कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
प्रारंभिक पृष्ठ एवं अथर्ववेदीय कल्प भूमिका
अथर्ववेदीय-कौशिक-गृह्यसूत्रम् । कौशिकाचार्येण प्रणीतम् । [ दारिलकेशवयोस्संक्षिप्तटीकया सहितम् ] अथर्ववेदस्य शौनकीया जाजला अकसाळा ब्रह्मवादा इति चतसृणां शाखानां गृह्यप्रतिपादकम् । जिसको— सर्वदर्शनसंग्रह, जीवन्मुक्तविवेक, महावाक्यरत्नावली, संस्कृत- प्रवेशिका, सिद्धान्तशिरोमणि ( गोलाध्याय ), सूर्य्यसिद्धान्त, आर्यभटीय, सभाष्यगोतमीयन्यायदर्शन, गोभिल- गृह्यसूत्रसटीक, द्राह्यायण-गृह्यसूत्रसटीक, खादिर-गृह्यसूत्रसटीक, वाराह-गृह्यसूत्र के हिन्दी अनुवादक— श्री ठा० उदयनारायण सिंह ने अपने शास्त्रप्रकाश भवन मथुरापुर, डाक-विद्दूपूर बाजार, जि० मुज़फ्फरपुर ( बिहार ) से सानुवाद प्रकाशित किया ।
मुद्रक:—बी० के० शास्त्री ; ज्योतिष प्रकाश प्रेस, विश्वेश्वरगंज, बनारस सिटी । २७६९
॥ समर्पणम् ॥ इस अथर्ववेदीय कौशिकगृह्यसूत्र को माननीय उदारचेता प्रत्यात्मवेत्ता, बिहाररत्न संस्कृत, हिन्दी, संगीत और हिन्दू धर्म के परम श्रद्धालु श्री बा० उमाशङ्कर जी जमीन्दार और रईस मुज़फ्फरपुर-जिन- की आर्थिकसहायता से अमेरिका में मुद्रित और प्रकाशित पुस्तक को भारत में हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशन करने का मुझे सुअवसर प्राप्त हुआ, उनके कर कमल में सादर एवं सप्रेम समर्पित करता हूँ। अनुवादक— ठा. श्रीउदयनारायण सिंह ।
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। कौशिकगृह्यसूत्रकी ⮞ विषय-सूची ⮜ अध्याय ॥ १ ॥ कं. सूत्र पृष्ठ १-१-३७ वेद तथा ब्राह्मण ग्रंथों से संस्कार, पाकयज्ञ, देवयज्ञ, १-३ पितृयज्ञादिक निकले हैं । पाकयज्ञ की परिभाषा, बैल के चर्म पर बैठना । २-१-४१ उपकरणों को वेदी के पास रखने का नियम उनको यथा ४-७ नियम साफ करना, प्रोक्षण करने की रीति, हवन की विधि । ३-१-२० इध्मों का आधान, अभिमन्त्रण, अभिषेचनादि, ब्रह्मा के ७-९ कर्त्तव्य राजकर्म, आभिचारिक कर्मों में विशेषता । ४-१-१९ वेदी के किस भाग में कौन २ सी आहुतियां देनी । ९-११ अवदान की प्रक्रिया, आहुतियों की देवता, उनके नाम, विभिन्न आपत्तियों के फल । ५-१-१३ अमावास्या, पौर्णमासी को होम करने की रीति । ११-१३ ६-१-३७ आज्य की अस्स्रुति द्वारा स्कन्न होम, अस्स्रुति होम, १३-१६ संस्थित होमादि, दर्श एवं पौर्णमास का व्याख्यान । ७-१-२९ स्थालीपाक की विधि में अश्नामि या आशयति करको कहा १६-१८ गया है, वहाँ २ स्थालीपाक की विधि समझना । जुहोति से घृत जानना । यह आहुति पदार्थ का विशेष नियम है । उदक से जलपात्र, अनुपदिष्ट की जगह आज्य काष्ठ अनुप- दिष्ट होने से । भक्षयति से पुरोडाश, प्रयच्छति से मन्थ एवं ओदन और उदक संस्कार कथन से जलपात्र समझना । ८-१-३५ पुरस्तात् होम के निशा कर्मों के नियम, विधि कर्मों में १८-२० जलक्रिया तीन २ करना, विभिन्न सूत्रों के विनियोग दशा में नियम प्रयच्छाञ्च परशुं से कुश काटने का अस्त्र देना । कर्म, अभिचारकर्म इनकी सामग्रियों, वास्तोष्पतीय, मातृ- नामादि की परिभाषा ।
( २ ) कं. सूत्र पृष्ठ ९-१-११ “अम्बयो यन्ति” आदि सूक्तों का स्पष्टीकरण और शान्त्युदक २१-२२ का तैयार करना । अध्याय ॥ २ ॥ १०-१-२४ मेधाजनन, ब्रह्मचारी को ब्रह्मचर्य की सफलता, हवि करने २२-२४ के नियम, बच्चे को शंखपुष्पी आदि का चटाना, जातकर्म के महोपकारी नियम । ११-१-२० पौर्णमासी को निर्ऋतिकर्म, ब्रह्मचारी साम्पदकर्म करे । २४-२५ १२-१-१६ सम्पत्ति कामना, सामनस्य के लिये काम्यकर्म ग्रामप्राप्ति २५-२६ एवं सर्वकामना की सिद्धि । १३-१-१३ हस्तिवर्चस आदि को विधिपूर्वक यन्त्र बांधने से फल, २६-२७ यक्ष्मा की दवा मेघजल को नियम से लेवे । १४-३१ युद्ध का वर्णन, विजय कर्म, इषुनिवारण कर्म, शत्रुसेना २७-३० की बुद्धिभ्रष्ट करना, उद्वेगकर कर्म । १५-१८ जयकर्म, जयपराजय ज्ञान, रोगी जीवेगा ? जानने का यंत्र । ३०-३२ सांग्रामिक विधान, परसेना में किन महारथियों का मरण होवेगा ? जानना । १६-३३ सोमलता को योद्धाओं के हाथ में बांधना, अभयकर्म । सेना ३२-३५ कर्म । राष्ट्र में प्रवेश । १७-३४ माण्डलिक राजाओं का अभिषेक और क्षत्रिय को सावित्री ३५-३७ बचवावे । अध्याय ॥ ३ ॥ १८-३८ दरिद्रता दूर करने के लिये, मन चाहा धन मांगने वाला ३७-४० निऋति कर्म करे । १९-३१ गोपालनविधि । पुष्टिकर्म । पीयूष की संज्ञा । सर्वकाममणि ४०-४३ शान्ति । २०-२६ हल जोलने आदि, खेती सम्बन्धि कर्म, बहुत बैल, गौयें हों ४३-४५ ऐसी इच्छा वाला मनुष्य यह कर्म करे । २१-२५ पदार्थवृद्धि कर्म, गोशान्ति कर्म । शान्त वृक्ष की शाखा को ४५-४७ घर में लाकर अमावास्या और पूर्णमासी को रसकर्म करे ।
( ३ ) कं. सूत्र पृष्ठ २२-१६ रस कर्म कुल । कुल की पुष्टि कर्म, हेतु कर्म । समृद्धिकर्म । ४७-४९ समुद्रकर्म । २३-१७ नये मकान ( पत्थर, ईंट, मट्टी, खर, काठ आदिका क्यों न ४९-५१ हो ) में गृहप्रवेश कर्म बच्छरे के कान को छेदने के नियम । २४-४६ खेत बोने का कर्म और गोशाला कर्म । गृह सम्बन्धि बातें ५१-५५ कृषि कर्म । पुष्टि कर्म । सलिलगण के मन्त्र । अध्याय ॥ ४ ॥ २५-३७ रोगों की दवा आदिका वर्णन । ज्वर का रोग यंत्र बान्धने से ५५-५८ छूटे । अतीसार, बहुमूत्र, हरैं एवं कपूर के यंत्र बान्धने से । पिशाच भगाने का उपाय । जलोदरादि रोगों का यंत्र । २६-४३ वात, पित्त, कफ, अतिकास, शिर पीड़ा, वातज्वर, कीटि ५८-६३ बन्ध, शिरो रोग, वातगुल्म, शरीर के किसी अङ्ग से या शरीर के बाहर रुधिर बहे इसका यंत्र । हृद्रोग, सफेद कुष्ट, यक्ष, अप्सरा, भूत, प्रेत, और ग्रहादिका । राजयक्ष्मा आदि रोग, जलोदर, कुल परम्परा से होने वाले रोगों का यंत्र । २७-३४ पिशाचगृहीत, क्षेत्रिय रोगों का यंत्र, अरुषी, उदर, गण्ड- ६३-६६ लक, यक्ष्मा, सर्व रोग भैषज्य । २८-२० हथियार से कटे रुधिर का, विषका, बुद्धिभ्रष्ट का, सूतिका ६६-६८ रोग को छुड़ाने का उपाय । २९-३० सर्प काटे का, ज्वर, कृमिरोग, राक्षसगृहीत का उपाय । ६८-७० ३०-१८ पित्तज्वर, केशगिरते हुये और केश बढाने का, कलेजा का ७०-७२ जलन, जलोदर, कामला-गण्डमाला । ३१-२८ रक्षोग्रह, किसी अङ्ग का या सब अङ्गों में शूल होने की दवा । ७२-७५ अक्षत व्रण, पक्षिके काटने कास एवं कफ गिरने की दवा । ३२-२९ जम्बुआ पकड़े की दवा । गण्डमाला, राजयक्ष्मा, सांप काटे ७५-७८ की, सर्वरोगों की दवा । मृतावत्सा की दवा । ३३-२० सुख से बच्चा पैदा होने का यत्न ७८-८० ३४-२७ वन्ध्या को सन्तान होने का, मृत वत्सा, बच्चा होकर मरजावे- ८०-८२ बच्चे मरे या स्याने मरजाया करे इसका उपाय कुमारी को पति मिले ।
( ४ ) कं. सूत्र पृष्ठ ३५-२८ पुंसवन संस्कार, जम्भुआ पकड़े का इलाज स्त्री वशीकरण । ८२-८५ ३६-४० स्त्री पुरुषके सम्भोगमें विघ्ननाशक कर्म । स्त्री को सोला देने ८५-८८ का कर्म । भागने वाली को बन्धन कर्म । स्त्री एवं पति के कोप शान्ति का विधान । अध्याय ॥ ५ ॥ ३७-१२ लाभ, हानि, जीत, हार, सुख, दुःख, उत्कर्ष, अपकर्ष, ८८-९० सुभिक्ष, दुर्भिक्ष, भय, अभय, रोग, अरोग, धनी, निर्धन, धर्म, अधर्म, मरण अमरण, धान्य होगा ? खेत उपजेगा ? घर में वास होगा ? इत्यादि संसारी प्रश्नों का उत्तर मिलेगा । ३८-३० नैमित्तिक कर्म । बरसते मेघ को रोकना । खेत में बिजुली पत्थरादि न गिरने पावे-इसका उपाय । अतिवृष्टि, अनावृष्टि, फसलमें कीड़े हो जाना, चूहा, टिड्डी, शुक, स्वचक्र, परचक्र, वृष्टि निवारण । ३९-३१ अपनी रक्षा के लिये यंत्र बांधना। कृत्या ( जादू ) का वापस ९०-९३ करना या कृत्या को मुर्दा करदेना और नदी के प्रवाह को जिस ओर चाहे घुमा देवे । पुरुष के वीर्य्य को बढ़ाना । शिश्न को मोटा