भारतकोश
संग्रह पर लौटें

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१७१. कल्याणधम्म जातक

दूसरा परिच्छेद ३. कल्याणधम्म वर्ग १७१. कल्याणधम्म जातक "कल्याण धम्मो " यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक बहरी सास के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में एक कुटुम्बिक रहता था। वह श्रद्धावान् था। वह प्रसन्न- चित्त था। वह त्रिशरण ग्रहण किए था और पञ्चशील भी। एक दिन वह घी आदि बहुत सी औषधियाँ,¹ पुष्प, सुगन्धियाँ तथा वस्त्र ले शास्ता से धर्म सुनने की इच्छा से जेतवन गया। उसके वहाँ गए रहने पर सास खाद्य-भोजन ले लडकी को देखने की इच्छा से लडकी के घर आई। वह थोडी बहरी थी। जब लडकी के साथ खाना खा चुकी, तो भोजनोपरान्त आराम करते हुए उसने लडकी से पूछा—'अम्म ! क्या तेरा पति तुझसे प्रसन्न है ? क्या वह विवाद न करता हुआ, प्रेमपूर्वक रहता है ?" 'अम्म ! क्या कहना ! जैसा तुम्हारा जँवाई है, वैसा शीलवान् तथा सदाचारी प्रव्रजित भी मिलना दुर्लभ है।" उस उपासिका ने लडकी की सारी बात पर भली प्रकार ध्यान न दे


¹ घी, मक्खन आदि औषध रूप से भिक्षु अपराह्न में भी ग्रहण कर सकता है।

कल्याणधम्म ] २१५ केवल 'प्रव्रजित' शब्द को सुन चिल्लाना शुरू किया—'धम्म ! तेरा स्वामी प्रव्रजित क्यों हो गया ?' उसकी बात सुन सारे घर वाले रोने लगे—'हमारा घर का मालिक प्रव्रजित हो गया ।' उनका रोना सुन दरवाजे से गुजरने वाले लोग पूछने लगे कि रो क्यों रहे हैं ? "इस घर का मालिक प्रव्रजित हो गया है ।' यह कुटुम्बिक भी बुद्ध का उपदेश सुन, विहार से निकल नगर में प्रविष्ट हुआ । एक आदमी ने उसे रास्ते में ही देख कर कहा—'सौम्य ! तेरे घर पर तेरे लड़के, स्त्री आदि सम्बन्धी रो रहे हैं कि तू प्रव्रजित हो गया है।' उसने सोचा—मैं प्रव्रजित नहीं हूँ, तो भी मुझे लोग प्रव्रजित समझ रहे हैं। मेरी प्रशंसा होने लगी है। इसे गँवाना नहीं चाहिए। आज ही मुझे प्रव्रज्या ग्रहण करनी चाहिए। वह वहीं से वापिस लौट कर शास्ता के पास गया। शास्ता ने पूछा— "उपासक ! अभी तू बुद्ध की सेवा म आकर लौटा, और तुरन्त फिर आया है ?" उसने वह बात कह निवेदन किया—"भन्ते ! मेरी प्रशंसा होने लगी। है। उस शुभ-नाम को गँवाना नहीं चाहिए। इसलिए मैं प्रव्रजित होने की इच्छा से आया हूँ।" प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त कर वह अच्छी तरह से जीवन व्यतीत करता हुआ थोड़ी ही देर में अर्हत् हुआ । यह बात भिक्षुसंघ में प्रकट हुई। एक दिन धर्म-सभा में भिक्षुओ ने बात- चीत चलाई—"आयुष्मानो ! अमुक कुटुम्बिक ने सोचा कि उसकी जो प्रशंसा होने लगी है, उस शुभ-नाम का लोप नहीं होना चाहिए। वह प्रव्रजित होकर अर्हत् हो गया ।" शास्ता ने आकर पूछा—' भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर, शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, पुराने समय में पण्डित जन भी यही सोच कर कि जो प्रशंसा होने लगे उस शुभ-नाम का लोप नहीं होने देना चाहिए प्रव्रजित ही हुए ।' इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा

२१६ [ २३।७१ ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणशी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व एक सेठ के घर में पैदा हुए। बड़े होने पर पिता के मरने के बाद सेठ का पद मिला। वह एक दिन घर से निकल राजा की सेवा में पहुॅचा। उसकी सास अपनी लड़की को देखने की इच्छा से उसके घर आई। वह थोड़ी बहरी थी। आगे की सब कथा 'वर्तमान-कथा' सदृश ही है। उसे राजा की सेवा करके अपने घर लौटते समय एक आदमी ने देख कर कहा—'तुम्हारे घर पर सब लोग रो पीट रहे हैं कि तुम प्रव्रजित हो गए।' बोधिसत्त्व ने सोचा कि जो प्रशंसा होने लगी है, उस शुभ-नाम को नष्ट नहीं होने देना चाहिए। वह वहीं से लौट कर राजा के पास पहुँचे। राजा ने पूछा— "महासेठ ! अभी जाकर अभी फिर क्या लौट आए ?" "देव ! घर के लोग मुझ अप्रव्रजित को ही प्रव्रजित हुआ समझ कर रोते पीटते हैं। यह जो मुझे शुभ-नाम मिला है, इसको लुप्त होने देना ठीक नहीं। मैं प्रव्रजित होऊँगा। मुझे प्रव्रजित होने की आज्ञा दें।" सेठ ने इस भाव को प्रकट करने वाली दो गाथाएँ कहीं— कल्याणधम्मोति यदा जनिन्द लोके समञ्ञा अनुपापुणाति, तस्मा न हीयेय नरो सपञ्जो हिरियापि सन्तो धुरमादियन्ति ॥ सायं समञ्ञा इध मञ्ज पत्ता कल्याणधम्मोति जनिन्द लोके, ताहं समेक्ख इध पब्बजिस्स नहि मत्थि छन्दो इध कामभोगे ॥ [ हे राजन् ! जब लोक में किसी की कीर्ति होती है, उसे शुभ-नाम मिलता है, तो बुद्धिमान् आदमी को उसे छोड़ना नहीं चाहिए। श्रेष्ठ पुरुष लज्जा से भी (प्रव्रज्या ) धुर को प्राप्त करते हैं।

दद्दर ] २१७ हे राजन ! आज मुझे वह कीर्ति उत्पन्न हुई है, शुभ-नाम मिला है। उसे देखकर मैं प्रव्रजित होऊँगा । मुझे काम-भोगो की इच्छा नही रही है।] कल्याण धम्मो, सुन्दर धर्म, समञ्ञ अनुपापुणाति जब शीलवान, सदाचारी, वा प्रव्रजित इस प्रकार की कीर्ति तथा लोक-व्यवहार आरम्भ हो जाता है। तस्मा न हीयेय, उस श्रमणत्व (की ख्याति) से न हटे । हिरियापि सन्तो धुर- मादियन्ति, महाराज ! सत्पुरुष अपने अन्दर से उत्पन्न लज्जा से, बाह्य-निन्दा से पैदा हुए भय से भी इस प्रव्रज्या को ग्रहण करते हैं। इध मज्ज, यहाँ मेरे द्वारा आज ताह समेक्ख मैं उस श्रमणत्व को गुण- रूप से देखता हुआ नत्थि मय्हि छन्दो, मुझ में इच्छा नही है, इध कामभोगे, इस दुनिया में वस्तु-कामना वा कामेच्छा । बोधिसत्त्व ने यह कह राजा से प्रव्रज्या की आज्ञा ली। फिर हिमालय- प्रदेश में जा ऋषि-प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर ब्रह्म-लोक गामी हुए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था। १७२. दद्दर जातक को नु सद्देन महता, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोकालिक भिक्षु के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

२१८ [ २३।७२ क. वर्तमान कथा उस समय दोव बहुश्रुत भिक्षुसघ के बीच में ऐसे पाठ करते थे जैसे मनो- शिला के नीचे तरुण सिंह गर्ज रहा हो, अथवा आकाश से गङ्गा उतारी जा रही हो। मोकालिक भिक्षु अपने तुच्छ-ज्ञान पर विचार न कर जिस समय भिक्षु पाठ करते थे, स्वय भी पाठ करने की इच्छा से भिक्षुओ के बीच में जाकर सघ का नाम न ले कहता कि भिक्षु मुझे पाठ करने नही देते, यदि पाठ करने दें तो मैं भी पाठ करूँ। इस प्रकार यह जहाँ तहाँ कहता हुआ घूमता था। उसकी यह बात भिक्षुसघ में प्रगट हो गई। भिक्षुओ ने सोचा इसकी परीक्षा करें। इस विचार से उन्होने कहा—"आयुष्मान् ! कोकालिक ! आज सघ के सम्मुख पाठ कर।" उसने अपना बल न पहचान कर स्वीकार कर लिया कि मै आज सघ के सम्मुख पाठ करूँगा। तब उसने अपने को अनुकूल पडने वाला यवागु पिया। भोजन किया। अनुकूल दाल भी ली। सूर्यास्त होने पर धर्म सुनने के समय सूचना देने पर भिक्षुसघ एकत्र हुआ। वह कुरण्ड-पुष्प सदृश काषाय-वस्त्र पहन घोर कनेर पुष्प सदृश लाल चीवर ओढ सघ के बीच जा, स्थविरो को प्रणाम कर, अलकृत रत्न-मण्डप के बीच बिछे हुए श्रेष्ठ आसन पर चढ चित्रित पखा हाथ में ले पाठ करने के लिए बैठा। उसी समय उसके शरीर से पसीना बहने लगा। वह लज्जित हो गया। वह पूर्व-गाथा¹ का प्रथम पाद भर कह सका। उसके आगे उसे नहीं सूझा। वह काँपता हुआ आसन से उतर आया। लज्जित हो सघ के बीच से गुजर वह अपने परिवेण में चला गया। किसी दूसरे ही बहुश्रुत भिक्षु ने पाठ किया। उस समय से भिक्षु जान गए कि वह अज्ञानी है। एक दिन भिक्षुओ ने धर्मसभा में बात चलाई—"आयुष्मनो ! पहले ¹ धर्मोपदेश देने के लिए जिस गाथा का आधार लिया जाता है।

