भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

विवेकसागर

(११३)

भेद अभेद दोऊ सम ज्ञान विचारहू ॥ अंत अवस्था जानि सोई निरवारहू ॥

टीका—कामके डींग मारनेको सुनकर वस्तु विचारने कहा रे सूठ काम ! तू मूर्ख है तेरेको समझ नहीं पडता है; तू अन्या है तुझको कुछ सूझता नहीं है ।

एकही ब्रह्म आत्मस्वरूप होकर जब सबमें रम रहा है तब स्त्री और पुरुष यह दो लिंग कहाँ हैं । जब एकही सच्चिदानन्द सबमें व्यापक हो रहा है तब कहाँ काम है और कहाँ रति है । जिसने इस प्रकारसे निज स्वरूपको विवेककी सहायतासे जानकर भेदा-भेद को नाश कर दिया है उसके लिये तेरा अस्तित्वही नहीं तब तेरा वश क्या । स्वरूपज्ञान प्राप्त होतेही तेरी अंत अवस्था आजाती है फिर तेरा बल उसके ऊपर नहीं चलता । किस दृष्टि को धारण करनेसे तेरा बल नहीं चलता सो सुन । छन्द—निरवारि देखे छानि लेखे दुतिय नहिं कोई कहा ॥

नरवत इत उत करत जहँ तहँ ब्रह्म सब मो रमि रहा ॥

टीका—विवेकी पुरुष ब्रह्म विचारको प्राप्त करनेके लिये जब अन्वयव्यतिरेक करके स्वात्मज्ञानको जानता है और अपने प्राप्त ज्ञानकी परीक्षाके लिये सर्व शास्त्र और आचार्योंके मतको छानता है तब उसे विचार ज्ञान द्वारा स्वात्म-निश्चयात्मक प्राप्त होता है जिससे वह सर्व स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य सब ही एक ब्रह्मकी ही लीला देखता है । जिस प्रकार नटको जाननेवाला पुरुष उसके अनेक स्वार्गोंमें भी उसे नट ही जानता है, उसे उसके स्वार्गोंमें दूसरा भाव कदापि नहीं होता । उसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वको जाननेवाले पुरुषकी दृष्टिमें जब द्वितीया है ही नहीं तब तेरी स्थिति कहाँ है ।

क्रोध और क्षमाका युद्ध

(११४)

विवेकसागर

इत काम सुनिके अस्त्र डारे आनिके चरण परचो ॥ विचार ब्रह्म उर्द्ध वीर्य मोह भय वश स्वरभरचो ॥

टीका-हे धर्मदास ! वस्तु विचारके निर्मल ब्रह्मज्ञानरूपी बाणसे विंघा हुआ काम तेजहीन होगया और अपने सर्व अभिमान और घमण्ड को भूलकर विचारके आगे अपना हथियार डालकर उसके आधीन होगया । उसके आधीन होतेही उसकी स्त्री रति आदि सब आकर विवेकरायके आगे माथा नवाकर अपने सब पराक्रम छोडकर आधीन होगयी ।

(जिस समय मन कामातुर होता है उसी समय ब्रह्मविचार द्वारा इसे मारनेसे वीर्यका बल जिसके बलसे काम अपना पराक्रम दिखाता है एकदम शान्त हो जाता है ।)

कामको मंरते देख मोह राजाके दलमें खलबली मच गयी स्वयम् मोह भी भयभीत हुआ तब-

क्रोध मोह सुनि तुरतही निजबल भावेऊ ॥

मोसन करि संग्राम कवन पत राखेऊ ॥

विचार विवेक सहित सब सेन संधारि हौं ॥

करौं निकंटराज वचन प्रतिपारि हौं ॥

टीका-हे धर्मदास ! काम सेनाके मरनेका समाचार और उसके मरनेसे राजाके भयभीत होनेकी खबर जब क्रोधको पहुँची तब वह उसी समय रणके लिये तैयार होकर मोहराजाके निकट जाकर कहने लगा हे राजन् ! क्या आप जानते नहीं हैं कि, मुझसे संग्राम करके किसीकी पत बची नहीं है । मैं तो सबको जीतनेवाला आपकी सेवाके लिये तैयार हूँ तब आप एक काम


१ मरना और शत्रुके अधीन होना इन दोनों बातोंमेंसे अधीन हो जाना मान अपमान सूचक होने से मृत्युसे भी अधिक है इस कारण “मरते देख” लिखा है ।

विवेकसंगर

(११५)

के मरने से ऐसी चिन्तामें क्यों डूबे हुए हैं। देखिये प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि, अभी संग्राममें जाकर विचार विवेक सहित उसकी समस्त सेनाका नाश करके आपका राज्य निष्कंठक बना दूंगा। आप किसी प्रकारकी भी चिन्ता न करें। इस प्रकार अपनी बड़ाई आपही करके रणभूमिमें जाकर उपस्थित हुआ।