करना । ४०-१८ वृष्टिकर्म विधि। जमीन में गड़े धन को उखाड़ने में विघ्ननाशनं ९३-९८ कर्म । धन के उपार्जन की सफलता । ४१-२६ द्यूत में जीतना, विघ्नशान्ति कर्म । घोड़े की शान्ति । प्रवास ९८-१०० जाने में मार्ग में भयादि विघ्न की शान्ति । व्यापार की चीजों को लेजाने के पहिले लाभार्थ कर्म करना । ४२-२३ घरके विरोध में सांमनस्य कर्म । पापलक्षण वाली स्त्री को १००-१०३ देखने पर शान्ति कर्म । ४३-२१ पुनर्विघ्नशमन । सर्प, शृङ्गी, दण्डादिका विघ्न नहीं होता ! १०३-१०५ अवसान, शाला कर्म । ४४-४० वशा (बिनब्याई हुई गौ जो-कभी ब्याती नहीं) का १०५-१०८ प्रयोग । ४५-१९ वशा जिस घर में रहती है उसकी शान्ति करनी । बुरे १०८-११० स्वप्न देखने पर शान्ति, अवकोर्णी (भ्रष्ट ब्रह्मचारी) प्राय-
( ५ ) कं. सूत्र पृष्ठ श्चित्त करे । किसी का सन्देश ले जाकर न कहने पर प्रायश्चित, बड़े भाई के रहते छोटे भाई का ब्याह न करे । पर शान्ति । बच्चे के ऊपर के दो बड़े दाँत निकलने पर शान्ति । ४६-५५ सब प्रकार की शान्तियों का वर्णन । ११०-११५ अध्याय ॥ ६ ॥ ४७-५७ अभिचार की पद्धति । ११५-१२४ ५०-२२ स्वस्त्ययन कर्म । जङ्गल में जाते समय मार्ग में बाघ, १२५-१२८ चोर, हुड़ाल, चरक, सिंह, बनैले हिंसक जानवरों से भय का निवारण । अध्याय ॥ ७ ॥ ५१-२२ गोशाला के कल्याणार्थ गोष्ठकर्म । खेत के नाश करनेवाले १२८-१३० मूसा, पतङ्ग, टिड्डी, हरिण, रुरु आदि । ५२-२१ कारागार से बन्धुओं को छुड़ना । जले अङ्गवाले को अभि- १३०-१३२ मंत्रित जल से धोवे । अग्नि के उत्पात
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Wait, look at ७५ in line 13: ७ curves down to the right.
In line 14, the first digit is ७? Wait, what about the second digit? It is ६?
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Wait, look at ७६:
Could it be ७६? No, the second digit has three bumps like ३!
Wait, why would it be ३३ on lines 14, 15, 16?
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Line 14: -३३
Line 15: -३३
Line 16: -३३
All three end in -३३!
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( ७ ) कं. सूत्र पृष्ठ यक्ष के उपद्रव, गीदड़ के बोलने आपस के झगड़ने, २२३-२५१ ग्रहणों, उषा, दुर्भिक्ष, हैजा, प्लेगादिमारक, आकाश में देव मूर्त्तियां इत्यादि—जब-जब जिस २ देश, नगर ग्राम आदिकों दैवी उपद्रव (अलौकिक) हावें, तब २ इस अद्भुत कर्म के प्रकरण पृ० २२३ से २५१ तक को भली भांति पढ़ समझकर शान्ति की पद्धति द्वारा उस उस कर्म की शान्ति करावे अवश्य कल्याण होगा। ९३ कण्डिका से १३६ कण्डिका तक में क्रमशः सूत्रों की संख्या । ४३, १८, ५, ५, ५, ९, ४, ५, ४ ४, ५, ५, ४, २४, ९, ४, ४, १०, ८, ११, ३, ४, ४, ३, ८, ५, २, ५, २४, २, ३, २, ७, ४, १४, १२, ६, ४, ३, २, ८, २, १२, ४४, अध्याय १४ १३७-४३ यज्ञ गृहरचना आदि । सर्व पाक यज्ञिय कर्म । २५१-२५५ १३८-१६ अष्टका कर्म का वर्णन । २५५-२५६ १३९-२८ अभिजित नक्षत्र में जब चन्द्रका का सम्बन्ध होवे, उस- २५६-२५८ समय अध्यापक अपने शिष्यों के साथ उत्सव करे । १४०-२२ महाराताओं, राजाओं को करने योग्य इन्द्रमहोत्सव २५९-२६० १४१-४५ वेदों के पढ़ने पढ़ाने तथा जिस २ समय पढ़ना, पढ़ाना- २६०-२६३ बन्द होगा इसका विचार । संक्षिप्तटोका संग्रह (ग्रंथ की समाप्ति में) १-५६ शुद्धिपत्र १-३
I
प्रस्तावना ।
