कफ वाले सन्निपात में हितकारी है। बटेर आदि समस्त विष्किर पक्षियों का मांस 'प्रसह' श्रेणो के मांसों से गुणों में मिलता है, थोड़ा ही अन्तर है। बकरी का मांस बहुत ठण्डा नहीं, बहुत भारी नहीं, बहुत स्निग्ध नहीं, कुछ ठण्डा, कुछ गुरु और कुछ स्निग्ध है) इसलिये वह दोषों को कुपित १. ... पाठः । २. मधुराण्यविपाकीनि इति पाठः । ३. खाद्यं इति पाठः ।

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३३४ चरकसंहिता [ अ० २७ नहीं करता, कफ को उत्पन्न नहीं करता । उक्त गुणों के कारण मनुष्यों के मांस के समान धातुओं वाला है, जो गुण मनुष्य के धातुओं के हैं, वे ही गुण बकरी के मांस के हैं इसलिये पुष्टिकारक है । मेढ़ का मांस मधुर, ठण्डा और भारी है । मधुर और शीतल होने से पित्तनाशक१ है । बकरी और मेढ़ के मिश्रित२ स्थान में चरने से मांस का गुण अनिश्चित है, फिर भी सामान्य रूप से कह दिया । और जो मांस अपने गुणों में विशेषता रखते हैं उन को कहते हैं । मोर का मांस—आंख, कान, मेधा, अग्नि, तारुण्य, वर्ण, स्वर और आयु के लिये हितकारी; बलकारक, वायुनाशक और मांस एवं शुक्रवर्धक है । हंस का मांस गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर, स्वर, वर्ण, बल को बढ़ाने वाला, बृंहण पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक और वातनाशक है । कुक्कुट का मांस—स्निग्ध, उष्ण, वृष्य, पुष्टिकारक, स्वर को अच्छा करने वाला, बलकारक और विशेषतः वात- नाशक तथा पसीना लाता है । तित्तिर पक्षी का ( मरुभूमि और आनूप देश दोनों स्थानों में रहने से ) मांस मध्यम गुरु, मध्यम उष्ण और मध्यम मधुर है, वातप्रधान सन्निपात को शीघ्र शान्त करता है । कपिंजल पक्षी का मांस—ठण्डा, मधुर और लघु होने से वात का जोर कम होने पर रक्तयुक्त पित्त या रक्तयुक्त कफ विकार में प्रशस्त है । लावा ( बटेर ), कषाय, मधुर, लघु, अग्निवर्धक, सन्निपात को शमन करने वाले और विपाक में कटु हैं । घर में पाले हुए कबूतरों का मांस—कषाय, विशद, शीत, रक्तपित्तनाशक, मधुर विपाक वाला होता है । और जो कबूतर जंगल में रहते हैं, उन का मांस इन से कुछ हल्का और शीतल, संग्राही और मूत्र को कम करने वाला होता है। तोते का मांस—कषाय, विपाक में अम्ल, रूक्ष, ठण्डा, शोष, क्षय, दमा, में हितकारी, स्तम्भक, हल्का, दीपक होता है । खरगोश का मांस—कषाय, स्वच्छ, रूक्ष, शीतल, विपाक में कटु, हल्का, मधुर और हीनवायु सन्निपात में प्रशस्त है । चिड़िया का मांस—मधुर, स्निग्ध, शक्ति व वीर्य को बढ़ाने वाला, सन्नि- १. सुश्रुत में भी कहा है— "बृंहणं मांसमौरभ्रं पित्तश्लेष्मापहं गुरु" ॥ २. मिश्र-गोचरत्वात्—बकरी या मेढ़ आनूप और मरु दोनों प्रदेशों में रहती है । इसलिये इन की योनि निश्चित नहीं है । तित्तिर पक्षी धन्व और आनूप किसी एक स्थान पर रहता है, ऐसा निश्चित करके कहा जा सकता है, इसलिये वह इस श्रेणी में नहीं है ।