यह कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।

दद्दर ] २१६ कोकालिक के ज्ञान की तुच्छता अज्ञात थी। अब इसने अपने ही बोलकर उसे प्रकट कर दिया।" शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर शास्ता ने कहा—"भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक ने बोलकर अपने आपको प्रकट किया है, पहले भी बोलकर प्रकट किया है।" यह कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय मे बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व हिमालय-प्रदेश में सिंह के रूप में पैदा हुए। वह बहुत से सिंहो के राजा बने। अनेक सिंहो के साथ वह रजत-गुफा में रहते थे। उसके पास ही एक गुफा में एक सियार रहता था। एक दिन वर्षा के हो चुकने पर सब सिंह सिंहराज के गुफा-द्वार पर इकट्ठे हो सिंह-नाद करते हुए सिंह-क्रीडा करने लगे। उनके इस प्रकार दहाड़ते हुए क्रीडा करने के समय वह सियार भी चिल्लाया। सिंहो ने जब उसकी आवाज सुनी तो वह यह सोचकर लज्जा के मारे चुप हो गए कि यह सियार भी हमारे साथ आवाज लगा रहा है। उनके चुप हो जाने पर बोधिसत्त्व के पुत्र सिंह-बच्चे ने पूछा—"तात ! यह सिंह दहाड़ दहाड़ कर सिंह-क्रीडा करते हुए किसी एक की आवाज सुनकर लज्जा से चुप हो गए। यह कौन है जो अपने शब्द से अपने को प्रकट कर रहा है ?" इस प्रकार पिता से पूछते हुए सिंह-बच्चे ने पहली गाथा कही— को नु सद्देन महता अभिनादेति दद्दरं किं सीहा न पटिनदन्ति को नामेसो मिगाधिभू ॥ [ हे मृगराज ! यह कौन है जो बड़े शब्द मे दद्दर पर्वत को गुंजा रहा है ? यह कौन है जिसके कारण सिंह नही बोलते है ? ] अभिनादेति दद्दरं, दद्दर पर्वत को गुंजा रहा है। मिगाधिभु पिता को सम्बोधन करता है। यहाँ यह अर्थ है। मिगाधिमु ! मृग-ज्येष्ठ ! सिंह- राज ! मै तुम्हे पूछता हूँ कि यह कौन है ?

२२० [ २.३.१७३ उसकी बात सुन पिता ने दूसरी गाथा कही— अधमो मिगजातानं सिगालो तात वस्सति जातिमस्स जिगुच्छन्ता तुण्ही सीहा समच्छरे ॥ [तात ! पशुओ में जो सबसे नीच शियार है वही चिल्लाता है। सिंह उसकी जाति से घृणा करने के कारण चुप हो गए हैं।] समच्छरे, सं केवल उपसर्ग है । अच्छा समझते हैं अर्थ है । तुण्ही, बैठते हैं, चुप होकर बैठते हैं, यही अर्थ है । पुस्तको में समच्छरे लिखते हैं। शास्ता बोले—"भिक्षुओ ! कोकालिक ने केवल अभी अपनी वाणी से अपने को प्रकट नहीं किया, पहले भी किया ही है।" यह धर्म-देशना ला शास्ता ने जातक का मेल बैठाया । उस समय सियार कोकालिक था। सिंह-बच्चा राहुल । सिंह-राज मैं ही था। १७३. मक्कट जातक "तात ! माणवको एसो..." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोंगी के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह कथा प्रकीर्णक परिच्छेद की उद्दालक जातक' मे आएगी । उस 'उद्दालक जातक (४८७)

कथा कही।

मक्कट ] २२१ समय शास्ता ने 'भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल अभी ढोगी नही है, इसने पहले भी जब यह बन्दर था अग्नि के लिए ढोग किया है', कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसो मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व किसी काशी-ग्राम मे ब्राह्मण कुल मे पैदा हुए। बडे होने पर तक्षशिला जा विद्या सीख घर बसाया। उसकी ब्राह्मणी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब लडका दौडने भागने लग गया, तो वह मर गई। बोधिसत्त्व ने उसका शरीर-कृत्य करके सोचा, अब मुझे घर में रहने से क्या लाभ ? मै पुत्र को लेकर प्रव्रजित हो जाऊँ। रोते हुए रिश्तेदारो तथा मित्र-समूह को छोड वह पुत्र को ले हिमालय मे प्रविष्ट हुआ। वहाँ ऋपियो के ढग से प्रव्रजित हो फल-मूल खाता हुआ रहने लगा। एक दिन वर्षा ऋतु में जब वर्षा हुई, तो वह सूखी लकडियाँ जलाकर आग तापते हुए एक तख्ते पर लेटा था। इसका पुत्र तपस्वी-कुमार भी इसके पैरो को दबाता हुआ बैठा था। एक जगली बन्दर ने शीत से पीडित हो उस पर्ण-कुटी में आग देख कर सोचा—"यदि मैं यहाँ प्रवेश करूँगा, तो 'बन्दर है, बन्दर है' कह मुझे पीट कर निकाल देंगे। मुझे आग तापना न मिलेगा। एक उपाय है। मै तपस्वी-वेश बना ढोग करके प्रवेश करूँ।" उसने एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र पहन लिए। फिर खारी ले, पर्ण-कुटी के द्वार पर एक ताड-वृक्ष के नीचे सिकुड कर बैठा। तपस्वी-कुमार ने उसे देख, बन्दर न समझ सोचा—शीत से पीडित एक बूढा तपस्वी आग तापने आया होगा। तपस्वी को कह कर इसे पर्ण-कुटी मे ला आग तपवाऊँ। उसने पिता को सम्बोधन कर यह पहली गाथा कही— तात ! माणवको एसो तालमूल अपस्सितो, अगारफञ्च्चिदं अत्थि हन्द देमस्स गारक ॥