दोहा-मोह भूप यह सुनतहि, होगया व्याकुल अंग ॥

बूझे मन्त्रिन से यहै, जूझे बन्धु अनंग ॥

बड़ो सुभट मोसे नमो, हुतो सहस कन्दर्प ॥

मो जावत सो हत गयो, हुस्तर कठिन जो सर्प ॥

महामोहको वचन सुनि, मोह उठयो गण गाजि ॥

मेरे बन्धुहि मारिके, कित जैहैं रण भाजि ॥

मेटौं मारि विवेकमन, ज्ञाने देहुँ बहाय ॥

शील सत्य संतोष सब, चितवत जाहि पराय ॥

हौं जब प्रगटो तेज है, संग पुत्र मम चार ॥

व्याकुल करि वैराग्यको, हरौं भक्ति परिवार ॥

असत्संग मन्त्री कहै, हे प्रभु बडभट क्रोध ॥

आयुस जाको दीजिये, विजय करै रण बोध ॥

हरण्यो मोह नरेश तब, सुन्यो क्रोध बल शूर ॥

आज्ञा तब रणको दर्द, करौ रिपुहि चकचूर ॥

चल्यो क्रोध वंदन कियो, प्रभु आज्ञा धरि माथ ॥

आइ गयो रणभूमिमें, दलबल लीन्हैं साथ ॥

टीका-क्रोधका रणमें आगमन सुनकर विवेक राजाने भी विचार करके अपना योद्धा भेजा ॥

तब विवेक क्षमा कहैं आयसु दीन्हिया ॥

सुभट दोऊ संग्राम समागम कीन्हिया ॥

(११६)

विवेकसागर

टीका-विवेक राजाने मंत्रियोंसे विचार करके क्रोधके सन्मुख क्षमाको संग्रामके लिये भेजा । अब दोनों ओरकी सेनाके बीचमें एक ओरसे महा विकाल क्रोध और दूसरी ओरसे महाकोमलांगी परमशान्त क्षमाका युद्ध आरंभ हुआ ॥

दोहा-नृप विवेकविस्मित भयो, सुनतहि क्रोध प्रभाव ॥ बृह्यो मंत्रिनसे यहै, कांजे कौन उपाय ॥ दियो मन्त्र सत्संग वर, धीरज अचल सवीर ॥ क्षमा नारि मन भावती, पुत्र आर्य्यव धीर ॥ धीरज रु क्षमा पठायो, ज्ञान भक्ति ता संग ॥ तेज क्रोधको सहजही, क्षमा करे तन भंग ॥ धीरज क्षमा विदा कियो, पुत्र आर्य्यव जान ॥ दीन्है सकल सहायको, विमल भक्ति अरु ज्ञान ॥ धीरज धरि धीरज चलयो, गयो आप रणभूमि ॥ जहाँ क्रोध गर्जत रह्यो, नयन मद झूमि ॥ मिलि दृष्टिसे दृष्टि जब, भयो क्रोध रिस अंग ॥ गरज्यो सन्मुख जायके, मारि करौं बल भंग ॥

क्षमाको सन्मुख लड़नेके लिये आया देखकर क्रोध गरज कर कहने लगा ।

क्रोध कहै सुनु भीता मोहिं न जानसी ॥ कम्पित है त्रिलोक मरण निज ठानसी ॥

टीका-क्रोधने कहा हे डरपोक क्षमा ! क्या तू मुझे नहीं जानती है कि, मेरे भयसे तीनों लोक कम्पायमान हो रहे हैं ऐसा जानकरके भी तू मरनेके लिये सामने क्यों आयी है ॥

क्रोध सँधारैउ छित्तिपति राज जित कित कियो ॥ क्रोधविश सुरलोक दैतन जहरहि दियो ॥

विवेकसागर

(११७)

क्रोध कटुक अतिदार्शनको आडो तोही ॥ तेहिको हात संधार मम दरैरा पर जोही ॥

टीका-क्रोध कहता है कि, हमने असंख्य राजाओंका नाश करके उनका राज तितर वितर कर दिया है। हमारेही कर्तव्यसे देवोंने राक्षसोंको विषपिला दिया था। हमारी सेना ऐसी प्रलय है कि जो इसके सम्मुख आता है उसका ऐसा नाश हो जाता है कि कहीं पता भी नहीं लगता। भला ऐसी बिकट सेनाके समक्ष तू क्या वस्तु है और तेरा रक्षककौन है कि तू मेरे सम्मुख आयी है॥

दोहा-कहा बापुरी भक्ति है, कहा बापुरो ज्ञान ॥

कहा बापुरी क्षमा तू, कहा तोहि गुमान ॥

कहा नृपति तुव रंक है, कहा धर्म सन्तोष ॥

सम्मुख मेरे ना टिकै, जब चित्तवो भरि रोष ॥

इस प्रकार कहकर फिर क्रोध कहने लगा ॥

माता पिशाची कुजन बन्धु करनकी सामानते ॥

गुरु कौन बापुरा वदन देखुँ मोहि सू बडज्ञानते ॥

निजनारिको अपमान करि वृषली सो लोकसमाज है ॥

क्षण सुरति ते तेहि काटिके तब करूँ राज विराज है ॥

टीका-हे क्षमा ! मेरे पिता राजा मनने अपनी स्त्री निवृत्तिका अपमान करके उसको लौंडीसे भी नीच गतिको पहुँचा दिया है, जिससे समाजमें वह पिशाचनीके समानही आदरको पाती है। और तेरे भाई जो विवेक आदि हैं ये तो महा दुष्ट हैं और तू तो तेजहीन साक्षात् वर्णसंकर समान देख पडती है। हाँ तेरे को मेरे सम्मुख आनेकी शिक्षा देनेवाला गुरु कौन बापुरा है। क्या वह मुझसे अधिक ज्ञानी है ? अब देख क्षणमात्रमें दृष्टि डालतेही तेरे सब परिवारका नाशकरके निवृत्तिका नामही मिटा देता हूँ ॥