प्रायः मनुष्यमात्र अनादि काल से यह विचार करते आते हैं कि यह संसार क्या है, यह कब और कैसे बना, और कब, कैसे नष्ट होगा । इस विषय में अनेकों मतभेद होते हुए भी सब विद्वान् एक ही बात में सहमत हैं कि ज्ञान की पहिली पुस्तक जो अब ही तक उपलब्ध हुई है वह वेद है और वेद के विद्वान् इस पुस्तक को सृष्टि विज्ञान की पूर्ण पुस्तक मानते हैं और उनका दावा है कि मनुष्य की जो उन्नति होती है, हुई है और होगी वह सब इसी वैदिकविज्ञान के आश्रय से है । संसार में मानव सभ्यता के प्राचीनतम काल से लेकर पाश्चात्य वैज्ञानिक आविष्कारों के युग तक समस्त विज्ञान का आधार भूमण्डल में केवल चार ही वस्तु हैं । वे हैं जल, अग्नि, वायु, और मिट्टी । इन्हीं चारों पदार्थों के स्थूल और सूक्ष्म ज्ञान को वेद कहते हैं । ज्ञान दो प्रकार का है एक प्रत्यक्ष जिसको लौकिक या दृष्टवाद और दूसरा अलौकिक या अदृष्टज्ञान कहते हैं । भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक इनमें भूलोक से लेकर स्वर्ग तक तीन लोकों की सृष्टि होती है और इन्हीं तीनों का प्रलय भी होता है । बाकी १४ लोकों या १४ भुवनों में से ११ का पाञ्चभौतिक लोकों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है और इनमें से सायंस ( विज्ञान ) और पदार्थों में शक्ति या गुण क्यों है ? इसका ज्ञान दर्शनशास्त्र ( अध्यात्म शास्त्र ) से होता है । ये दोनों प्रकार के ज्ञान वेद से होता है । वेद चार क्यों हैं ? अधिक या कम क्यों नहीं ? इसका उत्तर अग्नि, जल, वायु और पृथिवी इन्हीं चार भिन्न २ पदार्थों की अलग २ शक्तियाँ स्थूल और सूक्ष्म का ज्ञान वेदों से होता है इसलिये अग्नि का ज्ञान पूर्ण रूप से ऋग्वेद से, यजुर्वेद से, वायु के प्रकार कार्य्य इत्यादि जाने जाते हैं । सामवेद से जल सम्बन्धी सारी बातों का पूर्ण ज्ञान होता है और अथर्ववेद से यही पृथिवीतत्व का पूर्णतया ज्ञान होता है । इसीलिये ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इस प्रकार चार वेद हैं ।
( ख ) वेदोंकी शाखा । अग्नितत्त्व के ज्ञान के लिये वेद में २१ प्रधान विभाग हैं। अतएव ऋग्वेद की २१ शाखायें हैं । जलतत्त्व के प्रधान एकहजार विभाग हैं इसलिये सामवेद की १००० शाखायें हैं । यजुर्वेद में वायु के प्रधान १०१ विभाग हैं । अतएव उतनी ही उसकी शाखायें हैं और मिट्टी के ९ प्रधान विभाग हैं। इसलिये अथर्ववेद की नौ शाखायें हैं। ये सब मिलकर ११३१ शाखायें हैं। साम शब्द का अर्थ है जल, ऋक् का अग्नि, यजुः का अर्थ वायु और अथर्व का अर्थ मिट्टी। प्रत्येक वेद में जल, अग्नि, वायु, और मिट्टी पारिभाषिक शब्द हैं और उनसे हमारे इस जल, अग्नि, वायु, मिट्टी ही का तात्पर्य नहीं है; किन्तु इन चारों पदार्थों के आदि स्वरूप प्रकृति की अन्त्य अवस्था से लेकर स्थूलतम अवस्था तक जितने रूप, प्रकारान्तर से अवान्तर विभाग इत्यादि बनते हैं, उन सब का जातिवाचक नाम जल, अग्नि, वायु और मिट्टी वेद में हैं। जलसे वेद में घृत, मधु, सुरा, जल, इत्यादिक समस्त जलीय पदार्थों से अभिप्राय है। और जल के सूक्ष्म कण जो भाप रूप से आकाश में स्थित हैं, उनको वेद जल ही कहकर पुकारता है। वेद की शाखा का विभाग इस रूप से किया गया है कि एक एक शाखा में हम चार मूल पदार्थों के एक विभाग के गुण, कर्म, स्वभाव इत्यादिकों का विस्तृत वर्णन आ जाय। जैसे सामवेद की १००० शाखाओं में से १००० विभागों में एक एक विभाग का एक एक शाखा में विस्तृत वर्णन मिलेगा। अर्थात् एक जल पर एक शाखा प्रचलित हुई । इसी प्रकार अन्य वेदों की भी शाखायें हैं। प्राचीन ऋषियों ने प्रकृति की अवस्था से अन्त्य अवस्था तक योग बल से पूर्णावलोकन प्रत्येक देश में उस देश की प्राकृतिक रचना को देखकर इन शाखाओं का विस्तृत और क्रमपूर्वक प्रचार किया । उदाहरण स्वरूप उत्तर देश जल- और वायु प्रधान होने से विन्ध्य पर्वत के ऊपर साम और यजुर्वेद का प्रचार हुआ और विन्ध्य से नीचे दक्षिण देश अग्नि और भूमि की प्रधानता होने से वहाँ ऋग्वेद एवं अथर्ववेद का प्रचार हुआ । इससे साफ २ दीखता है कि हमारे ऋषियों ने सृष्टि का कितना सूक्ष्म और विस्तृत अध्ययन किया था। वर्तमान समय में हमारे अभाग्य से वेद की ११३१ शाखाओं में से भारतवर्ष में केवल छः ही उपलब्ध हैं। और ज़र्मन देश में १०३ शाखायें मिलती
( ग ) हैं। जिनको वहाँ की सरकार ने सुरक्षित कर रक्खी हैं। जिनका अध्ययन केवल वहाँ के शिखा रखने वाले ही द्वारा कराया जा सकता है। वेद का अर्थ निरुक्त से होता है। प्राचीन काल में प्रत्येक शाखा के भिन्न २ वेदाङ्गं (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) होते थे। इस समय के पहिले १८ निरुक्त कई एक व्याकरण, ज्योतिष आदि मिलते थे। अब तो भारत में एक व्याकरण, निरुक्त (व्यास्क्रीय) एक मिलते हैं। परन्तु जर्मन देश में निरुक्त ३ मिलते हैं। वेद में अनेक प्रकार के वायुयानों का उल्लेख हैं; जिनमें से इस समय तक १८ प्रकार के वायुयानों का पता जर्मनों ने लगाया है। वेद के द्वारा हमारे ऋषि सूर्य आदि अन्य मण्डलों में जा सकते थे। इस समय का वायुयान केवल अधिक से अधिक १०१ मील तक जा सकेगा। अभी केवल २१ ही मील तक जा सकता है। ९ प्रकार के विद्युत को हमारे ऋषिगण जानते थे, एक विद्युत के प्रकाश से जिसको उत्तरी ध्रुव के नीचे बिन्दु सरोवर के ऊपर रक्खा जाता था उसी से सम्पूर्ण एशिया में प्रकाश होता था। इत्यादि आश्चर्यमय विषयों का वर्णन वेदों की सारी शाखाओं में उपदिष्ट हैं। हमारे दुर्भाग्य से वेदों की सब शाखायें नहीं मिल रही है। आज हमने पाठकों के अवलोकनार्थ अमेरिका में प्रकाशित अथर्व- वेदीय कौशिक गृह्यसूत्र को सानुवाद प्रकाशित किया है। आज तक जितने वैदिक गृह्यसूत्र उपलब्ध हुए हैं उनमें लोकहित की ऐसी बातें प्रकाशित नहीं पाई गई हैं जैसा कि इस सूत्र में अलौकिक आश्चर्य शक्ति वाले पदार्थों का वर्णन इसमें पाया जाता है जिनको पाठकवर्ग देखकर उनसे लाभ उठावेंगे। अनुवादक
भूमिका । —❀— वेद से बढ़कर संसार में कोई प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ आजतक उपलब्ध नही हुआ है । मनुष्यों के लिये इससे बढ़कर किसी भाषा या धर्म सम्प्रदाय में ग्रंथ आज तक नहीं पाया गया है। इस विषय में एक सुप्रसिद्ध जर्मन देश के विद्वान् भट्ट मैक्षमूलर साहब यों लिखते हैं' कि वैदिक संहिता भाव, भाषा, तात्पर्य, रचना, प्रणाली और व्याकरण घटित विलक्षणता की विवेचना कर देखने से मालूम होता है कि संस्कृत भाषा में संसारकी विभिन्नजाति और देश की किसी भाषा में वैदिक संहिता के समान कोई दूसरी पुस्तक नहीं है। यह अलौकिक संस्कृत साहित्य का प्राचीन तम ग्रंथ “ऋग्वेद संहिता” है। यही मनुष्य जाति के हित के लिये पहिला ग्रंथ है। मानवीय सभ्यता का एक मात्र पहिला निदर्शन मनुष्य जाति का प्राचीनतम इतिहास और धर्म विश्वास का प्रथम मार्ग दर्शक है। इस लिये मनुष्य मात्र को यह वेद आदरणीय है। मनुष्य जाति के जिस समय का इतिहास कहीं नहीं पाया जाता है जिस I—The veda has a two fold interest, it belongs to the History of the world and to the History of India. In the History of the world the veda fills a gape which literary work in other langu- ages could fill. It carries us back to time of which we have no records any where and gives us the very words of gener- aration of men of whom otherwise we could form the vaguest estimate by means of conjectures and inferences. As long as man continues to take an interest in the history of his race and as long as we collect in literaries and museums the relics of farmer ages the place in that long row of books which contains the records of the Aryan branch of man kind belongs for ever to the regveda the most ancient than the Zindavasta and Homer ( 940-850. B. C. Professor Max mullar's History of Ancient Literature p. 63.
