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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६७ तत्र सर्वैः सारैरुपेतः पुरुषा भवन्त्यतिबलाः परमगौरवयुक्ताक्ले- शसहाः सर्वारम्भेष्वात्मनि जातप्रत्ययाः कल्याणाभिनिवेशिनः स्थिर- समाहितशरीराः सुसमाहितगतयः सानुनाद-स्निग्ध-गम्भीर-महास्वराः सुखैश्वर्यवित्तोपभोगसंमानभाजो मन्दजरसो मन्दविकाराः प्रायस्तु- ल्यगुणविस्तीर्णापत्याश्चिरजीविनश्च भवन्ति ॥ ११२ ॥ [ इनमें सब सारों की विशेषता से बल प्रमाण तीन प्रकार का है। यथा—उत्तम, मध्यम और अधम । ] इनमें जो पुरुष उपरोक्त आठों प्रकार के उत्तम सारों से युक्त होते हैं, वे अति बलवान्, अत्यन्त सुख से युक्त, क्लेश सहने वाले, सब कार्यों में समर्थ होने से प्रयत्नवान्, शुभ कार्यों में मन लगाने वाले, स्थिर और संहत शरीर वाले, सुधीर गतिवाले, प्रतिध्वनि से युक्त स्निग्ध, गम्भीर एव महान् स्वर वाले, सुख-ऐश्वर्य, वित्त, संमान का भोग करने वाले, अल्प जरा वाले, थोड़े रोग वाले, प्रायः अपने ही समान तुल्य गुण वाले, बहुत से चिरंजीवी पुत्रोंवाले होते हैं ॥ ११२ ॥ अतो विपरीतास्त्वसाराः ॥ ११३ ॥ इन उपरोक्त लक्षणों से विपरीत लक्षणों वाले पुरुष सारहीन होते हैं ॥११३॥ मध्यानां मध्यैः सारविशेषैर्गुणविशेषा व्याख्याता भवन्ति इति साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलप्रमाणविशेषज्ञानार्थान्युपदिष्टानि भवन्ति ॥११४॥ प्रवर और अवर के मध्यस्थ सार विशेषों से मध्यमसार के पुरुष होते हैं । इस मध्यम सार से ही इनके गुण समझ लेने चाहियें । इस प्रकार से बल- प्रमाण को विशेष रूप में जानने के लिये इन सारों की व्याख्या कर दी है ॥११४॥ कथं नु शरीरमात्रदर्शनादेव भिषङ् मुह्येदयमुपचितत्वाद् बलवान्, अयमल्पबलः कृशत्वात्, महाबलवानयं महाशरीरत्वात्, अयमल्पशरीर- त्वादल्पबल इति; दृश्यन्ते ह्यल्पशरीराः कृशाश्चैके बलवन्तः, तत्र पिपी- लिकाभारहरणवत्सिद्धिः । अतश्च सारतः परीक्षेतेत्युक्तम् ॥११५॥ वैद्य केवल शरीरमात्र के दर्शन से धोखा भी खा जाता है, भरा पूरा शरीर होने से यह बलवान् है, यह मनुष्य कृश होने से अल्पबलवाला है, इसका शरीर बड़ा है, इससे यह मनुष्य बड़ा भारी बलवान् है। यह अल्प शरीर होने से अल्पबलवाला है इत्यादि । परन्तु देखा जाता है कि अल्प शरीर वाले और पतले दुबले व्यक्ति भी बलवान् होते हैं । जिस प्रकार चिउंटी अपने से तिगुने चौगुने बोझ को भी उठा लेती है, उसी प्रकार पतले व्यक्ति भी सार के कारण बलवान् होते हैं और वे अनेक कार्य कर लेते हैं। इस कारण सार से परीक्षा करनी चाहिये यह कहा है ॥११५॥

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५६८ चरकसंहिता [ अ० ८

संहननतश्चेति—संहननं संघातः संयोजनमित्येकोऽर्थः । तत्र सम-
सुविभक्तास्थि-सुबद्धसंधि-सुनिष्विष्ट-मांस-शोणितं सुसंहतं शरीरमित्युच्यते।
तत्र सुसंहतशरीराः पुरुषा बलवन्तो विपर्ययेणाल्पबलाः, प्रवरावर-
मध्यत्वात् संहननस्य मध्यबला भवन्ति ॥ ११६ ॥
संहनन अर्थात् शरीर की बनावट से भी परीक्षा करनी चाहिये । संहनन,
संघात और संयोजन ये सब शब्द समानार्थक हैं । जिसकी अस्थियां सम-अनुपात
में विभक्त हों, सन्धियां खूब बंधी, मांस और रक्त अच्छी प्रकार से शरीर में
भरा हो, उसको भली प्रकार से संहत शरीरवाला कहते हैं । सुसंहत शरीर वाले
पुरुष बलवान् होते हैं । इसके विपरीत शरीर वाले पुरुष अल्प बल, मध्य शरीर
वाले पुरुष मध्यम बल होते हैं ॥११६॥
प्रमाणतश्चेति—शरीरप्रमाणं पुनर्यथास्वेनाङ्गुलिप्रमाणेनोपदेक्ष्यते
उत्सेधविस्तारायामैर्यथाक्रमम् । तत्र पादौ चत्वारि षट् चतुर्दश
चाङ्गुलानि, जंघे त्वष्टादशाङ्गुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, जानुनी चतुर-
ङ्गुले षोडशाङ्गुलपरिक्षेपे, त्रिंशदङ्गुलपरिक्षेपावष्टादशाङ्गुलावूरू,
षडंगुलदीर्घौ वृषणावष्टांगुलपरिणाहौ, शेफः षडंगुलदीर्घं पञ्चांगुल-
परिणाहं, द्वादशांगुलपरिमितो भगः, षोडशांगुलविस्तारा कटी, दशांगुलं
बस्तिशिरः, दशांगुलविस्तारं द्वादशांगुलमुदरं, दशांगुलविस्तीर्णे द्वादशां-
गुलायामे पार्श्वे, द्वादशांगुलविस्तारं स्तनान्तरं, द्वथंगुलं स्तनपर्यन्तं,
चतुर्विंशत्यंगुलविशालं द्वादशांगुलोत्सेधमुरः, द्वथंगुलं हृदयं, अष्टांगुलौ
स्कन्धौ, षडंगुलावंसौ, षोडशांगुलौ प्रबाहू, पञ्चदशांगुलौ प्रपाणी,
हस्तौ दशांगुलौ, कक्षावष्टांगुलौ, त्रिकं द्वादशांगुलोत्सेधं, अष्टादशांगुलो-
त्सेधं पृष्ठं, चतुरंगुलोत्सेधा द्वाविंशत्यंगुलपरिणाहा शिरोधरा, द्वादशां-
गुलोत्सेधं चतुर्विंशत्यंगुलपरिणाहमाननं, पञ्चांगुलमास्यं, चिबुकोष्ठ-
कर्णाक्षिमध्यनासिकाळलाटं चतुरंगुलं, षोडशांगुलोत्सेधं द्वात्रिंशदंगुल-
परिणाहं शिरः—इति पृथक्त्वेनाङ्गावयवानां मानमुक्तम् । केवलं पुनः
शरीरमंगुलिपर्वाणि चतुरशीतिस्तदायामविस्तारसमं समुच्यते। तत्राऽऽ-
युर्बलमोजःसुखमैश्वर्यं वित्तमिष्टाश्चापरे भावा भवन्त्यायत्ताः प्रमाण-
वति शरीरे, विपर्ययस्त्वतो हीनेऽधिके वा ॥ ११७ ॥
प्रमाण द्वारा शरीर की परीक्षा करनी चाहिये । शरीर का प्रमाण प्रत्येक
व्यक्ति को अपनी अंगुलियों से माप कर जानना चाहिये । उत्सेध ( ऊंचाई ),
विस्तार ( व्याध, चौड़ाई ), आयाम लम्बाई ये क्रमानुसार कहेंगे । इनमें-पांव
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की ऊंचाई ४, चौड़ाई ६ और लम्बाई चौदह अंगुल हो। टांगें (घुटने से नीचे टखने तक का भाग) लम्बाई में अठारह अंगुल, घेर में १६ अंगुल, घुटने लम्बाई में ४ अंगुल और घेर में १६ अंगुल, जांघें घेर में ३० अंगुल, लम्बाई में १८ अंगुल, वृषण ६ अंगुल लम्बे और गोलाई में आठ अंगुल, शिश्न (लिंग) छ अंगुल लम्बा और गोलाई में पांच अंगुल (सुश्रुत में चार अंगुल), भग (स्त्रीगुह्यांग) १२ अंगुल, कटी १६ अंगुल चौड़ी, बस्ति का शिर (मेढू की जड़ से नाभि प्रदेश तक पेडू) १० अंगुल लम्बा, नाभि से ऊपर और छाती से नीचे लम्बाई में पेट १२ अंगुल लम्बा और १० अंगुल चौड़ा, पार्श्व (दोनो पार्श्व) १० अंगुल चौड़े और १२ अंगुल लम्बे, स्तनों के बीच का अन्तर १२ अंगुल चौड़ा, स्तनप्रान्त दो अंगुल छाती १२ अंगुल ऊंची, २४ अंगुल चौड़ी, (सुश्रुत में १८ अंगुल चौड़ी छाती कही है, यह स्त्री की समझनी चाहिये), हृदय दो अंगुल, स्कन्ध ८ अंगुल, भुजःसंधि (अंस) ६ अंगुल, प्रबाहू (कंधे से नीचे कोहनी तक का भाग) १६ अंगुल, प्रपाणि (कलाई से कोहनी तक का भाग, प्रकोण्ठ) १५ अंगुल, हाथ १० अंगुल, (उसमें भी मध्यम अंगुलि ५ अंगुल, प्रदेशिनी और अनामिका ४।। अंगुल, कनिष्ठा और अंगुष्ठ ३।। अंगुल), दोनो कक्षा ८ अंगुल, त्रिक १२ अंगुल ऊंचा, पीठ १८ अंगुल ऊंची, ग्रीवा ४ अंगुल ऊंची और घेरा २४ अंगुल, मुख (मस्तक से ठोड़ी तक) १२ अंगुल और २४ अंगुल घेर वाला, खुला मुख ५ अंगुल, चिबुक, (दाढ़ी) कान, ओष्ठ, आंखों के बीच का मध्य भाग, नासिका और ललाट ये प्रत्येक चार अंगुल, शिर १६ अंगुल लम्बा, ऊंचा और ३२ अंगुल घेर वाला होता है। इस प्रकार से पृथक् पृथक् अंगों का माप कह दिया है। सम्पूर्ण शरीर पांव से आरम्भ करके शिर तक सारा ८४ अंगुल होता है (सुश्रुत में एक सो बीस अंगुल लम्बाई कही है। यह परिमाण पांव की अग्र-अस्थि से लेकर हाथों को ऊंचे उठाये हुए पुरुष का समझना चाहिये।) प्रमाण तीन प्रकार का है, सम, हीन और अधिक। इनमें जो शरीर लम्बाई और विस्तार में उपरोक्त कहे हुए प्रमाण के समान हो वह 'समप्रमाण' समझना चाहिये। इस प्रकार के समप्रमाण वाले शरीर में आयु, बल, ओज, सुख, ऐश्वर्य्य, धन और अन्य शुभ भाव रहते हैं। इस समपरिमाण से हीन वा अधिक में ये गुण (आयु आदि) नहीं रहते ॥ ११७ ॥ सात्म्यतश्चेति—सात्म्यं नाम यद्यत्सातत्येनोपयुज्यमानमुपशेते । तत्र ये घृत-क्षीर-तैल-मांस-रस-सात्म्यास्सर्व-रस-सात्म्याश्च, ते बलवन्तः