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३५

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३५ पात को शान्त करने वाला और विशेषतः वायुनाशक है' । शिवा ( गीदड़ ) का मांस—मधुर रस, मधुर विपाक, त्रिदोषनाशक है । काले हरिण का मांस—हल्का, मल मूत्र को रोकने वाला और शीतल होता है। गोह का मांस—विपाक में मधुर, कषाय, कटु रस, वात-पित्तनाशक, पुष्टिकारक, बल- वर्धक है। शल्लकी का मांस—मधुर अम्लरस, विपाक में कटु, त्रिदोषनाशक, श्वास-कास नाशक है। मछलियों का मांस—गुरु, उष्ण, मधुर, बलकारक, पुष्टिकारक, वायुनाशक, स्निग्ध, वृष्य, वीर्यवर्धक और बहुत से दोषों को उत्पन्न करने वाला है। रोहू मछली का मांस—शैवाल ( सरवाल ) का भोजन करने से, कभी न सोने से, दीपनीय, अग्निवर्धक, पचने में लघु और बहुत बल देने वाला है। सूअर का मांस—स्नेहन, बृंहण, वीर्यवर्धक, थकान और वायुनाशक बलकारक, रुचिकर और बहुत पसीना लाने वाला है। कछुए का मांस—बल- कारक, वातनाशक, वीर्यवर्धक, आंखों के लिये हितकारी, बलवर्धक, मेधा, बुद्धि और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, आयु के लिये हितकारी, शोषनाशक है। गाय का मांस—केवल वात रोगों में, पीनस में, विषम ज्वर में, सूखी खांसीमें, थकान में, अग्नि या मांस के बहुत अधिक क्षय हो जाने में हितकारी है। भैंस का मांस—स्निग्ध, उष्ण, मधुर, वीर्यवर्धक, भारी, पुष्टिदायक, शरीर में दृढ़ता, पुष्टि, उत्साहवर्धक और नींद लाने वाला है। हंस ( जिन के पांव और चोंच काले होते हैं ) चकोर, बत्तख, मोर और चिड़ियां इनके अण्डे वीर्य की क्षीणता में, कास रोग में, हृदय रोग में, क्षत (उरःक्षत) में हितकारी हैं। ये अण्डे मधुर अविपाकी और तत्काल बलदायक हैं। खाद्य पदार्थ में शरीर को पुष्ट करने के लिये मांस से बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। यह तीसरा मांस- वर्ग कह दिया ॥ ५६-८६॥ इति मांसवर्गः । अथ शाकवर्गः । पाठा शुषा शटीशाकं वास्तुकं सुनिषण्णकम् । विद्याद् ग्राहि त्रिदोषघ्नं भिन्नवर्चस्तु वास्तुकम् ॥ ८७ ॥ त्रिदोषशमनी वृष्या काकमाची रसायनी । नात्युष्णशीतवीर्या च भेदिनी कुष्ठनाशनी ॥ ८८ ॥ राजक्षवकशाकं तु त्रिदोषशमनं लघु ॥ वृष्य के लिये—"तृप्तिं चटकमांसानां गत्वा योऽनु पिबेत्पयः ।"

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ग्राहि शस्तं विशेषेण ग्रहण्यर्शोविकारिणाम् ॥ ८९ ॥ कालशाकं तु कटुकं दीपनं गरशोफजित् । लघूष्णं वातलं रूक्षं कालीयं शाकमुच्यते ॥ ९० ॥ दीपनी चोष्णवीर्या च ग्राहिणी कफमारुते । प्रशस्यतेऽम्लचाङ्गेरी ग्रहण्यर्शोहिता च सा ॥ ९१ ॥ मधुरा मधुरा पाके भेदिनी श्लेष्मवर्धिनी । वृष्या स्निग्धा च शीता च मदघ्नी चाप्युपोदिका ॥ ९२ ॥ रूक्षो महाविषघ्नश्च प्रशस्तो रक्तपित्तिनाम् । मधुरोऽमधुरः पाके शीतलस्तण्डुलीयकः ॥ ९३ ॥ मण्डूकपर्णी वेत्राग्रं कुचेला वनतिक्तकम् । कर्कोटकावल्गुजकौ पटोलं शकुलादनी ॥ ९४ ॥ वृषपुष्पाणि शार्ङ्गेष्टा केबूकं सकठिल्लकम् । नाडीं कलायं गोजिह्वा वार्त्ताकं तिलपर्णिका ॥ ९५ ॥ कुलकं कर्कशं निम्बं शाकं पार्पटकं च यत् । कफपित्तहरं तिक्तं शीतं कटु विपच्यते ॥ ९६ ॥ सर्वाणि सूप्यशाकानि फञ्जी चिल्ली कुतुम्बकः । आलुकानि च सर्वाणि सपत्राणि कुटिञ्जरम् ॥ ९७ ॥ शणशाल्मलिपुष्पाणि कर्बुदारः सुवर्चला । निष्पावः कोविदारश्च पत्तूरश्चुचुपर्णिका ॥ ६७ ॥ कुमारजीवो लोट्टाकः पालङ्क्या मारिषस्तथा । कलम्बनालिकासूयः कुसुम्ववृकधूमकौ ॥ ९९ ॥ लक्ष्मणा प्रपुन्नाडं च नलिनीका कुठेरकः । लोणिका यवशाकं च कुष्माण्डकमवल्गुजम् ॥ १०० ॥ यातुकः शालकल्याणी त्रिपर्णी पीलुपर्णिका । शाकं गुरु च रूक्षं च प्रायो विष्टभ्य जीर्यति ॥ १०१ ॥ मधुरं शीतवीर्यं च पुरीषस्य च भेदनम् । स्विन्नं निष्पीडितरसं स्नेहाढ्यं तत्प्रशस्यते ॥ १०२ ॥ शणस्य कोविदारस्य कर्बुदारस्य शाल्मलेः । पुष्पं ग्राहि प्रशस्तं च रक्तपित्ते विशेषतः ॥ १०३ ॥ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थ-प्लक्ष-पद्मादि-पल्लवाः । कषायाः स्तम्भनाः शीता हिताः पित्तातिसारिणाम् ॥

अ० २७ ] २२ सूत्रस्थानम् ३३७

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अ० २७ ] २२ सूत्रस्थानम् ३३७

वायुं वत्सादिनी हन्यात्कफं गण्डीरचित्रकौ ।
श्रेयसी बिल्वपर्णी च बिल्वपत्रं च वातनुत् ॥ १०५ ॥
भण्डी शतावरीशाकं बलो जीवन्तिकं च यत् ।
पर्वण्याः पर्वपुष्प्याश्च वातपित्तहरं स्मृतम् ॥ १०६ ॥
लघुभिन्नशकृत्तिक्तं लाङ्गलक्युरुबूकयोः ।
तिलवेत्रसशाकं च शाकं पञ्चाङ्गुलस्य च ॥ १०७ ॥
वातलं कटुतिक्ताम्लमधोमार्गप्रवर्तकम् ।
रूक्षाम्लमुष्णं कौसुम्भं कफघ्नं पित्तवर्धनम् ॥ १०८ ॥
त्रपुसैर्वारुकेस्वादु-गुरु-विष्टम्भि-शीतले ।
मुखप्रियं च रूक्षं च मूत्रलं त्रपुसं त्वति ॥ १०९ ॥
एर्वारुकं च संपक्वं दाह-तृष्णा-क्लमाति-नुत् ।
वर्चोभेदीन्यलाबूनि रूक्षशीतगुरूणि च ॥ ११० ॥
चिर्भट्यैर्वारुके तद्वद्वर्चोभेदहिते तु ते ।
कूष्माण्डमुक्तं सक्षारं मधुराम्लं तथा लघु ॥ १११ ॥
सृष्टमूत्रपुरीषं च सर्वदोषनिबर्हणम् ।
केलुटं च कदम्बं च नदीमाषकमैन्दुकम् ॥ ११२ ॥
विशदं गुरु शीतं च समभिष्यन्दि चोच्यते ।
उत्पलानि कषायाणि रक्तपित्तहराणि च ॥ ११३ ॥
तथा तालप्रलम्बं च उरःक्षतरुजापहम् ।
खर्जूरं तालशस्यं च रक्तपित्तक्षयापहम् ॥ ११४ ॥
तरूट-बिस-शालूक-क्रौञ्चादन-कशेरुकम् ।
शृङ्गाटमङ्कलोड्यं च गुरु विष्टम्भि शीतलम् ॥ ११५ ॥
कुमुदोत्पलनालास्तु सपुष्पाः सफलाः स्मृताः ।
शीताः स्वादुकषायास्तु कफमारुतकोपर्नाः ॥ ११६ ॥
कषायमीषद्दिष्टम्भि रक्तपित्तहरं स्मृतम् ।
पौष्करं तु भवेद् बीजं मधुरं रसपाकयोः ॥ ११७ ॥
बल्यः शीतो गुरुः स्निग्धस्तर्पणो बृंहणात्मकः ।
वातपित्तहरः स्वादुर्वृष्यो युञ्जातकः स्मृतः ॥ ११८ ॥
जीवनो बृंहणो वृष्यः कण्ठ्यः शस्तो रसायने ।
विदारिकन्दो बल्यश्च मूत्रलः स्वादुशीतलः ॥ ११९ ॥
अम्लिकायाः स्मृतः कन्दो ग्रहण्यर्शोहितो लघुः ।
उष्णः कफवातघ्नो ग्राही शस्तो मदात्यये ॥ १२० ॥
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३३८ चरकसंहिता [ अ० २७

त्रिदोषं बद्धविण्मूत्रं सार्षपं शाकमुच्यते ।
तद्वत्पिण्डालुकं विद्यात्कन्दत्वाच्च मुखप्रियम् ॥ १२१ ॥
सर्पच्छत्राफणश्याँस्तु बह्वयोऽन्याश्छत्रजातयः ।
शीताः पीनसकर्त्र्यश्च मधुरा गुर्व्य एव च ॥ १२२ ॥
चतुर्थः शाकवर्गोऽयं पत्रकन्दफलाश्रयः ।
शाकवर्ग-पाठा, शुषा ( सुशवी, ), कचूर, वास्तुक ( बथुआ ), सुनिषण्णक
( मेथी ) ये सब शाक ( भाजी ) ग्राहक, त्रिदोषनाशक हैं, परन्तु बथुआ की
भाजी ज़रा रेचक है । काकमाची ( मकोय ) की भाजी तीनों दोषों को नाश
करने वाली, पुष्टिदायक, और रसायन है, यह न तो बहुत गरम और न
बहुत ठण्डी है, मध्यमवीर्य, रेचक और कुष्ठनाशक है १ । राजक्षवक की
भाजी त्रिदोषनाशक, लघु, संग्राही है, ग्रहणी और अर्श रोग में विशेषतः हित-
कारी है । काल नामक शाक—कटु, अग्निदीपक, संयोगजन्य विषनाशक और
शोथनाशक, लघु, उष्ण, वायुकारक और रूक्ष है । खट्टी चांगेरी ( चौपतिया )
की भाजी—अग्निदीपक, उष्णवीर्य, संग्राही, कफ-वायु रोग में उत्तम तथा ग्रहणी
और अर्श रोग में हितकारी है। उपोदिका (चौलाई) मधुर रस मधुर विपाक, रेचक,
श्लेष्मावर्धक, वृष्य; स्निग्ध, शीतल और उन्मादनाशक (धत्तूरे आदि के मद को नष्ट
करनेवाली) है । तण्डुलीयका (चौलाई का भेद) रूक्ष, मद और विषनाशक, रक्तपित्त
रोग में श्रेष्ठ, मधुर रस, मधुर विपाक और शीतल है । मण्डूकपर्णी का शाक,
बेंत का अग्र भाग, कुचेला, वनतिक्ता, कंकोड़ा, अवल्गुजा ( बाबची ), परबल,
शकुनादनी, अडूसे के फूल, शार्ङ्गष्टा केम्बुक, कठिल्लक ( पुनर्नवा ), नाड़ी
( नाड़ीच ), कशाय ( मटर ), गोजिह्वा ( गाज़बां ), वार्त्ताक ( बैंगन ),
तिलपर्णी ( हुलहुल ), कुरुक ( करेला या परबल का भेद ), कर्कश ( अरुण-
दत्त के अनुसार कुचला, चक्रदत्त के अनुसार कर्कोटक ), नीम का शाक,
पित्तपापड़ा इन की भाजी कफ-पित्त नाशक, तिक्त, शीत और कटु विपाक है ।
'सूप्य शाक' ( माषपर्णी, उद्दपर्णी आदि ) फंजी ( ब्राह्मण, यष्टिका, भार्गी ),
चिल्छी २ कुतुम्बाक ( द्रोणपुष्पी, गोमा ), आलुक ( आलु, रतालु, पिण्डालु कन्द
मूल ), इन के पत्ते और कुटिंजर ( जंगली बथुआ ), सन, सिम्बल के फूल,
कर्बुदार ( कचनार ), सुवर्चला ( हुलहुल ), निष्पाव ( पालक ), कोविदार
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१. सुश्रुत में काकमाची को—"तिक्ता काकमाची वातं शमयत्युष्णवीर्य-
त्वात् ।” उष्णवीर्य कहा है ।
२. 'चिल्छी'—'माषपर्ण्या शुनः पुच्छे चिल्छी स्याच्छाकलोप्रयो । - डनि० ।