२२२ [ २.३.१७३ [ तात ] यह एक माणवक ताड-वृक्ष को आश्रय करके बैठा है। यह घर है। हन्त ! हम इसे गृह दे । ] माणवको एसो, प्राणी वाची शब्द है। तात ! यह एक माणवक प्राणी है। 'एक तपस्वी है' यही प्रकट करता है। तालमूलं अपस्सितो, ताड के वृक्ष के आश्रय है। अगारकञ्चिद अत्थि, यह हमारा प्रव्रजितो का घर है। पर्ण- कुटी को लेकर कहा है। हन्द, निश्चय के अर्थ में निपात है। वेमस्सगारकं, इसे एक कोने में रहने के लिए घर दें। बोधिसत्त्व ने पुत्र की बात सुन उठकर पर्ण-कुटी के दरवाजे पर खडे हो देखकर पहचान लिया कि वह बन्दर है। उन्होने कहा—'तात ! मनुष्यों का मुंह ऐसा नहीं होता। यह बन्दर है। इसे यहाँ नहीं बुलाना चाहिए।' यह कहते हुए दूसरी गाथा कही— मा खो तं तात ! पक्कोसि दूसेय्य नो अगारकं नेतादिस मुखं होति ब्राह्मणस्स सुसीलिनो ॥ [ तात ! इसे मत बुला । यह हमारे घर को खराब कर देगा। सदाचारी ब्राह्मण का ऐसा मुंह नही होता । ] दूसेय्य नो अगारकं, यह यहाँ प्रवेश पाकर इस कठिनाई से बनाई हुई पर्ण-कुटी को या तो आग से जलाकर अथवा मल त्याग कर खराब कर दे सकता है। नेतादिसं शीलवान् ब्राह्मण का ऐसा मुंह नहीं होता। 'यह बन्दर है' कह बोधिसत्त्व ने एक जलती हुई लकडी फेंकी कि यहाँ क्यो बैठा है ? इस प्रकार उसे भगा दिया। बन्दर वल्कल वस्त्र छोड वृक्ष पर चढ वन में चला गया। बोधिसत्त्व चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर यह ढोंगी भिक्षु था। तपस्वी-कुमार राहुल। तपस्वी तो मैं ही था।

१७४. दुब्बभियमक्कट जातक

दुब्बभियमक्कट ] २२३ १७४. दुब्बभियमक्कट जातक “अदम्हु ते वारि बहूतहूपं...” यह शास्ता ने वेणुवन में रहते समय देवदत्त के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा एक दिन धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षु देवदत्त के अकृतज्ञता तथा मित्र-द्रोही भाव की चर्चा कर रहे थे। शास्ता ने कहा—“भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त अकृतज्ञ तथा मित्र-द्रोही है। पहले भी यह ऐसा ही था।” इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व किसी काशीग्राम में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर घर बसाया। उस समय काशी राष्ट्र की एक बड़ी चलने वाली सड़क पर एक गहरा कुआँ था। जानवरो की उस तक पहुँच नही हो सकती थी। इसलिए रास्ता चलने वाले पुण्यार्थी मनुष्य, लम्बी रस्सी बँधे बर्तन से पानी निकाल एक द्रोणी में भर जानवरो को पानी पिलाते थे। उसके चारो तरफ भारी जगल था। उसमें बहुत से बन्दर रहते थे। दो तीन दिन उस मार्ग से आदमियो का आना जाना न हुआ। जानवरो को पानी न मिला। एक प्यासा बन्दर पानी खोजता हुआ कुएँ के आस पास घूमता था। बोधिसत्त्व किसी काम से उस रास्ते से आए। जब वह वहाँ जा, पानी निकाल, पी, हाथ पाँव धो कर खड़े थे, उन्होने उस बन्दर को देखा। ज यह जानकर कि वह प्यासा है उन्होने पानी निकाल द्रोणी में डाल कर उसे दिया। पानी देकर वह विश्राम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे लेटे।