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६०० चरकसंहिता [ अ० ८ क्लेशसहाश्चिरजीविनश्च भवन्ति। रूक्षसात्म्याः पुनरेक-रस-सात्म्याश्च ये, ते प्रायेणाल्पबलाश्चाक्लेशसहा अल्पायुषोऽल्पसाधनाश्च। व्यामिश्रसा- त्म्‍यास्तु ये, ते मध्यबलाः सात्म्यनिमित्ततो भवन्ति ॥ ११८ ॥ सात्म्य से परीक्षा करनी चाहिये। जिसके निरन्तर अभ्यास से सुख मिलता है, उसको 'सात्म्य' कहते हैं। इसमें जो पुरुष घी, तैल, दूध, मांस रस का सेवन निरन्तर करते हैं तथा जिनको सब सात्म्य है, वे बलवान्, क्लेश सहने वाले और दीर्घायु होते हैं। जिन पुरुषों को रूक्ष पदार्थ सात्म्य हैं और जो एक ही रस का अभ्यास करते हैं, वे पुरुष प्रायः करके अल्प-बल, थोड़ा कष्ट उठाने वाले, अल्पायु, अल्पक्रिया से गुजारा करने वाले होते हैं। प्रवर और अवर इस मिश्रित सात्म्य वाले पुरुष मध्य सात्म्य के कारण मध्यम बल होते हैं। इसलिये मध्य क्लेश सहन करने वाले, मध्यमायु होते हैं ॥ ११८ ॥ सत्त्वतश्चेति-सत्त्वमुच्यते मनः, तच्छरीरस्य तन्त्रकमात्मसंयो- गात्। तत् त्रिविधं बलभेदेन-प्रवरं मध्यमवरं चेति। अतश्च प्रवर- मध्यावरसत्त्वाश्च भवन्ति पुरुषाः। तत्र प्रवरसत्त्वाः स्वल्पाः, ते सारे- षूपदिष्टाः स्वल्पशरीरा ह्यपि ते निजागन्तुनिमित्तासु महतीष्वपि पीडा- स्वव्यथा दृश्यन्ते, सत्त्वगुणवैशेष्यात्। मध्यसत्त्वास्त्वपरानात्मन्युपनि- धाय संस्तम्भयन्त्यात्मनाऽऽत्मानं परैर्वाऽपि संस्तभ्यन्ते; हीनसत्त्वास्तु नाऽऽत्मना, न च परैः सत्त्वबलं प्रति शक्यन्त उपस्तम्भयितुं, महाशरीरा ह्यपि ते स्वल्पानामपि वेदनानामसहा दृश्यन्ते, संनिहित-भय-शोक-लोभ- मोह-माना रौद्र-भैरव-द्विष्ट-बीभत्स-विकृत-संकथास्वपि च पशुरुषमां- सशोणितानि चावेक्ष्य विषाद-वैवर्ण्य-मूर्च्छान्माद-भ्रम-प्रपतनानामन्यत- ममाप्नुवन्त्यथवा मरणमिति ॥ ११९ ॥ सत्त्व से परीक्षा करनी चाहिये। सत्त्व का अर्थ मन है। यह मन आत्मा के साथ मिलकर इस शरीर को (इन्द्रियों को) प्रेरित करता है। यह सत्त्व- संज्ञा वाला मन बल के भेद से प्रवर मध्य और अवर यह तीन प्रकार का है। इसलिये प्रवर सत्त्व (शुद्ध) मध्यम सत्त्व (राजस) और अवर सत्त्व (तामस) प्रकृति के मनुष्य होते हैं। इनमें प्रवर सत्त्वों का वर्णन 'सत्त्वसार' ओज के वर्णन में (स्मृतिमान् आदि से) कह दिया है। ये प्रवर सत्त्व वाले व्यक्ति छोटे शरीर के होने पर भी शारीरिक एवं आगन्तुज, बड़े रोगों में भी(तीव्र दर्दों में भी) व्यथारहित दीखते हैं, बड़ी पीड़ा को भी कुछ नहीं मानते। इसका कारण सत्त्वगुण की अधिकता है। ये अपने आत्मा से ही अपने को सम्भाल

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०१

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०१ लेते हैं। मध्यम सत्त्व पुरुष तीव्र वेदना को असह्य देख कर वेदना में अपने को अपने आप रोकते हैं, अथवा दूसरे पुरुष इनको सम्भालते हैं। हीन सत्त्व वाले पुरुष स्वयं अपने को सम्भाल नहीं सकते और नहीं दूसरे इनको सम्भाल सकते हैं। ये हीनसत्त्व पुरुष बड़े शरीर वाले होकर भी थोड़ी सी पीड़ा को भी सहन नहीं कर सकते। ये पुरुष भय, शोक, लोभ, मोह, आभान, रौद्र, भैरव, द्विष्ट, बीभत्स और विकृत कथाओं में, और पशु-मनुष्य के मांस-रक्त आदि को देख कर विषाद , विवर्ण, मूर्च्छा, उन्माद, भ्रम, पतन इनमें से किसी एक के वश हो जाते हैं, अथवा मर जाते हैं ॥११६॥ आहारशक्तिश्चेति—आहारशक्तिरभ्यवहरणशक्त्या जरणशक्त्या च परीक्ष्या, बलायुषी ह्याहारायत्ते ॥ १२० ॥ आहार शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये—आहार शक्ति की परीक्षा भोजन करने और उसको पचा लेने की शक्ति से करनी चाहिये। क्योंकि बल और आयु आहर के ही अधीन हैं ॥१२०॥ व्यायामशक्तिश्चेति—व्यायामशक्तिरपि कर्मशक्त्या परीक्ष्या कर्मशक्त्या ह्यनुमीयते बलत्रैविध्यम् ॥ १२१ ॥ व्यायाम शक्ति से परीक्षा करनी चाहिये—व्यायाम शक्ति की परीक्षा शरीर में परिश्रम उत्पन्न करने वाले कर्म से करनी चाहिये। कर्म शक्ति से तीनों प्रकार का प्रवर, मध्यम और अवर बल जाना जाता है ॥१२१॥ वयस्तश्चेति, कालप्रमाणविशेषापेक्षिणी हि शरीरावस्था वयोऽभि- धीयते । तद्वयो यथास्थूलभेदेन त्रिविधं—बालं मध्यं जीर्णमिति। तत्र बालमपरिपक्वधातुमाजातव्यञ्जनं सुकुमारमक्लेशसहमसंपूर्णबलं श्लेष्म- धातुप्रायमाषोडशवर्षं, विवर्धमानधातुगुणं पुनः प्रायेणानवस्थितसत्त्व- मात्रिंशद्वर्षमुपदिष्टं,मध्यं पुनः समत्वागत-बल-वीर्य-पौरुष-पराक्रम-ग्रहण- धारण-स्मरण-वचन-विज्ञान-सर्वधातु-गुणं बल-स्थितमवस्थितसत्त्वम- विशीर्यमाण-धातु-गुणं पित्त-धातु-प्रायमाषष्टिवर्षमुपदिष्टं अतः परं परि- हीयमानधात्विन्द्रिय-बल-वीर्य-पौरुष-पराक्रम-ग्रहण-धारणस्मरण-वचन- विज्ञानं भ्रश्यमानधातुगुणं वातधातुप्रायं क्रमेण जीर्णमुच्यते आब- र्षशतं, वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन्काले । सन्ति पुनरधिको- नवर्षशतजीविनो मनुष्याः। तेषां विकृतिवर्जैः प्रकृत्यादिबलविशेषै- रायुषो लक्षणतश्च प्रमाणमुपलक्ष्य वयसस्त्रित्वं विभजेत् ॥ १२२ ॥ आयु से परीक्षा करनी चाहिये—विशेष कालपरिमाण की अपेक्षा से शरीर