नं. ३ कबीरसागर - ६

(११८)

विवेकसागर

दोहा—तबै भक्तिको बोलि ढिग, कहै क्षमा सुसकाय ॥ वचन कोध कै सुनतहिं, तुरतहिं देव बहाय ॥ कोपि कोध बोल्यो तबै, धिग धिग है तुव मात ॥ नाम निवृत्ति जासु तुव, प्रगट भयो कुल घात ॥ तब क्षमा निज पियतन, चितई दृष्टि पसार ॥ कोपि वचन सुनि करिक्षमा, सहियेशब्द विचार ॥ कछो कोध अतिरिस भरे, रे धीरज मतिहीन ॥ कहा प्रातहि आइ तुम, अशुभ दृष्टि मुहि दीन ॥ लियो ज्ञानको बोलिके, क्षमा आपने तीर ॥ कहत वचन और कछू, मेटि कोधकी पीर ॥ कहत वचन अति रिस भरचो, रक्त वर्ण कर नयन ॥ तन पर स्वेद कंपित अधर; सुखते कटुतर वयन ॥ प्रकट भइ हिंसा तबै, कोध नारि विकराल ॥ अब सबको धीरज गयो, प्रगट भयी ज्यों काज ॥ बोली हिंसा रिसभरि, लिये खड्ग विपरीति ॥ कोपि क्षमा मारण चली, लिये खड्ग अपकीर्ति ॥ शतमुंख निजगुरु मारचो, शंभु सतीको तात ॥ कहुको मोरे जियतते, निकसि बाहिरें जात ॥ सुर नरमुनि व्याकुल किये, ताहि सकै कहि कौन ॥ लगी समाधि युगाधि भर, ताहि छुडावत मौन ॥ क्षमा कहे भृगु लात जब, हनी विष्णुके हीय ॥ क्षमा किये प्रभुता भयी, सुर नर मुनिके जीय ॥ क्षमा नाम यह भूमिको, लहत सकल अपराध ॥ है सबके अपराध शिर, जेहि वन्दे सुर साथ ॥

१ इन्द्र । २ इन्द्रको ब्रह्मज्ञानके उपदेश देनेवाले दध्यङ्गकृष्णिये थे । इन्द्रने इनका धार काट लिया था उपनिषदोंमें इसकी कथा प्रसिद्ध है आत्मपुराणमें विस्तार से है ।

विवेकसागर

(११९)

बहुरि क्रोध बोल्यो तहाँ, धरे भार बहु भूमि ॥ मोर भार सहस्रके, जाय पताल झूमि ॥ को मोरी तेजै सहे, कहा बडो अस वीर ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश हू, सो उर धरत न धीर ॥ कहे क्षमा पुनि भक्ति सो, हम सब विधि लछु आहि ॥ कब सम्पति यह क्रोधकी, क्यों पटतरि हैं ताहि ॥ क्रोध सुभट बोल्यो तबै, कहत वचन यह क्रूर ॥ मेटो मार विलम्ब नहीं, दया धर्म बड शूर ॥ जैसे कोऊ यत्न करी संग्रहि कीन्हो वित्त ॥ तस्कर पलमें लैगयो, शोक अग्नि जर वित्त ॥ क्षुधा पिपासा नींद पुनि, सिन्धु तरहि ज्यों यार ॥ गोपद लै बोलो तिन्हैं, ऐसेही वरियार ॥ जबै क्षमा सब सहि रहि, गहि रहि भगवत आस ॥ हृदय समझ बोलत भयी, हम तो हैं तुव दास ॥

यों कहत तुरत क्षमा कहे पौरुष बोलेऊ ॥

कुशल कुशल कहि फिर उत्तर खोलेऊ ॥

टीका—हे धर्मदास ! जिस समय क्रोधने महा कटु और हृदयमें शूल उत्पन्न करनेवाले महानिन्द्य वचन कहकर क्षमाके समस्त परिवारको गाली दियो उस समय भी क्षमा शान्तिसे कहने लगी हे क्रोध ! आपने जो कुछ कहा बहुत अच्छा कहा वाह ! वाह ! ऐसेही चाहिये ! इस प्रकार बार बार उसकी स्तुति करती हुई क्षमाने कहा आपने जो कुछ अपना पुरुषार्थ और बल वर्णन किया सब ठीक है । इसमें क्या संदेह आप बहुत बडे हैं । इस प्रकारसे क्षमाके कहनेपर क्रोधने उसकी बातोंको कटाक्ष समझकर और भी अपनी शक्ति अधिक प्रकाशित की । और—

(१२०)

विवेकसागर

कीन्हेसि चरण प्रहार सो अति विहसत भयो ॥ तो कुछ मम अपराध स्वामी अब गयो ॥

टीका-कोधने क्षमापर अपने लातसे प्रहार किया। उधर कोधने लात मारा इधर उसके बदलेमें क्षमाने हँसकर हे भाई! हे मालिक! अब मेरा जो कुछ अपराध था सो सब छूट गया। किन्तु मम हिय अतिहि कठोर चरण मृदुलैं अहे ॥ शासन उचित सो कीजिये अनुजैं निर्वहे ॥

टीका-मेरा हृदय अत्यन्त कठोर और आपका चरण अत्यन्त कोमल है इससे आपको चोट लगी होगी सो क्षमा करना, हे भाई! मैं आपसे छोटी हूँ आप मेरे जो उचित शासन समझिये सो कीजिये मेरा निर्वाह सब प्रकार हो सकता है ॥

दोहा-यहि मुनि झख लागे बकन, कोध बहुत दुख पात ॥

दास कहत हियसो मनहुँ, लगे चरनको घात ॥

धर्म तपस्या दया धन, पुनि संयम अरु नेम ॥

ज्ञान भक्ति वैराग बल, तजत शील रो प्रेम ॥

मेरे तेज प्रतापते, ये सब जाहि पराय ॥

धीरजहु धीरज तजै, मेरो दर्शन पाय ॥

क्षमा कहे तुमहो बडे, गुनहु बडे तुम माहिं ॥

जो कछु कहो सो सत्य है, यामैं संशय नाहिं ॥

कृपा करी मोपर बडी, मैं मान्यो बड भागि ॥

क्षमा दीन है कोध के, तुरतै पायन लागि ॥

क्षमाकी ऐसी अधीनताको देखकर कोधका तेज हत हो गया।

मोह और विवेककी सेनाका तुल्य युद्ध वर्णन अपने जोड़से लड़कर विवेककी सेनाका मोहकी सेनाको हराना

विवेकसागर

(१२१)

यह सुनि क्रोध शीतलगत अति कुंठित भयो॥

हारयो कर अतिदाप सबै जडता गयौ ॥

टीका-क्षमाकी अमृत समान अधीनताकी वाणीको सुनकर क्रोधका सब तेज जाता रहा, अब वह शांत और कुंठित होकर आगे युद्ध करनेसे रुक गया और अपने हथियार डाल दिये।

दोहा-कियो अनादर क्षमाको, शीतल भयो न रोष ॥

तबै क्षमा पायन परी, सबै हमारो दोष ॥

तुम विन दूजो को अहै, परम सीखकी बात ॥

सबै चूक मोसे परी, क्षमा कीजिये तात ॥

गये क्रोधके प्राण तब, शीतल भयो शरीर ॥

जीति क्षमा प्रिय ढिगगयी, मिटी सुतनकी पीर ॥

जैसे चण्डी मारेड, महिषासुर विकाल ॥

तैसे क्षमा विनाशेऊ, क्रोधहि हियेको शाल ॥

क्रोधके मरतेही दूतोंने मोहराजाको जाकर अपने पराजयका समाचार सुनाया।

काम क्रोध सुभटै युग पराजय पायऊ ॥

महा मोह अति संकेंऊ दास बुलायऊ ॥

टीका-काम और क्रोध दोनों महावीरकी जब पराजय होगयी तब मोह राजा अति भयभीत होकर अपने सर्व सेनाको बुलाकर एकदमसेही विवेककी सेनासे युद्ध करनेको रणमें आया। तब-

तब विवेक निजदल कहँ आयसु दीन्हेंऊ ॥

निज निज जोरी जान निपातन कीन्हेंऊ ॥

( १२२ )

विवेकसागर

टीका—जब मोहराजाने एकदमसे अपनी समग्र सेना सहित विवेककी सेना पर चढ़ायी की, तब इधरसे विवेक राजाने भी अपनी समग्र सेनाको शत्रुसे युद्ध करनेकी आज्ञा देदी। अब क्या था, घमासान युद्ध आरंभ हुआ। अपने २ जोड़के योद्धाओंको हूँठ २ कर सब परस्पर युद्ध करने लगे। तहाँ—

बुद्धि कुबुद्धिहिं मारयो धर्मं अधर्मता ॥

तृष्णा हतेउ संतोष सो कर्म अकर्ममता ॥

चंचल तेहि थिर मारेउ पुण्य जो कुकर्मा ॥

दुविधिहिं एकता घातेउ लिपट सूक्ष्मश्रमा ॥

टीका—बुद्धिने कुबुद्धिको मारा, धर्मने अधर्मको तारा, तृष्णाको संतोषने उजारा और कर्मने अकर्मका नाश मारा। स्थिरताने चंचलताको लुप्त किया तो पुण्यने पापको गुप्त किया। द्वैतभावको अद्वैतने तो सहजमें ही नाश कर दिया। इसी प्रकारसे मोह राजाकी समस्त सेनाका सत्यानाश हो गया ॥

छन्द—श्रम ही नमान्योरिपुसँहान्योमोह हुंदुभी बाजई ॥

प्रवृत्ति पुत्र पौत्र सबगत अम्बिका सुनि लाजई ॥

टीका—हे धर्मदास ! विवेकराजा तो इस प्रकारसे शत्रुको नाश करके निश्चित होकर बैठे, आनन्दरूपी दुन्दुभी बजने लगी किन्तु जब प्रवृत्तिने अपने वंशका नाश सुना तब अत्यन्त लज्जित होकर पश्चाताप करने लगी फिर—

आदि आशा सखी मिलि प्रवृत्ति आगे आयऊ ॥

मन राजा पत्नी सुनत क्षय शोक विपति विरागेऊ ॥

टीका—हे धर्मदास ! प्रवृत्तिके सर्वे पुत्र पौत्र कलत्रका नाश हो गया तब वह अत्यन्त शोक और पश्चाताप करती हुई आदि