( २ ) समय की चिन्ता, धर्म, विश्वास, सभ्यता, उपासना, पद्धति देवोत्थान, सामाजिक, रीति, नीति, आशा, भरोसा और हृदय का भाव काल के अनन्त स्रोत के गर्भ में विलीन हुए हैं, जिस समय के इतिहास के उद्धार के लिये अन्य उपाय विद्यमान नहीं उसी स्मरणातीत समय का इतिहास सुप्रणाली बद्धरूप वेदों में ही सोने के अक्षरों में लिपिबद्ध हैं। इसी निमित्त सभ्य जगत् के सर्वत्र पण्डित मण्डली में वेदों की संहिताओं का इतना सम्मान और आदर है। वेदों की संहितायें चार हैं—ऋग्वेद , यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जिनमें से—यहां अथर्ववेद के सम्बन्ध में लिखा जाता है।
अथर्ववेद की उत्पत्ति ।
दैवीं वाचमजनयन्त देवास्तां, विश्वरूपा पशवो वदन्ति । मन्द्रेष मूंर्जं दुहाना, धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतै तु ॥ १ ॥ भा० टी०—दैवी वाणी को देवताओं ने उत्पन्न किया, उसी को अनेक प्रकार के पशु बोलते हैं, गम्भीरनादमय धेनुस्वरूप वह वाणी हमारे द्वारा अभिष्टुत होकर अन्न तथा बल को देती हुई हमको प्राप्त हो ॥१॥ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव, विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ॥ स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा अथर्वातां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भरद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भरद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥ भा०टी०—विश्वरचयिता और उसका पालयिता देवताओं में पहिले ब्रह्मा हुए। वह सारी विद्याओं में प्रतिष्ठित वेदविद्या को अपने सबसे बड़े पुत्र अथर्व ऋषि को कहने लगे ॥ १ ॥ ब्रह्मा ने जिस वेद विद्या को अथर्वा से कहा, अथर्वा ने उसी को पहिले अङ्गिरा के प्रति कहा, अङ्गिरा ने भरद्वाज से कहा, और भरद्वाजने उसी परावरविद्याको आङ्गिरस से कहा ॥२॥ अथर्ववेद की मुण्डकोपनिषद् की इन दो श्रुतियों से वेदमात्र का पहिला वक्ता ब्रह्मा ही सिद्ध होते हैं। अथर्ववेद में प्राकृतिक पदार्थों के गुण वर्णन द्वारा, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रोगों की दवा का उपदेश है। जैसे—पृथिवी (मिट्टी) इसमें सर्प के विष को चूसने का गुण है (सर्प के काटे को भूमि में गढ़ा खोद कर श्वास लेने, जितना भाग छोड़ कर गाड़ देने से--सर्प विष
( ३ ) दूर हो जाता है ) । पृथिवी सम्भत् ( ऊषर पड़त मिट्टी ) अर्थात् रेह मिट्टी में कफ वाली खांसी को हटाने का गुण है। देवी मिट्टी में ( सौराष्ट्र मृत्तिका ) केशोंको काले, लम्बे और दृढ़ बनाने का गुण है और खान- पान आदि में दिये स्थावर बिष को नष्ट करती है। उपजीकोद्भृत् ( दीमक की मिट्टी ) व्रण ( घाव के गिरते पीव ) स्राव को और नशा करने वाले स्थावर विष से हुई मूर्च्छा और सर्प विष को भी नष्ट करती है। ऊँचे टीले और पहाड़ों पर दौड़ कर चढ़ जाने से तुरन्त काटे सर्प का विष निर्बल हो जाता है। अब जल का गुण कहते हैं। आपः ( जल ) जल में तुरन्त के घाव, स्वप्नदोष, नीद का न होना, और क्षेत्रिय ( वंश परम्परागत रोग ) को दूर करने का गुण है। और जल नेत्र-दृष्टि-वर्द्धक है। नदी के प्रवाहित जल में तैरने से सर्प विप दूर होता है। अवत्क ( ऊँचे से नीचे गिरता हुआ जल ) हिमालय पर्वत से निकलते हुए झरने का जल, हृदय जलन, और नेत्र जलन को दूर करता है। नये कूप का जल और ऊँचे से नीचे गिरता हुआ ( फाल का ) जल व्रणस्राव नाशक है। मेघवृष्टि धारा रुके मूत्र को निकाल देती है। और जल सब ही रोगों का नाशक है। अग्नि—शीत रोग को दूर करता है, सर्प विप को जला कर नष्ट कर देता है। कृमि दूषित आहार को शुद्ध करता है। रुके मूत्र को निकालता है और सुख से प्रसव कराता है। और सब रोगों का नाशक और रसायन है। भूरिधायस पर्जन्य ( पार्थिव अग्नि ) और होमाग्नि ( होम का अग्नि ) इन अग्नियों के गुण ऊपर कहे गये जानो। विद्युत या बिजुली इन्द्र ( विद्युत् शक्ति वाला ) इसके द्वारा सारे रोग दूर होते हैं। वरुण ( विद्युत् धारा ) भोजन में से कृमि दोष को दूर करता