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की अवस्था का नाम 'वय' कहा जाता है। यह वय अवस्था भेद से तीन प्रकार का है। ( १ ) बाल, ( २ ) मध्य और ( ३ ) जीर्ण, इनमें बाल वय तीस वर्ष तक है। इसमें भी १६ वर्ष तक रस, रक आदि धातु अपरिपक्व रहते हैं, दाढ़ी- मूंछ आदि लक्षण स्पष्ट नहीं होते, शरीर सुकुमार, क्लेश न सहने वाला, असम्पूर्ण बल वाला होता है। इस अवस्था में कफ धातु अधिक होता है। प्रायः करके मन अस्थिर, धातु लगातार बढ़ रहे होते हैं। मध्यम वय—तीस से ऊपर और ६० से नीचे तक की आयु है। बल, वीर्य, विक्रम, पौरुष, पराक्रम, अर्थ का ग्रहण, शब्द आदि का धारण, स्मरण, वचन, विज्ञान, तथा सब धातुओं के गुण, समान अवस्था में पहुंचे होते हैं। इस समय बल स्थिर रहता है मन निश्चल हो जाता है, धातुओं के गुण नष्ट नहीं होते, पित्त प्रधान रहता है। जीर्ण वय—६० वर्ष से ऊपर और १०० वर्ष के बीच के समय को जीर्ण वय कहते हैं। इस समय में धातु, इन्द्रिय, बल, वीर्य, पौरुष, पराक्रम, ग्रहण, धारण, स्मरण, वचन, विज्ञान एवं धातुओं के गुण क्रमशः क्षीण होरहे होते हैं। शरीर में वायु की प्रधानता रहती है। इसलिये इस अवस्था को जीर्ण-अवस्था कहते हैं। इस काल में सौ वर्ष से अधिक या कम जीने वाले पुरुष भी हैं। इन पुरुषों में विकृति को छोड़ कर अन्य प्रकृति आदि बल विशेष से तथा इन्द्रिय स्थान में और शरीर स्थान में कहे हुए लक्षणों से आयु का प्रमाण जान कर आयु के तीन विभाग* करने चाहियें ॥१२२॥ एवं प्रकृत्यादीनां विकृतिवर्ज्यानां भावानां प्रवरमध्यावरविभागेन बलविशेषं विभजेत्। विकृतिबलत्रैविध्येन तु दोषबलं त्रिविधमनु- मीयते। ततो भेषजस्य तीक्ष्णमृदुमध्यविभागेन त्रित्वं विभज्य यथा- दोषं भेषज्यमवचारयेदिति ॥ १२३ ॥ इस प्रकार से विकृति को छोड़ कर प्रकृति से आरम्भ करके वय के अन्त तक कहे हुए गुणों से प्रवर, अवर और मध्य विभाग करके इसके अनुसार रोग के बल का प्रवर, अवर और मध्य विभाग करना चाहिये। विकृति बल के भी तीन विभाग करके उनसे दोषों के तीन प्रकार के बलों का अनुमान किया ☸ सुश्रुत ने आयु का विभाग दोषों के संचय काल की दृष्टि से किया है। चरक में धातुओं की वृद्धि, साम्य और क्षय की दृष्टि से किया है, यह ध्यान रखना चाहिये।

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०३

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०३ जाता है। इसके अनन्तर औषध का भी तीक्ष्ण, मृदु और मध्य रूप से विभाग करके दोष एवं बल के औषध का प्रवर, मध्य और अवर रूप से प्रयोग करे ॥ १२३ ॥ आयुषः प्रमाणज्ञानेहेतोः पुनरिन्द्रियेषु जातिसूत्रीये च लक्षणान्यु- पदेक्ष्यन्ते ॥ १२४ ॥ आयु के प्रमाण को जानने के लिये लक्षण इन्द्रियस्थान में तथा शारीर स्थान के जातिसूत्रीय अध्याय में कहेंगे ॥ १२४ ॥ कालः पुनः संवत्सरश्चाऽऽतुरावस्था च । तत्र संवत्सरो द्विधा त्रिधा षोढा द्वादशधा भूयश्चाप्यतः प्रविभज्यते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्य । तं तु खलु तावत्षोढा प्रविभज्य कार्यमुपदेक्ष्यते—हेमन्तो ग्रीष्मो वर्षाश्चेति शीतोष्णवर्षलक्षणास्त्रय ऋतवो भवन्ति । तेषामन्तरेष्वितरे साधारण- लक्षणास्त्रय ऋतवः प्रावृट्शरद्वसन्ता इति । प्रावृडिति प्रथमः प्रवृष्टेः कालः, तस्यानुबन्धो हि वर्षाः । एवमेते संशोधनमधिकृत्य षड् विभ- ज्यन्ते ऋतवः ॥ १२५ ॥ काल—संवत्सर और रोगी की अवस्था का नाम 'काल' है। इनमें संवत्सर अयन भेद से दो प्रकार का; शीत, उष्ण, वर्षा भेद से तीन प्रकार का, ऋतु विभाग से छः प्रकार का, मास भेद से बारह प्रकार का, पक्ष भेद से चौबीस प्रकार का, और दिन, प्रहरादि के भेद से अनेक प्रकार का है। कार्य की दृष्टि से इसका विभाग किया जाता है। यहां पर वर्ष का ऋतु विभाग से छः प्रकार का विभाग करके इसके कार्य को कहेंगे। हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा रूप से शीत, उष्ण और बरसात के लक्षणों वाली मुख्यतः तीन ऋतुओं के बीच में भी दूसरी साधारण लक्षणों वाली तीन ऋतुएं होती हैं। यथा—प्रावृट्, शरद् और वसन्त अर्थात् प्रवृष्टि इसका प्रथम प्रारम्भ काल होना 'प्रावृट्' है। इसका पिछला भाग वर्षा-ऋतु । इस प्रकार से संशोधनाधिकार में हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृट्, वर्षा और शरद् ये ऋतुएँ कह दी हैं ॥ १२५ ॥ तत्र साधारणलक्षणेष्वृतुषु वमनादीनां प्रवृत्तिर्विधीयते, निवृत्ति- रितरेषु । साधारणलक्षणा हि मन्दशीतोष्णवर्षत्वात् सुखतमाश्च भव- न्त्यविकल्पकाश्च शरीरौषधानां, इतरे पुनरत्यर्थशीतोष्णवर्षत्वादु दुःखतमाश्च भवन्ति विकल्पकाश्च शरीरौषधानाम् ॥ १२६ ॥ इनमें साधारण लक्षणों वाले समय में जब न बहुत शीत और न बहुत गरमी हो, जैसे प्रावृट्, शरद् और वसन्त ऋतु में वमन आदि कार्यों के करने