प्रवृत्तिका मन राजाके निकट जाना और मनका शोक करना

विवेकसागर

( १२३ )

आशाको साथ लेकर मनराजा के समीप पहुँची (आदि आशा प्रवृत्तिकी सरली है क्यों कि, जब यह जीत अपने स्वरूपकी आदि अवस्थाका वर्णन शास्त्रोंमें सुनता है तब उस आदि सुखकी प्राप्ति के लिये प्रवृत्तिमें फँसता है । यद्यपि आदि आशा प्रथम उत्पन्न होती है तथापि प्रवृत्ति अधिक बलवती होनेके कारणसे उससे प्रधान होजाती है )

इस प्रकार प्रवृत्ति जब मनके निकट गयी तब मनराजा अपनी प्यारी स्त्री प्रवृत्तिके परिवारको नाशको सुनकर अत्यन्त कष्ट और शोक तथा विपत्तिको प्राप्त हुआ । पश्चात् उसे विराग आया ॥

( जब जीव किसी पदार्थ को अत्यन्त स्नेह पूर्वक ग्रहण करता है तब अपने स्वरूपको भूलकर उसी पदार्थमें तदाकार हो जाता है किन्तु जब उस पदार्थसे वियोग होजाता है; अथवा उसमें किसी प्रकारसे कुछ हानि होती है तब उसके चित्त को बहुत कष्ट, अनुताप और दुःख होता है, फिर थोड़ी देरमेंही चित्तमें स्थिरता आनेसे चित्तको शान्ति आजाती है और उससे विराग हो जाता है ) ॥ अब मन राजा प्रवृत्ति से पूछता है ॥

हे बाला अर्द्धगी कीतहि सिधायऊ ॥

मुहाय तुव सुत सतत किहि विधि मारेऊ ॥

टीका—हे मेरी स्त्री प्रवृत्ति ! तू इस समय कहाँ आयी है । तेरे परम सुन्दर पुत्रोंको किसने किस प्रकारसे मारा ॥

उधर तो प्रवृत्ति मनराजाके पासपहुँची है इधर अब निवृत्ति ने देखा कि, अब समय आया है मनराजा को अपने वश करना चाहिये इसलिये उसने अपने सखियोंको सिखाकर मनराजाके पास भेजा ॥

निवृत्तिका अपनी सखियोंको मन राजाके पास भेजना और प्रवृत्तिका क्रोध और पराजय

(१२४)

विवेकसागर

निवृत्ति निज सखियन तुरत सिखायऊ ॥

पति समीप तुम गौनो बात बुझायऊ ॥

टीका-मन राजाको विराग संयुक्त देखकर निवृत्तिने अपनी सखियोंको बुलाकर और उन्हें कुछ गुप्त शिक्षा देकर मन राजाके पास भेजा । तब-

विद्या विनय अधीन सखी तुरते गयी ॥

करिप्रणाम कर जोरि मानु बोलत भयी ॥

टीका-निवृत्तिकी आज्ञा पाकर विद्या और अधीनता तीनों सखी मन राजाके पास जाकर प्रणाम करके विनयपूर्वक बोलने लगीं । क्या बोलने लगीं कि हे प्रभु-

कितहिं उदास समुझि जिय देखिये ॥

एक वनितासंगभोग अब द्वितीय लेखिये ॥

टीका-निवृत्तिकी सखियोंने राजा मनसे कहा हे महाराज अब आप किस बातकी चिंता कर रहें हैं । अबतक एक स्त्रीके साथ समागम करके आनन्द विलास प्राप्त किया और उसका परिणाम भी देख लिया अब दूसरीकी और दृष्टि कीजिये और उसके आनन्द विलास और उसके परिणामको देखिये ॥

निवृत्तिकी सखियोंके वचनको सुनकर प्रवृत्तिकी सखी आशा (जो प्रथमसेही वहाँ बैठी हुई थी) को अच्छा न लगा ।

मुनत वचन रिसवश भयी आशा यों कही ॥

विद्या द्रोह दुराचारिणी कितहु न चूकही ॥

सुहावति सौत समाजहि सबहि मरावसी ॥

कहि कहि पाठ कुपाठ विवेक पठावसी ॥

टीका-विद्याकी बातको सुनकर कोधित हुई आशा कहने

विवेकसागर

( १२५ )

लगी—हे विद्वोहिणी ! दुराचारिणी विद्या ! तू कहीं भी चूकती नहीं है । प्रवृत्ति जो सौत निवृत्ति है उसके समाजमें सदा वास करके उसके पुत्र विवेकको पाठ कुपाठ अर्थात् सत्य झूठकी बात कह कहकर उसे बहकाती है और प्रवृत्तिके वंशका नाश भी तूने ही कराया है ।

जो वांछित सा कीनो अब कित भावसी ॥

जरे पर तैं माहुर भले लगावसी ॥

टीका—हे विद्या ! जो तेरे मनमें था सो तूने कर लिया अब क्या करना चाहती है कि जलेपर जहर लगाने आयी है आशाकी ऐसी दुष्ट वाणीको सुनकर विद्याने उसकी उपेक्षा की और मनराजासे कहने लगी ।