है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है और रसायन है। वायु—मरुत् ( साधारण चलता हुआ वायु ) वायु स्वास्थ्यप्रद है, शरीर में दवा का काम करता है। सुख से प्रसव कराता है। सब रोग नाशक है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है और रसायन है। वेधा ( प्रत्येक ऋतु का वायु ) बृहस्पति ( ऊपर का वायु ) मित्र ( साधन या यंत्र से प्रेरित वायु ) इन सबों में ऊपर कहे गुण हैं। मेघ, वृषा ( बादल ) गर्जना कर बरसता हुआ सर्प विष नाशक है। चन्द्र ( चन्द्रमा ) चन्द्रमा की चान्दनी रुके मूत्र को बाहर निकालती है और क्षेत्रिय रोगों को दूर करती है। सूर्य—हृदय रोग, हलीमक, कामला, अपची, गण्डमाला, शिरोरोग को नष्ट करता
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है। सुख से प्रसव कराता है, और सब ही जानवरों के विष को नष्ट करता है। क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है, कृमि नाशक है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है। क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है। और सर्व रोगना- शक रसायनरूप है। सूर्य के पर्यायवाची नाम—सूर्य, अर्यमा, सविता और आदित्य हैं। आठ वसु जिनका वर्णन वेदों में है, उन आठ वसुओं के भिन्न २ गुणों के कहने के पश्चात् अब अकारादि क्रम से अथर्ववेदोक्त दवाओं के गुणों का वर्णन करते हैं। अग्नि—(चित्रक या चीता दवा) यह दवा योनि दोष, गर्भ संस्राव, जातघातक रोगों तथा योनि एवं गर्भाशय में होने वाले कृमियों का नाशक है। अङ्ग (बोल नाम की दवा) बुखार को दूर करता है। अजशृङ्गी (मेढ़ासिंगी) शरीर में विष तुल्य मादक प्रभाव लानेवाले कृमियों को नष्ट कर देती है, भूत के द्वारा उन्माद का नाशक है। अदिति (गौ के दूध, घी, दही, माठा आदि पञ्चगव्य) सांप के विष को दूर करता है। अपामार्ग (श्वेत अपामार्ग, ढाल अपामार्ग, चिड़चिड़ी) सफेद चिड़चिड़ी मन्दाग्नि, ग्लानि, वमन, बन्ध्यापन, सन्तान स्तम्भन को दूर करता है, और लाल चिड़चिड़ी तृष्णा रोग, भस्मक रोग, पुरुषेन्द्रिय की निर्बलता को हटाता है। और अधः स्थान (गुदा, लिङ्ग, योनि) के अर्श रोग (बवासीर) और ऊर्ध्व स्थान (मुख, नाक) के अर्बुदों को नष्ट करता है। वीर्य्य स्तम्भक बाजीकरण है। संक्रमित होने वाले छूत रोगों को नष्ट करता है। अर्क (आक, अकवन) जननेन्द्रिय (लिङ्ग) में हर्ष एवं वृद्धि करने वाली बाजीकरण है। अर्जुनकाण्ड (कुह वृक्ष)*क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है। और खेत के अनुपज को नष्ट करता है। अश्वत्थ “शमीस्थ” (पीपलबन्दा, शमी वृक्ष पर लगा हुआ) गर्भ स्थापन कारक है, और पुरुष द्वारा सेवन करने से पुत्र पैदा होता है एवं स्त्री द्वारा सेवन करने से कन्या होती है। और पुरुष के वीर्य्य एवं स्त्री के रज का बढ़ाने वाला है। अश्ववार (कांस) सर्प काटे विष का बन्धन रोकने वाला है। असिक्नी (नीलिनी, नीळ) केशों की सफेदी, श्वेत कुष्ठ, गलित कुष्ठ को दूर करती है। आञ्जन (अञ्जन सुरमा) हलीमक, पाण्डु, विषय भोग से हुए रोग, अङ्गभेदक, विसल्यक फैलनेवाले विसर्प, हृदय और श्वास रोग को दूर करनेवाला आयुवर्द्धक है। आञ्जनमणि—सर्पकाटे विष एवं स्थावर विष को नष्ट करता है। मोहरूप मानसिकरोग का नाशक है। स्वप्न-
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दोष, निद्राक्षय को दूर करता है । एवं विषतुल्य मादक प्रभाववाले कृमियों को नष्ट करता है । हलीमक-पाण्डु, विषभोगजन्यक्षय, अङ्गफूटन विसर्प, श्वास, हृदयरोग, नेत्ररोग को नष्ट करता है एवं आयु बढ़ाने वाला रसायन है। पशुओं को स्वास्थ्य, पुष्टि और सन्तति शक्ति देने वाला है । आसुरी—सफेद सरसों-श्वेतकुष्ठ, गलितकुष्ठ को नष्ट करती है । स्त्रियों में सुभागत्व और सौन्दर्य कान्ति बढ़ाती है । इन्द्र (इन्द्रायण लाल फल उछलनेवाले, फूकारनेवाले, लिपटनेवाले और तिरछी रेखावाले सर्पों के विष को दूर करता है और सब ही सर्पों के विष को नष्ट करता है । उपजीका—'उपजीकानुषिक्त (दीमकों का मुखस्राव) नशा करने वाले स्थावर विष को नष्ट करता