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६०४ चरकसंहिता [अ० ८ का विधान है। अन्य तीन, अधिक शीत, अधिक उष्ण, अधिक वृष्टि, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा इन ऋतुओं में वमनादि कार्य नहीं किये जाते। क्योकि साधा- रण लक्षणों वाली ऋतुएं मन्द शीत, मन्द उष्ण और मन्द वर्षा वाली होने से शरीर के लिये अति सुखकारक एवं ओषधियों का नाश न करने वाली होती हैं। इसलिये उनमें वमन आदि कार्य किये जाते हैं। अन्य तीन (हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा) ऋतुएँ अति शीत, अति गरमी और अति वर्षा वाली होने से शरीर के लिये दुःखदायक और ओषधियों का नाश करने वाली होती हैं। इसलिये इन ऋतुओं में वमन आदि उपाय नहीं किये जाते ॥१२६॥ तत्र हेमन्ते ह्यतिमात्रशीतोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्यति- शीतवाताध्मातमतिदारुणीभूतमाबद्धदोषं च, भेषजं पुनः संशोधनार्थ- मुष्णस्वभावं शीतोपहतत्वान्मन्दवीर्यत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमयौगायोपपद्यते, शरीरमपि च वातोपद्रवाय। इनमें से हेमन्त ऋतु में अधिक शीत होने के कारण शरीर को सुख नहीं मिलता। अति शीत और अति वायु से शरीर विक्षुब्ध, अति कठोर और बहुत भारी दोष युक्त एवं अतिस्तम्भ दोष वाला हो जाता है। उष्ण स्वभाव वालो संशोधनकारी औषध भी शीत के अधिक होने से हीनवीर्य रहती है। इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग अयोग अर्थात् अनुचित रहता है। शरीर में भी प्रायः वायु के उपद्रव होने लगते हैं। ग्रीष्मे पुनर्ऋतुशोष्णोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्युष्णवातातपा- ध्मातमतिशिथिलमत्यन्तप्रविलोपदोषं, भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्व- भावमुष्णानुगमनात्तीक्ष्णतरत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधन- मतियोगायोपपद्यते, शरीरमपि पिपासोपद्रवाय। ग्रीष्म ऋतु में गरमी के अधिक होने से शरीर को सुख नहीं मिलता। इसलिये उष्ण वायु और उष्ण धूप से शरीर फूल जाता अति शिथिल तथा गरमी के कारण दोष बहुत अधिक छिपे (घुले) रहते हैं। संशोधन के लिये जो औषध दी जाती है, उसका स्वभाव उष्ण होता है। यह उष्ण स्वभाव की औषध सूर्य की किरणों के योग से अति उष्ण होकर अति तीक्ष्ण हो जाती है। इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग 'अतियोग' हो जाता है। शरीर में भी प्यास के उपद्रव होने लगते हैं। वर्षासु तु मेघजालाववृते गूढार्कचन्द्रतारे धाराकुले वियति भूमौ पङ्क-जल-पटल-संवृतायामत्यर्थोपक्लिन्नशरीरेषु भूतेषु विहतस्वभावेषु च

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०५

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०५ केवलेष्वौषधग्रामेषु तोयतोयदानुगतमारुतसंसर्गाद् गुरुप्रवृत्तीनि वम- नादीनि भवन्ति, गुरुसमुत्थानानि च शरीराणि । तस्माद्वमनादीनां निवृत्तिर्विधीयते वर्षाभागान्तेष्वृतुषु न चेदात्ययिकं कर्म, आत्ययिके पुनः कर्मणि कायमृतुं विकल्प्य कृत्रिमगुणोपधानेन यथर्तुगुणविपरीतेन भैषज्यं संयोग-संस्कार-प्रमाण-विकल्पेनोपपाद्यं प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा ततः प्रयोजयेदुत्तमेन यत्नेनावहितः ॥ १२७ ॥ वर्षा ऋतु में आकाश बादलों से भरा रहता है, सूर्य, चन्द्रमा और तारे छिपे रहते हैं। इस समय आकाश से पानी बरसता है, भूमि कीचड़से भरी होती है। प्राणियों का शरीर अत्यन्त क्लिन्न (आर्द्र) होता है। इसलिये स्वाभाविक गुण घट जाता है। सम्पूर्ण ओषधियों में जल, बादल और इनसे मिली वायु का संसर्ग होने से रस, वीर्य आदि का नाश हो जाता है। इसलिये वमन आदि गुरु कार्यों को ये ओषधियाँ नहीं कर सकती। इस ऋतु में जो रोग शरीर में होते हैं, उनका निदान महान् होता है। इसलिये हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा में वमन आदि कार्यों का निषेध किया जाता है। यदि वमन आदि कार्य करना आवश्यक (अनिवार्य) ही हो तो हेमन्त आदि ऋतुओं में भी ऋतु के विपरीत कृत्रिम ऋतु (हेमन्त में गर्भगृह आदि, ग्रीष्म में धारागृह आदि) बनाकर, भेषज को संयोग संस्कार के अनुसार तीक्ष्ण या मृदु वीर्य करके पूर्ण सावधानी के साथ प्रयोग करे जिससे हेमन्त में अयोग और ग्रीष्म में अतियोग न हो ॥ १२७ ॥ आतुरभावस्थास्वपि तु कार्याकार्यं प्रति कालाकालसंज्ञा । तद्यथा- अस्यामवस्थायामस्य भेषजस्याकालः कालः पुनरन्यस्येति एतदपि हि भवत्यवस्थाविशेषेण, तस्मादातुरभावस्थास्वपि हि कालाकालसंज्ञा । तस्य परीक्षा मुहुर्मुहुरातुरस्य सर्वावस्थाविशेषावेक्षणं यथावद्भेषजप्रयोगार्थं, नह्यतिपतितकालमप्राप्तकालं वा भेषजमुपयुज्यमानं यौगिकं भवति । कालो हि भेषजप्रयोगपर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति ॥ १२८ ॥ रोगी की अवस्था में भी कार्य एवं अकार्य को देखकर काल और अकाल कहा जाता है। जैसे--इस अवस्था में इस औषध का काल नहीं है और इस अन्य औषध का समय है। (यथा-ज्वर के छः दिन बीतने पर औषध देनी चाहिये यह औषध का काल है)। यह औषध देने का समय नहीं है (जैसे नव ज्वर में कषाय का देना अकाल है।) यह भी अवस्था भेद से ऐसा होता है। इसलिये रोगी की अवस्था में भी 'काल-अकाल' होता है। इसकी परीक्षा

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६०६ चरकसंहिता [ अ० ८ रोगी की सब अवस्थाओं को बार-बार देखकर उचित रीति से औषध देने के लिये करनी चाहिये । क्योकि समय के बीतने पर अथवा समय से पूर्व दी हुई औषध फलदायक नहीं होती । उचित काल ही औषध प्रयोग को सफल करता है ॥ १२८ ॥ प्रवृत्तिस्तु प्रतिकर्मसमारम्भः । तस्य लक्षणं-भिषगातुरौषधपरिचा- रकाणां क्रियासमायोगः ॥ १२९ ॥ प्रवृत्ति—चिकित्सा कर्म का प्रारम्भ 'प्रवृत्ति' है। भिषग्, औषध रोगी और परिचारक इन चारों का मिलकर क्रिया आरम्भ करना इसका लक्षण है ॥१२९॥ उपायः पुनभिषगादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् । तस्य लक्षणं—भिषगादीनां यथोक्तगुण-संपद्देश-काल-प्रमाण-सात्म्य-क्रियादि- भिश्च सिद्धिकारणैः सम्यगुपपादितस्यौषधस्यावचारणमिति ॥ १३० ॥ एवमेते दश परीक्ष्यविशेषाः पृथक्पृथक् परीक्ष्यितव्या भवन्ति ॥ उपाय—भिषग्, औषध, रोगी और परिचारक इन चारों का यथोक्त उत्तम गुण वाला होना एवं देश काल की अपेक्षा से इनका एकत्र होना है । खुड्डाक-चतुष्पाद अध्याय में कहे अपने-अपने गुणों से युक्त होकर, देश, काल, प्रमाण, सात्म्य और क्रिया आदि सफलता देने वाले कारणों से विचार कर भली प्रकार दी हुई औषध का प्रयोग ही उपाय का लक्षण है । इस विधि से कारण आदि दस परीक्ष्य विषयों की पृथक् पृथक् परीक्षा करनी चाहिये ॥ १३० ॥ परीक्षायास्तु खलु प्रयोजनं प्रतिपत्तिज्ञानं । प्रतिपत्तिर्नाम—यो विकारो यथा प्रतिपत्तव्यस्तस्य तथाऽनुष्ठानज्ञानम् ॥ १३१ ॥ परीक्षा का प्रयोजन—परीक्षा का प्रयोजन 'प्रतिपत्ति' है अर्थात् जो विकार जिस प्रकार से जानना चाहिये और जिस उपाय से चिकित्सा करना चाहिये, उस रोग की वैसी चिकित्सा का ज्ञान करना 'प्रतिपत्ति' है ॥ १३१ ॥ यत्र तु खलु वमनादीनां प्रवृत्तिर्यत्र च निवृत्तिस्तद् व्यासतः सिद्धि- षूत्तरकालमुपदेक्ष्यते सर्वम् । प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे तु खलु गुरु- लाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदन्यतरनिष्ठायाम् । सन्ति हि व्याधयः शास्त्रेषूत्सर्गापवादैरुपक्रमं प्रति निर्दिष्टाः । तस्माद् गुरुलाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदित्युक्तम् ॥ १३२ ॥ जिन रोगियों को वमन देना चाहिये और जिनको वमन आदि नहीं देना चाहिये, इन सबको पृथक् पृथक् आगे सिद्धिस्यान में कहेंगे ।