स्वामी चित धीरज धरि नीति विचारिये ॥

उभय नारि प्रतिपालक कितहिं विसरिये ॥

टीका—विद्याने कहा हे महाराज मन ! आप नीतिपूर्वक विचार करके देखिये कि आप अपनी दोनों स्त्रियोंके पालन पोषण करनेवाले हैं । सो आप इस धर्मको कहाँ भूल गये हैं । आप अबतक प्रवृत्तिमें सम्पूर्ण लिप्त होरहे हैं और निवृत्तिको एकदम भुला दिया है उसकी ओर भी दृष्टि उठाकर देखिये । इस प्रकारसे मनराजासे कहकर विद्या आशाकी ओर फिरी और उसको डांटा—

भाग भाग दूती भामिनी नित्य इच्छा चहै ॥

प्रवृत्ति है भारी देह अजहूँ चिता गहै ॥

टीका—विद्या कहती है । हे दूती ! आशा ! यहाँसे भाग जा यहाँसे भाग जा । देखती है कि, मनराजाके साथ प्रवृत्ति शरीर रूप होकर साक्षात् इतने बड़े स्वरूपसे विराज रही है तथापि उसको फिरसे और भी बड़ा बनानेके लिये चिता कर रही है ।

मन राजाका निवृत्ति रानीपर प्रसन्न होकर उसके साथ रहना

( १२६ )

विवेकसागर

यहाँ भाग, भाग दोबार कहनेसे आशय यह है कि निवृत्ति परायण पुरुषोंको लौकिक पारलौकिक दोनों प्रकारकी आशा त्यागनी चाहिये और यही वेराग्यका स्वरूप है । आशाको इस प्रकार से दुत्कार विद्या फिर मन राजासे कहने लगी ॥

छन्द-गहि निवृत्ति स्नेह कीजे सुनहु स्वामी नागरा ॥

विषय शोचहि कहा कीजे करहु राज उजागरा ॥

टीका-विद्याने कहा हे बुद्धिमान स्वामिनअब आप निवृत्ति को ग्रहण करके उसके साथ प्रेमपूर्व राज्य कीजिये ॥

मन राजा सुनि हर्षेऊ निवृत्ति संगम आयउ ॥

पति परी आन्दन्द भारी मुफल जीवन पायउ ॥

टीका-विद्याके शिक्षाप्रद वचनोंको सुनकर मनराजा मनमे बहुत प्रसन्न हुआ और विद्याके साथही निवृत्तिके समीप गया हे धर्मदास ! उस समय निवृत्तिके आनन्दका क्या पार हो ? निवृत्ति अपने पतिको अपने ऊपर कृपा करनेके लिये निकट प्राप्त हुआ देखकर अपनी जीवनकी साफल्यताको प्राप्त जानकर पतिके चरणपर पड़ गयी ॥

अब दोनों आनन्दपूर्वक आनन्द विलासमें मग्न हुए ॥

इस प्रकारसे हे धर्मदास ! जब यह मन प्रवृत्तिसे अलग होकर निवृत्तिको प्राप्त होकर गुरुमुखद्वारा सच्चे पारख पदको प्राप्त होता है तब मन स्थिर होकर सुखकी प्राप्ति होती है ॥

इति श्रीहंसमुक्तावली अर्न्तगत मोह और विवेकका युद्ध कवीरपंथी भारत-पथिककृतटीका सहित समाप्त

इति विवेकसागर समाप्त

धर्मदासजीका सर्वज्ञानका सार पूछना

सत्यसुक्त, आदिअदली, अजर अचिन्त, पुरुष, मुनींद्र, करुणामय, कबीर सुरति योग संतायन, धनी, धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध, गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रगट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश-व्यालीसकी दया ।

अथ श्रीसर्वज्ञसागर प्रारम्भः

धर्मदास वचन-चोपाई

कहे धर्मदास सुनो गुसाई । सकल मता तुम कहा समुझाई ॥ वरनि भेद कहो बहुमानी । सर्व ज्ञान तुम कही बखानी ॥ सब को सार कहो समुझायी । भित्र २ मोहि देहु लखायी ॥ सावन भादो वरसे मेहा । एते शब्द तुम कथे विदेहा ॥ बहुत अगम है मता तुम्हारा । कहैं लंगि गम्य करै संसारा ॥ नर देही कछु गम्य न जाने । जो कछु सुने सोई अनुमाने ॥ तहैंको भेद कहैं मूरख पावे । त्रितु सतगुरुको आन लखावे ॥ जो नहीं गर्भवास महीं आवा । अजावन सोई गुरु कहावा ॥

कबीर साहबका चार ज्ञान कहना

(१२८)

सर्वज्ञसागर

सारखी-बहुत भेद कहो तुम, सुन्यो सुरति दे कान ॥ अब कछु ऐसो भाषिये, आदि अंत बंधान ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

तब सतगुरु असवचन उचारा । सुनु धर्मनि प्राण अधारा ॥ बहुत ज्ञान सुनायो तोही । तुम अंतर जाना अब मोही ॥ कोटि ग्रन्थ ज्ञान हम भाखा । सुनिके भेद तुम अन्तर राखा ॥ पुनि टकसार मैं कहाँ अमानी । सो धर्मनि तुव मन नहिं मानी ॥ बीजक ज्ञान मैं कहो अरथाई । सो तुमरे चित एक नहिं आई ॥ चौथे मूल ज्ञान लै आवा । सर्व लोकन को भेद बतावा ॥ चार ज्ञान मैं कहा समझायी । तेहिमें तुम्हे परतीति न आयी ॥ विनु परतीति काज नहिं होई । श्रद्धा विना जिव जाय विगोई ॥

