महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४९- बहेलियेको स्वर्गलोककी प्राप्ति १५०- इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयको फटकारना १५१- ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना १५२- इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुनः अपने राज्यमें प्रवेश १५३- मृतककी पुनर्जीवन-प्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमता १५४- नारदजीका सेमल-वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न १५५- नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना १५६- नारदजीकी बात सुनकर वायुका सेमलको धमकाना और सेमलका वायुको तिरस्कृत करके विचारमग्न होना १५७- सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान्के साथ वैर न करनेका उपदेश १५८- समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण १५९- अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना १६०- मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य १६१- तपकी महिमा १६२- सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन १६३- काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय १६४- नृशंस अर्थात् अत्यन्त नीच पुरुषके लक्षण १६५- नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन १६६- खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन १६७- धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय १६८- मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ १६९- गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बकपक्षीके घरपर अतिथि होना १७०- गौतमका राजधर्मद्वारा आतिथ्य-सत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश