चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७ राशि के साथ मिलकर इस आहार राशि को उदर के एक भाग में रोक देते हैं अथवा सहसा ऊपर या नीचे के ( ऊर्ध्व या अधः ) मार्गों से बाहर निकालने लगते हैं। अधिक खानेवाले, पुरुष में भिन्न २ नाना रोग पृथक् २ रूप से उत्पन्न करते हैं ॥ ६-१० ॥ तत्र वातः शूलानाहाङ्गमर्द-मुखशोष-मूर्च्छा-भ्रमाग्निवैषम्य-सिरासं- कोचन-संस्तम्भनानि करोति । पित्तं पुनर्ज्वरातीसारमन्तर्दाहं तृष्णा- मदभ्रमप्रलपनानि । श्लेष्मा तु छर्द्यरोचकाविपाकशीतज्वरालस्यगात्रगौ- रवाभिनिर्वृत्तिकरः संपद्यते ॥ ११ ॥ वायु, शूल, अफारा, अंगमर्द (अंगों का टूटना), मुख का शुष्क होना, मूर्च्छा, भ्रम, अग्नि की विषमता, पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटिग्रह, शिराओं का आकुञ्चन (संकोच) और स्तम्भन (जड़ता), इन विकारों को उत्पन्न करता है। पित्तज्वर, अतिसार, अन्तर्दाह (शरीर में जलन), तृष्णा, मद, भ्रम और प्रलाप को उत्पन्न करता है और कफ छर्दि (वमन), अरुचि, अविपाक, शीतज्वर, आलस्य और शरीर में भारीपन पैदा करता है ॥ ११ ॥ न खलु केवलमतिमात्रमेवाऽऽहारराशिमामप्रदोषकरमिच्छन्ति, अपि तु खलु गुरु-रूक्ष-शीत-शुष्क-द्विष्ट विष्टम्भि-विदाह्यशुचि-विरुद्धनामकाले चान्नपानानामुपसेवनं, काम-क्रोध-लोभ-मोहेर्ष्या-ह्री-शोक-मानोद्वेग-भयो- पतप्तेन मनसा वा यदन्नपानमुपयुज्यते तदप्या ममेव प्रदूषयति ॥१२॥ कुशल वैद्य केवल आहार राशि की अतिमात्रा को ही आमदोष का कारण नहीं मानते। किन्तु प्रकृति से भारी, रूक्ष, शीत, शुष्क, द्वेषयुक्त (मन के प्रति- कूल), विष्टम्भी (वायु, दर्द के होने पर भी मल का न आना), दाह (जलन) करने वाले, अपवित्र, प्रकृति, संस्कार, राशि में विरोधी खान-पान का सेवन अथवा हितकारी अन्न को भी अनुचित काल में वा वमन, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, शोक, मन के उद्वेग, भय आदि अवस्था में किया हुआ अन्न-पान भी आम को ही दूषित करता है ॥ १२ ॥ भवति चात्र—मात्रयाऽप्यभ्यवहृतं पथ्यं चान्नं न जीर्यति । चिन्ता-शोक-भय-क्रोध-दुःख-शय्या-प्रजागरैः ॥ १३ ॥ तं द्विविधमामप्रदोषमाचक्षते भिषजो विसूचिकामलसकं च । तत्र विसूचिकामूर्ध्वं चाधश्च प्रवृत्तामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् ॥१४॥ हितकारी, पथ्य अन्न मात्रा से खाने पर भी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध, दुःख, शय्या में सोने, रात्रि में जागने से जीर्ण नहीं होता है। इस आम-
४६८ चरकसंहिता [ अ० २ प्रदोष ( भोजन के इस प्रकार न पचने ) को वैद्य दो प्रकार का मानते हैं । ( १ ) विसूचिका और ( २ ) अलसक । इन में विसूचिका के अन्दर आम दोष ( भोजन का न पचा अंश ) ऊपर और नीचे दोनों मार्गों से बाहर निकलता है ॥ १३-१४ ॥ अलसकमुपदेक्ष्यामः—दुर्बलस्याल्पाग्नेर्बहुश्लेष्मणो वात-मूत्र-पुरीष- वेग-विधारिणः स्थिर-गुरु-बहु-रूक्ष-शीत-शुष्कान्नसेविनस्तदन्नपानमनि- लप्रपीडितं श्लेष्मणा च विबद्धमार्गमतिमात्रलीनमलसत्वान्न बहिर्मुखी भवति, ततश्छर्द्यतीसारवर्ज्यान्यामप्रदोषलिङ्गानि यथोक्तान्यभिदर्शय- त्यतिमात्राणि । अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तिर्यग्गच्छ- न्तः कदाचित्केवलमेवास्य शरीरं दण्डवत्स्तम्भयन्ति, ततस्तमलसकम- साध्यं ब्रुवते ॥ १५ ॥ अलसक का उपदेश करते हैं--दुर्बल, अल्पाग्नि, बहुत कफयुक्त, वात आदि के वे के स्वभाव के, स्थिर, गुरु, बहुत, रूक्ष, शीत, शुष्क इस प्रकार के अन्न को सेवन करने वाले पुरुष में वायु खान-पान को पीड़ित करता है और कफ से मार्ग रुके होने से वह बाहर नहीं निकलता । यही आमाशय में बहुत अधिक मात्रा में व्याप्त हो जाता है । और आलस्य ( मन्दता ) के कारण बाहर भी नहीं आता । इसलिये इस को 'अलसक' कहते हैं । बाहर न होने से वमन और अतिसार को छोड़कर शेष अन्य आमदोष के लक्षण बहुत अधिक मात्रा में स्पष्ट होते हैं । असाध्य अलसक—बहुत अधिकमात्रा में दूषित हुए वात आदि दोष दुष्ट आम-द्वारा मार्गों के रुक जाने पर तिरछे गति करते हुए कभी अकस्मात् इस बहुत खाने वाले पुरुष के सम्पूर्ण शरीर को दण्डे की भांति स्तब्ध कर ( जकड़ ) देते हैं । इसलिये इस अलसक को असाध्य कहते हैं ॥ १५ ॥ विरुद्धमध्यशनाजीर्णाशनशीलिनः पुनरामदोषमामविषमित्याचक्षते भिषजो विषसदृशलिङ्गत्वात् । तत्परमसाध्यमाशुकारित्वाद्विरुद्धोप- क्रमत्वाच्चेति ॥ १६ ॥ विरुद्ध भोजी, अध्यशन ( खाने के ऊपर खाना खाने ) और अजीर्णाव- स्था में भोजन करने वाले पुरुष के दोष को वैद्य 'आमविष' कहते हैं, क्योंकि इसके लक्षण विष के समान होते हैं । ( आम दोष में भी विष के खाने के समान मुख से लालास्राव होता है ) । यह भी बहुत असाध्य है । विषरूप होने से शीघ्र मारने वाला है और इसमें जो उपचार !
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६९
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६९ वह विरोधी रहता है। अर्थात् विष में शीतक्रिया और आम एवं अजीर्ण में उष्णक्रिया करनी अपेक्षित है, ये दोनों परस्पर विरोधी होती हैं ॥ १६ ॥ तत्र साध्यमामं प्रदुष्टमलसीभूतमुल्लेखयेदादौ पाययित्वा लवणमुष्णं च वारि । ततः स्वेदनवर्तिप्रणिधानाभ्यामुपाचरेदुपवासयेच्चैनम् ॥ १७ ॥ साध्य अलसक की चिकित्सा—दुष्ट हुए एवं अलस ( क्रियाहीन ) बने आम-दोष में लवण मिश्रित गरम पानी पिलाकर वमन कारक दोष को बाहर निकालना चाहिये । पीछे से स्वेदन ( फलवर्ति ) का उपयोग करे और रोगी को उपवास करावे ॥ १७ ॥ विसूचिकायां तु लङ्घनमेवाग्रे विरिक्तवच्चास्यानुपूर्वी ॥ १८ ॥ विसूचिका की अवस्था में सबसे प्रथम लंघन ही करवाना चाहिये । इसके पीछे विरेचन दिये पुरुष की भांति पेयादि की व्यवस्था ( उपकल्पनीय अध्याय [ सूत्र० अ० १५ ] में कहे अनुसार ) करनी चाहिये ॥ १८ ॥ आमप्रदोषेषु त्वन्नकाले जीर्णाहारं पुनर्दोषावलिप्तामाशयं स्तिमित- गुरुकोष्ठमनन्नाभिलाषिणमभिसमीक्ष्य पाययेद्दोषशेषपाचनार्थमौषधमग्नि- संधुक्षणार्थं च, न त्वेवाजीर्णाशनम् । आमप्रदोषदुर्बलो ह्यग्नियुगपद्दोष- मौषधमाहारजातं चाशक्तः पक्तुम्, अपि चाऽऽमप्रदोषाहारौषधविभ्र- मोऽतिबलवत्त्वादुपरतकायाग्निं सहसैवाऽऽतुरमबलमतिपातयेत् ॥१९॥ आम प्रदोष में औषध प्रयोग—जब भोजन जीर्ण हो गया हो, जिस का कोष्ठ जड़ और भारी हो, जो अन्न की इच्छा न करता हो, ऐसे पुरुष के शेष अपक्व दोषों के पाचन के लिये और उसके अग्नि को बढ़ाने के लिये भोजन के समय में औषध देनी चाहिये, किन्तु अजीर्ण अवस्था में भोजन के जीर्ण हुए बिना औषध नहीं देनी चाहिये । क्योंकि आम-प्रदोष के कारण दुर्बल हुई अग्नि आम दोष, औषध और भोजन इन सबको एक साथ पचाने में समर्थ नहीं होती । इसके अतिरिक्त आमदोष, आहार और औषध में परस्पर विषमता अधिक बलवान् होने से शरीर की अग्नि को नष्ट करके ये निर्बल रोगी को सहसा शीघ्र ही मार सकते हैं ॥१९॥ आमप्रदोषजानां पुनर्विकाराणामपतर्पणेनैवोपरमो भवति, सति त्वनुबन्धे कृतापतर्पणानां व्याधीनां निग्रहे निमित्तविपरीतमुपास्यौष- धं तद्विपरीतमेवावचारयेद्यथास्वम् । सर्वविकाराणामपि च निग्रहे विधिर्विपरीतमौषधमिच्छन्ति कुशलाः, तदर्थकारि वा ॥२०॥
५०० चरकसंहिता [ अ० २ सम्पूर्ण आमदोषजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण ( उपवास ) से होती है१। संतर्पण से उत्पन्न रोगों में अपतर्पण क्रिया कारण के विपरीत है। परन्तु अप- तर्पण करने पर भी जहाँ अनुबन्ध हो वहां पर निदान के विपरीत औषध को छोड़ कर रोग के विपरीत ( जो जिस रोग के विपरीत हो ) वही औषध देनी चाहिये। यह बात केवल आमदोषजन्य रोगों के लिये ही नहीं है; अपितु सब रोगों के शमन के लिये निदान और रोग दोनों के विपरीत औषध देनी चाहिये ऐसा कुशल चिकित्सकों का मत है२ ॥ २० ॥ विशुद्धामप्रदोषस्य पुनः परिपक्वदोषस्य दीप्ते चाग्नावभ्यङ्गास्था- पनानुवासन विधिवत्स्नेहपानं च युक्त्या प्रयोज्यं प्रसमीक्ष्य दोष- भेषज·देश·काल·बल·शरीराहार·सात्म्य·सत्त्व·प्रकृति·वयसामवस्थान्त- राणि विकारांश्च सम्यगिति ॥२१॥ जब आम प्रदोष शान्त हो जाये, दोषों का परिपाक हो जाय, अग्नि प्रदीप्त हो जाय तब दोष, देश, औषध, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और आयु आदि अवस्थाओ को तथा विकारों को भली प्रकार देखकर अभ्यंग, आस्थापन, अनुवासन आदि कर्म और विधिपूर्वक स्नेह-पान युक्ति से कराना चाहिये ॥२१॥ भवन्ति चात्र—अशितं खादितं पीतं लीढं च क्व विपच्यते । एतत्त्वां धीर ! पृच्छामस्तन्न आचक्ष्व बुद्धिमन् ! ॥२२॥ इत्यग्निवेशप्रमुखैः शिष्यैः पृष्टः पुनर्वसुः । आचचक्षे ततस्तेभ्यो यत्राऽऽहारो विपच्यते ॥ २३ ॥ नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः । अशितं खादितं पीतं लीढं चात्र विपच्यते ॥ २४ ॥ आमाशयगतः पाकमाहारः प्राप्य केवलम् । पक्वः सर्वाश्रयं पश्चाद्धमनीभिः प्रपद्यते ॥ २५ ॥ १. अपतर्पण दोष बल की अपेक्षा से तीन प्रकार का है । ( १ ) लंघन, ( २ ) लंघन·पाचन और ( ३ ) दोषावसेचन । अल्पदोष में लंघन, मध्य दोष में लंघन·पाचन और बहुदोष मे दोषावसेचन करना चाहिये । २. गुरु और स्निग्ध पदार्थों से उत्पन्न रोग में लघु रूक्ष चिकित्सा । स्नेह- स्वेदजन्य रोग में लंघन-बृंहण । वमन में और अधिक वमन कराना तदर्थकारी चिकित्सा है ।
[अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०१
[अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०१
खाये, चबाये, पीये या चाटे सब अन्न-पान कहाँ पर पचते हैं, हे धीर गुरो ! यह हम आप से पूछते हैं, हे बुद्धिमन् ! यह आप हम को बताइये । इस प्रकार अग्निवेश आदि शिष्यों के पूछने पर पुनर्वसु ने उन को उपदेश किया । मनुष्य के नाभि और स्तनों के मध्यवर्त्ती प्रदेश को 'आमाशय' कहते हैं । स्तनो से नीचे और नाभि से ऊपर 'आमाशय' और नाभि से नीचे गुदा से ऊपर 'पक्वाशय' है । आमाशय में अशित, खादित, पीत और लीढ यह चारों प्रकार का अन्न पचता है । आमाशय में पहुंचा सब प्रकार का अन्न यहाँ पर परिपक्व होकर धमनी-स्रोतों द्वारा सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होता है ॥ २२-२५॥ तत्र श्लोकौ—तस्य मात्रावतो लिङ्गं फलं चोक्तं यथायथम् । अमात्रस्य तथा लिङ्गं फलं चोक्तं विभागशः ॥ २६ ॥ आहारविध्यायतनshapeानि चाष्टौ सम्यक्परीक्ष्याऽऽत्महितं विदध्यात् । अन्यच्च यः कश्चिदिहास्ति मार्गो हितोपयोगेषु भजेत तं च ॥२७॥ मात्रावाले आहार के लक्षण और फल पूर्ण रूप में कह दिये हैं। इसी प्रकार अमात्रा अर्थात् हीन और अधिक रूप में सेवन किये आहार के लक्षण और फल पृथक् २ करके कह दिये हैं। आहार-विधि के आठ आयतन (कारणों, अंगो) की ठीक २ परीक्षा करके अपना हित करें और भी जो कोई उत्तम मार्ग जिसका उपदेश नहीं किया हो उस को भी हित पदार्थों के उपयोग के अवसरों में प्रयोग करे ॥ २७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने त्रिविधकुक्षीयविमानं नाम द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः । अथातो जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'जनपद-उद्ध्वंसनीय' नाम विमान का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ जनपदमण्डले पञ्चालक्षेत्रे द्विजातिवराध्युषितायां काम्पिल्यराज- धान्यां भगवाञ्पुनर्वसुरात्रेयोऽन्तेवासिगणपरिवृतः पश्चिमे घर्ममासे ...तीरे ...विचारमनुविचरन् शिष्यमग्निवेशमब्रवीत् ॥ ३ ॥
५०२ चरकसंहिता [ अ० ३ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन द्विज वर्णों से बसे पांचाल क्षेत्र ( पंजाब ) के जनपद-मण्डल ( प्रान्त ) में, काम्पिल्य नाम राजधानी में शिष्यगण सहित भगवान् आत्रेय पुनर्वसु ग्रीष्म काल के द्वितीय अर्थात् ज्येष्ठ मांस में गंगा के किनारे वन में विहार करते हुए शिष्य अग्निवेश को बोले ॥ ३ ॥ दृश्यन्ते हि खलु सौम्य ! नक्षत्र-ग्रह-चन्द्र-सूर्यानिलानलानां दिशां चाऽप्रकृतिभूतानामृतुवैकारिका१ भावाः, अचिरादितो भूरपि च न यथा- वद्रस-वीर्य-विपाक-प्रभावमोषधीनां प्रतिविधास्यति,तद्वियोगाच्चाऽऽतङ्क- प्रायता नियता । तस्मात्प्रागुद्ध्वंसात्प्राक् च भूमेर्विरसीभावादुद्धरध्वं सौम्य ! भैषज्यानि यावन्नोपहत-रस-वीर्य-विपाक-प्रभावाणि भवन्ति । वयं चैषां रसवीर्यविपाकप्रभावानुपयोक्ष्यामहे, ये चास्माननुकाङ्क्षन्ति यांश्च वयमनुकाङ्क्षामः, नहि सम्यगुद्धृतेषु भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यग्विचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां किंचित्प्रतीकारगौ- रवं भवति ॥ ४ ॥ हे सौम्य ! नक्षत्र ( अश्विनी आदि ), ग्रह ( बृहस्पति आदि ), चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि और दिशाओं के प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक दशा में न होने पर ऋतु-विकार से उत्पन्न होनेवाले नाना परिणाम देखे जाते हैं। इधर पृथ्वी भी ओषधियो में रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव को शीघ्र उत्पन्न नहीं कर सकती, इसलिये प्रायः भयंकर रोगों का होना सम्भव होता है । अतः हे सौम्य ! जन- पदोद्ध्वंस अर्थात् देश भर को नाश कर देने वाले रोग होने से पूर्व तथा पृथ्वी के विरस ( रसहीन या विपरीत रसवाली ) होने से पूर्व ही औषधियों का संग्रह कर लो; जिस से कि इन ओषधियों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव सुरक्षित बने रहें, नष्ट न हों। हम इन ओषधियों के रस,वीर्य,विपाक और प्रभावका उपयोग करते हैं, जिन को हम चाहते हैं और जो हम को चाहते हैं, उनके लिये इन औषधियों का उपयोग करेंगे । ठीक समय पर ओषधियों के उखाड़ लेने पर, ठीक प्रकार से बना लेने पर और ठीक प्रकार से दोष आदि की अपेक्षा से प्रयोग करने पर जनपद-नाशक रोगों के प्रतीकार करने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती ॥ ४ ॥ १. सुश्रुत में इस विकार को 'मरक' कहा है । यथा— शीतोष्णवर्षाणि खलु विपरीतान्योषधीर्व्यापादयन्ति, तासामुपयोगाद् विविध रोगप्रादुर्भावो मरको वा भवेत् ॥ सु० सूत्र० अ० ६
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०३
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०३ एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच-उद्धृतानि खलु भगवन् ! भेषज्यानि विहितानि च सम्यक् सम्यग्विचारचारितानि च । अपि तु खलु जनपदोद्ध्वंसनमेकेनैव व्याधिना युगपदसमानप्रकृत्याहार-देह- बल-सात्म्य-सत्त्व-वयसां मनुष्याणां कस्माद्भवतीति ॥ ५ ॥ इस प्रकार से कहते हुए भगवान् आत्रेय को अग्निवेश बोले ! हे भगवन् ! ओषधियां ठीक प्रकार से इकट्ठी की गईं, ठीक प्रकार से बना ली जायेंगी और भली प्रकार से विचार कर ही ओषधियां दी जायेंगी । परन्तु भिन्न भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, सत्त्व और आयुवाले अनेक मनुष्यों का, देश भर को ध्वंस कर देने वाला एक ही प्रकार का रोग क्यों हो जाता है ॥५॥ तमुवाच भगवानात्रेयः-एवमसामान्यानामेभिरप्यग्निवेश ! प्रकृ- त्यादिभिर्भावैर्मनुष्याणां येऽन्ये भावाः सामान्यास्तद्वैगुण्यात्समानका- लाः समानलिङ्गाश्च व्याधयोऽभिनिर्वर्त्तमाना जनपदमूद्ध्वंसयन्ति । ते तु खल्विमे भावाः सामान्यजनपदेषु भवन्ति । तद्यथा-वायुरुदकं देशः काल इति ॥ ६ ॥ भगवान् आत्रेय ने कहा । हे अग्निवेश ! इन प्रकृति आदि की भिन्नता होने पर भी जो अन्य कारण सब मनुष्यों में समान रूप से रहते हैं, उन में विकार आने से एक ही समय में, एक ही लक्षणोंवाले रोग उत्पन्न होकर जन- पद का नाश कर देते हैं । जनपदों में निम्न कारण समान रूप से होते हैं । जैसे-वायु, जल, देश और काल ॥ ६ ॥ तत्र वातमेवंविधमनारोग्यकरं विद्यात् । तद्यथा-यथर्तुविषममति- स्तिमितमतिचलमतिपरुषमतिशीतमत्युष्णमतिरूक्षमत्यभिष्यन्दिनमति- भैरवारावमतिप्रतिहतपरस्परगतिमतिकुण्डलिनमसात्म्य - गन्ध - बाष्प- सिकता-पांशु-धूमोपहतमिति ॥ ७ ॥ इन में निम्न लक्षणोंवाले वायु को आरोग्यनाशक समझना चाहिये । जैसे-ऋतु के विपरीत, सर्वथा गतिरहित, बहुत वेग वाला, अति कर्कश, अति शीत, अति उष्ण, अतिरूक्ष, दोष, धातु, मल, स्रोतों में अति क्लिन्नता उत्पन्न करनेवाला, बहुत भीषण शब्द करनेवाला, परस्पर वायु से वायु का वेग खण्डित होता हो, आवर्त्त ( भंवरों ) वाला, हानिकारक-दुर्गन्ध वाला, बाष्प, सिकता ( रेत ), पांशु ( धूलि ) और धुंए से व्याप्त हो, तब वायु को अनारो- ग्यकारक. ( रोगकारक ) समझना चाहिये ॥ ७ ॥
उदकं तु खल्वत्यर्थ-विकृत-गन्ध-वर्ण-रस-स्पर्श-क्लेदबहुलमपक्रान्त- जलचरविहङ्गममुपक्षीणजलाशयमप्रीतिकरमपगतगुणं विद्यात् ॥ ८ ॥ जल—जिस पानी का गन्ध, रस, वर्ण और स्पर्श बहुत अधिक विकृत हो गया हो, जिस में क्लेद (सडांद) बहुत उठे, जिस पानी को जलचारी पक्षी छोड़कर चले गये हों, जिस पानी में रहने वाली मछलियां नष्ट हो गई हों और जलाशय भी कमती हो गया हो, इस प्रकार के पानी को अप्रिय और गुणरहित जाने ॥८॥ देशं पुनर्विंकृत-वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श-क्लेद-बहुलमुपसृष्टं सरीसृप-व्याल- मशक-शलभ-मक्षिका-मूषकोलूक-श्मशानिक-शकुनि-जम्बुकादिभिरूष्णो- तृणोपवनवन्तं लताप्रतानादिबहुलमपूर्ववदवपतितं शुष्कनष्टशस्यं धूम्रप- वनं प्रभातपतत्रिगणमुत्कृष्टश्वगणमुद्भ्रान्त-व्यथित-विविध-मृग-पक्षि- सङ्घमुत्सृष्ट-नष्ट-धर्म-सत्य-लज्जाचार-शील-गुण-जनपदं शश्वत्क्षुभितो- दीर्णसलिलाशयं प्रतताल्कापातनिर्घातभूमिकम्पमतिभयाराबरूपं रूक्ष- ताम्रारुणसिताभ्र-जाल-संवृतार्क-चन्द्र-तारकमभीक्ष्णं ससंभ्रमोद्वेगमिव सत्रासरुदितमिव सतमस्कमिव गुह्यकाचरितमिवाऽऽक्रन्दितशब्दबहु- लमिव चाहितं विद्यात् ॥ ६ ॥ देश—जिस स्थान का वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श विकृत हो गया हो, क्लेद बहुल हो, जिस स्थान में सरीसृप (सरकने वाले सांप आदि जन्तु), व्याल (सिंह, चीते आदि), मशक (मच्छर) शलभ (पतंगे), मक्खियां मूषक (चूहे), उलूक (उल्लू), श्मशान में रहने वाले पक्षी गीध, चील, गीदड़ आदि का उपद्रव हो, जहां पर ये बहुत हों, जहां पर तृण, घास, लता आदि बहुत हों, जो पहिले से एकदम नया ही दीखे, जहां पर अनाज के खेत सूख या नष्ट हो गये हों, जहां की वायु धुंवाली हों, जहां पर पक्षीगण घोर शब्द करते हों, जहां पर कुत्ते मुंह उठा कर रोते हों, जहां पर घबराये और पीड़ित नाना प्रकार के मृग-पशु-पक्षीसमूह हों, जिन नगरों में से धर्म, सत्य, लज्जा, आचार, शील, दया, दाक्षिण्य आदि गुण नष्ट हो गये हों, जहाँ के तालाबों का पानी बिना वायु के भी निरन्तर क्षुभित और तरंगों वाला रहे, जहां पर उल्कापात, बिजली आदि का गिरना, भूकम्प आदि लगातार हों और भयंकर शब्द उत्पन्न होता हो, जहां पर सूर्य, चन्द्र और तारे रूखे, तांबे के से, लाल, काले, बादलों से ढंपे दिखाई देवे, जहां पर बार बार भ्रम, उद्वेग, के साथ, भय के साथ रोने का सा शब्द सुने, अन्धकार सा हो, जो गुह्यक (यक्ष) आदि देवयोनियों से आक्रान्त सा हो, तथा रोने के से शब्दों से व्याप्त हो देश को अनारोग्यकारक समझना चाहिये ॥ ६ ॥
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०५
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०५ कालं तु खलु यथर्तुलिङ्गाद्विपरीतलिङ्गमधिकलिङ्गं हीनलिङ्गं वाहितं व्यवस्येत् ॥ १० ॥ काल—शीत, उष्ण और वर्षा इन ऋतुओं के अपने लक्षणों से विपरीत होना या उन लक्षणों का अधिक होना या कम होना ( मिथ्यायोग, अतियोग और अयोग ) अनारोग्यकारक होता है ॥ १० ॥ इमानेवं दोषयुक्तांश्चतुरो भावान् जनपदोद्ध्वंसकरान् वदन्ति कुशलाः । अतोऽन्यथाभूतांस्तु हितानाचक्षते ॥ ११ ॥ विगुणेष्वपि तु खल्वेतेषु जनपदोद्ध्वंसनकरेषु भेषजेनोपपाद्यमा- नानामभयं भवति रोगेभ्य इति ॥ १२ ॥ निपुण वैद्य इस प्रकार के दोषों वाले वायु, जल, देश और काल इन चारों को जनपद-नाश का कारण मानते हैं । इनसे विपरीत लक्षणों वाले इन चारों को आरोग्यकारक गिनते हैं । इन चारों के विगुण होने व जनपद के नाशक कारणों के उपस्थित होने पर भी, दोष और दूष्य की अपेक्षा करके औषध द्वारा चिकित्सा करने पर पुरुषों को रोग नहीं होते, वे पुरुष रोगों से बचे रहते हैं ॥ ११-१२ ॥ भवन्ति चात्र—वैगुण्यमुपपन्नानां देशकालानिलाम्भसाम् । गरीयस्त्वं विशेषेण हेतुमत्संप्रचक्ष्यते ॥ १३ ॥ वाताज्जलं जलाद्देशं, देशात्कालं, स्वभावतः । विद्याद् दुष्परिहार्यत्वाद् गरीयस्तरमर्थवित् ॥ १४ ॥ वाय्वादिषु यथोक्तानां दोषाणां तु विशेषवित् । प्रतीकारस्य सौकर्ये विद्याल्लाघवलक्षणम् ॥ १५ ॥ विकृत हुए देश, काल, वायु, और जल इनमें कारण के विचार-अनुसार- किसका उत्कर्ष है इसका वर्णन करते हैं । यथार्थ तत्त्व को जानने वाला वैद्य स्वभाव से वायु से जल को, जल से देश को, देश से काल को बढ़ कर समझे । क्योंकि इनका त्याग नहीं किया जा सकता । यदि वायु खराब हो तो दूसरे स्थान पर सुगमता से जाया जा सकता है । जल तो जीवन के लिये सेवन करना आवश्यक है । यदि प्रयत्न से जल को भी छोड़ दें, देश से बचना कठिन है । देश से भी यदि देशान्तर में जायें तो काल से बचना अशक्य है । इसलिये सबसे अधिक प्रबल काल है । वायु, जल, देश और काल इन चारों के दोषों को दूर करने के उपाय जाने और दोषों के प्रतिकार के सुगम होने के कारक वैद्य इनके शान्ति के लक्षण भी जाने ॥ १३-१५ ॥
५०६ चरकसंहिता [ अ० ३ चतुर्ष्वपि तु दुष्टेषु कालान्तेषु यदा नराः । भेषजेनोपपाद्यन्ते न भवन्त्यातुरास्तदा ॥ १६ ॥ वायु आदि इन चारों के विकृत होने पर भी जब पुरुष औषध सेवन करते हैं तब रोगी नहीं होते ॥ १६ ॥ येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम् । कर्म पञ्चविधं तेषां भेषजं परमुच्यते ॥ १७ ॥ रसायनानां विधिवच्चोपयोगः प्रशस्यते । शस्यते देहवृत्तिश्च भेषजैः पूर्वमुद्धृतैः ॥ १८ ॥ जिन पुरुषों में मरण की समानता नहीं और न कर्मों की समानता है, उनके लिये तो वमन, विरेचन आदि पञ्च कर्म सबसे श्रेयस्कर उपाय हैं । इसके साथ में विधिपूर्वक रसायन (वृष्य प्रयोगों) का सेवन करना चाहिये । तथा व्यापत्ति से पूर्व एकत्र की हुई औषधियो (अन्न आदि) से शरीर का पालन करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥ सत्यं भूते दया दानं बल्यो देवतार्चनम् । सद्वृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः ॥ १९ ॥ हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् । सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम् ॥ २० ॥ संस्कथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम् । धार्मिकैः सात्त्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसंमतैः ॥ २१ ॥ इत्येतद्भेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम् । येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे ॥ २२ ॥ सत्य, प्राणियों में दया, दान, बलि, देवता की अर्चना, सद् वृत्त का पालन, इन्द्रियों को विषयों से रोकना, अपनी रक्षा, अविकृत (अच्छे, जहाँ बीमारी न हो) जनपदों (देशों) का सेवन करना, ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मचारियों का सेवन करना, उनके पास रहना, धर्मशास्त्रों की कथा तथा जितात्मा महर्षियों से बात- चीत करना, धार्मिक सत्त्वप्रकृति के वृद्धों के पास उठना-बैठना, (तथा दैव- व्यपाश्रय कर्म का सेवन), आयु की रक्षा के लिये औषध है। जिन लोगों की मृत्यु इस दारुण काल में निश्चित (अवश्यम्भावी) नहीं है, उन के लिये उप- रोक्त कर्म औषध हैं ॥१९-२२॥ इति श्रुत्वा जनपदोद्ध्वंसने कारणान्यात्रेयस्य भगवतः पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—अथ खलु भगवन् ! कुतो मूलमेषां वाय्वादीनां वैगुण्यमुत्पद्यते, येनोपपन्ना जनपदमुद्ध्वंसयन्तीति ॥२
अ० ३] विमानस्थानम् ५०७
अ० ३] विमानस्थानम् ५०७ जनपद-नाश के इन कारणों को सुन कर भी अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से पूछा—हे भगवन् ! वायु आदि में किस कारण से विगुणता उत्पन्न होती है, जिस से विकृत होकर ये जनपदों को नाश करते हैं ॥२३॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—सर्वेषामप्यग्निवेश ! वाय्वादीनां यद्वैगु- ण्यमुत्पद्यते तस्य मूलमधर्मः, तन्मूलं वाऽसत्कर्म पूर्वकृतम् । तयोर्योनिः प्रज्ञापराध एव । तद्यथा—यदा देश-नगर-निगम-जनपद-प्रधाना धर्म- मुत्क्रम्याधर्मेण प्रजां वर्तयन्ति, तदाश्रितोपाश्रिताः पौरजनपदा व्यवहा- रोपजीविनश्च तमधर्ममभिवर्धयन्ति, ततः सोऽधर्मः प्रसह्य धर्ममन्त- र्धत्ते, ततस्तेऽन्तर्हितधर्माणो देवताभिरपि त्यज्यन्ते, तेषां तथाऽन्तर्हित- धर्माणामधर्मप्रधानानामपक्रान्तदेवतानामृतवो व्यापाद्यन्ते, तेन नापो यथाकालं देवो वर्षति, न वा वर्षति, विकृता वा वर्षति, वाता न सम्यगभिवान्ति, क्षितिर्व्यापद्यते, सलिलान्युपशुष्यन्ति, ओषधयः स्वभावं परिहायाऽऽपद्यन्ते विकृतिम्, तत उद्ध्वंसन्ते जनपदाः स्पर्शाभ्य- वहार्यदोषात् ॥ २४ ॥ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा । इन वायु आदि सब में जो विगु- णता उत्पन्न होती है, उसका मूल कारण अधर्म है । इस अधर्म का मूल कारण पूर्व किये और असत् कर्म ( अहित कर्म ) हैं । इन दोनों अधर्म और असत् कर्मों की उत्पत्ति का कारण प्रज्ञापराध अर्थात् बुद्धि का दोष है । जिस समय देश, नगर, प्रान्त और जनपद के अध्यक्ष ( प्रधान शासक जन ) धर्मका अति- क्रमण करके अधर्म से प्रजाजनों के साथ व्यवहार करने लगते हैं, तब इन प्रधान जनों के आश्रित एवं पीछे चलने वाले नगर और जनपद वासी लोग तथा वाणिज्य व्यवहार वा अदालत द्वारा जीविका प्राप्त करने वाले मनुष्य इस अधर्म को और भी बढ़ाते हैं । इस प्रकार से बढ़ा हुआ अधर्म बलात् धर्म का लोप कर देता है । इस धर्म के लोप हो जाने से देवता लोग नागरिकों के लोगों का साथ छोड़ देते हैं, इस प्रकार से अधर्म की प्रधानता होने और देवता आदि का सहयोग छूट जाने पर ऋतुएं ( शीत, उष्ण आर वर्षा ) विकृत हो जाती हैं । इस से देव ( मेघ ) ठीक समय पर वर्षा नहीं करता, सर्वथा नहीं करता अथवा विकृत रूप में जल बरसता है, वायुएँ भी भली प्रकार नहीं चलतीं, भूमि बिगड़ जाती है, पानी सूख जाते हैं । औषधियां अपनी प्रकृति को छोड़ कर विकृति को प्राप्त हो जाती हैं । तब स्पर्श और आहार के दोष से जनपद नष्ट होने लगते हैं ॥ २४ ॥
५०८ चरकसंहिता [अ० ३] तथा शस्त्रप्रभवस्यापि जनपदोद्ध्वंसस्याधर्म एव हेतुर्भवति । तेऽतिप्रवृद्ध-लोभ-रोष-मोह-मानास्ते दुर्बलानवमत्याऽऽत्मस्वजनपरोप- घाताय शस्त्रेण परस्परमभिक्रामन्ति, परांश्वाऽतिक्रामन्ति, परैर्वाऽभि- क्राम्यन्ते ॥ २५ ॥ रक्षोगणादिभिर्वा विविधैर्भूतसङ्घैस्तमधर्ममन्यद्वाऽप्यपचारान्तर- मुपलभ्याभिहन्यन्ते ॥ २६ ॥ शस्त्र से होने वाले युद्ध आदि में भी जो जनपद का नाश होता है उस का भी कारण अधर्म ही है। जिन पुरुषों में लोभ, क्रोध, मान बहुत बढ़ा होता है, वे दुर्बल पुरुषों का तिरस्कार करके अपने और दूसरों के नाश के लिये परस्पर शस्त्रों से आक्रमण करते हैं। इस अवस्था में राक्षस आदि नाना प्रकार के भूत (प्राणि) समूह इस अधर्म या इसी प्रकार के अन्य अपचारों से इन पर आघात करते हैं ॥२५-२६॥ तथाऽभिशापप्रभवस्याप्यधर्म एव हेतुर्भवति । ये लुप्तधर्माणो धर्मा- दपेतास्ते गुरु-वृद्ध-सिद्धर्षि-पूज्यानवमत्याहितान्याचरन्ति, ततस्ताः प्रजा गुर्वादिभिरभिशप्ता भस्मतामुपयान्ति प्रागेवानेकपुरुषकुलविनाशाय नियतप्रत्ययोपलम्भाध्नियता अनियतप्रत्ययोपलम्भादनियताश्चापरे॥२७॥ इसी प्रकार अभिशाप से देश के नाश होने का भी मुख्य कारण अधर्म ही है। जिन देशों में धर्म लुप्त हो जाता है और जो धर्म से च्युत हो जाते हैं; वे गुरु, वृद्ध, सिद्ध, ऋषि, पूज्य पुरुषों का तिरस्कार करके अहित कार्यों का सेवन करने लगते हैं। तब वे प्रजाएं गुरुजनों से शप्त होकर शीघ्र ही भस्म हो जाती हैं। अनेक पुरुषों के कुल विनाश के लिए जहां विशेष पुरुषों के अपराध होते हैं वहां वे ही नष्ट होते हैं और जहां निश्चित कारण नहीं होता वहां अनियमित रूप से अनेक अन्य भी नष्ट हो जाते हैं ॥ २७ ॥ प्रागपि चाधर्मादृते नाशुभोत्पत्तिरन्यतोऽभूत् , आदिकाले ह्यदिति- सुतसमौजसोऽतिबलविपुलप्रभावाः प्रत्यक्ष-देवर्षि-धर्म-यज्ञ-विधि-विधा- नाः शैलेन्द्र-सार-संहत-स्थिर-शरीराः प्रसन्नवर्णन्द्रियाः पवन-सम-बल- जब-पराक्रमाश्चारुरुचिरोऽभिरूपप्रमाणाकृतिप्रसादोपचयवन्तः सत्या- र्जवानृशंस्य-दान-दम-नियम-तपउपवास-ब्रह्मचर्य-व्रतपरा व्यपगत- भय-राग-द्वेष-मोह-लोभ-क्रोध-शोक-मान-रोग-निद्रा-तन्द्रा- श्रम -क्लमा- लस्य-परिग्रहाश्च पुरुषा बभूवुरमितायुषः । तेषामुदारसत्त्वगुणकर्मणाम- चिन्त्य-रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव-गुण-समुदितानि प्रादुर्बभूवुः सस्यानि सर्वगुणसमुदितत्वात्पृथिव्यादीनां कृतयुगस्याऽऽदौ ।
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०९
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०९ रोग आदि की उत्पत्ति का मूल कारण—पहले भी अधर्म के बिना किसी अन्य कारण से रोग आदि अशुभों की उत्पत्ति नहीं हुई । कृतयुग में देवों के समान तेज-पराक्रम वाले, अति बलवान्, विशाल प्रभाव वाले, देव, देवर्षि, धर्म, यज्ञ विधि आदि सत्कर्मों को प्रत्यक्ष देखने वाले, पर्वत के समान दृढ, संगठित, स्थिर शरीर वाले, निर्मल वर्ण ( कान्ति ), और इन्द्रियों से युक्त, वायु के समान बल, वेग और पराक्रमवाले, सुन्दर नितम्बवाले, वायु के अनुकूल अवयव परिमाण, आकृति और प्रसादवाले और गुणों और पुष्टि से युक्त, सत्य, आर्जव ( ऋजुता, नम्रता ), अनृशंसता ( दया ), दम, दान, नियम, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य और व्रतो में तत्पर, भय, राग, द्वेष, मोह, लोभ, क्रोध, शोक, मान, रोग, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, क्लम, आलस्य, परिग्रह इन से रहित और अमित ( युगों के अनुसार दीर्घ ) आयु वाले पुरुष थे । सत्य युग के प्रारम्भ मे इन पुरुषों के उदारचित्त और गुणों, धार्मिक कर्मों के अचिन्त्य प्रभाव से पृथिवी आदि महाभूतो के सर्वगुणसम्पन्न होने से शस्य ( धान्य ) भी रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव और गुणों वाले उत्पन्न होते थे । भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिदत्यादानात्सांप्रतिकानां शरीरगौरव- मासीत् । शरीरगौरवात् श्रमः श्रमादालस्यं, आलस्यात् संचयः, संच- यात् परिग्रहः, परिग्रहाल्लोभः प्रादुर्भूतः कृते ॥२८॥ कृतयुग के उतरते हुए अन्तिम भाग से कुछ सम्पन्न धनो लोंगों के अति- भोजन से शरीर में भारीपन आ गया । शरीर में भारीपन आने से श्रम, श्रम से आलस्य, आलस्य से संचय ( इकट्ठा करने की बुद्धि ), संचय से परिग्रह ( ममता ) और परिग्रह से लोभ उत्पन्न हुआ ॥ २८ ॥ ततस्त्रेतायां लोभादभिद्रोहः, अभिद्रोहादनृतवचनं, अनृतवचनात्काम- क्रोध-मान-द्वेष-पारुष्याभिघात-भय-ताप-शोक-चित्तोद्वेगादयः प्रवृत्ताः । ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमगमत्, तस्यान्तर्धानात् ( युगवर्षप्रमा- णस्य पादह्रासः ) पृथिव्यादीनां गुणपादप्रणाशोऽभूत्, तत्प्रणाशकृतश्च सस्यानां स्नेह-वैमल्य-रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव-गुण-पाद-भ्रंशः । तत स्तानि प्रजाशरीराणि हीयमानगुणपादैश्चाऽऽहारविहारैर्यथापूर्वमुपष्ट- भ्यमानान्यग्निमारुतपरीवानि प्राग्यथाधिभिर्ज्वरादिभिराक्रान्तानि, अतः प्राणिनो ह्रासमवापुरायुषः क्रमश इति ॥ २९ ॥ फिर त्रेता में लोभ से अभिद्रोह, अभिद्रोह से असत्य भाषण, असत्य भाषण काम, क्रोध, मान, द्वेष, कठोर वचन, अभिघात ( परस्पर हिंसा ), भय,
५१० चरकसंहिता [ अ० ३ ताप, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि उत्पन्न हुए। इन के पीछे त्रेता में धर्म का एक चरण लोप हो गया। इस धर्म के एक पांव के लोप होने से आहार- विहार के गुणों का भी एक चतुर्थांश नष्ट हो गया। साथ में पृथिवी आदि के गुणों में भी एक चौथाई कमी आ गई। इस कमी के कारण धान्यों के स्नेह, निर्मलता, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव में भी चतुर्थांश घटती हो गई। इस से पुरुषों के शरीर के गुणों में चतुर्थांश की कमी होने से, आहार विहार के गुणों में भी घटती होने से, पूर्व युग के समान वे अग्नि, वायु वाले नहीं रहे। अग्नि, वायु के गुणों में भी कमी आ गई। इसलिये ज्वर आदि रोगों से प्रथम प्रथम आक्रान्त हुए। अतः कृतयुग से प्राणियों की आयु में एक एक चतुर्थांश की कमी हुई ॥ २९ ॥ भवतश्चात्र—युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते । गुणापादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ॥ ३० ॥ संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम् । देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते ॥ ३१ ॥ इति विकाराणां प्रागुत्पत्तिहेतुरुक्तो भवति । इस क्रम से प्रत्येक युग में धर्म का एक एक पाद (चतुर्थांश) क्षीण होता जाता है। इसी क्रम से पृथिवी आदि भूतों के गुणों में भी एक एक पाद की कमी होती जाती है। अर्थात् सत्य युग में चार पाद, त्रेता में तीन पाद, द्वापर में दो और कलियुग में एक पाद शेष रह जाता है। इस प्रकार से लोक प्रलय को प्राप्त होते हैं। जिस युग में मनुष्यों की आयु और युग का जो जो परिमाण है, उस युगमान के सौ वर्ष पूर्ण होने पर आयु का एक एक वर्ष कम हो जाता है। जैसे कलियुग में सौ वर्ष की आयु है। युगमान १०० वर्ष पूर्ण होने पर एक वर्ष कम होकर निन्यानवें (९९) वर्ष परमायु होती है। यह रोगों के प्रथम उत्पत्ति का कारण कह दिया ॥ ३१ ॥ एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—किं नु खलु भगवन् ! नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं न वेति ॥ ३२ ॥ इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा—भगवन् ! क्या आयु का समय और परिमाण सब निश्चित है या अनिश्चित ? ॥ ३२ ॥ भगवानुवाच—इहाग्निवेश ! भूतानामायुर्युक्तिमपेक्षते !॥ ३३ ॥ दैवे पुरुषकारे च स्थितं ह्यस्य बलाबलम् ।
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५११
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५११ भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! प्राणियों की आयु, दैव और पुरुषकार इन दोनों का योग चाहती है। इसलिये आयु का बल और अबल दैव और पुरुषार्थ पर स्थित है ॥ ३३ ॥ दैवमात्मकृतं विद्यात्कर्म यत्पौर्वदैहिकम् ॥ ३४ ॥ स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम् । बलाबलविशेषोऽस्ति तयोरपि च कर्मणोः ॥ ३५ ॥ अपने शरीर से जो कर्म पूर्व जन्म में किये हों उन को 'दैव' जाने। और इस जन्म में जो कर्म किया जाता है उसे पुरुषकार कहा है। इन दोनों प्रकार के कर्मों का विशेष बल और अबल होता है ॥ ३४-३५ ॥ दृष्टं हि त्रिविधं कर्म हीनं मध्यममुत्तमम् । यह कर्म भी तीन प्रकार का है। हीन, मध्यम और उत्तम । तयोरुदारयोर्युक्तिर्दीर्घस्य च सुखस्य च ॥ ३६ ॥ नियतस्याऽऽयुषो हेतुर्विपरीतस्य चेतरा । तीन प्रकार की आयु—दैव और पुरुषकार दोनों प्रकार के कर्म उत्तम होने से आयु का परिमाण अर्थात् नियत काल दीर्घ होता है। सुखकारक एवं हितकारक आयु मिलती है और यदि इन दोनों प्रकार के कर्मों में विपरीत युक्ति हो तो आयु अनियत, छोटी, दुःखी एवं अहितकारक रहती है ॥ ३६ ॥ मध्यमा मध्यमस्येष्टा,कारणं शृणु चापरम् ॥ ३७ ॥ दैवं पुरुषकारेण दुर्बलं ह्यपहन्यते । दैवेन चेतरत्कर्म विशिष्टेनोपहन्यते ॥ ३८ ॥ इन कर्मों में मध्यम बल हो तो आयु भी मध्यम प्रकार की रहती है। और भी कारण सुनो। जहां पर एक कर्म बलवान् हो, दूसरा निर्बल हो, वहां पर बलवान् दुर्बल कारण को दबा लेता है। इसलिये यदि पुरुषकार-कर्म बलवान् होगा तो निर्बल दैव को दबा लेगा और यदि दैव बलवान् होगा तो वह दूसरे कर्म (पुरुषकार) को नष्ट कर देगा। निर्बल को बलवान् दबा लेता है ॥३८॥ दृष्ट्वा यदेके मन्यन्ते नियतं मानमायुषः । कर्म किंचित् क्वचित्काले विपाके नियतं महत् । किंचित्त्वकालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते ॥ ३६ ॥ इस बात को देख कर कुछ विद्वान् आयु का परिमाण निश्चित मानते हैं । किसी बलवान् कर्म का तो किसी विशेष निश्चित समय में ही परिपाक होता है और किसी का विपाक काल अनिश्चित है, कभी भी उसका पाक हो सकता है ।