२२४ [ २.३.१७४

बन्दर ने पानी पी, पास बैठ नकल बनाते हुए, बोधिसत्त्व को डराया। बोधिसत्त्व ने उसकी वह करतूत देख 'अरे दुष्ट बन्दर ! मैंने तुझे प्यास से कष्ट पाते हुए को पानी दिया। तू मुझे चिढाता है ? अहो ! पापी पर किया गया उपकार निरर्थक होता है" कहते हुए पहली गाथा कही— अदम्ह ते वारि बहूतरूपं घम्माभितत्तस्स पिपासितस्स सो दानि पीत्वान किंकि करोसि, असङ्कमो पापजनेन सेय्यो ॥ [ धूप से तप्त तुझ प्यासे को हमने बहुत सा पानी दिया । अब तू पानी पी कर चिडाने के लिए 'किं किं' आवाज करता है। पापी से दूर रहना ही अच्छा है। ] सो दानि पीत्वान किंकि करोसि, सो अब तू मेरा दिया हुआ पानी पीकर (मुझे) चिढ़ाता हुआ 'किंकि' आवाज करता है। असङ्कमो पापजनेन सेय्यो, पापी जन के साथ मिलना अच्छा नहीं। दूर रहना ही अच्छा है।

उसे सुन वह मित्र-द्रोही बन्दर बोला—क्या तू समझता है कि यह इतने से ही समाप्त हो गया ? अब तेरे सिर पर पाखाना करके जाऊँगा। यह कहते हुए उसने दूसरी गाथा कही। को ते सुतो वा दिट्ठो वा सीलवा नाम मक्कटो इदानि खो तं ऊहच्च एसा अस्माक धम्मत्ता ॥ [तूने कौन सा बन्दर सदाचारी है, सुना वा देखा ? अभी मैं तुझे मैला करके (जाऊँगा) यही हमारा स्वभाव है। ] अधिप्पार्थ यह है—रे ब्राह्मण मक्कटो कृतज्ञ, सदाचारी शीलवा नाम है यह तूने कहाँ सुनो वा दिट्ठो वा ? इदानि खो में तं ऊहच्च तेरे सिर पर

आदिच्चुपट्ठान ] २२५ पाखाना करके चला जाऊंगा। अस्माकं हि बन्दरो का ऐसा धम्मता, यह जातीय स्वभाव है कि हमें उपकार करने वाले के सिर पर मल त्यागना चाहिए। इसे सुन बोधिसत्त्व उठकर चलने लगे। बन्दर उसी क्षण उछल, शाखा पर बैठ, सरकी छोड़ने की तरह उसने सिर पर पाखाना गिरा, चिल्लाता हुआ वन में घुस गया। बोधिसत्त्व नहा कर चले गए। शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त अकृतज्ञ है। पहले भी मेरे किए उपकार को नही जानता था। इतना कह, यह धर्मदेशना ला शास्ता ने जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर देवदत्त था। ब्राह्मण मैं ही था। १७५. आदिच्चुपट्ठान जातक “सब्बेसु किर भूतेसु . .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोगी के बारे में कही। वर्तमान-कथा उक्त कथा ही की तरह है। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी-राष्ट्र में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा, विद्या सीख, ऋषियों की प्रव्रज्या के ढंग पर प्रव्रजित हुए। अभिज्ञा और समापत्तियां प्राप्त कर, अनेक अनुयायियों के साथ उनके गण-शास्ता बन, हिमालय में रहने लगे। वह वहाँ चिरकाल तक रह कर, निमक-खटाई खाने के लिए पर्वत से उतर प्रत्यन्त-देश में किसी ग्राम के पास एक पर्णकुटी में रहने लगे। १५

२२६ [ २.३.१७५

जिस समय ऋषि-गण भिक्षा के लिए जाते, एक लोभी बन्दर आश्रम पर आकर पर्ण-कुटी का फूस उजाड देता, पानी के घडो मे से पानी गिरा देता। कुण्डियाँ तोड देता और अग्नि-शाला में पाखाना कर देता। तपस्वियो ने वर्षा भर रह कर सोचा कि अब हेमन्त ऋतु आ गई है। फल फूल बहुत हो गए है। (प्रदेश) रमणीय है। यही चलकर रहें। उन्होने प्रत्यन्त-गांव के वासियों से विदा माँगी। मनुष्य बोले—भन्ते ! हम कल आश्रम पर भिक्षा लेकर आएंगे। उसे ग्रहण कर जाएँ। दूसरे दिन वे बहुत सारा खाद्य-भोज्य लेकर वहाँ पहुँचे। उसे देख बन्दर ने सोचा मैं भी ढोंग करके मनुष्यो को प्रसन्न कर अपने लिए खाद्य-भोज्य मँगवाऊँ। वह तप करते तपस्वी की तरह हो, सदाचारी की तरह हो, तपस्वियो से कुछ ही दूर पर सूर्य्य को नमस्कार करता हुआ खडा हुआ। मनुष्यो ने उसे देख सोचा कि सदाचारियो के पास रहने वाले सदाचारी होते है और पहली गाथा कही— सब्बेसु किर भूतेसु सन्ति सीलसमाहिता, पस्स साखामिगं जम्मं आदिच्चमुपतिट्ठति ॥ [ सभी प्राणियो में सदाचारी होते हैं। सूर्य्य की पूजा करते हुए नीच बन्दर को देखो।] सन्ति सीलसमाहिता, शील से युक्त है, शीलवान तथा समाहित या एकाग्रचित्त हैं, यह भी अर्थ है। जम्म नीच, आदिच्चमुपतिट्ठति, सूर्य्य को नमस्कार करते हुए ठहरा है। इस प्रकार उन मनुष्यो को उसकी प्रशंसा करते देख बोधिसत्त्व ने कहा कि तुम इस लोभी बन्दर के आचरण को न जानकर अयोग्य-जगह में ही श्रद्धा- वान् हुए हो, और यह दूसरी गाथा कही— नास्स सील विजानाथ अनञ्ञाय पसंसथ अग्गिहुत्तञ्च ऊहन्त द्वे च भिन्ना कमण्डलु ॥

कळायमुट्ठि ] २२७ [ तुम इसके स्वभाव को नही जानते । बिना जाने ही प्रशंसा कर रहे हो । इसने अग्नि-शाला खराब कर दी और दो कमण्डल तोड़ डाले । ] अनञ्जाय बिना जाने । ऊहन्त इस दुष्ट बन्दर द्वारा मैली की गई। कमण्डलु कुण्डी, द्वे च कुण्डियां उसके द्वारा भिन्ना । इस प्रकार उसने दुर्गुण कहे । मनुष्यो ने बन्दर का ढोग जान, ढेले और लाठियाँ ले, पीट कर भगा दिया। तब ऋषिगण को भिक्षा दी। ऋषि भी हिमालय प्रदेश में ही जा ध्यानावस्थित हो ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर यह ढोंगी था। ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। गण- शास्ता तो मैं ही था। १७६. कळायमुट्ठि जातक "बालो यतायं दुमसारगोचरो . . ." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय कोशल नरेश के बारे में कही। क. वर्तमान कथा एक बार वर्षा ऋतु के समय कोशल नरेश के इलाके में बग़ावत हुई। वहाँ जो योद्धा थे, उन्होने दो तीन युद्ध किए। जब वह शत्रुओ को न जीत सके तो उन्होने राजा के पास सन्देश भेजा। राजा वर्षा-ऋतु में असमय में ही निकल पड़ा। जेतवन के समीप पड़ाव डलवाकर उसने सोचा—मैं असमय में निकल पड़ा हूँ। कन्दराएँ और

दरारे पानी से भरी हैं। मार्ग दुर्गम है। मैं शास्ता के पास जाता हूँ। वे मुझे पूछेंगे, 'महाराज ! कहाँ जाते हो ?' मैं उन्हें यह बात कहूँगा। शास्ता मुझे केवल पारलौकिक उपदेश ही नहीं देते हैं। वह मुझे इस लोक में भी लाभ की बात बताते हैं। इसलिए यदि जाने से मेरी हानि होती होगी तो वह कह देंगे, 'महाराज ! यह असमय है।' यदि लाभ होगा, तो वह चुप रहेंगे। वह जेतवन जा शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा--महाराज ! दिन चढ़े तुम कैसे आए ? भन्ते ! मैं इलाके को शान्त करने के लिए निकला हूँ। तुम्हें प्रणाम करके जाने की इच्छा से आया हूँ। शास्ता न कहा--'महाराज ! पूर्व समय में भी सेना के तैयार होने पर, पण्डितो का कहना मान राजा लोग असमय में सेना को चढ़ा कर नहीं ले गए।' फिर उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसके अर्थ-धर्मानुशासक सर्वार्थ-अमात्य थे। राजा के इलाके के बगावत करने पर प्रत्यन्त के योद्धाओ ने सन्देशा भेजा ! राजा वर्षा ऋतु में निकला। उसका पड़ाव उद्यान में लगा। बोधिसत्त्व राजा के पास खड़े थे। उस समय घोडो के लिए मटर भिगो, ला कर द्रोणियो में डाल रहे थे। उद्यान के बन्दरो में से एक बन्दर वृक्ष से उतरा। उसने वहाँ से मटर लिए, मुँह भरा, हाथ भी भरे और कूद कर वृक्ष पर चढ़ खाना शुरू किया। खाते समय उसके हाथ से एक मटर भूमि पर गिर पड़ा। वह हाथ में और मुंह में जितने मटर थे उन्हें छोड़ वृक्ष से उतर उस मटर को ढूंढने लगा। जब उसे वह मटर नहीं दिखाई दिया तो वह फिर वृक्ष पर चढा और वहां जुए मे हजार हार गए की तरह चिन्ता करता हुआ रोनी शकल बना वृक्ष की शाखा पर बैठा। राजा ने बन्दर की करतूत देख बोधिसत्त्व को सम्बोधन कर पूछा— 'मित्र ! बन्दर ने यह क्या किया ?' बोधिसत्त्व ने कहा—'महाराज !