है । उपजीका-उपजीकोद्भूत उखाड़ी- उगली वल्मीकमृत्तिका, व्रणस्राव को नष्ट करती है। ऋषभ (अष्टवर्ग की ऋषभक दवा) वन्ध्यापन और गर्भपात रोगको नष्ट करती है और गर्भ स्थापन शक्ति देती है । औक्षगन्धि—(वृष्यगन्धाबला) विष तुल्य मादक प्रभाव करने वाले कृमियों को, भूतोन्माद को दूर करती है। औदुम्बरमणि (गूलर वृक्ष) पुष्टि, बल और सन्तति उत्पन्न करने की शक्ति देता है । और पशुओं को स्वास्थ्य एवं सन्तान शक्ति देता है । कन- कक (टङ्कण सुहागा) सर्प विष नाशक है । खाने से सर्प विष को बाहर ले आता है । कन्या (बड़ी इलायची) इसकी जड़ से सर्प विष नष्ट होता है। करम्भ (फूल प्रियङ्गु, मालकौनी) खान पान में दिये स्थावर विष के प्रभाव को नष्ट करती है । कल्याणी (माषपर्णी) काम- शक्तिवर्द्धक वाजीकरण है । कश्यपवीवर्ह (चमरी मृगपुच्छ) इसका झाल सारे रोगों में हितकर है । कान्दा विष (कन्द विष) सर्प विषना- शक, अर्थात् सर्प विष को बाहर ले आता है । कुमारिका (बांझक कोड़ा) सर्प विष नाशक है (इसके फल नहीं आते, जङ्गलों में होती है) कुषुम्भक (नेवलाप्राणी) सर्प के विष को चूसने वाला है। इसके मल मूत्र, लार, रोम, अङ्ग, सर्प विष को निर्बल कर बाहर निकाल देते हैं । कुष्ठ (पर्वत पर का कुष्ठ) शिरोरोग, नेत्रान्ध, रक्तदोष को दूर करता है । नपुंस- कता नाशक वृष्य है । एवं तृतीयक, चातुर्थिक, सन्तत और ऋतु के ज्वर को एवं मलेरिया ज्वर को नष्ट करता है। कृष्णा—(नीलिनी, नील) पहिले ही इसके गुण कहे गये । केशवर्धिनी (भृङ्गराज, भांगरा) कान्ति देने, तेज बढ़ाने, धातु वृद्धि, और केशों को बढ़ाने वाली है । गन्धारि (कचूर) ज्वर नाशक है । गुग्गुल (गूगल) शरीर के कठिन रोगों,
( ६ ) शापकृत मानसिकखेद, छूत रोग, वात रोग को दूर करता है और विष तुल्य मादक प्रभावकारी कृमियों को नष्ट करता है। भूतोन्माद का नाशक है। घृताची-देखो बड़ी इलायची चीपद्रु (चीड़वृक्ष) विविध फुन्सी, फोड़ों विद्रधि को नष्ट करता है। जङ्गिडमणि—मोह आदि मानसिक रोगों को दूर करती है। और अनेक प्रकार के असाध्य रोग कृत्या द्वारा किये रोगों को नाश करता है। जीवन्ती—जीवन देने, रोग दूर करने, स्वास्थ्य रक्षक, बल पुष्टि देनेवाली रसायन है। जीवला—(सिंह पिप्पली) पशुओं के रोगों को दूर करती है। तरुणक—(तृण रोहिष तृण) सर्प के काटे विष को नष्ट करती है। तस्तुव—(कड़वी तोरी) सर्प विष को नष्ट को नष्ट करती है। तिल पिञ्जी (तिलों की मञ्जरी एवं नाल) क्षेत्रिय रोगों को नष्ट करती है और तिल नाल के भस्म खेतों के अनुपज दोष को दूर करती है। तौदी—(बड़ी इलायची) देखो पूर्व कहा। दर्भ (दाभ) सर्प के काटे विष का बन्धक है। दर्भमणि—स्वास्थ्य एवं दीर्घायु देने वाला रसायन है। दश वृक्ष (दशमूल) सन्धिवात मस्ति- ष्कवात (मृगी,) रोगों का नाशक है। दासी-(काकजङ्घा) ज्वर को नष्ट करता है। दृत्ति (जोक प्राणी) सर्प काटे विष को चूसने वाली है। देवी (सौराष्ट्र की मट्टि) केशों को लम्बे, काले, दृढ़ बना देती है। नघमार—(कुष्ठभेद मीठा कुष्ठ) शिरो रोग, तृतीयक, सन्तत, ऋतु ज्वर को नष्ट करता है। नघारिष—(कुष्ठभेद कड़वाकूट) उपरोक्त गुण वाला है। नमः—(वज्र अभ्रक) दर्भमणि के गुण जानो। नलदी (जटा- मांसी) विषतुल्य मादक प्रभाव वाले कृमियों को नष्ट करती है। नवती (पिपीलिकायें) सर्प काटे विष को नष्ट करती है। परुषवार— (मूंज) सर्प काटे विप का बन्धक है। पर्जन्य (दारु हल्दी) स्वास्थ्य और आयु को प्रदान करती है, रसायन है। पर्णमणि = इसमें सोमलता के सब गुण हैं। पाढा (पाठा, पाढ़) शस्त्र प्रहार के घाव को अत्यन्त लाभ दायक है। पिङ्ग (हरिताल) प्रसूति रोग, गर्भ भक्षक कृमियों, मृतवत्सा रोग जन्म कर सन्तान मरजाने के रोग को नष्ट करती है। पिप्पली (पीपल दवा) आक्षेपक, पक्षाघात, गठिया, आदि वातरोग को नष्ट करती है। जीवन देनेवाली रसायन है। पीला (पिप्पली) विषतुल्य मादक प्रभावकारी, कृमियों को नष्ट करती है। भूतोन्माद नाशक है। पृश्निपर्णी (पृष्टिपर्णी) बवासीर, दाद, कुष्ठ- रोग, योनिविकार, गर्भक्षय, आदि कृमियों से आक्रान्त रोगों को नष्ट