कौन कर्म कब पकेगा इस बात का निर्णय कारणों से किया जाता है। कभी सहकारी अन्य कारण को पाकर कर्म का पाक होता है। किया कर्म अवश्य भोगना पड़ता है। इस प्रकार कर्म के परिपाक काल के नियम और अनियत होने से आयु भी नियत तथा अनियत है ॥ ३६ ॥
तस्मादुभयहृष्टत्वादेकान्तग्रहणमसाधु । निदर्शनमपि चात्रोदाहरि- ष्यामः। यदि हि नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं स्यात्, तदायुष्कामानां न मन्त्रौषधि-मणि-मङ्गल-बल्युपहार-होम-नियम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्य- यन-प्रणिपात-गमनाद्याः क्रिया इष्टयश्च प्रयुज्येरन्, नोद्भ्रान्त-चण्ड-चपल- गो-गजोष्ट्र-खर-तुरग-महिषादयः पवनादयश्च दुष्टाः परिहार्याः स्युर्न प्रपात- गिरि-विषम-दुर्गाम्बुवेगास्तथा न प्रमत्तोन्मत्तोद्भ्रान्त-चण्ड-चपल-मोह- लोभाकुलमतयो नारयो न प्रवृद्धोऽग्निर्न च विविधविषाश्रयाः सरीसृपोर- गादयः, न साहसं नादेशकालचर्या, न नरेन्द्रप्रकोप इत्येवमादयो हि भावा नाभावकराः स्युः, आयुषः सर्वस्य नियतकालप्रमाणत्वात् ॥४०॥
इसलिये नियत और अनियत दोनों प्रकार की आयु के दीखने से कोई एक पक्ष अर्थात् आयु का नियत वा अनियत काल मानना यह ठीक नहीं है। इस के लिये उदाहरण भी देते हैं:-- यदि आयु का परिमाण नियत मान लिया जाय तो दीर्घायु चाहने वाले मनुष्य आयु को बढ़ाने वाले मंत्र, ओषधि, क्रिया, इष्टि, याग, मणि, मंगल, बलि, उपहार, नियम, प्रायश्चित, उपवास स्वस्त्ययन, प्रणिपात, गमनादि क्रियाओं को न किया करें। इसी प्रकार इधर उधर दौड़ते हुए भयानक, चपल, गौ, हाथी, ऊंट, गधे, घोड़े, भैंसे आदि तथा दुष्ट वायु आदि से कोई भी अपने को न बचावे, न कोई उन को दूर करने का यत्न करें। प्रपात (जल-प्रपात), पहाड़, कठिन दुर्ग, पानी के वेग से कोई अपने को न बचावें। मस्त, उन्मत्त, भ्रान्त, चण्ड, चपल, मोह, लोभ से व्याप्त बुद्धि वालों से अपने को न बचावें, शत्रु को भी निवारण न करें। तेज़ जलती अग्नि से कोई न डरे। विविध प्रकार के विषैले पदार्थों और सर्प आदि जन्तु- ओं से कोई भय न माने। अनुचित बल के आरम्भ से न बचे। देश काल के विपरीत आचरण से अपने को न बचावें। राजा का प्रकोप भी मृत्यु का कारण न बन सकें। इन समस्त कारणों से भी आयु का नाश न हो। क्योंकि सब की आयु का काल और परिमाण नियत है। आयु के नियत काल होने से यह कारण भी मारक नहीं बनने चाहियें। मृत्यु के भय से ही लोग इस कारणों बचते हैं ॥ ४० ॥
अ० ३ ] ३३ विमानस्थानम् ५१३
अ० ३ ] ३३ विमानस्थानम् ५१३ न चानभ्यस्ताकाल-मरण-भय-निवारकाणामकाउमरणभयमागच्छे- त्प्राणिनां, व्यर्थाश्चाऽऽरम्भकथाप्रयोगबुद्धयः स्युर्महर्षीणां रसायनाधिकारे, नापीन्द्रो नियतायुषं शत्रुं वज्रेणाभिहन्यात्, नाश्विनावातं भेषजेनोप- पादयेतां, न महर्षयो यथेष्टमायुस्तपसा प्राप्नुयुः, नच विदितवेदितव्या महर्षयः ससुरेशा रसायनादीनि सम्यक् पश्येयुरुपदिशेयुराचरेयुर्वा । अकाल मरण के भय का निवारण करने वाले अनभ्यासी प्राणियों को अकाल मृत्यु के कारणों से भय भी न हो। महर्षियों के रसायनाधिकार में कहे हुए उपदेश, प्रयोग और ज्ञान ये सब व्यर्थ हो जायें । नियत आयुशाले शत्रु को इन्द्र भी वज्र से नहीं मार सके। अश्विनीकुमार भी रोगी पुरुष की औष- धियों से चिकित्सा न कर सकें। और महर्षिगण तप द्वारा वांछित वर्षों तक की आयु भी प्राप्त न कर सके। सर्वज्ञ महर्षिगण इन्द्र के साथ आयुवर्धक समाय- नादि को न देखें, न उपदेश करें और न स्वयं व्यवहार करें । क्योकि आयु का काल और परिमाण तो निश्चित है । अपि च सर्वचक्षुषामेतत्परं यदैन्द्रं चक्षुः, इदं चास्माकं प्रत्यक्षं, यथा पुरुषसहस्राणामुत्थायात्थायाऽऽहवं कुर्वतामकुर्वतां चातुल्यायुष्ट्वं, तथा जातमात्राणामप्रतीकारात् प्रतीकाराच्चाविषविषप्राशिनां चाप्य- तुल्यायुष्ट्वं, न च तुल्यो योगः क्षेम उदपानघटानां चित्रघटानां चोत्सी- दतां, तस्माद्धितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययान्मृत्युः । सब आंखों से श्रेष्ठ प्रमाण यह इन्द्र ( आत्मा ) की आंख है—हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि हजारों मनुष्य प्रतिदिन उठ उठ कर शत्रों से लड़ाई करते हैं, नहीं भी करते हैं, उन सब की आयु तुल्य नहीं होती अर्थात् लड़ने वाले मरते और न लड़ने वाले नहीं मरते हैं। इसी प्रकार उत्पन्न हुए संन्यास रोहिणी आदि रोगों की जो तत्काल चिकित्सा कर लेते हैं वे बच जाते हैं और जो चिकित्सा नहीं करते वे मरते हैं। इसी प्रकार विष खाने वाले मरते हैं और विष नहीं खाने वाले नहीं मरते । पानी रखने या लाने के लिये जो पक्के घड़े बनाये जाते हैं उन का तथा चित्र घटों (कच्चे घड़ों) का योग-क्षेम समान नहीं हो सकता । वे समान काल तक स्थिर नहीं रह सकते । किन्तु रक्षण करने से कच्चे घड़े भी देर तक रह सकते हैं और न पालने से पके घड़े भी शीघ्र टूट जाते हैं। इसलिये हितकारी वस्तुओं वा कार्यों का सेवन करना ही जीवन का निमित्त है। इस के विपरीत अहिताचरण करना मृत्यु का कारण है । अपि च देशकालात्मगुणविपरीतानां कर्मणामाहारविहाराणां च