कळायमुट्ठि ] २२६ बहुत की ओर ध्यान न दे थोडे की ओर ध्यान देने वाले दुर्बुद्धि मूर्ख जन ऐसा करते ही हैं।' इतना कह, पहली गाथा कही— बालो यतायं दुमसाखगोचरो पञ्ञा जनिन्द ! नयिमस्स विज्जति, कळायमुट्ठिं अवकिरिय सेयतं एकं कळायं पतितं गवेसति ॥ [ राजन् ! यह वृक्षों की शाखाओ पर घूमने वाला बन्दर मूर्ख है। इसे प्रज्ञा नहीं है। यह मटर की सारी मुट्ठी को बगेर कर गिरे हुए एक मटर को खोजता है।] दुमसालगोचरो बन्दर, यह वृक्षों की शाखा पर रहता है, इसके रहने की जगह इसके घूमने की जगह है, इसलिए वृक्षों की शाखा पर घूमने वाला कहलाया। जनिन्द, राजा को सम्बोधन करता है, परम ऐश्वर्यशाली होने से, राजा जनता के इन्द्र हैं; इसीलिए जनिन्द। कळायमुट्ठि मटर की मुट्ठि, काले मास की मुट्ठि भी कहते हैं। अवकिरिय वखेर कर सेयतं सय गवेसति भूमि पर गिरे एक ही मटर को खोजता है। ऐसा कहकर बोधिसत्त्व ने फिर राजा को सम्बोधन कर दूसरी गाथा कही— एवमेव मयं राज ! ये चञ्ञे अतिलोभिनो अप्पेन बहुजिज्याम कळायेनेव वानरो ॥ [ इसी प्रकार हे राजन ! हम और दूसरे अत्यन्त लोभी लोग थोडे के लिए बहुत की हानि कर देते हैं; जैसे बन्दर ने एक मटर के लिए।] सक्षिप्तार्थ इस प्रकार है—महाराज ! एवमेव मयं और अञ्ञे च सभी लोभी जन अप्पेन बहुं जिज्याम हम ही अब इस वर्षा काल में, इस अयोग्य समय में रास्ते पर चलकर थोडे से लाभ के लिए बहुत सी हानि करेंगे। कळायेनेव वानरो जैसे इस बन्दर ने एक मटर को ढूँढते हुए, उस एक मटर

२३० [ २.२.१७७ के कारण सब मटर गंवाए, उसी प्रकार हम भी असमय में जब कन्दराएँ और दरारें पानी से भरी हैं, छलने पर छोटे से लाभ के लिए बहुत से हाथी घोड़ों तथा सेना को गँवाएँगे। इसलिए असमय में जाना उचित नहीं। यूँ राजा को उपदेश दिया। राजा उसकी बात सुन वहीं से लौट कर वाराणसी नगर में वापिस चला गया। चोरों ने सुना कि राजा चोरों को दबाने के लिए नगर से निकल पड़ा है, ये इलाके से भाग गए। वर्तमान समय में भी चोरों ने जब यह सुना कि कोशल राजा निकल पड़ा है, वह भाग गए। राजा ने शास्ता का धर्मोपदेश सुना। फिर आसन से उठ, प्रणाम और प्रदक्षिणा कर श्रावस्ती को चला गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १७७. तिन्दुक जातक “धनुहत्थकलापेहि. ” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय प्रज्ञा पार- मिता के बारे में कही। क. वर्तमान कथा महाबोधि जातक¹ तथा उम्मग्ग जातक² (में आए वर्णन) की तरह शास्ता ने अपनी प्रज्ञा की प्रशंसा सुन कर कहा—“भिक्षुओ ! तथागत केवल ¹ महाबोधी जातक (५२८) ² उम्मग्ग जातक (५४६)

कह पूर्व-जन्म की कथा कही।

तिन्दुक ] २३१

अभी प्रज्ञावान् नहीं हैं, पहले भी प्रज्ञावान् तथा उपायकुशल रहे हैं।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक वानर के रूप में पैदा हो अस्सी हजार बन्दरों की मण्डली के साथ हिमालय में रहने लगे। वहीं पास ही एक प्रत्यन्त-गाँव था, जो कभी बसता था, कभी उजड़ जाता था। उस गाँव के बीच में शाखा-प्रशस्त तथा मधुर फलों से युक्त एक तिन्दुक- वृक्ष था। जब गाँव बसा न होता, तो वानर आकर उस वृक्ष के फल खाते। अगली बार फलों का मौसम आने पर वह गाँव बसा हुआ था। उसके चारों ओर बाँसो का घेरा था और एक फाटक था। उस वृक्ष की शाखाएँ भी फलों के भार से झुकी हुई थीं। वानर सोचने लगे—हम पहले अमुक गाँव में तिन्दुक फल खाते थे। इस बार वह वृक्ष फला है या नहीं ? उस गाँव में बस्ती है या नहीं ? यह सोच उन्होंने एक वानर को समाचार मालूम करने के लिए भेजा। उसने लौट कर कहा कि वृक्ष फला है और गाँव में घनी बस्ती है। वानरों ने जब सुना कि वृक्ष फला है तो उन्हें बड़ी खुशी हुई कि मीठे मीठे फल खाने को मिलेंगे। बहुत सारे वानरों ने वानरेश को जाकर कहा। वानरेश ने पूछा—"गाँव बसा है वा नहीं ? 'देव ! बसा है।" “तो (लौट) जाओ। मनुष्य बहुत मायावी होते हैं।" "देव ! आधी रात के समय जब मनुष्य सो जाएँगे, तब खाएँगे।" बहुत से वानरों ने जाकर वानरेश को मना लिया। फिर हिमालय से उतर, उस ग्राम से थोड़ी ही दूर पर वह मनुष्यों के सोने के समय की प्रतीक्षा करते हुए एक बड़े भारी पत्थर पर सो रहे। आधी रात को जब मनुष्य सो रहे थे उन्होंने वृक्ष पर चढ़ फल खाए। एक आदमी शौच के लिए घर से निकला। उसने गाँव के बीच