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०७

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०७ यदि एक ही पुरुष में वमन आदि कार्यों की प्रवृत्ति (देने) और निवृत्ति (न देने) दोनों कार्यों के लक्षण हों तब रोगों में गुरुता और लघुता भली प्रकार देख कर एक कार्य का निश्चय करना चाहिये, प्रवृत्ति और निवृत्ति के लक्षणों में से जिसके लक्षण गुरु हों वह कार्य करना चाहिये। दूसरे लघु-लक्षणों वाले कार्य को छोड़ देना चाहिये। क्योकि शास्त्रों में ऐसे भी रोग हैं, जिनकी चिकित्सा विधि और निषेध रूप से कही है। शास्त्र में उपक्रम की प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही कही है। इनमें से एक कार्य का निश्चय गुरु, लघु देखकर करना चाहिये ॥१३२॥ यानि तु खलु वमनादिषु भेषज-द्रव्याण्युपयोगं गच्छन्ति तान्यनु- व्याख्यास्यन्ते । तद्यथा- फल-जीमूतकेक्ष्वाकु - धामार्गव-कुटज-कृतवेधन- फलानि, फल-जीमूतकेक्ष्वाकु-धामार्गव-पत्र-पुष्पाणि, आरग्वधवृक्षक- मदन-स्वादुकण्टक-पाठा-पाटला-शाङ्गेष्टामूर्वा-सप्तपर्ण-नक्तमाल-पिचु- मर्द-पटोल-सुषवी - गुडूची-चित्रक-सोमवल्क द्वीपि-शिग्रु-मूल-कषायैश्च, मधुक-मधूक-कोविदार-कर्बुदार-नीप-निचुल-बिम्बी-शणपुष्पी-सदापुष्पी- प्रत्यकपुष्पी-कषायैश्च, एला-हरेणु-प्रियंगु-पृथ्वीका-कुस्तुम्बुरु-तगर-नलद- ह्रीवेर-तालीश-गोपी-कषायैश्च, इक्षुकाण्डद्वयेक्षुवालिका-दर्भ-पोटगलका- लंकृत-कषायैश्च, सुमना-सौमनस्यायनी-हरिद्रा-दारुहरिद्रा-वृश्चीर-पुनर्नवा- महासहा-क्षुद्रसहा-कषायैश्च, शाल्मलि-शाल्मलिक-भद्रपर्ण्यैलापर्ण्युपोदि- कोद्दालक-धन्वन-राजादनोपचित्रा-गोपी-शृङ्गाटिका-कषायैश्च, पिप्पली- पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-सर्षप-फाणित-क्षीर-क्षार-लवणोदकैश्च यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रियाचूर्णावलेह-स्नेह कषाय-मांस- रस-यवागू-यूष-काम्बलिक-क्षीरोपधेयान्मोदकानन्यांश्च योगान् विवि- धाननुविधाय यथा वमनार्हाय दद्याद्विधिवद्वमनमिति कल्पसंग्रहो वमनद्रव्याणाम्। कल्पस्त्वेषां विस्तरेणोत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥ १३३ ॥ वमनोपयोगी द्रव्यः—वमन आदि कार्यों में जो औषध द्रव्य काम में आते हैं उनका वर्णन करते हैं। जैसे-वमन द्रव्य फल (मदन फल) जीमूत (तुरई) इक्ष्वाकु (कड़वी तुरई), धामार्गव (कोषातकी), कुटज (कुड़ा), कृतवेधन (तुरई) इनके फल लेने चाहियें। फल, जीमूत, ईक्ष्वाकु, धामार्गव इनके पत्ते और फूल। अमलतास, कुड़ा मैनफल, विकङ्कत, पाठा, पाटला, गुञ्जा, मूर्वा, सतवन, नाटाकरञ्ज, नीम, परबल, करेला, गिलोय, चीता, खैर, शतावरी, कंटेरी (छोटी), शोभाञ्जन इनकी जड़ों का कषाय बना कर देवे। महुवा,

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६०८ चरकसंहिता [ अ० ८

मुलहठी, सफेद कचनार, लाल कचनार नीम, अम्लवेतस, कन्दूरी, झनझनिया, लाल आक, अपामार्ग इनका कषाय प्रयोग करना चाहिये। बड़ी इलायची, रेणुका (मेथी के बीज), फूल प्रियंगू, छोटी इलायची, धनिया, तगर, जटामांसी, खस, तालीशपत्र, उशीर, नेत्रबाला इनके कषाय का प्रयोग करना चाहिये। गजा, काण्डेक्षु, कुष्ठ, होगल, कसौंदी, तगर इनके कषाय को देवे। चमेली, चमेली की कली, हल्दी, दारूहल्दी, श्वेत पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, माषपर्णी, मूंगपर्णी इनका कषाय देवे । सिम्बल, रोहेड़ा, भादाली, रास्ना, कलम्बी, बहुवार, धामन, क्षीरणी वृक्ष, पृश्नपर्णी, सारिवा, सिंघाड़ा इनका कषाय देवे । पिप्पली, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोंठ, सरखों, फाणित (राब), दूध, क्षार और नमक इनका कषाय देना चाहिये। अथवा इच्छा के अनुसार, दोष दूष्य की अपेक्षा से प्रयोजनानुसार वर्त्ति, चूर्ण, अवलेह, घी, तैल आदि, कषाय, मांस रस, यवागू (लप्सी), यूष, काम्बलिक*, दूध, इनको मिलाकर बनाये लड्डू तथा अन्य खाद्य पदार्थ तैयार करके वमन के योग्य व्यक्ति को वमनविधि से खाने के लिये देना चाहिये। यह वमन द्रव्यों का कल्प संक्षेप में कह दिया है। वमन द्रव्यों के कल्प को पीछे कल्पस्थान में विस्तार से कहेंगे ॥ १३३ ॥ विरेचनद्रव्याणि तु श्यामा-त्रिवृच्चतुरंगुल-तिल्वक-महावृक्ष-सप्तला- शङ्खिनी- दन्ती-द्रवन्तीनां क्षीर-मूल-त्वक्पत्र-पुष्प-फलानि यथायोगं तैस्तैः क्षीर-मूल-त्वक्पत्र-फलैर्बिक्लिप्ताविक्लेपितैरजगन्धाश्वगन्धाऽजशृङ्गी-क्षीरि- णी-नीलिनी-क्लीतक-कषायैश्च, प्रकीर्योदकीर्या-मसूर-विदला-कम्पिल्लक- विडंग-गवाक्षी-कषायैश्च, पीलु-प्रियाल-मृद्वीका-काश्मर्य-परूषक-बदर- दाडिमामलक-हरीतकी-विभीतक-शृङ्गीर-पुनर्नवा-विदारिगन्धादि-कषा- यैश्च, शीधु-सुरा-सौवीरक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-मदिरा-मधु-मधूलक-धा- न्याम्ल-कुवल-बदर-खर्जूर-कर्कन्धुमिश्रश्च दधि-दधिमण्डोदश्विद्भिश्च, गोमहिष्याजावीनां च क्षीर-मूत्रैर्यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्ति- क्रिया-चूर्णासव-लेह-स्नेह-कषाय-मांसरस-यूषकाम्बलिक-यवागू-क्षीरोप- षेयान्मोदकानन्यांश्च भक्ष्यप्रकारान् विविधांश्च योगाननुविधाय यथार्हं विरेचनार्थाय दद्याद्विरेचनमिति कल्पसंग्रहो विरेचनद्रव्याणाम्। कल्प- स्त्वेषां विस्तरेण यथावदुत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥ १३४ ॥

☸ काम्बलिक यूष का लक्षण — ‘पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खडः फलैः । मूलैश्च तिलफल्काम्लप्रायः काम्बलिकः स्मृतः ॥ अष्टांगसंग्रह - सूत्रस्थान ॥

अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ६०६

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अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ६०६ विरेचन द्रव्य—काली निशोथ, सफेद निशोथ, अमलतास, लोध, स्नुही, शिकाकाई, शंखपुष्पी, दन्ती, द्रवन्ती ( मोगलई एरण्ड ) इनके दूध, मूल, त्वचा, पत्ते, पुष्प और फूल ये छः विरेचनाश्रय द्रव्यों को मिला कर अथवा पृथक् पृथक् रूप से प्रयोग करना चाहिये । अजवायन, असगन्ध, मेढ़ाशृङ्गी, दूर्वा, नीलनी, मुलहठी, इन के कषाय कर देवे । प्रकीर्य और उदकीर्य ( दो प्रकार का करंज ), श्यामलत्ता, कपीला, बायविडंग, इंद्रायण इनके कषाय का उपयोग करे। पीलु, पियाल, मुनक्का, गम्भारी, फालसा, बेर, अनारदाना, आंवला, हरड़, बहेड़ा, श्वेत और लाल पुनर्नवा, विदारीगन्धा, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, वृहती और छोटी कटेरी ( ह्रस्वपंचमूल ) इनके कषाय का प्रयोग करना चाहिये । सीधु, सुरा, काञ्जी, तुषोदक ( धान्याम्ल ), मैरेय ( सुरा और आसव को मिलाकर तैयार की सुरा ), मेदक, मदिरा, मधु ( द्राक्षा-सुरा ), मधूलिका, धान्याम्ल, कुवल, बदर और कर्कन्धु ( बेरों के भेद हैं ) और खजूर, दही, दही का मण्ड मस्तु, उदश्वित् ( दही में आधा पानी मिलाकर तैयार की छाछ ), गाय, भैंस, बकरी और भेड़ इनमें से जिसका मूत्र या दूध मिले उनसे वर्ति, चूर्ण, अवलेह, स्नेह, कषाय, मांस रस, यूष, काम्बलिक, यवागू, क्षीर तथा लड्डु और अन्य खाद्य पदार्थों को तैयार करके विरेचन के योग्य व्यक्ति को विरेचन विधि से खाने के लिये देना चाहिये । यह विरेचन द्रव्यों का संग्रह संक्षेप में कह दिया है । विस्तार से कल्पस्थान में कहेंगे ॥ १३४ ॥ आस्थापनेषु तु भूयिष्ठकल्पानि द्रव्याणि यानि योगमुपयान्ति तेषु तेष्ववस्थान्तरेष्वातुराणां तानि द्रव्याणि नामतो विस्तरेणोपदिश्यमाना- न्यपरिसंख्येयानि स्युर्विबहुत्वात्, इष्टञ्चानतिसंक्षेपविस्तरोपदेशस्तन्त्रे, इष्टं च केवलं ज्ञानं, तस्माद्रसत एव तान्यनुद्रयाख्यास्यन्ते ॥ १३५ ॥ आस्थापन द्रव्यों में जो द्रव्य प्रायः रोगियों की अवस्था भेद से अनेक प्रकार से प्रयोग में आते हैं, वे औषध द्रव्य अधिक होने से एक एक का नाम कहने पर असंख्य हो जाते हैं । शास्त्र में न तो अधिक संक्षेप और न अधिक विस्तार होना चाहिये । इसलिये शास्त्र में सम्पूर्ण, सब बातों का ज्ञान ही अपेक्षित होता है । इसलिये आस्थापन द्रव्यों को यहाँ पर रस के द्वारा ( छः प्रकार से ) कहेंगे ॥ १३५ ॥ रस-संसर्ग-विकल्प-बिस्तरो ह्येषामपरिसङ्ख्येया,समवेतानां रसाना- मंशांशबलविकल्पातिबहुत्वात् । तस्माद् द्रव्याणां चैकदेशमुदाहरणार्थं रसेष्वनुविभज्य रसैकैकश्येन रसकैकल्येन च नामलक्षणार्थं षडास्थाप- नस्कन्धाः समूहरसतोऽनुविभज्य व्याख्यास्यन्ते । यत्त षड्विधमास्था-

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६१० चरकसंहिता [ अ० ८

पनमेकरसमित्याचक्षते भिषजस्तद् दुर्लभतमं, संसृष्टरसभूयिष्ठत्वाद् द्रव्याणाम्। तस्मान्मधुराणि च मधुरप्रायाणि च मधुरविपाकानि च मधुरप्रभावाणि च मधुरस्कन्धे मधुराण्येव कृत्वोपदेक्ष्यन्ते तथेतराणि द्रव्याण्यपि। तद्यथा—जीवकर्षभकौ जीवन्ती-वीरातामलकी-काकोली- क्षीरकाकोळी-भीरु-मुद्गपर्णी-माषपर्णी-शालपर्णी-पृश्निपर्ण्यसनपर्णी-मेदा- महामेदा-शृङ्ग-कर्कट-शृङ्गी-शृङ्गाटिका-छिन्नरुहा-छत्रत्रातिच्छत्रा-श्रावणी- महाश्रावण्यलम्बुषा - सहदेवा - विश्वदेवा - शुकाक्षीर-शुक्राबळातिबला- विदारी-क्षीर-विदारी-क्षुद्रसह-महासहार्ष्यगन्धाइवगन्ध-पयस्या-वृश्चीर- पुनर्नवा-बृहती-कण्टकारिकैरण्ड-मोरट-श्वदंष्ट्रा-संहर्षा-शतावरी-शतपुष्पा- मधुकपुष्पी-यष्टिमधु-मधूलिका-मृद्वीका-खर्जूर-परूषकरात्मगुप्ता-पुष्करबीज- कशेरुका-राजादन-कतक-काश्मर्य-शीतपाक्यौदन-पाकीताऊ-खर्जूर-मस्त केक्ष्विक्षुबालिका-दर्भ-कुश-कास-शालि - गुन्द्रेकटंक-शरमूल-राजक्षवक- र्व्यप्रोक्ता - द्वारदा-भारद्वाजी-वनत्रपुष्य - भीरुपत्नी-हंसपादी-काकनासा- कुलिङ्गा-क्षीरवल्ली-कपोतवल्ली-गोपवल्लो-मधुवल्लयाः सोमवल्ली चेति। छः रस होने पर भी इनके परस्पर मिलने से बहुत विस्तार हो जाता है, जिससे कि ये असंख्य बन जाते हैं। एक दूसरे में मिले रसों के अंशांश बल की विकल्पना से असंख्य भेद हो जाते हैं। इसलिये आस्थापन द्रव्यों के उदाहरण मात्र के लिये मधुर आदि छः प्रकार के रसों में एक एक का विभाग करके नाम मात्र से कहेंगे। बुद्धिमान् मनुष्य न कहे हुए द्रव्यों को भी समझ सकेंगे। अतः रस के अनुसार छः प्रकार विभाग करके नाम और लक्षण दर्शाने के लिये छः आस्थापन स्कन्धों को समूह रसों के अनुसार विभाग करके कहेंगे। वैद्य लोग छः प्रकार के आस्थापन स्कन्ध को शुद्ध एक रस वाला कहते हैं। यह बात अतिदुर्लभ है। क्योंकि द्रव्यों में एक अनेक रसों का परस्पर संसर्ग रहता है। इसलिये जो द्रव्य मधुर रस (प्रायः करके) बहुल मधुर विपाक और मधुर प्रभाव वाले (अचिन्त्य शक्ति वाले) हैं, उनके रसान्तर होने पर भी मधुर रस की प्रधानता होने से मधुर समझकर इस मधुर स्कन्ध में ही उपदेश करेंगे। इसी प्रकार अम्ल आदि द्रव्यों की भी व्याख्या करेंगे। यथा-जीवक, ऋषभक, जीवन्ती, वीरा (शतावरी), तामलकी (भूष्या- मलकी), काकोली, क्षीरकाकोली, भीरु (सहस्त्रवीर्या, शतावरी का भेद), मूँगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, शणपर्णी मेदा, महामेदा, देवदारु, काकड़ाशृङ्गी, छिंघाड़ा, छिन्नरुहा, (गिलोय) छत्रा, तालमखाना, अहिच्छत्रा

अ० ८] विमानस्थानम् ६११

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अ० ८] विमानस्थानम् ६११ (सौँफ का भेद), लाल कोकिलाक्ष, श्रावणी (रक्तमुण्डेरी), महाश्रावणी (श्वेतमुण्डेरी), अलंबुषा, सहदेवी, पीतपुष्पा (बला), विश्वदेवा लालफूल- वाली, दण्डोत्पला, शुक्ला, निशोथ, बला, अतिबला, विदारी, क्षीरविदारी, क्षुद्रसहा (ऐन्द्री), लालकुरवक, श्वेत कुरवक, भरासङ्गा, कुजकतरणी, श्वेत कुरवक, ऋष्यगन्धा, असगन्ध, संहवां (जन्तुकारी), गोलरू, बन्दाक, शतावरी, सौँफ, महुए का भेद, मुलहठी, मधूलिका, किसमिस, खजूर, फालसा, कौँच, कमल के बीज, कसेरू, राजकसेरू, पियाल, कतक, गम्भारी, शीतला, नील झिण्टी, ताल और खजूर, मुस्तका, गभा, ईक्षुबालिका, दर्भ, कुश, काश, लाल चावल, गुन्द्रा (शरभेद), इत्कट, शरमूल, राज सरसों, (पीली सरसों) ऋष्यप्रोक्ता वा शतावरी भेद कपिकच्छू (कौंचू), दारदा, (साल) भारद्वाजी (जंगली कपास), जंगली खीरा, शतावरी भेद, (हंसपादिका) हंस के पांव के समान आकार की लता, काकनासा, पेटिका, क्षीरलता, छोटी इलायची, अनन्त मूल, यष्टिमधु का भेद कपोतवल्ली (ब्राह्मी भेद) और सोमलता, गोपवल्ली और मधुवल्ली। एषामेवंविधानामन्येषां च मधुरवर्ग-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां च्छेद्यानि खण्डशश्छेद्यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानी- येन सुप्राक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य पयसाऽर्धोदकेनाभ्यासिच्य साधयेद्दर्ध्या सततमुपघट्टयन, तदुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वौष- धेषु पयसि चानुपदग्धे स्थालीमपहृत्य सुपरिपूतं पयः सुखोष्णं घृत-तैल- वसा-मज्ज-लवण-फाणितोपहितं बस्तिं वातविकारिणे विधिज्ञो विधि- वद्दद्यात्, शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्तविकारिणे विधिवद्द- द्यादिति मधुरस्कन्धः ॥ १३६ ॥ इन अथवा अन्य इस प्रकार के मधुरवर्ग में पठित औषध द्रव्यों में जो द्रव्य छेदन के योग्य हों, उनके टुकड़े २ करके और जो फोड़ने के योग्य हों, उनको फोड़कर छोटे २ टुकड़े बनाकर पानी से भली प्रकार धोकर थाली में रखना चाहिये। डेग ताम्बा, लोहा या मिट्टी की लेनी चाहिये। डेग को नीचे से लेप देना चाहिये। इस डेग में दूध में आधा पानी मिलाकर डाल देना चाहिये। इस डेग को अग्नि पर रख कर कोमल आंच से धीरे धीरे पकाना चाहिये। पकाते समय कड़छी से निरन्तर चलाते जाना चाहिये। जिस समय पानी लगभग सूख जाये, औषधियों में से रस निकल आये, दूध का जलना आरम्भ न हो, तब डेग को उतार कर वस्त्र से छान लेना चाहिये। फिर इस दूध को कुछ गरम रखकर घी, तेल आदि चर्बी, मज्जा का मेल आदि मिला-कर

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६१२ चरकसंहिता [ अ० ८ वातरोगी को विधिपूर्वक आस्थापन नामक बस्ति दे। दूध के ठण्डा होने पर घी या मधु मिला कर पित्त विकार के रोगी को विधिपूर्वक बस्ति दे। यह मधुर- स्कन्ध हुआ ॥ १३६ ॥ आम्राम्रातक-लकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल बदर-दाडिम- मातुलुङ्ग-गण्डीरामलक-नन्दीतक-शीतक-तिन्तिडीक-दन्तशठैरावतक- कोषास्र-धन्वनानां फलानि, पत्राणि चाम्रातकाश्मन्तक-चाङ्गेरीणां चतु- र्विधानां चाम्लिकानां द्वयोः कोल्योश्चाम-शुष्कयोर्द्वयोश्चैव शुष्काम्लिक- योर्ग्राम्यारण्ययोः, वासव-द्रव्याणि च सुरा-सौवीर-तुषोदक-मैरेय-मेदक- मदिरा-मधु-सीधु-शुक्त-दधि-दधिमण्डोदश्विद्धान्याम्लादीनि च । अम्‍लद्रव्यस्कन्ध- आम, आमड़ा, बड़हल (डहु), करौंदा, इमली, अम्ल वेतस, कुवल और बदर (बेर के भेद), अनार, बिजौर, गण्डीर (समष्ठिल, काकाम्र) आंवला नन्दीतक (तून), जललोटक (कालमेघ), निम्बु, ऐरावतक (नारंगी), तिन्तिडीक (अमली), कच्चा आम और धन्वन (धामन), दन्तशठ (कैथ) के फल, आम्रातक, अश्मन्तक (कचनार का भेद) और चांगेरी (शाक) इनके पत्ते, चारों प्रकार का इमली, शुष्क आम, दोनों प्रकार के बेर, चार प्रकार की इमली, (ग्राम्य और जंगली शुष्क और आर्द्र भेद से चार प्रकार की) इनके पत्ते, आसव द्रव्य, सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मेदक, मदिरा, मधु, सीधु, शुक्त, दही, मस्तु, उदश्वित्, धान्याम्ल आदि । एषामेवंविधानां चान्येषां चाम्ल-वर्गे-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा द्रवैः स्थिराण्य- वसिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावत्तैल-वसा-मधु-मज्ज-लवण-फाणि- तोपहितं सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादित्य- म्लस्कन्धः ॥ १३७ ॥ अम्लस्कन्ध में गिने इन और इन के समान अन्य औषध द्रव्यों के टुकड़े करके, छोटा छोटा चूर्ण बना कर सुरा-सौवीर आदि द्रवों से सिंचन करके डेग में रख कर पूर्व की भांति सिद्ध करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें तेल, वसा, मज्जा, नमक, राब मिलाकर थोड़ी गरम अवस्था में वातरोगी को विधिपूर्वक आस्थापन बस्ति देनी चाहिये । यह अम्लस्कन्ध है ॥१३७॥ सैन्धव-सौवर्चल-कालविङ्ग-पाक्यान्प-कूप्य-बालुकैल-मौलक-सामुद्र- रोमकौद्भिदौषर-पाटेयक-पांशुजानीत्येवंप्रकाराणि चान्यानि लवण-वर्ग- परिसंख्यातानि, एतान्यम्लोपहितान्युष्णोदकोपहितानि वा स्नेहवन्ति सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति लवणस्कन्धः ॥

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१३

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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१३ लवणस्कन्ध—सैन्धव, सौवर्चल, कालविङ्, पाक्य (पाक द्वारा तैयार किया) कूप्य (कुपी के आकार में बना ), बालुकैल ( रेत में से बना ), मौलक ( मूखों से बना ), सामुद्रिक, रोमक ( साम्भर प्रदेश में उत्पन्न नमक ), औषर ( ऊषर भूमि में उत्पन्न), पांशुज (धूली से उत्पन्न ) पाटेयक (लवण भेद ) इस प्रकार के तथा अन्य लवण वर्ग में गिने हुए अम्लवर्ग से मिश्रित अथवा गरम पानी से मिश्रित घृत तैल आदि स्नेहों से बनी सुखोष्ण बस्ति को बात- रोगी के लिये विधिपूर्वक देना चाहिये । यह लवणस्कन्ध है ॥१३८॥ पिप्पली-पिप्पलीमूल-हस्तिपिप्पली-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-मरिचाज- मोदार्द्रक-विडङ्ग-कुस्तुम्बुरु-पीलु-तेजोवत्यैला-कुष्ठ-भल्लातकास्थि-हिंगु-कि- लिम-मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज-शिग्रुक-खरपुष्प-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठे- रकार्जक-गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणिज्जक-क्षार-मूत्र-पित्ताना- मेवंविधानां चान्येषां कटुक-वर्ग-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेद्यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा गोमूत्रेण सह साधयि- त्वोपसंहृत्य यथावन्मधु-तैल-लवणोपहितं सुखोष्णं बस्ति श्लेष्मविका- रिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति कटुकस्कन्धः ॥ १३६ ॥ कटुक स्कन्ध—पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, चविका, चीता, सोंठ, मरिच, अजवायन, आर्द्रक (अदरख), वायविडंग, हरा धनिया, पीलु, तेजवला, इलायची, कूठ, भिलावा, हींग, देवदारु, मूली, सरसों, लहसुन, करंज, शोभाञ्जन, मीठा सहजन, खुरासानी, अजवायन, ( खरपुष्पा, वन तुलसी ), कत्तृण, सुमुख, सुरस, अर्जक, काण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्जक, ( ये सब तुलसी के भेद हैं, ) क्षार, मूत्र और पित्त । ये तथा अन्य कटुवर्ग में गिने हुए द्रव्यों को कूट पीस कर गोमूत्र के साथ पका कर, मधु, तेल और लवण से मिश्रित करके सुखोष्ण बस्ति को श्लेष्म रोगी के लिये विधिपूर्वक देना चाहिये । यह कटुकस्कन्ध है । चन्दन-नलद-कृतमाल-नक्तमाल-निम्ब-तुम्बुरुं-कुटज-हरिद्रा-दारुह- रिद्रा-मुस्त-मूर्वाकिरात-तिक्तक-कटुरोहिणी-त्रायमाणा-कारवेल्लिका-करीर- करवीर-केवुक-कठिल्लक-वृष-मण्डूकपर्णी-कर्कोटक-वार्ताकु-कर्कश-काक- गाची-काकोदुम्बरिका-सुषव्यतिविषा-पटोल-कुलक-पाठा-गुडूची वेत्राग्र- वेतस-विकङ्कत-बकुल-सोमवल्क-सप्तपर्ण-सुमनार्कविल्गुज-वचा-तगराग- रु-वालकोशीराणामेवंविधानां चान्येषां तिक्तवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्र- व्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेद्यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेनाभ्यासिच्य साधयित्वोपसंहृत्य यथोक्तमधुतैललवणोपहितं

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६१४ चरकसंहिता [ अ० ८ सुखोष्णं बस्तिं श्लेष्मविकारिणे विधिवद्दद्यात् । शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसं- स्कृत्य पित्तविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति तिक्तस्कन्धः ॥१४०॥ तिक्तस्कन्ध- चन्दन, उशीर, कृतमाल, नाटा करञ्ज, निम्ब, तुम्बरु, कूड़ा, हल्दी, दारुहल्दी, मुस्ता, मूर्वा, चिरायता, कुटकी, त्रायमाणा, करीर, करवीर, पत्तूर, कर्कटक ( करेला ), वांशा, मण्डूकपर्णी, कांकरोला, बैंगन, परवल, काको दुम्बर, मकोय, करेला, सुषवी ( जंगली करेला ), अतीस, परवल, कुणक ( पर- वल का भेद ), पाठा, गिलोय, बेंत का अग्रभाग, अम्लवेतस, कुंच, मौलसरी, श्वेत खदिर, सप्तपर्ण, चमेली, आक, बाबची, त्रिफला, तगर, अगरु, उशीर, इन द्रव्यों को वा तिक्त वर्ग में गिने हुए अन्य औषध द्रव्यों को कूट पीस कर पानी से धो कर पानी के साथ पूर्ववत् विधि से पाक करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें मधु, तेल और नमक मिलाकर हलके गरमबस्ति को विधिपूर्वक श्लेष्म रोगी के लिये देना चाहिये । शीतल होने पर मधु और घी मिला कर पित्त रोगी को देनी चाहिये । यह तिक्तस्कन्ध है ॥ १४० ॥ प्रियङ्गवनन्ताम्रास्थ्यम्बष्ठाकी-कट्वङ्ग-लोध्र- मोचरस-समङ्गा-धातकी पुष्प-पद्म-पद्मकेशर-जम्ब्वाम्रत्वक्प्लक्ष-वटक-पीतनोदुम्बराश्वत्थ-भल्लात- काश्मन्तक-शिरीष-पुष्प-शिंशपा-सोमवल्क-तिन्दुक-पियाल-बदर- खदिर- सप्तपर्णाश्वकर्ण-स्यन्दनार्जुनासनानि मेदैडवालुक-परिपेलव-कदम्ब-श- ल्लकी-जिङ्गिनी-काश-कशेरुक-राजकशेरुक-कट्फल-वंश-पद्मकाशोक-शाल धव-सर्ज-भूर्ज-शण-खरपुष्पा-पुरशमी-माची-कवरक-तुङ्गाजकर्णाश्वकर्ण- स्फूर्जक-विभीतका-कुम्भी-पुष्कर-बीज-बिस-मृणाल-ताल-खर्जूर-तरूणामे- वंविधानां चान्येषां कषायवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सह साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधुतैललवणोपहितं सुखोष्णं बस्तिं श्लेष्म- विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात् । शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्त- विकारिणे विधिज्ञो विधिवद् दद्यादिति कषायस्कन्धः १४१ ॥ कषाय स्कन्ध-फूल प्रियंगु, अनन्तमूल, आम की गुठली, पाठा, श्योनाक, लोध्र, मोचरस, मंजीठ, धाय के फूल, पद्म, कमल का केशर, जामुन, आम, पिल- खन, बड़, कपीतन, गूलर, पीपल, भिलावा, पाषाणभेद, सिरस, शीशम, खैर, तिन्दुक, पियाल, बेर, खैर ( लाल ), सप्तपर्ण, अश्वकर्ण ( पलाश ), तिनिश, अर्जुन, असन, विट्, खदिर, तेजबल, कैवर्त्तमुस्ता, कदम्ब, शल्लकी, जिगण, कास, कसेरु, राजकसेरु, कायफल, बांस, पद्माख, अशोक, साल, धव, सर्जवृक्ष, भोजवल्कल, वृक्ष, तुलसी, शमी, देवदारु, वोरुक, पुंनाग, शाल भेद, वंशा