५१४ चरकसंहिता [अ० ३ क्रियोपयोगं सम्यक् सर्वतियोगसंधारणमसंधारणमुदीर्णानां च गति- मतां साहसानां च वर्जनमारोग्यानुवृत्तौ हेतुमुपलभामहे उपदिशामः सम्यक् पश्यामश्चेति ॥ ४१ ॥ और भी, देश, काल, आत्मा इन के गुणों के सात्म्य, कर्म तथा आहार द्रव्यों को विधिपूर्वक उपयोग करना, काल, कर्म और इन्द्रियार्थों के अयोग, मिथ्यायोग और अतियोग का त्याग, अनुपस्थित वेगों को रोकना ( बलात्कार से बाहर न करना) और उपस्थित वेगों को न रोकना और सब प्रकार के साहसिक कर्मों (अनुचित बल के कार्यों) का त्याग, ये सब बातें आरोग्य के संरक्षण में कारण होती हैं। इस स्वस्थवृत्त का हम भली प्रकार उपदेश करते हैं और इसे अच्छी प्रकार देखते भी हैं ॥४१॥ अतः परमग्निवेश उवाच—एवं सत्यनियतकालप्रमाणायुषां भग- वन् ! कथं कालमृत्युरकालमृत्युर्वा भवतीति ॥४२॥ इस के अनन्तर अग्निवेश बोले ! इस प्रकार से यदि आयु का समय अनिश्चित है, तब कालमृत्यु और अकालमृत्यु किस प्रकार होती है ? ॥४२॥ तमुवाच भगवानात्रेयः—श्रूयतामग्निवेश ! यथा यानसमायुक्तोऽक्षः प्रकृत्यैवाक्षगुणैरुपेतः ( स्यात्, संच ) सर्वगुणोपपन्नो वाह्यमानो यथा- कालं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छेत्, तथाऽऽयुः शरीरोपगतं बल- वत्प्रकृत्या यथावदुपचर्यमाणं स्वप्रमाणक्षयादेवावसानं गच्छति, स मृत्युः काले। भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश सुनो ! जिस प्रकार गाड़ी में लगा अक्ष (धुरा), धुरे के समस्त गुणों से युक्त होने पर भी अधिक भार आदि के न पड़ने से, ठीक समय में अपने परिमाण के क्षय होने पर घिसता २ टूट जाता है, उसी प्रकार शरीर से सम्बद्ध आयु भी बलवान् प्रकृति, युक्ति तथा स्वस्थवृत्त- विधि से पाली हुई, अपने समय में ही क्षय को प्राप्त होती है, इस मृत्यु को 'कालमृत्यु' कहते हैं। यथा च स एवाक्षोऽतिभाराधिष्ठितत्वाद्विषमपथादपथादक्षचक्र- भङ्गाद्द्वाह्यवाहकदोषादणिमोक्षात् पर्यसनादनुपाङ्गाच्चान्तरा व्यसनम् धत्ते, तथाऽऽयुरप्ययथाबलमारम्भादयथाग्न्यभ्यवहरणाद्विषमाभ्यवहर- णाद्विषमशरीरन्यासादमैथुनादसत्संश्रयादुदीर्णवेगविनिग्रहाद्विधार्य वेगाविधारणाद् भूतविषवाय्वग्न्युपतापादभिघातादाहारप्रतीका- र्जनाच्च यावदन्तरा व्यसनमापद्यते। तथा नियतायुष अन्तरा
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अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१५ राधाभिरुध्यन्ते । स मृत्युरकाले । तथा ज्वरादीनप्यात्वङ्गानन्मिथ्योपच- रितानकालमृत्यून् पश्याम इति ॥४३॥ और यदि इसी अक्ष पर बहुत अधिक भार रखा जाय, अथवा विषम मार्ग से, कुमार्ग से, धुरे या पहिये के टूटने से, बैल या वाहक ( सारथि ) के दोष से, आणि, धुरी में लगी कील के निकल जाने से, स्नेह न पड़ने से, गिरने से नियत समय से पूर्व ही टूट जाता है उसी प्रकार आयु भी साहसिक कार्यों से, अग्नि के अनुसार भोजन न करने या विषम भोजन करने से, अतिमैथुन से, उपस्थित वेगों को रोकने से, रोकने योग्य ( काम क्रोधादि ) वेगों को न रोकने से, शरीर को विषम स्थिति में रखने से ( उत्कट आसन बैठने से ), दुर्जनों का संसर्ग करने से, भूत, विष, वायु, अग्नि, ताप, चोट आदि से, आहार विधि के छोड़ने से, बीच में ही आयु समाप्त हो जाती है, इस का नाम 'अकाल-मृत्यु' है। इसी प्रकार ज्वर आदि रोगों की ठीक प्रकार से चिकित्सा न होने से इन से भी अकाल मृत्युएं होती देखते हैं ॥४३॥ अथाग्निवेशः पप्रच्छ—किं नु खलु भगवन् ! ज्वरितेभ्यः पानी- यमुष्णं भूयिष्ठं प्रयच्छन्ति भिषजो न तथा शीतम् । अस्ति च शीत- साध्यो धातुर्ज्वरकर इति ॥ ४४ ॥ इस के अनन्तर अग्निवेश ने पूछा—हे भगवन् ! वैद्य लोग ज्वर के रोगी को गरम पानी अधिकतः किस लिये देते हैं ? शीतल पानी उतना नहीं देते। शीत उपचार से भी ज्वरकारक धातु पित्त शान्त होता है ॥४४॥ तमुवाच भगवानात्रेयः,—ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकाला- नभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः । ज्वरो ह्यामाशयसमुत्थः प्रायो भेषजानि चाऽऽमाशयसमुत्थानां विकाराणां पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थं च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठम् । तच्चैषां पीतं वातमनुलोमयति, अग्निमुदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, स्वल्पमपि पीतं तृष्णाप्रशमनायोपपद्यते, तथायुक्त- मपि चैतन्नात्यर्थोत्सन्नपित्ते ज्वरे सदाहभ्रमप्रलापातिसारे वा प्रदेयम्, उष्णेन हि दाहभ्रमप्रलापातिसारा भूयोऽभिवर्धन्ते, शीतेनोपशाम्य- न्तीति ॥ ४५ ॥ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—ज्वर-रोगी के शरीर, निदान १ आमाशय से उत्पन्न विकारों में ) देश, काल को देखकर पाचन के लिये
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वैद्य लोग गरम पानी देते हैं। ज्वर की उत्पत्ति आमाशय से होती है। आमाशय से उत्पन्न होने वाले रोगों के लिये पाचन, वमन, अपतर्पण संशमन आदि उपचार प्रायः होते हैं। इसलिये ज्वर के रोगी को पाचन कराने के लिये वैद्य लोग गरम पानी अधिकतर देते हैं। यह पीया हुआ गरम पानी वायु का अनुलोमन करता है, जाठराग्नि को बढ़ाता है, शीघ्र पच जाता है, जीर्ण हो जाता है, कफ को सुखाता है और थोड़ा भी पिया हुआ गरम पानी प्यास को शान्त करने के लिये पर्याप्त होता है। यह गरम पानी इतना लाभप्रद होने पर भी जिस ज्वर में पित्त बहुत बढ़ा हो उस में और दाह, भ्रम, प्रलाप अथवा अतिसार की अवस्था में भी नहीं देना चाहिये। गरमी से दाह, भ्रम, प्रलाप और अतिसार और अधिक बढ़ते हैं। ये रोग शीत उपचार से शान्त होते हैं ॥ ४५ ॥ भवति चात्र—शीतेनोष्णकृतान् रोगान् शमयन्ति भिषग्वििदः । ये तु शीतकृता रोगास्तेषां चोष्णं भिषग्जितम् ॥ ४६ ॥ चिकित्सक ज्ञानी लोग गरमी (उष्णता) से उत्पन्न हुए रोगों को शीत चिकित्सा से शमन करते हैं और शीत कारण से उत्पन्न रोगों को उष्ण चिकि- त्सा से शान्त करते हैं अर्थात् निदान से विपरीत चिकित्सा करते हैं ॥ ४६ ॥ एवमितरेषामपि व्याधीनां निदानविपरीतमौषधं भवति कार्यम् । यथा—अपतर्पणनिमित्तानामपि व्याधीनां नान्तरेण पूरणमस्ति शान्ति- स्तथा पूरणनिमित्तानां नान्तरेणापतर्पणमिति ॥ ४७ ॥ इस प्रकार से अन्य रोगों में भी कारण के विपरीत चिकित्सा करनी होती है। जिस प्रकार कि अपतर्पण क्रिया से उत्पन्न रोगों की शान्ति संतर्पण क्रिया के बिना नहीं होती, उसी प्रकार संतर्पणजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण क्रिया के बिना नहीं होती ॥ ४७ ॥ अपतर्पणमपि च त्रिविधं लङ्घनं, लङ्घनपाचनं, दोषावसेचनं चेति ॥ ४८ ॥ अपतर्पण भी तीन प्रकार का है। (१) लंघन, (२) लंघन-पाचन और (३) दोषावसेचन (दोषों का बाहर निकालना) ॥ ४८ ॥ तत्र लङ्घनमल्पबलदोषाणां, लङ्घनेन ह्यग्निमारुतवृद्ध्या वाता- तपपरीतमिवल्पमुदकमल्पदोषः प्रतोषमापद्यते ॥ ४९ ॥ इन में जब दोषों का बल अल्प हो, तब लंघन करना चाहिये। लंघन