२३२ [ २३.१७७ जाने पर बानरो को देखा तो और आदमियो को खबर दी। बहुत से आदमी तीर कमान तैयार कर, नाना प्रकार के आयुध ले, ढेले-डण्डे आदि के साथ वृक्ष को घेर कर खड़े हो गए कि रात बीतने पर बानरो को पकड़ेंगे। अस्सी हजार बानरो ने मनुष्यों को देखा तो उन्हें डर लगा कि अब मरे। उन्होंने सोचा कि बानरेश को छोड़ उन्हें और कही शरण न मिलेगी। वे उसके पास गए और पहली गाथा कही— धनुहत्थकलापेहि नेत्तिसवरधारिहि समन्ता परिकिण्णम्हा कथ मोक्खो भविस्सति ॥ [तीर कमान हाथ में लिए तथा उत्तम खड्ग धारण किए हुए आदमियो से हम घिरे हैं। कैसे मुक्त होगे ? ] धनुहत्थकलापेहि, धनुष और (तीर-)समूह जिनके हाथ में हैं, धनुष और तीर-समूह लेकर जो खड़े हैं। नेत्तिसवरधारिहि, नेत्तिस कहते हैं खड्ग को, उत्तम खड्गधारियो से, परिकिण्णम्हा, हम घिरे हुए है, कथ किस उपाय से हमारा मोक्ष होगा। उनकी बात सुन बानरेश ने कहा—'डरो मत ! मनुष्यो को बहुत काम रहते हैं। अभी आधी रात है। यह हमें मारने के लिए खडे हैं। इस (हमारे मारने के) काम में विघ्न करने वाला दूसरा काम पैदा कर दें।' इस प्रकार उन्हें आश्वासन देते हुए दूसरी गाथा कही— अप्पेव बहुकिच्चान अत्थो जायेय कोचि न अथ्थिय रुक्खस्स अच्छेद्दन खज्जतञ्ञेव तिन्दुक ॥ [इन बहुत काम वालो को कोई न कोई काम पैदा हो सकता है। वृक्ष पर अभी फल लगे हैं। तिन्दुक को खाओ।] नं निपातमात्र है। अप्पेव बहुकिच्चान, मनुष्यो को दूसरा कोचि अत्यो उत्पन्न हो सकता है। अथ्थिय रुक्खस्स अच्छेद्दन इन वृक्षो पर से तोडने उतारने

कच्छप ] २३३ की बहुत जगह है। खज्जतञ्चेव तिन्दुक तिन्दुक फल खाओ। तुम्हें जितनी जरूरत है उतने फल खाओ। हमें मारने का समय आएगा तब देखेंगे। इस प्रकार महासत्त्व ने सब को दिलासा दिया। यह आश्वासन न मिलता तो डर था कि सभी हृदय फट कर मर जाते। महासत्त्व ने इस प्रकार वानरो को दिलासा दे कहा—सभी वानरो को इकट्ठा करो। इकट्ठे होने पर बोधिसत्त्व के सेनक नाम भानजे को न देखकर वह बोले कि सेनक नहीं आया। यदि सेनक नहीं आया तो मत डरो। वह अब कुछ अच्छा काम करेगा। वानरो के भागने के समय सेनक सोता रह गया था। पीछे उठ कर जब उसने किसी को न देखा तो वह भी वानरो के पीछे पीछे आया। रास्ते में उसने आदमियो को देखकर सोचा कि बानरो के लिए खतरा पैदा हो गया। उसने गांव के किनारे पर अग्नि जला कर कातती हुई एक स्त्री के पास जा, खेत पर जाने वाले लड़के की तरह उससे मशाल ले, जिधर की हवा थी उधर खडे हो गांव में आग लगा दी। आदमी वानरो को छोड़ कर आग बुझाने दौड़ पड़े। वानर भागे, लेकिन भागते हुए सेनक के लिए एक एक फल तोड़ कर लेते गए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भानजा सेनक महानाम शाक्य था। वानर समूह बुद्ध-परिषद थी। वानरेश तो में ही था। १७८. कच्छप जातक "जनित्तम्मे भवित्तम्मे..." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ऐसे आदमी के बारे में कही जो प्लेग से मुक्त हो गया था।