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शाल, तिन्दुक, बहेड़ा, कायफल, कमल गट्टा, बिस, मृणाल, ताड़, खजूर, धीकार इन या कषाय वर्ग में गिने हुए अन्य द्रव्यों को कूट पीस कर पानी से धो कर पानी के साथ पूर्ववत् पकाना चाहिये। सिद्ध होने पर मधु-तेल और लवण मिलाकर विधिपूर्वक श्लेष्मा के रोगी को कवोष्ण बस्ति देनी चाहिये। शीतल होने पर घी और शहद मिला कर पित्तविकार के रोगी को देना चाहिये। यह कषाय स्कन्ध कह दिया ॥१४१॥ तत्र श्लोकाः—षड्वर्गाः परिसंख्याता य एते रसभेदतः । आस्थापनमभिप्रेत्य तान् विद्यात्सार्वयोगिकान् ॥ १४२ ॥ सर्वशो हि प्रणिहिताः सर्वरोगेषु जानता। सर्वान् रोगान्नियच्छन्ति येभ्य आस्थापनं हितम् ॥ १४३ ॥ येषां येषां प्रशान्त्यर्थं ये ये ते परिकीर्तिताः । द्रव्यवर्गा विकाराणां तेषां ते परिकोपनाः ॥ १४४ ॥ इत्येते षडास्थापनस्कन्धा रसतोऽनुविभज्य व्याख्याताः । आस्थापन बस्ति के अभिप्राय से रसों के भेद से जो ये छः वर्ग कहे हैं, इन छः स्कन्धों को आस्थापन बस्ति से अच्छे होने वाले सब रोगों में लागू होने वाले समझने चाहिये। क्योंकि दोष, दूष्य, देश, काल, मात्रा आदि की अपेक्षा करके औषध-उपयोग को जानने वाले वैद्य द्वारा जिन रोगों के लिये आस्थापन विधि हितकारी है, उन रोगों में प्रयुक्त किये हुए यह छः वर्ग सब रोगों का शमन करते हैं। जिन जिन विकारों की शान्ति के लिये जो जो द्रव्यवर्ग नहीं कहे हैं, वे २ उन २ रोगों को कुपित करते हैं, शान्त नहीं करते। इस प्रकार से छः आस्थापन-स्कन्धों को रसों के अनुसार विभाग करके कह दिया ॥१४२-१४४॥ तेभ्यो भिषग्बुद्धिमान् परिसंख्यातमपि यद्यद् द्रव्यमयौगिकं मन्येत तत्तदपकर्षयेत्, यद्यच्चानुक्तमपि यौगिकं वा मन्येत तत्तद् विदध्यात्। वर्गमपि वर्गेणोपसंसृजेदेकमेकेनानेकेन वा युक्तिं प्रमाणीकृत्य । प्रच- रणमिव भिक्षुकस्य बीजमिव कर्षकस्य सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्पज्ञा- नायतनं भवति । तस्माद् बुद्धिमतामूह्यापोहवितर्काः । मन्दबुद्धेस्तु यथोक्तानुगमनमेव श्रेयः । यथोक्तं हि मार्गमनुगच्छन् भिषक् संसाध- यति वा कार्यमनतिमहत्त्वाद्वा निपातयत्यनतिह्रस्वत्वादुदाहरण- स्येति ॥ १४५ ॥ बुद्धिमान् वैद्य इन वर्गों में गिने हुए जिस द्रव्य को अयौगिक समझे उसको निकाल देवे और न कहे हुए जिस द्रव्य को यौगिक समझे उसको इनमें मिला लेवे। युक्ति के अनुसार दोष-दूष्य की विवेचना करके एक वर्ग को एक, अथवा

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६१६ चरकसंहिता [अ० ८ अनेक वर्ग के साथ मिला कर प्रयोग करे । भिक्षुक के विचरने के समान और किसान के बीज की तरह यह अल्प कथन भी बुद्धिमानों के लिये बड़ा ज्ञानप्रद है, क्योंकि बुद्धिमान् व्यक्ति ऊहापोह (यह इस प्रकार है, यह इस प्रकार नहीं है, इस प्रकार के तर्क) और वितर्क प्रमाण-युक्ति में कुशल होते हैं। मन्द- बुद्धि वाले व्यक्ति को कथनानुसार ही कार्य करना श्रेयस्कर है। क्योंकि इस प्रकार का मन्द बुद्धि वाला भिषक्, उपदेश के न बहुत संक्षिप्त और न बहुत विस्तार होने से, बिना ऊहापोह के भी यथोक्त मार्ग का अनुसरण करता हुआ कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है ॥१४५॥ अतः परमनुवासनद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यन्ते—अनुवासनं तु स्नेह एव। स्नेहस्तु द्विविधः—स्थावरो जङ्गमात्मकश्च। तत्र स्थावरात्मकः स्नेहस्तैलमतैलं च। तद् द्वयं तैलमेव कृत्वोपदिश्यते, सर्वतस्तैलप्रा- धान्यात्। जङ्गमात्मकस्तु—वसा, मज्जा, सर्पिरिति ॥ १४६ ॥ तेषां तु तैल-वसा-मज्ज-सर्पिषां तु यथापूर्वं श्रेष्ठं वात-श्लेष्म-विकारे- ष्वनुवासनीयेषु, यथोत्तरं तु पित्तविकारेषु, सर्व एव वा सर्वविकारे- ष्वपि च योगमुपयान्ति संस्कारविशेषादिति ॥ १४७ ॥ इसके आगे अनुवासन द्रव्यों की व्याख्या करेंगे। अनुवासन का अर्थ स्नेह है। स्नेह दो प्रकार का है स्थावर और जंगम। इनमें स्थावर स्नेह दो प्रकार का है। जैसे—तैल (तिलों से उत्पन्न हुआ) और अतैल (तिलों से न उत्पन्न हुआ), इन दोनों को तैल शब्द से ही कह देते हैं, क्योंकि सब तैलों में तिल के तैल की ही प्रधान है। जांगम स्नेह वसा, मज्जा और सर्पि (घी) हैं। तैल, वसा, मज्जा और घी इन में पूर्व की वस्तु उत्तर वस्तु से श्रेष्ठ है अर्थात् घी से मज्जा, मज्जा से वसा और वसा से तैल श्रेष्ठ है। यह नियम वात और कफ के विकारों के लिये है। पित्तजन्य विकारों में उत्तरोत्तर वस्तु (तैल से वसा; वसा से मज्जा और मज्जा से घी) श्रेष्ठ है। अथवा सब ही स्नेह सब रोगों में विशेष संस्कार से (उस उस दोषहर द्रव्य के सहयोग से) उपयुक्त बन जाते हैं ॥ १४६-१४७ ॥ शिरोविरेचनद्रव्याणि पुनरपामार्ग-पिप्पली-मरिच-विडङ्ग-शिग्रुशि- रीष-कुस्तुम्बुरु-पिल्वजाज्यजमोद-वार्ताकी-पृथ्वीकैला-हरेणुका-फला- नि च। सुमुख-सुरस-कुठेरक-गण्डीरक-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणि- ज्झक-हरिद्रा-शृङ्गवेर-मूलक-लशुन-तर्कारी-सर्षप-पत्राणि च, अर्कालर्क- कुष्ठ-नागदन्ती-वचा-भार्गी-श्वेता-ज्योतिष्मती-गवाक्षी-गण्डीर-पुष्पी- वृश्चिकाली-वयस्थातिविषा-मूलानि च, हरिद्रा-शृङ्गवेर-मूलक-लशुन-