सारखी--पुरुष हमसों जो कही, सो तोहि दीन्ह दिखाय ॥

और धर्म नहिं गोइहों, सुनु धर्मनि चित लाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विनती अनुसारी । साहिब विन्ती सुनो हमारी ॥ सकल भेद गुरु कहौ बुझायी । जाते संशय सब मिटि जायी ॥ आदि अंत मधि गति सोई । सबै कहौ राखो मति गोई ॥ पहले आदि समरथ किमि होई । उत्पति प्रलय भाषो तुम सोई ॥ तुम संदेशी आदिते आये । सर्व भेद तुम हमें सुनाये ॥ चारि ज्ञान तुम भाषि सुनावा । ज्ञान चारिको अर्थ बतावा ॥ अब त्रयवाचिक मोहि सुनावहु । दया करो जनिमोहि छिपावहु ॥

सारखी--तुम निज सतगुरु आदि हो, हम हैं वंश तुम्हार ॥

समरथ अन्त बतावहु, मिटे भर्म कौवार ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

तब साहिब अस वचन उचारा । सुनु धर्मनि प्राण अधारा ॥ आदि अन्त नहिं कोई वासा । आपहि आप कीन्ह प्रकासा ॥

आदिका वर्णन

सर्वज्ञसागर

(१२९)

साहब हते और नहीं कोई । शिष्य गुरु हते नहीं होई ॥ नहीं तब ब्रह्मा वेद निशानी । नहीं तब शिवकी उत्पानी ॥ नहीं तब विष्णु न निरंजन राया । नहीं तब अच्छर सृष्टि बनाया ॥ नहीं तब अतीत पुरुष कर ताना । नहीं तब रचे लोक अरु धामा ॥ नहीं सृष्टि न सिरजनहारा । नहीं कछु असार नहीं कछु सारा ॥ नहीं नरसिंग न कलकी नाहीं । गुरु और शिष्य बताऊ काहीं ॥

सारखी-पिण्ड ब्रह्माण्ड तब ना हता, नहीं लोक विस्तार ॥ पुरुष एक निश्चल हता, जिनकी सकल पसार ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

सुनु सद्गुरु विनती चित लायी । तुम गुरु रूप सदा सुखदायी ॥ ब्रह्मा देवता वेद विचारा । सो हम बूझे हृदय मँझारा ॥ चारि वेद भे तहैं चारी । चारि धाम गुरु कहौ विचारी ॥ सर्व ज्ञान गति तुम भाखा । क्षर अक्षर थापि जो राखा ॥ उत्तर पुरुष सब कछु कीना । सो तौ हम जीवन सब चीन्हा ॥ यही भेद विरञ्चि विचारा । सोई आठों योग पुकारा ॥ सोई सकल मुनिन ठहराई । सोई शुक्रदेव संसार सुनाई ॥

सारखी-सोई पुरुष तुमही कहो, हम चीन्हा जियमाँहि ॥ तुम काहेको आयऊ, सोई बतावो थाहि ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

तब सतगुरु बोले विहँसाई । धर्मदास बोले लडकाई ॥ जो कछु और विरञ्चि विचारा । सबकी गतिमतिकह्यौ निरधारा ॥ तेहिते और कहाँ है भाई । यही भेद सब जीवन पायी ॥ त्रिवाचिक तुम पूछो मोही । नितप्रति अगम कहाँ मैं तोही ॥

आदि अन्तकी उत्पत्तिका प्रश्नोत्तर

( १२० )

सबन्धसागर

कहा कहौं मैं कहत डराऊँ । ताते उत्पति कहत लजाऊँ ॥ तब नहिं होते पिण्ड ब्रह्मण्डा । तब ना हती पृथ्वी नौ खंडा ॥ तब नहिं लोक द्रौप की बानी । तब नहिं जीव जन्तु उत्पानी ॥ तब नहिं पुरुष और प्रकीरती । तब नहिं अछर निरञ्जन जोती ॥ तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । तब नहिं गौरी गणेश औशेषा ॥ तब नहिं ज्ञान ध्यान औज्ञानी । तब नहिं वेद कितेव निशानी ॥ तब नहिं गुरु सतगुरुकी बानी । तब नहिं सात सिन्धु उत्पानी ॥ तब नहिं सुरति शब्द निर्मावा । तब नहिं एक दोय परभावा ॥

सारखी-पांचतत्त्व तब ना हते, न हते आठों धाम ॥

नौद्वार तब ना हते, कहाँ लीन्ह विश्राम ॥

धर्मदासवचन-चौपाई

सतगुरु मैं बलिहारी तेरी । जीवन की काटी तुम बेरी ॥ दया सिंधु दया तुम कीन्हा । सर्व जीव आपन करि लीन्हा ॥ दया करो जनि मोहिं छिपाओ । आदि अन्त उत्पन्न सुनाओ ॥ जो आपण करि जानो मोही । सकल भेद बतावहु तोही ॥

सारखी-धर्मदास विनती करै, गहि कबीरको पाय ॥

साहिब तुम बीछुरे, शब्द वाहिरे जाय ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