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३९

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अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३९ ( लाल कचनार ), पत्तुर ( शालिञ्च ), चुचुचपर्णिका ( नाड़ीच का भेद ) उंडुरकानी ( आखुपर्णी ), कुमारजीव ( जीवशाक ), क्रोष्टाक ( क्रोष्टा मारिष ), पालं क्य ( पालक ), मारिष कलम्ब, नालिका, आसुरी ( राई ), कुसुमभ ( धनिया ), वृकधूमक, लक्ष्मणा, प्रपुन्नाड़ ( चक्रमर्द ), नलिनी ( कमल की नाल, भिस ), कुठेरक ( तुलसी भेद ), लोणिका ( लूनी ), यवशाक ( खेत पापड़ा ), कूष्माण्डक ( पेठा ), अवल्गुजा ( बावची ), यातु क ( सफेद शाल- पर्णी ), शालकल्याणी, त्रिपत्री ( हंसपादिका ), पीलुपर्णी ( मोरटक, मोरबेल ), इन की भाजी गुरु, रूक्ष और प्रायः करके जब तक पचती नहीं, तब तक पेट में अफरा करती है, मधुर, शीतवीर्य और मल के रेचक है । इनको पानी में भापकर ( बिना बाहर का पानी मिलाये ) रस निकाल कर इस में घी या तैल मिलाकर खाना उत्तम है । सन, कचनार, लाल कचनार और सिम्बल इनके फूल संग्राही है, इसलिये रक्तपित्त में विशेषतः प्रशस्त हैं । न्यग्रोध ( बड़ ), गूलर, पीपल, पिलखन, कमल आदि के पत्ते कषाय रस, स्तम्भक,शीत तथा पित्तातिसार में हित-कारी हैं । वत्साडनी ( गिलोय ) की भाजी वायु नाशक, गण्डीर ( शमठ, कडुवा जिमीकन्द ) और चीता की भाजी कफनाशक, श्रेयसी ( गज पिप्पली ), बिल्वपर्णी और बेल के पत्तों की भाजी वायुनाशक है । भण्डी ( भिण्डो ), शतावर, बला, खरैटी, जीवन्ती, पर्वरणी ( इन्द्रवारुणी ), पर्वपुष्पी इन की भाजी वातपित्तनाशक है । लांगली (कलिहारी) की, लाल एरण्ड की भाजी तिक्त, रेचक और लघु है । तिक्त अम्ल वेतस ( या बेंत का शाक ), या एरण्ड की भाजी वायुकारक, कटु, तिक्त, अम्ल तथा रेचक है । कुसुमभ की भाजी रूक्ष, अम्ल, उष्ण, कफनाशक, पित्तवर्धक है । त्रपुस ( खीरा ), उर्वारुक ( ककड़ी ), स्वादु गुरु, अवष्टम्भ करने वाली और शीतल है । इनमें खीरा मुखप्रिय ( खाने में स्वादु ), रूक्ष और बहुत मूत्र लाने वाले हैं । पका हुआ उर्वारुक ( ककड़ी), प्यास, जलन थकान की पीड़ा को नष्ट करती है । अलाबूं ( तूंबी, घीया, आल ) मल का रेचक, रूक्ष, शीतल और गुरु है । चिर्भटी ( ककड़ी ), एवों- रुक भी रेचक हैं। पेठा कद्दू-क्षारयुक्त, मधुर, अम्ल, लघु, मल मूत्र का रेचक, त्रिदोषनाशक है १ । १. कच्चे और पक्के कूष्माण्ड के गुणों मे अन्तर है । यथा- “पित्तघ्नं तेषु कूष्माण्डं बालं मध्यं कफावहम् । पक्वं लघूष्णं स क्षारं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ सर्वदोषहरं हृद्यम्-॥”