सुनु धर्मदास यह अकथ कहानी । सुर नर मुनि काहु नहिं मानी ॥ तन मन धनसो चित्त लगावे । गुरुका अन्त कोइ विरले पावे ॥ युगन युगन मोहि आवत भयऊ । सत्य शब्द मैं कहते रहेऊ ॥ कहा कहौं कोई नहिं मानै । जे समझे ते झगरा ठानै ॥

सत्ययुगका वर्णन

सतयुग चारि हंस समझाये । प्रथम राय मित्रसे नहिं आये ॥

त्रेतायुगका वर्णन

सर्वज्ञसागर

(१३१)

चित्ररेखा रानी कर नाऊ । तिन सुनिशब्द श्रवण चितलाऊ ॥ तिन युगबन्ध चौका कीन्हा । युग बन्धी परवाना लीन्हा ॥ राजा रानी पूछत मोही । सो हकीकत कहौ मैं तोही ॥ अष्टचौकाको शब्द सुनावा । राजा रानी लोक पठावा ॥ दुसरे राय वटक्षेत्रके आवा । सतसुकृति तहँ नाभ धरावा ॥ तिन राजा पूछा चित लायी । तब तेहि भेद कह्यो समझायी ॥ पान परवाना राजहिं दीन्हा । राजा वास लोकमें कीन्हा ॥ तिसरे राय हरचन्द कहँ आये । बन्ध काटिके लोक पठाये ॥ चौथे पुरी मथुरामें आयी । विकसी ग्वालिनके समझायी ॥ चारिहंस सतयुग समझाये । ते चारों गुरुवंश कहाये ॥ चारिहंस नौ लाख बचाये । शब्द भरोसे घरहि पठाये ॥

त्रेता युगका वर्णन

पुनि त्रेता युग कहौ विचारी । सात हंस त्रेतायुग तारी ॥ प्रथम ऋषी शृंगी समझाये । दुसरे अयोध्या मधुकर आये ॥ तिनसे शब्द कह्यो टकसारा । चौथे बोधे लछन कुमार ॥ पचवें चलि रावण लगि गयऊ । तहाँ भेंट मन्दोदरिसे भयऊ ॥ गर्वी रावण शब्द न माना । मन्दोदरी शब्द पहचाना ॥ छठै चलि वसिष्ठ लगि आये । ब्रह्म निरूपन उर्नहि सुनाये ॥ सतये जंगलमें कियो वासा । जहाँ मिले ऋषी दुर्वासा ॥ सात हंस सातौ गुरु कीन्हा । परमतत्त्व उन्ही भल चीन्हा ॥ सातौ गुरु त्रेतामें भयऊ । देह उपदेश सो हंस पठयऊ ॥

द्रापरयुग वर्णन

त्रेता गत द्रापर युग आया । सत्रह जीव परवाना पाया ॥ प्रथमें रायचन्द विजय कहँ गयऊ । ताकी रानी इन्दुमति रहेऊ ॥

कलियुगका वर्णन

(१३२)

सर्वज्ञसागर

दुसरे राय युधिष्ठिर कहैं आये । द्रौपदी सहित परवाना पाये ॥ तिसरे पाराशर पहाँ आये । निर्णय ज्ञान ताहि समझाये ॥ चौथे राय धुधुल लहि भेदा । बहुत ज्ञानको कीन्ह निखेदा ॥ पचये पारसदास समझावा । स्त्री सहित परवाना पावा ॥ छठये गरुडबोध हम कीन्हा । विहँग शब्द गरुडको दीन्हा ॥ सातें हरिदास सुपच समझावा । नीमषार महाँ उसको पावा ॥ अठयें शुक्रदेव पहाँ ज्ञान पसारा । सकल सरब भेद निरवारा ॥ नवमें राजा विदुर समझाया । भक्तिरूप उन दर्शन पाया ॥ दशमें राजा भोज बुझाया । सत्य शब्द पुनि उसे चिह्नाया ॥ ग्यारहें राजा मुचकुन्दहि तारे । बारहें राजा चन्द्रहास उबारे ॥ तेरहे चलि वृन्दावन आये । चारि ग्वाल गोपी समझाये ॥ गुरु रूप पुनि पन्थ चलाये । भौसे हंसा आनि छुडाये ॥ बावन लाख जो जीव उवारा । कलियुग चौथे यहाँ पर धारा ॥

कलियुग वर्णन

प्रथमें गोरखदत्त समझाये । तारक भेद हम तुमहिं बताये ॥ दुसरे शाह बलखको बोधा । षट् आरबी बहुविधि सोधा ॥ तिसरे रामानन्द पहाँ आये । गुप्त भेद हम उन्हें सुनाये ॥ चौथे पीरकी परचे दीन्हा । पचये शरण सिकन्दर लीन्हा ॥ छठे वीरसिंह राजा भयऊ । ताको हम शब्द सुनयऊ ॥ सतयें कनकसिंध समझाये । सोलह रानी लोक पठाये ॥ अठहँ राव भूपाले आये । ग्यारह रानी लोक पठाये ॥ नौमें रतना बनिन समझाई । जाति अग्रवालिन करत मिठाई ॥ दशहँ अलिदास धोबी गयऊ । सात जीव परवाना पयऊ ॥ ग्यारहें राजा भोज समझायी । तिन बहु भक्ति करी चितलायी ॥ बारहें सुहम्मदसोकहचोकुराना । हद हुकुम जीव कर माना ॥