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[Header] ३४० चरकसंहिता [ अ० २७

केलुट ( केंबुक कन्द शाक ) और कदम्ब नन्दी माषक ( उन्दी मान- वक ), ऐन्द्रक इन की भाजी स्वच्छ, गुरु, शीतल, कफकारक है। नीला कमल कषाय रस और रक्त पित्तनाशक है। ताल प्रलम्ब ( ताड़ का अंकुर ), खर्जूर, तालशस्य ( ताल के सिर की मज्जा ) रक्त-पित्त और क्षयरोगनाशक है। तरूट ( तिरट कन्द ), बिस वा भिस, कमल की दण्डी, लाल कमल का कन्द, कौंचादन ( डूकूर कन्द, कमल ), कशेरू, शृंगाटक (सिंघाड़ा) अंकालोद्य ( ह्रस्व उत्पलकन्द ), गुरु, विष्टम्भि और शीतल हैं। कुमुद ( श्वेत कमल ), उत्पल (नीला कमल ) फूल और फल समेत शीतल, मधुर, कषाय रस, कफ वायु के प्रकोपक हैं। पुष्कर का बीज कषाय रस, थोड़ा विष्टम्भ करने वाला, रक्तपित्तनाशक, मधुर रस और मधुर विपाक है। मुंजातक ( औखरपथिक कन्द ) बलकारक, शीतल, गुरु, स्निग्ध, तृप्तिकारक, बृंहण पुष्टि- कारक, वात-पित्तनाशक, मधुर वृष्य है। विदारीकन्द, जीवनीय, बृंहण, वृष्य, स्वर के लिये हितकारी, रसायन में प्रशस्त, बलकारक, मूत्ररेचक, मधुर और शीतल है। अम्ली कन्द ( आसाम में होता है आंवर जाति का कन्द ) ग्रहणी, अर्श में हितकारी, लघु, बहुत गरम, कफ-वातनाशक, संग्राहि और मदात्यय रोग में प्रशस्त है। सरसों का शाक—त्रिदोषकारक मल-मूत्र का अवरोधक है। पिण्डालु ( रतालु ) भी इसी प्रकार का है, परन्तु कन्द जाति का होने से खाने में अच्छा लगता है। सर्पछत्रक (खुम्बी) को छोड़कर अन्य सब इस प्रकार की भाजियां शीतल, पीनस रोग को उत्पन्न करने वाली, मधुर गुरु होती हैं। इस प्रकार से पत्ते, कन्द और फलवाला शाकवर्ग समाप्त हुआ ॥ ८७-१२२ ॥ इति शाकवर्गः ।

अथ फलवर्गः तृष्णा-दाह-ज्वर-श्वास-रक्त-पित्त-क्षत-क्षयान् । वातपित्तमुदावर्त्तं स्वरभेदं मदात्ययम् ॥ १२३ ॥ तिक्तास्यतामास्यशोषं कासं चाऽऽशु व्यपोहति । मृद्वीका बृंहणं वृष्या मधुरा स्निग्धशीतला ॥ १२४ ॥ मधुरं बृंहणं वृष्यं खर्जूरं गुरु शीतलम् । क्षयेऽभिघाते दाहे च वातपित्ते च तद्धितम् ॥ १२५ ॥ तर्पणं बृंहणं फल्गु गुरु विष्टम्भि शीतलम् । परूषकं मधूकं च वातपित्ते च शस्यते ॥ १२६॥